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पाताल खण्ड · अध्याय 52

सुरथ की विजय

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

श्लोक 1 (padma.5.52.1)

शेष उवाच। चंपकं पतितं दृष्ट्वा सुरथः क्षत्रियो बली । पुत्रदुःखपरीतांगो जगाम स्यंदने स्थितः

śeṣa uvāca caṁpakaṁ patitaṁ dṛṣṭvā surathaḥ kṣatriyo balī putraduḥkhaparītāṁgo jagāma syaṁdane sthitaḥ

शेष जी ने कहा — चंपक को गिरा हुआ देखकर बलवान् क्षत्रिय सुरथ, पुत्र-शोक से व्याकुल शरीर लिए, रथ पर सवार होकर आगे बढ़े।

श्लोक 2 (padma.5.52.2)

कपींद्रमाजुहावाथ सुरथः कोपसंयुतः । निःश्वासवेगं संमुंचन्महाबलसमन्वितः

kapīṁdramājuhāvātha surathaḥ kopasaṁyutaḥ niḥśvāsavegaṁ saṁmuṁcanmahābalasamanvitaḥ

तब सुरथ ने क्रोध से युक्त होकर, महाबल से संपन्न, दीर्घ श्वास लेते हुए कपींद्र को ललकारा।

श्लोक 3 (padma.5.52.3)

आह्वयानं नृपं दृष्ट्वा निजं वीरः कपीश्वरः । जगाम तं महावीरो महावेगसमन्वितः

āhvayānaṁ nṛpaṁ dṛṣṭvā nijaṁ vīraḥ kapīśvaraḥ jagāma taṁ mahāvīro mahāvegasamanvitaḥ

उस राजा को अपनी ओर ललकारते देखकर वीर कपीश्वर, वह महावीर, अत्यंत वेगपूर्वक उसकी ओर चले।

श्लोक 4 (padma.5.52.4)

तमागतं हनूमंतं तृणीकुर्वं तमुद्भटान् । उवाच सुरथो राजा मेघगंभीरसुस्वरः

tamāgataṁ hanūmaṁtaṁ tṛṇīkurvaṁ tamudbhaṭān uvāca suratho rājā meghagaṁbhīrasusvaraḥ

इस प्रकार आए हुए हनुमान से, उग्रतम वीरों को भी तृणवत् समझने वाले राजा सुरथ ने मेघ के समान गंभीर, सुंदर स्वर में कहा —

श्लोक 5 (padma.5.52.5)

सुरथ उवाच। धन्योसि कपिवर्य त्वं महाबलपराक्रमः । येन राममहत्कृत्यं कृतं राक्षसके पुरे

suratha uvāca dhanyosi kapivarya tvaṁ mahābalaparākramaḥ yena rāmamahatkṛtyaṁ kṛtaṁ rākṣasake pure

सुरथ ने कहा — धन्य हो, हे कपिवर्य! तुम महाबलपराक्रमी हो, जिसने राक्षस-नगरी में वह महान् कार्य किया।

श्लोक 6 (padma.5.52.6)

त्वं रामचरणस्यासि सेवको भक्तिसंयुतः । त्वया वीरेण मत्पुत्रः पातितश्चंपको बली

tvaṁ rāmacaraṇasyāsi sevako bhaktisaṁyutaḥ tvayā vīreṇa matputraḥ pātitaścaṁpako balī

तुम भक्तिसंयुक्त होकर राम के चरणों के सेवक हो; तुम्हारे द्वारा, हे वीर! मेरा बलवान् पुत्र चंपक गिराया गया है।

श्लोक 7 (padma.5.52.7)

इदानीं त्वां तु संबध्य गंतास्मि नगरेमम । यत्नात्तिष्ठ कपीशेशसत्यमुक्तं मया स्मृतम्

idānīṁ tvāṁ tu saṁbadhya gaṁtāsmi nagaremama yatnāttiṣṭha kapīśeśasatyamuktaṁ mayā smṛtam

अब तुम्हें बाँधकर मैं अपने नगर की ओर जाऊँगा; हे कपीश्वर! सावधान रहो, मैंने जो सत्य कहा था, वह मुझे स्मरण है।

श्लोक 8 (padma.5.52.8)

इति भाषितमाकर्ण्य सुरथस्य कपीश्वरः । उवाच धीरया वाण्या रणे वीरैकभूषिते

iti bhāṣitamākarṇya surathasya kapīśvaraḥ uvāca dhīrayā vāṇyā raṇe vīraikabhūṣite

सुरथ का यह कथन सुनकर, वीरों से ही सुशोभित उस युद्ध में कपीश्वर ने धीर वाणी में कहा।

श्लोक 9 (padma.5.52.9)

हनूमानुवाच। त्वं रामचरणस्मारी वयं रामस्य सेवकाः । बध्नासि चेन्मां प्रसभं मोचयिष्यति मत्प्रभुः

hanūmānuvāca tvaṁ rāmacaraṇasmārī vayaṁ rāmasya sevakāḥ badhnāsi cenmāṁ prasabhaṁ mocayiṣyati matprabhuḥ

हनुमान ने कहा — तुम राम के चरणों का स्मरण करने वाले हो; हम राम के सेवक हैं। यदि तुम मुझे बलपूर्वक बाँधोगे, तो मेरे स्वामी मुझे मुक्त कराएँगे।

श्लोक 10 (padma.5.52.10)

कुरु वीर भवत्स्वांतस्थितं सत्यं प्रतिश्रुतम् । रामं स्मरन्वै दुःखांतं याति वेदा वदंत्यदः

kuru vīra bhavatsvāṁtasthitaṁ satyaṁ pratiśrutam rāmaṁ smaranvai duḥkhāṁtaṁ yāti vedā vadaṁtyadaḥ

हे वीर! तुमने जो अपने हृदय में सत्य-प्रतिज्ञा धारण की है, उसे निभाओ; राम का स्मरण करने से मनुष्य दुःख के पार चला जाता है — ऐसा वेद कहते हैं।

श्लोक 11 (padma.5.52.11)

शेष उवाच। इति ब्रुवंतं सुरथः प्रशस्य पवनात्मजम् । विव्याध बाणैर्बहुभिः शितैः शाणेन दारुणैः

śeṣa uvāca iti bruvaṁtaṁ surathaḥ praśasya pavanātmajam vivyādha bāṇairbahubhiḥ śitaiḥ śāṇena dāruṇaiḥ

शेष जी ने कहा — इस प्रकार कहते हुए उससे सुरथ ने, पवनपुत्र की प्रशंसा करते हुए भी, शाण पर तेज़ किए गए अनेक तीक्ष्ण भयंकर बाणों से उन्हें बींध दिया।

श्लोक 12 (padma.5.52.12)

तान्मुक्तानगणय्याथ बाणाञ्छोणितपातिनः । करे जग्राह कोदंडं सज्यं शरसमन्वितम्

tānmuktānagaṇayyātha bāṇāñchoṇitapātinaḥ kare jagrāha kodaṁḍaṁ sajyaṁ śarasamanvitam

उन रक्त बहाने वाले बाणों की गिनती किए बिना ही उसने अपने हाथ में प्रत्यंचाबद्ध बाणयुक्त धनुष ले लिया।

श्लोक 13 (padma.5.52.13)

गृहीत्वा करयोश्चापं बभंज कुपितः कपिः । चीत्कुर्वंस्त्रासयन्वीरान्नखैर्दीर्णान्सृजन्भटान्

gṛhītvā karayoścāpaṁ babhaṁja kupitaḥ kapiḥ cītkurvaṁstrāsayanvīrānnakhairdīrṇānsṛjanbhaṭān

दोनों हाथों में धनुष लेकर क्रुद्ध वानर ने उसे तोड़ डाला, चीत्कार करते हुए वीरों को त्रस्त करते हुए, अपने नखों से योद्धाओं को विदीर्ण करते हुए।

श्लोक 14 (padma.5.52.14)

तेन भग्नं धनुर्दृष्ट्वा स्वकीयं गुणसंयुतम् । अपरं धनुरादत्त महद्गुणविशोभितम्

tena bhagnaṁ dhanurdṛṣṭvā svakīyaṁ guṇasaṁyutam aparaṁ dhanurādatta mahadguṇaviśobhitam

अपने प्रत्यंचायुक्त धनुष को इस प्रकार टूटा देखकर उसने महान् प्रत्यंचा से सुशोभित दूसरा धनुष उठाया।

श्लोक 15 (padma.5.52.15)

तच्चापि जगृहे रोषात्कपिश्चापं बभंज तत् । अन्यच्चापं समादत्त तद्बभंज महाबलः

taccāpi jagṛhe roṣātkapiścāpaṁ babhaṁja tat anyaccāpaṁ samādatta tadbabhaṁja mahābalaḥ

उसे भी क्रोध से उठाया; वानर ने उस धनुष को भी तोड़ डाला; उसने दूसरा धनुष लिया, उसे भी उस बलवान् ने तोड़ डाला।

श्लोक 16 (padma.5.52.16)

तस्मिंश्चापे प्रभग्नेऽपि सोऽन्यद्धनुरुपाददत् । सोपि चापं बभंजाशु महावेगसमन्वितः

tasmiṁścāpe prabhagne'pi so'nyaddhanurupādadat sopi cāpaṁ babhaṁjāśu mahāvegasamanvitaḥ

उस धनुष के टूट जाने पर भी उसने एक और धनुष उठाया; अत्यंत वेगयुक्त उस वानर ने उसे भी तुरंत तोड़ डाला।

श्लोक 17 (padma.5.52.17)

एवं राज्ञस्तु चापानामशीतिर्विदलीकृता । क्षणे क्षणे महारोषात्कुर्वन्नादाननेकधा

evaṁ rājñastu cāpānāmaśītirvidalīkṛtā kṣaṇe kṣaṇe mahāroṣātkurvannādānanekadhā

इस प्रकार राजा के अस्सी धनुष खंड-खंड कर दिए गए, जबकि वानर क्षण-प्रतिक्षण महाक्रोध में विविध गर्जनाएँ करता रहा।

श्लोक 18 (padma.5.52.18)

तदात्यंतं प्रकुपितः शक्तिमुग्रामथाददे । शक्त्या स ताडितो वीरः पपात क्षणमुत्सुकः

tadātyaṁtaṁ prakupitaḥ śaktimugrāmathādade śaktyā sa tāḍito vīraḥ papāta kṣaṇamutsukaḥ

तब अत्यंत क्रुद्ध होकर उसने एक उग्र शक्ति उठाई; उस शक्ति से आहत होकर वह वीर क्षणभर के लिए गिर पड़ा, यद्यपि युद्ध के लिए उत्सुक ही रहा।

श्लोक 19 (padma.5.52.19)

उत्थाय स्यंदनं राज्ञो जग्राह कुपितो भृशम् । उड्डीनस्तं गृहीत्वा तु समुद्रमतिवेगतः

utthāya syaṁdanaṁ rājño jagrāha kupito bhṛśam uḍḍīnastaṁ gṛhītvā tu samudramativegataḥ

उठकर, अत्यंत क्रुद्ध होकर, उसने राजा के रथ को पकड़ लिया, और उसे लेकर उड़ते हुए अत्यंत वेग से समुद्र की ओर ले गया।

श्लोक 20 (padma.5.52.20)

तमुड्डीनं समालक्ष्य सुरथः परवीरहा । ताडयामास परिघैर्हृदि मारुतिमुद्यतम्

tamuḍḍīnaṁ samālakṣya surathaḥ paravīrahā tāḍayāmāsa parighairhṛdi mārutimudyatam

उसे इस प्रकार उड़ते देखकर शत्रुवीरों के संहारक सुरथ ने उत्सुक मारुति के हृदय पर लौह-परिघों से प्रहार किया।

श्लोक 21 (padma.5.52.21)

मुक्तस्तेन रथो दूराच्चूर्णीभूतोऽभवत्क्षणात् । सोऽन्यरथं समारुह्य ययौ वेगात्समीरजम्

muktastena ratho dūrāccūrṇībhūto'bhavatkṣaṇāt so'nyarathaṁ samāruhya yayau vegātsamīrajam

उसके द्वारा छोड़ा गया वह रथ दूर जाकर क्षणभर में चूर्ण हो गया; दूसरा रथ चढ़कर पवनसुत वेगपूर्वक चले गए।

श्लोक 22 (padma.5.52.22)

हनूमांस्तद्रथं पुच्छे संवेष्ट्य प्रधनांगणे । हयसारथिसंयुक्तं बभंज सपताकिनम्

hanūmāṁstadrathaṁ pucche saṁveṣṭya pradhanāṁgaṇe hayasārathisaṁyuktaṁ babhaṁja sapatākinam

हनुमान ने रणभूमि में उस रथ को अपनी पूँछ से लपेटकर उसे घोड़े, सारथि तथा पताका सहित तोड़ डाला।

श्लोक 23 (padma.5.52.23)

अन्यं रथं समास्थाय ययौ राजा महाबलः । बभंज तं रथं वेगान्मारुतिः कुपितांगकः

anyaṁ rathaṁ samāsthāya yayau rājā mahābalaḥ babhaṁja taṁ rathaṁ vegānmārutiḥ kupitāṁgakaḥ

दूसरा रथ चढ़कर बलवान् राजा आगे बढ़े; उस रथ को भी क्रोध से भरे अंगों वाले मारुति ने वेगपूर्वक तोड़ डाला।

श्लोक 24 (padma.5.52.24)

भग्नं तं स्यंदनं वीक्ष्य सुरथोऽन्यसमाश्रितः । भग्नः स तेन सहसा हयसारथिसंयुतः

bhagnaṁ taṁ syaṁdanaṁ vīkṣya suratho'nyasamāśritaḥ bhagnaḥ sa tena sahasā hayasārathisaṁyutaḥ

उस रथ को टूटा देखकर सुरथ ने दूसरा रथ चढ़ा; उसे भी घोड़े और सारथि सहित उन्होंने तुरंत तोड़ डाला।

श्लोक 25 (padma.5.52.25)

एवमेकोनपंचाशद्रथा भग्ना हनूमता । तत्कर्म वीक्ष्य राजापि विसिस्माय ससैनिकः

evamekonapaṁcāśadrathā bhagnā hanūmatā tatkarma vīkṣya rājāpi visismāya sasainikaḥ

इस प्रकार हनुमान द्वारा उनचास रथ तोड़े गए; उस पराक्रम को देखकर राजा भी अपने सैनिकों सहित विस्मित हो उठे।

श्लोक 26 (padma.5.52.26)

कुपितः प्राह कीशेंद्रं धन्योसि पवनात्मज । पराक्रमन्निदं कर्म न कर्ता न करिष्यति

kupitaḥ prāha kīśeṁdraṁ dhanyosi pavanātmaja parākramannidaṁ karma na kartā na kariṣyati

क्रुद्ध होकर उन्होंने कपींद्र से कहा — धन्य हो, हे पवनपुत्र! यह पराक्रम का कार्य न किसी ने किया है और न करेगा।

श्लोक 27 (padma.5.52.27)

क्षणमेकं प्रतीक्षस्व यावत्सज्यं धनुस्त्वहम् । करोमि पवनोद्भूत रामपादाब्जषट्पद

kṣaṇamekaṁ pratīkṣasva yāvatsajyaṁ dhanustvaham karomi pavanodbhūta rāmapādābjaṣaṭpada

हे पवनोद्भव! हे राम-चरण-कमल के षट्पद! एक क्षण प्रतीक्षा करो, जब तक मैं अपना धनुष प्रत्यंचाबद्ध करता हूँ।

श्लोक 28 (padma.5.52.28)

इत्युक्त्वा चापमात्तज्यं कृत्वा रोषपरिप्लुतः । अस्त्रं पाशुपतं नाम संदधे शर उल्बणे

ityuktvā cāpamāttajyaṁ kṛtvā roṣapariplutaḥ astraṁ pāśupataṁ nāma saṁdadhe śara ulbaṇe

यह कहकर उन्होंने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, और क्रोध से आप्लावित होकर एक उग्र बाण पर पाशुपत नामक अस्त्र का संधान किया।

श्लोक 29 (padma.5.52.29)

ततो भूताश्च वेतालाः पिशाचा योगिनीमुखाः । प्रादुर्बभूवुः सहसा भीषयंतः समीरजम्

tato bhūtāśca vetālāḥ piśācā yoginīmukhāḥ prādurbabhūvuḥ sahasā bhīṣayaṁtaḥ samīrajam

तब भूत, वेताल, पिशाच और योगिनियों के समूह अकस्मात् प्रकट होकर पवनसुत को भयभीत करने लगे।

श्लोक 30 (padma.5.52.30)

कपिः पाशुपतैरस्त्रैर्बद्धो लोकैरभीक्षितः । हाहेति च वदंत्येते यावत्तावत्समीरजः

kapiḥ pāśupatairastrairbaddho lokairabhīkṣitaḥ hāheti ca vadaṁtyete yāvattāvatsamīrajaḥ

पाशुपत अस्त्रों से बँधे हुए उस वानर को समस्त लोक देख रहे थे; वे हाय-हाय पुकार रहे थे — तब तक पवनसुत ने —

श्लोक 31 (padma.5.52.31)

स्मृत्वा रामं स्वमनसा त्रोटयामास तत्क्षणात् । स मुक्तगात्रः सहसा युयुधे सुरथं नृपम्

smṛtvā rāmaṁ svamanasā troṭayāmāsa tatkṣaṇāt sa muktagātraḥ sahasā yuyudhe surathaṁ nṛpam

— अपने मन में राम का स्मरण करते हुए उसी क्षण उन बंधनों को तोड़ डाला; अंग मुक्त होकर वे तुरंत राजा सुरथ से युद्ध करने लगे।

श्लोक 32 (padma.5.52.32)

तं मुक्तगात्रं संवीक्ष्य सुरथः परमास्त्रवित् । महाबलं मन्यमानो ब्राह्ममस्त्रं समाददे

taṁ muktagātraṁ saṁvīkṣya surathaḥ paramāstravit mahābalaṁ manyamāno brāhmamastraṁ samādade

उसके अंगों को इस प्रकार मुक्त देखकर परमास्त्रवेत्ता सुरथ ने उसे महाबली मानते हुए ब्रह्मास्त्र धारण किया।

श्लोक 33 (padma.5.52.33)

मारुतिर्ब्राह्ममस्त्रं तु निजगाल हसन्बली । तन्निगीर्णं नृपो दृष्ट्वा रामं सस्मार भूमिपः

mārutirbrāhmamastraṁ tu nijagāla hasanbalī tannigīrṇaṁ nṛpo dṛṣṭvā rāmaṁ sasmāra bhūmipaḥ

बलवान् मारुति ने हँसते हुए ब्रह्मास्त्र को निगल लिया; उसे निगला हुआ देखकर राजा ने राम का स्मरण किया।

श्लोक 34 (padma.5.52.34)

स्मृत्वा दाशरथिं रामं रामास्त्रं स्वशरासने । संधाय तं जगादेदं बद्धोसि कपिपुंगव

smṛtvā dāśarathiṁ rāmaṁ rāmāstraṁ svaśarāsane saṁdhāya taṁ jagādedaṁ baddhosi kapipuṁgava

दशरथ-पुत्र राम का स्मरण करके उन्होंने अपने धनुष पर रामास्त्र चढ़ाया, और उससे यह कहा — हे कपिश्रेष्ठ! तुम बंध गए हो।

श्लोक 35 (padma.5.52.35)

श्रुत्वा तत्प्रक्रमेद्यावत्तावद्बद्धो रणांगणे । राज्ञा रामास्त्रतो वीरो हनूमान्रामसेवकः

śrutvā tatprakramedyāvattāvadbaddho raṇāṁgaṇe rājñā rāmāstrato vīro hanūmānrāmasevakaḥ

यह घोषणा सुनते ही, राम-सेवक वीर हनुमान रणभूमि में राजा द्वारा रामास्त्र से बाँध दिए गए।

श्लोक 36 (padma.5.52.36)

उवाच भूपं हनुमान्किंकरोमि महीभुज । मत्स्वाम्यस्त्रेण संबद्धो नान्येन प्राकृतेन वै

uvāca bhūpaṁ hanumānkiṁkaromi mahībhuja matsvāmyastreṇa saṁbaddho nānyena prākṛtena vai

हनुमान ने राजा से कहा — हे भूपाल! मैं क्या करूँ? मैं अपने स्वामी के ही अस्त्र से बँधा हूँ — किसी अन्य साधारण अस्त्र से नहीं।

श्लोक 37 (padma.5.52.37)

तन्मानयामिभूपालनयस्वस्वपुरंप्रति । मोचयिष्यति मत्स्वामी आगत्य स दयानिधिः

tanmānayāmibhūpālanayasvasvapuraṁprati mocayiṣyati matsvāmī āgatya sa dayānidhiḥ

इसलिए मैं इसका सम्मान करता हूँ; हे राजन्! मुझे अपने नगर की ओर ले चलो; मेरे स्वामी, वे कृपानिधि, आकर मुझे मुक्त कराएँगे।

श्लोक 38 (padma.5.52.38)

बद्धे समीरजे क्रुद्धः पुष्कलो भूमिपं ययौ । तं पुष्कलं समायांतं विव्याध वसुभिः शरैः

baddhe samīraje kruddhaḥ puṣkalo bhūmipaṁ yayau taṁ puṣkalaṁ samāyāṁtaṁ vivyādha vasubhiḥ śaraiḥ

पवनसुत के बँध जाने पर क्रुद्ध पुष्कल राजा की ओर बढ़े; उस आते हुए पुष्कल को उन्होंने आठ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 39 (padma.5.52.39)

अनेकबाणसाहस्रैर्निजघान नृपं बली । राज्ञानेके शरास्तस्य च्छिन्नाः प्रधनमंडले

anekabāṇasāhasrairnijaghāna nṛpaṁ balī rājñāneke śarāstasya cchinnāḥ pradhanamaṁḍale

अनेक हजार बाणों से उस बलवान् ने राजा पर प्रहार किया; और वहाँ रणभूमि में राजा के भी अनेक बाण काट डाले गए।

श्लोक 40 (padma.5.52.40)

एवं समरसंक्रुद्धे सुरथे पुष्कले तथा । बाणैर्व्याप्तं जगत्सर्वं स्थास्नुभूयश्चरिष्णु च

evaṁ samarasaṁkruddhe surathe puṣkale tathā bāṇairvyāptaṁ jagatsarvaṁ sthāsnubhūyaścariṣṇu ca

इस प्रकार सुरथ और पुष्कल के युद्ध में क्रोधित होने पर संपूर्ण संसार, स्थावर और जंगम दोनों, बाणों से व्याप्त हो गया।

श्लोक 41 (padma.5.52.41)

तेषां रणोद्यमं वीक्ष्य मुमुहुः सुरसैनिकाः । मानवानां तु का वार्ता क्षणात्त्रासं समीयुषाम्

teṣāṁ raṇodyamaṁ vīkṣya mumuhuḥ surasainikāḥ mānavānāṁ tu kā vārtā kṣaṇāttrāsaṁ samīyuṣām

उनके इस युद्धोत्साह को देखकर देवसैनिक भी मोहित हो गए; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या, जो क्षणभर में भय से त्रस्त हो गए।

श्लोक 42 (padma.5.52.42)

अस्त्रप्रत्यस्त्रविगमैर्महामंत्रपरिस्तुतैः । बभूव तुमुलं युद्धं वीराणां रोमहर्षणम्

astrapratyastravigamairmahāmaṁtraparistutaiḥ babhūva tumulaṁ yuddhaṁ vīrāṇāṁ romaharṣaṇam

महामंत्रों से स्तुत अस्त्र-प्रत्यस्त्रों के संघर्ष से एक ऐसा घमासान युद्ध हुआ, जिसने वीरों के रोंगटे खड़े कर दिए।

श्लोक 43 (padma.5.52.43)

तदा प्रकुपितो राजा नाराचं तु समाददे । छिन्नः स तु क्रुधा मुक्तैर्वत्सदंतैः सभारतैः

tadā prakupito rājā nārācaṁ tu samādade chinnaḥ sa tu krudhā muktairvatsadaṁtaiḥ sabhārataiḥ

तब क्रुद्ध राजा ने एक नाराच उठाया; उसे भारति द्वारा क्रोधवश छोड़े गए बछड़े-दंत के समान बाणों ने काट डाला।

श्लोक 44 (padma.5.52.44)

छिन्ने तस्मिञ्छरे राजा कोपादन्यं समाददे । छिनत्ति यावत्स शरं तावल्लग्नो हृदि क्षतः

chinne tasmiñchare rājā kopādanyaṁ samādade chinatti yāvatsa śaraṁ tāvallagno hṛdi kṣataḥ

उस बाण के कट जाने पर राजा ने क्रोधवश दूसरा बाण उठाया; जब तक वह बाण काट रहे थे, तब तक एक बाण उनके हृदय में जा लगा, जिससे वे घायल हो गए।

श्लोक 45 (padma.5.52.45)

मूर्च्छां प्राप महातेजाः पुष्कलो महदद्भुतम् । युद्धं विधाय सुमहद्राज्ञा सह महामतिः

mūrcchāṁ prāpa mahātejāḥ puṣkalo mahadadbhutam yuddhaṁ vidhāya sumahadrājñā saha mahāmatiḥ

महातेजस्वी महामति पुष्कल राजा के साथ एक अत्यंत महान् और अद्भुत युद्ध करके मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 46 (padma.5.52.46)

पुष्कले पतिते राजा शत्रुघ्नः शत्रुतापनः । सुरथं प्रति संक्रुद्धो जगाम स्यंदनस्थितः

puṣkale patite rājā śatrughnaḥ śatrutāpanaḥ surathaṁ prati saṁkruddho jagāma syaṁdanasthitaḥ

पुष्कल के गिरने पर शत्रुतापन राजा शत्रुघ्न क्रोध से भरकर रथ पर सवार होकर सुरथ की ओर बढ़े।

श्लोक 47 (padma.5.52.47)

उवाच सुरथं भूपं रामभ्राता महाबलः । त्वया महत्कृतं कर्म यद्बद्धः पवनात्मजः

uvāca surathaṁ bhūpaṁ rāmabhrātā mahābalaḥ tvayā mahatkṛtaṁ karma yadbaddhaḥ pavanātmajaḥ

राम के उस बलवान् भाई ने राजा सुरथ से कहा — तुमने बड़ा भारी कार्य किया है, कि पवनपुत्र को बाँध लिया —

श्लोक 48 (padma.5.52.48)

पुष्कलोऽपि महावीरस्तथान्ये मम सैनिकाः । पातिताः प्रधने घोरे महाबलपराक्रमाः

puṣkalo'pi mahāvīrastathānye mama sainikāḥ pātitāḥ pradhane ghore mahābalaparākramāḥ

— और महावीर पुष्कल को भी, और मेरे अन्य बल-पराक्रम-संपन्न सैनिकों को भी, इस भयंकर युद्ध में गिरा दिया है।

श्लोक 49 (padma.5.52.49)

इदानीं तिष्ठ मद्वीरान्पातयित्वा रणांगणे । कुत्र यास्यसि भूमीश सहस्व मम सायकान्

idānīṁ tiṣṭha madvīrānpātayitvā raṇāṁgaṇe kutra yāsyasi bhūmīśa sahasva mama sāyakān

अब मेरे वीरों को इस रणभूमि में गिराकर ठहरो; हे भूमीश! कहाँ जाओगे? अब मेरे बाणों को सहन करो।

श्लोक 50 (padma.5.52.50)

इत्थमाश्रुत्य वीरस्य भाषितं सुरथो बली । जगाद रामपादाब्जं दधच्चेतसि शोभनम्

itthamāśrutya vīrasya bhāṣitaṁ suratho balī jagāda rāmapādābjaṁ dadhaccetasi śobhanam

उस वीर का यह कथन सुनकर बलवान् सुरथ ने हृदय में राम के सुंदर चरण-कमलों को धारण करते हुए उत्तर दिया —

श्लोक 51 (padma.5.52.51)

मया ते पातिताः संख्ये वीरा मारुतजोन्मुखाः । इदानीं पातयिष्यामि त्वामपि प्रधनांगणे

mayā te pātitāḥ saṁkhye vīrā mārutajonmukhāḥ idānīṁ pātayiṣyāmi tvāmapi pradhanāṁgaṇe

मैंने युद्ध में पवनसुत के सम्मुख आए उन वीरों को गिराया है; अब मैं तुम्हें भी इस रणभूमि में गिरा दूँगा।

श्लोक 52 (padma.5.52.52)

स्मरस्व रामं यो वीरः स्वमागत्य प्ररक्षति । अन्यथा जीवितं नास्ति मत्पुरः शत्रुतापन

smarasva rāmaṁ yo vīraḥ svamāgatya prarakṣati anyathā jīvitaṁ nāsti matpuraḥ śatrutāpana

उस वीर राम का स्मरण करो, जो स्वयं आकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं; अन्यथा, हे शत्रुतापन! मेरे सम्मुख तुम्हारा जीवन नहीं है।

श्लोक 53 (padma.5.52.53)

इत्युक्त्वा बाणसाहस्रैस्तं जघान महीपतिः । शत्रुघ्नं शरसंघातपंजरे न्यदधात्परम्

ityuktvā bāṇasāhasraistaṁ jaghāna mahīpatiḥ śatrughnaṁ śarasaṁghātapaṁjare nyadadhātparam

यह कहकर राजा ने उस पर हजारों बाणों से प्रहार किया; उन्होंने शत्रुघ्न को बाणों के अत्यंत विशाल पिंजरे में बाँध दिया।

श्लोक 54 (padma.5.52.54)

शत्रुघ्नः शरसंघातं मुंचंतं वह्निदैवतम् । अस्त्रं मुमोच दाहार्थं शराणां नतपर्वणाम्

śatrughnaḥ śarasaṁghātaṁ muṁcaṁtaṁ vahnidaivatam astraṁ mumoca dāhārthaṁ śarāṇāṁ nataparvaṇām

शत्रुघ्न ने उस बाण-समूह के छोड़े जाने पर उन्हें भस्म करने के लिए अग्निदेवता से युक्त, मुड़े हुए पर्ववाले बाणों का अस्त्र छोड़ा।

श्लोक 55 (padma.5.52.55)

तदस्त्रं मुक्तमालोक्य राजा वै सुरथो महान् । वारुणास्त्रेण शमयन्विव्याध शरकोटिभिः

tadastraṁ muktamālokya rājā vai suratho mahān vāruṇāstreṇa śamayanvivyādha śarakoṭibhiḥ

उस छोड़े गए अस्त्र को देखकर महान् राजा सुरथ ने उसे वारुणास्त्र से शांत करते हुए करोड़ों बाणों से उन्हें बींध दिया।

श्लोक 56 (padma.5.52.56)

तदा तद्योगिनीदत्तमस्त्रं धनुषि संदधे । मोहनं सर्ववीराणां निद्राप्रापकमद्भुतम्

tadā tadyoginīdattamastraṁ dhanuṣi saṁdadhe mohanaṁ sarvavīrāṇāṁ nidrāprāpakamadbhutam

तब उन्होंने उस योगिनी द्वारा दिए गए अस्त्र को धनुष पर चढ़ाया, वह अद्भुत मोहनास्त्र, जो समस्त वीरों को निद्रा में डाल देता है।

श्लोक 57 (padma.5.52.57)

तन्मोहनं महास्त्रं स वीक्ष्य राजा हरिंस्मरन् । जगाद शत्रुघ्नमयं सर्वशस्त्रास्त्रकोविदः

tanmohanaṁ mahāstraṁ sa vīkṣya rājā hariṁsmaran jagāda śatrughnamayaṁ sarvaśastrāstrakovidaḥ

उस महान् मोहनास्त्र को देखकर राजा ने हरि का स्मरण करते हुए, समस्त शस्त्रास्त्रों में निपुण उस शत्रुघ्न से यह कहा —

श्लोक 58 (padma.5.52.58)

मोहितस्य मम श्रीमद्रामस्य स्मरणेन ह । नान्यन्मोहनमाभाति ममापि भयतापदम्

mohitasya mama śrīmadrāmasya smaraṇena ha nānyanmohanamābhāti mamāpi bhayatāpadam

मेरे श्रीमान् राम के स्मरण से मैं पहले ही मोहित हूँ; मेरे लिए अन्य कोई मोहन प्रभावी नहीं है, और न ही कोई भय या संताप।

श्लोक 59 (padma.5.52.59)

इत्युक्तवति वीरे तु मुमोच स महास्त्रकम् । तेन बाणेन संछिन्नं पपात रणमंडले

ityuktavati vīre tu mumoca sa mahāstrakam tena bāṇena saṁchinnaṁ papāta raṇamaṁḍale

वीर के इस प्रकार कहते ही उन्होंने वह महान् अस्त्र छोड़ा; उनके बाण से कट जाने पर वह युद्धभूमि में गिर पड़ा।

श्लोक 60 (padma.5.52.60)

तन्मोहनं महास्त्रं तु निष्फलं वीक्ष्य भूमिपे । अत्यंतं विस्मयं प्राप्य बाणं धनुषि संदधे

tanmohanaṁ mahāstraṁ tu niṣphalaṁ vīkṣya bhūmipe atyaṁtaṁ vismayaṁ prāpya bāṇaṁ dhanuṣi saṁdadhe

उस महान् मोहनास्त्र को राजा द्वारा निष्फल हुआ देखकर, अत्यंत विस्मित होकर उन्होंने धनुष पर एक बाण चढ़ाया।

श्लोक 61 (padma.5.52.61)

लवणो येन निहतो महासुरविमर्दनः । तं बाणं चाप आधत्त घोरं कान्त्यानलप्रभम्

lavaṇo yena nihato mahāsuravimardanaḥ taṁ bāṇaṁ cāpa ādhatta ghoraṁ kāntyānalaprabham

जिस बाण से महादैत्य-विमर्दक लवण मारा गया था — उसी भयंकर, अग्नि-सी कांति वाले बाण को उन्होंने धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 62 (padma.5.52.62)

तं वीक्ष्य राजा प्रोवाच बाणोऽयमसतां हृदि । लगते रामभक्तस्य संमुखेऽपि न भात्यसौ

taṁ vīkṣya rājā provāca bāṇo'yamasatāṁ hṛdi lagate rāmabhaktasya saṁmukhe'pi na bhātyasau

उसे देखकर राजा ने कहा — यह बाण दुष्टों के हृदय में लगता है; राम-भक्त के सम्मुख होने पर भी यह प्रभावी नहीं होता।

श्लोक 63 (padma.5.52.63)

इत्येवं भाषमाणं तु बाणेनानेन शत्रुहा । विव्याध हृदये क्षिप्रं वह्निज्वालासमप्रभम्

ityevaṁ bhāṣamāṇaṁ tu bāṇenānena śatruhā vivyādha hṛdaye kṣipraṁ vahnijvālāsamaprabham

इस प्रकार कहते ही शत्रुहंता (शत्रुघ्न) ने अग्निज्वाला के समान तेजस्वी उसी बाण से तुरंत उनके हृदय को बींध दिया।

श्लोक 64 (padma.5.52.64)

तेन बाणेन दुःखार्तो महापीडासमन्वितः । रथोपस्थे क्षणं मूर्च्छामवाप परतापनः

tena bāṇena duḥkhārto mahāpīḍāsamanvitaḥ rathopasthe kṣaṇaṁ mūrcchāmavāpa paratāpanaḥ

उस बाण से दुःखार्त, अत्यंत पीड़ा से युक्त होकर वह शत्रुतापन क्षणभर के लिए रथ पर मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 65 (padma.5.52.65)

स क्षणात्तां व्यथां तीर्त्वा जगाद रिपुमग्रतः । सहस्वैकं प्रहारं मे कुत्र यासि ममाग्रतः

sa kṣaṇāttāṁ vyathāṁ tīrtvā jagāda ripumagrataḥ sahasvaikaṁ prahāraṁ me kutra yāsi mamāgrataḥ

क्षणभर में उस पीड़ा को सहन करके उन्होंने अपने सम्मुख शत्रु से कहा — मेरा एक ही प्रहार सहन करो — मेरे सामने से कहाँ जाओगे?

श्लोक 66 (padma.5.52.66)

एवमुक्त्वा महासंख्ये बाणमाधत्त सायके । ज्वालामालापरीतांगं स्वर्णपुंखसमन्वितम्

evamuktvā mahāsaṁkhye bāṇamādhatta sāyake jvālāmālāparītāṁgaṁ svarṇapuṁkhasamanvitam

इस प्रकार उस महासमर में कहकर उन्होंने ज्वाला-माला से घिरे, स्वर्णपंखों से युक्त एक बाण अपने तीर पर चढ़ाया।

श्लोक 67 (padma.5.52.67)

स बाणो धनुषो मुक्तः शत्रुघ्नेन पथिस्थितः । छिन्नोऽप्यग्रफलेनाशु हृदये समपद्यत

sa bāṇo dhanuṣo muktaḥ śatrughnena pathisthitaḥ chinno'pyagraphalenāśu hṛdaye samapadyata

शत्रुघ्न के धनुष से छूटा वह बाण मार्ग में स्थित होकर, काटे जाने पर भी अपने अग्रभाग से तुरंत उनके हृदय में जा लगा।

श्लोक 68 (padma.5.52.68)

तेन बाणेन संमूर्छ्य पपात स्यंदनोपरि । ततो हाहाकृतं सैन्यं भग्नं सर्वं पराद्रवत्

tena bāṇena saṁmūrchya papāta syaṁdanopari tato hāhākṛtaṁ sainyaṁ bhagnaṁ sarvaṁ parādravat

उस बाण से मूर्च्छित होकर वे अपने रथ पर गिर पड़े; तब सेना हाहाकार करने लगी और सब पराजित होकर भाग खड़े हुए।

श्लोक 69 (padma.5.52.69)

सुरथो जयमापेदे संग्रामे रामसेवकः । दशवीरा दशसुतैर्मूर्च्छिताः पतिताः क्वचित्

suratho jayamāpede saṁgrāme rāmasevakaḥ daśavīrā daśasutairmūrcchitāḥ patitāḥ kvacit

राम-सेवक सुरथ ने उस युद्ध में विजय प्राप्त की; दस वीर, राजा के दस पुत्रों सहित, मूर्च्छित होकर इधर-उधर गिरे पड़े थे।

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