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पाताल खण्ड · अध्याय 82

दीक्षा-विधि और शिव का रहस्य

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

श्लोक 1 (padma.5.82.1)

शिव उवाच- अथ दीक्षाविधिं वक्ष्ये शृणु नारद तत्त्वतः । श्रवणादेव मुच्येत विना तस्य विधानतः

śiva uvāca- atha dīkṣāvidhiṁ vakṣye śṛṇu nārada tattvataḥ śravaṇādeva mucyeta vinā tasya vidhānataḥ

शिव बोले अब मैं दीक्षा-विधि कहूँगा, हे नारद! तत्त्वतः सुनो। इसके विधान के बिना, केवल श्रवण मात्र से ही मुक्ति हो जाती है।

श्लोक 2 (padma.5.82.2)

आविरंच्याज्जगत्सर्वं विज्ञाय नश्वरं बुधः । आध्यात्मिकादि त्रिविध दुःखमेवानुभूय च

āviraṁcyājjagatsarvaṁ vijñāya naśvaraṁ budhaḥ ādhyātmikādi trividha duḥkhamevānubhūya ca

ब्रह्मा की कृपा से सारे जगत को नश्वर जानकर, बुद्धिमान आध्यात्मिक आदि तीन प्रकार के दुःखों का अनुभव करके,

श्लोक 3 (padma.5.82.3)

अनित्यत्वाच्च सर्वेषां सुखानां मुनिसत्तम । दुःखपक्षे विनिक्षिप्य तानि तेभ्यो विवर्जितः

anityatvācca sarveṣāṁ sukhānāṁ munisattama duḥkhapakṣe vinikṣipya tāni tebhyo vivarjitaḥ

हे मुनिसत्तम! सभी सुखों की अनित्यता के कारण, उन्हें दुःख के पक्ष में रखकर, उनसे विरक्त होकर,

श्लोक 4 (padma.5.82.4)

विरज्य संसृतेर्हानौ साधनानि विचिंतयेत् । अनुत्तमसुखस्यापि संप्राप्तौ भृशनिर्वृतः

virajya saṁsṛterhānau sādhanāni viciṁtayet anuttamasukhasyāpi saṁprāptau bhṛśanirvṛtaḥ

संसार के क्षीण होने पर वैराग्य को प्राप्त होकर उपायों का चिंतन करे। परम सुख की प्राप्ति में भी अत्यंत निर्वृत,

श्लोक 5 (padma.5.82.5)

नराणां दुष्करत्वं हि विज्ञाय च महामतिः । भृशमार्त्तस्ततो विप्र मां गुरुं शरणं व्रजेत्

narāṇāṁ duṣkaratvaṁ hi vijñāya ca mahāmatiḥ bhṛśamārttastato vipra māṁ guruṁ śaraṇaṁ vrajet

मनुष्यों के लिए इसकी कठिनता जानकर वह महामति, अत्यंत व्याकुल होकर, हे विप्र! तब मुझ गुरु की शरण में जाए।

श्लोक 6 (padma.5.82.6)

शांतो विमत्सरः कृष्णे भक्तोऽनन्यप्रयोजनः । अनन्यसाधनः श्रीमान्कामलोभविवर्जितः

śāṁto vimatsaraḥ kṛṣṇe bhakto'nanyaprayojanaḥ ananyasādhanaḥ śrīmānkāmalobhavivarjitaḥ

शांत, ईर्ष्यारहित, कृष्ण का भक्त, अनन्य-प्रयोजनवाला, अनन्य-साधनवाला, श्रीमान, काम-लोभ से रहित,

श्लोक 7 (padma.5.82.7)

श्रीकृष्णरसतत्त्वज्ञः कृष्णमंत्रविदां वरः । कृष्णमंत्राश्रयो नित्यं मंत्रभक्तः सदा शुचिः

śrīkṛṣṇarasatattvajñaḥ kṛṣṇamaṁtravidāṁ varaḥ kṛṣṇamaṁtrāśrayo nityaṁ maṁtrabhaktaḥ sadā śuciḥ

श्रीकृष्ण-रस के तत्त्व को जानने वाला, कृष्ण-मंत्र जानने वालों में श्रेष्ठ, नित्य कृष्ण-मंत्र का आश्रित, सदा मंत्र-भक्त, सदा पवित्र,

श्लोक 8 (padma.5.82.8)

सद्धर्मशासकोनित्यं सदाचारनियोजकः । संप्रदायी कृपापूर्णो विरागी गुरुरुच्यते

saddharmaśāsakonityaṁ sadācāraniyojakaḥ saṁpradāyī kṛpāpūrṇo virāgī gururucyate

नित्य सद्धर्म का शासक, सदाचार में नियोजित करने वाला, संप्रदाय-दाता, कृपा से पूर्ण, विरागी ऐसा गुरु कहलाता है।

श्लोक 9 (padma.5.82.9)

एवमादिगुणः प्रायः शुश्रूषुर्गुरुपादयोः । गुरौ नितांतभक्तश्च मुमुक्षुः शिष्य उच्यते

evamādiguṇaḥ prāyaḥ śuśrūṣurgurupādayoḥ gurau nitāṁtabhaktaśca mumukṣuḥ śiṣya ucyate

ऐसे गुणों से युक्त, प्रायः गुरु-चरणों की सेवा चाहने वाला, गुरु में अत्यंत भक्त, मुमुक्षु शिष्य कहलाता है।

श्लोक 10 (padma.5.82.10)

यत्साक्षात्सेवनं तस्य प्रेम्णा भागवतो भवेत् । स मोक्षः प्रोच्यते प्राज्ञैर्वेदवेदांगवेदिभिः

yatsākṣātsevanaṁ tasya premṇā bhāgavato bhavet sa mokṣaḥ procyate prājñairvedavedāṁgavedibhiḥ

उसकी प्रेमपूर्वक साक्षात् सेवा ही भागवत-भाव है; उसे ही विद्वान, वेद-वेदांगों को जानने वाले, मोक्ष कहते हैं।

श्लोक 11 (padma.5.82.11)

आश्रित्य स्वगुरोः पादौ निजवृत्तं निवेदयेत् । स संदेहानपाकृत्य बोधयित्वा पुनः पुनः

āśritya svaguroḥ pādau nijavṛttaṁ nivedayet sa saṁdehānapākṛtya bodhayitvā punaḥ punaḥ

अपने गुरु के चरणों की शरण लेकर, अपना आचरण निवेदित करना चाहिए। संदेहों को दूर करके, बार-बार समझाकर,

श्लोक 12 (padma.5.82.12)

स्वपादप्रणतं शांतं शुश्रूषुं निजपादयोः । अतिहृष्टमनाः शिष्यं मनुमध्यापयेत्परम्

svapādapraṇataṁ śāṁtaṁ śuśrūṣuṁ nijapādayoḥ atihṛṣṭamanāḥ śiṣyaṁ manumadhyāpayetparam

अपने चरणों में झुके, शांत, अपनी सेवा चाहने वाले शिष्य को, अत्यंत हर्षित मनवाले गुरु को परम मनु (मंत्र) पढ़ाना चाहिए।

श्लोक 13 (padma.5.82.13)

चंदनेन मृदा वापि विलिखेद्बाहुमूलयोः । वामदक्षिणयोर्विप्र शंखचक्रे यथाक्रमम्

caṁdanena mṛdā vāpi vilikhedbāhumūlayoḥ vāmadakṣiṇayorvipra śaṁkhacakre yathākramam

चंदन से या मिट्टी से हे विप्र! बाएँ-दाएँ दोनों भुजाओं के मूल में क्रमशः शंख और चक्र अंकित करना चाहिए।

श्लोक 14 (padma.5.82.14)

ऊर्द्ध्वपुंड्रं ततः कुर्याद्भालादिषु विधानतः । ततोमंत्रद्वयं तस्य दक्षकर्णे विनिर्दिशेत्

ūrddhvapuṁḍraṁ tataḥ kuryādbhālādiṣu vidhānataḥ tatomaṁtradvayaṁ tasya dakṣakarṇe vinirdiśet

फिर ललाट आदि पर विधिपूर्वक ऊर्ध्वपुंड्र करना चाहिए। फिर उसके दाहिने कान में युगल मंत्र का निर्देश करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.5.82.15)

मंत्रार्थं च वदेत्तस्मै यथावदनुपूर्वशः । दासशब्दयुतं नाम धार्यं तस्य प्रयत्नतः

maṁtrārthaṁ ca vadettasmai yathāvadanupūrvaśaḥ dāsaśabdayutaṁ nāma dhāryaṁ tasya prayatnataḥ

और उसे यथाक्रम मंत्र का अर्थ बताना चाहिए। उसे 'दास' शब्द से युक्त नाम यत्नपूर्वक धारण कराना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.5.82.16)

ततोऽतिभक्त्या सस्नेहं वैष्णवान्भोजयेद्बुधः । श्रीगुरुं पूजयेच्चापि वस्त्रालंकरणादिभिः

tato'tibhaktyā sasnehaṁ vaiṣṇavānbhojayedbudhaḥ śrīguruṁ pūjayeccāpi vastrālaṁkaraṇādibhiḥ

फिर बुद्धिमान शिष्य को अत्यंत भक्ति और स्नेह से वैष्णवों को भोजन कराना चाहिए। श्रीगुरु की भी वस्त्र-आभूषण आदि से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 17 (padma.5.82.17)

सर्वस्वं गुरवे दद्यात्तदर्द्धं वा महामुने । स्वदेहमपि निक्षिप्य गुरौ स्थेयमकिंचनैः

sarvasvaṁ gurave dadyāttadarddhaṁ vā mahāmune svadehamapi nikṣipya gurau stheyamakiṁcanaiḥ

हे महामुने! अपना सर्वस्व, या कम से कम आधा, गुरु को देना चाहिए; अपनी देह भी अर्पित करके, निर्धन को गुरु में स्थिर रहना चाहिए।

श्लोक 18 (padma.5.82.18)

य एतैः पंचभिर्विद्वान्संस्कारैः संस्कृतो भवेत् । दास्यभागी स कृष्णस्य नान्यथा कल्पकोटिभिः

ya etaiḥ paṁcabhirvidvānsaṁskāraiḥ saṁskṛto bhavet dāsyabhāgī sa kṛṣṇasya nānyathā kalpakoṭibhiḥ

जो विद्वान इन पाँच संस्कारों से संस्कृत हो जाता है, वही कृष्ण की सेवा का भागी बनता है, अन्यथा करोड़ों कल्पों में भी नहीं।

श्लोक 19 (padma.5.82.19)

अंकनं चोर्द्ध्वपुंड्रश्च मंत्रो नामविधारणम् । पंचमो याग इत्युक्ताः संस्काराः पूर्वसूरिभिः

aṁkanaṁ corddhvapuṁḍraśca maṁtro nāmavidhāraṇam paṁcamo yāga ityuktāḥ saṁskārāḥ pūrvasūribhiḥ

अंकन, ऊर्ध्वपुंड्र, मंत्र, नाम-धारण, और पाँचवाँ याग यह कहा गया है पूर्व आचार्यों द्वारा संस्कार।

श्लोक 20 (padma.5.82.20)

अंकनं शंखचक्राद्यैः सच्छिद्रं पुंड्रमुच्यते । दासशब्दयुतं नाममंत्रो युगलसंज्ञकः

aṁkanaṁ śaṁkhacakrādyaiḥ sacchidraṁ puṁḍramucyate dāsaśabdayutaṁ nāmamaṁtro yugalasaṁjñakaḥ

शंख-चक्र आदि से अंकन; छिद्र सहित पुंड्र कहलाता है; 'दास' शब्द से युक्त नाम; युगल संज्ञावाला मंत्र,

श्लोक 21 (padma.5.82.21)

गुरुवैष्णवयोः पूजा याग इत्यभिधीयते । एते परमसंस्कारा मया ते परिकीर्तिताः

guruvaiṣṇavayoḥ pūjā yāga ityabhidhīyate ete paramasaṁskārā mayā te parikīrtitāḥ

गुरु और वैष्णव की पूजा को याग कहा जाता है। ये परम संस्कार मैंने तुम्हें कहे हैं।

श्लोक 22 (padma.5.82.22)

अथ तुभ्यं प्रपन्नानां धर्मान्वक्ष्यामि नारद । यानास्थाय गमिष्यंति हरिधाम नराः कलौ

atha tubhyaṁ prapannānāṁ dharmānvakṣyāmi nārada yānāsthāya gamiṣyaṁti haridhāma narāḥ kalau

अब मैं तुम्हें, हे नारद! शरणागतों के धर्म कहूँगा जिनका आश्रय लेकर कलियुग में मनुष्य हरि के धाम जाएँगे।

श्लोक 23 (padma.5.82.23)

इत्थं गुरोर्लब्धमंत्रो गुरुभक्तिपरायणः । सेवमानो गुरुं नित्यं तत्कृपां भावयेत्सुधीः

itthaṁ gurorlabdhamaṁtro gurubhaktiparāyaṇaḥ sevamāno guruṁ nityaṁ tatkṛpāṁ bhāvayetsudhīḥ

इस प्रकार गुरु से मंत्र प्राप्त करके, गुरु-भक्ति में परायण, नित्य गुरु की सेवा करते हुए, बुद्धिमान उनकी कृपा का चिंतन करे।

श्लोक 24 (padma.5.82.24)

सतां धर्मां स्ततः शिक्षेत्प्रपन्नानां विशेषतः । स्वेष्टदेवधिया नित्यं वैष्णवान्परितोषयेत्

satāṁ dharmāṁ stataḥ śikṣetprapannānāṁ viśeṣataḥ sveṣṭadevadhiyā nityaṁ vaiṣṇavānparitoṣayet

फिर उसे सज्जनों के धर्म सीखने चाहिए, विशेषकर शरणागतों के; अपने इष्ट-देव की भावना से नित्य वैष्णवों को संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.5.82.25)

ताडनं भर्त्सनं कामिभोग्यत्वेन यथा स्त्रियः । गृह्णंति वैष्णवानां च तत्तद्ग्राह्यं तथा बुधैः

tāḍanaṁ bhartsanaṁ kāmibhogyatvena yathā striyaḥ gṛhṇaṁti vaiṣṇavānāṁ ca tattadgrāhyaṁ tathā budhaiḥ

जैसे स्त्री अपने प्रियतम से ताड़ना-भर्त्सना को भी भोग-रूप में स्वीकार करती है, वैसे ही वैष्णवों से जो कुछ भी मिले, बुद्धिमानों को स्वीकार करना चाहिए।

श्लोक 26 (padma.5.82.26)

ऐहिक्यामुष्मिकी चिंता नैव कार्या कदाचन । ऐहिकं तु सदा भाव्यं पूर्वाचरितकर्मणा

aihikyāmuṣmikī ciṁtā naiva kāryā kadācana aihikaṁ tu sadā bhāvyaṁ pūrvācaritakarmaṇā

इस लोक और परलोक की चिंता कभी नहीं करनी चाहिए। इस लोक का जो कुछ है, वह सदा पूर्व-कर्मों के अनुसार ही समझना चाहिए,

श्लोक 27 (padma.5.82.27)

आमुष्मिकं तथा कृष्णः स्वयमेव करिष्यति । अतो हि तत्कृते त्याज्यः प्रयत्नः सर्वथा नरैः

āmuṣmikaṁ tathā kṛṣṇaḥ svayameva kariṣyati ato hi tatkṛte tyājyaḥ prayatnaḥ sarvathā naraiḥ

तथा परलोक का कार्य कृष्ण स्वयं ही करेंगे। इसलिए उसके लिए मनुष्यों को हर प्रकार से प्रयत्न त्याग देना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.5.82.28)

सर्वोपायपरित्यागः कृष्णीयात्मतयार्चनम् । सुचिरं प्रोषिते कांते यथा पतिपरायणा

sarvopāyaparityāgaḥ kṛṣṇīyātmatayārcanam suciraṁ proṣite kāṁte yathā patiparāyaṇā

सभी उपायों का त्याग करके, कृष्ण के ही आत्मभाव से पूजा करनी चाहिए, जैसे पति के चिरकाल तक प्रवास पर जाने पर पतिपरायणा स्त्री,

श्लोक 29 (padma.5.82.29)

प्रियानुरागिणी दीना तस्यसंगैककांक्षिणी । तद्गुणान्भावयेन्नित्यं गायत्यपि शृणोति च

priyānurāgiṇī dīnā tasyasaṁgaikakāṁkṣiṇī tadguṇānbhāvayennityaṁ gāyatyapi śṛṇoti ca

प्रिय में अनुरागिणी, दीन, केवल उसके संग की कामना करती हुई, नित्य उसके गुणों का चिंतन करे, गाए भी और सुने भी,

श्लोक 30 (padma.5.82.30)

श्रीकृष्णगुणलीलादि स्मरणादि तथाचरेत् । न पुनः साधनत्वेन कार्यं तत्तु कदाचन

śrīkṛṣṇaguṇalīlādi smaraṇādi tathācaret na punaḥ sādhanatvena kāryaṁ tattu kadācana

वैसे ही श्रीकृष्ण के गुण-लीला आदि का स्मरण आदि करे; किंतु उसे कभी भी पुनः किसी साधन के रूप में नहीं करना चाहिए।

श्लोक 31 (padma.5.82.31)

चिरं प्रोष्यागतं कांतं प्राप्य कांतधिया यथा । चुंबंती वा श्लिष्यंतीव नेत्रांते न पिबंत्यपि

ciraṁ proṣyāgataṁ kāṁtaṁ prāpya kāṁtadhiyā yathā cuṁbaṁtī vā śliṣyaṁtīva netrāṁte na pibaṁtyapi

जैसे चिरकाल बाद प्रवास से लौटे प्रिय को पाकर, प्रिय की ही भावना से युक्त स्त्री उसे चूमती या आलिंगन करती हुई पलक भी नहीं झपकती,

श्लोक 32 (padma.5.82.32)

ब्रह्मानंदगतेवाशु सेवते परया मुदा । श्रीमदर्चावतारेण तथा परिचरेद्धरिम्

brahmānaṁdagatevāśu sevate parayā mudā śrīmadarcāvatāreṇa tathā paricareddharim

ब्रह्मानंद को मानो शीघ्र प्राप्त हुई-सी परम हर्ष से सेवा करती है, वैसे ही श्रीमान प्रतिमा-अवतार में हरि की सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 33 (padma.5.82.33)

अनन्यशरणो नित्यं तथैवानन्यसाधनः । अनन्यसाधनार्थत्वात्स्यादनन्य प्रयोजनः

ananyaśaraṇo nityaṁ tathaivānanyasādhanaḥ ananyasādhanārthatvātsyādananya prayojanaḥ

नित्य अनन्य शरणवाला, और वैसे ही अनन्य साधनवाला होना चाहिए; अनन्य-साधन-प्रयोजन होने के कारण वह अनन्य-प्रयोजनवाला होगा।

श्लोक 34 (padma.5.82.34)

नान्यं च पूजयेद्देवं न नमेत्तं स्मरेन्न च । न च पश्येन्न गायेच्च न च निंदेत्कदाचन

nānyaṁ ca pūjayeddevaṁ na namettaṁ smarenna ca na ca paśyenna gāyecca na ca niṁdetkadācana

अन्य किसी देवता की पूजा न करे, उसे प्रणाम न करे, उसका स्मरण भी न करे; न उसे देखे, न गाए, और न कभी निंदा करे।

श्लोक 35 (padma.5.82.35)

नान्योच्छिष्टं च भुंजीत नान्यशेषं च धारयेत् । अवैष्णवानां संभाषा वंदनादि विवर्जयेत्

nānyocchiṣṭaṁ ca bhuṁjīta nānyaśeṣaṁ ca dhārayet avaiṣṇavānāṁ saṁbhāṣā vaṁdanādi vivarjayet

अन्य का जूठा न खाए, अन्य का शेष धारण न करे; अवैष्णवों से वार्तालाप और वंदन आदि का त्याग करे।

श्लोक 36 (padma.5.82.36)

ईशवैष्णवयोर्निंदां शृणुयान्न कदाचन । कर्णौ पिधाय गंतव्यं शक्तौ दंडं समाचरेत्

īśavaiṣṇavayorniṁdāṁ śṛṇuyānna kadācana karṇau pidhāya gaṁtavyaṁ śaktau daṁḍaṁ samācaret

ईश्वर और वैष्णव की निंदा कभी न सुने; कानों को बंद करके वहाँ से चला जाए, समर्थ होने पर दंड दे।

श्लोक 37 (padma.5.82.37)

आश्रित्य चातकीं वृत्तिं देहपातावधि द्विज । द्वयस्यार्थं भावयित्वा स्थेयमित्येव मे मतिः

āśritya cātakīṁ vṛttiṁ dehapātāvadhi dvija dvayasyārthaṁ bhāvayitvā stheyamityeva me matiḥ

चातक की वृत्ति का आश्रय लेकर, हे द्विज! देह-पात तक स्थिर रहना चाहिए; युगल-मंत्र के अर्थ का चिंतन करके, ऐसा ही रहना यही मेरा मत है।

श्लोक 38 (padma.5.82.38)

सरः समुद्र नद्यादीन्विहाय चातको यथा । तृषितो म्रियते वापि याचते वा पयोधरम्

saraḥ samudra nadyādīnvihāya cātako yathā tṛṣito mriyate vāpi yācate vā payodharam

जैसे चातक पक्षी सरोवर, समुद्र, नदी आदि को त्यागकर, प्यासा मर जाता है, या केवल मेघ से ही माँगता है,

श्लोक 39 (padma.5.82.39)

एवमेव प्रयत्नेन साधनानि विचिंतयेत् । स्वेष्टदेवःसदायाच्योगतिस्त्वंमेभवेरिति

evameva prayatnena sādhanāni viciṁtayet sveṣṭadevaḥsadāyācyogatistvaṁmebhaveriti

वैसे ही यत्नपूर्वक उपायों का चिंतन करना चाहिए मेरे इष्टदेव सदा प्रार्थनीय हैं, आप ही मेरे लिए गति हैं ऐसा,

श्लोक 40 (padma.5.82.40)

स्वेष्टदेव तदीयानां गुरोरपि विशेषतः । आनुकूल्ये सदा स्थेयं प्रातिकूल्यं विवर्जयेत्

sveṣṭadeva tadīyānāṁ gurorapi viśeṣataḥ ānukūlye sadā stheyaṁ prātikūlyaṁ vivarjayet

इष्टदेव, उनसे संबंधितों तथा विशेष रूप से गुरु के प्रति सदा अनुकूल रहना चाहिए, प्रतिकूलता का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 41 (padma.5.82.41)

सकृत्प्रपन्नो वक्ष्यामि कल्याणगुणतां तयोः । विचिंत्य विश्वसेदेतौ मामिमावुद्धरिष्यतः

sakṛtprapanno vakṣyāmi kalyāṇaguṇatāṁ tayoḥ viciṁtya viśvasedetau māmimāvuddhariṣyataḥ

एक बार शरणागत हुए के लिए, उन दोनों के कल्याणकारी गुणों को मैं कहूँगा विचार करके विश्वास करना चाहिए ये दोनों मुझे उद्धार करेंगे।

श्लोक 42 (padma.5.82.42)

संसारसागरान्नाथ मित्र पुत्र गृहा कुलात् । गोप्तारौ मे युवामेव प्रपन्नभयभंजनौ

saṁsārasāgarānnātha mitra putra gṛhā kulāt goptārau me yuvāmeva prapannabhayabhaṁjanau

हे नाथ! संसार-सागर से, मित्र, पुत्र, गृह, कुल से आप दोनों ही मेरे रक्षक हैं, शरणागत के भय को नष्ट करने वाले।

श्लोक 43 (padma.5.82.43)

योहं ममास्ति यत्किंचिदिह लोके परत्र च । तत्सर्वं भवतोरद्य चरणेषु समर्चितम्

yohaṁ mamāsti yatkiṁcidiha loke paratra ca tatsarvaṁ bhavatoradya caraṇeṣu samarcitam

जो मैं हूँ और जो कुछ भी इस लोक में या परलोक में मेरा है, वह सब आज आप दोनों के चरणों में अर्पित है।

श्लोक 44 (padma.5.82.44)

अहमस्म्यपराधानामालयस्त्यक्त साधनः । अगतिश्च ततो नाथौ भवंतावेव मे गतिः

ahamasmyaparādhānāmālayastyakta sādhanaḥ agatiśca tato nāthau bhavaṁtāveva me gatiḥ

मैं अपराधों का आलय हूँ, साधनों से त्यक्त हूँ; और कोई गति नहीं है, इसलिए हे नाथद्वय! आप ही मेरी गति हैं।

श्लोक 45 (padma.5.82.45)

तवास्मि राधिकाकांत कर्मणा मनसा गिरा । कृष्णकांते तवैवास्मि युवामेव गतिर्मम

tavāsmi rādhikākāṁta karmaṇā manasā girā kṛṣṇakāṁte tavaivāsmi yuvāmeva gatirmama

हे राधिकाकांत! मैं कर्म, मन और वाणी से आपका ही हूँ। हे कृष्णकांते! मैं आपकी ही हूँ, आप दोनों ही मेरी गति हैं।

श्लोक 46 (padma.5.82.46)

शरणं वां प्रपन्नोऽस्मि करुणानिकराकरौ । प्रसादं कुरु तं दास्यं मयि दुष्टेऽपराधिनि

śaraṇaṁ vāṁ prapanno'smi karuṇānikarākarau prasādaṁ kuru taṁ dāsyaṁ mayi duṣṭe'parādhini

करुणा के भंडार, आप दोनों की शरण मैंने ली है। मुझ दुष्ट अपराधी पर कृपा कीजिए, अपनी सेवा प्रदान कीजिए।

श्लोक 47 (padma.5.82.47)

इत्येवं जपता नित्यं स्थातव्यं पद्यपंचकम् । अचिरादेव तद्दास्यमिच्छता मुनिसत्तम

ityevaṁ japatā nityaṁ sthātavyaṁ padyapaṁcakam acirādeva taddāsyamicchatā munisattama

हे मुनिसत्तम! इस प्रकार नित्य जप करते हुए इन पाँच पदों में स्थिर रहना चाहिए; उस सेवा को चाहने वाले को यह शीघ्र ही प्राप्त होगी।

श्लोक 48 (padma.5.82.48)

बाह्यधर्मा मया ह्येते संक्षेपेणोपवर्णिताः । आंतरः परमो धर्मः प्रपन्नानामथोच्यते

bāhyadharmā mayā hyete saṁkṣepeṇopavarṇitāḥ āṁtaraḥ paramo dharmaḥ prapannānāmathocyate

ये बाह्य धर्म मैंने तुम्हें संक्षेप में बताए हैं। अब शरणागतों का जो परम आंतरिक धर्म है, वह कहा जाता है।

श्लोक 49 (padma.5.82.49)

कृष्णप्रिया सखीभावं समाश्रित्य प्रयत्नतः । तयोः सेवां प्रकुर्वीत दिवानक्तमतंद्रितः

kṛṣṇapriyā sakhībhāvaṁ samāśritya prayatnataḥ tayoḥ sevāṁ prakurvīta divānaktamataṁdritaḥ

कृष्ण-प्रिया की सखी-भाव का यत्नपूर्वक आश्रय लेकर, उन दोनों की सेवा दिन-रात बिना आलस्य के करनी चाहिए।

श्लोक 50 (padma.5.82.50)

उक्तो मंत्रस्तदंगानि तथा तस्याधिकारिणः । तद्धर्माश्च तथा तेभ्यः फलं मंत्रस्य नारद

ukto maṁtrastadaṁgāni tathā tasyādhikāriṇaḥ taddharmāśca tathā tebhyaḥ phalaṁ maṁtrasya nārada

मंत्र, उसके अंग, तथा उसके अधिकारी, उनके धर्म, और मंत्र का फल, हे नारद! ये सब कहे गए हैं।

श्लोक 51 (padma.5.82.51)

अनुतिष्ठ त्वमप्येतत्तयोर्दास्यमवाप्स्यसि । स्वाधिकारक्षये विप्र संदेहो नात्र कश्चन

anutiṣṭha tvamapyetattayordāsyamavāpsyasi svādhikārakṣaye vipra saṁdeho nātra kaścana

तुम भी इसका अनुष्ठान करो, तुम भी उन दोनों की सेवा प्राप्त करोगे। हे विप्र! अपने अधिकार के क्षय होने पर, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 52 (padma.5.82.52)

सकृन्मात्रप्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । निजदास्यं हरिर्दद्यान्न मेऽत्रास्ति विचारणा

sakṛnmātraprapannāya tavāsmīti ca yācate nijadāsyaṁ harirdadyānna me'trāsti vicāraṇā

एक बार मात्र शरणागत होकर 'मैं आपका हूँ' ऐसा माँगने वाले को हरि अपनी सेवा प्रदान करते हैं, इसमें मुझे कोई विचार नहीं है।

श्लोक 53 (padma.5.82.53)

अत्र ते वर्णयिष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् । श्रुतपूर्वं मया कृष्णात्साक्षाद्भगवतः परम्

atra te varṇayiṣyāmi rahasyaṁ paramādbhutam śrutapūrvaṁ mayā kṛṣṇātsākṣādbhagavataḥ param

अब मैं तुम्हें एक परम अद्भुत रहस्य बताऊँगा, जो मैंने पहले साक्षात् भगवान कृष्ण से ही सुना था।

श्लोक 54 (padma.5.82.54)

एष ते कथितो धर्म आंतरो मुनिसत्तम । गुह्यादेष गुह्यतमो गोपनीयः प्रयत्नतः

eṣa te kathito dharma āṁtaro munisattama guhyādeṣa guhyatamo gopanīyaḥ prayatnataḥ

हे मुनिसत्तम! यह तुम्हें आंतरिक धर्म कहा गया; यह गुह्य से भी गुह्यतम है, यत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए।

श्लोक 55 (padma.5.82.55)

मंत्ररत्नमहं पूर्वं जपन्कैलासमूर्द्धनि । ध्यायन्नारायणं देवमवसं गहने वने

maṁtraratnamahaṁ pūrvaṁ japankailāsamūrddhani dhyāyannārāyaṇaṁ devamavasaṁ gahane vane

पहले मैं कैलास के शिखर पर मंत्ररत्न का जप करते हुए, देव नारायण का ध्यान करते हुए, घने वन में निवास करता था।

श्लोक 56 (padma.5.82.56)

ततस्तु भगवांस्तुष्टः प्रादुरास ममाग्रतः । व्रियतां वर इत्युक्ते मयाप्युद्घाट्य लोचने

tatastu bhagavāṁstuṣṭaḥ prādurāsa mamāgrataḥ vriyatāṁ vara ityukte mayāpyudghāṭya locane

तब भगवान प्रसन्न होकर मेरे सामने प्रकट हुए। वर माँगो ऐसा कहे जाने पर मैंने भी नेत्र खोले,

श्लोक 57 (padma.5.82.57)

दृष्टो देवःप्रिया सार्द्धं संस्थितो गरुडोपरि । प्रणिपत्यावोचमहं वरदं कमलापतिम्

dṛṣṭo devaḥpriyā sārddhaṁ saṁsthito garuḍopari praṇipatyāvocamahaṁ varadaṁ kamalāpatim

और प्रिया सहित गरुड़ पर विराजमान देव को देखा। प्रणाम करके मैंने वरदाता कमलापति से कहा।

श्लोक 58 (padma.5.82.58)

यद्रूपं ते कृपासिंधो परमानंददायकम् । सर्वानंदाश्रयं नित्यं मूर्तिमत्सर्वतोऽधिकम्

yadrūpaṁ te kṛpāsiṁdho paramānaṁdadāyakam sarvānaṁdāśrayaṁ nityaṁ mūrtimatsarvato'dhikam

हे कृपासिंधो! आपका जो रूप परमानंददायक है, सर्व-आनंद का नित्य आश्रय, सर्वथा मूर्तिमान अधिक,

श्लोक 59 (padma.5.82.59)

निर्गुणं निष्क्रियं शांतं यद्ब्रह्मेति विदुर्बुधाः । तदहं द्रष्टुमिच्छामि चक्षुर्भ्यां परमेश्वर

nirguṇaṁ niṣkriyaṁ śāṁtaṁ yadbrahmeti vidurbudhāḥ tadahaṁ draṣṭumicchāmi cakṣurbhyāṁ parameśvara

निर्गुण, निष्क्रिय, शांत, जिसे विद्वान ब्रह्म कहते हैं, उसे मैं अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ, हे परमेश्वर!

श्लोक 60 (padma.5.82.60)

ततो मामाह भगवान्प्रपन्नं कमलापतिः । तदद्य द्रक्ष्यसे रूपं यत्ते मनसि कांक्षितम्

tato māmāha bhagavānprapannaṁ kamalāpatiḥ tadadya drakṣyase rūpaṁ yatte manasi kāṁkṣitam

तब कमलापति भगवान ने शरणागत मुझसे कहा आज तुम वह रूप देखोगे जो तुम्हारे मन में वांछित है।

श्लोक 61 (padma.5.82.61)

यमुना पश्चिमे तीरे गच्छ वृंदावनं मम । इत्युक्त्वांतर्दधे देवः प्रियासार्द्धं जगत्पतिः

yamunā paścime tīre gaccha vṛṁdāvanaṁ mama ityuktvāṁtardadhe devaḥ priyāsārddhaṁ jagatpatiḥ

यमुना के पश्चिम तट पर मेरे वृंदावन में जाओ। ऐसा कहकर जगत्पति देव प्रिया सहित अंतर्धान हो गए।

श्लोक 62 (padma.5.82.62)

अहमप्यागतस्तर्हि यमुनायास्तटं शुभम् । तत्र कृष्णमपश्यं च सर्वदेवेश्वरेश्वरम्

ahamapyāgatastarhi yamunāyāstaṭaṁ śubham tatra kṛṣṇamapaśyaṁ ca sarvadeveśvareśvaram

मैं भी तब यमुना के शुभ तट पर आया। वहाँ मैंने सभी देवेश्वरों के भी ईश्वर कृष्ण को देखा,

श्लोक 63 (padma.5.82.63)

गोपवेषधरं कांतं किशोरवयसान्वितम् । प्रियास्कंधे सुविन्यस्त वामहस्तं मनोहरम्

gopaveṣadharaṁ kāṁtaṁ kiśoravayasānvitam priyāskaṁdhe suvinyasta vāmahastaṁ manoharam

गोप-वेषधारी, प्रिय, किशोर-अवस्था से युक्त, अपनी प्रिया के कंधे पर सुंदर रूप से रखा बायाँ हाथ, मनोहर,

श्लोक 64 (padma.5.82.64)

हसंतं हासयतं तां मध्ये गोपीकदंबके । स्निग्धमेघसमाभासं कल्याणगुणमंदिरम्

hasaṁtaṁ hāsayataṁ tāṁ madhye gopīkadaṁbake snigdhameghasamābhāsaṁ kalyāṇaguṇamaṁdiram

हँसते हुए, उसे भी हँसाते हुए, गोपी-समूह के मध्य में, स्निग्ध मेघ जैसी कांतिवाले, कल्याण-गुणों के मंदिर।

श्लोक 65 (padma.5.82.65)

प्रहस्य च ततः कृष्णो मामाहामृतभाषणः । अहं ते दर्शनं यातो ज्ञात्वा रुद्र तवेप्सितम्

prahasya ca tataḥ kṛṣṇo māmāhāmṛtabhāṣaṇaḥ ahaṁ te darśanaṁ yāto jñātvā rudra tavepsitam

तब हँसकर, अमृत-वाणी बोलने वाले कृष्ण ने मुझसे कहा हे रुद्र! तुम्हारी इच्छा जानकर मैं तुम्हारे दर्शन के लिए आया हूँ।

श्लोक 66 (padma.5.82.66)

यदद्य मे त्वया दृष्टमिदं रूपमलौकिकम् । घनीभूतामलप्रेम सच्चिदानंदविग्रहम्

yadadya me tvayā dṛṣṭamidaṁ rūpamalaukikam ghanībhūtāmalaprema saccidānaṁdavigraham

आज तुमने जो यह अलौकिक रूप देखा है, यह सघन, निर्मल प्रेम, सच्चिदानंद-विग्रह है,

श्लोक 67 (padma.5.82.67)

नीरूपं निर्गुणं व्यापि क्रियाहीनं परात्परम् । वदंत्युपनिषत्संघा इदमेव ममानघम्

nīrūpaṁ nirguṇaṁ vyāpi kriyāhīnaṁ parātparam vadaṁtyupaniṣatsaṁghā idameva mamānagham

निराकार, निर्गुण, व्यापक, क्रियारहित, परे से भी परे यही उपनिषदों के समूह मेरा अनघ (निर्दोष) स्वरूप कहते हैं।

श्लोक 68 (padma.5.82.68)

प्रकृत्युत्थगुणाभावादनंतत्वात्तथेश्वरम् । असिद्धत्वान्मद्गुणानां निर्गुणं मां वदंति हि

prakṛtyutthaguṇābhāvādanaṁtatvāttatheśvaram asiddhatvānmadguṇānāṁ nirguṇaṁ māṁ vadaṁti hi

प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अभाव के कारण, तथा अनंतता के कारण मुझे ईश्वर कहते हैं; मेरे गुणों की असिद्धता के कारण मुझे निर्गुण कहते हैं,

श्लोक 69 (padma.5.82.69)

अदृश्यत्वान्ममैतस्य रूपस्य चर्मचक्षुषा । अरूपं मां वदंत्येते वेदाः सर्वे महेश्वर

adṛśyatvānmamaitasya rūpasya carmacakṣuṣā arūpaṁ māṁ vadaṁtyete vedāḥ sarve maheśvara

इस मेरे रूप के चर्म-नेत्रों से अदृश्य होने के कारण, हे महेश्वर! सभी वेद मुझे अरूप कहते हैं।

श्लोक 70 (padma.5.82.70)

व्यापकत्वाच्चिदंशेन ब्रह्मेति च विदुर्बुधाः । अकर्तृत्वात्प्रपंचस्य निष्क्रियं मां वदंति हि

vyāpakatvāccidaṁśena brahmeti ca vidurbudhāḥ akartṛtvātprapaṁcasya niṣkriyaṁ māṁ vadaṁti hi

चित्-अंश से व्यापकता के कारण विद्वान मुझे ब्रह्म कहते हैं; प्रपंच का कर्ता न होने के कारण मुझे निष्क्रिय कहते हैं,

श्लोक 71 (padma.5.82.71)

मायागुणैर्यतोमेंऽशा कुर्वंति सर्जनादिकम् । न करोमि स्वयं किंचित्सृष्ट्यादिकमहं शिव

māyāguṇairyatomeṁ'śā kurvaṁti sarjanādikam na karomi svayaṁ kiṁcitsṛṣṭyādikamahaṁ śiva

क्योंकि माया की शक्तियों से मेरे अंश ही सृष्टि आदि करते हैं मैं स्वयं सृष्टि आदि कुछ भी नहीं करता, हे शिव!

श्लोक 72 (padma.5.82.72)

अहमासां महादेव गोपीनां प्रेमविह्वलः । क्रियांतरं न जानामि नात्मानमपि नारद

ahamāsāṁ mahādeva gopīnāṁ premavihvalaḥ kriyāṁtaraṁ na jānāmi nātmānamapi nārada

हे महादेव! मैं इन गोपियों के प्रेम से विह्वल हूँ; मैं अन्य किसी क्रिया को नहीं जानता, अपने आप को भी नहीं, हे नारद!

श्लोक 73 (padma.5.82.73)

विहराम्यनया नित्यमस्याः प्रेमवशीकृतः । इमां तु मत्प्रियां विद्धि राधिकां परदेवताम्

viharāmyanayā nityamasyāḥ premavaśīkṛtaḥ imāṁ tu matpriyāṁ viddhi rādhikāṁ paradevatām

मैं इसी के साथ नित्य विहार करता हूँ, इसके प्रेम से वशीभूत होकर। इसे मेरी प्रिया, राधिका, परदेवता जानो।

श्लोक 74 (padma.5.82.74)

अस्याश्च परितः पश्य सख्यः शतसहस्रशः । नित्याः सर्वा इमा रुद्र यथाहं नित्यविग्रहः

asyāśca paritaḥ paśya sakhyaḥ śatasahasraśaḥ nityāḥ sarvā imā rudra yathāhaṁ nityavigrahaḥ

और इसके चारों ओर सैकड़ों-हजारों सखियों को देखो; ये सब नित्य हैं, हे रुद्र! जैसे मैं नित्य-विग्रह हूँ।

श्लोक 75 (padma.5.82.75)

गोपा गावो गोपिकाश्च सदा वृंदावनं मम । सर्वमेतन्नित्यमेव चिदानंदरसात्मकम्

gopā gāvo gopikāśca sadā vṛṁdāvanaṁ mama sarvametannityameva cidānaṁdarasātmakam

गोप, गौएँ, और गोपिकाएँ, तथा वृंदावन सदा मेरे हैं; यह सब नित्य ही है, चिदानंद-रस-स्वरूप।

श्लोक 76 (padma.5.82.76)

इदमानंदकंदाख्यं विद्धि वृंदावनं मम । यस्मिन्प्रवेशमात्रेण न पुनः संसृतिं विशेत्

idamānaṁdakaṁdākhyaṁ viddhi vṛṁdāvanaṁ mama yasminpraveśamātreṇa na punaḥ saṁsṛtiṁ viśet

इसे आनंदकंद नामक मेरा वृंदावन जानो जिसमें प्रवेश मात्र से पुनः संसार में प्रवेश नहीं होता।

श्लोक 77 (padma.5.82.77)

मद्वनं प्राप्य यो मूढः पुनरन्यत्र गच्छति । स आत्महा भवेदेव सत्यं सत्यं मयोदितम्

madvanaṁ prāpya yo mūḍhaḥ punaranyatra gacchati sa ātmahā bhavedeva satyaṁ satyaṁ mayoditam

जो मूढ़ मेरे वन को प्राप्त करके पुनः अन्यत्र जाता है, वह आत्महत्यारा ही होता है यह सत्य, सत्य ही मैंने कहा है।

श्लोक 78 (padma.5.82.78)

वृंदावनं परित्यज्य नैव गच्छाम्यहं क्वचित् । निवसाम्यनया सार्द्धमहमत्रैव सर्वदा

vṛṁdāvanaṁ parityajya naiva gacchāmyahaṁ kvacit nivasāmyanayā sārddhamahamatraiva sarvadā

मैं वृंदावन को त्यागकर कहीं भी नहीं जाता; मैं यहीं इसके साथ सदा निवास करता हूँ।

श्लोक 79 (padma.5.82.79)

इत्येवं सर्वमाख्यातं यत्ते रुद्र हृदि स्थितम् । कथयस्व ममेदानीं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

ityevaṁ sarvamākhyātaṁ yatte rudra hṛdi sthitam kathayasva mamedānīṁ kimanyacchrotumicchasi

इस प्रकार, हे रुद्र! तुम्हारे हृदय में जो था, वह सब कह दिया गया। अब मुझे बताओ, तुम और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 80 (padma.5.82.80)

ततस्तमब्रवं देवमहं च मुनिसत्तम । ईदृशस्त्वं कथं लभ्यस्तमुपायं वदस्व मे

tatastamabravaṁ devamahaṁ ca munisattama īdṛśastvaṁ kathaṁ labhyastamupāyaṁ vadasva me

हे मुनिसत्तम! तब मैंने उस देव से कहा ऐसे आप कैसे प्राप्त होते हैं, वह उपाय मुझे बताइए।

श्लोक 81 (padma.5.82.81)

ततो मामाह भगवान्साधु रुद्र तवोदितम् । अतिगुह्यतमं ह्येतद्गोपनीयं प्रयत्नतः

tato māmāha bhagavānsādhu rudra tavoditam atiguhyatamaṁ hyetadgopanīyaṁ prayatnataḥ

तब भगवान ने मुझसे कहा हे रुद्र! तुमने भलीभाँति कहा है; यह अत्यंत गुह्य है, यत्नपूर्वक गोपनीय रखने योग्य है।

श्लोक 82 (padma.5.82.82)

सकृदावां प्रपन्नो यस्त्यक्तोपाय उपासते । गोपीभावेन देवेश स मामेति न चेतरः

sakṛdāvāṁ prapanno yastyaktopāya upāsate gopībhāvena deveśa sa māmeti na cetaraḥ

जो हम दोनों की एक बार भी शरण लेकर, साधनों को त्यागकर, गोपी-भाव से उपासना करता है, हे देवेश! वही मुझे प्राप्त करता है, अन्य नहीं।

श्लोक 83 (padma.5.82.83)

सकृदावां प्रपन्नो वा मत्प्रियामेकिकामुत । सेवतेनन्यभावेन स मामेति न संशयः

sakṛdāvāṁ prapanno vā matpriyāmekikāmuta sevatenanyabhāvena sa māmeti na saṁśayaḥ

या जो हम दोनों की एक बार शरण लेकर, केवल मेरी प्रिया की अनन्य भाव से सेवा करता है, वह मुझे प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 84 (padma.5.82.84)

यो मामेव प्रपन्नश्च मत्प्रियां न महेश्वर । न कदापि स चाप्नोति मामेवं ते मयोदितम्

yo māmeva prapannaśca matpriyāṁ na maheśvara na kadāpi sa cāpnoti māmevaṁ te mayoditam

किंतु जो केवल मेरी शरण में गया है, मेरी प्रिया की नहीं, हे महेश्वर! वह मुझे कभी नहीं प्राप्त करता ऐसा मैंने तुम्हें कहा है।

श्लोक 85 (padma.5.82.85)

सकृदेव प्रपन्नोयस्तवास्मीति वदेदपि । साधनेन विनाप्येव मामाप्नोति न संशयः

sakṛdeva prapannoyastavāsmīti vadedapi sādhanena vināpyeva māmāpnoti na saṁśayaḥ

जो एक बार भी शरणागत होकर 'मैं आपका हूँ' ऐसा कहता भी है, वह बिना साधन के भी मुझे प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 86 (padma.5.82.86)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मत्प्रियां शरणं व्रजेत् । आश्रित्य मत्प्रियां रुद्र मां वशीकर्त्तुमर्हसि

tasmātsarvaprayatnena matpriyāṁ śaraṇaṁ vrajet āśritya matpriyāṁ rudra māṁ vaśīkarttumarhasi

इसलिए हर प्रकार से यत्न करके मेरी प्रिया की शरण लेनी चाहिए। हे रुद्र! मेरी प्रिया की शरण लेकर तुम मुझे वश में कर सकोगे।

श्लोक 87 (padma.5.82.87)

इदं रहस्यं परमं मया ते परिकीर्तितम् । त्वयाप्येतन्महादेव गोपनीयं प्रयत्नतः

idaṁ rahasyaṁ paramaṁ mayā te parikīrtitam tvayāpyetanmahādeva gopanīyaṁ prayatnataḥ

यह परम रहस्य मैंने तुम्हें बताया है; हे महादेव! तुम्हें भी इसे यत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए।

श्लोक 88 (padma.5.82.88)

त्वमप्येनां समाश्रित्य राधिकां मम वल्लभाम् । जपन्मे युगलं मंत्रं सदा तिष्ठ मदालये

tvamapyenāṁ samāśritya rādhikāṁ mama vallabhām japanme yugalaṁ maṁtraṁ sadā tiṣṭha madālaye

तुम भी मेरी प्रिया राधिका की शरण लेकर, मेरे युगल-मंत्र का जप करते हुए, सदा मेरे धाम में स्थित रहो।

श्लोक 89 (padma.5.82.89)

शिव उवाच-। इत्युक्त्वा दक्षिणे कर्णे मम कृष्णो दयानिधिः । उपदिश्य परं मंत्रं संस्कारांश्च विधाय हि

śiva uvāca- ityuktvā dakṣiṇe karṇe mama kṛṣṇo dayānidhiḥ upadiśya paraṁ maṁtraṁ saṁskārāṁśca vidhāya hi

शिव बोले ऐसा कहकर मेरे दाहिने कान में दयानिधि कृष्ण ने परम मंत्र का उपदेश देकर तथा संस्कार करके,

श्लोक 90 (padma.5.82.90)

सगणोंऽतर्दधे विप्र तत्रैव मम पश्यतः । अहमप्यत्र तिष्ठामि तदारभ्य निरंतरम्

sagaṇoṁ'tardadhe vipra tatraiva mama paśyataḥ ahamapyatra tiṣṭhāmi tadārabhya niraṁtaram

हे विप्र! अपने गण सहित वहीं, मेरे देखते-देखते अंतर्धान हो गए। मैं भी तब से यहीं निरंतर स्थित हूँ।

श्लोक 91 (padma.5.82.91)

सर्वमेतन्मया तुभ्यं सांगमेव प्रकीर्त्तितम् । अधुना वद विप्रेंद्र किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

sarvametanmayā tubhyaṁ sāṁgameva prakīrttitam adhunā vada vipreṁdra kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

यह सब मैंने तुम्हें उसके अंगों सहित कह दिया है। अब, हे विप्रेंद्र! बताओ, तुम और क्या सुनना चाहते हो?

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