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पाताल खण्ड · अध्याय 80

वर्षभर के भक्ति-विधान

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (padma.5.80.1)

पार्वत्युवाच- घोरे कलियुगे प्राप्ते विषयग्राहसंकुले । पुत्रदारधनाद्यार्तैस्तत्कथं धार्यते विभो

pārvatyuvāca- ghore kaliyuge prāpte viṣayagrāhasaṁkule putradāradhanādyārtaistatkathaṁ dhāryate vibho

पार्वती बोलीं इस भयंकर कलियुग के आने पर, जो विषयों के मगरमच्छ से भरा है, पुत्र-पत्नी-धन आदि से पीड़ित मनुष्य, हे विभो! धर्म को कैसे धारण करे?

श्लोक 2 (padma.5.80.2)

तदुपायं महादेव कथयस्व कृपानिधे । ईश्वर उवाच- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्

tadupāyaṁ mahādeva kathayasva kṛpānidhe īśvara uvāca- harernāma harernāma harernāmaiva kevalam

वह उपाय, हे महादेव, हे कृपानिधे! बताइए। ईश्वर बोले हरि का नाम, हरि का नाम, केवल हरि का नाम ही,

श्लोक 3 (padma.5.80.3)

हरेराम हरेकृष्ण कृष्णकृष्णेति मंगलम् । एवं वदंति ये नित्यं न हि तान्बाधते कलि

harerāma harekṛṣṇa kṛṣṇakṛṣṇeti maṁgalam evaṁ vadaṁti ye nityaṁ na hi tānbādhate kali

हरे राम, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण यह मंगल है। जो सदा ऐसा कहते हैं, उन्हें कलि बाधा नहीं पहुँचाता।

श्लोक 4 (padma.5.80.4)

अंतरांतरकर्माणि कृत्वा नामानि च स्मरेत् । कृष्णकृष्णेति कृष्णेति कृष्णेत्याह पुनः पुनः

aṁtarāṁtarakarmāṇi kṛtvā nāmāni ca smaret kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti kṛṣṇetyāha punaḥ punaḥ

अपने-अपने कर्मों को करते हुए भी नामों का स्मरण करना चाहिए कृष्ण-कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण ऐसा बार-बार कहना चाहिए।

श्लोक 5 (padma.5.80.5)

मन्नाम चैव त्वन्नाम योजयित्वा व्यतिक्रमात् । सोऽपि पापात्प्रमुच्येत तूलराशेरिवानलः

mannāma caiva tvannāma yojayitvā vyatikramāt so'pi pāpātpramucyeta tūlarāśerivānalaḥ

मेरा नाम और तुम्हारा नाम मिलाकर, गलती से भी वह पाप से मुक्त हो जाता है, जैसे रुई के ढेर को अग्नि (भस्म कर देती है)।

श्लोक 6 (padma.5.80.6)

जयाद्येतत्त्वया वाप्यथवा श्रीशब्दपूर्वकम् । तच्च मे मंगलं नाम जपन्पापात्प्रमुच्यते

jayādyetattvayā vāpyathavā śrīśabdapūrvakam tacca me maṁgalaṁ nāma japanpāpātpramucyate

जय आदि से युक्त, या श्री शब्द के साथ, मेरे उस मंगल नाम का जप करके मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 7 (padma.5.80.7)

दिवानिशि च संध्यायां सर्वकालेषु संस्मरेत् । अहर्निशं स्मरन्रामं कृष्णं पश्यति चक्षुषा

divāniśi ca saṁdhyāyāṁ sarvakāleṣu saṁsmaret aharniśaṁ smaranrāmaṁ kṛṣṇaṁ paśyati cakṣuṣā

दिन-रात और संध्या में, सभी कालों में स्मरण करना चाहिए। रात-दिन राम का स्मरण करने वाला अपनी आँखों से कृष्ण को देखता है।

श्लोक 8 (padma.5.80.8)

अशुचिर्वा शुचिर्वापि सर्वकालेषु सर्वदा । नामसंस्मरणादेव संसारान्मुच्यते क्षणात्

aśucirvā śucirvāpi sarvakāleṣu sarvadā nāmasaṁsmaraṇādeva saṁsārānmucyate kṣaṇāt

अशुद्ध हो या शुद्ध, सभी कालों में, सदा नाम-स्मरण मात्र से ही मनुष्य क्षणभर में संसार से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 9 (padma.5.80.9)

नानापराधयुक्तस्य नामापि च हरत्यघम् । यज्ञव्रततपोदानं सांगं नैव कलौ युगे

nānāparādhayuktasya nāmāpi ca haratyagham yajñavratatapodānaṁ sāṁgaṁ naiva kalau yuge

अनेक अपराधों से युक्त व्यक्ति का भी नाम ही पाप हर लेता है। यज्ञ, व्रत, तप, दान अपने साधनों सहित कलियुग में सफल नहीं होते,

श्लोक 10 (padma.5.80.10)

गंगास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम्

gaṁgāsnānaṁ harernāma nirapāyamidaṁ dvayam

गंगा-स्नान और हरि का नाम ये दो ही निर्दोष हैं।

श्लोक 11 (padma.5.80.11)

हत्यायुतं पापसहस्रमुग्रं गुर्वंगनाकोटिनिषेवणं च । स्तेयान्यथान्यानि हरेः प्रियेण गोविंदनाम्ना न च संति भद्रे

hatyāyutaṁ pāpasahasramugraṁ gurvaṁganākoṭiniṣevaṇaṁ ca steyānyathānyāni hareḥ priyeṇa goviṁdanāmnā na ca saṁti bhadre

हजार-करोड़ हत्याएँ, उग्र हजार पाप, करोड़ों गुरु-अंगनाओं का सेवन, चोरी और अन्य दोष हे भद्रे! हरि के प्रिय गोविंद-नाम के लिए ये कुछ भी नहीं हैं।

श्लोक 12 (padma.5.80.12)

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुंडीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः

apavitraḥ pavitro vā sarvāvasthāṁ gato'pi vā yaḥ smaretpuṁḍīkākṣaṁ sa bāhyābhyaṁtaraḥ śuciḥ

अपवित्र हो या पवित्र, किसी भी अवस्था में हो, जो पुंडरीकाक्ष का स्मरण करता है, वह भीतर-बाहर दोनों से शुद्ध है।

श्लोक 13 (padma.5.80.13)

नामसंस्मरणादेव तथा तस्यार्थचिंतनात् । सौवर्णीं राजतीं वापि तथा पैष्टीं स्रगाकृतिम्

nāmasaṁsmaraṇādeva tathā tasyārthaciṁtanāt sauvarṇīṁ rājatīṁ vāpi tathā paiṣṭīṁ sragākṛtim

नाम-स्मरण मात्र से, तथा उसके अर्थ के चिंतन से भी (शुद्धि होती है)। स्वर्ण की, या रजत की, या पिष्ट (आटे) की माला के आकार में,

श्लोक 14 (padma.5.80.14)

पादयोश्चिह्नितां कृत्वा पूजां चैव समारभेत् । दक्षिणस्य पदोंगुष्ठमूले चक्रं बिभर्ति यः

pādayościhnitāṁ kṛtvā pūjāṁ caiva samārabhet dakṣiṇasya padoṁguṣṭhamūle cakraṁ bibharti yaḥ

दोनों चरणों पर चिह्नित करके पूजा आरंभ करनी चाहिए। दाहिने पैर के अँगूठे के मूल में जो चक्र धारण करते हैं,

श्लोक 15 (padma.5.80.15)

तत्र नम्रजनस्यापि संसारच्छेदनाय च । मध्यमांगुलिमूले तु धत्ते कमलमच्युतः

tatra namrajanasyāpi saṁsāracchedanāya ca madhyamāṁgulimūle tu dhatte kamalamacyutaḥ

वहाँ, विनीत जन के लिए भी, संसार के छेदन के लिए वह विद्यमान है। मध्यमा अँगुली के मूल में अच्युत कमल धारण करते हैं,

श्लोक 16 (padma.5.80.16)

ध्यातृचित्तद्विरेफाणां लोभनायातिशोभनम् । पद्मस्याधोध्वजं धत्ते सर्वानर्थजयध्वजम्

dhyātṛcittadvirephāṇāṁ lobhanāyātiśobhanam padmasyādhodhvajaṁ dhatte sarvānarthajayadhvajam

अत्यंत सुंदर, ध्यान करने वालों के चित्त-रूपी भ्रमरों को लुभाने के लिए। कमल के नीचे ध्वज धारण करते हैं, सभी अनर्थों पर विजय का ध्वज,

श्लोक 17 (padma.5.80.17)

कनिष्ठामूलतो वज्रं भक्तपापौघभेदनम् । पार्श्वमध्येंऽकुशं भक्तचित्ते रभसकारणम्

kaniṣṭhāmūlato vajraṁ bhaktapāpaughabhedanam pārśvamadhyeṁ'kuśaṁ bhaktacitte rabhasakāraṇam

कनिष्ठिका के मूल से वज्र, भक्तों के पापों के समूह को भेदने वाला; बगल के मध्य में अंकुश, भक्त के चित्त में तीव्रता का कारण,

श्लोक 18 (padma.5.80.18)

भोगसंपन्मयं धत्ते यवमंगुष्ठपर्वणि । मूले गदां च पापाद्रिभेदनीं सर्वदेहिनाम्

bhogasaṁpanmayaṁ dhatte yavamaṁguṣṭhaparvaṇi mūle gadāṁ ca pāpādribhedanīṁ sarvadehinām

भोग-संपत्तिमय जौ का चिह्न अँगूठे के जोड़ पर धारण करते हैं; मूल में गदा, सभी देहधारियों के पाप-पर्वत को भेदने वाली,

श्लोक 19 (padma.5.80.19)

सर्वविद्याप्रकाशाय धत्ते स भगवानजः । पद्मादीन्यपि चिह्नानि तत्र दक्षेण यत्पुनः

sarvavidyāprakāśāya dhatte sa bhagavānajaḥ padmādīnyapi cihnāni tatra dakṣeṇa yatpunaḥ

समस्त विद्या के प्रकाश के लिए वह अजन्मा भगवान धारण करते हैं। दाहिने चरण पर जो कमल आदि चिह्न हैं,

श्लोक 20 (padma.5.80.20)

वामपादे वसेत्सोऽयं बिभर्त्ति करुणानिधिः । तस्माद्गोविंदमाहात्म्यमानंदरससुंदरम्

vāmapāde vasetso'yaṁ bibhartti karuṇānidhiḥ tasmādgoviṁdamāhātmyamānaṁdarasasuṁdaram

वही बाएँ चरण में भी वे करुणानिधि धारण करते हैं। इसलिए आनंद-रस से सुंदर गोविंद के माहात्म्य को,

श्लोक 21 (padma.5.80.21)

शृणुयात्कीर्त्तयेन्नित्यं स निर्मुक्तो न संशयः । मासकृत्यं प्रवक्ष्यामि विष्णोः प्रीतिकरं परम्

śṛṇuyātkīrttayennityaṁ sa nirmukto na saṁśayaḥ māsakṛtyaṁ pravakṣyāmi viṣṇoḥ prītikaraṁ param

जो नित्य सुनता या कीर्तन करता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। अब मैं मासिक कृत्य कहूँगा, जो विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं।

श्लोक 22 (padma.5.80.22)

ज्येष्ठे तु स्नापनं कुर्याच्छ्रीविष्णोर्यत्नतः शुचिः । दैनंदिनं तु दुरितं पक्षमासर्त्तुवर्षजम्

jyeṣṭhe tu snāpanaṁ kuryācchrīviṣṇoryatnataḥ śuciḥ dainaṁdinaṁ tu duritaṁ pakṣamāsarttuvarṣajam

ज्येष्ठ मास में यत्नपूर्वक, पवित्र होकर श्रीविष्णु का स्नपन करना चाहिए। दैनिक, पाक्षिक, मासिक, ऋतु और वार्षिक पाप,

श्लोक 23 (padma.5.80.23)

ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाता ज्ञातकृतानि च । स्वर्णस्तेयसुरापान गुरुतल्पायुतानि च

brahmahatyāsahasrāṇi jñātā jñātakṛtāni ca svarṇasteyasurāpāna gurutalpāyutāni ca

हजारों ब्रह्महत्याएँ, जानकर या अनजाने में की गई, स्वर्ण-चोरी, मद्यपान, और अनगिनत गुरु-शय्या-गमन,

श्लोक 24 (padma.5.80.24)

कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि च । सर्वाण्यथ प्रणश्यंति पौर्णमास्यां तु वासरे

koṭikoṭisahasrāṇi hyupapāpāni yāni ca sarvāṇyatha praṇaśyaṁti paurṇamāsyāṁ tu vāsare

और जो करोड़ों-करोड़ हजारों उपपाप हैं, वे सभी पूर्णिमा के दिन नष्ट हो जाते हैं,

श्लोक 25 (padma.5.80.25)

आसिंचेदच्युतं मूर्ध्नि तदैतत्कलशोदकम् । पुरुषसूक्तेन मंत्रेण पावमानीभिरेव च

āsiṁcedacyutaṁ mūrdhni tadaitatkalaśodakam puruṣasūktena maṁtreṇa pāvamānībhireva ca

यदि अच्युत के सिर पर कलश का वह जल पुरुष-सूक्त मंत्र से, और पावमानी ऋचाओं से सींचा जाए,

श्लोक 26 (padma.5.80.26)

नालिकेरोदकेनाथ तथा तालफलांबुना । रत्नोदकेन गंधेन तथा पुष्पोदकेन च

nālikerodakenātha tathā tālaphalāṁbunā ratnodakena gaṁdhena tathā puṣpodakena ca

फिर नारियल के जल से, और उसी प्रकार ताड़-फल के जल से, रत्न-मिश्रित जल से, गंध से, और पुष्प-जल से भी,

श्लोक 27 (padma.5.80.27)

पंचोपचारैराराध्य यथाविभवविस्तरैः । घं घंटायै नम इति घंटावाद्यं प्रदापयेत्

paṁcopacārairārādhya yathāvibhavavistaraiḥ ghaṁ ghaṁṭāyai nama iti ghaṁṭāvādyaṁ pradāpayet

पंचोपचारों से, अपनी सामर्थ्य के विस्तार के अनुसार आराधना करके 'घं घंटायै नमः' कहकर घंटा-वादन कराना चाहिए,

श्लोक 28 (padma.5.80.28)

पतितस्य महाध्वानन्यस्तपातकसंचये । पाहि मां पापिनं घोरसंसारार्णवपातिनम्

patitasya mahādhvānanyastapātakasaṁcaye pāhi māṁ pāpinaṁ ghorasaṁsārārṇavapātinam

महाध्वनि से गिरे हुए, पापों के समूह में फँसे हुए के लिए मुझे बचाओ, मुझ पापी को, इस घोर संसार-सागर में गिरते हुए को,

श्लोक 29 (padma.5.80.29)

य एवं कुरुते विद्वान्ब्राह्मणः श्रोत्रियः शुचिः । सर्वपापैः प्रमुच्येत विष्णुलोकं स गच्छति

ya evaṁ kurute vidvānbrāhmaṇaḥ śrotriyaḥ śuciḥ sarvapāpaiḥ pramucyeta viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो विद्वान, श्रोत्रिय, पवित्र ब्राह्मण ऐसा करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 30 (padma.5.80.30)

आषाढशुक्लैकादश्यां कुर्यात्स्वापमहोत्सवम् । आषाढे च रथं कुर्याच्छ्रावणे श्रवणाविधिम्

āṣāḍhaśuklaikādaśyāṁ kuryātsvāpamahotsavam āṣāḍhe ca rathaṁ kuryācchrāvaṇe śravaṇāvidhim

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को शयन-महोत्सव करना चाहिए। आषाढ़ में रथ-यात्रा करनी चाहिए, श्रावण में श्रवण-विधि,

श्लोक 31 (padma.5.80.31)

भाद्रे च जन्मदिवस उपवासपरो भवेत् । प्रसुप्तस्य परीवर्तमाश्विने मासि कारयेत्

bhādre ca janmadivasa upavāsaparo bhavet prasuptasya parīvartamāśvine māsi kārayet

भाद्रपद में जन्मदिन पर उपवासपरायण होना चाहिए। आश्विन मास में सुप्त हुए (विष्णु) का करवट-परिवर्तन कराना चाहिए,

श्लोक 32 (padma.5.80.32)

उत्थानं श्रीहरेः कुर्यादन्यथा विष्णुद्रोहकृत् । शुभे चैवाश्विने मासि महामायां च पूजयेत्

utthānaṁ śrīhareḥ kuryādanyathā viṣṇudrohakṛt śubhe caivāśvine māsi mahāmāyāṁ ca pūjayet

श्रीहरि का उत्थान (जागरण) कराना चाहिए, अन्यथा विष्णु-द्रोही हो जाता है। शुभ आश्विन मास में महामाया की भी पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 33 (padma.5.80.33)

सौवर्णीं राजतीं वापि विष्णुरूपां बलिं विना । हिंसाद्वेषौ न कर्तव्यौ धर्मात्मा विष्णुपूजकः

sauvarṇīṁ rājatīṁ vāpi viṣṇurūpāṁ baliṁ vinā hiṁsādveṣau na kartavyau dharmātmā viṣṇupūjakaḥ

स्वर्ण या रजत की, विष्णु-रूपा, बलि के बिना। धर्मात्मा विष्णु-पूजक को हिंसा और द्वेष नहीं करना चाहिए।

श्लोक 34 (padma.5.80.34)

कार्तिके पुष्यमासे च कामतः पुण्यमाचरेत् । दामोदराय दीपं च प्रांशुस्थाने प्रदापयेत्

kārtike puṣyamāse ca kāmataḥ puṇyamācaret dāmodarāya dīpaṁ ca prāṁśusthāne pradāpayet

कार्तिक में और पौष मास में इच्छानुसार पुण्य-आचरण करना चाहिए। दामोदर के लिए ऊँचे स्थान पर दीप देना चाहिए,

श्लोक 35 (padma.5.80.35)

सप्तवर्तिप्रमाणेन दीपः स्याच्चतुरंगुलः । पक्षांते च प्रकर्तव्या दीपमालावलि शुभा

saptavartipramāṇena dīpaḥ syāccaturaṁgulaḥ pakṣāṁte ca prakartavyā dīpamālāvali śubhā

दीप सात बत्तियों के प्रमाण से चार अंगुल का होना चाहिए। पक्ष के अंत में शुभ दीप-माला की पंक्ति बनानी चाहिए।

श्लोक 36 (padma.5.80.36)

मार्गशीर्षे सिते पक्षे षष्ठ्यां च सितवस्त्रकैः । पूजयेज्जगदीशं च ब्रह्माणं च विशेषतः

mārgaśīrṣe site pakṣe ṣaṣṭhyāṁ ca sitavastrakaiḥ pūjayejjagadīśaṁ ca brahmāṇaṁ ca viśeṣataḥ

मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को श्वेत वस्त्रों से जगदीश और विशेषकर ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (padma.5.80.37)

पौषे पुष्पाभिषेकं च वर्जयेच्चंदनं श्लथम् । संक्रांत्यां माघमासे च साधिवासित तंडुलात्

pauṣe puṣpābhiṣekaṁ ca varjayeccaṁdanaṁ ślatham saṁkrāṁtyāṁ māghamāse ca sādhivāsita taṁḍulāt

पौष में पुष्पाभिषेक करना चाहिए, ढीला चंदन त्यागना चाहिए। संक्रांति पर, माघ मास में रात भर भिगोए चावल से,

श्लोक 38 (padma.5.80.38)

नैवेद्यं विष्णवे दद्यादिमं मंत्रमुदीरयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या देवदेवपुरः स्थितान्

naivedyaṁ viṣṇave dadyādimaṁ maṁtramudīrayet brāhmaṇānbhojayedbhaktyā devadevapuraḥ sthitān

विष्णु को नैवेद्य अर्पित करना चाहिए, यह मंत्र बोलना चाहिए। भगवद्देव के सामने बैठे ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिए,

श्लोक 39 (padma.5.80.39)

अभ्यर्च्य भगवद्भक्तान्द्विजांश्च भगवद्धिया । एकस्मिन्भोजिते भक्ते कोटिर्भवति भोजिता

abhyarcya bhagavadbhaktāndvijāṁśca bhagavaddhiyā ekasminbhojite bhakte koṭirbhavati bhojitā

भगवद्भाव से भगवद्भक्तों और द्विजों की पूजा करके। एक भक्त को भोजन कराने पर मानो करोड़ भोजन कराए गए हों।

श्लोक 40 (padma.5.80.40)

विप्रभोजनमात्रेण व्यंगं सांगं ध्रुवं भवेत् । पंचम्यां शुक्लपक्षे तु स्नापयित्वा च केशवम्

viprabhojanamātreṇa vyaṁgaṁ sāṁgaṁ dhruvaṁ bhavet paṁcamyāṁ śuklapakṣe tu snāpayitvā ca keśavam

एक विप्र को भोजन कराने मात्र से अंग-हीन कार्य भी निश्चय ही संपूर्ण हो जाता है। शुक्ल पक्ष की पंचमी को केशव को स्नान कराकर,

श्लोक 41 (padma.5.80.41)

पूजयित्वा विधानेन चूतपल्लवसंयुतैः । फलचूर्णैश्च विविधैर्वासितैः पटसाधितैः

pūjayitvā vidhānena cūtapallavasaṁyutaiḥ phalacūrṇaiśca vividhairvāsitaiḥ paṭasādhitaiḥ

विधिपूर्वक आम के पल्लवों से, वस्त्र से छाने गए विविध सुगंधित फल-चूर्णों से पूजा करके,

श्लोक 42 (padma.5.80.42)

काननं रमणीयं च प्रदीप्तं दीपदीपितम् । द्राक्षेक्षु रंभा जंबीर नागरंगं च पूगकम्

kānanaṁ ramaṇīyaṁ ca pradīptaṁ dīpadīpitam drākṣekṣu raṁbhā jaṁbīra nāgaraṁgaṁ ca pūgakam

रमणीय कानन को दीपों से प्रदीप्त करके, अंगूर-ईख-केला-नींबू-संतरा-सुपारी,

श्लोक 43 (padma.5.80.43)

नालिकेरं च धात्रीं च पनसं च हरीतकीम् । अन्यैश्च वृक्षखंडैश्च सर्वर्तुकुसुमान्वितैः

nālikeraṁ ca dhātrīṁ ca panasaṁ ca harītakīm anyaiśca vṛkṣakhaṁḍaiśca sarvartukusumānvitaiḥ

नारियल, आँवला, कटहल और हरड़, अन्य वृक्षों के समूहों और सभी ऋतुओं के फूलों से,

श्लोक 44 (padma.5.80.44)

अन्यैश्च विविधैश्चैव फलपुष्पसमन्वितैः । वितानैः कुसुमोद्दामैर्वारिपूर्णघटैस्तथा

anyaiśca vividhaiścaiva phalapuṣpasamanvitaiḥ vitānaiḥ kusumoddāmairvāripūrṇaghaṭaistathā

तथा अन्य नाना फल-फूलों से युक्त करके, पुष्पों से भरे मंडपों और जल से भरे कलशों से,

श्लोक 45 (padma.5.80.45)

चूतशाखोपशाखाभिः शोभितं छत्रचामरैः । जयकृष्णेति संस्मृत्य प्रदक्षिणपुरस्सरम्

cūtaśākhopaśākhābhiḥ śobhitaṁ chatracāmaraiḥ jayakṛṣṇeti saṁsmṛtya pradakṣiṇapurassaram

आम की शाखा-उपशाखाओं से, छत्र-चामरों से सुशोभित करके, 'जय कृष्ण' का स्मरण करते हुए, प्रदक्षिणा-पूर्वक,

श्लोक 46 (padma.5.80.46)

विशेषतः कलियुगे दोलोत्सवो विधीयते । फाल्गुने च चतुर्दश्यामष्टमे यामसंज्ञके

viśeṣataḥ kaliyuge dolotsavo vidhīyate phālgune ca caturdaśyāmaṣṭame yāmasaṁjñake

विशेषकर कलियुग में डोल-उत्सव (झूला-उत्सव) विधान किया जाता है। फाल्गुन में चतुर्दशी को, यम नामक आठवें प्रहर में,

श्लोक 47 (padma.5.80.47)

अथवा पौर्णमास्यां तु प्रतिपत्संधिसंज्ञके । पूजयेद्विधिवद्भक्त्या फल्गुचूर्णैश्चतुर्विधैः

athavā paurṇamāsyāṁ tu pratipatsaṁdhisaṁjñake pūjayedvidhivadbhaktyā phalgucūrṇaiścaturvidhaiḥ

अथवा पूर्णिमा को, प्रतिपत्-संधि नामक काल में, विधिपूर्वक भक्तिपूर्वक चार प्रकार के फाल्गुन-चूर्णों से पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 48 (padma.5.80.48)

सितरक्तैर्गौरपीतैः कर्पूरादि विमिश्रितैः । हरिद्रारागयोगाच्च रंगरूपैर्मनोहरैः

sitaraktairgaurapītaiḥ karpūrādi vimiśritaiḥ haridrārāgayogācca raṁgarūpairmanoharaiḥ

श्वेत-लाल, गौर-पीत, कर्पूर आदि से मिश्रित; हल्दी के रंग-योग से, मनोहर रंग-रूपों से,

श्लोक 49 (padma.5.80.49)

अन्यैर्वा रंगरूपैश्च प्रीणयेत्परमेश्वरम् । एकादश्यां समारभ्य पंचम्यां तं समापयेत्

anyairvā raṁgarūpaiśca prīṇayetparameśvaram ekādaśyāṁ samārabhya paṁcamyāṁ taṁ samāpayet

अथवा अन्य रंग-रूपों से परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहिए। एकादशी से आरंभ करके पंचमी को उसे पूर्ण करना चाहिए,

श्लोक 50 (padma.5.80.50)

पंचाहानि त्र्यहानि वा दोलोत्सवो विधीयते । दक्षिणाभिमुखं कृष्णं दोलमानं सकृन्नराः

paṁcāhāni tryahāni vā dolotsavo vidhīyate dakṣiṇābhimukhaṁ kṛṣṇaṁ dolamānaṁ sakṛnnarāḥ

पाँच दिन या तीन दिन तक डोल-उत्सव विधान किया जाता है। दक्षिणाभिमुख झूलते हुए कृष्ण को मनुष्य एक बार,

श्लोक 51 (padma.5.80.51)

दृष्ट्वापराधनिचयैर्मुक्तास्ते नात्र संशयः । निक्षिप्य जलपात्रे च मासि माधवसंज्ञके

dṛṣṭvāparādhanicayairmuktāste nātra saṁśayaḥ nikṣipya jalapātre ca māsi mādhavasaṁjñake

देखकर, अपराधों के समूह से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। जल-पात्र में स्थापित करके, माधव नामक मास (वैशाख) में,

श्लोक 52 (padma.5.80.52)

सौवर्णपात्रे रौप्ये वा ताम्रे वाप्यथ मृण्मये । तोयस्थं योऽर्चयेद्देवं शालग्रामसमुद्भवम्

sauvarṇapātre raupye vā tāmre vāpyatha mṛṇmaye toyasthaṁ yo'rcayeddevaṁ śālagrāmasamudbhavam

स्वर्ण, रजत, ताम्र, अथवा मिट्टी के पात्र में, जल में स्थित शालग्राम से उत्पन्न देव की जो पूजा करता है,

श्लोक 53 (padma.5.80.53)

प्रतिमां वा महाभागे तस्य पुण्यं न गण्यते । दमनारोपणं कृत्वा श्रीविष्णौ च समर्पयेत्

pratimāṁ vā mahābhāge tasya puṇyaṁ na gaṇyate damanāropaṇaṁ kṛtvā śrīviṣṇau ca samarpayet

या हे महाभागे! प्रतिमा की, उसका पुण्य गिना नहीं जा सकता। दमन-वृक्ष का आरोपण करके श्रीविष्णु को अर्पित करना चाहिए,

श्लोक 54 (padma.5.80.54)

वैशाखे श्रावणे भाद्रे कर्तव्यं वा तदर्पणम् । पूर्वेपूर्वे तु वातस्थे दमनादिषु कर्मसु

vaiśākhe śrāvaṇe bhādre kartavyaṁ vā tadarpaṇam pūrvepūrve tu vātasthe damanādiṣu karmasu

वैशाख, श्रावण या भाद्रपद में वह अर्पण करना चाहिए। जिस-जिस ऋतु में यह हो, दमन आदि कर्मों में,

श्लोक 55 (padma.5.80.55)

प्रकर्तव्यं विधानेन अन्यथा निष्फलं भवेत् । वैशाखे च तृतीयायां जलमध्ये विशेषतः

prakartavyaṁ vidhānena anyathā niṣphalaṁ bhavet vaiśākhe ca tṛtīyāyāṁ jalamadhye viśeṣataḥ

विधिपूर्वक करना चाहिए, अन्यथा निष्फल हो जाता है। वैशाख में तृतीया को विशेषकर जल के मध्य में,

श्लोक 56 (padma.5.80.56)

अथवा मंडले कुर्यान्मंडपे वा बृहद्वने । सुगंधचंदनेनांगं सुपुष्टं च दिनेदिने

athavā maṁḍale kuryānmaṁḍape vā bṛhadvane sugaṁdhacaṁdanenāṁgaṁ supuṣṭaṁ ca dinedine

अथवा मंडल में, या मंडप में, या बड़े वन में, सुगंधित चंदन से शरीर को प्रतिदिन भलीभाँति पुष्ट करते हुए,

श्लोक 57 (padma.5.80.57)

यथाप्रयत्नतः कुर्यात्कृशांगस्येव पुष्टिदम् । चंदनागुरु ह्रीबेर कृष्णकुंकुम रोचना

yathāprayatnataḥ kuryātkṛśāṁgasyeva puṣṭidam caṁdanāguru hrībera kṛṣṇakuṁkuma rocanā

जितने यत्न से कोई कृशांग को पुष्टि दे, उतने ही यत्न से करना चाहिए। चंदन, अगुरु, ह्रीबेर, काला कुंकुम, गोरोचन,

श्लोक 58 (padma.5.80.58)

जटामांसी मुरा चैव विष्णोर्गंधाष्टकं विदुः । तैस्तैर्गंधयुतैश्चापि विष्णोरंगानि लेपयेत्

jaṭāmāṁsī murā caiva viṣṇorgaṁdhāṣṭakaṁ viduḥ taistairgaṁdhayutaiścāpi viṣṇoraṁgāni lepayet

जटामांसी और मुरा इन्हें विष्णु का अष्टगंध जानना चाहिए। इन सुगंधित द्रव्यों से विष्णु के अंगों का लेपन करना चाहिए।

श्लोक 59 (padma.5.80.59)

धृष्टं च तुलसीकाष्ठं कर्पूरागुरुयोगतः । अथवा केसरैर्योज्यं हरिचंदनमुच्यते

dhṛṣṭaṁ ca tulasīkāṣṭhaṁ karpūrāguruyogataḥ athavā kesarairyojyaṁ haricaṁdanamucyate

घिसी हुई तुलसी-लकड़ी को कर्पूर-अगुरु के योग से, अथवा केसर से युक्त करके 'हरिचंदन' कहा जाता है।

श्लोक 60 (padma.5.80.60)

यात्राकाले च ये कृष्णं भक्त्या पश्यंति मानवाः । न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि

yātrākāle ca ye kṛṣṇaṁ bhaktyā paśyaṁti mānavāḥ na teṣāṁ punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi

यात्रा के समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कृष्ण को देखते हैं, उनकी सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) नहीं होती।

श्लोक 61 (padma.5.80.61)

सुगंधमिश्रितैस्तोयैर्देवदेवं गलंति ये । अथवा पुष्पमध्ये तु स्थापयेज्जगदीश्वरम्

sugaṁdhamiśritaistoyairdevadevaṁ galaṁti ye athavā puṣpamadhye tu sthāpayejjagadīśvaram

जो सुगंध-मिश्रित जल से देवाधिदेव का अभिषेक करते हैं, अथवा पुष्पों के मध्य जगदीश्वर को स्थापित करना चाहिए।

श्लोक 62 (padma.5.80.62)

वृंदावनं तत्र गत्वा उपस्कृत्य फलानि च । विष्णुभक्तेन योग्येन भोजयेत्तदशेषतः

vṛṁdāvanaṁ tatra gatvā upaskṛtya phalāni ca viṣṇubhaktena yogyena bhojayettadaśeṣataḥ

वहाँ वृंदावन जाकर, फलों को तैयार करके, योग्य विष्णु-भक्त को उन सबका पूर्ण रूप से भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 63 (padma.5.80.63)

नारिकेलफलं बीजकोशं चोद्धृत्य दापयेत् । घोंटाफलं च पनसं कोशमुद्धृत्य दापयेत्

nārikelaphalaṁ bījakośaṁ coddhṛtya dāpayet ghoṁṭāphalaṁ ca panasaṁ kośamuddhṛtya dāpayet

नारियल फल का बीज-कोश निकालकर देना चाहिए; घोंटा फल और कटहल का कोश निकालकर देना चाहिए।

श्लोक 64 (padma.5.80.64)

दध्ना विमिश्रितं चान्नं घृतेनाप्लुत्य दापयेत् । पाचितं पिष्टकं पूपमष्टादशघृतेन च

dadhnā vimiśritaṁ cānnaṁ ghṛtenāplutya dāpayet pācitaṁ piṣṭakaṁ pūpamaṣṭādaśaghṛtena ca

दही से मिश्रित अन्न घी में डुबोकर देना चाहिए; पकाया हुआ पिष्टक, पूआ अठारह प्रकार के घी सहित,

श्लोक 65 (padma.5.80.65)

तैलैश्च तिलसंमिश्रैः फलं पक्वं प्रदापयेत् । यद्यदेवात्मनः प्रीतं तत्तदीशाय दापयेत्

tailaiśca tilasaṁmiśraiḥ phalaṁ pakvaṁ pradāpayet yadyadevātmanaḥ prītaṁ tattadīśāya dāpayet

तथा तिल-मिश्रित तेलों से पका हुआ फल देना चाहिए। जो-जो अपने को प्रिय हो, वही-वही स्वामी को अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 66 (padma.5.80.66)

दत्वा नैवेद्यवस्त्रादि नाददीत कथंचन । त्यक्तं च विष्णुमुद्दिश्य तद्भक्तेभ्यो विशेषतः

datvā naivedyavastrādi nādadīta kathaṁcana tyaktaṁ ca viṣṇumuddiśya tadbhaktebhyo viśeṣataḥ

नैवेद्य-वस्त्र आदि देकर, किसी भी प्रकार वापस नहीं लेना चाहिए; और विष्णु के निमित्त त्यागा हुआ वह विशेषतः उनके भक्तों को ही देना चाहिए।

श्लोक 67 (padma.5.80.67)

इति ते कथितं किंचित्समासेन महेश्वरि । गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति

iti te kathitaṁ kiṁcitsamāsena maheśvari gopanīyaṁ prayatnena svayoniriva pārvati

इस प्रकार, हे महेश्वरि! मैंने तुम्हें संक्षेप में यह कुछ कहा है; हे पार्वती! इसे अपने ही स्वजन के समान यत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए।

श्लोक 68 (padma.5.80.68)

श्रीकृष्णरूपगुणवर्णन शास्त्रवर्गबोधाधिकार इह चेदलमन्यपाठैः । तत्प्रेमभावरसभक्तिविलास नामहारेषु चेत्खलु मनः किमु कामिनीभिः

śrīkṛṣṇarūpaguṇavarṇana śāstravargabodhādhikāra iha cedalamanyapāṭhaiḥ tatpremabhāvarasabhaktivilāsa nāmahāreṣu cetkhalu manaḥ kimu kāminībhiḥ

श्रीकृष्ण के रूप-गुण-वर्णन के इस शास्त्र-वर्ग को समझने का यहाँ अधिकार हो तो अन्य पाठों से क्या लाभ? यदि मन उनके प्रेम-भाव-रस-भक्ति-विलास के नाम-हारों में रम जाए, तो कामिनियों से क्या प्रयोजन?

श्लोक 69 (padma.5.80.69)

तच्चेतसा प्रभजतां व्रजबालकेंद्रं वृंदावनक्षितितलं यमुनाजलं च । तल्लोकनाथपदपंकजधूलिमिश्रलिप्तं वपुः किल वृथागरुचंदनाद्यैः

taccetasā prabhajatāṁ vrajabālakeṁdraṁ vṛṁdāvanakṣititalaṁ yamunājalaṁ ca tallokanāthapadapaṁkajadhūlimiśraliptaṁ vapuḥ kila vṛthāgarucaṁdanādyaiḥ

जो पूर्ण हृदय से व्रज-बालकों के स्वामी, वृंदावन की भूमि और यमुना के जल की सेवा करते हैं, उस लोकनाथ के चरण-कमल की धूलि से मिश्रित, लिप्त शरीर के लिए वास्तव में अगुरु-चंदन आदि व्यर्थ ही हैं।

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