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पाताल खण्ड · अध्याय 70

वृंदावन का दिव्य परिवार

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (padma.5.70.1)

पार्वत्युवाच- यदाकर्णनमेतस्य ये वा पारिषदाः प्रभोः । तदहं श्रोतुमिच्छामि कथयस्व दयानिधे

pārvatyuvāca- yadākarṇanametasya ye vā pāriṣadāḥ prabhoḥ tadahaṁ śrotumicchāmi kathayasva dayānidhe

पार्वती बोलीं इसके विषय में जो सुनने योग्य है, अर्थात् प्रभु के जो पार्षद (सहचर) हैं, उन्हें मैं सुनना चाहती हूँ, हे दयानिधे! कहिए।

श्लोक 2 (padma.5.70.2)

ईश्वर उवाच। राधया सह गोविंदं स्वर्णसिंहासनेस्थितम् । पूर्वोक्तरूपलावण्यं दिव्यभूषांबरस्रजम्

īśvara uvāca rādhayā saha goviṁdaṁ svarṇasiṁhāsanesthitam pūrvoktarūpalāvaṇyaṁ divyabhūṣāṁbarasrajam

ईश्वर बोले राधा सहित गोविंद, स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान, पूर्वोक्त रूप-लावण्य से युक्त, दिव्य आभूषण-वस्त्र-माला धारण किए हुए,

श्लोक 3 (padma.5.70.3)

त्रिभंगी मंजु सुस्निग्धं गोपीलोचनतारकम् । तद्बाह्ये योगपीठे च स्वर्णसिंहासनावृते

tribhaṁgī maṁju susnigdhaṁ gopīlocanatārakam tadbāhye yogapīṭhe ca svarṇasiṁhāsanāvṛte

त्रिभंगी मुद्रा में मधुर, अत्यंत स्निग्ध, गोपियों के नेत्रों के तारे; और उसके बाहर योगपीठ पर, स्वर्ण-सिंहासन से घिरे हुए,

श्लोक 4 (padma.5.70.4)

प्रत्यंगरभसावेशाः प्रधानाः कृष्णवल्लभाः । ललिताद्याः प्रकृत्यंशा मूलप्रकृतिराधिका

pratyaṁgarabhasāveśāḥ pradhānāḥ kṛṣṇavallabhāḥ lalitādyāḥ prakṛtyaṁśā mūlaprakṛtirādhikā

प्रत्येक अंग में तीव्र भाव से आवेशित, कृष्ण की प्रधान प्रियाएँ ललिता आदि प्रकृति के अंश हैं, और मूल प्रकृति स्वयं राधिका हैं।

श्लोक 5 (padma.5.70.5)

संमुखे ललिता देवी श्यामला वायुकोणके । उत्तरे श्रीमती धन्या ऐशान्यां श्रीहरिप्रिया

saṁmukhe lalitā devī śyāmalā vāyukoṇake uttare śrīmatī dhanyā aiśānyāṁ śrīharipriyā

सामने देवी ललिता हैं, वायव्य कोण में श्यामला; उत्तर में धन्य श्रीमती, ईशान में श्रीहरिप्रिया।

श्लोक 6 (padma.5.70.6)

विशाखा च तथा पूर्वे शैब्या चाग्नौ ततः परम् । पद्मा च दक्षिणे पश्चान्नैर्ऋते क्रमशः स्थिताः

viśākhā ca tathā pūrve śaibyā cāgnau tataḥ param padmā ca dakṣiṇe paścānnairṛte kramaśaḥ sthitāḥ

पूर्व में विशाखा, फिर आग्नेय में शैब्या; दक्षिण में पद्मा, और फिर नैर्ऋत्य में क्रमशः स्थित हैं।

श्लोक 7 (padma.5.70.7)

योगपीठे केसराग्रे चारु चंद्रावती प्रिया । अष्टौ प्रकृतयः पुण्याः प्रधानाः कृष्णवल्लभाः

yogapīṭhe kesarāgre cāru caṁdrāvatī priyā aṣṭau prakṛtayaḥ puṇyāḥ pradhānāḥ kṛṣṇavallabhāḥ

योगपीठ के केसर के अग्रभाग में सुंदर प्रिया चंद्रावती हैं ये आठों पुण्य, प्रधान प्रकृतियाँ कृष्ण की प्रियाएँ हैं।

श्लोक 8 (padma.5.70.8)

प्रधानप्रकृतिस्त्वाद्या राधा चंद्रावती समा । चंद्रावली चित्ररेखा चंद्रा मदनसुंदरी

pradhānaprakṛtistvādyā rādhā caṁdrāvatī samā caṁdrāvalī citrarekhā caṁdrā madanasuṁdarī

आद्य प्रधान प्रकृति स्वयं राधा हैं, चंद्रावती के समान; चंद्रावली, चित्ररेखा, चंद्रा, मदनसुंदरी,

श्लोक 9 (padma.5.70.9)

प्रिया च श्रीमधुमती चंद्ररेखा हरिप्रिया । षोडशाद्याः प्रकृतयः प्रधानाः कृष्णवल्लभाः

priyā ca śrīmadhumatī caṁdrarekhā haripriyā ṣoḍaśādyāḥ prakṛtayaḥ pradhānāḥ kṛṣṇavallabhāḥ

प्रिया श्रीमधुमती, चंद्ररेखा, हरिप्रिया ये सोलह प्रधान प्रकृतियाँ कृष्ण की मुख्य प्रियाएँ हैं।

श्लोक 10 (padma.5.70.10)

वृंदावनेश्वरी राधा तथा चंद्रावली प्रिया । अभिन्नगुणलावण्य सौंदर्याश्चारुलोचनाः

vṛṁdāvaneśvarī rādhā tathā caṁdrāvalī priyā abhinnaguṇalāvaṇya sauṁdaryāścārulocanāḥ

वृंदावनेश्वरी राधा तथा प्रिया चंद्रावली अभिन्न गुण-लावण्य-सौंदर्य वाली, मनोहर नेत्रों वाली,

श्लोक 11 (padma.5.70.11)

मनोहरा मुग्धवेषाः किशोरीवयसोज्ज्वलाः । अग्रेतनास्तथा चान्या गोपकन्याः सहस्रशः

manoharā mugdhaveṣāḥ kiśorīvayasojjvalāḥ agretanāstathā cānyā gopakanyāḥ sahasraśaḥ

मनोहर, निष्कपट वेषभूषा वाली, किशोरावस्था से उज्ज्वल; और उनके आगे सहस्रों अन्य गोप-कन्याएँ भी हैं,

श्लोक 12 (padma.5.70.12)

शुद्धकांचनपुंजाभाः सुप्रसन्नाः सुलोचनाः । तद्रूपहृदयारूढास्तदाश्लेष समुत्सुकाः

śuddhakāṁcanapuṁjābhāḥ suprasannāḥ sulocanāḥ tadrūpahṛdayārūḍhāstadāśleṣa samutsukāḥ

शुद्ध स्वर्ण-राशि के समान कांतिवाली, प्रसन्न, सुंदर नेत्रोंवाली, जिनके हृदय उन्हीं के रूप में आरूढ़ हैं, जो उनके आलिंगन के लिए उत्सुक हैं,

श्लोक 13 (padma.5.70.13)

श्यामामृतरसे मग्नाः स्फुरत्तद्भावमानसाः । नेत्रोत्पलार्चिते कृष्णपादाब्जेऽपितचेतसः

śyāmāmṛtarase magnāḥ sphurattadbhāvamānasāḥ netrotpalārcite kṛṣṇapādābje'pitacetasaḥ

श्याम-अमृतरस में निमग्न, जिनके मन में उसी भाव की स्फुरणा है, जिनका चित्त नेत्ररूपी कमलों से पूजित कृष्ण के चरण-कमलों में अर्पित है।

श्लोक 14 (padma.5.70.14)

श्रुतिकन्यास्ततो दक्षे सहस्रायुतसंयुताः । जगन्मुग्धीकृताकारा हृद्वर्तिकृष्णलालसाः

śrutikanyāstato dakṣe sahasrāyutasaṁyutāḥ jaganmugdhīkṛtākārā hṛdvartikṛṣṇalālasāḥ

फिर दाहिनी ओर श्रुतियों की कन्याएँ हैं, सहस्रों-अयुतों की संख्या में, जिनका रूप जगत को मोहित करने वाला, हृदय में कृष्ण की लालसा रखने वाला है।

श्लोक 15 (padma.5.70.15)

नानासत्वस्वरालापमुग्धीकृतजगत्त्रयाः । तत्र गूढरहस्यानि गायंत्यः प्रेमविह्वलाः

nānāsatvasvarālāpamugdhīkṛtajagattrayāḥ tatra gūḍharahasyāni gāyaṁtyaḥ premavihvalāḥ

नाना प्रकार के मधुर स्वरालाप से तीनों लोकों को मोहित करती हुई वे वहाँ गूढ़ रहस्यों को गाती हैं, प्रेम से विह्वल होकर।

श्लोक 16 (padma.5.70.16)

देवकन्यास्ततः सव्ये दिव्यवेषारसोज्ज्वलाः । नानावैदिग्ध्यनिपुणा दिव्यभावभरान्विताः

devakanyāstataḥ savye divyaveṣārasojjvalāḥ nānāvaidigdhyanipuṇā divyabhāvabharānvitāḥ

फिर बाईं ओर देवकन्याएँ हैं, दिव्य वेष और रस से उज्ज्वल, नाना कलाओं में निपुण, दिव्य भाव से परिपूर्ण,

श्लोक 17 (padma.5.70.17)

सौंदर्यातिशयेनाढ्याः कटाक्षातिमनोहराः । निर्लज्जास्तत्र गोविंदे तदंगस्पर्शनोद्यताः

sauṁdaryātiśayenāḍhyāḥ kaṭākṣātimanoharāḥ nirlajjāstatra goviṁde tadaṁgasparśanodyatāḥ

सौंदर्य की अधिकता से समृद्ध, अत्यंत मनोहर कटाक्षोंवाली; वे वहाँ गोविंद के सम्मुख निर्लज्ज होकर उनके अंगों का स्पर्श करने को उद्यत रहती हैं।

श्लोक 18 (padma.5.70.18)

तद्भावमग्नमनसः स्मितसाचि निरीक्षणाः । मंदिरस्य ततो बाह्ये प्रियया विशदावृते

tadbhāvamagnamanasaḥ smitasāci nirīkṣaṇāḥ maṁdirasya tato bāhye priyayā viśadāvṛte

उनका मन उसी भाव में निमग्न रहता है, तिरछी और मुस्कुराती दृष्टि रखती हैं। फिर मंदिर के बाहर, प्रिया से घिरे स्वच्छ प्रांगण में,

श्लोक 19 (padma.5.70.19)

समानवेषवयसः समानबलपौरुषाः । समानगुणकर्माणः समानाभरणप्रियाः

samānaveṣavayasaḥ samānabalapauruṣāḥ samānaguṇakarmāṇaḥ samānābharaṇapriyāḥ

समान वेष-वय वाले, समान बल-पौरुष वाले, समान गुण-कर्म वाले, समान आभूषण-प्रिय,

श्लोक 20 (padma.5.70.20)

समानस्वरसंगीत वेणुवादनतत्पराः । श्रीदामा पश्चिमे द्वारे वसुदामा तथोत्तरे

samānasvarasaṁgīta veṇuvādanatatparāḥ śrīdāmā paścime dvāre vasudāmā tathottare

समान स्वर-संगीत और वेणुवादन में तत्पर वे सखा हैं श्रीदामा पश्चिम द्वार पर, वसुदामा उत्तर में,

श्लोक 21 (padma.5.70.21)

सुदामा च तथा पूर्वे किंकिणी चापि दक्षिणे । तद्बाह्ये स्वर्णपीठे च सुवर्णमंदिरावृते

sudāmā ca tathā pūrve kiṁkiṇī cāpi dakṣiṇe tadbāhye svarṇapīṭhe ca suvarṇamaṁdirāvṛte

सुदामा पूर्व में, तथा किंकिणी दक्षिण में। उसके बाहर स्वर्णपीठ पर, स्वर्णमंदिर से घिरे हुए,

श्लोक 22 (padma.5.70.22)

स्वर्णवेद्यंतरस्थे तु स्वर्णाभरणभूषिते । स्तोककृष्णं सुभद्राद्यैर्गोपालैरयुतायुतैः

svarṇavedyaṁtarasthe tu svarṇābharaṇabhūṣite stokakṛṣṇaṁ subhadrādyairgopālairayutāyutaiḥ

स्वर्ण-वेदी के भीतर, स्वर्णाभूषणों से विभूषित, बालरूप कृष्ण, सुभद्रा आदि अयुतों-अयुत गोपालकों सहित,

श्लोक 23 (padma.5.70.23)

शृंगवीणावेणुवेत्रवयोवेषाकृतिस्वरैः । तद्गुणध्यानसंयुक्तैर्गायद्भिरपि विह्वलैः

śṛṁgavīṇāveṇuvetravayoveṣākṛtisvaraiḥ tadguṇadhyānasaṁyuktairgāyadbhirapi vihvalaiḥ

शृंग, वीणा, वेणु, वेत्र तथा अपनी आयु-वेष-आकृति के अनुरूप स्वरों से, उनके गुणों के ध्यान में लीन, गाते हुए, विह्वल,

श्लोक 24 (padma.5.70.24)

चित्रार्पितैश्चित्ररूपैः सदानंदाश्रुवर्षिभिः । पुलकाकुलसर्वांगैर्योगींद्रैरिव विस्मितैः

citrārpitaiścitrarūpaiḥ sadānaṁdāśruvarṣibhiḥ pulakākulasarvāṁgairyogīṁdrairiva vismitaiḥ

चित्र में अंकित जैसे विचित्र रूपोंवाले, सदा आनंद के आँसू बहाते हुए, समस्त अंगों में रोमांच से भरे, योगींद्रों के समान विस्मित,

श्लोक 25 (padma.5.70.25)

क्षरत्ययोभिर्गोविंदैरसंख्यातैरुपावृतम् । तद्बाह्ये स्वर्णप्राकारे कोटिसूर्यसमुज्जवले

kṣaratyayobhirgoviṁdairasaṁkhyātairupāvṛtam tadbāhye svarṇaprākāre koṭisūryasamujjavale

अविरत भक्ति-भाव बहाते असंख्य गोविंद-सखाओं से घिरे हुए। उसके बाहर करोड़ों सूर्यों के समान उज्ज्वल स्वर्ण-प्राकार में,

श्लोक 26 (padma.5.70.26)

चतुर्दिक्षुमहोद्यानं मंजुसौरभमोहिते । पश्चिमे संमुखे श्रीमत्पारिजातद्रुमाश्रये

caturdikṣumahodyānaṁ maṁjusaurabhamohite paścime saṁmukhe śrīmatpārijātadrumāśraye

चारों दिशाओं में मधुर सुगंध से मोहक महान् उद्यान हैं; पश्चिम में सामने, श्रीमान् पारिजात वृक्ष के आश्रयस्थल में,

श्लोक 27 (padma.5.70.27)

तदधस्तु स्वर्णपीठे स्वर्णमंडनमंडिते । तन्मध्ये मणिमाणिक्य दिव्यसिंहासनोज्ज्वले

tadadhastu svarṇapīṭhe svarṇamaṁḍanamaṁḍite tanmadhye maṇimāṇikya divyasiṁhāsanojjvale

उसके नीचे स्वर्णपीठ पर, स्वर्ण-अलंकरण से मंडित, उसके मध्य में मणि-माणिक्यों से युक्त, दिव्य सिंहासन पर उज्ज्वल,

श्लोक 28 (padma.5.70.28)

तत्रोपरि परानंदं वासुदेवं जगत्प्रभुम् । त्रिगुणातीतचिद्रूपं सर्वकारणकारणम्

tatropari parānaṁdaṁ vāsudevaṁ jagatprabhum triguṇātītacidrūpaṁ sarvakāraṇakāraṇam

वहाँ ऊपर परमानंदमय वासुदेव विराजमान हैं, जगत के स्वामी, त्रिगुणातीत चिद्रूप, सबके कारणों के भी कारण,

श्लोक 29 (padma.5.70.29)

इंद्रनीलघनश्यामं नीलकुंचितकुंतलम् । पद्मपत्रविशालाक्षं मकराकृतिकुंडलम्

iṁdranīlaghanaśyāmaṁ nīlakuṁcitakuṁtalam padmapatraviśālākṣaṁ makarākṛtikuṁḍalam

इंद्रनील मणि के समान श्याम, नीले घुँघराले केश, कमल-पत्र जैसे विशाल नेत्र, मकराकार कुंडल धारण किए,

श्लोक 30 (padma.5.70.30)

चतुर्भुजं तु चक्रासिगदाशंखांबुजायुधम् । आद्यंतरहितं नित्यं प्रधानं पुरुषोत्तमम्

caturbhujaṁ tu cakrāsigadāśaṁkhāṁbujāyudham ādyaṁtarahitaṁ nityaṁ pradhānaṁ puruṣottamam

चार भुजाओं में चक्र, तलवार, गदा, शंख और कमल आयुध धारण किए, आदि-अंत से रहित, नित्य, प्रधान पुरुषोत्तम,

श्लोक 31 (padma.5.70.31)

ज्योतीरूपं महद्धाम पुराणं वनमालिनम् । पीतांबरधरं स्निग्धं दिव्यभूषणभूषितम्

jyotīrūpaṁ mahaddhāma purāṇaṁ vanamālinam pītāṁbaradharaṁ snigdhaṁ divyabhūṣaṇabhūṣitam

ज्योतिर्मय, महान् धाम, पुरातन, वनमाला धारण किए, पीत वस्त्र पहने, स्निग्ध, दिव्य आभूषणों से विभूषित,

श्लोक 32 (padma.5.70.32)

दिव्यानुलेपनं राजच्चित्रितांग मनोहरम् । रुक्मिणी सत्यभामा च नाग्नजिती सुलक्षणा

divyānulepanaṁ rājaccitritāṁga manoharam rukmiṇī satyabhāmā ca nāgnajitī sulakṣaṇā

दिव्य अनुलेपन से चमकते, चित्रित अंगों से मनोहर रुक्मिणी, सत्यभामा, सुलक्षणा नाग्नजिती,

श्लोक 33 (padma.5.70.33)

मित्रविंदानुविंदा सुनंदा जांबवती प्रिया । सुशीला चाष्टमहिला वासुदेवप्रियास्ततः

mitraviṁdānuviṁdā sunaṁdā jāṁbavatī priyā suśīlā cāṣṭamahilā vāsudevapriyāstataḥ

मित्रविंदा, अनुविंदा, सुनंदा, प्रिया जांबवती, तथा सुशीला ये आठ महारानियाँ वासुदेव की प्रियाएँ हैं,

श्लोक 34 (padma.5.70.34)

उद्भ्राजिताः पारिषदा वृतयोर्भक्तितत्पराः । उत्तरे सुमहोद्याने हरिचंदनसंश्रये

udbhrājitāḥ pāriṣadā vṛtayorbhaktitatparāḥ uttare sumahodyāne haricaṁdanasaṁśraye

उज्ज्वल, भक्ति में तत्पर पार्षदों से घिरी हुई। उत्तर में महान् उद्यान में, हरिचंदन के वृक्षों के आश्रय में,

श्लोक 35 (padma.5.70.35)

तत्राधस्तु स्वर्णपीठे मणिमंडपमंडिते । तन्मध्ये हेमनिर्माणदले सिंहासनोज्जवले

tatrādhastu svarṇapīṭhe maṇimaṁḍapamaṁḍite tanmadhye hemanirmāṇadale siṁhāsanojjavale

वहाँ नीचे स्वर्णपीठ पर, मणिमंडप से मंडित, उसके मध्य स्वर्ण-निर्मित दल पर, उज्ज्वल सिंहासन पर,

श्लोक 36 (padma.5.70.36)

तत्रैव सह रेवत्या संकर्षण हलायुधम् । ईश्वरस्य प्रियानंतमभिन्नगुणरूपिणम्

tatraiva saha revatyā saṁkarṣaṇa halāyudham īśvarasya priyānaṁtamabhinnaguṇarūpiṇam

वहीं रेवती सहित संकर्षण हलायुध (बलराम) विराजमान हैं, भगवान के प्रिय अनंत, जो गुण और रूप में उनसे अभिन्न हैं,

श्लोक 37 (padma.5.70.37)

शुद्धस्फटिकसंकाशं रक्तांबुज दलेक्षणम् । नीलपट्टधरं स्निग्धं दिव्यभूषास्रगंबरम्

śuddhasphaṭikasaṁkāśaṁ raktāṁbuja dalekṣaṇam nīlapaṭṭadharaṁ snigdhaṁ divyabhūṣāsragaṁbaram

शुद्ध स्फटिक के समान कांति, लाल कमल-दल जैसे नेत्र, नीला वस्त्र धारण किए, स्निग्ध, दिव्य आभूषण-माला-वस्त्र से युक्त,

श्लोक 38 (padma.5.70.38)

मधुपाने सदासक्तं मधुघूर्णितलोचनम् । प्रवीरदक्षिणेभागे मंजुनाभ्यंतरस्थिते

madhupāne sadāsaktaṁ madhughūrṇitalocanam pravīradakṣiṇebhāge maṁjunābhyaṁtarasthite

सदा मधुपान में आसक्त, मद से घूमती हुई आँखों वाले। उस श्रेष्ठ वीर के दाहिने भाग में, मधुर आंतरिक स्थल में,

श्लोक 39 (padma.5.70.39)

संतानवृक्षमूले तु मणिमंदिरमंडितम् । तन्मध्ये मणिमाणिक्य दिव्यसिंहासनोज्ज्वले

saṁtānavṛkṣamūle tu maṇimaṁdiramaṁḍitam tanmadhye maṇimāṇikya divyasiṁhāsanojjvale

संतान (कल्पवृक्ष) के मूल में, मणि-मंदिर से मंडित, उसके मध्य में मणि-माणिक्य से युक्त, उज्ज्वल दिव्य सिंहासन पर,

श्लोक 40 (padma.5.70.40)

प्रद्युम्नं च रती देवं तत्रोपरिसुखस्थितम् । जगन्मोहनसौंदर्य्यसारश्रेणीरसात्मकम्

pradyumnaṁ ca ratī devaṁ tatroparisukhasthitam jaganmohanasauṁdaryyasāraśreṇīrasātmakam

देवी रति सहित सुखपूर्वक विराजमान प्रद्युम्न हैं, जगत को मोहित करने वाले सौंदर्य के सार-समूह का साक्षात् रस-स्वरूप,

श्लोक 41 (padma.5.70.41)

असितांभोजपुंजाभमरविंददलेक्षणम् । दिव्यालंकारभूषाभिर्दिव्यगंधानुलेपनम्

asitāṁbhojapuṁjābhamaraviṁdadalekṣaṇam divyālaṁkārabhūṣābhirdivyagaṁdhānulepanam

नीलकमल-समूह के समान कांति, कमलदल जैसे नेत्र, दिव्य अलंकार-आभूषणों से युक्त, दिव्य सुगंध से अनुलिप्त,

श्लोक 42 (padma.5.70.42)

जगन्मुग्धीकृताशेष सौंदर्याश्चर्यविग्रहम् । पूर्वोद्याने महारण्ये सुरद्रुम समाश्रये

jaganmugdhīkṛtāśeṣa sauṁdaryāścaryavigraham pūrvodyāne mahāraṇye suradruma samāśraye

जिनके अद्भुत सौंदर्य-विग्रह ने सारे जगत को मोहित कर दिया है। पूर्व उद्यान में, देव-वृक्षों के आश्रय वाले महावन में,

श्लोक 43 (padma.5.70.43)

तत्राधस्तु स्वर्णपीठे हेममंडपमंडिते । तस्य मध्ये स्थिरे राजद्दिव्यसिंहासनोज्ज्वले

tatrādhastu svarṇapīṭhe hemamaṁḍapamaṁḍite tasya madhye sthire rājaddivyasiṁhāsanojjvale

वहाँ नीचे स्वर्णपीठ पर, स्वर्ण-मंडप से मंडित, उसके मध्य में स्थिर, उज्ज्वल दिव्य सिंहासन पर सुशोभित,

श्लोक 44 (padma.5.70.44)

दिव्योषयासमं श्रीमदनिरुद्धं जगत्पतिम् । सांद्रानंदघनश्यामं सुस्निग्धं नीलकुंतलम्

divyoṣayāsamaṁ śrīmadaniruddhaṁ jagatpatim sāṁdrānaṁdaghanaśyāmaṁ susnigdhaṁ nīlakuṁtalam

दिव्य अमृत-तुल्य श्रीमान् अनिरुद्ध विराजमान हैं, जगत के स्वामी, सघन मेघ जैसे श्याम, अत्यंत स्निग्ध, नीले घुँघराले केश,

श्लोक 45 (padma.5.70.45)

सुभ्रून्नतलताभंगीं सुकपोलं सुनासिकम् । सुग्रीवं सुंदरं वक्षो मनोहर मनोहरम्

subhrūnnatalatābhaṁgīṁ sukapolaṁ sunāsikam sugrīvaṁ suṁdaraṁ vakṣo manohara manoharam

सुंदर भौंहें लता की भाँति उन्नत, सुंदर कपोल, सुंदर नासिका, सुंदर ग्रीवा, मनोहर वक्ष सर्वांग मनोहर,

श्लोक 46 (padma.5.70.46)

किरीटिनं कुंडलिनं कंठभूषाविभूषितम् । मंजुमंजीरमाधुर्यादतिसौंदर्य विग्रहम्

kirīṭinaṁ kuṁḍalinaṁ kaṁṭhabhūṣāvibhūṣitam maṁjumaṁjīramādhuryādatisauṁdarya vigraham

मुकुटधारी, कुंडलधारी, कंठ के आभूषणों से विभूषित; मधुर नूपुरों की मधुरता से अत्यंत सुंदर विग्रह,

श्लोक 47 (padma.5.70.47)

प्रियभृत्यगणाराध्यं यत्र संगीतकप्रियम् । पूर्णब्रह्मसदानंदं शुद्धसत्वस्वरूपकम्

priyabhṛtyagaṇārādhyaṁ yatra saṁgītakapriyam pūrṇabrahmasadānaṁdaṁ śuddhasatvasvarūpakam

प्रिय सेवकों द्वारा पूज्य, संगीत के प्रिय, पूर्ण ब्रह्म के सदा-आनंद, शुद्ध सत्त्वगुण के साक्षात् स्वरूप।

श्लोक 48 (padma.5.70.48)

तस्योर्द्ध्वे चांतरिक्षे च विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम् । अनादिमादिचिद्रूपं चिदानंदं परं विभुम्

tasyorddhve cāṁtarikṣe ca viṣṇuṁ sarveśvareśvaram anādimādicidrūpaṁ cidānaṁdaṁ paraṁ vibhum

उनके ऊपर, आकाश में, विष्णु हैं, सबके ईश्वरों के भी ईश्वर, अनादि-आदि चिद्रूप, चिदानंद, परम व्यापक,

श्लोक 49 (padma.5.70.49)

त्रिगुणातीतमव्यक्तं नित्यमक्षयमव्ययम् । समेघपुंजमाधुर्यसौंदर्यश्यामविग्रहम्

triguṇātītamavyaktaṁ nityamakṣayamavyayam sameghapuṁjamādhuryasauṁdaryaśyāmavigraham

त्रिगुणातीत, अव्यक्त, नित्य, अक्षय, अव्यय, मेघ-समूह जैसी मधुरता और सौंदर्य वाला श्याम विग्रह,

श्लोक 50 (padma.5.70.50)

नीलकुंचितसुस्निग्ध केशपाशातिसुंदरम् । अरविंददलस्निग्ध सुदीर्घचारुलोचनम्

nīlakuṁcitasusnigdha keśapāśātisuṁdaram araviṁdadalasnigdha sudīrghacārulocanam

नीले, घुँघराले, अत्यंत स्निग्ध केशों के गुच्छ से अत्यंत सुंदर, कमलदल जैसे स्निग्ध, दीर्घ मनोहर नेत्र,

श्लोक 51 (padma.5.70.51)

किरीटकुंडलोद्गंड शुद्धसत्वात्मभिर्वृतम् । आत्मारामैश्च चिद्रूपैस्तन्मूर्तिध्यानतत्परैः

kirīṭakuṁḍalodgaṁḍa śuddhasatvātmabhirvṛtam ātmārāmaiśca cidrūpaistanmūrtidhyānatatparaiḥ

मुकुट और कुंडलों से उभरे कपोल, शुद्ध सत्त्वस्वरूप आत्माओं से घिरे हुए, आत्मारामी चिद्रूपी साधुओं से जो उनकी मूर्ति के ध्यान में तत्पर हैं,

श्लोक 52 (padma.5.70.52)

हृदयारूढ तद्ध्य्नौर्नासाग्रन्यस्तलोचनैः । क्रियतेऽहैतुकीभक्तिः कायहृद्वृत्तिभाषितैः

hṛdayārūḍha taddhynaurnāsāgranyastalocanaiḥ kriyate'haitukībhaktiḥ kāyahṛdvṛttibhāṣitaiḥ

जिनका हृदय उन्हीं के ध्यान में आरूढ़ है, जिनकी दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी है वे शरीर, हृदय और वाणी से अहैतुकी भक्ति करते हैं।

श्लोक 53 (padma.5.70.53)

तत्सव्ये यक्षगंधर्वसिद्धविद्याधरादिभिः । सुकांतैरप्सरःसंघैर्नृत्यसंगीततत्परैः

tatsavye yakṣagaṁdharvasiddhavidyādharādibhiḥ sukāṁtairapsaraḥsaṁghairnṛtyasaṁgītatatparaiḥ

उनके बाईं ओर यक्ष, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि तथा नृत्य-संगीत में तत्पर सुंदर अप्सराओं के समूह हैं,

श्लोक 54 (padma.5.70.54)

तदंगभजनं कामं वांछद्भिः कृष्णलालसैः । तदग्रे वैष्णवैः सर्वैश्चांतरिक्षे सुखासने

tadaṁgabhajanaṁ kāmaṁ vāṁchadbhiḥ kṛṣṇalālasaiḥ tadagre vaiṣṇavaiḥ sarvaiścāṁtarikṣe sukhāsane

जो कृष्ण की लालसा से उनके अंगों की सेवा करने की कामना करते हैं। उनके सम्मुख आकाश में, सुखासन पर बैठे सभी वैष्णव हैं,

श्लोक 55 (padma.5.70.55)

प्रह्लादनारदाद्यैश्च कुमारशुकवैष्णवैः । जनकाद्यैर्लसद्भावैर्हृद्बाह्य स्फूर्तितत्परैः

prahlādanāradādyaiśca kumāraśukavaiṣṇavaiḥ janakādyairlasadbhāvairhṛdbāhya sphūrtitatparaiḥ

प्रह्लाद, नारद आदि, कुमार (सनकादि), शुक और अन्य वैष्णव, जनक आदि, उज्ज्वल भावों से युक्त, भीतर-बाहर उसी भाव को प्रकट करने में तत्पर,

श्लोक 56 (padma.5.70.56)

पुलकाकुलसर्वांगैः स्फुरत्प्रेमसमाकुलैः । रहस्यामृतसंसिक्तैरर्द्धयुग्माक्षरो मनुः

pulakākulasarvāṁgaiḥ sphuratpremasamākulaiḥ rahasyāmṛtasaṁsiktairarddhayugmākṣaro manuḥ

समस्त अंगों में रोमांच से व्याप्त, स्फुरित प्रेम से व्याकुल, रहस्य के अमृत से सिंचित वे आधे युग्म अक्षरों वाला मंत्र जपते हैं।

श्लोक 57 (padma.5.70.57)

मंत्रचूडामणिः प्रोक्तः सर्वमंत्रैककारणम् । सर्वदेवस्य मंत्राणां कैशोरं मंत्रहेतुकम्

maṁtracūḍāmaṇiḥ proktaḥ sarvamaṁtraikakāraṇam sarvadevasya maṁtrāṇāṁ kaiśoraṁ maṁtrahetukam

वह मंत्रचूड़ामणि कहा गया है, समस्त मंत्रों का एकमात्र कारण; सब देवताओं के मंत्रों में किशोर-मंत्र ही मंत्र-शक्ति का हेतु है।

श्लोक 58 (padma.5.70.58)

सर्वकैशोरमंत्राणां हेतुश्चूडामणिर्मनुः । जपं कुर्वंति मनसा पूर्णप्रेमसुखाश्रयाः

sarvakaiśoramaṁtrāṇāṁ hetuścūḍāmaṇirmanuḥ japaṁ kurvaṁti manasā pūrṇapremasukhāśrayāḥ

सभी किशोर-मंत्रों में चूड़ामणि-मंत्र ही हेतु है; पूर्ण प्रेम-सुख के आश्रित वे लोग मन से उसका जप करते हैं।

श्लोक 59 (padma.5.70.59)

वांछंति तत्पदांभोजे निश्चलं प्रेमसाधनम् । तद्बाह्ये स्फटिकाद्युच्च प्रावारे सुमनोहरे

vāṁchaṁti tatpadāṁbhoje niścalaṁ premasādhanam tadbāhye sphaṭikādyucca prāvāre sumanohare

वे उनके चरण-कमलों में अचल प्रेम-साधना की ही कामना करते हैं। उसके बाहर स्फटिक आदि के ऊँचे, अत्यंत मनोहर आवरण में,

श्लोक 60 (padma.5.70.60)

कुंकुमैः सितरक्ताद्यैश्चतुर्दिक्षु समाकुलैः । शुक्लं चतुर्भुजं विष्णुं पश्चिमे द्वारपालकम्

kuṁkumaiḥ sitaraktādyaiścaturdikṣu samākulaiḥ śuklaṁ caturbhujaṁ viṣṇuṁ paścime dvārapālakam

कुंकुम, श्वेत, रक्त आदि रंगों से चारों दिशाओं में सुसज्जित, पश्चिम में द्वारपाल के रूप में श्वेत चतुर्भुज विष्णु,

श्लोक 61 (padma.5.70.61)

शंखचक्रगदापद्मकिरीटादि विभूषितम् । रक्तं चतुर्भुजं पद्मशंखचक्रगदायुधम्

śaṁkhacakragadāpadmakirīṭādi vibhūṣitam raktaṁ caturbhujaṁ padmaśaṁkhacakragadāyudham

शंख, चक्र, गदा, कमल, मुकुट आदि से विभूषित; रक्त-वर्ण चतुर्भुज विष्णु, कमल-शंख-चक्र-गदा आयुधों सहित,

श्लोक 62 (padma.5.70.62)

किरीटकुंडलोद्दीप्त द्वारपालकमुत्तरे । गौरं चतुर्भुजं विष्णुं शुखचक्रगदायुधम्

kirīṭakuṁḍaloddīpta dvārapālakamuttare gauraṁ caturbhujaṁ viṣṇuṁ śukhacakragadāyudham

मुकुट-कुंडलों से चमकते, उत्तर में द्वारपाल; गौर-वर्ण चतुर्भुज विष्णु, शंख-चक्र-गदा आयुधों सहित,

श्लोक 63 (padma.5.70.63)

किरीटकुंडलाद्यैश्च शोभितं वनमालिनम् । पूर्वद्वारे द्वारपालं गौरं विष्णुं प्रकीर्तितम्

kirīṭakuṁḍalādyaiśca śobhitaṁ vanamālinam pūrvadvāre dvārapālaṁ gauraṁ viṣṇuṁ prakīrtitam

मुकुट-कुंडल आदि से सुशोभित, वनमाला धारण किए, पूर्व द्वार पर द्वारपाल के रूप में गौरवर्ण विष्णु कहे गए हैं।

श्लोक 64 (padma.5.70.64)

कृष्णवर्णं चतुर्बाहुं शंखचक्रादिभूषणम् । दक्षिणद्वारपालं तु श्रीविष्णुंकृष्णवर्णकम्

kṛṣṇavarṇaṁ caturbāhuṁ śaṁkhacakrādibhūṣaṇam dakṣiṇadvārapālaṁ tu śrīviṣṇuṁkṛṣṇavarṇakam

श्याम-वर्ण चतुर्भुज, शंख-चक्र आदि आभूषणों सहित, दक्षिण द्वार के द्वारपाल श्री विष्णु श्यामवर्ण के हैं।

श्लोक 65 (padma.5.70.65)

श्रीकृष्णचरितं ह्येतद्यः पठेत्प्रयतः शुचिः । शृणुयाद्वापि यो भक्त्या गोविंदे लभते रतिम्

śrīkṛṣṇacaritaṁ hyetadyaḥ paṭhetprayataḥ śuciḥ śṛṇuyādvāpi yo bhaktyā goviṁde labhate ratim

जो कोई इस श्रीकृष्ण-चरित्र को संयमित और पवित्र होकर पढ़ता है, अथवा भक्तिपूर्वक सुनता है, वह गोविंद में रति (प्रेम) को प्राप्त करता है।

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