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पाताल खण्ड · अध्याय 54

लव द्वारा अश्व-बंधन

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (padma.5.54.1)

शेष उवाच। गतः प्रातःक्रियां कर्तुं समिधस्तत्क्रियार्हकाः । आनेतुं जानकीसूनुर्वृतो मुनिसुतैर्लवः

śeṣa uvāca gataḥ prātaḥkriyāṁ kartuṁ samidhastatkriyārhakāḥ ānetuṁ jānakīsūnurvṛto munisutairlavaḥ

शेष जी ने कहा — जानकी-पुत्र लव प्रातःकालीन कर्म के योग्य समिधाएँ लाने के लिए मुनि-पुत्रों से घिरे हुए गए।

श्लोक 2 (padma.5.54.2)

ददर्श तत्र यज्ञाश्वं स्वर्णपत्रेण चिह्नितम् । कुंकुमागरुकस्तूरी दिव्यगंधेन वासितम्

dadarśa tatra yajñāśvaṁ svarṇapatreṇa cihnitam kuṁkumāgarukastūrī divyagaṁdhena vāsitam

— वहाँ उन्होंने स्वर्णपत्र से चिह्नित, केसर, अगर, कस्तूरी की दिव्य सुगंध से सुवासित यज्ञीय अश्व को देखा।

श्लोक 3 (padma.5.54.3)

विलोक्य जातकुतुको मुनिपुत्रानुवाच सः । अर्वा कस्य मनोवेगः प्राप्तो दैवान्मदाश्रमम्

vilokya jātakutuko muniputrānuvāca saḥ arvā kasya manovegaḥ prāpto daivānmadāśramam

उसे देखकर कुतूहल से भरकर उसने मुनि-पुत्रों से कहा — यह मनोवेगी अश्व किसका है, जो भाग्यवश मेरे आश्रम में आ पहुँचा है?

श्लोक 4 (padma.5.54.4)

आगच्छंतु मया सार्धं प्रेक्षंतां मा भयं कृथाः । इत्युक्त्वा स लवस्तूर्णं वाहस्य निकटे गतः

āgacchaṁtu mayā sārdhaṁ prekṣaṁtāṁ mā bhayaṁ kṛthāḥ ityuktvā sa lavastūrṇaṁ vāhasya nikaṭe gataḥ

मेरे साथ आओ, इसे देखो, भयभीत मत हो। यह कहकर लव शीघ्र ही अश्व के समीप गए।

श्लोक 5 (padma.5.54.5)

स रराज समीपस्थो वाहस्य रघुवंशजः । धनुर्बाणधरः स्कंधे जयंत इव दुर्जयः

sa rarāja samīpastho vāhasya raghuvaṁśajaḥ dhanurbāṇadharaḥ skaṁdhe jayaṁta iva durjayaḥ

समीप खड़े रघुवंशी वे कंधे पर धनुष-बाण धारण किए, जयंत के समान अजेय शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 6 (padma.5.54.6)

गत्वा मुनिसुतैः सार्धं वाचयामास पत्रकम् । भालस्थितं स्पष्टवर्णराजिराजितमुत्तमम्

gatvā munisutaiḥ sārdhaṁ vācayāmāsa patrakam bhālasthitaṁ spaṣṭavarṇarājirājitamuttamam

मुनि-पुत्रों के साथ जाकर उन्होंने अश्व के भाल पर स्थित, स्पष्ट अक्षर-पंक्तियों से सुशोभित, उत्तम पत्र को पढ़ा।

श्लोक 7 (padma.5.54.7)

विवस्वतो महान्वंशः सर्वलोकेषु विश्रुतः । यत्र कोपि पराबाधी न परद्रव्यलंपटः

vivasvato mahānvaṁśaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ yatra kopi parābādhī na paradravyalaṁpaṭaḥ

विवस्वान् (सूर्य) का वह महान् वंश समस्त लोकों में विख्यात है, जिसमें कोई किसी को पीड़ित नहीं करता, न ही किसी का धन लोभ करता है।

श्लोक 8 (padma.5.54.8)

सूर्यवंशध्वजो धन्वी धनुर्दीक्षा गुरुर्गुरुः । यं देवाः सामराः सर्वे नमंति मणिमौलिभिः

sūryavaṁśadhvajo dhanvī dhanurdīkṣā gururguruḥ yaṁ devāḥ sāmarāḥ sarve namaṁti maṇimaulibhiḥ

वह सूर्यवंश की ध्वजा, धनुर्धारी, धनुर्विद्या में गुरुओं के भी गुरु, जिन्हें समस्त देवगण अपने मणिमुकुटों से नमन करते हैं —

श्लोक 9 (padma.5.54.9)

तस्यात्मजो वीर बलदर्पहारी रघूद्वहः । रामचंद्रो महाभागः सर्वशूरशिरोमणिः

tasyātmajo vīra baladarpahārī raghūdvahaḥ rāmacaṁdro mahābhāgaḥ sarvaśūraśiromaṇiḥ

— उन्हीं के पुत्र, बलवानों के अभिमान का नाश करने वाले वीर, रघूद्वह, महाभाग्यशाली रामचंद्र, समस्त शूरवीरों के शिरोमणि —

श्लोक 10 (padma.5.54.10)

तन्माता कोशलनृपपुत्रीरत्नसमुद्भवा । तस्याः कुक्षिभवं रत्नं रामः शत्रुक्षयंकरः

tanmātā kośalanṛpaputrīratnasamudbhavā tasyāḥ kukṣibhavaṁ ratnaṁ rāmaḥ śatrukṣayaṁkaraḥ

— उनकी माता, कोशल-नरेश की रत्नस्वरूपा पुत्री से उत्पन्न; उनके गर्भ से उत्पन्न वह रत्न ही राम हैं, शत्रुओं के विनाशक।

श्लोक 11 (padma.5.54.11)

करोति हयमेधं स ब्राह्मणेन सुशिक्षितः । रावणाभिधविप्रेंद्र वधपापापनुत्तये

karoti hayamedhaṁ sa brāhmaṇena suśikṣitaḥ rāvaṇābhidhavipreṁdra vadhapāpāpanuttaye

वे ब्राह्मणों द्वारा भलीभाँति निर्देशित होकर, रावण नामक उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के वध के पाप के निवारण हेतु अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं।

श्लोक 12 (padma.5.54.12)

मोचितस्तेन वाहानां मुख्योऽसौ याज्ञिको हयः । महाबलपरीवारो परिखाभिः सुरक्षितः

mocitastena vāhānāṁ mukhyo'sau yājñiko hayaḥ mahābalaparīvāro parikhābhiḥ surakṣitaḥ

उन्हीं के द्वारा मुक्त किया गया यह श्रेष्ठ, यज्ञीय, समस्त अश्वों में मुख्य, महाबल परिवार से युक्त, खाइयों से सुरक्षित —

श्लोक 13 (padma.5.54.13)

तद्रक्षकोऽस्ति मद्भ्राता शत्रुघ्नो लवणांतकः । हस्त्यश्वरथपादातसंघसेनासमन्वितः

tadrakṣako'sti madbhrātā śatrughno lavaṇāṁtakaḥ hastyaśvarathapādātasaṁghasenāsamanvitaḥ

— इसका रक्षक मेरा ही भाई है, लवण का संहारक शत्रुघ्न, हाथी, अश्व, रथ तथा पदाति सैन्य-समूह से युक्त।

श्लोक 14 (padma.5.54.14)

यस्य राज्ञ इति श्रेष्ठो मानो जायेत्स्वकान्मदात् । शूरा वयं धनुर्धारि श्रेष्ठा वयमिहोत्कटाः

yasya rājña iti śreṣṭho māno jāyetsvakānmadāt śūrā vayaṁ dhanurdhāri śreṣṭhā vayamihotkaṭāḥ

जो कोई राजा अपने ही अभिमान से स्वयं को श्रेष्ठ मानता है — हम वीर हैं, हम धनुर्धारी हैं, हम ही यहाँ श्रेष्ठ और उग्र हैं —

श्लोक 15 (padma.5.54.15)

ते गृह्णंतु बलाद्वाहं रत्नमालाविभूषितम् । मनोवेगं कामजवं सर्वगत्याधिभास्वरम्

te gṛhṇaṁtu balādvāhaṁ ratnamālāvibhūṣitam manovegaṁ kāmajavaṁ sarvagatyādhibhāsvaram

— वह इस रत्नमाला-विभूषित, मनोवेग, कामवेग वाले, सर्वगति में देदीप्यमान इस अश्व को बलपूर्वक ग्रहण कर ले।

श्लोक 16 (padma.5.54.16)

ततो मोचयिता भ्राता शत्रुघ्नो लीलया हठात् । शरासनविनिर्मुक्त वत्सदंतकृतव्यथात्

tato mocayitā bhrātā śatrughno līlayā haṭhāt śarāsanavinirmukta vatsadaṁtakṛtavyathāt

तब मेरा ही भाई, इसका मुक्तिदाता शत्रुघ्न, बलपूर्वक लीलामात्र में इसे उनसे मुक्त करा लेगा जिनके शरीर उसके धनुष से छूटे बछड़े-दंत बाणों की पीड़ा भोग चुके होंगे —

श्लोक 17 (padma.5.54.17)

ये क्षत्रियाः क्षत्रियकन्यकायां । जाताश्च सत्क्षेत्रकुलेषु सत्सु । गृह्णंतु ते तद्विपरीतदेहा । नमंतु राज्यं रघवे निवेद्य

ye kṣatriyāḥ kṣatriyakanyakāyāṁ jātāśca satkṣetrakuleṣu satsu gṛhṇaṁtu te tadviparītadehā namaṁtu rājyaṁ raghave nivedya

— जो क्षत्रिय क्षत्रिय-कन्या से, उत्तम कुलों में उत्पन्न हुए हैं, वे ही इसे ग्रहण करें; जो इसके विपरीत जन्मे हैं, वे झुककर अपना राज्य रघुनाथ को निवेदन कर समर्पण कर दें।

श्लोक 18 (padma.5.54.18)

इति संवाच्य कुपितो लवः शस्त्रधनुर्धरः । उवाच मुनिपुत्रांस्तान्रोषगद्गदभाषितः

iti saṁvācya kupito lavaḥ śastradhanurdharaḥ uvāca muniputrāṁstānroṣagadgadabhāṣitaḥ

यह कहकर, क्रोध से भरे, शस्त्र-धनुष धारण किए लव ने उन मुनि-पुत्रों से क्रोध से गद्गद वाणी में कहा —

श्लोक 19 (padma.5.54.19)

पश्यत क्षिप्रमेतस्य धृष्टत्वं क्षत्रियस्य वै । लिलेख यो भालपत्रे स्वप्रतापबलं नृपः

paśyata kṣiprametasya dhṛṣṭatvaṁ kṣatriyasya vai lilekha yo bhālapatre svapratāpabalaṁ nṛpaḥ

देखो तुरंत इस क्षत्रिय की धृष्टता, जिसने अश्व के भाल-पत्र पर अपने ही प्रताप-बल का वर्णन लिख डाला है!

श्लोक 20 (padma.5.54.20)

कोऽसौ रामः कः शत्रुघ्नः कीटाः स्वल्पबलाश्रिताः । क्षत्रियाणां कुले जाता एते न वयमुत्तमाः

ko'sau rāmaḥ kaḥ śatrughnaḥ kīṭāḥ svalpabalāśritāḥ kṣatriyāṇāṁ kule jātā ete na vayamuttamāḥ

कौन है यह राम, कौन यह शत्रुघ्न — तुच्छ बल के आश्रित कीट मात्र हैं! क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न हुए क्या हम श्रेष्ठ नहीं हैं?

श्लोक 21 (padma.5.54.21)

एतस्य वीरसूर्माता जानकी न कुशप्रसूः । या रत्नं कुशसंज्ञं तु दधाराग्निमिवारणिः

etasya vīrasūrmātā jānakī na kuśaprasūḥ yā ratnaṁ kuśasaṁjñaṁ tu dadhārāgnimivāraṇiḥ

इस वीर की माता जानकी कुश की जननी नहीं थी — उन्होंने ही कुश नामक रत्न को उसी प्रकार धारण किया जैसे अरणि अग्नि को धारण करती है।

श्लोक 22 (padma.5.54.22)

इदानीं क्षत्रियत्वादि दर्शयिष्यामि सर्वतः । यदि क्षत्रियभूरेष भविष्यति च शत्रुहा

idānīṁ kṣatriyatvādi darśayiṣyāmi sarvataḥ yadi kṣatriyabhūreṣa bhaviṣyati ca śatruhā

अब मैं सर्वप्रकार से अपना क्षत्रियत्व दिखाऊँगा, यदि यह सचमुच क्षत्रिय-रक्त से उत्पन्न और शत्रुओं का संहारक है।

श्लोक 23 (padma.5.54.23)

गृहीष्यति मया बद्धं वाहं यज्ञक्रियोचितम् । नोचेत्क्षत्रत्वमुन्मुच्य कुशस्य चरणार्चकः

gṛhīṣyati mayā baddhaṁ vāhaṁ yajñakriyocitam nocetkṣatratvamunmucya kuśasya caraṇārcakaḥ

वह मेरे द्वारा बाँधे गए, यज्ञ-क्रिया के योग्य इस अश्व को ग्रहण करे — अन्यथा क्षत्रियत्व त्यागकर कुश के चरणों का पुजारी बन जाए।

श्लोक 24 (padma.5.54.24)

अधुना मद्धनुर्मुक्तैः शरैः सुप्तो भविष्यति । अन्ये ये च महावीरा रणमंडलभूषणाः

adhunā maddhanurmuktaiḥ śaraiḥ supto bhaviṣyati anye ye ca mahāvīrā raṇamaṁḍalabhūṣaṇāḥ

अब मेरे धनुष से छूटे बाणों द्वारा वह सुला दिया जाएगा — तथा अन्य जो भी महावीर रणभूमि के आभूषण हैं, वे भी।

श्लोक 25 (padma.5.54.25)

इत्यादिवाक्यमुच्चार्य लवो जग्राह तं हयम् । तृणीकृत्य नृपान्सर्वांश्चापबाणधरो वरः

ityādivākyamuccārya lavo jagrāha taṁ hayam tṛṇīkṛtya nṛpānsarvāṁścāpabāṇadharo varaḥ

ऐसे और अन्य वचन कहकर, धनुष-बाण धारण करने वाले श्रेष्ठ लव ने समस्त राजाओं को तृणवत् समझते हुए अश्व को पकड़ लिया।

श्लोक 26 (padma.5.54.26)

तदा मुनिसुताः प्रोचुर्लवं हयजिहीर्षकम् । अयोध्यानृपती रामो महाबलपराक्रमः

tadā munisutāḥ procurlavaṁ hayajihīrṣakam ayodhyānṛpatī rāmo mahābalaparākramaḥ

तब मुनि-पुत्रों ने अश्व हरण के इच्छुक लव से कहा — अयोध्या के राजा राम महाबलपराक्रमी हैं —

श्लोक 27 (padma.5.54.27)

तस्य वाहं न गृह्णाति शक्रोऽपि स्वबलोद्धतः । मा गृहाण शृणुष्वेदं मद्वाक्यं हितसंयुतम्

tasya vāhaṁ na gṛhṇāti śakro'pi svabaloddhataḥ mā gṛhāṇa śṛṇuṣvedaṁ madvākyaṁ hitasaṁyutam

— अपने बल के अभिमानी इंद्र भी उनके अश्व को नहीं पकड़ते। इसे मत लो; मेरे इस हितकर वचन को सुनो।

श्लोक 28 (padma.5.54.28)

इत्युक्तं स श्रुतौ धृत्वा जगाद स द्विजात्मजान् । यूयं बलं न जानीथ क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः

ityuktaṁ sa śrutau dhṛtvā jagāda sa dvijātmajān yūyaṁ balaṁ na jānītha kṣatriyāṇāṁ dvijottamāḥ

यह सुनकर, कान में धारण करके उसने उन ब्राह्मण-पुत्रों से कहा — तुम क्षत्रियों का बल नहीं जानते, हे द्विजोत्तम!

श्लोक 29 (padma.5.54.29)

क्षत्रिया वीर्यशौंडीर्या द्विजा भोजनशालिनः । तस्माद्यूयं गृहे गत्वा भुंजंतु जननी हृतम्

kṣatriyā vīryaśauṁḍīryā dvijā bhojanaśālinaḥ tasmādyūyaṁ gṛhe gatvā bhuṁjaṁtu jananī hṛtam

क्षत्रिय वीर्य-शौंडीर्य से गर्वित होते हैं, ब्राह्मण भोजनप्रिय होते हैं; इसलिए तुम घर जाओ और माता द्वारा लाया हुआ भोजन करो।

श्लोक 30 (padma.5.54.30)

इत्युक्तास्तेऽभवंस्तूष्णीं प्रेक्षंतस्तत्पराक्रमम् । लवस्य मुनिपुत्रास्ते संतस्थुर्दूरतो बहिः

ityuktāste'bhavaṁstūṣṇīṁ prekṣaṁtastatparākramam lavasya muniputrāste saṁtasthurdūrato bahiḥ

यह सुनकर वे मौन हो गए, उसके पराक्रम को देखते हुए; मुनि-पुत्र लव से दूर, बाहर खड़े रहे।

श्लोक 31 (padma.5.54.31)

एवं व्यतिकरे वृत्ते सेवकास्तस्य भूपतेः । आयातास्तं हयं बद्धं दृष्ट्वा प्रोचुस्तदा लवम्

evaṁ vyatikare vṛtte sevakāstasya bhūpateḥ āyātāstaṁ hayaṁ baddhaṁ dṛṣṭvā procustadā lavam

इस प्रकार यह प्रसंग चलते हुए, राजा के सेवक वहाँ पहुँचकर, अश्व को बँधा हुआ देखकर, लव से बोले —

श्लोक 32 (padma.5.54.32)

बबंध को हयमहो रुष्टः कस्य च धर्मराट् । को बाणव्रजमध्यस्थः प्राप्स्यते परमां व्यथाम्

babaṁdha ko hayamaho ruṣṭaḥ kasya ca dharmarāṭ ko bāṇavrajamadhyasthaḥ prāpsyate paramāṁ vyathām

अरे! यह अश्व किसने बाँधा है? किसके क्रोध पर, किसके धर्म के विरुद्ध? जो कोई इस बाण-वृष्टि के मध्य खड़ा होगा वह परम पीड़ा को प्राप्त होगा।

श्लोक 33 (padma.5.54.33)

तदा लवो जगादाशु मया बद्धोऽश्व उत्तमः । यो मोचयति तस्याशु रुष्टो भ्राता कुशो महान्

tadā lavo jagādāśu mayā baddho'śva uttamaḥ yo mocayati tasyāśu ruṣṭo bhrātā kuśo mahān

तब लव ने तुरंत कहा — यह श्रेष्ठ अश्व मेरे द्वारा बाँधा गया है; जो कोई इसे मुक्त कराने आएगा, उससे मेरे महान् भाई कुश तत्काल क्रुद्ध हो उठेंगे।

श्लोक 34 (padma.5.54.34)

यमः करिष्यति किमु ह्यागतोऽपि स्वयं प्रभुः । नत्वा गमिष्यति क्षिप्रं शरवृष्ट्या सुतोषितः

yamaḥ kariṣyati kimu hyāgato'pi svayaṁ prabhuḥ natvā gamiṣyati kṣipraṁ śaravṛṣṭyā sutoṣitaḥ

फिर स्वयं यम भी क्या करेंगे? यदि स्वयं प्रभु भी आएँ, तो वे बाण-वर्षा से भलीभाँति संतुष्ट होकर प्रणाम करके शीघ्र ही लौट जाएँगे।

श्लोक 35 (padma.5.54.35)

शेष उवाच। इति वाक्यं समाकर्ण्य बालोयमिति तेब्रुवन् । समागता मोचयितुं हयं बद्धं तु ये हरेः

śeṣa uvāca iti vākyaṁ samākarṇya bāloyamiti tebruvan samāgatā mocayituṁ hayaṁ baddhaṁ tu ye hareḥ

शेष जी ने कहा — यह वचन सुनकर यह तो बालक मात्र है ऐसा कहते हुए हरि के वे सेवक, जो बँधे अश्व को मुक्त कराने आए थे —

श्लोक 36 (padma.5.54.36)

तान्वैमोचयितुं प्राप्ताञ्छत्रुघ्नस्य च सेवकान् । कोदंडं करयोर्धृत्वा क्षुरप्रान्सममूमुचत्

tānvaimocayituṁ prāptāñchatrughnasya ca sevakān kodaṁḍaṁ karayordhṛtvā kṣuraprānsamamūmucat

— उन शत्रुघ्न के सेवकों को मुक्त कराने आया देखकर उसने दोनों हाथों में धनुष लेकर एक साथ क्षुरप्र बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 37 (padma.5.54.37)

ते छिन्नबाहवः शोकाच्छत्रुघ्नं प्रतिसंगताः । पृष्टास्ते जगदुः सर्वे लवात्स्वभुजकृंतनम्

te chinnabāhavaḥ śokācchatrughnaṁ pratisaṁgatāḥ pṛṣṭāste jagaduḥ sarve lavātsvabhujakṛṁtanam

भुजाएँ कट जाने से शोकाकुल होकर वे शत्रुघ्न के पास लौटे; उनके द्वारा पूछे जाने पर उन सबने लव द्वारा अपनी-अपनी भुजाओं के काटे जाने की बात बताई।

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