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पाताल खण्ड · अध्याय 49

राजा सुरथ द्वारा अश्व-ग्रहण

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (padma.5.49.1)

शेष उवाच। मासाः सप्ताभवंस्तस्य हयवर्यस्य हेलया । चरतो भारतं वर्षमनेकनृपपूरितम्

śeṣa uvāca māsāḥ saptābhavaṁstasya hayavaryasya helayā carato bhārataṁ varṣamanekanṛpapūritam

शेष जी ने कहा — उस श्रेष्ठ अश्व के अनेक राजाओं से भरे भारतवर्ष में लीलापूर्वक विचरण करते हुए सात मास बीत गए।

श्लोक 2 (padma.5.49.2)

स पूजितो भूपवरैः परीत्य वरभारतम् । परीवृतो वीरवरैः शत्रुघ्नादिभिरुद्भटैः

sa pūjito bhūpavaraiḥ parītya varabhāratam parīvṛto vīravaraiḥ śatrughnādibhirudbhaṭaiḥ

श्रेष्ठ राजाओं द्वारा पूजित होकर, उत्तम भारतवर्ष में भ्रमण करते हुए, शत्रुघ्न आदि प्रबल वीरश्रेष्ठों से घिरा हुआ —

श्लोक 3 (padma.5.49.3)

स बभ्राम बहून्देशान्हिमालयसमीपतः । न कोपि तं निजग्राह हयं रामबलं स्मरन्

sa babhrāma bahūndeśānhimālayasamīpataḥ na kopi taṁ nijagrāha hayaṁ rāmabalaṁ smaran

— वह अनेक देशों में हिमालय के समीप विचरण करता रहा; कोई भी उसे न पकड़ सका, राम के बल का स्मरण करते हुए।

श्लोक 4 (padma.5.49.4)

अंगवंगकलिंगानां राजभिः संस्तुतो हयः । जगाम राज्ञो नगरे सुरथस्य मनोहरे

aṁgavaṁgakaliṁgānāṁ rājabhiḥ saṁstuto hayaḥ jagāma rājño nagare surathasya manohare

अंग, वंग और कलिंग के राजाओं द्वारा स्तुति किया गया वह अश्व राजा सुरथ की मनोहर नगरी में गया।

श्लोक 5 (padma.5.49.5)

कुंडलं नाम नगरमदितेर्यत्र कुंडलम् । कर्णयोः पतितं भूमौ हर्षभयसुकंपयोः

kuṁḍalaṁ nāma nagaramaditeryatra kuṁḍalam karṇayoḥ patitaṁ bhūmau harṣabhayasukaṁpayoḥ

कुंडल नामक वह नगर, जहाँ अदिति का कुंडल हर्ष और भय से काँपते हुए कानों से भूमि पर गिर पड़ा था —

श्लोक 6 (padma.5.49.6)

यत्र धर्मव्यतिक्रांतिं न करोति कदापिना । श्रीरामस्मरणं प्रेम्णा करोति जनतान्वहम्

yatra dharmavyatikrāṁtiṁ na karoti kadāpinā śrīrāmasmaraṇaṁ premṇā karoti janatānvaham

— जहाँ लोग कभी धर्म का उल्लंघन नहीं करते, और प्रेमपूर्वक निरंतर श्रीराम का स्मरण करते हैं —

श्लोक 7 (padma.5.49.7)

अश्वत्थानां तु यत्रार्चा तुलस्याः प्रत्यहं नृभिः । क्रियते रघुनाथस्य सेवकैः पापवर्जितैः

aśvatthānāṁ tu yatrārcā tulasyāḥ pratyahaṁ nṛbhiḥ kriyate raghunāthasya sevakaiḥ pāpavarjitaiḥ

— जहाँ रघुनाथ के पापरहित सेवक प्रतिदिन अश्वत्थ वृक्ष तथा तुलसी की पूजा करते हैं —

श्लोक 8 (padma.5.49.8)

यत्र देवालया रम्या राघवप्रतिमायुताः । पूज्यंते प्रत्यहं शुद्धचित्तैः कपटवर्जितैः

yatra devālayā ramyā rāghavapratimāyutāḥ pūjyaṁte pratyahaṁ śuddhacittaiḥ kapaṭavarjitaiḥ

— जहाँ राघव की प्रतिमाओं से युक्त रमणीय देवालय प्रतिदिन शुद्ध-चित्त, कपटरहित लोगों द्वारा पूजे जाते हैं —

श्लोक 9 (padma.5.49.9)

वाचि नाम हरेर्यत्र न वै कलहसंकथा । हृदि ध्यानं तु तस्यैव न च कामफलस्मृतिः

vāci nāma hareryatra na vai kalahasaṁkathā hṛdi dhyānaṁ tu tasyaiva na ca kāmaphalasmṛtiḥ

— जहाँ वाणी में केवल हरि का नाम है, कभी कलह अथवा व्यर्थ वार्तालाप नहीं; हृदय में केवल उन्हीं का ध्यान है, कामना के फल का स्मरण नहीं —

श्लोक 10 (padma.5.49.10)

देवनं यत्र रामस्य वार्त्ताभिः पूतदेहिनाम् । न जातुचिन्नृणामस्ति सत्यव्यसनमानिनाम्

devanaṁ yatra rāmasya vārttābhiḥ pūtadehinām na jātucinnṛṇāmasti satyavyasanamāninām

— जहाँ पवित्र देहधारी लोगों की बातों में राम की लीला ही सर्वस्व है, जो सत्य को ही अपना धन मानते हैं, उनके लिए वह कभी अनुपस्थित नहीं होती —

श्लोक 11 (padma.5.49.11)

तस्मिन्वसति धर्मात्मा सुरथः सत्यवान्बली । रघुनाथपदस्मारहृष्टचित्तः परोन्मदः

tasminvasati dharmātmā surathaḥ satyavānbalī raghunāthapadasmārahṛṣṭacittaḥ paronmadaḥ

— वहाँ सुरथ रहते थे, धर्मात्मा, सत्यवान् और बलवान्, रघुनाथ के चरणों के स्मरण से हर्षित चित्त, परम उन्मत्त भक्त।

श्लोक 12 (padma.5.49.12)

किं वर्णयामि रामस्य सेवकं सुरथं वरम् । यस्याशेषगुणा भूमौ विस्तृताः पावयंत्यघम्

kiṁ varṇayāmi rāmasya sevakaṁ surathaṁ varam yasyāśeṣaguṇā bhūmau vistṛtāḥ pāvayaṁtyagham

राम के उस श्रेष्ठ सेवक सुरथ का मैं क्या वर्णन करूँ, जिनके असंख्य गुण पृथ्वी पर फैलकर पाप का नाश करते हैं?

श्लोक 13 (padma.5.49.13)

सेवकास्तस्य भूपस्य पर्यटंतः कदाचन । अपश्यन्हयमेधस्य हयं चंदनचर्चितम्

sevakāstasya bhūpasya paryaṭaṁtaḥ kadācana apaśyanhayamedhasya hayaṁ caṁdanacarcitam

उस राजा के सेवकों ने एक दिन घूमते हुए चंदन से चर्चित उस अश्वमेध के अश्व को देखा।

श्लोक 14 (padma.5.49.14)

ते दृष्ट्वा विस्मयं प्राप्ता हयपत्रमलोकयन् । स्पष्टाक्षरसमायुक्तं चंदनादिकचर्चितम्

te dṛṣṭvā vismayaṁ prāptā hayapatramalokayan spaṣṭākṣarasamāyuktaṁ caṁdanādikacarcitam

उसे देखकर वे विस्मित हुए और चंदन आदि से लिपटे उस अश्व-पत्र को पढ़ा, जो स्पष्ट अक्षरों से युक्त था।

श्लोक 15 (padma.5.49.15)

ज्ञात्वा रामेण संमुक्तं हयं नेत्रमनोहरम् । हृष्टा राज्ञे सभास्थाय कथयामासुरुत्सुकाः

jñātvā rāmeṇa saṁmuktaṁ hayaṁ netramanoharam hṛṣṭā rājñe sabhāsthāya kathayāmāsurutsukāḥ

नेत्रों को मोहित करने वाले उस अश्व को राम द्वारा छोड़ा गया जानकर, हर्षित और उत्सुक होकर वे सभा में बैठे राजा के पास जाकर बोले —

श्लोक 16 (padma.5.49.16)

स्वामिन्नयोध्यानगरीपतिस्तस्यास्तु राघवः । हयमेधक्रतोर्योग्यो हयो मुक्तः परिभ्रमन्

svāminnayodhyānagarīpatistasyāstu rāghavaḥ hayamedhakratoryogyo hayo muktaḥ paribhraman

स्वामिन्! अयोध्यानगरी के स्वामी वे राघव — उनका, अश्वमेध-यज्ञ के योग्य वह अश्व, मुक्त होकर स्वच्छंद विचरण कर रहा है।

श्लोक 17 (padma.5.49.17)

स ते पुरस्य निकटे प्राप्तः सेवकसंयुतः । गृहाण त्वं महाराज हयं तं सुमनोहरम्

sa te purasya nikaṭe prāptaḥ sevakasaṁyutaḥ gṛhāṇa tvaṁ mahārāja hayaṁ taṁ sumanoharam

वह आपकी नगरी के समीप ही, अपने सेवकों सहित, पहुँच गया है; हे महाराज! उस अत्यंत मनोहर अश्व को ग्रहण कीजिए।

श्लोक 18 (padma.5.49.18)

शेष उवाच। इति श्रुत्वा निजप्रोक्तं वाक्यं हर्षपरिप्लुतः । उवाच वीरान्बलिनो मेघगंभीरया गिरा

śeṣa uvāca iti śrutvā nijaproktaṁ vākyaṁ harṣapariplutaḥ uvāca vīrānbalino meghagaṁbhīrayā girā

शेष जी ने कहा — इस प्रकार कहा गया यह वृत्तांत सुनकर हर्ष से अभिभूत होकर उन्होंने मेघ के समान गंभीर वाणी में अपने बलवान् वीरों से कहा —

श्लोक 19 (padma.5.49.19)

सुरथ उवाच। धन्या वयं राममुखं पश्यामः सह सेवकाः । ग्रहीष्यामि हयं तस्य भटकोटिपरीवृतम्

suratha uvāca dhanyā vayaṁ rāmamukhaṁ paśyāmaḥ saha sevakāḥ grahīṣyāmi hayaṁ tasya bhaṭakoṭiparīvṛtam

सुरथ ने कहा — हम धन्य हैं कि सेवकों सहित राम का मुखारविंद देखेंगे; मैं करोड़ों योद्धाओं से घिरे उस अश्व को ग्रहण करूँगा।

श्लोक 20 (padma.5.49.20)

तदा मोक्ष्यामि वाहं तं यदा रामः समाव्रजेत् । कृतार्थं मम भक्तस्य चिरं ध्यानरतस्य वै

tadā mokṣyāmi vāhaṁ taṁ yadā rāmaḥ samāvrajet kṛtārthaṁ mama bhaktasya ciraṁ dhyānaratasya vai

तब मैं उस अश्व को तभी छोड़ूँगा जब स्वयं राम यहाँ आएँगे — यह मुझ जैसे दीर्घकाल से उन्हीं के ध्यान में लीन भक्त के लिए कृतार्थता होगी।

श्लोक 21 (padma.5.49.21)

शेष उवाच। इत्थमुक्त्वा महीपालः सेवकान्स्वयमादिशत् । गृह्णंतु वाहं प्रसभं मोच्यो नाश्वोऽक्षिगोचरः

śeṣa uvāca itthamuktvā mahīpālaḥ sevakānsvayamādiśat gṛhṇaṁtu vāhaṁ prasabhaṁ mocyo nāśvo'kṣigocaraḥ

शेष जी ने कहा — यह कहकर राजा ने स्वयं अपने सेवकों को आज्ञा दी — इस अश्व को बलपूर्वक पकड़ लो; इसे दृष्टि से ओझल न होने दो।

श्लोक 22 (padma.5.49.22)

अनेन सुमहाँल्लाभो भविष्यति तु मे मतम् । यद्रामचरणौ प्रेक्षे ब्रह्मशक्रादिदुर्ल्लभौ

anena sumahā~llābho bhaviṣyati tu me matam yadrāmacaraṇau prekṣe brahmaśakrādidurllabhau

इससे मुझे बड़ा भारी लाभ होगा, ऐसा मेरा विचार है — कि मैं उन राम के चरणों का दर्शन करूँगा, जो ब्रह्मा और इंद्र के लिए भी दुर्लभ हैं।

श्लोक 23 (padma.5.49.23)

स एव धन्यः स्वजनः पुत्रो वा बांधवोऽथवा । पशुर्वा वाहनं वापि रामाप्तिर्येन संभवेत्

sa eva dhanyaḥ svajanaḥ putro vā bāṁdhavo'thavā paśurvā vāhanaṁ vāpi rāmāptiryena saṁbhavet

वही परिजन, पुत्र, बांधव, अथवा पशु या वाहन धन्य है, जिसके माध्यम से राम की प्राप्ति संभव हो सके।

श्लोक 24 (padma.5.49.24)

तस्माद्गृहीत्वा क्रत्वश्वं स्वर्णपत्रेण शोभितम् । बध्नंतु वाजिशालायां कामवेगं मनोरमम्

tasmādgṛhītvā kratvaśvaṁ svarṇapatreṇa śobhitam badhnaṁtu vājiśālāyāṁ kāmavegaṁ manoramam

इसलिए स्वर्णपत्र से सुशोभित उस यज्ञीय अश्व को ग्रहण करके, कामनावेगी उस मनोहर अश्व को अश्वशाला में बाँध दो।

श्लोक 25 (padma.5.49.25)

इत्युक्तास्ते ततो गत्वा वाहं रामस्य शोभितम् । गृहीत्वा तरसा राज्ञे ददुः सर्वं शुभांगिनम्

ityuktāste tato gatvā vāhaṁ rāmasya śobhitam gṛhītvā tarasā rājñe daduḥ sarvaṁ śubhāṁginam

इस प्रकार आज्ञा पाकर वे गए और राम के उस सुशोभित अश्व को, जिसका संपूर्ण सौंदर्य ज्यों का त्यों था, तुरंत पकड़कर राजा को दे दिया।

श्लोक 26 (padma.5.49.26)

राजा प्राप्य मुदा चाश्वं रामस्य दनुजार्दनः । सेवकान्प्राह बलिनो धर्मकृत्यविचक्षणः

rājā prāpya mudā cāśvaṁ rāmasya danujārdanaḥ sevakānprāha balino dharmakṛtyavicakṣaṇaḥ

दैत्यों के संहारक राम के उस अश्व को हर्षपूर्वक प्राप्त करके, धर्मकृत्य में निपुण राजा ने अपने बलवान् सेवकों से कहा —

श्लोक 27 (padma.5.49.27)

वात्स्यायन महाबुद्धे शृणुष्वैकाग्रमानसः । न तस्य विषये कश्चित्परदाररतो नरः

vātsyāyana mahābuddhe śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ na tasya viṣaye kaścitparadārarato naraḥ

हे वात्स्यायन! हे महाबुद्धे! एकाग्रचित्त होकर सुनो: मेरे इस राज्य में कोई भी मनुष्य परस्त्री में आसक्त नहीं है —

श्लोक 28 (padma.5.49.28)

न परद्रव्यनिरतो न च कामेषु लंपटः । न जिह्वाभिरतोन्मार्गे कीर्त्तयेद्रामकीर्तनात्

na paradravyanirato na ca kāmeṣu laṁpaṭaḥ na jihvābhiratonmārge kīrttayedrāmakīrtanāt

— न किसी के धन का लोभी है, न कामासक्त है; न वह अपनी जिह्वा से मार्ग-भ्रष्ट होकर राम-कीर्तन के अतिरिक्त कुछ और बोलता है।

श्लोक 29 (padma.5.49.29)

यः सेवकान्नृपो वक्ति यूयं सेवार्थमागताः । कथयंतु भवच्चेष्टां धर्मकर्मविशारदाः

yaḥ sevakānnṛpo vakti yūyaṁ sevārthamāgatāḥ kathayaṁtu bhavacceṣṭāṁ dharmakarmaviśāradāḥ

जो राजा अपने सेवकों से कहता है — तुम सेवा के लिए यहाँ आए हो — धर्मकर्म में निपुण वे तुम्हारा अपना ही आचरण बता दें।

श्लोक 30 (padma.5.49.30)

एकपत्नीव्रतधरा न परद्रव्यलोलुपाः । परापवादानिरता न च वेदोत्पथं गताः

ekapatnīvratadharā na paradravyalolupāḥ parāpavādāniratā na ca vedotpathaṁ gatāḥ

एकपत्नीव्रत धारण करने वाले, दूसरे के धन के लोभी न होने वाले, परनिंदा में लीन न होने वाले, तथा वेद-मार्ग से न भटकने वाले —

श्लोक 31 (padma.5.49.31)

श्रीरामस्मरणादीनि कुर्वंति प्रत्यहं भटाः । तानहं रामसेवार्थं रक्षाम्यंतक कोपवान्

śrīrāmasmaraṇādīni kurvaṁti pratyahaṁ bhaṭāḥ tānahaṁ rāmasevārthaṁ rakṣāmyaṁtaka kopavān

— प्रतिदिन श्रीराम का स्मरण करने वाले मेरे उन योद्धाओं की मैं राम-सेवा के लिए यमराज के समान क्रोधित होकर रक्षा करता हूँ।

श्लोक 32 (padma.5.49.32)

एतद्विरुद्धधर्माणो ये नराः पापसंयुताः । तानहं विषये मह्यं वासयामि न दुर्मतीन्

etadviruddhadharmāṇo ye narāḥ pāpasaṁyutāḥ tānahaṁ viṣaye mahyaṁ vāsayāmi na durmatīn

जो लोग इस धर्म के विपरीत आचरण करते हैं, पाप में लिप्त हैं — उन दुर्बुद्धियों को मैं अपने राज्य में नहीं बसने देता।

श्लोक 33 (padma.5.49.33)

तस्य देशे न पापिष्ठाः पापं कुर्वंति मानसे । हरिध्यानहताशेष पातकामोदसंयुताः

tasya deśe na pāpiṣṭhāḥ pāpaṁ kurvaṁti mānase haridhyānahatāśeṣa pātakāmodasaṁyutāḥ

उसके देश में अत्यंत पापी भी मन में पाप की कल्पना नहीं कर सकते, हरि-ध्यान से उनके शेष सभी पातक नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 34 (padma.5.49.34)

यदैवमभवद्देशो राजा धर्मेण संयुतः । तदा तत्स्था नराः सर्वे मृता गच्छंति निर्वृतिम्

yadaivamabhavaddeśo rājā dharmeṇa saṁyutaḥ tadā tatsthā narāḥ sarve mṛtā gacchaṁti nirvṛtim

जब इस प्रकार वह देश राजा के धर्मयुक्त होने से युक्त हो गया, तब वहाँ रहने वाले सभी मनुष्य मरने पर मुक्ति को प्राप्त होने लगे।

श्लोक 35 (padma.5.49.35)

यमानुचरनिर्वेशो नाभवत्सौरथे पुरे । तदा यमो मुनेरूपं धृत्वा प्रागान्महीश्वरम्

yamānucaranirveśo nābhavatsaurathe pure tadā yamo munerūpaṁ dhṛtvā prāgānmahīśvaram

सुरथ की नगरी में यमदूतों के लिए कोई कार्य शेष न रहने पर स्वयं यमराज मुनि का रूप धारण करके उस भूपति के पास गए।

श्लोक 36 (padma.5.49.36)

वल्कलांबरधारी च जटाशोभितशीर्षकः । सुरथं तु सभामध्ये ददर्श हरिसेवकम्

valkalāṁbaradhārī ca jaṭāśobhitaśīrṣakaḥ surathaṁ tu sabhāmadhye dadarśa harisevakam

वल्कल वस्त्र धारण किए, जटाओं से सुशोभित मस्तक वाले उन्होंने हरि-सेवक सुरथ को सभा के मध्य देखा।

श्लोक 37 (padma.5.49.37)

तुलसीमस्तके यस्य वाचि नाम हरेः परम् । धर्मकर्मरतां वार्त्तां श्रावयंतं निजाञ्जनान्

tulasīmastake yasya vāci nāma hareḥ param dharmakarmaratāṁ vārttāṁ śrāvayaṁtaṁ nijāñjanān

उनके मस्तक पर तुलसी थी, वाणी में हरि का परम नाम था, और वे अपने लोगों को धर्मकर्म से युक्त कथाएँ सुना रहे थे।

श्लोक 38 (padma.5.49.38)

तदा मुनिं नृपो दृष्ट्वा तपोमूर्तिमिव स्थितम् । ववंदे चरणौ तस्य पाद्यादिकमथाकरोत्

tadā muniṁ nṛpo dṛṣṭvā tapomūrtimiva sthitam vavaṁde caraṇau tasya pādyādikamathākarot

तब राजा ने तपोमूर्ति के समान खड़े उस मुनि को देखकर उनके चरणों में प्रणाम किया तथा पाद्य आदि से उनका सत्कार किया।

श्लोक 39 (padma.5.49.39)

सुखोपविष्टं विश्रांतं मुनिं प्राह नृपाग्रणीः । धन्यमद्य जनुर्मह्यं धन्यमद्य गृहं मम

sukhopaviṣṭaṁ viśrāṁtaṁ muniṁ prāha nṛpāgraṇīḥ dhanyamadya janurmahyaṁ dhanyamadya gṛhaṁ mama

सुखपूर्वक विश्राम से बैठे मुनि से राजश्रेष्ठ ने कहा — आज मेरा जन्म धन्य हुआ, आज मेरा घर धन्य हुआ —

श्लोक 40 (padma.5.49.40)

कथाः कथयतान्मह्यं रामस्य विविधा वराः । याः शृण्वतां पापहानिर्भविष्यति पदे पदे

kathāḥ kathayatānmahyaṁ rāmasya vividhā varāḥ yāḥ śṛṇvatāṁ pāpahānirbhaviṣyati pade pade

— अब मुझे राम की अनेक श्रेष्ठ कथाएँ सुनाइए, जिन्हें सुनने वालों का पाप पद-पद पर क्षीण होता जाएगा।

श्लोक 41 (padma.5.49.41)

इत्थमुक्तं समाकर्ण्य जहास स मुनिर्भृशम् । दंतान्प्रदर्शयन्सर्वांस्तालास्फालितपाणिकः

itthamuktaṁ samākarṇya jahāsa sa munirbhṛśam daṁtānpradarśayansarvāṁstālāsphālitapāṇikaḥ

यह सुनकर वह मुनि ज़ोर से हँस पड़े, अपने सारे दाँत दिखाते हुए और तालियाँ बजाते हुए।

श्लोक 42 (padma.5.49.42)

हसंतं तं मुनिं प्राह हसने कारणं किमु । कथयस्व प्रसादेन यथा स्यान्मनसः सुखम्

hasaṁtaṁ taṁ muniṁ prāha hasane kāraṇaṁ kimu kathayasva prasādena yathā syānmanasaḥ sukham

उस हँसते हुए मुनि से राजा ने कहा — इस हँसी का कारण क्या है? कृपापूर्वक बताइए, जिससे मेरे मन को सुख हो।

श्लोक 43 (padma.5.49.43)

ततो मुनिर्नृपं प्राह शृणु राजन्धियायुतः । यदहं तेऽभिधास्यामि स्मिते कारणमुत्तमम्

tato munirnṛpaṁ prāha śṛṇu rājandhiyāyutaḥ yadahaṁ te'bhidhāsyāmi smite kāraṇamuttamam

तब मुनि ने राजा से कहा — हे बुद्धिमान राजन्! सुनो, मैं तुम्हें अपनी मुस्कान का उत्तम कारण बताता हूँ।

श्लोक 44 (padma.5.49.44)

त्वया प्रोक्तं हरेः कीर्तिं कथयस्व ममाग्रतः । को हरिः कस्य वा कीर्तिः सर्वे कर्मवशा नराः

tvayā proktaṁ hareḥ kīrtiṁ kathayasva mamāgrataḥ ko hariḥ kasya vā kīrtiḥ sarve karmavaśā narāḥ

तुमने मुझसे कहा कि मेरे सामने हरि की कीर्ति सुनाओ — परंतु हरि कौन है, और किसकी कीर्ति है? सभी मनुष्य तो अपने-अपने कर्मों के अधीन हैं।

श्लोक 45 (padma.5.49.45)

कर्मणा प्राप्यते स्वर्गः कर्मणा नरकं व्रजेत् । कर्मणैव भवेत्सर्वं पुत्रपौत्रादिकं बहु

karmaṇā prāpyate svargaḥ karmaṇā narakaṁ vrajet karmaṇaiva bhavetsarvaṁ putrapautrādikaṁ bahu

कर्म से ही स्वर्ग प्राप्त होता है, कर्म से ही नरक में जाना पड़ता है; कर्म से ही पुत्र-पौत्र आदि प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त होती है।

श्लोक 46 (padma.5.49.46)

शक्रः शतं क्रतूनां तु कृत्वागात्परमं पदम् । ब्रह्मापि कर्मणा लोकं प्राप्य सत्याख्यमद्भुतम्

śakraḥ śataṁ kratūnāṁ tu kṛtvāgātparamaṁ padam brahmāpi karmaṇā lokaṁ prāpya satyākhyamadbhutam

शक्र ने सौ यज्ञ करके परम पद प्राप्त किया; ब्रह्मा ने भी अपने कर्मों से सत्यलोक नामक अद्भुत लोक प्राप्त किया।

श्लोक 47 (padma.5.49.47)

अनेके कर्मणा सिद्धा मरुदादय ईशिनः । कुर्वन्ति भोगसौख्यं च अप्सरोगणसेविताः

aneke karmaṇā siddhā marudādaya īśinaḥ kurvanti bhogasaukhyaṁ ca apsarogaṇasevitāḥ

मरुद्गण आदि अनेक ईशगण अपने कर्मों से सिद्ध होकर अप्सराओं के समूहों द्वारा सेवित भोग-सुख का आनंद लेते हैं।

श्लोक 48 (padma.5.49.48)

तस्मात्कुरुष्व यज्ञादीन्यजस्व किल देवताः । यथा ते विमलाकीर्तिर्भविष्यति महीतले

tasmātkuruṣva yajñādīnyajasva kila devatāḥ yathā te vimalākīrtirbhaviṣyati mahītale

इसलिए यज्ञ आदि करो, देवताओं का यजन करो, जिससे तुम्हारी निर्मल कीर्ति पृथ्वीतल पर फैल सके।

श्लोक 49 (padma.5.49.49)

इति श्रुत्वा तु तद्वाक्यं कोपक्षुभितमानसः । उवाच रामैकमना विप्रं कर्मविशारदम्

iti śrutvā tu tadvākyaṁ kopakṣubhitamānasaḥ uvāca rāmaikamanā vipraṁ karmaviśāradam

यह वचन सुनकर, क्रोध से क्षुब्ध चित्त हुए, राम में ही एकाग्रचित्त राजा ने कर्म-विशारद उस विप्र से कहा —

श्लोक 50 (padma.5.49.50)

मा ब्रूहि कर्मणो वार्तां क्षयिष्णुफलदायिनीम् । गच्छ मन्नगरोपांताद्बहिर्लोकविगर्हितः

mā brūhi karmaṇo vārtāṁ kṣayiṣṇuphaladāyinīm gaccha mannagaropāṁtādbahirlokavigarhitaḥ

मुझसे कर्म की उस बात को मत कहो, जो क्षय होने वाला फल देती है; लोक-निंदित होकर मेरी नगरी की सीमा से बाहर चले जाओ।

श्लोक 51 (padma.5.49.51)

इंद्रः पतिष्यति क्षिप्रं पतिष्यत्यपि पद्मजः । न पतिष्यंति मनुजा रामस्य भजनोत्सुकाः

iṁdraḥ patiṣyati kṣipraṁ patiṣyatyapi padmajaḥ na patiṣyaṁti manujā rāmasya bhajanotsukāḥ

इंद्र भी शीघ्र ही गिरेगा, और पद्मज (ब्रह्मा) भी गिरेंगे; परंतु राम-भजन में तत्पर मनुष्य कभी नहीं गिरते।

श्लोक 52 (padma.5.49.52)

पश्य ध्रुवं च प्रह्लादं बिभीषणमथाद्भुतम् । ये चान्ये रामभक्ता वै कदापि न पतंति ते

paśya dhruvaṁ ca prahlādaṁ bibhīṣaṇamathādbhutam ye cānye rāmabhaktā vai kadāpi na pataṁti te

देखो ध्रुव को, प्रह्लाद को, और उस अद्भुत विभीषण को भी, तथा अन्य जो भी राम के भक्त हैं — वे कभी नहीं गिरते।

श्लोक 53 (padma.5.49.53)

ये रामनिंदका दुष्टास्तानि मे यमकिंकराः । ताडयिष्यंति लोहस्य मुद्गरैः पाशबन्धनैः

ye rāmaniṁdakā duṣṭāstāni me yamakiṁkarāḥ tāḍayiṣyaṁti lohasya mudgaraiḥ pāśabandhanaiḥ

जो दुष्ट राम की निंदा करते हैं — उन्हें मेरे यमकिंकर लोहे के मुद्गरों से पीटेंगे और बंधनों में बाँधेंगे।

श्लोक 54 (padma.5.49.54)

ब्राह्मणत्वाद्देहदंडं न कुर्यां ते द्विजाधम । गच्छ गच्छ मदालोकात्ताडयिष्यामि चान्यथा

brāhmaṇatvāddehadaṁḍaṁ na kuryāṁ te dvijādhama gaccha gaccha madālokāttāḍayiṣyāmi cānyathā

केवल तुम्हारे ब्राह्मणत्व के कारण ही मैं तुम्हें शारीरिक दंड नहीं देता, हे नीच द्विज! मेरी दृष्टि से दूर हो जाओ, अन्यथा मैं तुम्हें दंड दूँगा।

श्लोक 55 (padma.5.49.55)

इत्थमुक्तवति श्रेष्ठे भूपे सुरथसंज्ञिते । सेवका बाहुना धृत्वा निष्कासयितुमुद्यताः

itthamuktavati śreṣṭhe bhūpe surathasaṁjñite sevakā bāhunā dhṛtvā niṣkāsayitumudyatāḥ

श्रेष्ठ राजा सुरथ के इस प्रकार कहने पर उनके सेवक उस मुनि को भुजा से पकड़कर बाहर निकालने को उद्यत हुए।

श्लोक 56 (padma.5.49.56)

तदा यमो निजं रूपं धृत्वा लोकैकवंदितम् । प्राह भूपं प्रतुष्टोऽस्मि याचस्व हरिसेवक

tadā yamo nijaṁ rūpaṁ dhṛtvā lokaikavaṁditam prāha bhūpaṁ pratuṣṭo'smi yācasva harisevaka

तब यम ने समस्त लोकों द्वारा वंदित अपने वास्तविक रूप को धारण करके राजा से कहा — मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ; हे हरि-सेवक! वर माँगो।

श्लोक 57 (padma.5.49.57)

मया प्रलोभितो वाग्भिर्बह्वीभिरपि सुव्रत । चलितोसि न रामस्य सेवायाः साधुसेवितः

mayā pralobhito vāgbhirbahvībhirapi suvrata calitosi na rāmasya sevāyāḥ sādhusevitaḥ

हे सुव्रत! मेरे अनेक वचनों से प्रलोभित होने पर भी तुम राम की सेवा से विचलित नहीं हुए — तुम सचमुच साधु हो।

श्लोक 58 (padma.5.49.58)

तदा प्रोवाच भूमीशो यमं दृष्ट्वा सुतोषितम् । उवाच यदि तुष्टोसि देहि मे वरमुत्तमम्

tadā provāca bhūmīśo yamaṁ dṛṣṭvā sutoṣitam uvāca yadi tuṣṭosi dehi me varamuttamam

तब यम को अत्यंत प्रसन्न देखकर राजा ने उनसे कहा — यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे उत्तम वर दीजिए —

श्लोक 59 (padma.5.49.59)

तावन्मम न वै मृत्युर्यावद्रामसमागमः । न भयं मे भवत्तो हि कदाचन हि धर्मराट्

tāvanmama na vai mṛtyuryāvadrāmasamāgamaḥ na bhayaṁ me bhavatto hi kadācana hi dharmarāṭ

— मुझे तब तक मृत्यु न आए जब तक राम से मेरी भेंट न हो; हे धर्मराज! मुझे आपसे कभी कोई भय न हो।

श्लोक 60 (padma.5.49.60)

तदोवाच यमो भूपमिदं तव भविष्यति । सर्वं त्वदीप्सितं तथ्यं करिष्यति रघोःपतिः

tadovāca yamo bhūpamidaṁ tava bhaviṣyati sarvaṁ tvadīpsitaṁ tathyaṁ kariṣyati raghoḥpatiḥ

तब यम ने राजा से कहा — तुम्हारे लिए यह ऐसा ही होगा; रघुनाथ तुम्हारी समस्त इच्छाओं को सत्य करेंगे।

श्लोक 61 (padma.5.49.61)

इत्युक्त्वांतर्हितो धर्मो जगाम स्वपुरं प्रति । प्रशस्य तस्य चरितं हरिभक्तिपरात्मनः

ityuktvāṁtarhito dharmo jagāma svapuraṁ prati praśasya tasya caritaṁ haribhaktiparātmanaḥ

यह कहकर धर्मराज उस हरिभक्तिपरायण की चर्या की प्रशंसा करते हुए अंतर्धान होकर अपनी नगरी की ओर चले गए।

श्लोक 62 (padma.5.49.62)

स राजा धार्मिको रामसेवकः परया मुदा । गृहीत्वाश्वं प्रत्युवाच सेवकान्हरिसेवकान्

sa rājā dhārmiko rāmasevakaḥ parayā mudā gṛhītvāśvaṁ pratyuvāca sevakānharisevakān

राम के उस धार्मिक सेवक राजा ने अत्यंत हर्षित होकर अश्व को ग्रहण करते हुए अपने हरि-भक्त सेवकों से कहा —

श्लोक 63 (padma.5.49.63)

मया गृहीतो वाहोऽसौ राघवस्य महीपतेः । सज्जी भवंतु सर्वत्र यूयं रणविशारदाः

mayā gṛhīto vāho'sau rāghavasya mahīpateḥ sajjī bhavaṁtu sarvatra yūyaṁ raṇaviśāradāḥ

मैंने पृथ्वीपति राघव के इस अश्व को ग्रहण कर लिया है; युद्धकुशल तुम सब लोग सर्वत्र सन्नद्ध हो जाओ।

श्लोक 64 (padma.5.49.64)

इति प्रोक्तास्तु ते सर्वे भटा राज्ञो महाबलाः । सज्जीभूताः क्षणादेव सभायां जग्मुरुत्सुकाः

iti proktāstu te sarve bhaṭā rājño mahābalāḥ sajjībhūtāḥ kṣaṇādeva sabhāyāṁ jagmurutsukāḥ

यह कहे जाने पर राजा के वे सभी महाबली योद्धा क्षणभर में सन्नद्ध होकर उत्सुकतापूर्वक सभा में गए।

श्लोक 65 (padma.5.49.65)

राज्ञो वीरा दशसुताश्चंपको मोहकस्तथा । रिपुंजयोऽतिदुर्वारः प्रतापीबलमोदकः

rājño vīrā daśasutāścaṁpako mohakastathā ripuṁjayo'tidurvāraḥ pratāpībalamodakaḥ

राजा के दस पुत्र — चंपक, मोहक, अत्यंत दुर्दमनीय रिपुंजय, प्रतापी, बलमोदक —

श्लोक 66 (padma.5.49.66)

हर्यक्षः सहदेवश्च भूरिदेवः सुतापनः । इति राज्ञो दश सुताः सज्जीभूता रणांगणे

haryakṣaḥ sahadevaśca bhūridevaḥ sutāpanaḥ iti rājño daśa sutāḥ sajjībhūtā raṇāṁgaṇe

— हर्याक्ष, सहदेव, भूरिदेव, सुतापन — इस प्रकार राजा के दस पुत्र रणभूमि में सन्नद्ध हो गए।

श्लोक 67 (padma.5.49.67)

यातुमिच्छामकुर्वंस्ते महोत्साहसमन्विताः । राजापि स्वरथं चित्रं हेमशोभाविनिर्मितम्

yātumicchāmakurvaṁste mahotsāhasamanvitāḥ rājāpi svarathaṁ citraṁ hemaśobhāvinirmitam

महान् उत्साह से युक्त वे प्रस्थान करने के लिए संकल्पबद्ध हो गए; और राजा ने भी स्वर्ण-शोभा से निर्मित अपना अद्भुत रथ मँगवाया —

श्लोक 68 (padma.5.49.68)

आह्वयामास सुजवैर्वाजिभिः समलंकृतम् । रणोत्साहेन संयुक्तः सर्वसैन्यपरीवृतः

āhvayāmāsa sujavairvājibhiḥ samalaṁkṛtam raṇotsāhena saṁyuktaḥ sarvasainyaparīvṛtaḥ

— जो द्रुतगामी अश्वों से अलंकृत था; युद्धोत्साह से युक्त, संपूर्ण सेना से घिरे हुए —

श्लोक 69 (padma.5.49.69)

सभायां सेवकान्सर्वान्दिशन्नास्ते महीपतिः

sabhāyāṁ sevakānsarvāndiśannāste mahīpatiḥ

— राजा सभा में स्थित रहकर अपने समस्त सेवकों को निर्देश देते रहे।

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