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पाताल खण्ड · अध्याय 44

द्रोण पर्वत पर देवताओं की पराजय

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (padma.5.44.1)

शेष उवाच। आगत्य सविधे रुद्रं समरांगणमूर्धनि । जगाद हनुमान्वीरः संजिहीर्षुः सुराधिपम्

śeṣa uvāca āgatya savidhe rudraṁ samarāṁgaṇamūrdhani jagāda hanumānvīraḥ saṁjihīrṣuḥ surādhipam

शेष जी ने कहा — रणभूमि के अग्रभाग में रुद्र के समीप जाकर, देवताओं के स्वामी को युद्ध से हटाने की इच्छा से वीर हनुमान ने कहा।

श्लोक 2 (padma.5.44.2)

हनूमानुवाच। त्वं यदाचरसे रुद्र धर्मस्य प्रतिकूलनम् । तस्मात्त्वां शास्तुमिच्छामि रामभक्तवधोद्यतम्

hanūmānuvāca tvaṁ yadācarase rudra dharmasya pratikūlanam tasmāttvāṁ śāstumicchāmi rāmabhaktavadhodyatam

हनुमान ने कहा — हे रुद्र! तुम धर्म के विपरीत आचरण कर रहे हो, इसलिए राम-भक्त के वध पर उद्यत तुम्हें मैं दंडित करना चाहता हूँ।

श्लोक 3 (padma.5.44.3)

मया पुरा श्रुतं देव ऋषिभिर्बहुधोदितम् । रघुनाथपदस्मारी नित्यं रुद्रः पिनाकभृत्

mayā purā śrutaṁ deva ṛṣibhirbahudhoditam raghunāthapadasmārī nityaṁ rudraḥ pinākabhṛt

हे देव! मैंने पहले ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से यह सुना था कि पिनाकधारी रुद्र सदा रघुनाथ के चरणों का स्मरण करते हैं।

श्लोक 4 (padma.5.44.4)

तत्सर्वं तु मृषा जातं शत्रुघ्नं प्रति युध्यतः । पुष्कलो मे हतः शूरः शत्रुघ्नोऽपि विमूर्च्छितः

tatsarvaṁ tu mṛṣā jātaṁ śatrughnaṁ prati yudhyataḥ puṣkalo me hataḥ śūraḥ śatrughno'pi vimūrcchitaḥ

वह सब मिथ्या सिद्ध हो गया, क्योंकि तुम शत्रुघ्न के विरुद्ध युद्ध कर रहे हो: मेरा शूरवीर पुष्कल मारा गया, और रामानुज शत्रुघ्न भी मूर्च्छित कर दिया गया।

श्लोक 5 (padma.5.44.5)

तस्मात्त्वां पातयाम्यद्य त्रैलोक्यप्रलयोद्यतम् । यत्नात्तिष्ठस्व भोः शर्व रामभक्तिपराङ्मुखः

tasmāttvāṁ pātayāmyadya trailokyapralayodyatam yatnāttiṣṭhasva bhoḥ śarva rāmabhaktiparāṅmukhaḥ

इसलिए हे शर्व! त्रिलोक-प्रलय पर उद्यत तुम्हें मैं आज गिरा दूँगा; हे राम-भक्ति से विमुख! सावधान होकर खड़े रहो।

श्लोक 6 (padma.5.44.6)

शेष उवाच। इत्युक्तवंतं प्लवगं प्रोवाच स महेश्वरः । धन्योऽसि वीरवर्यस्त्वं भवान्वदति नो मृषा

śeṣa uvāca ityuktavaṁtaṁ plavagaṁ provāca sa maheśvaraḥ dhanyo'si vīravaryastvaṁ bhavānvadati no mṛṣā

शेष जी ने कहा — इस प्रकार कहने वाले उस वानर से महेश्वर ने कहा — धन्य हो, हे वीरवर्य! तुम जो कहते हो वह मिथ्या नहीं है।

श्लोक 7 (padma.5.44.7)

मत्स्वामी रामचंद्रोऽयं सुरासुरनमस्कृतः । तदश्वमानयामास शत्रुघ्नः परवीरहा

matsvāmī rāmacaṁdro'yaṁ surāsuranamaskṛtaḥ tadaśvamānayāmāsa śatrughnaḥ paravīrahā

यह रामचंद्र, जो देवों और असुरों द्वारा नमस्कृत हैं, मेरे स्वामी ही हैं; शत्रुघ्न, जो शत्रुवीरों के संहारक हैं, उन्होंने यह अश्व लाया था —

श्लोक 8 (padma.5.44.8)

तद्रक्षार्थं समायातस्तद्भक्त्या तु वशीकृतः । यथाकथंचिद्भक्तोऽसौ रक्ष्यः स्वात्मा इति स्थितिः

tadrakṣārthaṁ samāyātastadbhaktyā tu vaśīkṛtaḥ yathākathaṁcidbhakto'sau rakṣyaḥ svātmā iti sthitiḥ

— और मैं उसकी रक्षा के लिए ही यहाँ आया हूँ, उनकी भक्ति से वशीभूत होकर। किसी न किसी प्रकार इस भक्त की रक्षा होनी ही चाहिए — यही मेरा निश्चय है।

श्लोक 9 (padma.5.44.9)

रघुनाथः कृपां कृत्वा विलोकय तु निस्त्रपम् । मां स्वभक्त सुदुःखेन किंचित्कोपं दधन्महान्

raghunāthaḥ kṛpāṁ kṛtvā vilokaya tu nistrapam māṁ svabhakta suduḥkhena kiṁcitkopaṁ dadhanmahān

हे रघुनाथ! कृपा करके निःसंकोच होकर मुझे देखें; हे महान्! मैंने अपने भक्त के अत्यंत दुःख के कारण कुछ क्रोध धारण किया।

श्लोक 10 (padma.5.44.10)

शेष उवाच। एवं वदति चंडीशे हनूमान्कुपितो भृशम् । शिलामादाय महतीं ताडयामास तद्रथम्

śeṣa uvāca evaṁ vadati caṁḍīśe hanūmānkupito bhṛśam śilāmādāya mahatīṁ tāḍayāmāsa tadratham

शेष जी ने कहा — चंडीश के इस प्रकार कहने पर भी हनुमान अत्यंत क्रुद्ध होकर एक विशाल शिला उठाकर उनके रथ पर दे मारी।

श्लोक 11 (padma.5.44.11)

शिलया ताडितस्तस्य रथः शकलतां गतः । ससूतः सहयः केतुपताकाभिः समन्वितः

śilayā tāḍitastasya rathaḥ śakalatāṁ gataḥ sasūtaḥ sahayaḥ ketupatākābhiḥ samanvitaḥ

उस शिला के प्रहार से उनका रथ सारथि, अश्वों तथा ध्वजा-पताकाओं सहित चूर-चूर हो गया।

श्लोक 12 (padma.5.44.12)

नभःस्था देवताः सर्वाः प्रशशंसुः कपीश्वरम् । धन्योसि प्लवगाधीश महत्कर्म त्वया कृतम्

nabhaḥsthā devatāḥ sarvāḥ praśaśaṁsuḥ kapīśvaram dhanyosi plavagādhīśa mahatkarma tvayā kṛtam

आकाश में स्थित समस्त देवगण कपीश्वर की प्रशंसा करने लगे — धन्य हो, हे कपिराज! तुमने बड़ा भारी कार्य किया है।

श्लोक 13 (padma.5.44.13)

श्रीशिवं विरथं दृष्ट्वा नंदी तं समुपाद्रवत् । उवाच श्रीमहादेवं मत्पृष्ठं गम्यतामिति

śrīśivaṁ virathaṁ dṛṣṭvā naṁdī taṁ samupādravat uvāca śrīmahādevaṁ matpṛṣṭhaṁ gamyatāmiti

श्री शिव को रथहीन देखकर नंदी उनकी ओर दौड़ आया और श्री महादेव से बोला — अब मेरी पीठ पर सवार हो जाइए।

श्लोक 14 (padma.5.44.14)

वृषस्थितं तु भूतेशं हनूमान्कुपितो भृशम् । शिलामुत्पाट्य तरसा प्राहनद्धृदये तदा

vṛṣasthitaṁ tu bhūteśaṁ hanūmānkupito bhṛśam śilāmutpāṭya tarasā prāhanaddhṛdaye tadā

भूतेश को वृषभ पर बैठा देखकर हनुमान अत्यंत क्रुद्ध होकर एक शिला उखाड़कर तुरंत उनके हृदय पर दे मारे।

श्लोक 15 (padma.5.44.15)

तदाहतो भूतपतिः शूलं तीक्ष्णं समाददे । जाज्वल्यमानं त्रिशिखं वह्निज्वालासमप्रभम्

tadāhato bhūtapatiḥ śūlaṁ tīkṣṇaṁ samādade jājvalyamānaṁ triśikhaṁ vahnijvālāsamaprabham

उस प्रहार से आहत भूतपति ने एक तीक्ष्ण त्रिशूल उठाया, जो अग्निज्वाला के समान तेजस्वी, प्रज्वलित और त्रिशिखर वाला था।

श्लोक 16 (padma.5.44.16)

आयातं तन्महद्दृष्ट्वा शूलं प्रज्वलनप्रभम् । हस्ते गृहीत्वा तरसा बभंज तिलशः क्षणात्

āyātaṁ tanmahaddṛṣṭvā śūlaṁ prajvalanaprabham haste gṛhītvā tarasā babhaṁja tilaśaḥ kṣaṇāt

उस आते हुए महान् प्रज्वलित त्रिशूल को देखकर कपींद्र ने उसे तुरंत हाथ से पकड़कर क्षणभर में चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 17 (padma.5.44.17)

भग्ने त्रिशूले तरसा कपीन्द्रेण क्षणाच्छिवः । शक्तिं करे समाधत्त सर्वलोहविनिर्मिताम्

bhagne triśūle tarasā kapīndreṇa kṣaṇācchivaḥ śaktiṁ kare samādhatta sarvalohavinirmitām

कपींद्र द्वारा त्रिशूल को इस प्रकार तत्क्षण तोड़ दिए जाने पर शिव ने पूर्णतः लौहनिर्मित एक शक्ति हाथ में ले ली।

श्लोक 18 (padma.5.44.18)

सा शक्तिः शिवनिर्मुक्ता हृदये तस्य धीमतः । लग्ना क्षणादभूत्तत्र विक्लवः प्लवगाधिपः

sā śaktiḥ śivanirmuktā hṛdaye tasya dhīmataḥ lagnā kṣaṇādabhūttatra viklavaḥ plavagādhipaḥ

शिव द्वारा छोड़ी गई वह शक्ति उस बुद्धिमान के हृदय में क्षणभर में जा लगी; कपिराज क्षणभर के लिए व्याकुल हो गए।

श्लोक 19 (padma.5.44.19)

क्षणाच्च तद्व्यथां तीर्त्वा गृहीत्वा वृक्षमुल्बणम् । ताडयामास हृदये महाव्यालविभूषिते

kṣaṇācca tadvyathāṁ tīrtvā gṛhītvā vṛkṣamulbaṇam tāḍayāmāsa hṛdaye mahāvyālavibhūṣite

उस पीड़ा को क्षणभर में सहन करके उन्होंने एक विशाल वृक्ष उखाड़ा और महासर्पों से विभूषित शिव के हृदय पर प्रहार किया।

श्लोक 20 (padma.5.44.20)

ताडितास्तेन वीरेण फणीन्द्रास्त्रा समागताः । इतस्ततस्ते तं मुक्त्वा गताः पातालमुज्जवाः

tāḍitāstena vīreṇa phaṇīndrāstrā samāgatāḥ itastataste taṁ muktvā gatāḥ pātālamujjavāḥ

उस वीर के प्रहार से वे तेजस्वी सर्पाभूषण अपने स्थान से छूटकर इधर-उधर पाताल की ओर चले गए।

श्लोक 21 (padma.5.44.21)

शिवस्तस्मिन्नगे मुक्ते वक्षसि स्वे निरीक्ष्य च । कुपितो व्यदधाद्घोरं मुसलं करयुग्मके

śivastasminnage mukte vakṣasi sve nirīkṣya ca kupito vyadadhādghoraṁ musalaṁ karayugmake

अपने वक्षस्थल पर छोड़े गए उस वृक्ष को देखकर शिव क्रुद्ध हो उठे और दोनों हाथों में एक भयंकर मुसल धारण किया।

श्लोक 22 (padma.5.44.22)

हतोसि गच्छ संग्रामात्पलाय्य प्लवगाधम । एष ते प्राणहंताहं मुसलेन क्षणादिह

hatosi gaccha saṁgrāmātpalāyya plavagādhama eṣa te prāṇahaṁtāhaṁ musalena kṣaṇādiha

तू मारा गया! हे नीच वानर! युद्ध से भाग जा! मैं इस मुसल से अभी क्षणभर में तेरे प्राण लेता हूँ।

श्लोक 23 (padma.5.44.23)

मुसलं वीक्ष्य निर्मुक्तं शिवेन कुपितेन वै । कीशस्तद्वंचयामास महावेगाद्धरिं स्मरन्

musalaṁ vīkṣya nirmuktaṁ śivena kupitena vai kīśastadvaṁcayāmāsa mahāvegāddhariṁ smaran

क्रुद्ध शिव द्वारा छोड़े गए उस मुसल को देखकर वानर ने हरि का स्मरण करते हुए अत्यंत वेग से उसे चकमा दे दिया।

श्लोक 24 (padma.5.44.24)

मुसलं तत्पपाताधः शिवमुक्तं महायसम् । विदार्य पृथिवीं सर्वां जगाम च रसातलम्

musalaṁ tatpapātādhaḥ śivamuktaṁ mahāyasam vidārya pṛthivīṁ sarvāṁ jagāma ca rasātalam

शिव द्वारा छोड़ा गया वह विशाल लौह-मुसल नीचे गिरा और संपूर्ण पृथ्वी को भेदकर रसातल में चला गया।

श्लोक 25 (padma.5.44.25)

तदा प्रकुपितोऽत्यतं हनूमान्रामसेवकः । गृहीत्वा पर्वतं हस्ते ताडयामास वक्षसि

tadā prakupito'tyataṁ hanūmānrāmasevakaḥ gṛhītvā parvataṁ haste tāḍayāmāsa vakṣasi

तब राम-सेवक हनुमान अत्यंत क्रुद्ध होकर हाथ में एक पर्वत लेकर उनके वक्षस्थल पर प्रहार किया।

श्लोक 26 (padma.5.44.26)

स यावत्पर्वतं छेत्तुं मतिं चक्रे सतीपतिः । तावद्धतः कपींद्रेण शालेन बहुशाखिना

sa yāvatparvataṁ chettuṁ matiṁ cakre satīpatiḥ tāvaddhataḥ kapīṁdreṇa śālena bahuśākhinā

जैसे ही सती के पति ने उस पर्वत को काटने का विचार किया, उसी क्षण कपींद्र ने बहुशाखी शाल वृक्ष से उन पर प्रहार कर दिया।

श्लोक 27 (padma.5.44.27)

तमपिच्छेत्तुमुद्युक्तो यावत्तावच्छिलाहतः । शिलास्ता भेदितुं स्वांतं चकार मृड उद्यतः

tamapicchettumudyukto yāvattāvacchilāhataḥ śilāstā bhedituṁ svāṁtaṁ cakāra mṛḍa udyataḥ

जैसे ही उसे भी काटने के लिए वे उद्यत हुए, उन्हें एक शिला से आहत किया गया; उस प्रहार से मृड ने उन शिलाओं को चूर-चूर करने का निश्चय किया।

श्लोक 28 (padma.5.44.28)

तावद्वृष्टिं चकारायं शिलाभिर्नगपर्वतैः । लांगूलेन च संवेष्ट्य ताडयत्येष भूतपम्

tāvadvṛṣṭiṁ cakārāyaṁ śilābhirnagaparvataiḥ lāṁgūlena ca saṁveṣṭya tāḍayatyeṣa bhūtapam

इतने में उसने शिलाओं और पर्वत-शिखरों की वर्षा कर दी, और अपनी पूँछ से भूतपति को लपेटकर बार-बार प्रहार किया।

श्लोक 29 (padma.5.44.29)

शिलाभिः पर्वतैर्वृक्षैः पुच्छास्फोटेन भूरिशः । नंदी प्राप्तो महात्रासं चंद्रोऽपि शकलीकृतः

śilābhiḥ parvatairvṛkṣaiḥ pucchāsphoṭena bhūriśaḥ naṁdī prāpto mahātrāsaṁ caṁdro'pi śakalīkṛtaḥ

शिलाओं, पर्वतों, वृक्षों तथा पूँछ के अनेक आघातों से — नंदी अत्यंत भयभीत हो उठा, और शिव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा भी खंड-खंड हो गया।

श्लोक 30 (padma.5.44.30)

अत्यंतं विह्वलो जातो महेशानः प्रकोपनः । क्षणेक्षणे प्रहारेण विह्वलं कुर्वतं भृशम्

atyaṁtaṁ vihvalo jāto maheśānaḥ prakopanaḥ kṣaṇekṣaṇe prahāreṇa vihvalaṁ kurvataṁ bhṛśam

क्रोधी महेशान भी अत्यंत विह्वल हो उठे; क्षण-प्रतिक्षण के प्रहार से वे और भी अधिक व्याकुल होते गए —

श्लोक 31 (padma.5.44.31)

जगाद प्लवगाधीशं धन्योसि रघुपानुग । महत्कर्म कृतं तेऽद्य यत्तेहं सुप्रतोषितः

jagāda plavagādhīśaṁ dhanyosi raghupānuga mahatkarma kṛtaṁ te'dya yattehaṁ supratoṣitaḥ

— और उन्होंने कपींद्र से कहा — हे रघुपति के अनुगामी! तुम धन्य हो। आज तुमने बड़ा भारी कार्य किया, जिससे मैं भलीभाँति संतुष्ट हुआ हूँ।

श्लोक 32 (padma.5.44.32)

न दानेन न यज्ञेन नाल्पेन तपसा ह्यहम् । सुलभोऽस्मि महावेग तस्मात्प्रार्थय मे वरम्

na dānena na yajñena nālpena tapasā hyaham sulabho'smi mahāvega tasmātprārthaya me varam

हे महावेगी! न दान से, न यज्ञ से, न बड़ी तपस्या से भी मैं इतनी सहजता से प्राप्त होता हूँ; इसलिए मुझसे वर माँगो।

श्लोक 33 (padma.5.44.33)

शेष उवाच। एवं ब्रुवंतं तं दृष्ट्वा हनूमान्निजगाद तम् । प्रहसन्निर्भिया वाण्या महेशानं सुतोषितम्

śeṣa uvāca evaṁ bruvaṁtaṁ taṁ dṛṣṭvā hanūmānnijagāda tam prahasannirbhiyā vāṇyā maheśānaṁ sutoṣitam

शेष जी ने कहा — उन्हें इस प्रकार कहते देखकर हनुमान ने हँसते हुए निर्भय वाणी से उन प्रसन्न महेशान से कहा।

श्लोक 34 (padma.5.44.34)

हनूमानुवाच। रघुनाथप्रसादेन सर्वं मेऽस्ति महेश्वर । तथापि याचे हि वरं त्वत्तः समरतोषितात्

hanūmānuvāca raghunāthaprasādena sarvaṁ me'sti maheśvara tathāpi yāce hi varaṁ tvattaḥ samaratoṣitāt

हनुमान ने कहा — हे महेश्वर! रघुनाथ की कृपा से मेरे पास सब कुछ है; फिर भी युद्ध से प्रसन्न हुए आपसे मैं एक वर माँगता हूँ।

श्लोक 35 (padma.5.44.35)

एष पुष्कलसंज्ञो नः समरे पतितो हतः । तथैव रामावरजः शत्रुघ्नो मूर्च्छितो रणे

eṣa puṣkalasaṁjño naḥ samare patito hataḥ tathaiva rāmāvarajaḥ śatrughno mūrcchito raṇe

यह पुष्कल नामक वीर हमारे युद्ध में गिरकर मारा गया है; इसी प्रकार रामानुज शत्रुघ्न भी रणभूमि में मूर्च्छित पड़े हैं —

श्लोक 36 (padma.5.44.36)

अन्ये च वीरा बहवः पतिताः शरविक्षताः । मूर्च्छिताः पतिताः केचित्तान्रक्षस्व गणैः सह

anye ca vīrā bahavaḥ patitāḥ śaravikṣatāḥ mūrcchitāḥ patitāḥ kecittānrakṣasva gaṇaiḥ saha

— तथा अन्य भी अनेक वीर बाणों से क्षत होकर गिरे हैं; कुछ मूर्च्छित होकर पड़े हैं — उन सबकी अपने गणों सहित रक्षा कीजिए,

श्लोक 37 (padma.5.44.37)

यथा चैतान्महाभूता वेतालाश्च पिशाचकाः । न हरंति न खादंति श्वशृगालादयस्तथा

yathā caitānmahābhūtā vetālāśca piśācakāḥ na haraṁti na khādaṁti śvaśṛgālādayastathā

— जिससे ये महाभूत, वेताल और पिशाच, तथा कुत्ते, सियार आदि न तो उन्हें उठा ले जाएँ और न ही खा जाएँ।

श्लोक 38 (padma.5.44.38)

एतेषां वपुषो भेदो न भवेत्त्वं तथाचर । यावदिंद्रगणं जित्वा न यामि द्रोणपर्वतम्

eteṣāṁ vapuṣo bhedo na bhavettvaṁ tathācara yāvadiṁdragaṇaṁ jitvā na yāmi droṇaparvatam

उनके शरीरों को कोई क्षति न पहुँचे — आप ऐसा ही कीजिए — जब तक मैं इंद्र की सेना को जीतकर द्रोण पर्वत पर नहीं जाता,

श्लोक 39 (padma.5.44.39)

तत्रस्था औषधीर्वापि नीत्वा संस्थापितान्भटान् । जीवयामि बलात्सर्वांस्तावत्त्वं रक्ष सर्वशः

tatrasthā auṣadhīrvāpi nītvā saṁsthāpitānbhaṭān jīvayāmi balātsarvāṁstāvattvaṁ rakṣa sarvaśaḥ

— और वहाँ की औषधियाँ लाकर इन सभी गिरे हुए योद्धाओं को बलपूर्वक जीवित न कर दूँ — तब तक आप उन सबकी सब प्रकार से रक्षा कीजिए।

श्लोक 40 (padma.5.44.40)

एष गच्छामि तं नेतुं द्रोणं पर्वतसत्तमम् । यस्मिन्वसंत्योषधयः प्राणिसंजीवनंकराः

eṣa gacchāmi taṁ netuṁ droṇaṁ parvatasattamam yasminvasaṁtyoṣadhayaḥ prāṇisaṁjīvanaṁkarāḥ

मैं अब उस श्रेष्ठ द्रोण पर्वत को लाने जा रहा हूँ, जिस पर प्राणियों को पुनर्जीवित करने वाली औषधियाँ उगती हैं।

श्लोक 41 (padma.5.44.41)

एतद्वचः समाकर्ण्य तथेति निजगाद तम् । याहि शीघ्रं नगं तं तु रक्षामि त्वद्भटान्मृतान्

etadvacaḥ samākarṇya tatheti nijagāda tam yāhi śīghraṁ nagaṁ taṁ tu rakṣāmi tvadbhaṭānmṛtān

यह वचन सुनकर उन्होंने कहा, ऐसा ही हो। तुम शीघ्र उस पर्वत पर जाओ; मैं तुम्हारे गिरे हुए योद्धाओं की रक्षा करूँगा।

श्लोक 42 (padma.5.44.42)

तच्छ्रुत्वा वाक्यमीशस्य जगाम द्रोणपर्वतम् । द्वीपान्सर्वानतिक्रम्य जगाम क्षीरसागरम्

tacchrutvā vākyamīśasya jagāma droṇaparvatam dvīpānsarvānatikramya jagāma kṣīrasāgaram

ईश्वर के इस वचन को सुनकर वे द्रोण पर्वत की ओर चले; सभी द्वीपों को लांघकर वे क्षीरसागर तक जा पहुँचे।

श्लोक 43 (padma.5.44.43)

अत्र तु स्वगणैश्चायं रक्षति स्म शिवो महान् । श्मशानं तद्गणैः स्वीयैर्महाबलपराक्रमैः

atra tu svagaṇaiścāyaṁ rakṣati sma śivo mahān śmaśānaṁ tadgaṇaiḥ svīyairmahābalaparākramaiḥ

वहाँ महान् शिव अपने महाबलशाली गणों के साथ उस श्मशान-तुल्य युद्धस्थल की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 44 (padma.5.44.44)

हनूमान्द्रोणमासाद्य द्रोणंनाम महागिरिम् । लांगूले तं निधायाशु प्रतस्थे रणमंडलम्

hanūmāndroṇamāsādya droṇaṁnāma mahāgirim lāṁgūle taṁ nidhāyāśu pratasthe raṇamaṁḍalam

हनुमान द्रोण नामक उस महान् पर्वत के पास पहुँचकर, उसे तुरंत अपनी पूँछ पर रखकर रणभूमि की ओर चल पड़े।

श्लोक 45 (padma.5.44.45)

तं नेतुमुद्यते विप्र चकंपे स च पर्वतः । कंपमानं तु तं दृष्ट्वा तत्पाला देवतागणाः

taṁ netumudyate vipra cakaṁpe sa ca parvataḥ kaṁpamānaṁ tu taṁ dṛṣṭvā tatpālā devatāgaṇāḥ

हे विप्र! जैसे ही वे उसे ले जाने को उद्यत हुए, वह पर्वत काँप उठा; उसे काँपता देखकर उसके रक्षक देवगण —

श्लोक 46 (padma.5.44.46)

हाहेति कृत्वा प्रोचुस्ते किमिदं भविता गिरौ । को ह्येनं नयते वीरो महाबलपराक्रमः

hāheti kṛtvā procuste kimidaṁ bhavitā girau ko hyenaṁ nayate vīro mahābalaparākramaḥ

— हाय-हाय कहकर बोले — अब इस पर्वत का क्या होगा? इतना महाबली और पराक्रमी कौन वीर इसे ले जा रहा है?

श्लोक 47 (padma.5.44.47)

एवं कृत्वा सुराः सर्वे संहता ददृशुः कपिम् । मुंचैनमिति तं प्रोच्य जघ्नुः शस्त्रास्त्रकोटिभिः

evaṁ kṛtvā surāḥ sarve saṁhatā dadṛśuḥ kapim muṁcainamiti taṁ procya jaghnuḥ śastrāstrakoṭibhiḥ

यह कहकर समस्त देवगण एकत्र होकर उस वानर को देखने लगे; इसे छोड़ दो! ऐसा कहकर उन्होंने करोड़ों शस्त्रास्त्रों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 48 (padma.5.44.48)

तान्सर्वान्निघ्नतो दृष्ट्वा हनूमान्कुपितो भृशम् । जघान तान्क्षणाद्वीरः शक्रः सर्वासुरान्यथा

tānsarvānnighnato dṛṣṭvā hanūmānkupito bhṛśam jaghāna tānkṣaṇādvīraḥ śakraḥ sarvāsurānyathā

उन सबको प्रहार करते देखकर हनुमान अत्यंत क्रुद्ध हो उठे, और उस वीर ने क्षणभर में उन सबको उसी प्रकार मार डाला जैसे शक्र ने समस्त असुरों को मारा था।

श्लोक 49 (padma.5.44.49)

केचित्पदाहतास्तत्र केचित्करविमर्दिताः । लांगूलेन हताः केचित्केचिच्छृंगेण चाहताः

kecitpadāhatāstatra kecitkaravimarditāḥ lāṁgūlena hatāḥ kecitkecicchṛṁgeṇa cāhatāḥ

कुछ वहाँ उनके पैरों की चोट से, कुछ हाथों से कुचलकर, कुछ पूँछ से आहत होकर तथा कुछ पर्वत-शिखर की चोट से मारे गए।

श्लोक 50 (padma.5.44.50)

सर्वे ते नाशमापन्नाः क्षणात्कीशेन ताडिताः । केचिन्निपतिता भूमौ रुधिरेण परिप्लुताः

sarve te nāśamāpannāḥ kṣaṇātkīśena tāḍitāḥ kecinnipatitā bhūmau rudhireṇa pariplutāḥ

वे सभी उस वानर के प्रहार से क्षणभर में विनष्ट हो गए; कुछ रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 51 (padma.5.44.51)

केचित्कीशभयात्त्रस्ता जग्मुः शक्रं सुराधिपम् । क्षतेन च परिप्लुष्टा रुधिरक्षतदेहिनः

kecitkīśabhayāttrastā jagmuḥ śakraṁ surādhipam kṣatena ca paripluṣṭā rudhirakṣatadehinaḥ

कुछ वानर के भय से त्रस्त होकर देवराज शक्र के पास भाग गए; उनके शरीर रक्त से क्षत-विक्षत और लथपथ थे —

श्लोक 52 (padma.5.44.52)

तान्दृष्ट्वा भयसंविग्नान्रुधिरेण परिप्लुतान् । सुराञ्जगाद विमनाः शक्रः सर्वसुरोत्तमः

tāndṛṣṭvā bhayasaṁvignānrudhireṇa pariplutān surāñjagāda vimanāḥ śakraḥ sarvasurottamaḥ

उन्हें भय से त्रस्त और रक्त से लथपथ देखकर, मन में व्याकुल हुए सर्वश्रेष्ठ देवराज शक्र ने उनसे कहा —

श्लोक 53 (padma.5.44.53)

कथं यूयं भयत्रस्ताः कथं रुधिरविप्लुताः । केन दैत्येन निहता राक्षसेनाधमेन वा

kathaṁ yūyaṁ bhayatrastāḥ kathaṁ rudhiraviplutāḥ kena daityena nihatā rākṣasenādhamena vā

तुम इस प्रकार भयभीत क्यों हो? रक्त से लथपथ क्यों हो? किस दैत्य अथवा किस नीच राक्षस ने तुम्हें मारा है?

श्लोक 54 (padma.5.44.54)

सर्वं शंसत मे तथ्यं यथा ज्ञात्वा व्रजामि तम् । निहत्य बद्ध्वा चायामि युष्मद्घातकमुन्मदम्

sarvaṁ śaṁsata me tathyaṁ yathā jñātvā vrajāmi tam nihatya baddhvā cāyāmi yuṣmadghātakamunmadam

मुझे सब कुछ सत्य बताओ, जिससे यह जानकर मैं उसके पास जाऊँ — और तुम्हारे उस उन्मत्त संहारक को मारकर तथा बाँधकर लौट आऊँ।

श्लोक 55 (padma.5.44.55)

इति वाक्यं समाकर्ण्य तुरासाहं सुरोत्तमाः । जगदुर्दीनया वाचा सुरासुरनमस्कृतम्

iti vākyaṁ samākarṇya turāsāhaṁ surottamāḥ jagadurdīnayā vācā surāsuranamaskṛtam

यह वचन सुनकर वे श्रेष्ठ देवगण देवासुरनमस्कृत तुराषाट् से दीन वाणी में बोले।

श्लोक 56 (padma.5.44.56)

देवा ऊचुः। इहागत्य न जानीमः कश्चिद्वानररूपधृक् । नेतुं द्रोणं समुद्युक्तो लांगूले वेष्ट्य तं गिरिम्

devā ūcuḥ ihāgatya na jānīmaḥ kaścidvānararūpadhṛk netuṁ droṇaṁ samudyukto lāṁgūle veṣṭya taṁ girim

देवताओं ने कहा — यहाँ आकर, वानर-रूपधारी कोई, हम नहीं जानते कौन, द्रोण पर्वत को अपनी पूँछ से लपेटकर ले जाने को उद्यत हुआ।

श्लोक 57 (padma.5.44.57)

गंतुं कृतमतिस्तावद्वयं सर्वे सुसंहताः । युद्धं चक्रुः सुसंनद्धाः सर्वशस्त्रास्त्रवर्षिणः

gaṁtuṁ kṛtamatistāvadvayaṁ sarve susaṁhatāḥ yuddhaṁ cakruḥ susaṁnaddhāḥ sarvaśastrāstravarṣiṇaḥ

उसे रोकने के लिए हम सब एकत्र होकर, भलीभाँति सुसज्जित होकर, समस्त शस्त्रास्त्रों की वर्षा करते हुए युद्ध करने लगे।

श्लोक 58 (padma.5.44.58)

तेन सर्वे वयं युद्धे निर्जिता बलशालिना । अनेके निहतास्तत्र भूमौ पेतुः सुरोत्तमाः

tena sarve vayaṁ yuddhe nirjitā balaśālinā aneke nihatāstatra bhūmau petuḥ surottamāḥ

उस बलशाली ने युद्ध में हम सबको पराजित कर दिया; हम में से अनेक श्रेष्ठ देवगण वहाँ मारे जाकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 59 (padma.5.44.59)

वयं तु बहुभिः पुण्यैर्जीविता इह चागताः । शोणितेन सुसिक्तांगाः क्षतपीडासमन्विताः

vayaṁ tu bahubhiḥ puṇyairjīvitā iha cāgatāḥ śoṇitena susiktāṁgāḥ kṣatapīḍāsamanvitāḥ

हम तो केवल बहुत पुण्यों के कारण ही यहाँ जीवित आ सके हैं, हमारे शरीर रक्त से लथपथ हैं और घावों की पीड़ा से युक्त हैं।

श्लोक 60 (padma.5.44.60)

एतद्वाक्यं समाकर्ण्य सुराणां स पुरंदरः । आदिदेश सुरान्सर्वान्महाबलसमन्वितान्

etadvākyaṁ samākarṇya surāṇāṁ sa puraṁdaraḥ ādideśa surānsarvānmahābalasamanvitān

देवताओं का यह वचन सुनकर पुरंदर ने महाबलशाली समस्त देवताओं को यह आज्ञा दी —

श्लोक 61 (padma.5.44.61)

यात महाद्रोणगिरिं कपिं बद्धुं महाबलम् । बद्ध्वा नयत यूयं वै सुराणां रणपातकम्

yāta mahādroṇagiriṁ kapiṁ baddhuṁ mahābalam baddhvā nayata yūyaṁ vai surāṇāṁ raṇapātakam

जाओ महान् द्रोण पर्वत पर और उस महाबली वानर को बाँध लो; उसे बाँधकर यहाँ ले आओ, इस देव-संहारक को।

श्लोक 62 (padma.5.44.62)

इत्याज्ञप्ता ययुस्ते वै द्रोणं पर्वतसत्तमम् । यत्रास्ते बलवान्वीरो हनूमान्कपिसत्तमः

ityājñaptā yayuste vai droṇaṁ parvatasattamam yatrāste balavānvīro hanūmānkapisattamaḥ

इस प्रकार आज्ञा पाकर वे उस द्रोण नामक श्रेष्ठ पर्वत की ओर गए, जहाँ महाबली वानरश्रेष्ठ हनुमान खड़े थे।

श्लोक 63 (padma.5.44.63)

गत्वा ते प्राहरन्सर्वे हनूमंतं महाबलम् । हनूमता ते निहता मुष्टिभिः करताडनैः

gatvā te prāharansarve hanūmaṁtaṁ mahābalam hanūmatā te nihatā muṣṭibhiḥ karatāḍanaiḥ

वहाँ जाकर उन सबने महाबली हनुमान पर प्रहार किया; हनुमान ने उन्हें मुष्टिप्रहारों और हस्ताघातों से मार गिराया।

श्लोक 64 (padma.5.44.64)

पतितास्ते क्षणात्तत्र रुधिरक्षतविग्रहाः । अन्ये पलायनपरा जग्मुस्ते त्रिदिवेश्वरम्

patitāste kṣaṇāttatra rudhirakṣatavigrahāḥ anye palāyanaparā jagmuste tridiveśvaram

वे वहाँ क्षणभर में रक्त से क्षत-विक्षत होकर गिर पड़े; कुछ अन्य भाग खड़े होकर त्रिदिवेश्वर के पास चले गए।

श्लोक 65 (padma.5.44.65)

तच्छ्रुत्वा कुपितः शक्रः सर्वानमरसत्तमान् । आदिदेश महावीरं वानरेंद्रं सुरोत्तमः

tacchrutvā kupitaḥ śakraḥ sarvānamarasattamān ādideśa mahāvīraṁ vānareṁdraṁ surottamaḥ

यह सुनकर क्रुद्ध शक्र, देवताओं में श्रेष्ठ, ने समस्त श्रेष्ठ अमरों को, जो महावीर थे, आज्ञा दी।

श्लोक 66 (padma.5.44.66)

तदाज्ञप्ता ययुस्ते वै यत्र कीशेश्वरो बली । तान्सर्वानागतान्दृष्ट्वा जगाद कपिसत्तमः

tadājñaptā yayuste vai yatra kīśeśvaro balī tānsarvānāgatāndṛṣṭvā jagāda kapisattamaḥ

इस प्रकार आज्ञा पाकर वे वहाँ गए जहाँ बलवान् कपीश्वर खड़े थे; उन सबको आते देखकर कपिश्रेष्ठ ने कहा —

श्लोक 67 (padma.5.44.67)

मायां तु वीराः समरे संहर्तारं हि मां बलात् । नेष्यामि युष्मानधुना संयमिन्याः पुरोंऽतिके

māyāṁ tu vīrāḥ samare saṁhartāraṁ hi māṁ balāt neṣyāmi yuṣmānadhunā saṁyaminyāḥ puroṁ'tike

हे वीरो! मुझे बलपूर्वक युद्ध में अपना संहारक मत बनाओ; अन्यथा मैं अभी तुम सबको यमपुरी के समीप भेज दूँगा।

श्लोक 68 (padma.5.44.68)

इत्युक्ता अपि ते सर्वे सन्नद्धाः प्राहरन्कपिम् । शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैर्महाबलसमन्विताः

ityuktā api te sarve sannaddhāḥ prāharankapim śastrāstrairbahudhā muktairmahābalasamanvitāḥ

यह कहे जाने पर भी वे सभी महाबलशाली सुसज्जित होकर अनेक शस्त्रास्त्र छोड़ते हुए वानर पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 69 (padma.5.44.69)

केचिच्छूलैः परशुभिः केचित्खड्गैश्च पट्टिशैः । मुसलैः शक्तिभिः केचित्क्रोधेन कलुषीकृताः

kecicchūlaiḥ paraśubhiḥ kecitkhaḍgaiśca paṭṭiśaiḥ musalaiḥ śaktibhiḥ kecitkrodhena kaluṣīkṛtāḥ

कुछ त्रिशूलों से, कुछ फरसों से; कुछ खड्गों और भालों से; कुछ मुसलों और शक्तियों से, क्रोध से कलुषित होकर वे प्रहार करने लगे।

श्लोक 70 (padma.5.44.70)

स आहतोऽमरवरैर्विविधैरायुधैर्बली । शिलाभिस्ताञ्जघानाशु सर्वानमरसत्तमान्

sa āhato'maravarairvividhairāyudhairbalī śilābhistāñjaghānāśu sarvānamarasattamān

श्रेष्ठ अमरों द्वारा विविध आयुधों से आहत होकर, उस बलवान् ने शीघ्र ही शिलाओं से समस्त श्रेष्ठ देवताओं को मार गिराया।

श्लोक 71 (padma.5.44.71)

केचित्पलाय्य आहुस्ते गताः शक्रसमीपकम् । तदुक्तं वाक्यमाकर्ण्य भयं प्राप सुराधिपः

kecitpalāyya āhuste gatāḥ śakrasamīpakam taduktaṁ vākyamākarṇya bhayaṁ prāpa surādhipaḥ

कुछ भागकर शक्र के पास गए और यह समाचार सुनाया; उनका यह वचन सुनकर देवराज भय से युक्त हो गए।

श्लोक 72 (padma.5.44.72)

बृहस्पतिं सुराध्यक्षं मंत्रिणं स्वर्गवासिनाम् । पप्रच्छ सविधे गत्वा नत्वा सुरगुरुं वरम्

bṛhaspatiṁ surādhyakṣaṁ maṁtriṇaṁ svargavāsinām papraccha savidhe gatvā natvā suraguruṁ varam

उन्होंने स्वर्गवासियों के मंत्री तथा देवाध्यक्ष बृहस्पति के पास जाकर, उन श्रेष्ठ देवगुरु को प्रणाम कर पूछा।

श्लोक 73 (padma.5.44.73)

इंद्र उवाच। कोऽसौ यो वानरो द्रोणं नेतुं स्वामिन्समागतः । येन मे निहता वीरा अमराः शस्त्रधारिणः

iṁdra uvāca ko'sau yo vānaro droṇaṁ netuṁ svāminsamāgataḥ yena me nihatā vīrā amarāḥ śastradhāriṇaḥ

इंद्र ने कहा — हे स्वामिन्! यह कौन वानर है जो द्रोण पर्वत को ले जाने आया है, जिसने मेरे शस्त्रधारी वीर अमरों को मार डाला है?

श्लोक 74 (padma.5.44.74)

शेष उवाच। एतच्छ्रुत्वा तु तद्वाक्यमुक्तमांगिरसो महान् । जगाद भयसंविग्नं तुरासाहं सुराधिपम्

śeṣa uvāca etacchrutvā tu tadvākyamuktamāṁgiraso mahān jagāda bhayasaṁvignaṁ turāsāhaṁ surādhipam

शेष जी ने कहा — यह वचन सुनकर आंगिरस ने भयाकुल तुराषाट् देवराज से कहा।

श्लोक 75 (padma.5.44.75)

बृहस्पतिरुवाच। यो रावणमहन्संख्ये कुंभकर्णमदीदहत् । येन ते वैरिणः सर्वे हतास्तस्यैव सेवकः

bṛhaspatiruvāca yo rāvaṇamahansaṁkhye kuṁbhakarṇamadīdahat yena te vairiṇaḥ sarve hatāstasyaiva sevakaḥ

बृहस्पति ने कहा — जिसने युद्ध में रावण को मारा, जिसने कुंभकर्ण को जला डाला, जिसके द्वारा तुम्हारे समस्त शत्रु मारे गए — यह उन्हीं का सेवक है।

श्लोक 76 (padma.5.44.76)

येन लंका सत्रिकूटा निर्दग्धा पुच्छवह्निना । अक्षश्च निहतो येन हनूमंतमवेहि तम्

yena laṁkā satrikūṭā nirdagdhā pucchavahninā akṣaśca nihato yena hanūmaṁtamavehi tam

जिसने अपनी पूँछ की अग्नि से त्रिकूट सहित लंका को जला डाला, और जिसने अक्षकुमार का वध किया — उसे तुम हनुमान जानो।

श्लोक 77 (padma.5.44.77)

तेन सर्वे विनिहता द्रोणार्थमयमुद्यतः । हयमेधं महाराजः करोति बलिसत्तमः

tena sarve vinihatā droṇārthamayamudyataḥ hayamedhaṁ mahārājaḥ karoti balisattamaḥ

उसी के द्वारा ये सब मारे गए, जो अब द्रोण पर्वत के लिए प्रयत्नशील है; वह महाराज, दानियों में श्रेष्ठ, अश्वमेध यज्ञ कर रहा है —

श्लोक 78 (padma.5.44.78)

तस्याश्वं शिवभक्तस्तु नृपो वीरमणिर्महान् । जहार तत्र समभूद्रणं सुरविमोहनम्

tasyāśvaṁ śivabhaktastu nṛpo vīramaṇirmahān jahāra tatra samabhūdraṇaṁ suravimohanam

— उनका वह अश्व शिवभक्त महान् राजा वीरमणि ने हर लिया था; वहाँ देवताओं को भी मोहित कर देने वाला युद्ध हुआ।

श्लोक 79 (padma.5.44.79)

शिवेन निहताः संख्ये वीरा रामस्य भूरिशः । तान्वै जीवयितुं द्रोणं नेष्यत्येव महाबलः

śivena nihatāḥ saṁkhye vīrā rāmasya bhūriśaḥ tānvai jīvayituṁ droṇaṁ neṣyatyeva mahābalaḥ

उस युद्ध में स्वयं शिव द्वारा राम के अनेक वीर मारे गए; उन्हें जीवित करने के लिए ही यह महाबली द्रोण पर्वत को ले जाएगा ही।

श्लोक 80 (padma.5.44.80)

नायं वर्षशतैर्जेयो भवता बलसंयुतः । तस्मात्प्रसादय कपिं देहि तत्रत्यमौषधम्

nāyaṁ varṣaśatairjeyo bhavatā balasaṁyutaḥ tasmātprasādaya kapiṁ dehi tatratyamauṣadham

वह सौ वर्षों में भी नहीं जीता जा सकता, चाहे तुम्हारा बल कितना ही अधिक क्यों न हो। इसलिए उस वानर को प्रसन्न करो और वहाँ की औषधियाँ उसे दे दो।

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