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पाताल खण्ड · अध्याय 88

पाँच प्रकार के पुत्र

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

श्लोक 1 (padma.5.88.1)

सुमनोवाच- ऋणसंबंधिनं पुत्रं प्रवक्ष्यामि तवाग्रतः । ऋणं यस्य गृहीत्वा यः प्रयाति मरणं किल

sumanovāca- ṛṇasaṁbaṁdhinaṁ putraṁ pravakṣyāmi tavāgrataḥ ṛṇaṁ yasya gṛhītvā yaḥ prayāti maraṇaṁ kila

सुमना बोलीं अब मैं तुम्हारे आगे ऋण-संबंधी पुत्र के बारे में कहूँगी जो किसी से ऋण लेकर मृत्यु को प्राप्त होता है,

श्लोक 2 (padma.5.88.2)

अर्थदाता सुतो भूत्वा भ्रातावाथ पिता प्रिया । मित्ररूपेण वर्तेत अंतर्दुष्टः सदैव सः

arthadātā suto bhūtvā bhrātāvātha pitā priyā mitrarūpeṇa varteta aṁtarduṣṭaḥ sadaiva saḥ

वह उस अर्थ-दाता का पुत्र, या भाई, या पिता, या प्रिय पत्नी बनकर, मित्र के रूप में व्यवहार करता है, किंतु सदा भीतर से दुष्ट रहता है।

श्लोक 3 (padma.5.88.3)

गुणं नैव प्रपश्येत स क्रूरो निष्ठुराकृतिः । जल्पते निष्ठुरं वाक्यं सदैव स्वजनेषु च

guṇaṁ naiva prapaśyeta sa krūro niṣṭhurākṛtiḥ jalpate niṣṭhuraṁ vākyaṁ sadaiva svajaneṣu ca

वह गुण नहीं देखता, क्रूर, कठोर स्वभाव का होता है; वह सदा अपने ही स्वजनों से कठोर वचन बोलता है।

श्लोक 4 (padma.5.88.4)

मिष्टं मिष्टं समश्नाति भोगान्भुंजति नित्यशः । द्यूतकर्मरतो नित्यं चौरकर्मणि सस्पृहः

miṣṭaṁ miṣṭaṁ samaśnāti bhogānbhuṁjati nityaśaḥ dyūtakarmarato nityaṁ caurakarmaṇi saspṛhaḥ

वह मीठे-मीठे पदार्थ खाता है, नित्य भोगों को भोगता है, सदा जुए में रत, चोरी के कर्म में लालायित रहता है।

श्लोक 7 (padma.5.88.7)

गृहाद्द्रव्यं चोरयति वार्यमाणः स कुप्यति । पितरं मातरं चैव कुत्सते च दिनेदिने

gṛhāddravyaṁ corayati vāryamāṇaḥ sa kupyati pitaraṁ mātaraṁ caiva kutsate ca dinedine

घर से धन चुराता है, रोकने पर क्रोधित होता है; पिता और माता को प्रतिदिन कोसता है।

श्लोक 8 (padma.5.88.8)

एवं संक्षीयते द्रव्यमेवमेतद्वदत्यपि । गृहं क्षेत्रादिकं सर्वं ममैव हि न संशयः

evaṁ saṁkṣīyate dravyamevametadvadatyapi gṛhaṁ kṣetrādikaṁ sarvaṁ mamaiva hi na saṁśayaḥ

इस प्रकार धन क्षीण होता जाता है, और वह यह भी कहता है घर, खेत आदि सब कुछ मेरा ही है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 9 (padma.5.88.9)

पितरं मातरं चैव हिनस्त्येव दिने दिने । सुदंडैर्मुशलैश्चैव केशोत्पाटैश्च दारुणैः

pitaraṁ mātaraṁ caiva hinastyeva dine dine sudaṁḍairmuśalaiścaiva keśotpāṭaiśca dāruṇaiḥ

वह पिता और माता को प्रतिदिन कठोर दंडों, मूसलों तथा भयंकर केश-उखाड़ने से पीड़ित करता है।

श्लोक 10 (padma.5.88.10)

मृते तु तस्मिन्पितरि मातरि चातिनिष्ठुरः । निःस्नेहो निष्ठुरश्चैव जायते नात्र संशयः

mṛte tu tasminpitari mātari cātiniṣṭhuraḥ niḥsneho niṣṭhuraścaiva jāyate nātra saṁśayaḥ

पिता के मरने पर, माता के प्रति अत्यंत निष्ठुर, स्नेहरहित और कठोर हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 11 (padma.5.88.11)

श्राद्धकार्याणि दानानि न करोति सदैव सः । एवंविधाः प्रियाः पुत्रा भवंति च महीपते

śrāddhakāryāṇi dānāni na karoti sadaiva saḥ evaṁvidhāḥ priyāḥ putrā bhavaṁti ca mahīpate

वह श्राद्ध-कार्य और दान कभी नहीं करता हे महीपते! ऐसे ही होते हैं वे प्रिय पुत्र।

श्लोक 12 (padma.5.88.12)

रिपुं पुत्रं प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम । बाल्येवयसि संप्राप्ते पुत्रत्वे वर्तते सदा

ripuṁ putraṁ pravakṣyāmi tavāgre dvijasattama bālyevayasi saṁprāpte putratve vartate sadā

अब मैं तुम्हारे आगे शत्रु-पुत्र के बारे में कहूँगी, हे द्विजसत्तम! बाल्यावस्था से ही वह सदा पुत्र-भाव में रहता है,

श्लोक 13 (padma.5.88.13)

पितरं मातरं चैव क्रीडमानो हि ताडयेत् । ताडयित्वा प्रयात्येवं प्रहस्यैवं पुनः पुनः

pitaraṁ mātaraṁ caiva krīḍamāno hi tāḍayet tāḍayitvā prayātyevaṁ prahasyaivaṁ punaḥ punaḥ

वह खेलते हुए पिता-माता को मारता है; मारकर हँसते हुए चला जाता है, बार-बार।

श्लोक 14 (padma.5.88.14)

पुनरायाति तं तत्र पितरं मातरं पुनः । सक्रोधो वर्तते नित्यं कुत्सते च दिनेदिने

punarāyāti taṁ tatra pitaraṁ mātaraṁ punaḥ sakrodho vartate nityaṁ kutsate ca dinedine

फिर उसी पिता-माता के पास लौट आता है; सदा क्रोध से भरा रहता है, प्रतिदिन उन्हें कोसता है।

श्लोक 15 (padma.5.88.15)

एवं संवर्तते नित्यं वैरकर्मणि संपदा । पितरं ताडयित्वा च मातरं च ततः पुनः

evaṁ saṁvartate nityaṁ vairakarmaṇi saṁpadā pitaraṁ tāḍayitvā ca mātaraṁ ca tataḥ punaḥ

इस प्रकार वह सदा समृद्धि में भी वैर-कर्म में लगा रहता है, पिता को मारकर, फिर माता को भी,

श्लोक 16 (padma.5.88.16)

प्रयात्येवं स दुष्टात्मा पूर्ववैरानुभावतः । अथातः संप्रवक्ष्यामि यथालभ्यं भवेत्प्रियम्

prayātyevaṁ sa duṣṭātmā pūrvavairānubhāvataḥ athātaḥ saṁpravakṣyāmi yathālabhyaṁ bhavetpriyam

वह दुष्टात्मा पूर्व-वैर के प्रभाव से इसी प्रकार चला जाता है। अब आगे मैं कहूँगी कि जितना संभव हो, प्रिय क्या करना चाहिए।

श्लोक 17 (padma.5.88.17)

जातमात्रं प्रियं कुर्याद्बाल्ये क्रीडनताडनैः । वयः प्राप्य प्रियं कुर्यान्मातृपित्रोरनंतरम्

jātamātraṁ priyaṁ kuryādbālye krīḍanatāḍanaiḥ vayaḥ prāpya priyaṁ kuryānmātṛpitroranaṁtaram

जन्म से ही उसके प्रति प्रीति करनी चाहिए, बाल्यावस्था में क्रीड़ा और हल्के दंड से; आयु प्राप्त होने पर माता-पिता के प्रति तुरंत प्रीति करनी चाहिए।

श्लोक 18 (padma.5.88.18)

भक्त्या संतोषयेन्नित्यं तावुभौ परितोषयेत् । स्नेहेन वचसा चैव प्रियसंभाषणेन च

bhaktyā saṁtoṣayennityaṁ tāvubhau paritoṣayet snehena vacasā caiva priyasaṁbhāṣaṇena ca

भक्तिपूर्वक सदा उन्हें संतुष्ट करना चाहिए, दोनों को स्नेह, वचन और प्रिय संभाषण से परितुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 19 (padma.5.88.19)

मृतौ गुरू समाज्ञाय स्नेहेन रुदते पुनः । श्राद्धकर्माणि सर्वाणि पिंडदानादिकां क्रियाम्

mṛtau gurū samājñāya snehena rudate punaḥ śrāddhakarmāṇi sarvāṇi piṁḍadānādikāṁ kriyām

माता-पिता की मृत्यु पर उन्हें गुरु मानकर स्नेह से पुनः रोना चाहिए; सभी श्राद्ध-कर्म, पिंडदान आदि क्रियाएँ,

श्लोक 20 (padma.5.88.20)

करोत्येवसुदुःखार्तस्तेभ्यो यात्रां प्रयच्छति । ऋणत्रयान्वितः स्नेहान्मोचयेद्यस्तु निश्चितः

karotyevasuduḥkhārtastebhyo yātrāṁ prayacchati ṛṇatrayānvitaḥ snehānmocayedyastu niścitaḥ

अत्यंत दुःखार्त होकर करता है, उनके लिए (मृत्यु के बाद की) यात्रा-सामग्री देता है। जो तीनों ऋणों से युक्त होकर स्नेह से उनसे मुक्त होने का निश्चय करता है,

श्लोक 21 (padma.5.88.21)

यस्माल्लभ्यं भवेत्कांत प्रयच्छति न संशयः । पुत्रो भूत्वा महाप्राज्ञ अनेनविधिना किल

yasmāllabhyaṁ bhavetkāṁta prayacchati na saṁśayaḥ putro bhūtvā mahāprājña anenavidhinā kila

हे कांत! जितना उससे प्राप्त होना चाहिए, वह देता है, इसमें संदेह नहीं। हे महाप्राज्ञ! इस विधि से ही वह पुत्र बनता है।

श्लोक 22 (padma.5.88.22)

उदासीनं प्रवक्ष्यामि तवाग्रे प्रिय सांप्रतम् । उदासीनेन भावेन सदैव परिवर्तते

udāsīnaṁ pravakṣyāmi tavāgre priya sāṁpratam udāsīnena bhāvena sadaiva parivartate

अब मैं तुम्हारे आगे, हे प्रिय! उदासीन पुत्र के बारे में कहूँगी वह सदा उदासीन भाव से ही व्यवहार करता है।

श्लोक 23 (padma.5.88.23)

ददाति नैव गृह्णाति न च कुप्यति तुष्यति । नो वा प्रयाति संत्यज्य उदासीनो द्विजोत्तम

dadāti naiva gṛhṇāti na ca kupyati tuṣyati no vā prayāti saṁtyajya udāsīno dvijottama

वह न देता है, न लेता है, न क्रोधित होता है, न प्रसन्न होता है; हे द्विजोत्तम! वह न ही छोड़कर चला जाता है, ऐसा उदासीन होता है।

श्लोक 24 (padma.5.88.24)

भृत्याश्चापि समाख्याताः पशवस्तुरगास्तथा । गजा महिष्यो दास्यश्च ऋणसंबंधिनस्त्वमी

bhṛtyāścāpi samākhyātāḥ paśavasturagāstathā gajā mahiṣyo dāsyaśca ṛṇasaṁbaṁdhinastvamī

सेवक, पशु, घोड़े, हाथी, भैंसें और दासियाँ भी इसी प्रकार ऋण-संबंधी कहे गए हैं।

श्लोक 25 (padma.5.88.25)

गृहीतमाययैकेन आवाभ्यां तु न कस्य हि । न्यासमेवं न कस्यापि कृतं वै पूर्वजन्मनि

gṛhītamāyayaikena āvābhyāṁ tu na kasya hi nyāsamevaṁ na kasyāpi kṛtaṁ vai pūrvajanmani

माया से किसी एक द्वारा लिया गया हो, किंतु हम दोनों के बीच किसी का ऐसा कुछ नहीं है; इसी प्रकार पूर्वजन्म में किसी को कोई न्यास भी नहीं दिया गया है।

श्लोक 26 (padma.5.88.26)

राधयामि न कस्यापि क्षणं कांत शृणुष्व हि । न वैरमस्ति केनापि पूर्वजन्मनि वै कृतम्

rādhayāmi na kasyāpi kṣaṇaṁ kāṁta śṛṇuṣva hi na vairamasti kenāpi pūrvajanmani vai kṛtam

हे कांत! मैं क्षणभर भी किसी के प्रति द्वेष नहीं रखती, सुनो; पूर्वजन्म में किसी के साथ कोई वैर भी नहीं किया गया।

श्लोक 27 (padma.5.88.27)

आबाल्येन तु विप्रेंद्र न च त्यक्तो मया पतिः । एवं ज्ञात्वा शमं गच्छ त्यज चिंतामनर्थिकीम्

ābālyena tu vipreṁdra na ca tyakto mayā patiḥ evaṁ jñātvā śamaṁ gaccha tyaja ciṁtāmanarthikīm

हे विप्रेंद्र! बाल्यावस्था से ही मैंने पति को कभी नहीं त्यागा। ऐसा जानकर शांति को प्राप्त हो, इस निरर्थक चिंता को त्याग दो।

श्लोक 28 (padma.5.88.28)

हृतं नैव च कस्यापि नैव दत्तं त्वया पुनः । कथं ते धनमायाति विस्मयं व्रज मा विभो

hṛtaṁ naiva ca kasyāpi naiva dattaṁ tvayā punaḥ kathaṁ te dhanamāyāti vismayaṁ vraja mā vibho

मैंने किसी का कुछ भी नहीं हरा है, और तुमने भी किसी को कुछ वापस नहीं दिया है; फिर तुम्हारे पास धन कैसे आता है? हे विभो! इस पर विस्मय मत करो।

श्लोक 29 (padma.5.88.29)

प्राप्तमेव हि यत्रैव रक्षितुश्च न तिष्ठति । एवं ज्ञात्वा शमं गच्छ त्यज चिंतामनर्थिकीम्

prāptameva hi yatraiva rakṣituśca na tiṣṭhati evaṁ jñātvā śamaṁ gaccha tyaja ciṁtāmanarthikīm

जो जहाँ प्राप्त हुआ है, वह उसके रक्षक के बिना वहाँ नहीं ठहरता। ऐसा जानकर शांति को प्राप्त हो, इस निरर्थक चिंता को त्याग दो।

श्लोक 30 (padma.5.88.30)

कस्य पुत्राः प्रिया भार्या कस्य स्वजनबांधवाः । कः कस्य नास्ति संसारे न संबंधो द्विजोत्तम

kasya putrāḥ priyā bhāryā kasya svajanabāṁdhavāḥ kaḥ kasya nāsti saṁsāre na saṁbaṁdho dvijottama

किसके पुत्र, किसकी प्रिय पत्नी? किसके स्वजन-बांधव? हे द्विजोत्तम! इस संसार में किसका किससे संबंध नहीं है?

श्लोक 31 (padma.5.88.31)

मायामोहेन संमूढा मानवाः पापचेतनाः । इदं गृहमयं पुत्र इयं भार्या ममैव हि

māyāmohena saṁmūḍhā mānavāḥ pāpacetanāḥ idaṁ gṛhamayaṁ putra iyaṁ bhāryā mamaiva hi

माया के मोह से मोहित, पापी चित्तवाले मनुष्य सोचते हैं यह घर मेरा है, यह पुत्र मेरा है, यह पत्नी मेरी ही है।

श्लोक 32 (padma.5.88.32)

अनृतं दृश्यते कांत संसारस्य हि बंधनम्

anṛtaṁ dṛśyate kāṁta saṁsārasya hi baṁdhanam

हे कांत! यह असत्य दिखाई देता है, यही तो संसार का बंधन है।

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