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पाताल खण्ड · अध्याय 45

श्रीराम का समागम

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (padma.5.45.1)

शेष उवाच गुरुभाषितमाकर्ण्य वृषपर्वरिपुः स्वराट् । ज्ञात्वा रामस्य कार्यार्थमागतं पवनात्मजम्

śeṣa uvāca gurubhāṣitamākarṇya vṛṣaparvaripuḥ svarāṭ jñātvā rāmasya kāryārthamāgataṁ pavanātmajam

शेष जी ने कहा — गुरु के इस वचन को सुनकर वृषपर्व के शत्रु स्वराट् (इंद्र) ने यह जानकर कि पवनपुत्र राम के कार्य के लिए ही आए हैं —

श्लोक 2 (padma.5.45.2)

भयं तत्याज मनसि वानरात्समुपस्थितम् । जहर्ष चित्ते च भृशं वाचस्पतिमुवाच ह

bhayaṁ tatyāja manasi vānarātsamupasthitam jaharṣa citte ca bhṛśaṁ vācaspatimuvāca ha

— मन से उस भय को त्याग दिया जो वानर के कारण उत्पन्न हुआ था; वे हृदय में अत्यंत हर्षित हुए और वाचस्पति से बोले —

श्लोक 3 (padma.5.45.3)

इंद्र उवाच कथं कार्यं सुराधीश द्रोणोऽयं नीयते यदि । देवानां जीवनं भूयः कथं स्यादिति मे वद

iṁdra uvāca kathaṁ kāryaṁ surādhīśa droṇo'yaṁ nīyate yadi devānāṁ jīvanaṁ bhūyaḥ kathaṁ syāditi me vada

इंद्र ने कहा — हे सुराधीश! यदि यह द्रोण पर्वत ले जाया गया तो कैसे होगा? मुझे बताइए, देवताओं का पुनर्जीवन फिर कैसे संभव होगा?

श्लोक 4 (padma.5.45.4)

इदानीं पवनोद्भूतं प्रसादय यथातथम् । रामः प्रीतिं परां याति देवानां च सुखं भवेत्

idānīṁ pavanodbhūtaṁ prasādaya yathātatham rāmaḥ prītiṁ parāṁ yāti devānāṁ ca sukhaṁ bhavet

अब आप उस पवनपुत्र को यथोचित रूप से प्रसन्न करें; इससे राम को परम प्रीति होगी और देवताओं को भी सुख प्राप्त होगा।

श्लोक 5 (padma.5.45.5)

देवाधिपस्य वचनं श्रुत्वा वाचस्पतिस्तदा । शक्रं तु पुरतः कृत्वा सर्वदेवैः परीवृतम्

devādhipasya vacanaṁ śrutvā vācaspatistadā śakraṁ tu purataḥ kṛtvā sarvadevaiḥ parīvṛtam

देवाधिपति के इस वचन को सुनकर वाचस्पति तब शक्र को आगे करके, समस्त देवताओं से घिरे हुए —

श्लोक 6 (padma.5.45.6)

जगाम तत्र यत्रास्ते हनूमान्निर्भयः कपिः । गर्जति प्रसभं जित्वा सुरान्सर्वान्सुखासिनः

jagāma tatra yatrāste hanūmānnirbhayaḥ kapiḥ garjati prasabhaṁ jitvā surānsarvānsukhāsinaḥ

— वहाँ गए जहाँ निर्भय कपि हनुमान खड़े थे, जो समस्त देवताओं को सहजता से जीतकर प्रबल गर्जना कर रहे थे।

श्लोक 7 (padma.5.45.7)

ते गत्वा सन्निधौ तस्य बृहस्पतिपुरोगमाः । पेतुस्ते चरणौ नत्वा समीरतनुजस्य हि

te gatvā sannidhau tasya bṛhaspatipurogamāḥ petuste caraṇau natvā samīratanujasya hi

बृहस्पति के नेतृत्व में वे उनके समीप जाकर पवनपुत्र के चरणों में गिरकर प्रणाम करने लगे।

श्लोक 8 (padma.5.45.8)

बृहस्पतिश्च तं वीरं जगाद प्रेरितोऽमुना । सुराधीशेन लोकस्य गुरुणा वदतां वरः

bṛhaspatiśca taṁ vīraṁ jagāda prerito'munā surādhīśena lokasya guruṇā vadatāṁ varaḥ

और देवाधीश, जगद्गुरु, वक्ताओं में श्रेष्ठ बृहस्पति ने उनसे प्रेरित होकर उस वीर से कहा —

श्लोक 9 (padma.5.45.9)

अजानद्भिः कृतं कर्म देवैस्तव पराक्रमम् । श्रीरामचरणस्य त्वं सेवकोऽसि महामते

ajānadbhiḥ kṛtaṁ karma devaistava parākramam śrīrāmacaraṇasya tvaṁ sevako'si mahāmate

यह कार्य देवताओं ने आपके पराक्रम को न जानते हुए किया है; हे महामते! आप तो श्रीराम के चरणों के सेवक हैं।

श्लोक 10 (padma.5.45.10)

किमर्थमयमारंभः कथमत्र समागमः । तत्करिष्यामहे सर्वे सन्नतास्तव भाषितम्

kimarthamayamāraṁbhaḥ kathamatra samāgamaḥ tatkariṣyāmahe sarve sannatāstava bhāṣitam

यह उद्यम किस प्रयोजन से है, और यहाँ यह संघर्ष कैसे हुआ? हम सब आपके सम्मुख नत होकर आपके कहे अनुसार ही करेंगे।

श्लोक 11 (padma.5.45.11)

रोषं त्यक्त्वा कृपां कृत्वा देवाधीशं विलोकय । पवनात्मज दैत्यानां भयंकरवपुर्दधत्

roṣaṁ tyaktvā kṛpāṁ kṛtvā devādhīśaṁ vilokaya pavanātmaja daityānāṁ bhayaṁkaravapurdadhat

क्रोध त्यागकर, कृपा करके देवाधीश की ओर देखिए, हे पवनपुत्र, जो दैत्यों के लिए भयंकर रूप धारण करते हैं।

श्लोक 12 (padma.5.45.12)

शेष उवाच इत्थं भाषितमाकर्ण्य देवानां स गुरोर्वचः । उवाच देवान्सकलान्गुरुं चैव महयशाः

śeṣa uvāca itthaṁ bhāṣitamākarṇya devānāṁ sa gurorvacaḥ uvāca devānsakalānguruṁ caiva mahayaśāḥ

शेष जी ने कहा — देवगुरु के इस प्रकार कहे गए वचन को सुनकर उस महायशस्वी वीर ने समस्त देवताओं और गुरु से कहा —

श्लोक 13 (padma.5.45.13)

राज्ञो वीरमणेः संख्ये हताः शर्वेण भूरिशः । भटास्तान्वै जीवयितुं द्रोणं नेष्यामि पर्वतम्

rājño vīramaṇeḥ saṁkhye hatāḥ śarveṇa bhūriśaḥ bhaṭāstānvai jīvayituṁ droṇaṁ neṣyāmi parvatam

राजा वीरमणि के अनेक वीर युद्ध में शर्व द्वारा मारे गए हैं; उन्हें जीवित करने के लिए मैं द्रोण पर्वत ले जाऊँगा।

श्लोक 14 (padma.5.45.14)

तं ये निवारयिष्यंति स्ववीर्यबलदर्पिताः । तान्नेष्यामि क्षणादेव यमस्य सदनं प्रति

taṁ ye nivārayiṣyaṁti svavīryabaladarpitāḥ tānneṣyāmi kṣaṇādeva yamasya sadanaṁ prati

जो कोई अपने बल-पराक्रम के अभिमान में मुझे रोकने का प्रयास करेगा, उसे मैं क्षणभर में ही यमलोक भेज दूँगा।

श्लोक 15 (padma.5.45.15)

तस्माद्वदत मे यूयं द्रोणं वाथ तदौषधम् । येन संजीवयिष्यामि मृतान्वीरान्रणांगणे

tasmādvadata me yūyaṁ droṇaṁ vātha tadauṣadham yena saṁjīvayiṣyāmi mṛtānvīrānraṇāṁgaṇe

इसलिए मुझसे कहो — द्रोण पर्वत दोगे, या फिर वह औषधि, जिससे मैं रणभूमि में मरे हुए वीरों को जीवित कर सकूँ?

श्लोक 16 (padma.5.45.16)

शेष उवाच इति वाक्यं समाकर्ण्य वायुसूनोर्महात्मनः । ते सर्वे प्रणतिं गत्वा ददुः संजीवनौषधम्

śeṣa uvāca iti vākyaṁ samākarṇya vāyusūnormahātmanaḥ te sarve praṇatiṁ gatvā daduḥ saṁjīvanauṣadham

शेष जी ने कहा — वायुपुत्र महात्मा के इस वचन को सुनकर उन सबने प्रणाम करके उन्हें वह संजीवनी औषधि दे दी।

श्लोक 17 (padma.5.45.17)

ते प्रहृष्टा भयं त्यक्त्वा सुराः स्वर्गौकसः स्वयम् । ययुः सुरपतिं कृत्वा पुरः सौख्य समन्विताः

te prahṛṣṭā bhayaṁ tyaktvā surāḥ svargaukasaḥ svayam yayuḥ surapatiṁ kṛtvā puraḥ saukhya samanvitāḥ

प्रसन्न होकर, भय त्यागकर, स्वर्गवासी देवगण स्वयं ही देवराज को आगे करके सुखपूर्वक चले गए।

श्लोक 18 (padma.5.45.18)

हनुमान्भेषजं तत्तु समादायागतो रणम् । स्तुतः सर्वैः सुरगणैर्महाकर्मसमुत्सुकैः

hanumānbheṣajaṁ tattu samādāyāgato raṇam stutaḥ sarvaiḥ suragaṇairmahākarmasamutsukaiḥ

हनुमान वह औषधि लेकर रणभूमि की ओर लौटे, और उस महान् कार्य के लिए उत्सुक समस्त देवगणों द्वारा प्रशंसित हुए।

श्लोक 19 (padma.5.45.19)

तमागतं हनूमंतं वीक्ष्य सर्वेऽपि वैरिणः । साधुसाधुप्रशंसंतमद्भुतं मेनिरे कपिम्

tamāgataṁ hanūmaṁtaṁ vīkṣya sarve'pi vairiṇaḥ sādhusādhupraśaṁsaṁtamadbhutaṁ menire kapim

हनुमान को इस प्रकार लौटते देखकर उनके शत्रु भी उस अद्भुत वानर की साधु-साधु कहकर प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 20 (padma.5.45.20)

कपिः समागत्य महामुदायुतः । पुरो भटं पुष्कलमागतं मृतम् । शिवेन संरक्षितमुग्रमंडले । श्रीरामचित्तं सविधे जगाम ह

kapiḥ samāgatya mahāmudāyutaḥ puro bhaṭaṁ puṣkalamāgataṁ mṛtam śivena saṁrakṣitamugramaṁḍale śrīrāmacittaṁ savidhe jagāma ha

वह वानर अत्यंत हर्ष से युक्त होकर वहाँ आया, जहाँ मृत वीर पुष्कल का शव उस भयंकर रणभूमि में शिव द्वारा सुरक्षित पड़ा था; श्रीराम को हृदय में धारण किए हुए वह उसके समीप पहुँचा।

श्लोक 21 (padma.5.45.21)

सुमतिं च समाहूय मंत्रिणं महतां मतम् । उवाच जीवयाम्यद्य सर्वान्वीरान्रणे मृतान्

sumatiṁ ca samāhūya maṁtriṇaṁ mahatāṁ matam uvāca jīvayāmyadya sarvānvīrānraṇe mṛtān

महापुरुषों द्वारा सम्मानित मंत्री सुमति को बुलाकर उन्होंने कहा — आज मैं युद्ध में मरे हुए सभी वीरों को जीवित करूँगा।

श्लोक 22 (padma.5.45.22)

एवमुक्त्वा भेषजं तत्पुष्कलस्य महोरसि । शिरः कायेन संधाय जगाद वचनं शुभम्

evamuktvā bheṣajaṁ tatpuṣkalasya mahorasi śiraḥ kāyena saṁdhāya jagāda vacanaṁ śubham

यह कहकर उन्होंने वह औषधि पुष्कल के विशाल वक्षस्थल पर रखी, उसके सिर को धड़ से जोड़ा, और यह शुभ वचन कहा —

श्लोक 23 (padma.5.45.23)

यद्यहं मनसा वाचा कर्मणा राघवं पतिम् । जानामि तर्हि एतेन भेषजेनाशु जीवतु

yadyahaṁ manasā vācā karmaṇā rāghavaṁ patim jānāmi tarhi etena bheṣajenāśu jīvatu

यदि मैं मन, वचन और कर्म से राघव को ही अपना स्वामी जानता हूँ, तो इस औषधि से यह शीघ्र जीवित हो उठे।

श्लोक 24 (padma.5.45.24)

इति वाक्यं यदा वक्ति तावत्पुष्कल उत्थितः । रणांगणेऽदशद्रोषाद्दंतान्वीरशिरोमणिः

iti vākyaṁ yadā vakti tāvatpuṣkala utthitaḥ raṇāṁgaṇe'daśadroṣāddaṁtānvīraśiromaṇiḥ

यह वचन कहते ही पुष्कल उठ बैठा; उस रणभूमि में वह वीरशिरोमणि क्रोधवश दाँत पीसने लगा।

श्लोक 25 (padma.5.45.25)

क्व गतो वीरभद्रोऽसौ मां संमूर्च्छ्य रणांगणे । सद्योऽहं पातयाम्येनं क्वास्ति मे धनुरुत्तमम्

kva gato vīrabhadro'sau māṁ saṁmūrcchya raṇāṁgaṇe sadyo'haṁ pātayāmyenaṁ kvāsti me dhanuruttamam

वह वीरभद्र कहाँ गया, जिसने मुझे इस रणभूमि में मूर्च्छित किया था? मैं उसे अभी गिरा दूँगा — मेरा वह उत्तम धनुष कहाँ है?

श्लोक 26 (padma.5.45.26)

इति तं भाषमाणं वै प्राह वीरं कपींद्रकः । धन्योऽसि वीर यद्भूयो वदस्येनं रणांगणे

iti taṁ bhāṣamāṇaṁ vai prāha vīraṁ kapīṁdrakaḥ dhanyo'si vīra yadbhūyo vadasyenaṁ raṇāṁgaṇe

इस प्रकार कहते हुए उस वीर से कपींद्र ने कहा — धन्य हो, हे वीर! कि तुम रणभूमि में पुनः उसकी बात करते हो।

श्लोक 27 (padma.5.45.27)

त्वं हतो वीरभद्रेण रघुनाथप्रसादतः । पुनः संजीवितोऽस्येहि शत्रुघ्नं याम मूर्च्छितम्

tvaṁ hato vīrabhadreṇa raghunāthaprasādataḥ punaḥ saṁjīvito'syehi śatrughnaṁ yāma mūrcchitam

तुम वीरभद्र द्वारा मारे गए थे, और रघुनाथ की कृपा से पुनः जीवित हो उठे हो। अब आओ, हम शत्रुघ्न के पास चलें, जो मूर्च्छित पड़े हैं।

श्लोक 28 (padma.5.45.28)

इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र संग्रामवरमूर्धनि । श्वसन्नास्ते स शत्रुघ्नः शिवबाणप्रपीडितः

ityuktvā prayayau tatra saṁgrāmavaramūrdhani śvasannāste sa śatrughnaḥ śivabāṇaprapīḍitaḥ

यह कहकर वे उस महान् युद्ध के अग्रभाग की ओर चले, जहाँ शत्रुघ्न शिव के बाण से पीड़ित होकर श्वास लेते हुए पड़े थे।

श्लोक 29 (padma.5.45.29)

तत्र गत्वा समीपं तच्छत्रुघ्नस्य महात्मनः । निधाय भेषजं तस्य वक्षसि श्वासमागते

tatra gatvā samīpaṁ tacchatrughnasya mahātmanaḥ nidhāya bheṣajaṁ tasya vakṣasi śvāsamāgate

वहाँ महात्मा शत्रुघ्न के समीप जाकर, जिनके वक्षस्थल में अभी भी श्वास शेष था, उन्होंने वह औषधि रखी —

श्लोक 30 (padma.5.45.30)

उवाच हनुमांस्तं वै जीव शत्रुघ्नसत्तम । मूर्च्छितोऽसि रणे कस्मान्महाबलपराक्रम

uvāca hanumāṁstaṁ vai jīva śatrughnasattama mūrcchito'si raṇe kasmānmahābalaparākrama

— और हनुमान ने उनसे कहा — जीवित हो जाओ, हे शत्रुघ्नश्रेष्ठ! हे महाबलपराक्रमी! युद्ध में क्यों मूर्च्छित हो गए?

श्लोक 31 (padma.5.45.31)

यद्यहं ब्रह्मचर्यं च जन्मपर्यंतमुद्यतः । पालयामि तदा वीरः शत्रुघ्नो जीवतु क्षणात्

yadyahaṁ brahmacaryaṁ ca janmaparyaṁtamudyataḥ pālayāmi tadā vīraḥ śatrughno jīvatu kṣaṇāt

यदि मैंने जन्म से लेकर अब तक दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन किया है, तो वीर शत्रुघ्न इसी क्षण जीवित हो उठें।

श्लोक 32 (padma.5.45.32)

उक्तमात्रेण तेनेदं जीवितः क्षणमात्रतः । क्व शिवः क्व शिवो यातो विहायरणमंडलम्

uktamātreṇa tenedaṁ jīvitaḥ kṣaṇamātrataḥ kva śivaḥ kva śivo yāto vihāyaraṇamaṁḍalam

कहते ही वह क्षणमात्र में जीवित हो उठे — शिव कहाँ है? रणभूमि छोड़कर शिव कहाँ चले गए?

श्लोक 33 (padma.5.45.33)

अनेके निहताः संख्ये श्रीरुद्रेण पिनाकिना । ते सर्वे जीविता वीराः कपीन्द्रेण महात्मना

aneke nihatāḥ saṁkhye śrīrudreṇa pinākinā te sarve jīvitā vīrāḥ kapīndreṇa mahātmanā

श्री रुद्र पिनाकी द्वारा युद्ध में मारे गए अनेक वीरों को उस महात्मा कपींद्र ने जीवित कर दिया।

श्लोक 34 (padma.5.45.34)

तदा सर्वे सुसन्नद्धा रोषपूरितमानसाः । स्वेस्वे रथे स्थिताः शत्रून्प्रययुः क्षतविग्रहाः

tadā sarve susannaddhā roṣapūritamānasāḥ svesve rathe sthitāḥ śatrūnprayayuḥ kṣatavigrahāḥ

तब वे सभी सुसज्जित होकर, क्रोध से भरे हृदय के साथ, अपने-अपने रथों पर सवार होकर, घावों से युक्त शरीर के साथ ही शत्रुओं की ओर बढ़े।

श्लोक 35 (padma.5.45.35)

पुष्कलो वीरभद्रं तु चंडं चैव कुशध्वजः । नंदिनं हनुमान्वीरः शत्रुघ्नः संगरे शिवम्

puṣkalo vīrabhadraṁ tu caṁḍaṁ caiva kuśadhvajaḥ naṁdinaṁ hanumānvīraḥ śatrughnaḥ saṁgare śivam

पुष्कल वीरभद्र के विरुद्ध, कुशध्वज चंड के विरुद्ध, वीर हनुमान नंदी के विरुद्ध, तथा शत्रुघ्न उस युद्ध में शिव के विरुद्ध बढ़े।

श्लोक 36 (padma.5.45.36)

धनुर्विस्फारयंतं तं शत्रुघ्नं बलिनां वरम् । संग्रामे शिवमाहूय तिष्ठंतं प्रययौ नृपः

dhanurvisphārayaṁtaṁ taṁ śatrughnaṁ balināṁ varam saṁgrāme śivamāhūya tiṣṭhaṁtaṁ prayayau nṛpaḥ

बलवानों में श्रेष्ठ शत्रुघ्न ने धनुष खींचकर शिव को युद्ध के लिए ललकारा; और वहाँ खड़े उनके सम्मुख राजा वीरमणि आगे बढ़ा।

श्लोक 37 (padma.5.45.37)

राजा वीरमणिर्वीरः शत्रुघ्नः समरे बली । अन्योन्यं चक्रतुर्युद्धं मुनिविस्मयकारकम्

rājā vīramaṇirvīraḥ śatrughnaḥ samare balī anyonyaṁ cakraturyuddhaṁ munivismayakārakam

वीर राजा वीरमणि और बलवान् शत्रुघ्न ने परस्पर ऐसा युद्ध किया जिसने मुनियों को भी विस्मित कर दिया।

श्लोक 38 (padma.5.45.38)

राज्ञा च वीरमणिना रथा भग्नाः शताधिकाः । शत्रुघ्नस्य नरेंद्रस्य तिलशः क्षणतो द्विज

rājñā ca vīramaṇinā rathā bhagnāḥ śatādhikāḥ śatrughnasya nareṁdrasya tilaśaḥ kṣaṇato dvija

हे द्विज! राजा वीरमणि ने राजा शत्रुघ्न के सौ से अधिक रथों को क्षणभर में चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 39 (padma.5.45.39)

तदा प्रकुपितोऽत्यंतं शत्रुघ्नो रणमंडले । आग्नेयास्त्रं मुमोचामुं दग्धुं सैन्यसमन्वितम्

tadā prakupito'tyaṁtaṁ śatrughno raṇamaṁḍale āgneyāstraṁ mumocāmuṁ dagdhuṁ sainyasamanvitam

तब रणभूमि में अत्यंत क्रुद्ध होकर शत्रुघ्न ने उसे सेना सहित भस्म करने के लिए आग्नेयास्त्र छोड़ा।

श्लोक 40 (padma.5.45.40)

दाहकं तन्महद्दृष्ट्वा महास्त्रं शत्रुमोचितम् । अत्यंतं कुपितो राजा वारुणास्त्रं समाददे

dāhakaṁ tanmahaddṛṣṭvā mahāstraṁ śatrumocitam atyaṁtaṁ kupito rājā vāruṇāstraṁ samādade

शत्रु द्वारा छोड़े गए उस भयंकर दाहक अस्त्र को देखकर राजा अत्यंत क्रुद्ध हो उठा और वारुणास्त्र धारण किया।

श्लोक 41 (padma.5.45.41)

वारुणास्त्रेण शीतार्तं वीक्ष्य रामानुजो बली । वायव्यास्त्रं मुमोचास्मै तेन वायुर्महानभूत्

vāruṇāstreṇa śītārtaṁ vīkṣya rāmānujo balī vāyavyāstraṁ mumocāsmai tena vāyurmahānabhūt

वारुणास्त्र से शीत-पीड़ित बलवान् रामावनुज को देखकर उसने उन पर वायव्यास्त्र छोड़ा, जिससे भीषण आँधी उठी।

श्लोक 42 (padma.5.45.42)

वायुना संहता मेघा ययुस्ते सर्वतोदिशम् । इतस्ततो गताः सर्वे सैन्यं तत्सुखितं बभौ

vāyunā saṁhatā meghā yayuste sarvatodiśam itastato gatāḥ sarve sainyaṁ tatsukhitaṁ babhau

उस वायु से प्रेरित होकर मेघ चारों दिशाओं में बिखर गए; इधर-उधर चले जाने से वह सेना पुनः सुखी हो गई।

श्लोक 43 (padma.5.45.43)

सैन्ये पवनपीडार्ते नृपो वीरमतिर्महान् । पर्वतास्त्रं रिपूद्धारि जग्राह च शरासने

sainye pavanapīḍārte nṛpo vīramatirmahān parvatāstraṁ ripūddhāri jagrāha ca śarāsane

अपनी सेना को वायु से पीड़ित देखकर उस महान् वीरमति राजा ने धनुष पर शत्रु-निवारक पर्वतास्त्र धारण किया।

श्लोक 44 (padma.5.45.44)

पर्वतैः स्तंभितो वायुर्न चासर्पत संगरे । तद्वीक्ष्य रामावरजो वज्रास्त्रं तु समाददे

parvataiḥ staṁbhito vāyurna cāsarpata saṁgare tadvīkṣya rāmāvarajo vajrāstraṁ tu samādade

पर्वतों से रुककर वायु उस युद्ध में आगे न बढ़ सका; यह देखकर रामानुज ने वज्रास्त्र धारण किया।

श्लोक 45 (padma.5.45.45)

वज्रास्त्रेण हताः सर्वे नगास्तु तिलशः कृताः । चूर्णतां प्रापुरेतस्मिन्रणे वीरवरार्चिते

vajrāstreṇa hatāḥ sarve nagāstu tilaśaḥ kṛtāḥ cūrṇatāṁ prāpuretasminraṇe vīravarārcite

वज्रास्त्र से वे सभी पर्वत खंड-खंड होकर चूर्ण हो गए, उस वीरवरार्चित युद्ध में।

श्लोक 46 (padma.5.45.46)

वज्रास्त्रेण विदीर्णांगा वीराः शोणितशोभिताः । बभूवुः समरप्रांते चित्रं समभवद्रणम्

vajrāstreṇa vidīrṇāṁgā vīrāḥ śoṇitaśobhitāḥ babhūvuḥ samaraprāṁte citraṁ samabhavadraṇam

वज्रास्त्र से विदीर्ण अंगों वाले, रक्त से सुशोभित वीर रणभूमि के छोर पर फैल गए — वह युद्ध अत्यंत विचित्र हो उठा।

श्लोक 47 (padma.5.45.47)

तदा प्रकुपितोऽत्यंतं राजा वीरमणिर्महान् । ब्रह्मास्त्रं चाप आधत्त वैरिदाहकमद्भुतम्

tadā prakupito'tyaṁtaṁ rājā vīramaṇirmahān brahmāstraṁ cāpa ādhatta vairidāhakamadbhutam

तब अत्यंत क्रुद्ध होकर महान् राजा वीरमणि ने शत्रु-दाहक अद्भुत ब्रह्मास्त्र धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 48 (padma.5.45.48)

शत्रुघ्नः शरमादाय सस्मार सुमनोहरम् । अस्त्रं तद्योगिनीदत्तं सर्ववैरिविमोहनम्

śatrughnaḥ śaramādāya sasmāra sumanoharam astraṁ tadyoginīdattaṁ sarvavairivimohanam

शत्रुघ्न ने बाण उठाकर उस अत्यंत मनोहर अस्त्र का स्मरण किया, जो एक योगिनी द्वारा उन्हें दिया गया था और समस्त शत्रुओं को मोहित करने वाला था।

श्लोक 49 (padma.5.45.49)

ब्रह्मास्त्रं तत्करभ्रष्टमागतं वैरिणं प्रति । तावच्छत्रुघ्ननाम्ना तु तन्मुक्तं मोहनास्त्रकम्

brahmāstraṁ tatkarabhraṣṭamāgataṁ vairiṇaṁ prati tāvacchatrughnanāmnā tu tanmuktaṁ mohanāstrakam

जैसे ही ब्रह्मास्त्र उसके हाथ से छूटकर शत्रु की ओर बढ़ा — उसी क्षण शत्रुघ्न के नाम से वह मोहनास्त्र छोड़ा गया।

श्लोक 50 (padma.5.45.50)

मोहनास्त्रेण तद्ब्राह्मं द्विधाछिन्नं क्षणादिह । लग्नं राज्ञो हृदि क्षिप्रं मूर्च्छां संप्रापयन्नृपम्

mohanāstreṇa tadbrāhmaṁ dvidhāchinnaṁ kṣaṇādiha lagnaṁ rājño hṛdi kṣipraṁ mūrcchāṁ saṁprāpayannṛpam

मोहनास्त्र से वह ब्रह्मास्त्र क्षणभर में दो भागों में विभक्त हो गया; वह तुरंत राजा के हृदय में जा लगा और उन्हें मूर्च्छित कर दिया।

श्लोक 51 (padma.5.45.51)

ते बाणाः शतशो मुक्ताः शत्रुघ्नेन महीभृता । सर्वेपि मूर्च्छिता वीरा गणा रुद्रस्य ये पुनः

te bāṇāḥ śataśo muktāḥ śatrughnena mahībhṛtā sarvepi mūrcchitā vīrā gaṇā rudrasya ye punaḥ

तब राजा शत्रुघ्न द्वारा छोड़े गए सैकड़ों बाणों ने पुनर्जीवित हुए रुद्र के उन समस्त गणों को भी मूर्च्छित कर दिया —

श्लोक 52 (padma.5.45.52)

शिवस्य चरणोपस्थे मूढाः पेतुर्महीतले । तदा शिवः प्रकुपितो रथे तिष्ठन्ययौ नृपम्

śivasya caraṇopasthe mūḍhāḥ peturmahītale tadā śivaḥ prakupito rathe tiṣṭhanyayau nṛpam

— और वे मूढ़ होकर शिव के चरणों के समीप ही भूमि पर गिर पड़े। तब शिव अत्यंत क्रुद्ध होकर रथ पर सवार होकर राजा की ओर बढ़े।

श्लोक 53 (padma.5.45.53)

शिवेन सहसा योद्धुं समायातो रणांगणे । शत्रुघ्नः सज्जमात्तज्यं धनुः कृत्वा व्ययुद्ध्यत

śivena sahasā yoddhuṁ samāyāto raṇāṁgaṇe śatrughnaḥ sajjamāttajyaṁ dhanuḥ kṛtvā vyayuddhyata

शत्रुघ्न रणभूमि में शिव से तुरंत युद्ध करने के लिए आगे आए और अपने प्रत्यंचाबद्ध धनुष को सँभालकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 54 (padma.5.45.54)

तयोः समभवद्युद्धं घोरं वैरिविदारणम् । शस्त्रास्त्रैर्बहुधामुक्तैरादीपित दिगंतरम्

tayoḥ samabhavadyuddhaṁ ghoraṁ vairividāraṇam śastrāstrairbahudhāmuktairādīpita digaṁtaram

उन दोनों के बीच शत्रु-विदारक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें छोड़े गए अनेक शस्त्रास्त्रों से सभी दिशाएँ जगमगा उठीं।

श्लोक 55 (padma.5.45.55)

अस्त्रप्रत्यस्त्रसंघातैस्ताडनप्रतिताडनैः । देवानामपि दैत्यानां नैतादृग्रणमंडलम्

astrapratyastrasaṁghātaistāḍanapratitāḍanaiḥ devānāmapi daityānāṁ naitādṛgraṇamaṁḍalam

अस्त्र-प्रत्यस्त्र के संघातों से, प्रहार-प्रत्याघातों से — न देवताओं ने और न दैत्यों ने भी ऐसा रणक्षेत्र कभी देखा था।

श्लोक 56 (padma.5.45.56)

तदा व्याकुलितोऽत्यंतं शत्रुघ्नः शिवसंगरे । सस्मार स्वामिनं तत्र पावनेरुपदेशतः

tadā vyākulito'tyaṁtaṁ śatrughnaḥ śivasaṁgare sasmāra svāminaṁ tatra pāvanerupadeśataḥ

तब शिव के साथ उस युद्ध में अत्यंत व्याकुल हुए शत्रुघ्न ने पवनपुत्र के उपदेश से अपने स्वामी का स्मरण किया।

श्लोक 57 (padma.5.45.57)

हा नाथ भ्रातरत्युग्रः शिवः प्राणापहारणम् । करोति धनुरुद्यम्य त्रायस्व रणमंडले

hā nātha bhrātaratyugraḥ śivaḥ prāṇāpahāraṇam karoti dhanurudyamya trāyasva raṇamaṁḍale

हाय नाथ! हे भ्राता! यह अत्यंत उग्र शिव धनुष उठाकर मेरे प्राण हरने को उद्यत हैं — रणभूमि में मेरी रक्षा कीजिए!

श्लोक 58 (padma.5.45.58)

अनेके दुःखपाथोधिं तीर्णा राम तवाख्यया । मामप्युद्धर दुःखस्थं रामराम कृपानिधे

aneke duḥkhapāthodhiṁ tīrṇā rāma tavākhyayā māmapyuddhara duḥkhasthaṁ rāmarāma kṛpānidhe

हे राम! आपके ही नाम से अनेकों ने दुःख के सागर को पार किया है; मुझे भी, जो दुःख में डूबा हूँ, उबारिए — हे राम राम, कृपानिधे!

श्लोक 59 (padma.5.45.59)

इत्थं वक्ति यदा तावद्वीक्षितो रणमंडले । नीलोत्पलदलश्यामो रामो राजीवलोचनः

itthaṁ vakti yadā tāvadvīkṣito raṇamaṁḍale nīlotpaladalaśyāmo rāmo rājīvalocanaḥ

इस प्रकार कहते ही उस रणभूमि में साक्षात् राम दिखाई दिए — नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्रों वाले —

श्लोक 60 (padma.5.45.60)

मृगशृंगं कटौ धृत्वा दीक्षितं वपुरुद्वहन् । तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप शत्रुघ्नः समरांगणे

mṛgaśṛṁgaṁ kaṭau dhṛtvā dīkṣitaṁ vapurudvahan taṁ dṛṣṭvā vismayaṁ prāpa śatrughnaḥ samarāṁgaṇe

— कटि में मृगशृंग धारण किए, दीक्षित व्रती के रूप में अपना शरीर धारण किए हुए। उन्हें देखकर शत्रुघ्न रणभूमि में विस्मय से भर उठे।

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