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पाताल खण्ड · अध्याय 75

नारद का अपना रूपांतर

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

श्लोक 1 (padma.5.75.1)

पार्वत्युवाच-। वृंदावनरहस्यं च बहुधा कथितं विभो । केन पुण्यविशेषेण नारदः प्रकृतिं गतः

pārvatyuvāca- vṛṁdāvanarahasyaṁ ca bahudhā kathitaṁ vibho kena puṇyaviśeṣeṇa nāradaḥ prakṛtiṁ gataḥ

पार्वती बोलीं हे विभो! आपने वृंदावन का रहस्य अनेक प्रकार से कहा। किस विशेष पुण्य से नारद प्रकृति-रूप को प्राप्त हुए?

श्लोक 2 (padma.5.75.2)

ईश्वर उवाच- एकदाश्चर्यवृत्तांतं मया जिज्ञासितं पुरा । ब्रह्मणा कथितं गुह्यं श्रुतं कृष्णमुखांबुजात्

īśvara uvāca- ekadāścaryavṛttāṁtaṁ mayā jijñāsitaṁ purā brahmaṇā kathitaṁ guhyaṁ śrutaṁ kṛṣṇamukhāṁbujāt

ईश्वर बोले एक बार पूर्वकाल में मैंने एक अद्भुत वृत्तांत जानना चाहा था; वह गुह्य रहस्य ब्रह्मा द्वारा कहा गया था, जो कृष्ण के मुख-कमल से सुना गया था।

श्लोक 3 (padma.5.75.3)

नारदः पृष्टवान्मह्यं तदाहं प्राप्तवानिदम् । अहं वक्तुं न शक्नोमि तन्माहात्म्यं कथंचन

nāradaḥ pṛṣṭavānmahyaṁ tadāhaṁ prāptavānidam ahaṁ vaktuṁ na śaknomi tanmāhātmyaṁ kathaṁcana

नारद ने मुझसे यह पूछा, तब मुझे यह प्राप्त हुआ। मैं उसकी महिमा किसी भी प्रकार कहने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 4 (padma.5.75.4)

किं कुर्वे शपनं तस्य स्मृत्वा सीदामि मानसे । इति श्रुत्वा मम वचो दुर्मनाः सोऽभवद्यदा

kiṁ kurve śapanaṁ tasya smṛtvā sīdāmi mānase iti śrutvā mama vaco durmanāḥ so'bhavadyadā

मैं उसे क्या शाप दूँ? उसका स्मरण करके मन में खिन्न होता हूँ। मेरा यह वचन सुनकर जब वह उदास हो गया,

श्लोक 5 (padma.5.75.5)

तदा ब्रह्माणमाहूय अहमादिष्टवान्प्रिये । त्वया यत्कथितं मह्यं नारदाय वदस्व तत्

tadā brahmāṇamāhūya ahamādiṣṭavānpriye tvayā yatkathitaṁ mahyaṁ nāradāya vadasva tat

तब, हे प्रिये! मैंने ब्रह्मा को बुलाकर आदेश दिया जो तुमसे मैंने कहा था, वह नारद से कहो।

श्लोक 6 (padma.5.75.6)

ब्रह्मा तदा ममवचो निशम्य सह नारदः । जगाम कृष्णसविधं नत्वा पृच्छत्तदेव तु

brahmā tadā mamavaco niśamya saha nāradaḥ jagāma kṛṣṇasavidhaṁ natvā pṛcchattadeva tu

तब ब्रह्मा ने मेरा वचन सुनकर, नारद सहित, कृष्ण के पास जाकर प्रणाम करके यही पूछा।

श्लोक 7 (padma.5.75.7)

ब्रह्मोवाच- किमिदं द्वात्रिंशद्वनं वृंदारण्यं विशांपते । श्रोतुमिच्छामि भगवन्यदियोग्योऽस्मि मे वद

brahmovāca- kimidaṁ dvātriṁśadvanaṁ vṛṁdāraṇyaṁ viśāṁpate śrotumicchāmi bhagavanyadiyogyo'smi me vada

ब्रह्मा बोले हे विशांपते! यह बत्तीस वनों वाला वृंदारण्य क्या है? मैं सुनना चाहता हूँ, हे भगवन्! यदि योग्य हूँ तो कहिए।

श्लोक 8 (padma.5.75.8)

श्रीभगवानुवाच- इदं वृंदावनं रम्यं मम धामैव केवलम् । यत्रेमे पशवः साक्षाद्वृक्षाः कीटा नरामराः

śrībhagavānuvāca- idaṁ vṛṁdāvanaṁ ramyaṁ mama dhāmaiva kevalam yatreme paśavaḥ sākṣādvṛkṣāḥ kīṭā narāmarāḥ

श्रीभगवान बोले यह रमणीय वृंदावन मेरा ही केवल धाम है, जहाँ ये पशु, वृक्ष, कीट, मनुष्य और देवता साक्षात्,

श्लोक 9 (padma.5.75.9)

ये वसंति ममांत्ये ते मृता यांति ममांतिकम् । अत्र या गोपपत्न्यश्च निवसंति ममालये

ye vasaṁti mamāṁtye te mṛtā yāṁti mamāṁtikam atra yā gopapatnyaśca nivasaṁti mamālaye

जो मेरी सीमा में रहते हैं, वे मरकर मेरे ही पास जाते हैं। यहाँ जो गोप-पत्नियाँ मेरे आलय में निवास करती हैं,

श्लोक 10 (padma.5.75.10)

योगिन्यस्तास्तु एवं हि मम देवाः परायणाः । पंचयोजनमेवं हि वनं मे देवरूपकम्

yoginyastāstu evaṁ hi mama devāḥ parāyaṇāḥ paṁcayojanamevaṁ hi vanaṁ me devarūpakam

वे ही योगिनियाँ हैं, मेरे परायण, मेरी ही देवियाँ हैं। इस प्रकार यह पाँच योजन का वन मेरा ही देव-स्वरूप है।

श्लोक 11 (padma.5.75.11)

कालिंदीयं सुषुम्नाख्या परमामृतवाहिनी । यत्र देवाश्च भूतानि वर्त्तंते सूक्ष्मरूपतः

kāliṁdīyaṁ suṣumnākhyā paramāmṛtavāhinī yatra devāśca bhūtāni varttaṁte sūkṣmarūpataḥ

यह कालिंदी सुषुम्ना नाम से परम अमृत बहाने वाली है, जहाँ देवता और भूत सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहते हैं।

श्लोक 12 (padma.5.75.12)

सर्वतो व्यापकश्चाहं न त्यक्ष्यामि वनं क्वचित् । आविर्भावस्तिरोभावो भवेदत्र युगेयुगे

sarvato vyāpakaścāhaṁ na tyakṣyāmi vanaṁ kvacit āvirbhāvastirobhāvo bhavedatra yugeyuge

मैं सर्वत्र व्यापक हूँ, मैं इस वन को कभी नहीं छोड़ूँगा। युग-युग में यहाँ आविर्भाव और तिरोभाव होता रहता है।

श्लोक 13 (padma.5.75.13)

तेजोमयमिदं स्थानमदृश्यं चर्मचक्षुषाम् । रहस्यं मे प्रभावं च पश्य वृंदावनं युगे

tejomayamidaṁ sthānamadṛśyaṁ carmacakṣuṣām rahasyaṁ me prabhāvaṁ ca paśya vṛṁdāvanaṁ yuge

यह तेजोमय स्थान चर्म-नेत्रों के लिए अदृश्य है। मेरे इस रहस्य और प्रभाव को देखो प्रत्येक युग में वृंदावन,

श्लोक 14 (padma.5.75.14)

ब्रह्मादीनां देवतानां न दृश्यं तत्कथंचन । ईश्वर उवाच- तच्छ्रुत्वा नारदो नत्वा कृष्णं ब्रह्माणमेव च

brahmādīnāṁ devatānāṁ na dṛśyaṁ tatkathaṁcana īśvara uvāca- tacchrutvā nārado natvā kṛṣṇaṁ brahmāṇameva ca

ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी किसी प्रकार दृश्य नहीं है। ईश्वर बोले यह सुनकर नारद ने कृष्ण और ब्रह्मा दोनों को प्रणाम करके,

श्लोक 15 (padma.5.75.15)

आजगाम ह भूर्लोके मिश्रकं नैमिषं वनम् । तत्रासौ सत्कृतश्चापि शौनकाद्यैर्मुनीश्वरैः

ājagāma ha bhūrloke miśrakaṁ naimiṣaṁ vanam tatrāsau satkṛtaścāpi śaunakādyairmunīśvaraiḥ

भूर्लोक में मिश्रित नैमिष वन को प्रस्थान किया। वहाँ वे शौनक आदि मुनीश्वरों द्वारा सत्कृत हुए।

श्लोक 16 (padma.5.75.16)

पृष्टश्चाप्यागतो ब्रह्मन्कुतस्त्वमधुना वद । तच्छ्रुत्वा नारदः प्राह गोलोकादागतोऽस्म्यहम्

pṛṣṭaścāpyāgato brahmankutastvamadhunā vada tacchrutvā nāradaḥ prāha golokādāgato'smyaham

और पूछे जाने पर हे ब्रह्मन्! अब आप कहाँ से आए, बताइए यह सुनकर नारद ने कहा मैं गोलोक से आया हूँ,

श्लोक 17 (padma.5.75.17)

श्रुत्वा कृष्णमुखांभोजाद्वृंदावनरहस्यकम् । नारद उवाच- तत्र नानाविधाः प्रश्नाः कृताश्चैव पुनः पुनः

śrutvā kṛṣṇamukhāṁbhojādvṛṁdāvanarahasyakam nārada uvāca- tatra nānāvidhāḥ praśnāḥ kṛtāścaiva punaḥ punaḥ

कृष्ण के मुख-कमल से वृंदावन का रहस्य सुनकर। नारद बोले वहाँ अनेक प्रकार के प्रश्न बार-बार किए गए,

श्लोक 18 (padma.5.75.18)

समस्ता मनवस्तत्र योगाश्चैव मया श्रुताः । तानेव कथयिष्यामि यथाप्रश्नं च तत्त्वतः

samastā manavastatra yogāścaiva mayā śrutāḥ tāneva kathayiṣyāmi yathāpraśnaṁ ca tattvataḥ

सारे मंत्र और योग वहाँ मैंने सुने। मैं वही तत्त्वतः, प्रश्न के अनुसार कहूँगा।

श्लोक 19 (padma.5.75.19)

शौनकादय ऊचुः - वृंदारण्यरहस्यं हि यदुक्तं ब्रह्मणा त्वयि । तदस्माकं समाचक्ष्व यद्यस्मासु कृपा तव

śaunakādaya ūcuḥ - vṛṁdāraṇyarahasyaṁ hi yaduktaṁ brahmaṇā tvayi tadasmākaṁ samācakṣva yadyasmāsu kṛpā tava

शौनक आदि बोले वृंदारण्य का जो रहस्य ब्रह्मा ने आपसे कहा था, वह हमें बताइए, यदि हम पर आपकी कृपा हो।

श्लोक 20 (padma.5.75.20)

नारद उवाच- कदाचित्सरयूतीरे दृष्टोऽस्माभिश्च गौतमः । मनस्वी च महादुःखी चिंताकुलितचेतनः

nārada uvāca- kadācitsarayūtīre dṛṣṭo'smābhiśca gautamaḥ manasvī ca mahāduḥkhī ciṁtākulitacetanaḥ

नारद बोले एक बार सरयू तट पर हमने गौतम को देखा, मनस्वी और अत्यंत दुःखी, चिंता से आकुल चित्तवाले।

श्लोक 21 (padma.5.75.21)

मां दृष्ट्वा गौतमो देवः पपात धरणीतले । उत्तिष्ठ वत्सवत्सेति तमुवाचाहमेव हि

māṁ dṛṣṭvā gautamo devaḥ papāta dharaṇītale uttiṣṭha vatsavatseti tamuvācāhameva hi

मुझे देखकर देव गौतम धरती पर गिर पड़े। उठो वत्स, उठो! यह मैंने ही उनसे कहा।

श्लोक 22 (padma.5.75.22)

कथं भवान्मनस्वीति प्रोच्य तां यदि रोचते । गौतम उवाच- श्रुतं तव मुखादेव कृष्णतत्त्वं च तादृशम्

kathaṁ bhavānmanasvīti procya tāṁ yadi rocate gautama uvāca- śrutaṁ tava mukhādeva kṛṣṇatattvaṁ ca tādṛśam

आप इतने चिंतित क्यों हैं यह कहा, यदि उन्हें रुचिकर हो। गौतम बोले आपके ही मुख से मैंने कृष्ण-तत्त्व सुना है, ऐसा ही,

श्लोक 23 (padma.5.75.23)

द्वारकाख्यं माथुराख्यं रहस्यं बहुशो मया । वृंदावनरहस्यं तु न श्रुतं त्वन्मुखांबुजात्

dvārakākhyaṁ māthurākhyaṁ rahasyaṁ bahuśo mayā vṛṁdāvanarahasyaṁ tu na śrutaṁ tvanmukhāṁbujāt

द्वारका और मथुरा का रहस्य मुझसे अनेक बार, किंतु वृंदावन का रहस्य मैंने आपके मुख-कमल से नहीं सुना,

श्लोक 24 (padma.5.75.24)

यतो मे मनसः स्थैर्य्यं भविष्यति च सद्गुरो । नारद उवाच- इदं तु परमं गुह्यं रहस्यातिरहस्यकम्

yato me manasaḥ sthairyyaṁ bhaviṣyati ca sadguro nārada uvāca- idaṁ tu paramaṁ guhyaṁ rahasyātirahasyakam

जिससे मेरे मन को स्थिरता प्राप्त हो, हे सद्गुरु! नारद बोले यह तो परम गुह्य, रहस्यों का भी रहस्य है,

श्लोक 25 (padma.5.75.25)

पुरा मे ब्रह्मणा प्रोक्तं तादृग्वृंदावनोद्भवम् । रहस्यं वद देवेश वृंदारण्यस्य मे पितः

purā me brahmaṇā proktaṁ tādṛgvṛṁdāvanodbhavam rahasyaṁ vada deveśa vṛṁdāraṇyasya me pitaḥ

पूर्व में मुझे ब्रह्मा द्वारा वृंदावन की उत्पत्ति के इसी माप में कहा गया था। हे देवेश! मेरे पिता! वृंदारण्य का रहस्य कहिए।

श्लोक 26 (padma.5.75.26)

इतिजिज्ञासितं श्रुत्वा क्षणं मौनी स चाभवत् । ततो माऽह महाविष्णुं गच्छ वत्स प्रभुं मम

itijijñāsitaṁ śrutvā kṣaṇaṁ maunī sa cābhavat tato mā'ha mahāviṣṇuṁ gaccha vatsa prabhuṁ mama

यह जिज्ञासा सुनकर मैं क्षणभर मौन हो गया। तब उसने मुझसे कहा जाओ वत्स, मेरे प्रभु महाविष्णु के पास।

श्लोक 27 (padma.5.75.27)

मयापि तत्र गंतव्यं त्वया सह न संशयः । इत्युक्त्वा मां गृहीत्वा च गतो विष्णोश्च धामनि

mayāpi tatra gaṁtavyaṁ tvayā saha na saṁśayaḥ ityuktvā māṁ gṛhītvā ca gato viṣṇośca dhāmani

मुझे भी वहाँ जाना है, तुम्हारे साथ, इसमें संदेह नहीं। ऐसा कहकर मुझे लेकर वह विष्णु के धाम गया।

श्लोक 28 (padma.5.75.28)

महाविष्णौ च कथितं मयोक्तं यत्तदेव हि । तच्छ्रुत्वा च महाविष्णुः स्वयं भुवमथादिशत्

mahāviṣṇau ca kathitaṁ mayoktaṁ yattadeva hi tacchrutvā ca mahāviṣṇuḥ svayaṁ bhuvamathādiśat

महाविष्णु को भी मैंने जो कहा था, वही कहा गया। यह सुनकर महाविष्णु ने स्वयं भूमि (ब्रह्मा) को आदेश दिया।

श्लोक 29 (padma.5.75.29)

त्वमेवादेशतो मह्यं नीत्वा वै नारदं मुनिम् । स्नानाय विनियुंक्ष्वामुं सरस्यमृतसंज्ञके

tvamevādeśato mahyaṁ nītvā vai nāradaṁ munim snānāya viniyuṁkṣvāmuṁ sarasyamṛtasaṁjñake

तुम स्वयं, मेरे आदेश से, नारद मुनि को ले जाकर, अमृत नामक सरोवर में स्नान के लिए नियुक्त करो।

श्लोक 30 (padma.5.75.30)

महाविष्णुसमादिष्टः स्वयंभूर्मां तथाकरोत् । तत्रामृतसरश्चाहं प्रविश्य स्नानमाचरम्

mahāviṣṇusamādiṣṭaḥ svayaṁbhūrmāṁ tathākarot tatrāmṛtasaraścāhaṁ praviśya snānamācaram

महाविष्णु द्वारा आदिष्ट स्वयंभू (ब्रह्मा) ने मेरे साथ वैसा ही किया। मैं उस अमृत-सरोवर में प्रवेश करके स्नान करने लगा।

श्लोक 31 (padma.5.75.31)

तत्क्षणात्तत्सरः पारे योषितां सविधेऽभवम् । सर्वलक्षणसपन्ना योषिद्रूपातिविस्मिता

tatkṣaṇāttatsaraḥ pāre yoṣitāṁ savidhe'bhavam sarvalakṣaṇasapannā yoṣidrūpātivismitā

उसी क्षण मैं उस सरोवर के पार, स्त्रियों के निकट पहुँच गया। सभी लक्षणों से संपन्न, स्त्री-रूप से अत्यंत विस्मित।

श्लोक 32 (padma.5.75.32)

मां दृष्ट्वा ताः समायांतीमपृच्छंश्च मुहुर्मुहुः । स्त्रिय ऊचुः - का त्वं कुतः समायाता कथयात्मविचेष्टितम्

māṁ dṛṣṭvā tāḥ samāyāṁtīmapṛcchaṁśca muhurmuhuḥ striya ūcuḥ - kā tvaṁ kutaḥ samāyātā kathayātmaviceṣṭitam

मुझे आते देखकर वे बार-बार पूछने लगीं। स्त्रियाँ बोलीं तुम कौन हो, कहाँ से आई हो, अपनी चेष्टा बताओ।

श्लोक 33 (padma.5.75.33)

तासां प्रियकथां श्रुत्वा मयोक्तं तन्निशामय । कुतः कोऽहं समायातः कथं वा योषिदाकृतिः

tāsāṁ priyakathāṁ śrutvā mayoktaṁ tanniśāmaya kutaḥ ko'haṁ samāyātaḥ kathaṁ vā yoṣidākṛtiḥ

उनकी प्रिय बातें सुनकर मैंने जो कहा, वह सुनो कहाँ से, कौन मैं आई, कैसे स्त्री-रूप हो गया?

श्लोक 34 (padma.5.75.34)

स्वप्नवद्दृश्यते सर्वं किं वा मुग्धोऽस्मि भूतले । तच्छ्रुत्वा मद्वचो देवी प्रोवाच मधुरस्वनैः

svapnavaddṛśyate sarvaṁ kiṁ vā mugdho'smi bhūtale tacchrutvā madvaco devī provāca madhurasvanaiḥ

सब कुछ स्वप्न जैसा दिखता है, या क्या मैं भूतल पर मोहित हूँ? मेरा यह वचन सुनकर देवी ने मधुर स्वरों में कहा,

श्लोक 35 (padma.5.75.35)

वृंदानाम्नी पुरी चेयं कृष्णचंद्रप्रिया सदा । अहं च ललितादेवी तुर्यातीता च निष्कला

vṛṁdānāmnī purī ceyaṁ kṛṣṇacaṁdrapriyā sadā ahaṁ ca lalitādevī turyātītā ca niṣkalā

यह वृंदा नाम की पुरी है, सदा कृष्णचंद्र की प्रिया। मैं ललिता देवी हूँ, तुरीय से भी अतीत, निष्कल।

श्लोक 36 (padma.5.75.36)

इत्युक्त्वा च महादेवी करुणा सांद्रमानसा । मां प्रत्याह पुनर्देवी समागच्छ मया सह

ityuktvā ca mahādevī karuṇā sāṁdramānasā māṁ pratyāha punardevī samāgaccha mayā saha

ऐसा कहकर वह महादेवी, हृदय में सघन करुणा लिए, मुझसे फिर बोलीं आओ, मेरे साथ चलो।

श्लोक 37 (padma.5.75.37)

अन्याश्च योषितः सर्वाः कृष्णपादपरायणाः । ताश्च मां प्रवदंत्येवं समागच्छानया सह

anyāśca yoṣitaḥ sarvāḥ kṛṣṇapādaparāyaṇāḥ tāśca māṁ pravadaṁtyevaṁ samāgacchānayā saha

अन्य सभी स्त्रियाँ भी कृष्ण-चरणों में परायण हैं। वे भी मुझसे यही कहने लगीं इसके साथ आओ।

श्लोक 38 (padma.5.75.38)

ततोनुकृष्णचंद्रस्य चतुर्दशाक्षरो मनुः । कृपया कथितस्तस्या देव्याश्चापि महात्मनः

tatonukṛṣṇacaṁdrasya caturdaśākṣaro manuḥ kṛpayā kathitastasyā devyāścāpi mahātmanaḥ

तब कृपापूर्वक उस महात्मा देवी द्वारा मुझे कृष्णचंद्र का चौदह-अक्षरी मंत्र बताया गया।

श्लोक 39 (padma.5.75.39)

तत्क्षणादेव तत्साम्यमलभं विविधोपमा । ताभिः सह गतास्तत्र यत्र कृष्णः सनातनः

tatkṣaṇādeva tatsāmyamalabhaṁ vividhopamā tābhiḥ saha gatāstatra yatra kṛṣṇaḥ sanātanaḥ

उसी क्षण मुझे उनकी सामीप्य-स्थिति प्राप्त हो गई, नाना उपमाओं सहित। उनके साथ मैं वहाँ गया, जहाँ सनातन कृष्ण थे,

श्लोक 40 (padma.5.75.40)

केवलं सच्चिदानंदः स्वयंयोषिन्मयः प्रभुः । योषिदानंदहृदयो दृष्ट्वा मां प्राब्रवीन्मुहुः

kevalaṁ saccidānaṁdaḥ svayaṁyoṣinmayaḥ prabhuḥ yoṣidānaṁdahṛdayo dṛṣṭvā māṁ prābravīnmuhuḥ

केवल सच्चिदानंद, स्वयं स्त्री-स्वरूपमय प्रभु। स्त्रियों में आनंदित हृदयवाले उन्होंने मुझे देखकर बार-बार कहा,

श्लोक 41 (padma.5.75.41)

समागच्छ प्रिये कांते भक्त्या मां परिरंभय । रेमे वर्षप्रमाणेन तत्र चैव द्विजोत्तम

samāgaccha priye kāṁte bhaktyā māṁ pariraṁbhaya reme varṣapramāṇena tatra caiva dvijottama

आओ, हे प्रिये! हे कांते! भक्तिपूर्वक मुझसे आलिंगन करो। हे द्विजोत्तम! मैं वहाँ एक वर्ष के प्रमाण तक रमण करता रहा।

श्लोक 42 (padma.5.75.42)

तदोक्तं रमणेशेन तां देवीं राधिकां प्रति । इयं मे प्रकृतिस्तत्र चासीन्नारदरूपधृक्

tadoktaṁ ramaṇeśena tāṁ devīṁ rādhikāṁ prati iyaṁ me prakṛtistatra cāsīnnāradarūpadhṛk

तब रमणेश्वर (कृष्ण) ने उस देवी राधिका से कहा यह मेरी प्रकृति है, जो यहाँ नारद-रूप धारण किए हुए थी।

श्लोक 43 (padma.5.75.43)

नीत्वामृतसरो रम्यं स्नानार्थं संनियोजय । तया मे रमणस्यांते गदितं प्रियभाषितम्

nītvāmṛtasaro ramyaṁ snānārthaṁ saṁniyojaya tayā me ramaṇasyāṁte gaditaṁ priyabhāṣitam

इसे रमणीय अमृत-सरोवर में ले जाकर स्नान के लिए नियुक्त करो। उन्होंने मेरे रमण के अंत में मुझसे यह प्रिय वचन कहा,

श्लोक 44 (padma.5.75.44)

अहं च ललितादेवी राधिकाया च गीयते । अहं च वासुदेवाख्यो नित्यं कामकलात्मकः

ahaṁ ca lalitādevī rādhikāyā ca gīyate ahaṁ ca vāsudevākhyo nityaṁ kāmakalātmakaḥ

मैं ललिता देवी हूँ, राधिका की ही कही जाती हूँ। और मैं वासुदेव नाम से, नित्य काम-कला-स्वरूप हूँ।

श्लोक 45 (padma.5.75.45)

सत्यं योषित्स्वरूपोऽहं योषिच्चाहं सनातनी । अहं च ललितादेवी पुंरूपा कृष्णविग्रहा

satyaṁ yoṣitsvarūpo'haṁ yoṣiccāhaṁ sanātanī ahaṁ ca lalitādevī puṁrūpā kṛṣṇavigrahā

सत्य ही मैं स्त्री-स्वरूप हूँ, और स्त्री होते हुए भी मैं सनातन हूँ। और मैं ललिता देवी, पुरुष-रूप में कृष्ण की ही विग्रह हूँ।

श्लोक 46 (padma.5.75.46)

आवयोरंतरं नास्ति सत्यंसत्यं हि नारद । एवं यो वेत्ति मे तत्त्वं समयं च तथा मनुम्

āvayoraṁtaraṁ nāsti satyaṁsatyaṁ hi nārada evaṁ yo vetti me tattvaṁ samayaṁ ca tathā manum

हम दोनों में कोई भेद नहीं है, यह सत्य ही सत्य है, हे नारद! जो कोई इस प्रकार मेरे तत्त्व, समय और मनु को जानता है,

श्लोक 47 (padma.5.75.47)

स समाचारसंकेतं ललिता वत्स मे प्रियः । इदं वृंदावनं नाम रहस्यं मम वै गृहम्

sa samācārasaṁketaṁ lalitā vatsa me priyaḥ idaṁ vṛṁdāvanaṁ nāma rahasyaṁ mama vai gṛham

वह आचार-संकेत को जानता है ललिता मेरी प्रिय है, हे वत्स! यह वृंदावन नाम मेरा गोपनीय गृह ही है।

श्लोक 48 (padma.5.75.48)

न प्रकाश्यं कदा कुत्र वक्तव्यं न पशौ क्वचित् । ततोऽनुराधिकादेवी मां नीत्वा तत्सरोवरे

na prakāśyaṁ kadā kutra vaktavyaṁ na paśau kvacit tato'nurādhikādevī māṁ nītvā tatsarovare

इसे कभी, कहीं भी प्रकाशित नहीं करना चाहिए, किसी नीच के आगे नहीं कहना चाहिए। फिर राधिका देवी मुझे उस सरोवर में ले जाकर,

श्लोक 49 (padma.5.75.49)

स्थित्वा सा कृष्णचंद्रस्य चरणांते गता पुनः । ततो निमज्जनादेव नारदोऽहमुपागतः

sthitvā sā kṛṣṇacaṁdrasya caraṇāṁte gatā punaḥ tato nimajjanādeva nārado'hamupāgataḥ

वहाँ रहकर, पुनः कृष्णचंद्र के चरणों में चली गईं। फिर उसी निमज्जन से मैं पुनः नारद बनकर,

श्लोक 50 (padma.5.75.50)

वीणाहस्तो गानपरस्तद्रहस्यं मुहुर्मुदा । स्वयंभुवं नमस्कृत्य तत्रागां विष्णुपार्षदम्

vīṇāhasto gānaparastadrahasyaṁ muhurmudā svayaṁbhuvaṁ namaskṛtya tatrāgāṁ viṣṇupārṣadam

वीणा हाथ में, गान में तत्पर, उस रहस्य का बार-बार आनंद लेता हुआ। स्वयंभू को नमस्कार करके मैं वहाँ विष्णु-पार्षद के पास गया।

श्लोक 51 (padma.5.75.51)

स्वयंभुवा तथा दृष्टं नोक्तं किंचित्तदा पुनः । इति ते कथितं वत्स सुगोप्यं च मया त्वयि

svayaṁbhuvā tathā dṛṣṭaṁ noktaṁ kiṁcittadā punaḥ iti te kathitaṁ vatsa sugopyaṁ ca mayā tvayi

स्वयंभू ने भी वैसा ही देखा, पर तब कुछ और नहीं कहा गया। इस प्रकार मैंने तुम्हें, हे वत्स! जो मुझसे अत्यंत गोप्य रखा गया था, वह कहा है।

श्लोक 52 (padma.5.75.52)

त्वयापि कृष्णचंद्रस्य केवलं धामचित्कलम् । गोपनीयं प्रयत्नेन मातुर्जारइव प्रियम्

tvayāpi kṛṣṇacaṁdrasya kevalaṁ dhāmacitkalam gopanīyaṁ prayatnena māturjāraiva priyam

तुम्हें भी कृष्णचंद्र के इस केवल चिन्मय धाम की, माता के प्रिय गुप्त रहस्य के समान, यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 53 (padma.5.75.53)

यथा प्रोक्तं मया शिष्ये गौतमे सरहस्यकम् । तथा भवत्सु कार्त्स्न्येन कथितं चातिगोपितम्

yathā proktaṁ mayā śiṣye gautame sarahasyakam tathā bhavatsu kārtsnyena kathitaṁ cātigopitam

जैसा मैंने अपने शिष्य गौतम से रहस्य सहित कहा, वैसा ही तुम सबको भी संपूर्णता से, अत्यंत गोपित रूप से कहा गया है।

श्लोक 54 (padma.5.75.54)

यत्र कुत्र कदाचित्तु प्रकाश्यं मुनिपुंगवाः । तदा शापो भवेद्विप्राः कृष्णचंद्रस्य निश्चितम्

yatra kutra kadācittu prakāśyaṁ munipuṁgavāḥ tadā śāpo bhavedviprāḥ kṛṣṇacaṁdrasya niścitam

यदि कहीं भी, कभी भी इसे प्रकाशित किया गया, हे श्रेष्ठ मुनियो! तो हे विप्रो! निश्चय ही कृष्णचंद्र का शाप होगा।

श्लोक 55 (padma.5.75.55)

इमं कृष्णस्य लीलाभिर्युतमध्यायमुत्तमम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमं पदम्

imaṁ kṛṣṇasya līlābhiryutamadhyāyamuttamam yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sa yāti paramaṁ padam

कृष्ण की लीलाओं से युक्त इस उत्तम अध्याय को जो पढ़े या सुने, वह परम पद को प्राप्त होता है।

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