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पाताल खण्ड · अध्याय 78

शालग्राम-निर्णय

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

श्लोक 1 (padma.5.78.1)

पार्वत्युवाच- वैष्णवानां च यद्धर्मं सर्वं तथ्यं च मे वद । यत्कृत्वा मानवाः सर्वे भवांभोधिं तरंति हि

pārvatyuvāca- vaiṣṇavānāṁ ca yaddharmaṁ sarvaṁ tathyaṁ ca me vada yatkṛtvā mānavāḥ sarve bhavāṁbhodhiṁ taraṁti hi

पार्वती बोलीं वैष्णवों का जो धर्म है, वह सब मुझे यथार्थ रूप से कहिए, जिसे करके सभी मनुष्य भवसागर को पार करते हैं।

श्लोक 2 (padma.5.78.2)

ईश्वर उवाच- अथ द्वादशधा शुद्धिर्वैष्णवानामिहोच्यते । गृहोपलेपनं चैव तथानुगमनं हरेः

īśvara uvāca- atha dvādaśadhā śuddhirvaiṣṇavānāmihocyate gṛhopalepanaṁ caiva tathānugamanaṁ hareḥ

ईश्वर बोले अब यहाँ वैष्णवों की बारह प्रकार की शुद्धि कही जाती है घर का लेपन, तथा हरि का अनुगमन,

श्लोक 3 (padma.5.78.3)

भक्त्या प्रदक्षिणा चैव पादयोः शोधनं पुनः । पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोत्तोलनं हरेः

bhaktyā pradakṣiṇā caiva pādayoḥ śodhanaṁ punaḥ pūjārthaṁ patrapuṣpāṇāṁ bhaktyaivottolanaṁ hareḥ

भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा, तथा फिर चरणों का शोधन; पूजा के लिए पत्र-पुष्पों का भक्तिपूर्वक हरि के निमित्त उठाना,

श्लोक 4 (padma.5.78.4)

करयोः सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिर्विशिष्यते । तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्त्तनम्

karayoḥ sarvaśuddhīnāmiyaṁ śuddhirviśiṣyate tannāmakīrtanaṁ caiva guṇānāmapi kīrttanam

सभी शुद्धियों में यही हाथों की शुद्धि विशिष्ट है। उनके नाम का कीर्तन, तथा गुणों का भी कीर्तन,

श्लोक 5 (padma.5.78.5)

भक्त्या श्रीकृष्णदेवस्य वचसः शुद्धिरिष्यते । तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्

bhaktyā śrīkṛṣṇadevasya vacasaḥ śuddhiriṣyate tatkathāśravaṇaṁ caiva tasyotsavanirīkṣaṇam

भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णदेव का यह वाणी की शुद्धि है। उनकी कथा का श्रवण, तथा उनके उत्सव का दर्शन,

श्लोक 6 (padma.5.78.6)

श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धिः सम्यगिहोच्यते । पादोदकं च निर्माल्यं मालानामपि धारणम्

śrotrayornetrayoścaiva śuddhiḥ samyagihocyate pādodakaṁ ca nirmālyaṁ mālānāmapi dhāraṇam

कानों और नेत्रों की भलीभाँति शुद्धि यही कही जाती है। चरणामृत, निर्माल्य, तथा मालाओं का धारण भी,

श्लोक 7 (padma.5.78.7)

उच्यते शिरसः शुद्धिः प्रणतस्य हरेः पुरः । आघ्राणं तस्य पुष्पादेर्निर्माल्यस्य तथा प्रिये

ucyate śirasaḥ śuddhiḥ praṇatasya hareḥ puraḥ āghrāṇaṁ tasya puṣpādernirmālyasya tathā priye

हरि के आगे झुके हुए सिर की शुद्धि कही जाती है। उनके फूल आदि का सूँघना, तथा हे प्रिये! निर्माल्य का भी,

श्लोक 8 (padma.5.78.8)

विशुद्धिः स्यादंतरस्य घ्राणस्यापि विधीयते । यत्र पुष्पादिकं यच्च कृष्णपादयुगार्पितम्

viśuddhiḥ syādaṁtarasya ghrāṇasyāpi vidhīyate yatra puṣpādikaṁ yacca kṛṣṇapādayugārpitam

यह अंतःकरण और घ्राण की भी विशुद्धि की जाती है। जहाँ भी जो पुष्प आदि कृष्ण के चरण-युगल को अर्पित किया गया हो,

श्लोक 9 (padma.5.78.9)

तदेकं पावनं लोके तद्धि सर्वं विशोधयेत् । पूजा च पंचधा प्रोक्ता तासां भेदं शृणुष्व मे

tadekaṁ pāvanaṁ loke taddhi sarvaṁ viśodhayet pūjā ca paṁcadhā proktā tāsāṁ bhedaṁ śṛṇuṣva me

वह अकेला ही लोक में पावन है, वह सब कुछ शुद्ध कर देता है। पूजा पाँच प्रकार की कही गई है; उनका भेद मुझसे सुनो।

श्लोक 10 (padma.5.78.10)

अभिगमनमुपादानं योगः स्वाध्याय एव च । इज्या पंचप्रकारार्चा क्रमेण कथयामि ते

abhigamanamupādānaṁ yogaḥ svādhyāya eva ca ijyā paṁcaprakārārcā krameṇa kathayāmi te

अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय, और इज्या इन पाँच प्रकार की पूजाओं को मैं क्रम से तुम्हें कहता हूँ।

श्लोक 11 (padma.5.78.11)

तत्वाभिगमनं नाम देवतास्थानमार्जनम् । उपलेपं च निर्माल्यदूरीकरणमेव च

tatvābhigamanaṁ nāma devatāsthānamārjanam upalepaṁ ca nirmālyadūrīkaraṇameva ca

तत्त्व-अभिगमन नाम है देव-स्थान का बुहारना, लेपना, तथा निर्माल्य को दूर करना।

श्लोक 12 (padma.5.78.12)

उपादानं नाम गंध पुष्पादिचयनं तथा । योगो नाम स्वदेवस्य स्वात्मनैवात्मभावना

upādānaṁ nāma gaṁdha puṣpādicayanaṁ tathā yogo nāma svadevasya svātmanaivātmabhāvanā

उपादान नाम है गंध, पुष्प आदि का चयन। योग नाम है अपने ही आत्मा से अपने देवता की भावना।

श्लोक 13 (padma.5.78.13)

स्वाध्यायो नाम मंत्रार्थानुसंधापूर्वको जपः । सूक्तस्तोत्रादिपाठश्च हरेः संकीर्त्तनं तथा

svādhyāyo nāma maṁtrārthānusaṁdhāpūrvako japaḥ sūktastotrādipāṭhaśca hareḥ saṁkīrttanaṁ tathā

स्वाध्याय नाम है मंत्रार्थ के अनुसंधानपूर्वक जप, सूक्त-स्तोत्र आदि का पाठ, तथा हरि का संकीर्तन,

श्लोक 14 (padma.5.78.14)

तत्त्वादिशास्त्राभ्यासश्च स्वाध्यायः परिकीर्तितः । इज्या नाम स्वदेवस्य पूजनं च यथार्थतः

tattvādiśāstrābhyāsaśca svādhyāyaḥ parikīrtitaḥ ijyā nāma svadevasya pūjanaṁ ca yathārthataḥ

तत्त्व आदि शास्त्रों का अभ्यास स्वाध्याय कहलाता है। इज्या नाम है अपने देवता की यथार्थ पूजा।

श्लोक 15 (padma.5.78.15)

इति पंचप्रकारार्चा कथिता तव सुव्रते । सार्ष्टि सामीप्य सालोक्य सायुज्य सारूप्यदा क्रमात्

iti paṁcaprakārārcā kathitā tava suvrate sārṣṭi sāmīpya sālokya sāyujya sārūpyadā kramāt

इस प्रकार, हे सुव्रते! पाँच प्रकार की पूजा तुम्हें कही गई; वे क्रमशः सार्ष्टि, सामीप्य, सालोक्य, सायुज्य और सारूप्य प्रदान करती हैं।

श्लोक 16 (padma.5.78.16)

प्रसंगात्कथयिष्यामि शालग्रामशिलार्चनम् । केशवादेश्चतुर्बाहोर्दक्षिणोर्ध्वकरक्रमात्

prasaṁgātkathayiṣyāmi śālagrāmaśilārcanam keśavādeścaturbāhordakṣiṇordhvakarakramāt

इसी प्रसंग में मैं शालग्राम-शिला की पूजा कहूँगा केशव आदि चतुर्भुज रूपों के दाहिने ऊर्ध्व हाथ के क्रम से।

श्लोक 17 (padma.5.78.17)

शंखचक्रगदापद्मी केशवाख्यो गदाधरः । नारायणः पद्मगदाचक्रशंखायुधैः क्रमात्

śaṁkhacakragadāpadmī keśavākhyo gadādharaḥ nārāyaṇaḥ padmagadācakraśaṁkhāyudhaiḥ kramāt

शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी केशव नामक गदाधर हैं; नारायण पद्म-गदा-चक्र-शंख आयुधों को क्रमशः धारण करते हैं।

श्लोक 18 (padma.5.78.18)

माधवश्चक्रशंखाभ्यां पद्मेन गदया भवेत् । गदाब्जशंखचक्री च गोविंदाख्यो गदाधरः

mādhavaścakraśaṁkhābhyāṁ padmena gadayā bhavet gadābjaśaṁkhacakrī ca goviṁdākhyo gadādharaḥ

माधव चक्र और शंख को एक जोड़े में, पद्म और गदा को दूसरे जोड़े में धारण करते हैं; और गदा-कमल-शंख-चक्रधारी गोविंद नामक गदाधर हैं।

श्लोक 19 (padma.5.78.19)

पद्मशंखारि गदिने विष्णुरूपाय ते नमः । सशंखाब्ज गदाचक्र मधुसूदन मूर्तये

padmaśaṁkhāri gadine viṣṇurūpāya te namaḥ saśaṁkhābja gadācakra madhusūdana mūrtaye

कमल-शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु-रूप को तुम्हें नमस्कार है। शंख-कमल-गदा-चक्रधारी मधुसूदन-मूर्ति को नमस्कार है।

श्लोक 20 (padma.5.78.20)

नमो गदारिशंखाब्जयुक्तत्रिविक्रमाय च । सारिकौमोदकी पद्मशंख वामन मूर्त्तये

namo gadāriśaṁkhābjayuktatrivikramāya ca sārikaumodakī padmaśaṁkha vāmana mūrttaye

गदा-चक्र-शंख-कमलधारी त्रिविक्रम को नमस्कार है। चक्र, कौमोदकी (गदा), कमल और शंख से युक्त वामन-मूर्ति को।

श्लोक 21 (padma.5.78.21)

चक्राब्जशंखगदिने नमः श्रीधरमूर्त्तये । हृषीकेशसारिगदाशंखपद्मिन्नमोस्तु ते

cakrābjaśaṁkhagadine namaḥ śrīdharamūrttaye hṛṣīkeśasārigadāśaṁkhapadminnamostu te

चक्र-कमल-शंख-गदाधारी श्रीधर-मूर्ति को नमस्कार है। हृषीकेश को चक्र-गदा-शंख-कमलधारी, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 22 (padma.5.78.22)

साब्जशंखगदाचक्रपद्मनाभ स्वमूर्त्तये । दामोदरशंखगदाचक्रपद्मिन्नमोस्तु ते

sābjaśaṁkhagadācakrapadmanābha svamūrttaye dāmodaraśaṁkhagadācakrapadminnamostu te

कमल-शंख-गदा-चक्रधारी पद्मनाभ की अपनी ही मूर्ति को; दामोदर को शंख-गदा-चक्र-कमलधारी, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 23 (padma.5.78.23)

शंखाब्जचक्रगदिने नमः संकर्षणाय च । सारिशंखगदाब्जाय वासुदेव नमोस्तुते

śaṁkhābjacakragadine namaḥ saṁkarṣaṇāya ca sāriśaṁkhagadābjāya vāsudeva namostute

शंख-कमल-चक्र-गदाधारी संकर्षण को नमस्कार है। वासुदेव को चक्र-शंख-गदा-कमलधारी, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 24 (padma.5.78.24)

शंखचक्रगदाब्जाय धृत प्रद्युम्नमूर्त्तये । नमोऽनिरुद्धाय गदाशंखाब्जारिविधारिणे

śaṁkhacakragadābjāya dhṛta pradyumnamūrttaye namo'niruddhāya gadāśaṁkhābjārividhāriṇe

शंख-चक्र-गदा-कमलधारी प्रद्युम्न-मूर्ति को; अनिरुद्ध को नमस्कार, जो गदा-शंख-कमल-चक्र धारण करते हैं।

श्लोक 25 (padma.5.78.25)

साब्जशंखगदाचक्रपुरुषोत्तममूर्त्तये । नमोऽधोक्षजरूपाय गदाशंखारि पद्मिने

sābjaśaṁkhagadācakrapuruṣottamamūrttaye namo'dhokṣajarūpāya gadāśaṁkhāri padmine

कमल-शंख-गदा-चक्रधारी पुरुषोत्तम-मूर्ति को; अधोक्षज-रूप को नमस्कार, जो गदा-शंख-चक्र-कमल धारण करते हैं।

श्लोक 26 (padma.5.78.26)

नृसिंहमूर्त्तये पद्मगदाशंखारिधारिणे । पद्मारिशंखगदिने नमोस्त्वच्युतमूर्त्तये

nṛsiṁhamūrttaye padmagadāśaṁkhāridhāriṇe padmāriśaṁkhagadine namostvacyutamūrttaye

कमल-गदा-शंख-चक्रधारी नृसिंह-मूर्ति को; कमल-चक्र-शंख-गदाधारी अच्युत-मूर्ति को नमस्कार है।

श्लोक 27 (padma.5.78.27)

सगदाब्जारिशंखाय नमः श्रीकृष्णमूर्त्तये । शालग्रामशिलाद्वारगतलग्नद्विचक्रधृक्

sagadābjāriśaṁkhāya namaḥ śrīkṛṣṇamūrttaye śālagrāmaśilādvāragatalagnadvicakradhṛk

गदा-कमल-चक्र-शंखधारी श्रीकृष्ण-मूर्ति को नमस्कार है। शालग्राम-शिला के द्वार में लगे दो चक्रों को धारण करने वाला —

श्लोक 28 (padma.5.78.28)

शुक्लाभरेखः शोभाढ्यः सदेवः श्रीगदाधरः । लग्नद्विचक्रो रक्ताभः पूर्वभागस्तु पुष्कलः

śuklābharekhaḥ śobhāḍhyaḥ sadevaḥ śrīgadādharaḥ lagnadvicakro raktābhaḥ pūrvabhāgastu puṣkalaḥ

श्वेत रेखा, शोभा से युक्त, देवचिह्न सहित श्रीगदाधर है। द्वार में लगे दो चक्र, लाल कांतिवाले, अग्रभाग पुष्ट,

श्लोक 29 (padma.5.78.29)

संकर्षणोऽथ प्रद्युम्नः सूक्ष्मचक्रस्तु पीतकः । सुदीर्घसुषिरच्छिद्रो ह्यनिरुद्धस्तु वर्त्तुलः

saṁkarṣaṇo'tha pradyumnaḥ sūkṣmacakrastu pītakaḥ sudīrghasuṣiracchidro hyaniruddhastu varttulaḥ

वह संकर्षण है; फिर प्रद्युम्न सूक्ष्म चक्रवाला, पीले रंग का है; अत्यंत लंबे, छिद्रयुक्त रंध्रवाला अनिरुद्ध, गोल है।

श्लोक 30 (padma.5.78.30)

नीलो द्वारे त्रिरेखश्च अथ नारायणोऽसितः । मध्ये गदाकृती रेखा नाभिपद्मं महोन्नतम्

nīlo dvāre trirekhaśca atha nārāyaṇo'sitaḥ madhye gadākṛtī rekhā nābhipadmaṁ mahonnatam

द्वार में नीला, तीन रेखाओंवाला फिर नारायण, श्याम है। मध्य में गदाकृति रेखा, नाभि-कमल अत्यंत उन्नत,

श्लोक 31 (padma.5.78.31)

पृथुचक्रो नृसिंहो यः कपिलो यस्त्रिबिंदुकः । अथवा पंचबिंदोस्तु पूजनं ब्रह्मचारिणः

pṛthucakro nṛsiṁho yaḥ kapilo yastribiṁdukaḥ athavā paṁcabiṁdostu pūjanaṁ brahmacāriṇaḥ

विस्तृत चक्रवाला नृसिंह है, जो तीन बिंदुवाला हो वह कपिल है; अथवा पाँच बिंदुवाला ब्रह्मचारी (वामन) की पूजा है।

श्लोक 32 (padma.5.78.32)

वराहः स त्रिलिंगो यो विषमद्वयचक्रकः । नीलस्त्रिरेखः स्थूलोऽथ कूर्ममूर्तिः सबिंदुकः

varāhaḥ sa triliṁgo yo viṣamadvayacakrakaḥ nīlastrirekhaḥ sthūlo'tha kūrmamūrtiḥ sabiṁdukaḥ

तीन चिह्नोंवाला जो असम दो चक्रवाला हो वह वराह है; नीला, तीन रेखाओंवाला, स्थूल फिर कूर्म-मूर्ति है, बिंदुओं सहित।

श्लोक 33 (padma.5.78.33)

कृष्णः सवर्तुलावर्त्त पांडुरो धृतपृष्ठकः । श्रीधरः पंचरेखश्च वनमाली गदांकितः

kṛṣṇaḥ savartulāvartta pāṁḍuro dhṛtapṛṣṭhakaḥ śrīdharaḥ paṁcarekhaśca vanamālī gadāṁkitaḥ

श्याम, गोल आवर्तवाला, पांडुर, पीठ धारण किए वह श्रीधर है; पाँच रेखाओंवाला, वनमाला, गदा-अंकित,

श्लोक 34 (padma.5.78.34)

वामनो वर्तुलो नाम मध्यचक्रः सनीलकः । नानावर्णानेकमूर्ति नागभोगी त्वनंतकः

vāmano vartulo nāma madhyacakraḥ sanīlakaḥ nānāvarṇānekamūrti nāgabhogī tvanaṁtakaḥ

वामन गोल नाम है, मध्य में चक्र, नीले चिह्न सहित; नाना रंगों की अनेक मूर्ति, नाग-भोगधारी अनंत है।

श्लोक 35 (padma.5.78.35)

स्थूलो दामोदरो नीलो मध्ये चक्रः सनीलकः । संकर्षणद्वारकोव्यादथ ब्रह्मा सुलोहितः

sthūlo dāmodaro nīlo madhye cakraḥ sanīlakaḥ saṁkarṣaṇadvārakovyādatha brahmā sulohitaḥ

स्थूल, नीला दामोदर, मध्य में चक्र, नीले चिह्न सहित; संकर्षण-द्वार की रक्षा करे, फिर गहरे लाल रंग का ब्रह्मा,

श्लोक 36 (padma.5.78.36)

सुदीर्घरेखासुषिर एकचक्रांबुजः पृथुः । पृथुचक्रः स्थूलछिद्रः कृष्णो बिंदुश्च बिंदुमान्

sudīrgharekhāsuṣira ekacakrāṁbujaḥ pṛthuḥ pṛthucakraḥ sthūlachidraḥ kṛṣṇo biṁduśca biṁdumān

अत्यंत लंबी, छिद्रयुक्त रेखा, एक चक्रवाला कमल, विस्तृत; विस्तृत चक्र, स्थूल-छिद्र वाला कृष्ण, बिंदुवाला 'बिंदुमान्' है।

श्लोक 37 (padma.5.78.37)

ह्यग्रीवोंऽकुशाकारः पंचरेखः सकौस्तुभः । वैकुंठो मल्लवद्भाति एकचक्रमयोसितः

hyagrīvoṁ'kuśākāraḥ paṁcarekhaḥ sakaustubhaḥ vaikuṁṭho mallavadbhāti ekacakramayositaḥ

अंकुशाकार हयग्रीव, पाँच रेखाओं और कौस्तुभ सहित; वैकुंठ पहलवान जैसा दिखता है, एक चक्रवाला, लौह जैसा श्याम।

श्लोक 38 (padma.5.78.38)

मत्स्यो दीर्घांबुजाकारो दीर्घरेखश्च पांडुरः । रामचक्रो दक्षरेखो यः श्यामः स त्रिविक्रमः

matsyo dīrghāṁbujākāro dīrgharekhaśca pāṁḍuraḥ rāmacakro dakṣarekho yaḥ śyāmaḥ sa trivikramaḥ

लंबे कमल के आकार का, लंबी रेखा और पांडुर मत्स्य है; राम जैसे चक्र, दाहिनी रेखावाला जो श्याम है वह त्रिविक्रम है।

श्लोक 39 (padma.5.78.39)

शालग्रामद्वारकायां स्थिताय गदिने नमः । एकेन लक्षितो योव्याद्गदाधारी सुदर्शनः

śālagrāmadvārakāyāṁ sthitāya gadine namaḥ ekena lakṣito yovyādgadādhārī sudarśanaḥ

शालग्राम के द्वार में स्थित गदाधारी को नमस्कार है। एक चिह्न से लक्षित जो हो, वह गदाधारी सुदर्शन है,

श्लोक 40 (padma.5.78.40)

लक्ष्मीनारायणो द्वाभ्यां त्रिभिश्चैव त्रिविक्रमः । चतुर्भिश्च चतुर्व्यूहो वासुदेवश्च पंचभिः

lakṣmīnārāyaṇo dvābhyāṁ tribhiścaiva trivikramaḥ caturbhiśca caturvyūho vāsudevaśca paṁcabhiḥ

दो से लक्ष्मीनारायण, तीन से त्रिविक्रम होते हैं। चार से चतुर्व्यूह, पाँच से वासुदेव।

श्लोक 41 (padma.5.78.41)

प्रद्युम्नः षड्भिरेवाव्यात्संकर्षणश्च सप्तभिः । पुरुषोत्तमोऽष्टभिश्च स्यान्नवव्यूहो नवो हितः

pradyumnaḥ ṣaḍbhirevāvyātsaṁkarṣaṇaśca saptabhiḥ puruṣottamo'ṣṭabhiśca syānnavavyūho navo hitaḥ

छह से प्रद्युम्न की रक्षा हो, सात से संकर्षण; आठ से पुरुषोत्तम, नौ से यथोचित नव-व्यूह रूप।

श्लोक 42 (padma.5.78.42)

दशावतारो दशभिरनिरुद्धोऽवतादथ । द्वादशात्मा द्वादशभिरतऊर्द्ध्वमनंतकः

daśāvatāro daśabhiraniruddho'vatādatha dvādaśātmā dvādaśabhirataūrddhvamanaṁtakaḥ

दस से दशावतार, फिर उससे अधिक से अनिरुद्ध की रक्षा हो; बारह से द्वादश-आत्मा, उससे ऊपर अनंत।

श्लोक 43 (padma.5.78.43)

ब्रह्मा चतुर्मुखो दंडी कमंडलुस्रगुन्नतः । महेश्वरः पंचवक्त्रो दशबाहुर्वृषध्वजः

brahmā caturmukho daṁḍī kamaṁḍalusragunnataḥ maheśvaraḥ paṁcavaktro daśabāhurvṛṣadhvajaḥ

चार मुखवाले ब्रह्मा, दंडधारी, कमंडलु और माला से उन्नत; पाँच मुखवाले महेश्वर, दस भुजाओंवाले, वृषभ-ध्वजधारी,

श्लोक 44 (padma.5.78.44)

यथायुधस्तथागौरी चंडिका च सरस्वती । महालक्ष्मीर्मातरश्च पद्महस्तो दिवाकरः

yathāyudhastathāgaurī caṁḍikā ca sarasvatī mahālakṣmīrmātaraśca padmahasto divākaraḥ

उन्हीं के आयुधों के अनुसार गौरी, चंडिका और सरस्वती भी हैं; मातृ-देवियाँ, कमल-हस्त सूर्य,

श्लोक 45 (padma.5.78.45)

गजास्यश्च गजस्कंधः षण्मुखोनेकधा गणाः । एते स्थिताः स्थापिता स्युः प्रसादेवाथ पूजिताः

gajāsyaśca gajaskaṁdhaḥ ṣaṇmukhonekadhā gaṇāḥ ete sthitāḥ sthāpitā syuḥ prasādevātha pūjitāḥ

गजमुख (गणेश) और गज-कंधवाला, षण्मुख (कार्तिकेय) और अनेक गण ये सब स्थापित करके, कृपापूर्वक पूजित किए जाने चाहिए।

श्लोक 46 (padma.5.78.46)

धर्मार्थकाममोक्षा हि प्राप्यंते पुरुषेण च

dharmārthakāmamokṣā hi prāpyaṁte puruṣeṇa ca

इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाते हैं।

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