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पाताल खण्ड · अध्याय 73

मथुरा का माहात्म्य

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74

श्लोक 1 (padma.5.73.1)

ईश्वर उवाच-। यत्त्वया पृष्टमाश्चर्यं तन्मया भाषितं क्रमात् । यत्र मुह्यंति ब्रह्माद्यास्तत्र को वा न मुह्यति

īśvara uvāca- yattvayā pṛṣṭamāścaryaṁ tanmayā bhāṣitaṁ kramāt yatra muhyaṁti brahmādyāstatra ko vā na muhyati

ईश्वर बोले जो आश्चर्य तुमने पूछा, वह मैंने क्रमशः कह दिया; जहाँ ब्रह्मा आदि भी मोहित हो जाते हैं, वहाँ कौन मोहित नहीं होता?

श्लोक 2 (padma.5.73.2)

तथापि ते प्रवक्ष्यामि यदुक्तं परमर्षिणा । महाराजमंबरीषं विष्णुभक्तं शिवान्वितम्

tathāpi te pravakṣyāmi yaduktaṁ paramarṣiṇā mahārājamaṁbarīṣaṁ viṣṇubhaktaṁ śivānvitam

फिर भी मैं तुम्हें वह कहूँगा जो परमर्षि व्यास ने महाराज अंबरीष से कहा था, जो विष्णु-भक्त और शिव के भी भक्त थे।

श्लोक 3 (padma.5.73.3)

बदर्याश्रममासाद्य समासीनं जितेंद्रियम् । राजा प्रणम्य तुष्टाव विष्णुधर्मविवित्सया

badaryāśramamāsādya samāsīnaṁ jiteṁdriyam rājā praṇamya tuṣṭāva viṣṇudharmavivitsayā

बदरी आश्रम में पहुँचकर, जितेंद्रिय व्यास को बैठे देखकर, राजा ने प्रणाम कर विष्णु-धर्म जानने की इच्छा से उनकी स्तुति की।

श्लोक 4 (padma.5.73.4)

वेदव्यासं महाभागं सर्वज्ञं पुरुषोत्तमम् । मां त्वं संसारदुष्पारे परित्रातुमिहार्हसि

vedavyāsaṁ mahābhāgaṁ sarvajñaṁ puruṣottamam māṁ tvaṁ saṁsāraduṣpāre paritrātumihārhasi

हे वेदव्यास महाभाग, सर्वज्ञ पुरुषोत्तम! आप ही मुझे इस दुष्पार संसार से यहाँ बचाने योग्य हैं।

श्लोक 5 (padma.5.73.5)

विषयेषु विरक्तोऽस्मि नमस्तेभ्यो नमोखिलम् । यत्तत्पदमनुद्विग्नं सच्चिदानंदविग्रहम्

viṣayeṣu virakto'smi namastebhyo namokhilam yattatpadamanudvignaṁ saccidānaṁdavigraham

मैं विषयों से विरक्त हूँ; आपको नमस्कार है, सर्वथा नमस्कार है। जो वह पद अनुद्विग्न है, सच्चिदानंद-विग्रह है,

श्लोक 6 (padma.5.73.6)

परं ब्रह्म पराकाशमनाकाशमनामयम् । यत्साक्षात्कृत्य मुनयो भवांभोधिं तरंति हि

paraṁ brahma parākāśamanākāśamanāmayam yatsākṣātkṛtya munayo bhavāṁbhodhiṁ taraṁti hi

परम ब्रह्म, परम आकाश, आकाश-रहित, रोगरहित है, जिसका साक्षात्कार करके मुनि भवसागर को पार करते हैं,

श्लोक 7 (padma.5.73.7)

तत्राहं मनसो नित्यं कथं गतिमवाप्नुयाम् । व्यास उवाच-। अतिगोप्यं त्वया पृष्टं यन्मया न शुकं प्रति

tatrāhaṁ manaso nityaṁ kathaṁ gatimavāpnuyām vyāsa uvāca- atigopyaṁ tvayā pṛṣṭaṁ yanmayā na śukaṁ prati

उस पद तक मेरा मन नित्य कैसे गति प्राप्त कर सकता है? व्यास बोले तुमने मुझसे अत्यंत गोपनीय वस्तु पूछी है, जो मैंने अपने पुत्र शुक से भी नहीं कही,

श्लोक 8 (padma.5.73.8)

गदितं स्वसुतं किंतु त्वां वक्ष्यामि हरिप्रियम् । आसीदिदं परं विश्वं यद्रूपं यत्प्रतिष्ठितम्

gaditaṁ svasutaṁ kiṁtu tvāṁ vakṣyāmi haripriyam āsīdidaṁ paraṁ viśvaṁ yadrūpaṁ yatpratiṣṭhitam

किंतु तुम्हें, हरि के प्रिय को, मैं वह कहूँगा। यह परम विश्व जिस रूप में विद्यमान और प्रतिष्ठित है,

श्लोक 9 (padma.5.73.9)

अव्याकृतमव्यथितं तदीश्वरमयं शृणु । मया कृतं तपः पूर्वं बहुवर्षसहस्रकम्

avyākṛtamavyathitaṁ tadīśvaramayaṁ śṛṇu mayā kṛtaṁ tapaḥ pūrvaṁ bahuvarṣasahasrakam

अव्याकृत, अव्यथित उसे ईश्वरमय ही जानो, सुनो। मैंने पूर्वकाल में बहुत सहस्र वर्षों तक तप किया,

श्लोक 10 (padma.5.73.10)

फलमूलपलाशांबु वाय्वाहारनिषेविणा । ततो मामाहभगवान्स्वध्याननिरतं हरिः

phalamūlapalāśāṁbu vāyvāhāraniṣeviṇā tato māmāhabhagavānsvadhyānanirataṁ hariḥ

फल-मूल-पत्ते-जल और वायु का आहार करते हुए। तब भगवान हरि ने अपने ही ध्यान में लीन मुझसे कहा।

श्लोक 11 (padma.5.73.11)

कस्मिन्नर्थे चिकीर्षाते विवित्सा वा महामते । प्रसन्नोऽस्मि वृणुष्व त्वं वरं च वरदर्षभात्

kasminnarthe cikīrṣāte vivitsā vā mahāmate prasanno'smi vṛṇuṣva tvaṁ varaṁ ca varadarṣabhāt

हे महामते! किस उद्देश्य से तुम कर्म करना चाहते हो, या क्या जानना चाहते हो? मैं प्रसन्न हूँ, वरदाताओं में श्रेष्ठ मुझसे वर माँगो।

श्लोक 12 (padma.5.73.12)

मद्दर्शनांतः संसार इति सत्यं ब्रवीमि ते । ततोऽहमब्रुवं कृष्णं पुलकोत्फुल्लविग्रहः

maddarśanāṁtaḥ saṁsāra iti satyaṁ bravīmi te tato'hamabruvaṁ kṛṣṇaṁ pulakotphullavigrahaḥ

मेरे दर्शन में ही संसार का अंत है यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ। तब मैंने रोमांचित शरीर से कृष्ण से कहा,

श्लोक 13 (padma.5.73.13)

त्वामहं द्रष्टुमिच्छामि चक्षुर्भ्यां मधुसूदन । यत्तत्सत्यं परं ब्रह्म जगज्ज्योतिं जगत्पतिम्

tvāmahaṁ draṣṭumicchāmi cakṣurbhyāṁ madhusūdana yattatsatyaṁ paraṁ brahma jagajjyotiṁ jagatpatim

हे मधुसूदन! मैं आपको अपने ही नेत्रों से देखना चाहता हूँ जो सत्य, परम ब्रह्म, जगत की ज्योति, जगत्पति हैं,

श्लोक 14 (padma.5.73.14)

वदंति वेदशिरसश्चाक्षुषं नाथमद्भुतम् । श्रीभगवानुवाच-। ब्रह्मणैवं पुरा पृष्टः प्रार्थितश्च यथा पुरा

vadaṁti vedaśirasaścākṣuṣaṁ nāthamadbhutam śrībhagavānuvāca- brahmaṇaivaṁ purā pṛṣṭaḥ prārthitaśca yathā purā

जिसे वेदों का शिरोभाग (उपनिषद) अद्भुत, नेत्रों से देखे जा सकने योग्य स्वामी कहते हैं। श्रीभगवान बोले पहले ब्रह्मा ने जैसे पूछा और प्रार्थना की थी,

श्लोक 15 (padma.5.73.15)

यदवोचमहं तस्मै तत्तुभ्यमपि कथ्यते । मामेके प्रकृतिं प्राहुः पुरुषं च तथेश्वरम्

yadavocamahaṁ tasmai tattubhyamapi kathyate māmeke prakṛtiṁ prāhuḥ puruṣaṁ ca tatheśvaram

जो मैंने उससे कहा था, वही तुम्हें भी बताता हूँ। कुछ मुझे प्रकृति कहते हैं, कुछ पुरुष तथा ईश्वर कहते हैं,

श्लोक 16 (padma.5.73.16)

धर्ममेके धनं चैके मोक्षमेकेऽकुतोभयम् । शून्यमेके भावमेके शिवमेके सदाशिवम्

dharmameke dhanaṁ caike mokṣameke'kutobhayam śūnyameke bhāvameke śivameke sadāśivam

कुछ धर्म, कुछ धन, कुछ अभयदायी मोक्ष; कुछ शून्य, कुछ भाव, कुछ शिव, कुछ सदाशिव कहते हैं,

श्लोक 17 (padma.5.73.17)

अपरे वेदशिरसि स्थितमेकं सनातनम् । सद्भावं विक्रियाहीनं सच्चिदानंदविग्रहम्

apare vedaśirasi sthitamekaṁ sanātanam sadbhāvaṁ vikriyāhīnaṁ saccidānaṁdavigraham

अन्य वेद-शिरोभाग में स्थित एक सनातन कहते हैं, सद्भाव, विकाररहित, सच्चिदानंद-विग्रह।

श्लोक 18 (padma.5.73.18)

पश्याद्य दर्शयिष्यामि स्वरूपं वेदगोपितम् । ततोऽपश्यं भूपबालमहं कालांबुदप्रभम्

paśyādya darśayiṣyāmi svarūpaṁ vedagopitam tato'paśyaṁ bhūpabālamahaṁ kālāṁbudaprabham

देखो, मैं अब वह वेद-गोपित स्वरूप दिखाता हूँ। तब मैंने एक गोप-बालक को देखा, काले मेघ जैसी कांतिवाला,

श्लोक 19 (padma.5.73.19)

गोपकन्यावृतं गोपं हसंतं गोपबालकैः । कदंबमूलआसीनं पीतवाससमद्भुतम्

gopakanyāvṛtaṁ gopaṁ hasaṁtaṁ gopabālakaiḥ kadaṁbamūlaāsīnaṁ pītavāsasamadbhutam

गोपकन्याओं से घिरा, गोप-बालकों के साथ हँसता हुआ, कदंब के मूल में बैठा, पीत वस्त्रधारी, अद्भुत,

श्लोक 20 (padma.5.73.20)

वनं वृंदावनं नाम नवपल्लवमंडितम् । कोकिलभ्रमरारावं मनोभव मनोहरम्

vanaṁ vṛṁdāvanaṁ nāma navapallavamaṁḍitam kokilabhramarārāvaṁ manobhava manoharam

तथा वृंदावन नामक वन, नए पल्लवों से मंडित, कोयल-भ्रमरों की ध्वनि से युक्त, कामदेव के मन जैसा मनोहर।

श्लोक 21 (padma.5.73.21)

नदीमपश्यं कालिंदीमिंदीवरदलप्रभाम् । गोवर्द्धनमथापश्यं कृष्णरामकरोद्धृतम्

nadīmapaśyaṁ kāliṁdīmiṁdīvaradalaprabhām govarddhanamathāpaśyaṁ kṛṣṇarāmakaroddhṛtam

मैंने नीलकमल-दल जैसी कांतिवाली कालिंदी नदी देखी; और मैंने कृष्ण-राम के हाथों से उठाया गया गोवर्धन देखा,

श्लोक 22 (padma.5.73.22)

महेंद्रदर्पनाशाय गोगोपालसुखावहम् । गोपालमबलासंगमुदितं वेणुवादिनम्

maheṁdradarpanāśāya gogopālasukhāvaham gopālamabalāsaṁgamuditaṁ veṇuvādinam

महेंद्र के दर्प का नाश करने के लिए, गौओं-गोपालों को सुख देने वाला। मैंने गोपाल को गोपियों के साथ आनंदित, वेणु बजाते देखा,

श्लोक 23 (padma.5.73.23)

दृष्ट्वातिहृष्टो ह्यभवं सर्वभूषणभूषणम् । ततो मामाह भगवान्वृंदावनचरः स्वयम्

dṛṣṭvātihṛṣṭo hyabhavaṁ sarvabhūṣaṇabhūṣaṇam tato māmāha bhagavānvṛṁdāvanacaraḥ svayam

यह देखकर मैं अत्यंत हर्षित हुआ, वह सभी आभूषणों का आभूषण था। तब स्वयं वृंदावन-विहारी भगवान ने मुझसे कहा।

श्लोक 24 (padma.5.73.24)

यदिदं मे त्वया दृष्टं रूपं दिव्यं सनातनम् । निष्कलं निष्क्रियं शांतं सच्चिदानंदविग्रहम्

yadidaṁ me tvayā dṛṣṭaṁ rūpaṁ divyaṁ sanātanam niṣkalaṁ niṣkriyaṁ śāṁtaṁ saccidānaṁdavigraham

यह मेरा जो दिव्य, सनातन रूप तुमने देखा है निष्कल, निष्क्रिय, शांत, सच्चिदानंद-विग्रह,

श्लोक 25 (padma.5.73.25)

पूर्णं पद्मपलाशाक्षं नातः परतरं मम । इदमेववदंत्येतेवेदाःकारणकारणम्

pūrṇaṁ padmapalāśākṣaṁ nātaḥ parataraṁ mama idamevavadaṁtyetevedāḥkāraṇakāraṇam

पूर्ण, कमल-पत्र जैसे नेत्रोंवाला इससे परे मेरा कुछ नहीं है। यही वेद कारणों के भी कारण कहते हैं,

श्लोक 26 (padma.5.73.26)

सत्यंनित्यंपरानंदंचिद्घनंशाश्वतंशिवम् । नित्यां मे मथुरां विद्धि वनं वृंदावनं तथा

satyaṁnityaṁparānaṁdaṁcidghanaṁśāśvataṁśivam nityāṁ me mathurāṁ viddhi vanaṁ vṛṁdāvanaṁ tathā

सत्य, नित्य, परम आनंद, चिद्घन, शाश्वत, शिव। मेरी मथुरा को नित्य जानो, और वृंदावन वन को भी,

श्लोक 27 (padma.5.73.27)

यमुनां गोपकन्याश्च तथा गोपालबालकाः । ममावतारो नित्योऽयमत्र मा संशयं कृथाः

yamunāṁ gopakanyāśca tathā gopālabālakāḥ mamāvatāro nityo'yamatra mā saṁśayaṁ kṛthāḥ

यमुना को, गोपकन्याओं को, तथा गोपाल-बालकों को भी। यह मेरा अवतार यहाँ नित्य है, इसमें संदेह मत करो।

श्लोक 28 (padma.5.73.28)

ममेष्टा हि सदा राधा सर्वज्ञोऽहं परात्परः । सर्वकामश्च सर्वेशः सर्वानंदः परात्परः

mameṣṭā hi sadā rādhā sarvajño'haṁ parātparaḥ sarvakāmaśca sarveśaḥ sarvānaṁdaḥ parātparaḥ

राधा सदा मेरी इष्ट हैं; मैं सर्वज्ञ, परात्पर हूँ। सर्वकाम, सर्वेश, सर्वानंद, परात्पर हूँ।

श्लोक 29 (padma.5.73.29)

मयि सर्वमिदं विश्वं भाति मायाविजृंभितम् । ततोऽहमब्रुवं देवं जगत्कारणकारणम्

mayi sarvamidaṁ viśvaṁ bhāti māyāvijṛṁbhitam tato'hamabruvaṁ devaṁ jagatkāraṇakāraṇam

मुझमें ही यह सारा विश्व माया से विस्तारित होकर प्रकाशित होता है। तब मैंने उस जगत के कारण के भी कारण देव से कहा,

श्लोक 30 (padma.5.73.30)

काश्च गोप्यस्तु के गोपा वृक्षोऽयं कीदृशो मतः । वनं किं कोकिलाद्याश्च नदी केयं गिरिश्च कः

kāśca gopyastu ke gopā vṛkṣo'yaṁ kīdṛśo mataḥ vanaṁ kiṁ kokilādyāśca nadī keyaṁ giriśca kaḥ

ये गोपियाँ कौन हैं, गोप कौन हैं, यह वृक्ष कैसा माना गया है? यह वन क्या है, कोयल आदि क्या हैं, यह नदी कौन है, और यह पर्वत कौन है?

श्लोक 31 (padma.5.73.31)

कोऽसौ वेणुर्महाभागो लोकानंदैकभाजनम् । भगवानाह मां प्रीतः प्रसन्नवदनांबुजः

ko'sau veṇurmahābhāgo lokānaṁdaikabhājanam bhagavānāha māṁ prītaḥ prasannavadanāṁbujaḥ

यह लोकों के आनंद का एकमात्र आधार महाभाग वेणु कौन है? भगवान ने प्रसन्न, प्रसन्न कमल-मुख से मुझे कहा,

श्लोक 32 (padma.5.73.32)

गोप्यस्तु श्रुतयो ज्ञेया ऋचो वै गोपकन्यकाः । देवकन्याश्च राजेंद्र तपोयुक्ता मुमुक्षवः

gopyastu śrutayo jñeyā ṛco vai gopakanyakāḥ devakanyāśca rājeṁdra tapoyuktā mumukṣavaḥ

गोपियाँ श्रुतियाँ जाननी चाहिए, ऋचाएँ ही गोपकन्याएँ हैं। हे राजेंद्र! देवकन्याएँ तपोयुक्त, मुमुक्षु हैं,

श्लोक 33 (padma.5.73.33)

गोपाला मुनयः सर्वे वैकुंठानंदमूर्त्तयः । कल्पवृक्षः कदंबोऽयं परानंदैकभाजनम्

gopālā munayaḥ sarve vaikuṁṭhānaṁdamūrttayaḥ kalpavṛkṣaḥ kadaṁbo'yaṁ parānaṁdaikabhājanam

गोपाल सभी मुनि हैं, वैकुंठ-आनंद की मूर्तियाँ हैं। यह कदंब कल्पवृक्ष है, परम आनंद का एकमात्र आधार है।

श्लोक 34 (padma.5.73.34)

वनमानंदकाख्यं हि महापातकनाशनम् । सिद्धाश्च साध्या गंधर्वाः कोकिलाद्या न संशयः

vanamānaṁdakākhyaṁ hi mahāpātakanāśanam siddhāśca sādhyā gaṁdharvāḥ kokilādyā na saṁśayaḥ

यह वन आनंदक नामक है, महापातकों का नाशक है। कोयल आदि सिद्ध, साध्य, गंधर्व हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 35 (padma.5.73.35)

केचिदानंदहृदयं साक्षाद्यमुनया तनुम् । अनादिर्हरिदासोऽयं भूधरो नात्र संशयः

kecidānaṁdahṛdayaṁ sākṣādyamunayā tanum anādirharidāso'yaṁ bhūdharo nātra saṁśayaḥ

कुछ आनंद-हृदय हैं; साक्षात् यमुना ही (मेरी प्रिया की) देह है। यह पर्वत अनादि, हरि का सेवक है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 36 (padma.5.73.36)

वेणुर्यः शृणुतं विप्रं तवापि विदितं तथा । द्विज आसीच्छांतमनास्तपः शांतिपरायणः

veṇuryaḥ śṛṇutaṁ vipraṁ tavāpi viditaṁ tathā dvija āsīcchāṁtamanāstapaḥ śāṁtiparāyaṇaḥ

और यह जो वेणु है, हे विप्र! सुनो, यह तुम्हें भी ज्ञात है एक ब्राह्मण था, शांत मनवाला, तप और शांति में परायण,

श्लोक 37 (padma.5.73.37)

नाम्ना देवव्रतोदांतः कर्मकांडविशारदः । स वैष्णवजनव्रातमध्यवर्त्ती क्रियापरः

nāmnā devavratodāṁtaḥ karmakāṁḍaviśāradaḥ sa vaiṣṇavajanavrātamadhyavarttī kriyāparaḥ

नाम से देवव्रत, संयमी, कर्मकांड में निपुण। वह वैष्णवजनों के समूह के मध्य रहने वाला, क्रियापरायण था।

श्लोक 38 (padma.5.73.38)

स कदाचन शुश्राव यज्ञेशोऽस्तीति भूपते । तस्य गेहमथाभ्यागाद्द्विजो मद्गतनिश्चयः

sa kadācana śuśrāva yajñeśo'stīti bhūpate tasya gehamathābhyāgāddvijo madgataniścayaḥ

हे भूपते! उसने एक बार सुना कि यज्ञेश (मैं) हूँ। मुझमें मन लगाए वह ब्राह्मण तब उसके घर गया।

श्लोक 39 (padma.5.73.39)

स मद्भक्तः क्वचित्पूजां तुलसीदलवारिणा । कृतवांस्तद्गृहे किंचित्फलं मूलं न्यवेदयत्

sa madbhaktaḥ kvacitpūjāṁ tulasīdalavāriṇā kṛtavāṁstadgṛhe kiṁcitphalaṁ mūlaṁ nyavedayat

मेरा वह भक्त तुलसी-दल और जल से कहीं पूजा करके, उसके घर में कुछ फल-मूल निवेदित किया।

श्लोक 40 (padma.5.73.40)

स्नानवारिफलं किंचित्तस्मै मत्या ददौ सुधीः । अश्रद्धया स्मितं कृत्वा सोऽप्यगृह्णाद्द्विजन्मनः

snānavāriphalaṁ kiṁcittasmai matyā dadau sudhīḥ aśraddhayā smitaṁ kṛtvā so'pyagṛhṇāddvijanmanaḥ

उस बुद्धिमान ने मुझमें भक्ति से उसे कुछ स्नान-जल और फल दिया; उसने भी अश्रद्धा से मुस्कुराकर उस द्विज से वह ले लिया।

श्लोक 41 (padma.5.73.41)

तेन पापेन संजातं वेणुत्वमतिदारुणम् । तेन पुण्येन तस्याथ मदीय प्रियतां गतः

tena pāpena saṁjātaṁ veṇutvamatidāruṇam tena puṇyena tasyātha madīya priyatāṁ gataḥ

उस पाप से उसे अत्यंत भयंकर वेणुत्व प्राप्त हुआ; किंतु उसी पुण्य से वह अंततः मेरा प्रिय बन गया।

श्लोक 42 (padma.5.73.42)

अमुना सोपि राजेंद्र केतुमानिव राजते । युगांते तद्विष्णुपरो भूत्वा ब्रह्म समाप्स्यति

amunā sopi rājeṁdra ketumāniva rājate yugāṁte tadviṣṇuparo bhūtvā brahma samāpsyati

इससे, हे राजेंद्र! वह भी ध्वजधारी के समान सुशोभित है; युग के अंत में विष्णुपरायण होकर वह ब्रह्म को प्राप्त करेगा।

श्लोक 43 (padma.5.73.43)

अहो न जानंति नरा दुराशयाः पुरीं मदीयां परमां सनातनीम् । सुरेंद्र नागेंद्र मुनींद्र संस्तुतां मनोरमां तां मथुरां पुरातनीम्

aho na jānaṁti narā durāśayāḥ purīṁ madīyāṁ paramāṁ sanātanīm sureṁdra nāgeṁdra munīṁdra saṁstutāṁ manoramāṁ tāṁ mathurāṁ purātanīm

अफसोस! दुराशय मनुष्य नहीं जानते मेरी परम, सनातन पुरी को, जो सुरेंद्र-नागेंद्र-मुनींद्रों से स्तुत है, वह मनोहर, प्राचीन मथुरा को।

श्लोक 44 (padma.5.73.44)

काश्यादयो यद्यपि संति पुर्यस्तासां तु मध्ये मथुरैव धन्या । यज्जन्ममौंजीव्रतमृत्युदाहैर्नृणां चतुर्द्धा विदधाति मुक्तिम्

kāśyādayo yadyapi saṁti puryastāsāṁ tu madhye mathuraiva dhanyā yajjanmamauṁjīvratamṛtyudāhairnṛṇāṁ caturddhā vidadhāti muktim

यद्यपि काशी आदि पुरियाँ भी हैं, उन सबमें मथुरा ही धन्य है, क्योंकि वह जन्म, उपनयन-व्रत, मृत्यु और दाह इन चार प्रकार से मनुष्यों को मुक्ति देती है।

श्लोक 45 (padma.5.73.45)

यदा विशुद्धास्तपआदिना जनाः शुभाशया ध्यानधना निरंतरम् । तदैव पश्यंति ममोत्तमां पुरीं न चान्यथा कल्पशतैर्द्विजोत्तमाः

yadā viśuddhāstapaādinā janāḥ śubhāśayā dhyānadhanā niraṁtaram tadaiva paśyaṁti mamottamāṁ purīṁ na cānyathā kalpaśatairdvijottamāḥ

जब मनुष्य तप आदि से विशुद्ध, शुभ आशयवाले, निरंतर ध्यान-धनी होते हैं, तभी वे मेरी उत्तम पुरी को देखते हैं, अन्यथा सौ कल्पों में भी नहीं, हे द्विजोत्तम!

श्लोक 46 (padma.5.73.46)

मथुरावासिनो धन्या मान्या अपि दिवौकसाम् । अगण्यमहिमानस्ते सर्व एव चतुर्भुजाः

mathurāvāsino dhanyā mānyā api divaukasām agaṇyamahimānaste sarva eva caturbhujāḥ

मथुरावासी धन्य हैं, देवताओं द्वारा भी मान्य हैं; उनकी महिमा अगणनीय है, वे सभी मानो चतुर्भुज ही हैं।

श्लोक 47 (padma.5.73.47)

मथुरावासिनो ये तु दोषान्पश्यंति मानवाः । तेषु दोषं न पश्यंति जन्ममृत्युसहस्रजम्

mathurāvāsino ye tu doṣānpaśyaṁti mānavāḥ teṣu doṣaṁ na paśyaṁti janmamṛtyusahasrajam

जो मनुष्य मथुरावासियों में दोष देखते हैं, उनमें भी हजारों जन्म-मृत्यु से उत्पन्न दोष नहीं देखा जाता।

श्लोक 48 (padma.5.73.48)

अधना अपि ते धन्या मथुरां ये स्मरंति ते । यत्र भूतेश्वरो देवो मोक्षदः पापिनामपि

adhanā api te dhanyā mathurāṁ ye smaraṁti te yatra bhūteśvaro devo mokṣadaḥ pāpināmapi

वे निर्धन भी धन्य हैं जो मथुरा का स्मरण करते हैं, जहाँ देव भूतेश्वर पापियों को भी मोक्ष देने वाले हैं।

श्लोक 49 (padma.5.73.49)

मम प्रियतमो नित्यं देवो भूतेश्वरः परः । यः कदापि मम प्रीत्यै न संत्यजति तां पुरीम्

mama priyatamo nityaṁ devo bhūteśvaraḥ paraḥ yaḥ kadāpi mama prītyai na saṁtyajati tāṁ purīm

देव भूतेश्वर मेरे नित्य अत्यंत प्रिय हैं; वे मेरी प्रीति के लिए कभी उस पुरी को नहीं छोड़ते।

श्लोक 50 (padma.5.73.50)

भूतेश्वरं यो न नमेन्न पूजयेन्न वास्मरेद्दुश्चरितो मनुष्यः । नैनां स पश्येन्मथुरां मदीयां स्वयंप्रकाशां परदेवताख्याम्

bhūteśvaraṁ yo na namenna pūjayenna vāsmaredduścarito manuṣyaḥ naināṁ sa paśyenmathurāṁ madīyāṁ svayaṁprakāśāṁ paradevatākhyām

जो दुश्चरित मनुष्य भूतेश्वर को न प्रणाम करे, न पूजे, न स्मरण करे, वह मेरी स्वयंप्रकाश, परदेवता कहलाने वाली इस मथुरा को नहीं देख सकता।

श्लोक 51 (padma.5.73.51)

न कथं मयि भक्तिं स लभते पापपूरुषः । यो मदीयं परं भक्तं शिवं संपूजयेन्नहि

na kathaṁ mayi bhaktiṁ sa labhate pāpapūruṣaḥ yo madīyaṁ paraṁ bhaktaṁ śivaṁ saṁpūjayennahi

जो मेरे परम भक्त शिव की पूजा नहीं करता, वह पापी पुरुष मुझमें भक्ति कैसे प्राप्त करे?

श्लोक 52 (padma.5.73.52)

मन्मायामोहितधियः प्रायस्ते मानवाधमाः । भूतेश्वरं न नमंति न स्मरंति स्तुवंति ये

manmāyāmohitadhiyaḥ prāyaste mānavādhamāḥ bhūteśvaraṁ na namaṁti na smaraṁti stuvaṁti ye

मेरी माया से मोहित बुद्धिवाले वे नराधम प्रायः भूतेश्वर को न प्रणाम करते, न स्मरण करते, न स्तुति करते हैं।

श्लोक 53 (padma.5.73.53)

बालकोऽपि ध्रुवो यत्र ममाराधनतत्परः । प्राप स्थानं परं शुद्धं यत्नयुक्तं पितामहैः

bālako'pi dhruvo yatra mamārādhanatatparaḥ prāpa sthānaṁ paraṁ śuddhaṁ yatnayuktaṁ pitāmahaiḥ

बालक ध्रुव भी जहाँ मेरी आराधना में तत्पर रहकर, वह परम शुद्ध स्थान प्राप्त कर सका जिसके लिए पितामह भी यत्न करते हैं।

श्लोक 54 (padma.5.73.54)

तां पुरीं प्राप्य मथुरां मदीयां सुरदुर्लभाम् । खंजो भूत्वांधको वापि प्राणानेव परित्यजेत्

tāṁ purīṁ prāpya mathurāṁ madīyāṁ suradurlabhām khaṁjo bhūtvāṁdhako vāpi prāṇāneva parityajet

देवताओं को भी दुर्लभ मेरी उस मथुरा पुरी को प्राप्त करके, लंगड़ा या अंधा होकर भी अपने प्राण त्याग देना चाहिए।

श्लोक 55 (padma.5.73.55)

वेदव्यासमहाभाग मा कृथाः संशयं क्वचित् । रहस्यं वेदशिरसां यन्मया ते प्रकाशितम्

vedavyāsamahābhāga mā kṛthāḥ saṁśayaṁ kvacit rahasyaṁ vedaśirasāṁ yanmayā te prakāśitam

हे वेदव्यास महाभाग! कहीं भी संदेह मत करो; वेद-शिरोभाग का यह रहस्य मैंने तुम्हें प्रकाशित किया है।

श्लोक 56 (padma.5.73.56)

इमं भगवता प्रोक्तमध्यायं यः पठेच्छुचिः । शृणुयाद्वापि यो भक्त्या मुक्तिस्तस्यापि शाश्वती

imaṁ bhagavatā proktamadhyāyaṁ yaḥ paṭhecchuciḥ śṛṇuyādvāpi yo bhaktyā muktistasyāpi śāśvatī

भगवान द्वारा कहे गए इस अध्याय को जो पवित्र होकर पढ़े, अथवा भक्तिपूर्वक सुने, उसके लिए भी मुक्ति शाश्वत है।

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74