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पाताल खण्ड · अध्याय 55

चार-निरीक्षण

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

श्लोक 1 (padma.5.55.1)

व्यास उवाच। एतां श्रुत्वा कथां रम्यां लवस्य बलिनो मुनिः । संशयानः पर्यपृच्छन्नागं दशशताननम्

vyāsa uvāca etāṁ śrutvā kathāṁ ramyāṁ lavasya balino muniḥ saṁśayānaḥ paryapṛcchannāgaṁ daśaśatānanam

व्यास जी ने कहा — बलवान् लव की इस मनोरम कथा को सुनकर मुनि ने संशययुक्त होकर सहस्रफण नाग (शेष) से पूछा।

श्लोक 2 (padma.5.55.2)

श्रीवात्स्यायन उवाच। त्वयोक्तं तु पुरा रामः सीतामेकाकिनीं वने । रजकस्य दुरुक्त्यासौ तत्याज महि लोलुपः

śrīvātsyāyana uvāca tvayoktaṁ tu purā rāmaḥ sītāmekākinīṁ vane rajakasya duruktyāsau tatyāja mahi lolupaḥ

श्री वात्स्यायन ने कहा — आपने पहले बताया था कि राम ने पृथ्वी की कीर्ति के लोभ से एक धोबी के दुर्वचन के कारण सीता को अकेले वन में त्याग दिया था।

श्लोक 3 (padma.5.55.3)

जानक्यां क्व सुतौ जातौ क्व धनुर्धरतां गतौ । कथं च शिक्षिता विद्या यो रामहयमाहरत्

jānakyāṁ kva sutau jātau kva dhanurdharatāṁ gatau kathaṁ ca śikṣitā vidyā yo rāmahayamāharat

जानकी से वे दोनों पुत्र कहाँ जन्मे और कहाँ धनुर्धरता को प्राप्त हुए? वह विद्या कैसे सीखी गई, जिससे उसने राम के अश्व को हर लिया?

श्लोक 4 (padma.5.55.4)

व्यास उवाच। इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं शेषो नागो महामतिः । प्रशस्य विप्रं जगदे रामचारित्रमद्भुतम्

vyāsa uvāca iti śrutvā munervākyaṁ śeṣo nāgo mahāmatiḥ praśasya vipraṁ jagade rāmacāritramadbhutam

व्यास जी ने कहा — मुनि का यह वचन सुनकर महामति नाग शेष ने उस विप्र की प्रशंसा करते हुए राम के अद्भुत चरित्र का वर्णन किया।

श्लोक 5 (padma.5.55.5)

शेष उवाच। रामो राज्यमयोध्यायां भ्रातृभिः सहितोऽकरोत् । धर्मेण पालयन्सर्वं क्षितिखंडं स्वया स्त्रिया

śeṣa uvāca rāmo rājyamayodhyāyāṁ bhrātṛbhiḥ sahito'karot dharmeṇa pālayansarvaṁ kṣitikhaṁḍaṁ svayā striyā

शेष जी ने कहा — राम ने अपने भाइयों सहित अयोध्या में राज्य किया, अपनी पत्नी सहित संपूर्ण पृथ्वीखंड का धर्मपूर्वक पालन करते हुए।

श्लोक 6 (padma.5.55.6)

सीता दधार तद्वीर्यं मासाः पंचाभवंस्तदा । अत्यंतं शुशुभे देवी त्रयीव पुरुषं धरा

sītā dadhāra tadvīryaṁ māsāḥ paṁcābhavaṁstadā atyaṁtaṁ śuśubhe devī trayīva puruṣaṁ dharā

सीता ने उनका वीर्य धारण किया; तब पाँच मास बीत गए; वह देवी अत्यंत शोभायमान हुई, मानो पृथ्वी उस पुरुष को त्रयी के समान धारण कर रही हो।

श्लोक 7 (padma.5.55.7)

कदाचित्समये रामः पप्रच्छ च विदेहजाम् । कीदृशो दोहदः साध्वि मया ते साध्यते हि सः

kadācitsamaye rāmaḥ papraccha ca videhajām kīdṛśo dohadaḥ sādhvi mayā te sādhyate hi saḥ

एक बार उस समय राम ने विदेहनंदिनी से पूछा — हे साध्वी! तुम्हारी दोहद-इच्छा क्या है? मैं उसे तुम्हारे लिए पूर्ण करूँगा।

श्लोक 8 (padma.5.55.8)

रहस्येव तु सा पृष्टा त्रपमाणा पतिं सती । लज्जा गद्गद वाग्रामं निजगाद वचोऽमृतम्

rahasyeva tu sā pṛṣṭā trapamāṇā patiṁ satī lajjā gadgada vāgrāmaṁ nijagāda vaco'mṛtam

इस प्रकार एकांत में पूछे जाने पर वह सती अपने पति के समक्ष लज्जित होकर, लज्जा से गद्गद वाणी में राम से अमृत-तुल्य वचन कहने लगी।

श्लोक 9 (padma.5.55.9)

सीतोवाच। त्वत्कृपातो मया सर्वं भुक्तं भोक्ष्यामि शोभनम् । न कश्चिन्मानसे कांत विषयो ह्यतिरिच्यते

sītovāca tvatkṛpāto mayā sarvaṁ bhuktaṁ bhokṣyāmi śobhanam na kaścinmānase kāṁta viṣayo hyatiricyate

सीता ने कहा — आपकी कृपा से मैंने सब कुछ भोगा है, और सब कुछ शुभ भोगूँगी; हे कांत! मेरे मन में इससे परे कोई विषय शेष नहीं है।

श्लोक 10 (padma.5.55.10)

यस्याभवादृशः स्वामी देवसंस्तुतसत्पदः । तस्याः सर्वं वरीवर्ति न किंचिदवशिष्यते

yasyābhavādṛśaḥ svāmī devasaṁstutasatpadaḥ tasyāḥ sarvaṁ varīvarti na kiṁcidavaśiṣyate

जिसका स्वामी आप जैसा है, जिनके चरणों की देवता भी स्तुति करते हैं — उसके लिए सब कुछ स्वयं ही उपस्थित रहता है, कुछ भी शेष नहीं रहता।

श्लोक 11 (padma.5.55.11)

त्वमाग्रहात्पृच्छसि मां दोहदं मनसि स्थितम् । ब्रवीमि पुरतः सत्यं तव स्वामिन्मनोहर

tvamāgrahātpṛcchasi māṁ dohadaṁ manasi sthitam bravīmi purataḥ satyaṁ tava svāminmanohara

आप आग्रहपूर्वक मेरे मन में स्थित दोहद के विषय में पूछते हैं; हे मनोहर स्वामी! मैं आपके समक्ष सत्य कहती हूँ।

श्लोक 12 (padma.5.55.12)

चिरं जातं मया सत्यो लोपामुद्रादिकाः स्त्रियः । दृष्ट्वा स्वामिन्मनो द्रष्टुं ता उत्सुकति सुंदरीः

ciraṁ jātaṁ mayā satyo lopāmudrādikāḥ striyaḥ dṛṣṭvā svāminmano draṣṭuṁ tā utsukati suṁdarīḥ

बहुत समय हो गया है जब मैंने उन सती स्त्रियों — लोपामुद्रा आदि को देखा था; उन सुंदरियों को देखने के लिए मेरा मन उत्सुक हो रहा है।

श्लोक 13 (padma.5.55.13)

राज्यं प्राप्ता त्वया सार्द्धमनेकसुखमास्थिता । कृतघ्नाहं कदापीह ता नमस्कर्तुमानसा

rājyaṁ prāptā tvayā sārddhamanekasukhamāsthitā kṛtaghnāhaṁ kadāpīha tā namaskartumānasā

आपके साथ राज्य प्राप्त करके, अनेक सुखों में स्थित होकर, मैं कृतघ्न रही हूँ — मेरा मन उन्हें प्रणाम करने के लिए कभी वहाँ नहीं गया।

श्लोक 14 (padma.5.55.14)

तत्र गत्वा तपःकोशान्वस्त्राद्यैः परिपूजये । रत्नानि चैव भास्वंति भूषा अपि समर्पये

tatra gatvā tapaḥkośānvastrādyaiḥ paripūjaye ratnāni caiva bhāsvaṁti bhūṣā api samarpaye

वहाँ जाकर, उनके तपोवन-आश्रमों में, मैं वस्त्र आदि से उनकी पूजा करूँगी, और देदीप्यमान रत्न तथा आभूषण भी अर्पित करूँगी —

श्लोक 15 (padma.5.55.15)

यथा मे तोषिताः सत्यो ददत्याशीर्मनोहराः । एष मे दोहदः कांत परिपूरय मानसः

yathā me toṣitāḥ satyo dadatyāśīrmanoharāḥ eṣa me dohadaḥ kāṁta paripūraya mānasaḥ

— जिससे संतुष्ट हुई वे सती स्त्रियाँ मुझे अपने मनोहर आशीर्वाद दें। यही मेरा दोहद है, हे प्रिय! मेरे इस मन की इच्छा को पूर्ण कीजिए।

श्लोक 16 (padma.5.55.16)

इत्थमाकर्ण्य वचनं सीतायाः सुमनोहरम् । जगाद परमप्रीतो रामचंद्रः प्रियां प्रति

itthamākarṇya vacanaṁ sītāyāḥ sumanoharam jagāda paramaprīto rāmacaṁdraḥ priyāṁ prati

सीता के इस अत्यंत मनोहर वचन को सुनकर रामचंद्र अत्यंत प्रसन्न होकर अपनी प्रिया से बोले —

श्लोक 17 (padma.5.55.17)

धन्यासि जानकी प्रातर्गमिष्यसि तपोधनाः । प्रेक्ष्यतास्तु कृतार्था त्वमागमिष्यसि मेंऽतिकम्

dhanyāsi jānakī prātargamiṣyasi tapodhanāḥ prekṣyatāstu kṛtārthā tvamāgamiṣyasi meṁ'tikam

हे जानकी! तुम धन्य हो। प्रातःकाल तपोधन मुनियों के दर्शन तुम्हें प्राप्त होंगे; अपना प्रयोजन सिद्ध करके तुम मेरे पास लौट आओगी।

श्लोक 18 (padma.5.55.18)

इति रामवचः श्रुत्वा परमां प्रीतिमाप सा । प्रातर्मम भवत्यद्धा तापसीनां समीक्षणम्

iti rāmavacaḥ śrutvā paramāṁ prītimāpa sā prātarmama bhavatyaddhā tāpasīnāṁ samīkṣaṇam

राम के इस वचन को सुनकर उसे परम प्रीति प्राप्त हुई — वास्तव में कल प्रातः मुझे तपस्विनी स्त्रियों का दर्शन प्राप्त होगा।

श्लोक 19 (padma.5.55.19)

अथ तन्निशि रामेण चाराः कीर्तिं निजां श्रुताम् । प्रेक्षितुं प्रेषितास्ते तु निशीथे ह्यगमनञ्छनैः

atha tanniśi rāmeṇa cārāḥ kīrtiṁ nijāṁ śrutām prekṣituṁ preṣitāste tu niśīthe hyagamanañchanaiḥ

तब उसी रात राम ने अपनी कीर्ति को सुनने की इच्छा से चरों को भेजा, जो मध्यरात्रि में धीरे-धीरे निकल पड़े।

श्लोक 20 (padma.5.55.20)

ते प्रत्यहं रामकथाः शृण्वंतः सुमनोहराः । तद्दिने गतवंतस्तु धनाढ्यस्य गृहं महत्

te pratyahaṁ rāmakathāḥ śṛṇvaṁtaḥ sumanoharāḥ taddine gatavaṁtastu dhanāḍhyasya gṛhaṁ mahat

प्रतिदिन राम की मनोहर कथाएँ सुनते हुए वे उस दिन एक धनाढ्य व्यक्ति के विशाल गृह में गए।

श्लोक 21 (padma.5.55.21)

दीपं वीक्ष्य प्रज्वलंतं वचनं वीक्ष्य मानुषम् । स्थितास्तत्र क्षणं चाराः समशृण्वन्यशो भृशम्

dīpaṁ vīkṣya prajvalaṁtaṁ vacanaṁ vīkṣya mānuṣam sthitāstatra kṣaṇaṁ cārāḥ samaśṛṇvanyaśo bhṛśam

वहाँ जलता हुआ दीपक देखकर, मानवी वाणी सुनकर, चर वहाँ क्षणभर खड़े रहे और उनकी महान् कीर्ति को ध्यानपूर्वक सुनने लगे।

श्लोक 22 (padma.5.55.22)

तत्र काचन वामाक्षी बालकं प्रति हर्षिता । स्तनं धयंतं निजगौ वाक्यं तु सुमनोहरम्

tatra kācana vāmākṣī bālakaṁ prati harṣitā stanaṁ dhayaṁtaṁ nijagau vākyaṁ tu sumanoharam

वहाँ एक सुंदर नेत्रों वाली स्त्री, हर्षित होकर, अपने स्तनपान करते हुए शिशु से यह अत्यंत मनोहर वचन कहने लगी —

श्लोक 23 (padma.5.55.23)

पिब पुत्र यथेष्टं त्वं स्तन्यं मम मनोहरम् । पश्चात्तव सुदुष्प्रापं भविष्यति ममात्मज

piba putra yatheṣṭaṁ tvaṁ stanyaṁ mama manoharam paścāttava suduṣprāpaṁ bhaviṣyati mamātmaja

हे पुत्र! जितना चाहो उतना मेरा यह मनोहर दूध पी लो; इसके पश्चात्, हे मेरे पुत्र! यह तुम्हारे लिए अत्यंत दुर्लभ हो जाएगा।

श्लोक 24 (padma.5.55.24)

एतत्पुर्याः पती रामो नीलोत्पलदलप्रभः । तत्पुरीस्थजनानां तु न भविष्यति वै जनुः

etatpuryāḥ patī rāmo nīlotpaladalaprabhaḥ tatpurīsthajanānāṁ tu na bhaviṣyati vai januḥ

इस नगरी के स्वामी राम हैं, नीलकमल की पंखुड़ी के समान तेजस्वी; इस नगरी में रहने वाले लोगों का फिर जन्म ही नहीं होगा।

श्लोक 25 (padma.5.55.25)

जन्माभावात्कथं पानं स्तन्यस्य भुवि जायते । तस्मात्पिब मुहुः स्तन्यं दुर्ल्लभं हृदि मन्य च

janmābhāvātkathaṁ pānaṁ stanyasya bhuvi jāyate tasmātpiba muhuḥ stanyaṁ durllabhaṁ hṛdi manya ca

जन्म के अभाव में पृथ्वी पर दूध पीना कैसे होगा? इसलिए इस दूध को बार-बार पी लो, और इसे हृदय में दुर्लभ मानो।

श्लोक 26 (padma.5.55.26)

ये श्रीरामं स्मरिष्यंति ध्यायंति च वदंति ये । तेषामपि पयःपानं न भविष्यति जातुचित्

ye śrīrāmaṁ smariṣyaṁti dhyāyaṁti ca vadaṁti ye teṣāmapi payaḥpānaṁ na bhaviṣyati jātucit

जो लोग श्रीराम का स्मरण करेंगे, ध्यान करेंगे और उनकी बात करेंगे — उनके लिए भी दूध पीना फिर कभी नहीं होगा।

श्लोक 27 (padma.5.55.27)

इत्यादिवाक्यं संश्रुत्य श्रीरामयशसोऽमृतम् । हर्षिताः प्रययुर्गेहमन्यद्भाग्यवतो महत्

ityādivākyaṁ saṁśrutya śrīrāmayaśaso'mṛtam harṣitāḥ prayayurgehamanyadbhāgyavato mahat

यह और ऐसे अन्य वचन, श्रीराम की कीर्ति का वह अमृत सुनकर, वे हर्षित होकर दूसरे गृह की ओर गए, किसी भाग्यशाली व्यक्ति के महान् गृह की ओर।

श्लोक 28 (padma.5.55.28)

तावदन्यश्चरस्तत्र मनोरममिदं गृहम् । मत्वा तिष्ठन्हि रामस्य क्षणं शुश्रूषया यशः

tāvadanyaścarastatra manoramamidaṁ gṛham matvā tiṣṭhanhi rāmasya kṣaṇaṁ śuśrūṣayā yaśaḥ

इतने में एक अन्य चर, इस मनोहर गृह को राम की कीर्ति का ही स्थान मानते हुए, वहाँ क्षणभर शुश्रूषापूर्वक खड़ा रहा।

श्लोक 29 (padma.5.55.29)

तत्र काचिन्निजं कांतं पर्यंकोपरि सुस्थितम् । तांबूलं चर्वती दत्तं भर्त्तास्नेहेन सुंदरी

tatra kācinnijaṁ kāṁtaṁ paryaṁkopari susthitam tāṁbūlaṁ carvatī dattaṁ bharttāsnehena suṁdarī

वहाँ एक सुंदरी अपने पति को शय्या पर सुखपूर्वक बैठे देखकर, स्नेहवश दिए गए पान को चबाते हुए —

श्लोक 30 (padma.5.55.30)

कंकणस्वरशोभाढ्या कर्पूरागरुधूपिता । कांतं वीक्ष्य चलन्नेत्रा कामरूपमवोचत

kaṁkaṇasvaraśobhāḍhyā karpūrāgarudhūpitā kāṁtaṁ vīkṣya calannetrā kāmarūpamavocata

— कंकणों की ध्वनि से सुशोभित, कर्पूर-अगर से सुवासित, चंचल नेत्रों से अपने प्रिय को देखते हुए उसने प्रेम-वचन कहे —

श्लोक 31 (padma.5.55.31)

नाथ त्वं तादृशो मह्यं भासि यादृग्रघोः पतिः । अत्यंतं सुंदरतरं वपुर्बिभ्रत्सुकोमलम्

nātha tvaṁ tādṛśo mahyaṁ bhāsi yādṛgraghoḥ patiḥ atyaṁtaṁ suṁdarataraṁ vapurbibhratsukomalam

हे नाथ! आप मुझे उसी प्रकार दिखाई देते हैं जैसे रघुपति, अत्यंत सुंदर और कोमल शरीर धारण करने वाले —

श्लोक 32 (padma.5.55.32)

पद्मप्रांतं नेत्रयुग्मं वक्षो मोहनविस्तृतम् । भुजौ च सांगदौ बिभ्रत्साक्षाद्राम इवासि मे

padmaprāṁtaṁ netrayugmaṁ vakṣo mohanavistṛtam bhujau ca sāṁgadau bibhratsākṣādrāma ivāsi me

— दोनों नेत्र कमल-सदृश, वक्षस्थल मोहक और विस्तृत, अंगदयुक्त भुजाएँ धारण किए हुए — आप मेरे लिए साक्षात् राम ही हैं।

श्लोक 33 (padma.5.55.33)

इति वाक्यं समाकर्ण्य कांतायाः सुमनोहरम् । उवाच नेत्रयोः प्रांतं नर्तयन्कामसुंदरः

iti vākyaṁ samākarṇya kāṁtāyāḥ sumanoharam uvāca netrayoḥ prāṁtaṁ nartayankāmasuṁdaraḥ

अपनी प्रिया के इस अत्यंत मनोहर वचन को सुनकर, कामदेव-सम सुंदर उस पति ने अपनी आँखों के कोरों को नचाते हुए कहा —

श्लोक 34 (padma.5.55.34)

शृणु कांते त्वया प्रोक्तं साध्व्या तु सुमनोहरम् । पतिव्रतानां तद्योग्यं स्वकांतो राम एव हि

śṛṇu kāṁte tvayā proktaṁ sādhvyā tu sumanoharam pativratānāṁ tadyogyaṁ svakāṁto rāma eva hi

सुनो हे प्रिये! तुमने साध्वी होकर जो कहा वह अत्यंत मनोहर है, पतिव्रताओं के योग्य है — तुम्हारा अपना कांत सचमुच राम ही है।

श्लोक 35 (padma.5.55.35)

परं क्वाहं मंदभाग्यः क्व रामो भाग्यवान्महान् । क्व चाहं कीटवत्तुच्छः क्व ब्रह्मादिसुरार्चितः

paraṁ kvāhaṁ maṁdabhāgyaḥ kva rāmo bhāgyavānmahān kva cāhaṁ kīṭavattucchaḥ kva brahmādisurārcitaḥ

परंतु कहाँ मैं अभागा, और कहाँ भाग्यशाली महान् राम? कहाँ मैं कीट के समान तुच्छ, और कहाँ ब्रह्मादि देवों द्वारा पूजित वे?

श्लोक 36 (padma.5.55.36)

खद्योतः क्व नभोरत्नं शलभः क्व नु पामरः । गजारिः क्व मृगेंद्रोऽसौ शशकः क्व नु मंदधीः

khadyotaḥ kva nabhoratnaṁ śalabhaḥ kva nu pāmaraḥ gajāriḥ kva mṛgeṁdro'sau śaśakaḥ kva nu maṁdadhīḥ

कहाँ जुगनू, कहाँ आकाश-रत्न (चंद्रमा); कहाँ नीच पतंगा, कहाँ अधम? कहाँ हाथी का शत्रु (सिंह), कहाँ मंदबुद्धि तुच्छ खरगोश?

श्लोक 37 (padma.5.55.37)

क्व च सा जाह्नवी देवी क्व रथ्या जलमुत्पथम् । क्व मेरुः सुरसंवासः क्व गुंजापुंजकोल्पकः

kva ca sā jāhnavī devī kva rathyā jalamutpatham kva meruḥ surasaṁvāsaḥ kva guṁjāpuṁjakolpakaḥ

कहाँ वह देवी जाह्नवी (गंगा), कहाँ जल से भरा गली का गड्ढा? कहाँ मेरु, देवताओं का निवास, कहाँ गुंजा-बीजों का तुच्छ ढेर?

श्लोक 38 (padma.5.55.38)

तथाहं क्व क्व रामोऽसौ यत्पादरजसांगना । शिलीभूता क्षणाज्जाता ब्रह्ममोहनरूपधृक्

tathāhaṁ kva kva rāmo'sau yatpādarajasāṁganā śilībhūtā kṣaṇājjātā brahmamohanarūpadhṛk

वैसे ही मैं कहाँ, और कहाँ वे राम, जिनके चरणों की धूल से एक शिला क्षणभर में स्त्री बन गई, ब्रह्मा को भी मोहित करने वाला रूप धारण करते हुए।

श्लोक 39 (padma.5.55.39)

इति वाक्यं प्रब्रुवाणं परिरेभे निजं पतिम् । जातकामा हृतप्रेम्णा नर्तित भ्रू धनुर्धरा

iti vākyaṁ prabruvāṇaṁ parirebhe nijaṁ patim jātakāmā hṛtapremṇā nartita bhrū dhanurdharā

यह वचन कहते हुए, कामातुर होकर, प्रेम से हृत-हृदय, उस स्त्री ने धनुष के समान नाचती भौंहों के साथ अपने पति का आलिंगन किया।

श्लोक 40 (padma.5.55.40)

इत्यादि वाक्यं संश्रुत्य गतश्चान्यनिवेशनम् । तावदन्यश्चरो वाक्यं शुश्राव यशसान्वितम्

ityādi vākyaṁ saṁśrutya gataścānyaniveśanam tāvadanyaścaro vākyaṁ śuśrāva yaśasānvitam

यह और अन्य वचन सुनकर वह दूसरे निवास की ओर गया; इतने में एक अन्य चर ने यश से युक्त वचन सुना।

श्लोक 41 (padma.5.55.41)

काचित्पुष्पमयीं शय्यां चंदनं सह चंद्रकम् । सर्वं विधाय कामार्हं जगाद वचनं पतिम्

kācitpuṣpamayīṁ śayyāṁ caṁdanaṁ saha caṁdrakam sarvaṁ vidhāya kāmārhaṁ jagāda vacanaṁ patim

एक स्त्री ने चंदन तथा कर्पूर सहित पुष्प-शय्या तैयार करके, भोग के योग्य सब कुछ सजाकर अपने पति से कहा —

श्लोक 42 (padma.5.55.42)

पते कुरुष्व भोगार्हे शयनं पुष्पमंचके । चंदनादिकलेपं च तथा भोगमनेकधा

pate kuruṣva bhogārhe śayanaṁ puṣpamaṁcake caṁdanādikalepaṁ ca tathā bhogamanekadhā

हे स्वामी! इस भोग-योग्य पुष्प-शय्या पर शयन कीजिए, चंदन आदि के लेप सहित, तथा अनेक प्रकार के भोग के साथ।

श्लोक 43 (padma.5.55.43)

त्वादृशा एव भोगार्हा न च रामपराङ्मुखाः । सर्वं रामकृपाप्राप्तमुपभुंक्ष्व यथातथम्

tvādṛśā eva bhogārhā na ca rāmaparāṅmukhāḥ sarvaṁ rāmakṛpāprāptamupabhuṁkṣva yathātatham

तुम्हारे जैसे ही भोग के योग्य हैं, न कि जो राम से विमुख हैं; राम की कृपा से प्राप्त इस सब का यथावत् उपभोग कीजिए।

श्लोक 44 (padma.5.55.44)

मत्सदृशी कामिनी ते चंदनं तापहारकम् । पर्यंकः पुष्परचितः सर्वं रामकृपाभवम्

matsadṛśī kāminī te caṁdanaṁ tāpahārakam paryaṁkaḥ puṣparacitaḥ sarvaṁ rāmakṛpābhavam

तुम्हारे लिए मेरे जैसी कामिनी, यह ताप-हारक चंदन, यह पुष्प-रचित शय्या — यह सब राम की कृपा से उत्पन्न है।

श्लोक 45 (padma.5.55.45)

ये रामं न भजिष्यंति ते नरा जठरं स्वयम् । न भर्तुं शक्नुवंत्येव वस्त्रभोगादि वर्जिताः

ye rāmaṁ na bhajiṣyaṁti te narā jaṭharaṁ svayam na bhartuṁ śaknuvaṁtyeva vastrabhogādi varjitāḥ

जो लोग राम का भजन नहीं करेंगे — वे मनुष्य वस्त्र, भोग आदि से वंचित होकर अपना उदर भी नहीं भर सकेंगे।

श्लोक 46 (padma.5.55.46)

इति ब्रुवंतीं महिलां हर्षितः पतिरब्रवीत् । सर्वं तथ्यं ब्रवीषि त्वं मम रामकृपाभवम्

iti bruvaṁtīṁ mahilāṁ harṣitaḥ patirabravīt sarvaṁ tathyaṁ bravīṣi tvaṁ mama rāmakṛpābhavam

अपनी पत्नी को इस प्रकार कहते सुनकर हर्षित पति ने कहा — तुम जो कहती हो सब सत्य है; मेरा सब कुछ राम की कृपा से ही है।

श्लोक 47 (padma.5.55.47)

इत्येवं रामभद्रस्य यशः श्रुत्वा गतश्चरः । तावदन्यस्य वेश्मस्थश्चरोऽन्य शुश्रुवे वचः

ityevaṁ rāmabhadrasya yaśaḥ śrutvā gataścaraḥ tāvadanyasya veśmasthaścaro'nya śuśruve vacaḥ

रामभद्र की इस कीर्ति को सुनकर वह चर आगे बढ़ा; इतने में एक अन्य गृह में खड़े दूसरे चर ने और वचन सुने।

श्लोक 48 (padma.5.55.48)

काचित्कांतेन पर्यंके वीणावादनतत्परा । कांतेन रामसत्कीर्तिं गायमाना पतिं जगौ

kācitkāṁtena paryaṁke vīṇāvādanatatparā kāṁtena rāmasatkīrtiṁ gāyamānā patiṁ jagau

एक स्त्री अपने पति के साथ शय्या पर वीणा-वादन में तत्पर होकर, राम की सुंदर कीर्ति गाते हुए अपने पति से बोली।

श्लोक 49 (padma.5.55.49)

स्वामिन्वयं धन्यतमा येषां पुर्याः पतिः प्रभुः । श्रीरामः स्वप्रजाः पुत्रानिव पाति च रक्षकः

svāminvayaṁ dhanyatamā yeṣāṁ puryāḥ patiḥ prabhuḥ śrīrāmaḥ svaprajāḥ putrāniva pāti ca rakṣakaḥ

हे स्वामिन्! हम सबसे धन्य हैं, जिनकी नगरी के स्वामी और प्रभु श्रीराम हैं, जो अपनी प्रजा की रक्षा पुत्रों के समान करते हैं।

श्लोक 50 (padma.5.55.50)

यो महत्कर्मदुःसाध्यं कृतवान्सुलभं न तत् । समुद्रं यो निजग्राह सेतुं तत्र बबंध च

yo mahatkarmaduḥsādhyaṁ kṛtavānsulabhaṁ na tat samudraṁ yo nijagrāha setuṁ tatra babaṁdha ca

जिन्होंने वह महान् कार्य किया जो दूसरों के लिए सुसाध्य नहीं है — जिन्होंने समुद्र को ही वश में किया और वहाँ सेतु बाँधा —

श्लोक 51 (padma.5.55.51)

रावणं यो रिपुं हत्वा लंकां संभज्य वानरैः । जानकीमाजहारात्र महदाचारमाचरत्

rāvaṇaṁ yo ripuṁ hatvā laṁkāṁ saṁbhajya vānaraiḥ jānakīmājahārātra mahadācāramācarat

— जिन्होंने शत्रु रावण को मारकर, वानरों के साथ लंका को व्यवस्थित करके, यहाँ जानकी को वापस लाया, वह महान् आचरण किया।

श्लोक 52 (padma.5.55.52)

इति प्रोक्तं समाकर्ण्य वचः सुमधुराक्षरम् । पतिः स्मितं चकारेमां वाक्यं पुनरथाब्रवीत्

iti proktaṁ samākarṇya vacaḥ sumadhurākṣaram patiḥ smitaṁ cakāremāṁ vākyaṁ punarathābravīt

यह मधुर शब्दों में कहा गया वचन सुनकर उसके पति ने मुस्कुराते हुए पुनः उससे यह वचन कहा —

श्लोक 53 (padma.5.55.53)

मुग्धेनेदं महत्कर्म रामचंद्रस्य भामिनी । दशाननवधादीनि समुद्र दमनानि च

mugdhenedaṁ mahatkarma rāmacaṁdrasya bhāminī daśānanavadhādīni samudra damanāni ca

हे भामिनि! तुम रामचंद्र के इस महान् कार्य की बात करती हो — दशानन-वध आदि, तथा समुद्र-दमन।

श्लोक 54 (padma.5.55.54)

लीलयायोऽवनिं प्राप्तो ब्रह्मादिप्रार्थितो महान् । करोति सच्चरित्राणि महापापहराणि च

līlayāyo'vaniṁ prāpto brahmādiprārthito mahān karoti saccaritrāṇi mahāpāpaharāṇi ca

वह महान् लीलामात्र से, ब्रह्मादि द्वारा प्रार्थित होकर, पृथ्वी पर आए, और महापाप हरने वाले सच्चरित्रों को करते हैं।

श्लोक 55 (padma.5.55.55)

मा जानीहि नरं रामं कौसल्यानंददायकम् । सृजत्यवति हंत्येतद्विश्वं लीलात्तमानुषः

mā jānīhi naraṁ rāmaṁ kausalyānaṁdadāyakam sṛjatyavati haṁtyetadviśvaṁ līlāttamānuṣaḥ

राम को कौसल्या को आनंद देने वाला साधारण मनुष्य मत समझो; वे मनुष्य लीलामात्र से इस संपूर्ण विश्व की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।

श्लोक 56 (padma.5.55.56)

धन्या वयं ये रामस्य पश्यामो मुखपंकजम् । ब्रह्मादिसुरदुर्दर्शं महत्पुण्यकृतो वयम्

dhanyā vayaṁ ye rāmasya paśyāmo mukhapaṁkajam brahmādisuradurdarśaṁ mahatpuṇyakṛto vayam

धन्य हैं हम, जो राम के कमल-मुख का दर्शन करते हैं, जो ब्रह्मादि देवों के लिए भी दुर्लभ है; हम महान् पुण्य करने वाले हैं।

श्लोक 57 (padma.5.55.57)

अशृणोद्रामचंद्रस्य चरित्रं श्रुतिसौख्यदम् । इत्यादिवाक्यं शुश्राव चारो द्वारिस्थितो मुहुः

aśṛṇodrāmacaṁdrasya caritraṁ śrutisaukhyadam ityādivākyaṁ śuśrāva cāro dvāristhito muhuḥ

उसने रामचंद्र का, कानों को सुख देने वाला चरित्र सुना; यह और ऐसे अन्य वचन उस चर ने द्वार पर खड़े होकर बार-बार सुने।

श्लोक 58 (padma.5.55.58)

अन्यो ह्यन्यं गृहं गत्वा तस्थौ श्रोतुं हरेर्यशः । तत्रापि रामभद्रस्य यशः शुश्राव शोभनम्

anyo hyanyaṁ gṛhaṁ gatvā tasthau śrotuṁ hareryaśaḥ tatrāpi rāmabhadrasya yaśaḥ śuśrāva śobhanam

फिर घर-घर जाकर वह हरि की कीर्ति सुनने के लिए रुका; वहाँ भी उसने रामभद्र की सुंदर कीर्ति सुनी।

श्लोक 59 (padma.5.55.59)

खेलंती स्वामिना सार्धं द्यूतेन सुमनोहरा । उवाच वाक्यं मधुरं नर्तयंतीव कंकणे

khelaṁtī svāminā sārdhaṁ dyūtena sumanoharā uvāca vākyaṁ madhuraṁ nartayaṁtīva kaṁkaṇe

एक मनोहर स्त्री अपने पति के साथ द्यूत खेलती हुई, अपने कंकणों को मानो नचाती हुई, मधुर वचन बोली।

श्लोक 60 (padma.5.55.60)

जितं मया कांत जवेन सर्वं । करिष्यसि त्वं किमु हारिमानसः । इत्यादि वाक्यं परिहासपूर्वकं । कृत्वा स्वकांतं परिषस्वजे मुदा

jitaṁ mayā kāṁta javena sarvaṁ kariṣyasi tvaṁ kimu hārimānasaḥ ityādi vākyaṁ parihāsapūrvakaṁ kṛtvā svakāṁtaṁ pariṣasvaje mudā

हे कांत! मैंने वेग से तुमसे सब कुछ जीत लिया; अब क्या करोगे, हृतमन? इस प्रकार परिहासपूर्वक कहकर उसने हर्षपूर्वक अपने पति का आलिंगन किया।

श्लोक 61 (padma.5.55.61)

उवाच कांतश्चार्वंगि जितमेव सुशोभने । रामं मे स्मरतो नित्यं न कुत्रापि पराजयः

uvāca kāṁtaścārvaṁgi jitameva suśobhane rāmaṁ me smarato nityaṁ na kutrāpi parājayaḥ

पति ने कहा — हे चारुअंगी! हे सुशोभने! तुमने जीत तो लिया है; परंतु राम का सदा स्मरण करने वाले मेरी कहीं पराजय नहीं है।

श्लोक 62 (padma.5.55.62)

इदानीं त्वां तु जेष्यामि रामं स्मृत्वा मनोहरम् । देवा यथा पुरा स्मृत्वा दितिजानजयन्क्षणात्

idānīṁ tvāṁ tu jeṣyāmi rāmaṁ smṛtvā manoharam devā yathā purā smṛtvā ditijānajayankṣaṇāt

अब मैं तुम्हें भी जीत लूँगा, मनोहर राम का स्मरण करके, जैसे देवताओं ने पूर्वकाल में उन्हीं का स्मरण करके दितिपुत्रों को क्षणभर में जीत लिया था।

श्लोक 63 (padma.5.55.63)

एवमुक्त्वा पाशकानां परिवर्तनमाकरोत् । तावज्जयं प्रपेदेऽसौ हर्षितो वाक्यमब्रवीत्

evamuktvā pāśakānāṁ parivartanamākarot tāvajjayaṁ prapede'sau harṣito vākyamabravīt

यह कहकर उसने पासे फेंके; तब उसने विजय प्राप्त की, और हर्षित होकर यह वचन कहा —

श्लोक 64 (padma.5.55.64)

मम प्रोक्तमृतं जातं जिता त्वं नवयौवना । रामस्मारी कदाप्येव न भवेद्रिपुतो भयी

mama proktamṛtaṁ jātaṁ jitā tvaṁ navayauvanā rāmasmārī kadāpyeva na bhavedriputo bhayī

मैंने जो कहा वह सत्य हुआ — तुम जीत ली गईं, हे नवयौवना! राम का स्मरण करने वाला कभी शत्रु से भयभीत नहीं होता।

श्लोक 65 (padma.5.55.65)

इत्येवं तौ वदंतौ च परस्परमथोत्सुकौ । परिरभ्य दृढं प्रेम्णा ततश्चारो गतो गृहम्

ityevaṁ tau vadaṁtau ca parasparamathotsukau parirabhya dṛḍhaṁ premṇā tataścāro gato gṛham

इस प्रकार वे दोनों परस्पर बोलते हुए, उत्सुकतापूर्वक प्रेम से एक-दूसरे का दृढ़ आलिंगन करने लगे; तब वह चर दूसरे घर की ओर चला गया।

श्लोक 66 (padma.5.55.66)

एवं पंचमहाचारा राज्ञः संश्रुत्य वै यशः । परस्परं प्रशंसंतो गेहं स्वं स्वं ययुर्मुदा

evaṁ paṁcamahācārā rājñaḥ saṁśrutya vai yaśaḥ parasparaṁ praśaṁsaṁto gehaṁ svaṁ svaṁ yayurmudā

इस प्रकार पाँचों महान् चर राजा की कीर्ति सुनकर, परस्पर प्रशंसा करते हुए हर्षपूर्वक अपने-अपने घर गए।

श्लोक 67 (padma.5.55.67)

एकः षष्ठश्चरः कारुगेहानालोक्य तत्र ह । जगाम श्रोतुकामोऽसौ यशो राज्ञो महीपतेः

ekaḥ ṣaṣṭhaścaraḥ kārugehānālokya tatra ha jagāma śrotukāmo'sau yaśo rājño mahīpateḥ

छठा चर, वहाँ एक कारीगर के घर को देखकर, राजा की कीर्ति सुनने की इच्छा से वहाँ गया।

श्लोक 68 (padma.5.55.68)

रजकः क्रोधसंस्पृष्टो भार्यामन्यगृहोषिताम् । पदा संताडयामास धिक्कुर्वञ्छोणनेत्रवान्

rajakaḥ krodhasaṁspṛṣṭo bhāryāmanyagṛhoṣitām padā saṁtāḍayāmāsa dhikkurvañchoṇanetravān

एक धोबी, क्रोध से भरा हुआ, अपनी पत्नी को, जो दूसरे के घर रह चुकी थी, पैर से मारने लगा, लाल नेत्रों से धिक्कारते हुए।

श्लोक 69 (padma.5.55.69)

गच्छ त्वं मद्गृहात्तस्य गेहं यत्रोषिता दिनम् । नाहं गृह्णामि भवतीं दुष्टां वचनलंघिनीम्

gaccha tvaṁ madgṛhāttasya gehaṁ yatroṣitā dinam nāhaṁ gṛhṇāmi bhavatīṁ duṣṭāṁ vacanalaṁghinīm

मेरे घर से उसी के घर चली जा जहाँ तू एक दिन रह चुकी थी; मैं तुझे नहीं स्वीकारता, हे दुष्टा, मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली!

श्लोक 70 (padma.5.55.70)

तदास्य माता प्रोवाच मा त्यजैनां गृहागताम् । अपराधेन रहितां दुष्टकर्मविवर्जिताम्

tadāsya mātā provāca mā tyajaināṁ gṛhāgatām aparādhena rahitāṁ duṣṭakarmavivarjitām

तब उसकी माता ने कहा — उसे मत त्यागो, जो तुम्हारे घर लौट आई है, अपराध से रहित, दुष्ट कर्म से रहित।

श्लोक 71 (padma.5.55.71)

मातरं प्रत्युवाचाथ रजकः क्रोधसंयुतः । नाहं रामइव प्रेष्ठां गृह्णाम्यन्यगृहोषिताम्

mātaraṁ pratyuvācātha rajakaḥ krodhasaṁyutaḥ nāhaṁ rāmaiva preṣṭhāṁ gṛhṇāmyanyagṛhoṣitām

तब क्रोध से युक्त धोबी ने अपनी माता को उत्तर दिया — मैं राम के समान नहीं हूँ, जो दूसरे के घर रही हुई प्रिया को स्वीकार कर लूँ।

श्लोक 72 (padma.5.55.72)

स राजा यत्करोत्येव तत्सर्वं नीतिमद्भवेत् । अहं गृह्णामि नो भार्यां परवेश्मनि संस्थिताम्

sa rājā yatkarotyeva tatsarvaṁ nītimadbhavet ahaṁ gṛhṇāmi no bhāryāṁ paraveśmani saṁsthitām

वह राजा जो कुछ भी करता है, वह सब नीतिसंगत बन जाता है — परंतु मैं दूसरे के घर में रही पत्नी को नहीं स्वीकारता।

श्लोक 73 (padma.5.55.73)

पुनःपुनरुवाचेदं नाहं रामो महीश्वरः । यः परस्य गृहे संस्थां जानकीं वै ररक्ष सः

punaḥpunaruvācedaṁ nāhaṁ rāmo mahīśvaraḥ yaḥ parasya gṛhe saṁsthāṁ jānakīṁ vai rarakṣa saḥ

उसने यह बार-बार कहा — मैं राम, वह पृथ्वीपति, नहीं हूँ जिसने जानकी की रक्षा की, यद्यपि वह दूसरे के घर रही थी।

श्लोक 74 (padma.5.55.74)

इति वाक्यं समाश्रुत्य चारः क्रोधपरिप्लुतः । खड्गं गृहीत्वा स्वकरे तं हंतुं विदधे मनः

iti vākyaṁ samāśrutya cāraḥ krodhapariplutaḥ khaḍgaṁ gṛhītvā svakare taṁ haṁtuṁ vidadhe manaḥ

यह वचन सुनकर वह चर क्रोध से आप्लावित होकर हाथ में तलवार लेकर उसे मारने का निश्चय करने लगा।

श्लोक 75 (padma.5.55.75)

स रामोक्तं च सस्मार न वध्यः कोपि मे जनः । इति ज्ञात्वा सरोषं तु संजहार महामनाः

sa rāmoktaṁ ca sasmāra na vadhyaḥ kopi me janaḥ iti jñātvā saroṣaṁ tu saṁjahāra mahāmanāḥ

परंतु उसे राम के ही वचन का स्मरण हो आया — मेरी कोई प्रजा वध्य नहीं है — यह जानकर उस महामना ने क्रोधित होते हुए भी स्वयं को संयत कर लिया।

श्लोक 76 (padma.5.55.76)

तदा श्रुत्वा सुदुःखार्तः पंचचारा यतः स्थिताः । ततो गतः प्रकुपितो निःश्वसन्मुहुरुच्छ्वसन्

tadā śrutvā suduḥkhārtaḥ paṁcacārā yataḥ sthitāḥ tato gataḥ prakupito niḥśvasanmuhurucchvasan

यह सुनकर अत्यंत दुःखार्त, वहाँ खड़े पाँचों चर — फिर वह क्रुद्ध होकर बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए वहाँ से चला गया।

श्लोक 77 (padma.5.55.77)

ते वै परस्परं तत्र मिलितास्तु समब्रुवन् । स्वश्रुतं रामचरितं सर्वलोकैकपूजितम्

te vai parasparaṁ tatra militāstu samabruvan svaśrutaṁ rāmacaritaṁ sarvalokaikapūjitam

वहाँ परस्पर मिलकर उन्होंने राम के उस चरित्र की चर्चा की, जिसे उन्होंने सुना था, जो अकेले समस्त लोक द्वारा पूजित है।

श्लोक 78 (padma.5.55.78)

ते तद्भाषितमाकर्ण्य परस्परममंत्रयन् । न वाच्यं रघुनाथाया वाच्यं दुष्टजनोदितम्

te tadbhāṣitamākarṇya parasparamamaṁtrayan na vācyaṁ raghunāthāyā vācyaṁ duṣṭajanoditam

उस कथन को सुनकर उन्होंने परस्पर विचार-विमर्श किया — जो दुष्ट व्यक्ति ने कहा है, वह रघुनाथ की पत्नी से नहीं कहा जाना चाहिए।

श्लोक 79 (padma.5.55.79)

इति संमंत्र्य ते गेहं गत्वा सुषुपुरुत्सुकाः । प्राता राज्ञे प्रशंसाम इति बुद्ध्या व्यवस्थिताः

iti saṁmaṁtrya te gehaṁ gatvā suṣupurutsukāḥ prātā rājñe praśaṁsāma iti buddhyā vyavasthitāḥ

इस प्रकार परस्पर विचार करके वे उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने घर जाकर सो गए; प्रातःकाल यह सोचकर स्थिर हुए कि हम राजा से केवल प्रशंसा ही कहेंगे।

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