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पाताल खण्ड · अध्याय 77

श्रीकृष्ण-रूप-वर्णन

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

श्लोक 1 (padma.5.77.1)

पार्वत्युवाच- विस्तरेण समाचक्ष्व नामार्थपदगौरवम् । ईश्वरस्य स्वरूपं च तत्स्थानानां विभूतयः

pārvatyuvāca- vistareṇa samācakṣva nāmārthapadagauravam īśvarasya svarūpaṁ ca tatsthānānāṁ vibhūtayaḥ

पार्वती बोलीं ईश्वर के नाम, अर्थ और पद के गौरव को विस्तार से कहिए, और उनके स्वरूप तथा उन स्थानों की विभूतियों को भी।

श्लोक 2 (padma.5.77.2)

तद्विष्णोः परमं धाम व्यूहभेदास्तथा हरेः । निर्वाणाख्याहि तत्त्वेन मम सर्वं सुरेश्वर

tadviṣṇoḥ paramaṁ dhāma vyūhabhedāstathā hareḥ nirvāṇākhyāhi tattvena mama sarvaṁ sureśvara

विष्णु के उस परम धाम को, हरि के व्यूह-भेदों को भी; निर्वाण नामक तत्त्व को यथार्थ रूप से मुझे सब कहिए, हे सुरेश्वर!

श्लोक 3 (padma.5.77.3)

ईश्वर उवाच- सारे वृंदावने कृष्णं गोपीकोटिभिरावृतम् । तत्र गंगा पराशक्तिस्तत्स्थमानंदकाननम्

īśvara uvāca- sāre vṛṁdāvane kṛṣṇaṁ gopīkoṭibhirāvṛtam tatra gaṁgā parāśaktistatsthamānaṁdakānanam

ईश्वर बोले वृंदावन के सार में कृष्ण करोड़ों गोपियों से घिरे हैं; वहाँ गंगा परा शक्ति के रूप में हैं, वहीं आनंद-कानन स्थित है,

श्लोक 4 (padma.5.77.4)

नाना सुकुसुमामोदसमीरसुरभीकृतम् । कलिंदतनया दिव्यतरंगरागशीतलम्

nānā sukusumāmodasamīrasurabhīkṛtam kaliṁdatanayā divyataraṁgarāgaśītalam

नाना सुंदर पुष्पों की सुगंधित वायु से सुरभित, कालिंद-तनया (यमुना) की दिव्य रंगीन तरंगों से शीतल,

श्लोक 5 (padma.5.77.5)

सनकाद्यैर्भागवतैः संसृष्टं मुनिपुंगवैः । आह्लादिमधुरारावैर्गोवृंदैरभिमंडितम्

sanakādyairbhāgavataiḥ saṁsṛṣṭaṁ munipuṁgavaiḥ āhlādimadhurārāvairgovṛṁdairabhimaṁḍitam

सनक आदि भागवत मुनिश्रेष्ठों से संयुक्त, आह्लाददायी मधुर ध्वनि करते गौ-समूहों से सुशोभित,

श्लोक 6 (padma.5.77.6)

रम्यस्रग्भूषणोपेतैर्नृत्यद्भिर्बालकैर्वृतम् । तत्र श्रीमान्कल्पतरुर्जांबूनदपरिच्छदः

ramyasragbhūṣaṇopetairnṛtyadbhirbālakairvṛtam tatra śrīmānkalpatarurjāṁbūnadaparicchadaḥ

सुंदर माला-आभूषणों से युक्त नाचते बालकों से घिरा हुआ। वहाँ स्वर्ण-आवरणवाला श्रीमान कल्पवृक्ष है,

श्लोक 7 (padma.5.77.7)

नानारत्नप्रवालाढ्यो नानामणिफलोज्ज्वलः । तस्य मूले रत्नवेदी रत्नदीधितिदीपिता

nānāratnapravālāḍhyo nānāmaṇiphalojjvalaḥ tasya mūle ratnavedī ratnadīdhitidīpitā

नाना रत्नों-मूँगों से समृद्ध, नाना मणि-फलों से उज्ज्वल। उसके मूल में रत्न-वेदी, रत्नों की किरणों से दीप्त है।

श्लोक 8 (padma.5.77.8)

तत्र त्रयीमयं रत्नसिंहासनमनुत्तमम् । तत्रासीनं जगन्नाथं त्रिगुणातीतमव्ययम्

tatra trayīmayaṁ ratnasiṁhāsanamanuttamam tatrāsīnaṁ jagannāthaṁ triguṇātītamavyayam

वहाँ त्रयी (तीनों वेदों) के सार से बना अनुपम रत्न-सिंहासन है; उस पर विराजमान जगन्नाथ, त्रिगुणातीत, अव्यय,

श्लोक 9 (padma.5.77.9)

कोटिचंद्रप्रतीकाशं कोटिभास्करभास्वरम् । कोटिकंदर्पलावण्यं भासयन्तं दिशोदश

koṭicaṁdrapratīkāśaṁ koṭibhāskarabhāsvaram koṭikaṁdarpalāvaṇyaṁ bhāsayantaṁ diśodaśa

करोड़ों चंद्रमाओं के समान, करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी, करोड़ों कामदेवों के लावण्य वाले, दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए,

श्लोक 10 (padma.5.77.10)

त्रिनेत्रं द्विभुजं गौरं तप्तजांबूनदप्रभम् । श्लिष्यमाणमंगनाभिः सदामानं च सर्वशः

trinetraṁ dvibhujaṁ gauraṁ taptajāṁbūnadaprabham śliṣyamāṇamaṁganābhiḥ sadāmānaṁ ca sarvaśaḥ

त्रिनेत्र, द्विभुज, गौर, तपे स्वर्ण की कांतिवाले, स्त्रियों द्वारा आलिंगित, सर्वदा सर्वथा सम्मानित,

श्लोक 11 (padma.5.77.11)

ब्रह्माद्यैः सनकाद्यैश्च ध्येयं भक्तवशीकृतम् । सदाघूर्णितनेत्राभिर्नृत्यंतीभिर्महोत्सवैः

brahmādyaiḥ sanakādyaiśca dhyeyaṁ bhaktavaśīkṛtam sadāghūrṇitanetrābhirnṛtyaṁtībhirmahotsavaiḥ

ब्रह्मा आदि, सनक आदि द्वारा ध्येय, भक्तों के वशीभूत; सदा घूर्णित नेत्रोंवाली, नाचती हुई, महोत्सवों में रत,

श्लोक 12 (padma.5.77.12)

चुंबंतीभिर्हसंतीभिः श्लिष्यंतीभिर्मुहुर्मुहुः । अवाप्तगोपीदेहाभिः श्रुतिभिः कोटिकोटिभिः

cuṁbaṁtībhirhasaṁtībhiḥ śliṣyaṁtībhirmuhurmuhuḥ avāptagopīdehābhiḥ śrutibhiḥ koṭikoṭibhiḥ

चूमती, हँसती, बार-बार आलिंगन करती, गोपी-देह प्राप्त की हुई करोड़ों-करोड़ श्रुतियों से,

श्लोक 13 (padma.5.77.13)

तत्पादांबुजमाध्वीकचित्ताभिः परितो वृतम् । तासां तु मध्ये या देवी तप्तचामीकरप्रभा

tatpādāṁbujamādhvīkacittābhiḥ parito vṛtam tāsāṁ tu madhye yā devī taptacāmīkaraprabhā

उनके चरण-कमल की मधुरता में लीन चित्तवाली, चारों ओर से घिरे हुए। उन सबके मध्य जो देवी हैं, तपे स्वर्ण की कांतिवाली,

श्लोक 14 (padma.5.77.14)

द्योतमाना दिशः सर्वाः कुर्वती विद्युदुज्ज्वलाः । प्रधानं या भगवती यया सर्वमिदं ततम्

dyotamānā diśaḥ sarvāḥ kurvatī vidyudujjvalāḥ pradhānaṁ yā bhagavatī yayā sarvamidaṁ tatam

सभी दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, बिजली-सी उज्ज्वल; जो प्रधान भगवती हैं, जिनसे यह सब कुछ व्याप्त है,

श्लोक 15 (padma.5.77.15)

सृष्टिस्थित्यंतरूपा या विद्या विद्यात्रयीपरा । स्वरूपा शक्तिरुपा च मायारूपा च चिन्मयी

sṛṣṭisthityaṁtarūpā yā vidyā vidyātrayīparā svarūpā śaktirupā ca māyārūpā ca cinmayī

सृष्टि-स्थिति-प्रलय का स्वरूप, तीनों वेदों से परे विद्या, अपना ही स्वरूप, शक्ति-स्वरूपा, माया-स्वरूपा, चिन्मयी,

श्लोक 16 (padma.5.77.16)

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां देहकारणकारणम् । चराचरं जगत्सर्वं यन्मायापरिरंभितम्

brahmaviṣṇuśivādīnāṁ dehakāraṇakāraṇam carācaraṁ jagatsarvaṁ yanmāyāpariraṁbhitam

ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि के देह के कारण की भी कारण; यह सारा चराचर जगत जिनकी माया से घिरा है,

श्लोक 17 (padma.5.77.17)

वृंदावनेश्वरी नाम्ना राधा धात्रानुकारणात् । तामालिंग्य वसंतं तं मुदा वृंदावनेश्वरम्

vṛṁdāvaneśvarī nāmnā rādhā dhātrānukāraṇāt tāmāliṁgya vasaṁtaṁ taṁ mudā vṛṁdāvaneśvaram

वे वृंदावनेश्वरी नाम से, धात्री-भाव के कारण राधा कहलाती हैं। उनका आलिंगन करके, हर्षपूर्वक वहाँ बसते हुए वृंदावनेश्वर का,

श्लोक 18 (padma.5.77.18)

अन्योन्यचुंबनाश्लेष मदावेशविघूर्णितम् । ध्यायेदेवं कृष्णदेवं स च सिद्धिमवाप्नुयात्

anyonyacuṁbanāśleṣa madāveśavighūrṇitam dhyāyedevaṁ kṛṣṇadevaṁ sa ca siddhimavāpnuyāt

परस्पर चुंबन-आलिंगन के मद-आवेश से घूर्णित उस कृष्ण-देव का इस प्रकार ध्यान करना चाहिए; ऐसा करने वाला सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 19 (padma.5.77.19)

मंत्रराजमिमं गुह्यं तस्य मंत्रं च मंत्रवित् । यो जपेच्छृणुयाद्वापि स महात्मा सुदुर्ल्लभः

maṁtrarājamimaṁ guhyaṁ tasya maṁtraṁ ca maṁtravit yo japecchṛṇuyādvāpi sa mahātmā sudurllabhaḥ

इस गुह्य मंत्रराज और उसके मंत्र को जो मंत्रवेत्ता जपता है या सुनता है, वह अत्यंत दुर्लभ महात्मा हो जाता है।

श्लोक 20 (padma.5.77.20)

राधिंका चित्ररेखा च चंद्रा मदनसुंदरी । श्रीप्रिया श्रीमधुमती शशिरेखा हरिप्रिया

rādhiṁkā citrarekhā ca caṁdrā madanasuṁdarī śrīpriyā śrīmadhumatī śaśirekhā haripriyā

राधिका, चित्ररेखा, चंद्रा, मदनसुंदरी, श्रीप्रिया, श्रीमधुमती, शशिरेखा, हरिप्रिया —

श्लोक 21 (padma.5.77.21)

सुवर्णशोभा संमोहा प्रेमरोमांचराजिता । वैवर्ण्यस्वेदसंयुक्ता भावासक्ता प्रियंवदा

suvarṇaśobhā saṁmohā premaromāṁcarājitā vaivarṇyasvedasaṁyuktā bhāvāsaktā priyaṁvadā

स्वर्ण-कांति से युक्त, सर्व-मोहक, प्रेम के रोमांच की पंक्तियों से युक्त, विवर्णता-स्वेद से युक्त, भाव में आसक्त, प्रियंवदा,

श्लोक 22 (padma.5.77.22)

सुवर्णमालिनी शांता सुरासरसिका तथा । सर्वस्त्री जीवना दीनवत्सला विमलाशया

suvarṇamālinī śāṁtā surāsarasikā tathā sarvastrī jīvanā dīnavatsalā vimalāśayā

समस्त स्त्रियों का जीवन, दीनों पर वत्सल, निर्मल आशयवाली, जिनका नाम पीने मात्र से अमृत हो, वे राधा कही जाती हैं।

श्लोक 23 (padma.5.77.23)

निपीतनामपीयूषा सा राधा परिकीर्तिता । सुदीर्घस्मितसंयुक्ता तप्तचामीकरप्रभा

nipītanāmapīyūṣā sā rādhā parikīrtitā sudīrghasmitasaṁyuktā taptacāmīkaraprabhā

दीर्घ मुस्कान से युक्त, तपे स्वर्ण की कांतिवाली, प्रेम की मूर्च्छित नदी राधा, उत्तम वर्णवाली, अंजन-सज्जित नेत्रोंवाली,

श्लोक 24 (padma.5.77.24)

मूर्च्छत्प्रेमनदी राधा वरणा लोचनांजना । मायामात्सर्यसंयुक्ता दानसाम्राज्य जीवना

mūrcchatpremanadī rādhā varaṇā locanāṁjanā māyāmātsaryasaṁyuktā dānasāmrājya jīvanā

मान (ईर्ष्या) से युक्त, दान के साम्राज्य से जीवित; रति के उत्सव और संग्राम की स्वामिनी चित्ररेखा कही गई है।

श्लोक 25 (padma.5.77.25)

सुरतोत्सव संग्रामा चित्ररेखा प्रकीर्तिता । गौरांगी नातिदीर्घा च सदा वादनतत्परा

suratotsava saṁgrāmā citrarekhā prakīrtitā gaurāṁgī nātidīrghā ca sadā vādanatatparā

गौरांगी, अधिक लंबी नहीं, सदा वादन में तत्पर, दीनता और अनुराग का नृत्य करने वाली, मूर्च्छा और रोमांच से विह्वल,

श्लोक 26 (padma.5.77.26)

दैन्यानुरागनटना मूर्च्छारोमांचविह्वला । हरिदक्षिणपार्श्वस्था सर्वमंत्रप्रिया तथा

dainyānurāganaṭanā mūrcchāromāṁcavihvalā haridakṣiṇapārśvasthā sarvamaṁtrapriyā tathā

हरि के दाहिने पार्श्व में स्थित, सभी मंत्रों की प्रिय; कामदेव की मधुरता के लोभ से युक्त, वह चंद्रा कही गई है।

श्लोक 27 (padma.5.77.27)

अनंगलोभमाधुर्या चंद्रा सा परिकीर्तिता । सलीलमंथरगतिर्मंजुमुद्रित लोचना

anaṁgalobhamādhuryā caṁdrā sā parikīrtitā salīlamaṁtharagatirmaṁjumudrita locanā

लीलापूर्वक मंद गतिवाली, मधुर मुद्रा से बंद नेत्रोंवाली, प्रेम-धारा से उज्ज्वल-व्याप्त, बिखरे अंजन से सुशोभित,

श्लोक 28 (padma.5.77.28)

प्रेमधारोज्ज्वलाकीर्णा दलितांजन शोभना । कृष्णानुरागरसिका रासध्वनिसमुत्सुका

premadhārojjvalākīrṇā dalitāṁjana śobhanā kṛṣṇānurāgarasikā rāsadhvanisamutsukā

कृष्ण-अनुराग में रसिक, रास-ध्वनि की उत्सुक, अहंकार (आत्मविश्वास) से युक्त, मुख से चंद्रमा को भी निंदित करने वाली,

श्लोक 29 (padma.5.77.29)

अहंकारसमायुक्ता मुखनिंदितचंद्रमाः । मधुरालापचतुरा जितेंद्रियशिरोमणिः

ahaṁkārasamāyuktā mukhaniṁditacaṁdramāḥ madhurālāpacaturā jiteṁdriyaśiromaṇiḥ

मधुर वार्तालाप में चतुर, जितेंद्रियों में शिरोमणि, सुंदर मुस्कान से युक्त वह मदनसुंदरी है।

श्लोक 30 (padma.5.77.30)

सुंदरस्मितसंयुक्ता सा वै मदनसुंदरी । विविक्तरासरसिका श्यामा श्याममनोहरा

suṁdarasmitasaṁyuktā sā vai madanasuṁdarī viviktarāsarasikā śyāmā śyāmamanoharā

एकांत रास-रस में रसिक, श्यामा, श्याम (कृष्ण) के समान मनोहर; प्रेम और प्रेम-कटाक्ष से हरि के चित्त को मोहित करने वाली,

श्लोक 31 (padma.5.77.31)

प्रेम्णा प्रेमकटाक्षेण हरेश्चित्तविमोहनी । जितेंद्रिया जितक्रोधा सा प्रिया परिकीर्तिता

premṇā premakaṭākṣeṇa hareścittavimohanī jiteṁdriyā jitakrodhā sā priyā parikīrtitā

जितेंद्रिय, क्रोध पर विजयी, वह प्रिया कही गई है। तपे स्वर्ण जैसे गौर अंगोंवाली, लीला-गमन में सुंदर,

श्लोक 32 (padma.5.77.32)

सुतप्तस्वर्णगौरांगी लीलागमनसुंदरी । स्मरोत्थ प्रेमरोमांच वैचित्रमधुराकृतिः

sutaptasvarṇagaurāṁgī līlāgamanasuṁdarī smarottha premaromāṁca vaicitramadhurākṛtiḥ

काम के उठने से उत्पन्न प्रेम-रोमांच से विचित्र, मधुर आकृतिवाली,

श्लोक 33 (padma.5.77.33)

सुंदरस्मितसंयुक्त मुखनिंदितचंद्रमाः । मधुरालापचतुरा जितेंद्रियशिरोमणिः

suṁdarasmitasaṁyukta mukhaniṁditacaṁdramāḥ madhurālāpacaturā jiteṁdriyaśiromaṇiḥ

सुंदर मुस्कान से युक्त, मुख से चंद्रमा को निंदित करने वाली, मधुर वार्तालाप में चतुर, जितेंद्रियों में शिरोमणि,

श्लोक 34 (padma.5.77.34)

कीर्तिता सा मधुमती प्रेमसाधनतत्परा । संमोहज्वररोमांच प्रेमधारा समन्विता

kīrtitā sā madhumatī premasādhanatatparā saṁmohajvararomāṁca premadhārā samanvitā

वह मधुमती कही गई है, प्रेम-साधना में तत्पर; मोह-ज्वर के रोमांच और प्रेम-धारा से युक्त,

श्लोक 35 (padma.5.77.35)

दानधूलिविनोदा च रासध्वनि महानटी । शशिरेखा च विज्ञेया गोपालप्रेयसी सदा

dānadhūlivinodā ca rāsadhvani mahānaṭī śaśirekhā ca vijñeyā gopālapreyasī sadā

गुलाल-धूलि के विनोद से युक्त, रास-ध्वनि की महानर्तकी शशिरेखा जाननी चाहिए, सदा गोपाल की प्रिया।

श्लोक 36 (padma.5.77.36)

कृष्णात्मा सोत्तमा श्यामा मधुपिंगललोचना । तत्पादप्रेमसंमोहात्क्वचित्पुलकचुंबिता

kṛṣṇātmā sottamā śyāmā madhupiṁgalalocanā tatpādapremasaṁmohātkvacitpulakacuṁbitā

कृष्ण की आत्मा-स्वरूपा वह उत्तम श्यामा, मधु जैसे पीले-भूरे नेत्रोंवाली; उनके चरणों के प्रेम-मोह से कभी रोमांचित होकर चुंबित होती है।

श्लोक 37 (padma.5.77.37)

शिवकुंडे शिवानंदा नंदिनी देहिकातटे । रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृंदावने वने

śivakuṁḍe śivānaṁdā naṁdinī dehikātaṭe rukmiṇī dvāravatyāṁ tu rādhā vṛṁdāvane vane

वे शिव-कुंड में शिवानंदा, यमुना-तट पर नंदिनी; द्वारावती में रुक्मिणी, वृंदावन के वन में राधा,

श्लोक 38 (padma.5.77.38)

देवकी मथुरायां तु जाता मे परमेश्वरी । चंद्रकूटे तथा सीता विंध्ये विंध्यनिवासिनी

devakī mathurāyāṁ tu jātā me parameśvarī caṁdrakūṭe tathā sītā viṁdhye viṁdhyanivāsinī

मथुरा में देवकी बनकर मेरी परमेश्वरी उत्पन्न हुईं; चंद्रकूट में सीता, विंध्य में विंध्य-निवासिनी,

श्लोक 39 (padma.5.77.39)

वाराणस्यां विशालाक्षी विमला पुरुषोत्तमे । वृंदावनाधिपत्यं च दत्तं तस्यै प्रसीदता

vārāṇasyāṁ viśālākṣī vimalā puruṣottame vṛṁdāvanādhipatyaṁ ca dattaṁ tasyai prasīdatā

वाराणसी में विशालाक्षी, पुरुषोत्तम (पुरी) में विमला; और उन प्रसन्न होने वाली को वृंदावन का आधिपत्य,

श्लोक 40 (padma.5.77.40)

कृष्णेनान्यत्र देवी तु राधा वृंदावने वने । नित्यानंदतनुः शौरिर्योऽशरीरीति भाष्यते

kṛṣṇenānyatra devī tu rādhā vṛṁdāvane vane nityānaṁdatanuḥ śauriryo'śarīrīti bhāṣyate

कृष्ण द्वारा अन्यत्र दिया गया, हे देवी! किंतु राधा वृंदावन के वन में ही (नित्य) हैं। नित्यानंद-देहधारी शौरि, जो अशरीरी कहे जाते हैं,

श्लोक 41 (padma.5.77.41)

वाय्वग्निनाकभूमीनामंगाधिष्ठितदेवता । निरूप्यते ब्रह्मणोऽपि तथा गोविंदविग्रहः

vāyvagninākabhūmīnāmaṁgādhiṣṭhitadevatā nirūpyate brahmaṇo'pi tathā goviṁdavigrahaḥ

वायु, अग्नि, आकाश, भूमि के अंग-अधिष्ठाता देवताओं के समान, ब्रह्म से भी, गोविंद का विग्रह ऐसा ही निरूपित किया जाता है।

श्लोक 42 (padma.5.77.42)

सेंद्रियोऽपि यथा सूर्यस्तेजसा नोपलक्ष्यते । तथा कांतियुतः कृष्णः कालं मोहयति ध्रुवम्

seṁdriyo'pi yathā sūryastejasā nopalakṣyate tathā kāṁtiyutaḥ kṛṣṇaḥ kālaṁ mohayati dhruvam

जैसे तेजोमय सूर्य अपने तेज से अलग नहीं देखा जा सकता, वैसे ही कांतिमय कृष्ण निश्चय ही काल को भी मोहित करते हैं।

श्लोक 43 (padma.5.77.43)

न तस्य प्राकृती मूर्तिर्मेदोमांसास्थिसंभवा । योगी चैवेश्वरश्चान्यः सर्वात्मा नित्यविग्रहः

na tasya prākṛtī mūrtirmedomāṁsāsthisaṁbhavā yogī caiveśvaraścānyaḥ sarvātmā nityavigrahaḥ

उनका शरीर मेद-मांस-अस्थि से बना प्राकृत नहीं है; वे योगी हैं, ईश्वर हैं, सबसे अन्य, सर्वात्मा, नित्य-विग्रह हैं।

श्लोक 44 (padma.5.77.44)

काठिन्यं देवयोगेन करकाघृतयोरिव । कृष्णस्यामिततत्त्वस्य पादपृष्ठं न देवता

kāṭhinyaṁ devayogena karakāghṛtayoriva kṛṣṇasyāmitatattvasya pādapṛṣṭhaṁ na devatā

जैसे घी में कठोरता ब्रह्मा की हथेलियों में ही देवयोग से आती है, वैसे ही अपरिमित तत्त्ववाले कृष्ण का चरण-तल भी देवता से कम नहीं है।

श्लोक 45 (padma.5.77.45)

वृंदावनरजोवृंदे तत्र स्युर्विष्णुकोटयः । आनंदकिरणे वृंदव्याप्तविश्वकलानिधिः

vṛṁdāvanarajovṛṁde tatra syurviṣṇukoṭayaḥ ānaṁdakiraṇe vṛṁdavyāptaviśvakalānidhiḥ

वृंदावन की धूलि के कणों में करोड़ों विष्णु होते हैं; आनंद की किरण में, विश्व की समस्त कलाओं के निधि, समूह से व्याप्त,

श्लोक 46 (padma.5.77.46)

गुणात्मतात्मनि यथा जीवास्तत्किरणांगकाः । भुजद्वयवृतः कृष्णो न कदाचिच्चतुर्भुजः

guṇātmatātmani yathā jīvāstatkiraṇāṁgakāḥ bhujadvayavṛtaḥ kṛṣṇo na kadāciccaturbhujaḥ

जैसे गुणात्मक आत्मा में जीव उसकी किरणों के अंग हैं, वैसे ही (वे विष्णु उनकी किरणें हैं)। कृष्ण दो भुजाओं से घिरे रहते हैं, कभी चतुर्भुज नहीं।

श्लोक 47 (padma.5.77.47)

गोप्यैकया वृतस्तत्र परिक्रीडति सर्वदा । गोविंद एव पुरुषो ब्रह्माद्याः स्त्रिय एव च

gopyaikayā vṛtastatra parikrīḍati sarvadā goviṁda eva puruṣo brahmādyāḥ striya eva ca

वहाँ केवल एक गोपी से घिरे हुए वे सदा क्रीड़ा करते हैं। गोविंद ही एकमात्र पुरुष हैं, ब्रह्मा आदि तो मानो स्त्री ही हैं।

श्लोक 48 (padma.5.77.48)

तत एव स्वभावोयंऽप्रकृतेर्भाव ईश्वरः । पुरुषः प्रकृतिश्चाद्यौ राधावृंदावनेश्वरौ

tata eva svabhāvoyaṁ'prakṛterbhāva īśvaraḥ puruṣaḥ prakṛtiścādyau rādhāvṛṁdāvaneśvarau

इसीलिए यह स्वभाव है प्रकृति का यह भाव ही ईश्वर है। पुरुष और प्रकृति, दोनों आदि, राधा और वृंदावनेश्वर हैं।

श्लोक 49 (padma.5.77.49)

प्रकृतेर्विकृतं सर्वं विना वृंदावनेश्वरम्

prakṛtervikṛtaṁ sarvaṁ vinā vṛṁdāvaneśvaram

वृंदावनेश्वर के बिना प्रकृति का सारा विकार (परिवर्तन असंभव) है।

श्लोक 50 (padma.5.77.50)

समुद्भवेनैव समुद्भवेदिदं भेदं गतं तस्य विनाशतो हि । स्वर्णस्य नाशो न हि विद्यते तथा मत्स्यादिनाशेऽपि न कृष्णविच्युतिः

samudbhavenaiva samudbhavedidaṁ bhedaṁ gataṁ tasya vināśato hi svarṇasya nāśo na hi vidyate tathā matsyādināśe'pi na kṛṣṇavicyutiḥ

उनके ही उद्भव से यह सब उत्पन्न होता है, उनके विनाश से ही यह भेद को प्राप्त होता है जैसे स्वर्ण का नाश नहीं होता, वैसे ही मत्स्य आदि (अवतारों) के नाश में भी कृष्ण से च्युति नहीं होती।

श्लोक 51 (padma.5.77.51)

त्रिगुणादिप्रपंचोऽयं वृंदावनविहारिणः । ऊर्म्मीवाब्धेस्तरंगस्य यथाब्धिर्नैव जायते

triguṇādiprapaṁco'yaṁ vṛṁdāvanavihāriṇaḥ ūrmmīvābdhestaraṁgasya yathābdhirnaiva jāyate

तीन गुणों आदि का यह सारा विस्तार वृंदावन-विहारी का ही है जैसे समुद्र की लहर से समुद्र भिन्न नहीं होता।

श्लोक 52 (padma.5.77.52)

न राधिका समा नारी न कृष्णसदृशः पुमान् । वयः परं न कैशोरात्स्वभावः प्रकृतेः परः

na rādhikā samā nārī na kṛṣṇasadṛśaḥ pumān vayaḥ paraṁ na kaiśorātsvabhāvaḥ prakṛteḥ paraḥ

राधिका के समान कोई स्त्री नहीं, कृष्ण के समान कोई पुरुष नहीं; किशोरावस्था से परे कोई आयु नहीं, प्रकृति के स्वभाव से परे कुछ नहीं।

श्लोक 53 (padma.5.77.53)

ध्येयं कैशोरकं ध्येयं वनं वृंदावनं वनम् । श्याममेव परं रूपमादिदेवं परो रसः

dhyeyaṁ kaiśorakaṁ dhyeyaṁ vanaṁ vṛṁdāvanaṁ vanam śyāmameva paraṁ rūpamādidevaṁ paro rasaḥ

ध्यान का विषय किशोर-रूप है, ध्यान का विषय वृंदावन वन है। श्याम रूप ही परम है, आदि देव, परम रस है।

श्लोक 54 (padma.5.77.54)

बाल्यं पंचमवर्षांतं पौगंडं दशमावधि । अष्टपंचककैशोरं सीमा पंचदशावधि

bālyaṁ paṁcamavarṣāṁtaṁ paugaṁḍaṁ daśamāvadhi aṣṭapaṁcakakaiśoraṁ sīmā paṁcadaśāvadhi

बाल्य पाँचवें वर्ष तक, पौगंड दसवें वर्ष तक; किशोरावस्था आठ से पाँच अधिक, पंद्रहवें वर्ष तक की सीमा है।

श्लोक 55 (padma.5.77.55)

यौवनोद्भिन्नकैशोरं नवयौवनमुच्यते । तद्वयस्तस्य सर्वस्वं प्रपंचमितरद्वयः

yauvanodbhinnakaiśoraṁ navayauvanamucyate tadvayastasya sarvasvaṁ prapaṁcamitaradvayaḥ

किशोरावस्था से फूटता यौवन नव-यौवन कहलाता है। वही आयु उनका सर्वस्व है, उससे अन्य सब विस्तार-मात्र है।

श्लोक 56 (padma.5.77.56)

बाल्यपौगंडकैशोरं वयो वंदे मनोहरम् । बालगोपालगोपालं स्मरगोपालरूपिणम्

bālyapaugaṁḍakaiśoraṁ vayo vaṁde manoharam bālagopālagopālaṁ smaragopālarūpiṇam

मैं उस मनोहर बाल्य-पौगंड-किशोर आयु को वंदन करता हूँ बालगोपाल, गोपाल, कामदेव के गोपाल-रूपधारी को।

श्लोक 57 (padma.5.77.57)

वंदे मदनगोपालं कैशोराकारमद्भुतम् । यमाहुर्यौवनोद्भिन्न श्रीमन्मदनमोहनम्

vaṁde madanagopālaṁ kaiśorākāramadbhutam yamāhuryauvanodbhinna śrīmanmadanamohanam

मैं मदन-गोपाल को वंदन करता हूँ, अद्भुत किशोर-आकार वाले, जिन्हें यौवन से फूटता हुआ श्रीमान मदन-मोहन कहते हैं,

श्लोक 58 (padma.5.77.58)

अखंडातुलपीयूष रसानंदमहार्णवम् । जयति श्रीपतेर्गूढं वपुः कैशोररूपिणः

akhaṁḍātulapīyūṣa rasānaṁdamahārṇavam jayati śrīpatergūḍhaṁ vapuḥ kaiśorarūpiṇaḥ

अखंड, अनुपम पीयूष-रस के आनंद के महासागर। श्रीपति के उस गूढ़, किशोर-रूपधारी शरीर की जय हो —

श्लोक 59 (padma.5.77.59)

एकमप्यव्ययं पूर्वं बल्लवीवृंदमध्यगम् । ध्यानगम्यं प्रपश्यंति रुचिभेदात्पृथग्धियः

ekamapyavyayaṁ pūrvaṁ ballavīvṛṁdamadhyagam dhyānagamyaṁ prapaśyaṁti rucibhedātpṛthagdhiyaḥ

एक होते हुए भी अव्यय, पूर्व, गोपियों के समूह के मध्य में स्थित; ध्यान से ही प्राप्य, भिन्न-भिन्न रुचिवाले पृथक-पृथक बुद्धि से उसे देखते हैं।

श्लोक 60 (padma.5.77.60)

यन्नखेंदुरुचिर्ब्रह्म ध्येयं ब्रह्मादिभिः सुरैः । गुणत्रयमतीतं तं वंदे वृंदावनेश्वरम्

yannakheṁdurucirbrahma dhyeyaṁ brahmādibhiḥ suraiḥ guṇatrayamatītaṁ taṁ vaṁde vṛṁdāvaneśvaram

जिनके नखचंद्र की कांति ही वह ब्रह्म है जिसे ब्रह्मा आदि देवता ध्यान करते हैं, उन त्रिगुणातीत वृंदावनेश्वर को मैं वंदन करता हूँ।

श्लोक 61 (padma.5.77.61)

वृंदावनपरित्यागो गोविंदस्य न विद्यते । अन्यत्र यद्वपुस्तत्तु कृत्रिमं तन्न संशयः

vṛṁdāvanaparityāgo goviṁdasya na vidyate anyatra yadvapustattu kṛtrimaṁ tanna saṁśayaḥ

गोविंद का वृंदावन-त्याग कभी नहीं होता; जहाँ कहीं भी उनका अन्य शरीर हो, वह कृत्रिम है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 62 (padma.5.77.62)

सुलभं व्रजनारीणां दुर्ल्लभं तन्मुमुक्षुणाम् । तं भजे नंदसूनुं यन्नखतेजः परं मनुः

sulabhaṁ vrajanārīṇāṁ durllabhaṁ tanmumukṣuṇām taṁ bhaje naṁdasūnuṁ yannakhatejaḥ paraṁ manuḥ

व्रज की स्त्रियों को सुलभ, मुमुक्षुओं के लिए दुर्लभ, उस नंद-पुत्र को मैं भजता हूँ, जिनकी नख की तेजस्विता ही परम मनु (मंत्र) है।

श्लोक 63 (padma.5.77.63)

पार्वत्युवाच। भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत्पिशाची हृदि वर्त्तते । तावत्प्रेमसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्

pārvatyuvāca bhuktimuktispṛhā yāvatpiśācī hṛdi varttate tāvatpremasukhasyātra kathamabhyudayo bhavet

पार्वती बोलीं जब तक भोग और मोक्ष की इच्छा रूपी पिशाची हृदय में विद्यमान रहती है, तब तक यहाँ प्रेम-सुख का उदय कैसे हो सकता है?

श्लोक 64 (padma.5.77.64)

ईश्वर उवाच- साधुपृष्टं त्वया भद्रे यन्मे मनसि वर्त्तते । तत्सर्वं कथयिष्यामि सावधाना निशामय

īśvara uvāca- sādhupṛṣṭaṁ tvayā bhadre yanme manasi varttate tatsarvaṁ kathayiṣyāmi sāvadhānā niśāmaya

ईश्वर बोले हे भद्रे! तुमने भलीभाँति पूछा है, जो मेरे मन में है; मैं वह सब कहूँगा, सावधान होकर सुनो।

श्लोक 65 (padma.5.77.65)

स्मृत्वा गुणान्स्मरन्नाम गानं वा मनरंजनम् । बोधयत्यात्मनात्मानं सततं प्रेम्णि लीयते

smṛtvā guṇānsmarannāma gānaṁ vā manaraṁjanam bodhayatyātmanātmānaṁ satataṁ premṇi līyate

उनके गुणों का स्मरण करते हुए, नाम का स्मरण करते हुए, या मन को रंजित करने वाला गान करते हुए, मनुष्य अपने द्वारा अपनी ही चेतना को जगाता है, और सदा प्रेम में लीन हो जाता है।

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