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पाताल खण्ड · अध्याय 48

अश्व की मुक्ति

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (padma.5.48.1)

शेष उवाच। इति प्रोक्तं तु मुनिना संश्रुत्य परवीरहा । विस्मयं मानयामास हृदि शौनकमब्रवीत्

śeṣa uvāca iti proktaṁ tu muninā saṁśrutya paravīrahā vismayaṁ mānayāmāsa hṛdi śaunakamabravīt

शेष जी ने कहा — मुनि द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर शत्रुवीरों के संहारक शत्रुघ्न ने हृदय में विस्मित होकर शौनक से कहा —

श्लोक 2 (padma.5.48.2)

शत्रुघ्न उवाच। कर्मणो गहना वार्ता यया सात्वकनामधृत् । दिवं प्राप्तोऽपि महता कर्मणा राक्षसीकृतः

śatrughna uvāca karmaṇo gahanā vārtā yayā sātvakanāmadhṛt divaṁ prāpto'pi mahatā karmaṇā rākṣasīkṛtaḥ

शत्रुघ्न ने कहा — कर्मों की यह गाथा कितनी गूढ़ है, जिसके कारण सात्वक नामक वह व्यक्ति, बड़े पुण्य-कर्म से स्वर्ग को प्राप्त होकर भी राक्षस बना दिया गया।

श्लोक 3 (padma.5.48.3)

स्वामिन्वद महर्षे त्वं कर्मणां स्वगतिर्यथा । येन कर्मविपाकेन यादृशं नरकं भवेत्

svāminvada maharṣe tvaṁ karmaṇāṁ svagatiryathā yena karmavipākena yādṛśaṁ narakaṁ bhavet

हे स्वामिन्! हे महर्षे! मुझे बताइए कि कर्मों की अपनी गति कैसी होती है — किस कर्म के फल से कैसा नरक प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (padma.5.48.4)

शौनक उवाच। धन्योसि राघवश्रेष्ठ यत्ते मतिरियं शुभा । जानन्नपि हितार्थाय लोकानां त्वं ब्रवीषि भोः

śaunaka uvāca dhanyosi rāghavaśreṣṭha yatte matiriyaṁ śubhā jānannapi hitārthāya lokānāṁ tvaṁ bravīṣi bhoḥ

शौनक ने कहा — हे राघवश्रेष्ठ! धन्य हो, कि तुम्हारी बुद्धि इस शुभ प्रश्न की ओर गई; जानते हुए भी तुम लोगों के हित के लिए यह पूछ रहे हो।

श्लोक 5 (padma.5.48.5)

कथयामि विचित्राणां कर्मणां विविधा गतीः । ताः शृणुष्व महाराज यच्छ्रुत्वा मोक्षमाप्नुयात्

kathayāmi vicitrāṇāṁ karmaṇāṁ vividhā gatīḥ tāḥ śṛṇuṣva mahārāja yacchrutvā mokṣamāpnuyāt

मैं विचित्र कर्मों की अनेक विविध गतियों का वर्णन करता हूँ; हे महाराज! उन्हें सुनो, जिन्हें सुनकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 6 (padma.5.48.6)

परवित्तं परापत्यं कलत्रं पारकं च यः । बलात्कारेण गृह्णाति भोगबुद्ध्या च दुर्मतिः

paravittaṁ parāpatyaṁ kalatraṁ pārakaṁ ca yaḥ balātkāreṇa gṛhṇāti bhogabuddhyā ca durmatiḥ

जो कोई दुर्बुद्धि से भोग की इच्छा से दूसरे के धन, दूसरे की संतान अथवा दूसरे की पत्नी को बलपूर्वक हर लेता है —

श्लोक 7 (padma.5.48.7)

कालपाशेन संबद्धो यमदूतैर्महाबलैः । तामिस्रे पात्यते तावद्यावद्वर्षसहस्रकम्

kālapāśena saṁbaddho yamadūtairmahābalaiḥ tāmisre pātyate tāvadyāvadvarṣasahasrakam

— वह काल के पाश से बँधकर यम के महाबली दूतों द्वारा तामिस्र नरक में एक हजार वर्षों तक डाला जाता है।

श्लोक 8 (padma.5.48.8)

तत्र ताडनमुद्धूताः कुर्वंति यमकिंकराः । पापभोगेन संतप्तस्ततो योनिं तु शौकरीम्

tatra tāḍanamuddhūtāḥ kurvaṁti yamakiṁkarāḥ pāpabhogena saṁtaptastato yoniṁ tu śaukarīm

वहाँ यमकिंकर क्रोध में भरकर उसे पीटते हैं; पाप के फल से संतप्त होकर वह फिर शूकर-योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (padma.5.48.9)

तत्र भुक्त्वा महादुःखं मानुषत्वं गमिष्यति । रोगादिचिह्नितं तत्र दुर्यशो ज्ञापकं स्वकम्

tatra bhuktvā mahāduḥkhaṁ mānuṣatvaṁ gamiṣyati rogādicihnitaṁ tatra duryaśo jñāpakaṁ svakam

वहाँ महान् दुःख भोगकर वह मनुष्य-योनि को प्राप्त होगा, रोग आदि से चिह्नित, जो उसकी अपनी दुष्कीर्ति का द्योतक होगा।

श्लोक 10 (padma.5.48.10)

भूतद्रोहं विधायैव केवलं स्वकुटुंबकम् । पुष्णाति पापनिरतः सोंऽधतामिस्रके पतेत्

bhūtadrohaṁ vidhāyaiva kevalaṁ svakuṭuṁbakam puṣṇāti pāpanirataḥ soṁ'dhatāmisrake patet

जो प्राणियों के प्रति द्रोह करके केवल अपने कुटुंब का ही पोषण करता है, पाप में रत रहता है — वह अंधतामिस्र में गिरता है।

श्लोक 11 (padma.5.48.11)

ये नरा इह जंतूनां वधं कुर्वंति वै मृषा । ते रौरवे निपात्यंते भिद्यंते रुरुभी रुषा

ye narā iha jaṁtūnāṁ vadhaṁ kurvaṁti vai mṛṣā te raurave nipātyaṁte bhidyaṁte rurubhī ruṣā

जो मनुष्य यहाँ मिथ्या रूप से प्राणियों का वध करते हैं — वे रौरव नरक में डाले जाते हैं, जहाँ रुरु उन्हें क्रोधवश विदीर्ण करते हैं।

श्लोक 12 (padma.5.48.12)

यः स्वोदरार्थे भूतानां वधमाचरति स्फुटम् । महारौरवसंज्ञे तु पात्यते स यमाज्ञया

yaḥ svodarārthe bhūtānāṁ vadhamācarati sphuṭam mahārauravasaṁjñe tu pātyate sa yamājñayā

जो अपने पेट के लिए स्पष्ट रूप से प्राणियों का वध करता है — वह यम की आज्ञा से महारौरव नरक में डाला जाता है।

श्लोक 13 (padma.5.48.13)

यो वै निजं तु जनकं ब्राह्मणं द्वेष्टि पापकृत् । कालसूत्रे महादुष्टे योजनायुतविस्तृते

yo vai nijaṁ tu janakaṁ brāhmaṇaṁ dveṣṭi pāpakṛt kālasūtre mahāduṣṭe yojanāyutavistṛte

जो पापी अपने ही पिता से अथवा किसी ब्राह्मण से द्वेष करता है — वह दस हजार योजन विस्तृत अत्यंत भयंकर कालसूत्र नरक में गिरता है।

श्लोक 14 (padma.5.48.14)

यावंति पशुरोमाणि गवां द्वेषं करोति यः । तावद्वर्षसहस्राणि पच्यते यमकिंकरैः

yāvaṁti paśuromāṇi gavāṁ dveṣaṁ karoti yaḥ tāvadvarṣasahasrāṇi pacyate yamakiṁkaraiḥ

गौओं के जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षों तक गौ से द्वेष करने वाला यमकिंकरों द्वारा पकाया जाता है।

श्लोक 15 (padma.5.48.15)

यो भूमौ भूपतिर्भूत्वा दंडायोग्यं तु दंडयेत् । करोति ब्राह्मणस्यापि देहदंडं च लोलुपः

yo bhūmau bhūpatirbhūtvā daṁḍāyogyaṁ tu daṁḍayet karoti brāhmaṇasyāpi dehadaṁḍaṁ ca lolupaḥ

जो राजा बनकर पृथ्वी पर अदंडनीय को दंड देता है, या लोभवश ब्राह्मण को भी शारीरिक दंड देता है —

श्लोक 16 (padma.5.48.16)

स सूकरमुखैर्दुष्टैः पीड्यते यमकिंकरैः । पश्चाद्दुष्टासु योनीषु जायते पापमुक्तये

sa sūkaramukhairduṣṭaiḥ pīḍyate yamakiṁkaraiḥ paścādduṣṭāsu yonīṣu jāyate pāpamuktaye

— उसे यम के दुष्ट शूकरमुख किंकर पीड़ा देते हैं; बाद में वह अपने पाप के शमन हेतु दुष्ट योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 17 (padma.5.48.17)

ब्राह्मणानां गवां ये तु द्रव्यं वृत्तं तथाल्पकम् । वृत्तिं वा गृह्णते मोहाल्लुंपंति स्वबलान्नराः

brāhmaṇānāṁ gavāṁ ye tu dravyaṁ vṛttaṁ tathālpakam vṛttiṁ vā gṛhṇate mohālluṁpaṁti svabalānnarāḥ

जो मनुष्य मोहवश ब्राह्मणों तथा गौओं के धन, अल्प वृत्ति अथवा जीविका को अपने बल से छीन लेते हैं —

श्लोक 18 (padma.5.48.18)

ते परत्रांधकूपे च पात्यंते च महार्दिताः । योऽन्नं स्वयमुपाहृत्य मधुरं चात्तिलोलुपः

te paratrāṁdhakūpe ca pātyaṁte ca mahārditāḥ yo'nnaṁ svayamupāhṛtya madhuraṁ cāttilolupaḥ

— वे परलोक में अंधकूप नरक में महान् पीड़ा के साथ डाले जाते हैं। जो व्यक्ति स्वयं मीठा भोजन प्राप्त करके स्वाद-लोलुप होकर —

श्लोक 19 (padma.5.48.19)

न देवाय न सुहृदे ददाति रसनापरः । स पतत्येव नरके कृमिभोजनसंज्ञिते

na devāya na suhṛde dadāti rasanāparaḥ sa patatyeva narake kṛmibhojanasaṁjñite

— उसे न किसी देवता को देता है और न मित्र को, केवल अपनी जिह्वा में लीन रहता है — वह कृमिभोजन नामक नरक में गिरता है।

श्लोक 20 (padma.5.48.20)

अनापदि नरो यस्तु हिरण्यादीन्यपाहरेत् । ब्रह्मस्वं वा महादुष्टे संदंशे नरके पतेत्

anāpadi naro yastu hiraṇyādīnyapāharet brahmasvaṁ vā mahāduṣṭe saṁdaṁśe narake patet

जो मनुष्य बिना किसी आपत्ति के स्वर्ण आदि अथवा ब्राह्मण के धन का अपहरण करता है — वह अत्यंत भयंकर संदंश नरक में गिरता है।

श्लोक 21 (padma.5.48.21)

यः स्वदेहं प्रपुष्णाति नान्यं जानाति मूढधीः । स पात्यते तैलतप्ते कुंभीपाकेऽतिदारुणे

yaḥ svadehaṁ prapuṣṇāti nānyaṁ jānāti mūḍhadhīḥ sa pātyate tailatapte kuṁbhīpāke'tidāruṇe

जो केवल अपने ही शरीर का पोषण करता है, किसी अन्य को नहीं जानता, वह मूढ़बुद्धि अत्यंत भयंकर तेल से खौलते कुंभीपाक में डाला जाता है।

श्लोक 22 (padma.5.48.22)

यो नागम्यां स्त्रियं मोहाद्योषिद्भावाच्च कामयेत् । तं तया किंकराः सूर्म्या परिरंभं च कुर्वते

yo nāgamyāṁ striyaṁ mohādyoṣidbhāvācca kāmayet taṁ tayā kiṁkarāḥ sūrmyā pariraṁbhaṁ ca kurvate

जो कोई मोहवश किसी अगम्य स्त्री की, केवल स्त्री-भाव के कामवश, कामना करता है — यमकिंकर उससे तपाए हुए लोहे की उस प्रतिमा का आलिंगन कराते हैं।

श्लोक 23 (padma.5.48.23)

ये बलाद्वेदमर्यादां लुंपंति स्वबलोद्धताः । ते वैतरण्यां पतिता मांसशोणितभक्षकाः

ye balādvedamaryādāṁ luṁpaṁti svabaloddhatāḥ te vaitaraṇyāṁ patitā māṁsaśoṇitabhakṣakāḥ

जो अपने बल के अभिमान में वेद की मर्यादा का बलपूर्वक उल्लंघन करते हैं — वे वैतरणी नदी में गिरकर मांस और रक्त भक्षण करते हैं।

श्लोक 24 (padma.5.48.24)

वृषलद्यं यः स्त्रियं कृत्वा तया गार्हस्थ्यमाचरेत् । पूयोदे निपतत्येव महादुःखसमन्वितः

vṛṣaladyaṁ yaḥ striyaṁ kṛtvā tayā gārhasthyamācaret pūyode nipatatyeva mahāduḥkhasamanvitaḥ

जो वृषल-कन्या को पत्नी बनाकर उसके साथ गृहस्थ-जीवन बिताता है — वह अत्यंत दुःखयुक्त पूयोद नरक में गिरता है।

श्लोक 25 (padma.5.48.25)

ये दंभमाश्रयंते वै धूर्ता लोकस्य वंचने । वैशसे नरके मूढाः पतंति यमताडिताः

ye daṁbhamāśrayaṁte vai dhūrtā lokasya vaṁcane vaiśase narake mūḍhāḥ pataṁti yamatāḍitāḥ

जो धूर्त लोगों को धोखा देने के लिए पाखंड का सहारा लेते हैं — वे मूढ़ यमदूतों द्वारा पीटे जाकर वैशस नरक में गिरते हैं।

श्लोक 26 (padma.5.48.26)

ये सवर्णां स्त्रियं मूढा रेतः स्वं पाययंति च । रेतःकुल्यासु ते पापा रेतःपानेषु तत्पराः

ye savarṇāṁ striyaṁ mūḍhā retaḥ svaṁ pāyayaṁti ca retaḥkulyāsu te pāpā retaḥpāneṣu tatparāḥ

जो मूढ़ पुरुष अपनी ही जाति की स्त्री को अपना वीर्य पिलाते हैं — वे पापी वीर्य की नदियों और वीर्यपान में डाले जाते हैं।

श्लोक 27 (padma.5.48.27)

ये चौरा वह्निदा दुष्टा गरदा ग्रामलुंठकाः । सारमेयादने ते वै पात्यंते पातकान्विताः

ye caurā vahnidā duṣṭā garadā grāmaluṁṭhakāḥ sārameyādane te vai pātyaṁte pātakānvitāḥ

जो दुष्ट चोर, अग्निदाता, विषदाता, ग्राम-लुंठक हैं — वे पापयुक्त होकर श्वानों द्वारा भक्षण किए जाने वाले नरक में डाले जाते हैं।

श्लोक 28 (padma.5.48.28)

कूटसाक्ष्यं वदत्यद्धा पुरुषः पापसंभृतः । परकीयं तु द्रव्यं यो हरति प्रसभं बली

kūṭasākṣyaṁ vadatyaddhā puruṣaḥ pāpasaṁbhṛtaḥ parakīyaṁ tu dravyaṁ yo harati prasabhaṁ balī

जो पापपूर्ण व्यक्ति स्पष्ट रूप से झूठी गवाही देता है, अथवा जो बलवान् दूसरे के धन को बलपूर्वक हर लेता है —

श्लोक 29 (padma.5.48.29)

सोऽवीचिनरके पापी अवाग्वक्त्रः पतत्यधः । तत्र दुःखं महद्भुक्त्वा पापिष्ठां योनिमाव्रजेत्

so'vīcinarake pāpī avāgvaktraḥ patatyadhaḥ tatra duḥkhaṁ mahadbhuktvā pāpiṣṭhāṁ yonimāvrajet

— वह पापी अवीचि नरक में मुख नीचे किए हुए उलटा गिरता है; वहाँ महान् दुःख भोगकर वह अत्यंत पापी योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 30 (padma.5.48.30)

यो नरो रसनास्वादात्सुरां पिबति मूढधीः । तं पाययंति लोहस्य रसं धर्मस्य किंकराः

yo naro rasanāsvādātsurāṁ pibati mūḍhadhīḥ taṁ pāyayaṁti lohasya rasaṁ dharmasya kiṁkarāḥ

जो मूढ़बुद्धि मनुष्य जिह्वा के स्वाद के लिए मदिरा पीता है — धर्मराज के किंकर उसे उसके स्थान पर लोहे का पिघला हुआ रस पिलाते हैं।

श्लोक 31 (padma.5.48.31)

यो गुरूनवमन्येत स्वविद्याचारदर्पितः । स मृतः पात्यते क्षारनरकेऽधोमुखः पुमान्

yo gurūnavamanyeta svavidyācāradarpitaḥ sa mṛtaḥ pātyate kṣāranarake'dhomukhaḥ pumān

जो अपनी विद्या और आचार के अभिमान में अपने गुरुओं का अनादर करता है — वह व्यक्ति मरने पर सिर के बल क्षार नरक में गिरता है।

श्लोक 32 (padma.5.48.32)

विश्वासघातं कुर्वंति ये नरा धर्मनिष्कृताः । शूलप्रोते च नरके पात्यंते बहुयातने

viśvāsaghātaṁ kurvaṁti ye narā dharmaniṣkṛtāḥ śūlaprote ca narake pātyaṁte bahuyātane

जो धर्मभ्रष्ट मनुष्य विश्वासघात करते हैं — वे अनेक यातनाओं सहित शूल में बींधने वाले नरक में डाले जाते हैं।

श्लोक 33 (padma.5.48.33)

पिशुनो यो नरान्सर्वानुद्वेजयति वाक्यतः । दंदशूके च पतितो दंदशूकैः स दश्यते

piśuno yo narānsarvānudvejayati vākyataḥ daṁdaśūke ca patito daṁdaśūkaiḥ sa daśyate

जो चुगलखोर अपनी वाणी से सब मनुष्यों को व्याकुल करता है — वह सर्पों के बीच गिरकर सर्पों द्वारा डँसा जाता है।

श्लोक 34 (padma.5.48.34)

एवं राजन्ननेके वै नरकाः पापकारिणाम् । पापं कृत्वा प्रयांत्येते पीडां यांति सुदारुणाम्

evaṁ rājannaneke vai narakāḥ pāpakāriṇām pāpaṁ kṛtvā prayāṁtyete pīḍāṁ yāṁti sudāruṇām

हे राजन्! इस प्रकार पापियों के लिए अनेक नरक हैं; पाप करके वे इस अत्यंत भयंकर पीड़ा को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 35 (padma.5.48.35)

यैर्न श्रुता रामकथा न परोपकृतिः कृता । तेषां सर्वाणि दुःखानि भवंति नरकांतरे

yairna śrutā rāmakathā na paropakṛtiḥ kṛtā teṣāṁ sarvāṇi duḥkhāni bhavaṁti narakāṁtare

जिन्होंने राम की कथा नहीं सुनी और न ही दूसरों का उपकार किया — उन्हें ही ये सभी दुःख नरकों के मध्य प्राप्त होते हैं।

श्लोक 36 (padma.5.48.36)

अत्र यस्य सुखं स्वर्गे भूयात्तस्य इतीर्यते । ये दुःखिनो रोगयुता नरकादागताश्च ते

atra yasya sukhaṁ svarge bhūyāttasya itīryate ye duḥkhino rogayutā narakādāgatāśca te

यह कहा जाता है कि जिसे यहाँ सुख मिलता है उसे स्वर्ग में भी सुख मिलता है; जो दुःखी और रोगग्रस्त हैं, वे नरक से आए हुए हैं।

श्लोक 37 (padma.5.48.37)

शेष उवाच। एतच्छ्रुत्वा महीपालः कंपमानः क्षणे क्षणे । पप्रच्छ भूयस्तं विप्रं सर्वसंशयनुत्तये

śeṣa uvāca etacchrutvā mahīpālaḥ kaṁpamānaḥ kṣaṇe kṣaṇe papraccha bhūyastaṁ vipraṁ sarvasaṁśayanuttaye

शेष जी ने कहा — यह सुनकर राजा क्षण-प्रतिक्षण काँपते हुए, अपने सभी संशयों के निवारण हेतु उस विप्र से पुनः पूछने लगे —

श्लोक 38 (padma.5.48.38)

तत्तत्पापस्य चिह्नानि कथयस्व महामुने । केन पापेन किं चिह्नं भूलोके उपजायते

tattatpāpasya cihnāni kathayasva mahāmune kena pāpena kiṁ cihnaṁ bhūloke upajāyate

हे महामुने! मुझे उन-उन पापों के चिह्न बताइए — किस पाप से पृथ्वीलोक में कौन-सा चिह्न उत्पन्न होता है?

श्लोक 39 (padma.5.48.39)

इति श्रुत्वा तु तद्वाक्यं मुनिः प्रोवाच भूपतिम् । शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि चिह्नानि पापकारिणाम्

iti śrutvā tu tadvākyaṁ muniḥ provāca bhūpatim śṛṇu rājanpravakṣyāmi cihnāni pāpakāriṇām

यह वचन सुनकर मुनि ने राजा से कहा — सुनो, हे राजन्! मैं तुम्हें पापियों के चिह्न बताता हूँ।

श्लोक 40 (padma.5.48.40)

शौनक उवाच। सुरापः श्यामदंतश्च नरकांते प्रजायते । अभक्ष्यभक्षकारी च जायते गुल्मकोदरः

śaunaka uvāca surāpaḥ śyāmadaṁtaśca narakāṁte prajāyate abhakṣyabhakṣakārī ca jāyate gulmakodaraḥ

शौनक ने कहा — मदिरापान करने वाला नरक के अंत में काले दाँतों वाला जन्म लेता है; अभक्ष्य भक्षण करने वाला बड़े पेट वाला जन्म लेता है।

श्लोक 41 (padma.5.48.41)

उदक्यावीक्षितं भुक्त्वा जायते कृमिलोदरः । श्वमार्जारादिसंस्पृष्टं भुक्त्वा दुर्गंधिमान्भवेत्

udakyāvīkṣitaṁ bhuktvā jāyate kṛmilodaraḥ śvamārjārādisaṁspṛṣṭaṁ bhuktvā durgaṁdhimānbhavet

रजस्वला स्त्री द्वारा देखा गया भोजन खाने से मनुष्य कृमियुक्त उदर वाला जन्म लेता है; कुत्ते-बिल्ली आदि द्वारा स्पर्श किए भोजन को खाने से दुर्गंधयुक्त होता है।

श्लोक 42 (padma.5.48.42)

अनिवेद्य सुरादिभ्यो भुंजानो जायते नरः । उदरे रोगवान्दुःखी महारोगप्रपीडितः

anivedya surādibhyo bhuṁjāno jāyate naraḥ udare rogavānduḥkhī mahārogaprapīḍitaḥ

देवता आदि को अर्पण किए बिना भोजन करने वाला मनुष्य उदर-रोगी, दुःखी और महारोग से पीड़ित होकर जन्म लेता है।

श्लोक 43 (padma.5.48.43)

परान्नविघ्नकरणादजीर्णमभिजायते । मंदोदराग्निर्भवति सति द्रव्ये कदन्नदः

parānnavighnakaraṇādajīrṇamabhijāyate maṁdodarāgnirbhavati sati dravye kadannadaḥ

दूसरे के भोजन में विघ्न डालने से अजीर्ण उत्पन्न होता है; साधन होते हुए भी कदन्न देने वाला मंद जठराग्नि वाला होता है।

श्लोक 44 (padma.5.48.44)

विषदश्छर्दिरोगी स्यान्मार्गहा पादरोगवान् । पिशुनो नरकस्यांते जायते श्वासकासवान्

viṣadaśchardirogī syānmārgahā pādarogavān piśuno narakasyāṁte jāyate śvāsakāsavān

विषदाता वमन-रोगी होता है; मार्ग रोकने वाला पैरों के रोग से युक्त होता है; चुगलखोर नरक के अंत में श्वास-कास रोग से युक्त जन्म लेता है।

श्लोक 45 (padma.5.48.45)

धूर्तोऽपस्माररोगी स्याच्छूली च परतापनः । दावाग्निदायकश्चैव रक्तातीसारवान्भवेत्

dhūrto'pasmārarogī syācchūlī ca paratāpanaḥ dāvāgnidāyakaścaiva raktātīsāravānbhavet

धूर्त मिर्गी रोगी होता है; दूसरों को संतप्त करने वाला फोड़े-फुंसी से युक्त होता है; दावानल लगाने वाला रक्तातिसार रोगी होता है।

श्लोक 46 (padma.5.48.46)

सुरालये जले वापि शकृत्क्षेपं करोति यः । गुदरोगो भवेत्तस्य पापरूपः सुदारुणः

surālaye jale vāpi śakṛtkṣepaṁ karoti yaḥ gudarogo bhavettasya pāparūpaḥ sudāruṇaḥ

जो मंदिर में अथवा जल में मल त्यागता है — उसका पाप अत्यंत भयंकर गुदा-रोग के रूप में प्रकट होता है।

श्लोक 47 (padma.5.48.47)

गर्भपातनजा रोगाः क्षयमेहजलोदराः । प्रतिमा भंगकारी च अप्रतिष्ठश्च जायते

garbhapātanajā rogāḥ kṣayamehajalodarāḥ pratimā bhaṁgakārī ca apratiṣṭhaśca jāyate

गर्भपात कराने से क्षय, प्रमेह और जलोदर रोग उत्पन्न होते हैं; प्रतिमा को खंडित करने वाला समाज में प्रतिष्ठाहीन जन्म लेता है।

श्लोक 48 (padma.5.48.48)

दुष्टवादी खंडितः स्यात्खल्वाटः परनिंदकः । सभायां पक्षपाती च जायते पक्षघातवान्

duṣṭavādī khaṁḍitaḥ syātkhalvāṭaḥ paraniṁdakaḥ sabhāyāṁ pakṣapātī ca jāyate pakṣaghātavān

झूठ बोलने वाला अपंग होता है; परनिंदक गंजा होता है; सभा में पक्षपात करने वाला लकवाग्रस्त जन्म लेता है।

श्लोक 49 (padma.5.48.49)

परोक्तहास्यकृत्काणः कुनखी विप्रहेमहृत् । तुंदीवरी ताम्रचौरः कांस्यहृत्पुंडरीकिकः

paroktahāsyakṛtkāṇaḥ kunakhī viprahemahṛt tuṁdīvarī tāmracauraḥ kāṁsyahṛtpuṁḍarīkikaḥ

दूसरों की हँसी उड़ाने वाला काना होता है; विप्र का स्वर्ण चुराने वाला दुष्ट नखों वाला होता है; ताँबा चुराने वाला तोंदल होता है; काँसा चुराने वाला श्वेत-दाग वाला होता है।

श्लोक 50 (padma.5.48.50)

त्रपुहारी च पुरुषो जायते पिंगमूर्द्धजः । शीसहारी च पुरुषो जायते शीर्षरोगवान्

trapuhārī ca puruṣo jāyate piṁgamūrddhajaḥ śīsahārī ca puruṣo jāyate śīrṣarogavān

टिन चुराने वाला पिंगल-केश वाला जन्म लेता है; सीसा चुराने वाला सिर के रोग से युक्त जन्म लेता है।

श्लोक 51 (padma.5.48.51)

घृतचौरस्तु पुरुषो जायते नेत्ररोगवान् । लोहहारी च पुरुषो बर्बरांगः प्रजायते

ghṛtacaurastu puruṣo jāyate netrarogavān lohahārī ca puruṣo barbarāṁgaḥ prajāyate

घी चुराने वाला नेत्र-रोगी जन्म लेता है; लोहा चुराने वाला विकृत अंगों वाला जन्म लेता है।

श्लोक 52 (padma.5.48.52)

चर्महारी च पुरुषो जायते मेदसा वृतः । मधुचौरस्तु पुरुषो जायते बस्तिगंधवान्

carmahārī ca puruṣo jāyate medasā vṛtaḥ madhucaurastu puruṣo jāyate bastigaṁdhavān

चमड़ा चुराने वाला अत्यधिक मेदयुक्त जन्म लेता है; मधु चुराने वाला दुर्गंधित वस्ति-प्रदेश वाला जन्म लेता है।

श्लोक 53 (padma.5.48.53)

तैलचौर्येण भवति नरः कण्ड्वातिपीडितः । आमान्नहरणाच्चैव दंतहीनः प्रजायते

tailacauryeṇa bhavati naraḥ kaṇḍvātipīḍitaḥ āmānnaharaṇāccaiva daṁtahīnaḥ prajāyate

तेल की चोरी से मनुष्य अत्यधिक खुजली से पीड़ित होता है; कच्चा अन्न चुराने से दंतहीन जन्म लेता है।

श्लोक 54 (padma.5.48.54)

पक्वान्नहरणाच्चैव जिह्वारोगयुतो भवेत् । मातृगामी च पुरुषो जायते लिंगवर्जितः

pakvānnaharaṇāccaiva jihvārogayuto bhavet mātṛgāmī ca puruṣo jāyate liṁgavarjitaḥ

पका हुआ अन्न चुराने से जिह्वा-रोग होता है; माता से संभोग करने वाला पुरुष लिंगहीन जन्म लेता है।

श्लोक 55 (padma.5.48.55)

गुरुजायाभिगमनान्मूत्रकृच्छ्रः प्रजायते । भगिनीं चैव गमने पीतकुष्ठः प्रजायते

gurujāyābhigamanānmūtrakṛcchraḥ prajāyate bhaginīṁ caiva gamane pītakuṣṭhaḥ prajāyate

गुरुपत्नी से संभोग करने से मूत्रकृच्छ्र रोग होता है; और बहन से संभोग करने पर पीत-कुष्ठ रोग होता है।

श्लोक 56 (padma.5.48.56)

स्वसुतागमने चैव रक्तकुष्ठः प्रजायते । भ्रातृभार्याभिगमने गुल्मकुष्ठः प्रजायते

svasutāgamane caiva raktakuṣṭhaḥ prajāyate bhrātṛbhāryābhigamane gulmakuṣṭhaḥ prajāyate

अपनी पुत्री से संभोग करने पर रक्त-कुष्ठ होता है; भाई की पत्नी से संभोग करने पर गुल्म-कुष्ठ होता है।

श्लोक 57 (padma.5.48.57)

स्वामिगम्यादिगमने जायते दद्रुमंडलम् । विश्वस्तभार्यागमने गजचर्मा प्रजायते

svāmigamyādigamane jāyate dadrumaṁḍalam viśvastabhāryāgamane gajacarmā prajāyate

स्वामी की पत्नी आदि से संभोग करने पर दाद के गोल दाग होते हैं; विश्वस्त पत्नी से संभोग करने पर हाथी जैसी चमड़ी वाला जन्म लेता है।

श्लोक 58 (padma.5.48.58)

पितृष्वस्रभिगमने दक्षिणांगे व्रणी भवेत् । मातुलान्यास्तु गमने वामांगे व्रणवान्भवेत्

pitṛṣvasrabhigamane dakṣiṇāṁge vraṇī bhavet mātulānyāstu gamane vāmāṁge vraṇavānbhavet

बुआ से संभोग करने पर दाहिने अंग में घाव होता है; मामी से संभोग करने पर बाएँ अंग में घाव होता है।

श्लोक 59 (padma.5.48.59)

पितृव्यपत्नीगमने कटौ कुष्ठः प्रजायते । मित्रभार्याभिगमने मृतभार्यः प्रजायते

pitṛvyapatnīgamane kaṭau kuṣṭhaḥ prajāyate mitrabhāryābhigamane mṛtabhāryaḥ prajāyate

चाची से संभोग करने पर कटि-कुष्ठ होता है; मित्र की पत्नी से संभोग करने पर स्वयं की पत्नी मृत जन्म लेती है।

श्लोक 60 (padma.5.48.60)

स्वगोत्रस्त्रीप्रसंगेन जायते च भगंदरः । तपस्विनीप्रसंगेन प्रमेहो जायते नरे

svagotrastrīprasaṁgena jāyate ca bhagaṁdaraḥ tapasvinīprasaṁgena prameho jāyate nare

अपने ही गोत्र की स्त्री से संभोग करने पर भगंदर होता है; तपस्विनी स्त्री से संभोग करने पर मनुष्य को प्रमेह रोग होता है।

श्लोक 61 (padma.5.48.61)

श्रोत्रियस्त्रीप्रसंगेन जायते नासिकाव्रणी । दीक्षितस्त्रीप्रसंगेन जायते दुष्टरक्तसृक्

śrotriyastrīprasaṁgena jāyate nāsikāvraṇī dīkṣitastrīprasaṁgena jāyate duṣṭaraktasṛk

श्रोत्रिय की पत्नी से संभोग करने पर नासिका में घाव होता है; दीक्षित स्त्री से संभोग करने पर दूषित रक्त-रोग होता है।

श्लोक 62 (padma.5.48.62)

स्वजातिजायागमने जायते हृदयव्रणी । जात्युन्नतस्त्रीगमने जायते मस्तकव्रणी

svajātijāyāgamane jāyate hṛdayavraṇī jātyunnatastrīgamane jāyate mastakavraṇī

अपनी ही जाति की परस्त्री से संभोग करने पर हृदय में घाव होता है; उच्च कुल की स्त्री से संभोग करने पर सिर में घाव होता है।

श्लोक 63 (padma.5.48.63)

पशुयोनौ च गमनान्मूत्रघातः प्रजायते । एते दोषा नराणां स्युर्नरकांते न संशयः

paśuyonau ca gamanānmūtraghātaḥ prajāyate ete doṣā narāṇāṁ syurnarakāṁte na saṁśayaḥ

पशु-योनि से संभोग करने पर मूत्ररोध होता है — ये सभी दोष नरक के अंत में मनुष्यों को प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 64 (padma.5.48.64)

स्त्रीणामपि भवंत्येते तत्तत्पुरुषसंगमात् । एवं राजन्हि चिह्नानि कीर्तितानि सुपापिनाम्

strīṇāmapi bhavaṁtyete tattatpuruṣasaṁgamāt evaṁ rājanhi cihnāni kīrtitāni supāpinām

ये स्त्रियों को भी उस-उस पुरुष के साथ संबंध से प्राप्त होते हैं। हे राजन्! इस प्रकार महापापियों के चिह्न बताए गए।

श्लोक 65 (padma.5.48.65)

दानपुण्यप्रसंगेन तीर्थादिक्रियया तथा । रामस्य चरितं श्रुत्वा तपसा वाक्षयं व्रजेत्

dānapuṇyaprasaṁgena tīrthādikriyayā tathā rāmasya caritaṁ śrutvā tapasā vākṣayaṁ vrajet

दान-पुण्य के प्रसंग से, तीर्थ आदि के कर्म से, तथा तप से भी मनुष्य क्षय से परे जा सकता है — राम की कथा सुनकर।

श्लोक 66 (padma.5.48.66)

सर्वेषामेव पापानां हरिकीर्तिधुनी नृणाम् । क्षालयेत्पापिनां पंकं नात्र कार्या विचारणा

sarveṣāmeva pāpānāṁ harikīrtidhunī nṛṇām kṣālayetpāpināṁ paṁkaṁ nātra kāryā vicāraṇā

मनुष्यों के समस्त पापों के लिए हरि की कीर्ति की नदी ही पापियों के पाप-कीचड़ को धो देती है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 67 (padma.5.48.67)

यो नावमन्येत हरिं तस्य यागाविधि श्रुताः । तीर्थान्यपि सुपुण्यानि पावितुं न क्षमाणि तम्

yo nāvamanyeta hariṁ tasya yāgāvidhi śrutāḥ tīrthānyapi supuṇyāni pāvituṁ na kṣamāṇi tam

जो हरि का अनादर करता है — उसके लिए यज्ञ-विधियाँ और अत्यंत पुण्यमय तीर्थ भी उसे पवित्र करने में समर्थ नहीं होते।

श्लोक 68 (padma.5.48.68)

हसते कीर्त्यमानं यश्चरित्रं ज्ञानदुर्बलः । न तस्य नरकान्मुक्तिः कल्पांतेऽपि भविष्यति

hasate kīrtyamānaṁ yaścaritraṁ jñānadurbalaḥ na tasya narakānmuktiḥ kalpāṁte'pi bhaviṣyati

जो ज्ञान से दुर्बल होकर उनकी कीर्ति के गान का उपहास करता है — उसकी नरक से मुक्ति कल्प के अंत में भी नहीं होगी।

श्लोक 69 (padma.5.48.69)

या हि राजन्विमोक्षार्थं हयस्यानुचरैः सह । श्रावय श्रीशचरितं यतो वाहगतिर्भवेत्

yā hi rājanvimokṣārthaṁ hayasyānucaraiḥ saha śrāvaya śrīśacaritaṁ yato vāhagatirbhavet

इसलिए हे राजन्! मुक्ति के लिए अश्व के अनुचरों सहित श्रीशचरित सुनाओ, जिससे अश्व की गति पुनः हो सके।

श्लोक 70 (padma.5.48.70)

शेष उवाच। इति श्रुत्वा प्रहृष्टोऽभूच्छत्रुघ्नः परवीरहा । प्रणम्य तं परिक्रम्य ययौ सेवकसंयुतः

śeṣa uvāca iti śrutvā prahṛṣṭo'bhūcchatrughnaḥ paravīrahā praṇamya taṁ parikramya yayau sevakasaṁyutaḥ

शेष जी ने कहा — यह सुनकर शत्रुवीरों के संहारक शत्रुघ्न अत्यंत हर्षित हुए; उन्हें प्रणाम करके तथा परिक्रमा करके वे अपने सेवकों सहित चल पड़े।

श्लोक 71 (padma.5.48.71)

तत्र गत्वा स हनुमान्हयवर्यस्य पार्श्वतः । उवाच रामचरितं महादुर्गतिनाशकम्

tatra gatvā sa hanumānhayavaryasya pārśvataḥ uvāca rāmacaritaṁ mahādurgatināśakam

वहाँ जाकर हनुमान ने उस श्रेष्ठ अश्व के समीप महादुर्गति का नाश करने वाला राम-चरित्र सुनाया।

श्लोक 72 (padma.5.48.72)

याहि देव विमानं स्वं रामकीर्तनपुण्यतः । स्वैरं चर स्वलोके त्वं मुक्तो भव कुयोनितः

yāhi deva vimānaṁ svaṁ rāmakīrtanapuṇyataḥ svairaṁ cara svaloke tvaṁ mukto bhava kuyonitaḥ

हे देव! राम-कीर्तन के पुण्य से जाओ अपने विमान पर; अपने लोक में स्वच्छंद विचरण करो, दुर्योनि से मुक्त हो जाओ।

श्लोक 73 (padma.5.48.73)

इति वाक्यं समाकर्ण्य शत्रुघ्नो यावदास्थितः । तावद्ददर्श विमलं देवं वैमानिकं वरम्

iti vākyaṁ samākarṇya śatrughno yāvadāsthitaḥ tāvaddadarśa vimalaṁ devaṁ vaimānikaṁ varam

यह वचन सुनते ही शत्रुघ्न जब तक वहाँ खड़े थे, उन्होंने एक निर्मल, श्रेष्ठ विमानवासी देव को प्रकट होते देखा।

श्लोक 74 (padma.5.48.74)

स उवाच विमुक्तोऽहं रामकीर्तनसंश्रुतेः । यामि स्वं भवनं राजन्नाज्ञापय महामते

sa uvāca vimukto'haṁ rāmakīrtanasaṁśruteḥ yāmi svaṁ bhavanaṁ rājannājñāpaya mahāmate

उसने कहा — राम-कीर्तन को सुनकर मैं मुक्त हो गया; अब मैं अपने भवन को जाता हूँ, हे राजन्! हे महामते! यदि कुछ और आज्ञा हो तो कहिए।

श्लोक 75 (padma.5.48.75)

इत्युक्त्वा प्रययौ देवो विमाने स्वे परिस्थितः । तदा विस्मयमापुस्ते शत्रुघ्नेन सहानुगाः

ityuktvā prayayau devo vimāne sve paristhitaḥ tadā vismayamāpuste śatrughnena sahānugāḥ

यह कहकर वह देव अपने विमान में बैठकर चला गया; तब शत्रुघ्न सहित वे सभी विस्मय से भर उठे।

श्लोक 76 (padma.5.48.76)

ततो वाहो विनिर्मुक्तो गात्रस्तंभाच्च भूतलात् । ययौ तद्विपिनं सर्वं भ्रमन्पक्षिसमाकुलम्

tato vāho vinirmukto gātrastaṁbhācca bhūtalāt yayau tadvipinaṁ sarvaṁ bhramanpakṣisamākulam

तब वह अश्व अपने अंगों की जड़ता से मुक्त होकर, उस संपूर्ण वन में, जो पक्षियों से भरा हुआ था, विचरण करता हुआ आगे बढ़ चला।

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