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पाताल खण्ड · अध्याय 92

चित्रा की कथा

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (padma.5.92.1)

सूत उवाच-। इति तस्य वचः श्रुत्वा नारदस्य स भूपतिः । प्रणम्य विस्मितः प्राहचिंतयन्मनसा हरिम्

sūta uvāca- iti tasya vacaḥ śrutvā nāradasya sa bhūpatiḥ praṇamya vismitaḥ prāhaciṁtayanmanasā harim

सूत बोले नारद का यह वचन सुनकर वह भूपति प्रणाम करके, विस्मित होकर, मन में हरि का चिंतन करते हुए बोला।

श्लोक 2 (padma.5.92.2)

अंबरीष उवाच-। कथमेतद्विमुह्यामः स्वल्पायासेन यन्मुने । शूद्रः पापसमाचारो लेभे ब्राह्मण्यमुत्तमम्

aṁbarīṣa uvāca- kathametadvimuhyāmaḥ svalpāyāsena yanmune śūdraḥ pāpasamācāro lebhe brāhmaṇyamuttamam

अंबरीष बोले हे मुने! हम कैसे मोहित हो रहे हैं कि इतने अल्प परिश्रम से एक शूद्र, पापाचारी, उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है?

श्लोक 3 (padma.5.92.3)

ब्राह्मण्यं दुर्ल्लभं तात सुकृतैर्विविधैरपि । कथं माधवमासस्य स्नानेनैवाप सोऽधमः

brāhmaṇyaṁ durllabhaṁ tāta sukṛtairvividhairapi kathaṁ mādhavamāsasya snānenaivāpa so'dhamaḥ

हे तात! ब्राह्मणत्व अनेक प्रकार के सुकृतों से भी दुर्लभ है; वह अधम केवल माधव-मास के स्नान से उसे कैसे प्राप्त कर सका?

श्लोक 4 (padma.5.92.4)

न यज्ञदानैर्न तपोभिरुग्रैर्न पुण्यसंज्ञैरपरैरपीश । अस्मादृशो भूपतयोऽर्थवंतो न ते लभंतेऽवनिदैवतत्वम्

na yajñadānairna tapobhirugrairna puṇyasaṁjñairaparairapīśa asmādṛśo bhūpatayo'rthavaṁto na te labhaṁte'vanidaivatatvam

न यज्ञ-दानों से, न उग्र तपों से, न अन्य पुण्य नामक कर्मों से भी, हे ईश! हम जैसे धनवान राजा भी भू-देवत्व को प्राप्त नहीं करते।

श्लोक 5 (padma.5.92.5)

स गाधिसूनुर्विविधं तपोऽपि चिरंविधायानिशमेव घोरम् । कृच्छ्रेण लेभे शतवर्षपूर्णैरहो कथंचिद्बहुभिः प्रयत्नैः

sa gādhisūnurvividhaṁ tapo'pi ciraṁvidhāyāniśameva ghoram kṛcchreṇa lebhe śatavarṣapūrṇairaho kathaṁcidbahubhiḥ prayatnaiḥ

उस गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) ने भी चिरकाल तक अनेक प्रकार का घोर तप करके, सौ वर्ष पूरे होने पर, अनेक प्रयत्नों से, अत्यंत कठिनाई से किसी प्रकार उसे प्राप्त किया।

श्लोक 6 (padma.5.92.6)

कथं स वर्णाधम एष पापः स्वधर्महीनो धनवान दाता । पुण्यादनायासकृतादमुष्मादल्पादिहावाप स रामतत्त्वम्

kathaṁ sa varṇādhama eṣa pāpaḥ svadharmahīno dhanavāna dātā puṇyādanāyāsakṛtādamuṣmādalpādihāvāpa sa rāmatattvam

वह नीच वर्ण का पापी, अपने धर्म से हीन, धनवान दाता, इतने छोटे, बिना परिश्रम के किए गए पुण्य से रामतत्त्व (उत्तम ब्राह्मणत्व) को यहाँ कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 7 (padma.5.92.7)

नारद उवाच-। सत्यमुक्तं त्वया राजन्ब्राह्मण्यमतिदुर्ल्लभम् । तथापि गतयः सूक्ष्मा दुर्ज्ञेया धर्मतत्त्वतः

nārada uvāca- satyamuktaṁ tvayā rājanbrāhmaṇyamatidurllabham tathāpi gatayaḥ sūkṣmā durjñeyā dharmatattvataḥ

नारद बोले हे राजन्! तुमने सत्य कहा, ब्राह्मणत्व अत्यंत दुर्लभ है; फिर भी धर्म-तत्त्व की गति सूक्ष्म, दुर्जेय है।

श्लोक 8 (padma.5.92.8)

विचित्राणि च कर्माणि विचित्रा भूतभावना । विचित्राणि च भूतानि विचित्राः कर्मशक्तयः

vicitrāṇi ca karmāṇi vicitrā bhūtabhāvanā vicitrāṇi ca bhūtāni vicitrāḥ karmaśaktayaḥ

विचित्र कर्म हैं, प्राणियों के भाव विचित्र हैं; प्राणी विचित्र हैं, कर्मों की शक्तियाँ भी विचित्र हैं।

श्लोक 9 (padma.5.92.9)

कदाचित्सुकृतं कर्म कूटस्थं यदवापि तम् । केनचित्कर्मणा भूप शुभेन परिवर्धते

kadācitsukṛtaṁ karma kūṭasthaṁ yadavāpi tam kenacitkarmaṇā bhūpa śubhena parivardhate

कभी-कभी कूटस्थ सुकृत कर्म, एक बार प्राप्त हो जाने पर, हे भूप! किसी अन्य शुभ कर्म से बढ़ जाता है,

श्लोक 10 (padma.5.92.10)

फलं ददाति सुमहत्तस्मिन्नपि च जन्मनि । धर्मो गहनसूक्ष्मोऽयं नीयते न यथा तथा

phalaṁ dadāti sumahattasminnapi ca janmani dharmo gahanasūkṣmo'yaṁ nīyate na yathā tathā

और उसी जन्म में भी अत्यंत महान फल देता है; यह धर्म गहन और सूक्ष्म है, जैसा दिखता है वैसे नहीं ले जाया जाता।

श्लोक 11 (padma.5.92.11)

न तस्य फलदानस्य श्रूयते कालनिश्चयः । यत्किंचित्सुकृतं कर्मच्छन्नं पापांतरैरपि

na tasya phaladānasya śrūyate kālaniścayaḥ yatkiṁcitsukṛtaṁ karmacchannaṁ pāpāṁtarairapi

उस फलदान का कोई निश्चित काल नहीं सुना जाता; जो भी सुकृत कर्म, अन्य पापों से भी ढका हुआ हो,

श्लोक 12 (padma.5.92.12)

तदागत्य कुतः क्वापि सुफलं च प्रयच्छति । कृतस्य नेह नाशोस्ति पुण्यस्य दुरितस्य च

tadāgatya kutaḥ kvāpi suphalaṁ ca prayacchati kṛtasya neha nāśosti puṇyasya duritasya ca

वह कहीं से भी आकर अपना शुभ फल देता है। किए हुए पुण्य या पाप का यहाँ नाश नहीं है,

श्लोक 13 (padma.5.92.13)

तथापि बहुभिः पुण्यैर्दुरितं याति दारुणम् । यदुक्तं भवता राजन्नायासाधिक्यतो भवेत्

tathāpi bahubhiḥ puṇyairduritaṁ yāti dāruṇam yaduktaṁ bhavatā rājannāyāsādhikyato bhavet

फिर भी बहुत पुण्यों से भयंकर पाप भी नष्ट हो जाता है। तुमने जो कहा, हे राजन्! कि अधिक परिश्रम से,

श्लोक 14 (padma.5.92.14)

तत्फलं तत्र तत्रापि शृणु सत्यं मयोदितम् । अनायासमहायासौ यद्यल्पत्व महत्त्वयोः

tatphalaṁ tatra tatrāpi śṛṇu satyaṁ mayoditam anāyāsamahāyāsau yadyalpatva mahattvayoḥ

वह फल, वहाँ-वहाँ भी हो सकता है, सुनो, मैंने सत्य कहा है। अल्प-परिश्रम और महा-परिश्रम, यदि अल्पता-महत्ता पर आधारित हों,

श्लोक 15 (padma.5.92.15)

महाव्रतास्ततस्ते स्युः सततं कर्मकादयः । सिंहव्याघ्रादिमूत्रादौ प्रयासा बहुलास्ततः

mahāvratāstataste syuḥ satataṁ karmakādayaḥ siṁhavyāghrādimūtrādau prayāsā bahulāstataḥ

तो निरंतर कर्मकांड आदि में लगे रहने वाले महाव्रती होते; और सिंह-व्याघ्र आदि के मूत्र आदि में प्रयास बहुत होने के कारण,

श्लोक 16 (padma.5.92.16)

पंचगव्यप्रशस्तत्वं व्रतमध्ये ततो भवेत् । इति कर्तव्यबाहुल्यं महत्त्वं चेत्तदल्पता

paṁcagavyapraśastatvaṁ vratamadhye tato bhavet iti kartavyabāhulyaṁ mahattvaṁ cettadalpatā

पंचगव्य की श्रेष्ठता व्रतों में गिनी जाती। इस प्रकार करणीयों की बहुलता और महत्ता, यदि यही अल्पता हो,

श्लोक 17 (padma.5.92.17)

जलाग्न्यादिप्रवेशस्य प्रसज्येत व्रतांतरात् । इदमल्पं महत्त्वं तदिति नैव नियामकः

jalāgnyādipraveśasya prasajyeta vratāṁtarāt idamalpaṁ mahattvaṁ taditi naiva niyāmakaḥ

तो जल-अग्नि आदि में प्रवेश करने वाले व्रत को अन्य व्रत से बड़ा मानना पड़ेगा; यह छोटा है, यह बड़ा है यह नियामक नहीं है।

श्लोक 18 (padma.5.92.18)

फलं यथोदितं शास्त्रे तदेव स्यान्महोदयम् । यथाल्पनाशो महता महन्नाशस्तथाल्पतः

phalaṁ yathoditaṁ śāstre tadeva syānmahodayam yathālpanāśo mahatā mahannāśastathālpataḥ

शास्त्र में जो फल कहा गया है, वही महाफल होगा; जैसे छोटे से बड़े का नाश होता है, वैसे ही बड़े से छोटे का भी।

श्लोक 19 (padma.5.92.19)

किंत्वल्पविस्फुलिंगेन तृणनाशः प्रदृश्यते । अजामिलोऽपि भूपाल दास्याः पतिरिति स्मृतः

kiṁtvalpavisphuliṁgena tṛṇanāśaḥ pradṛśyate ajāmilo'pi bhūpāla dāsyāḥ patiriti smṛtaḥ

किंतु अल्प चिंगारी से भी घास का नाश देखा जाता है। हे भूपाल! अजामिल भी, जो दासी का पति स्मृत है,

श्लोक 20 (padma.5.92.20)

धर्मपत्नीपरित्यागी नित्यं पापपथिस्थितः । म्रियमाणः सुताह्वानं चक्रे नारायणेति च

dharmapatnīparityāgī nityaṁ pāpapathisthitaḥ mriyamāṇaḥ sutāhvānaṁ cakre nārāyaṇeti ca

धर्मपत्नी का त्यागी, सदा पाप-पथ पर स्थित, मरते समय अपने पुत्र को 'नारायण' कहकर पुकारा,

श्लोक 21 (padma.5.92.21)

तथा यन्नामग्रहणात्पदं लेभे सुदुर्ल्लभम् । अनिच्छयापि दहति स्पृष्टो हुतवहो यथा

tathā yannāmagrahaṇātpadaṁ lebhe sudurllabham anicchayāpi dahati spṛṣṭo hutavaho yathā

और उसी नाम-ग्रहण से अत्यंत दुर्लभ पद प्राप्त किया। बिना इच्छा के भी छूने पर जैसे अग्नि जला देती है,

श्लोक 22 (padma.5.92.22)

तथा दहति गोविंदनामव्याजादपीरितम्

tathā dahati goviṁdanāmavyājādapīritam

वैसे ही गोविंद का नाम, बहाने से भी लिया जाए तो जला देता है।

श्लोक 23 (padma.5.92.23)

हत्यायुतं शपनहा सहस्रमुग्रं गुर्वंगनाकोटिनिषेवणं च । स्तेयान्यशेषाणि हरेः प्रियेण गोविंदनाम्ना निहतानि सद्यः

hatyāyutaṁ śapanahā sahasramugraṁ gurvaṁganākoṭiniṣevaṇaṁ ca steyānyaśeṣāṇi hareḥ priyeṇa goviṁdanāmnā nihatāni sadyaḥ

हजार-करोड़ हत्याएँ, शाप को नष्ट करने वाला, हजार उग्र पाप, करोड़ों गुरु-अंगनाओं का सेवन, और समस्त चोरी हरि के प्रिय गोविंद-नाम से तुरंत नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 24 (padma.5.92.24)

विष्णुभक्तिमयं वीर यत्किंचित्क्रियतेऽल्पकम् । सुकृतं साधु विदुषा तदक्षयफलं भवेत्

viṣṇubhaktimayaṁ vīra yatkiṁcitkriyate'lpakam sukṛtaṁ sādhu viduṣā tadakṣayaphalaṁ bhavet

हे वीर! विष्णु-भक्तिमय जो भी थोड़ा-सा कर्म विद्वान द्वारा भलीभाँति किया जाता है, वह अक्षय फल देने वाला होता है।

श्लोक 25 (padma.5.92.25)

संदेहो न च कर्तव्यो माधवे मासि माधवम् । समाराध्य जनो भक्त्या तत्तद्वांछितमाप्नुयात्

saṁdeho na ca kartavyo mādhave māsi mādhavam samārādhya jano bhaktyā tattadvāṁchitamāpnuyāt

संदेह नहीं करना चाहिए माधव मास में भक्तिपूर्वक माधव की आराधना करके मनुष्य इच्छित वस्तु प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (padma.5.92.26)

अपत्यं द्रविणं दारा धरा हर्म्यं हया गजाः । सुखानि स्वर्गमोक्षौ च न दूरे हरिभक्तितः

apatyaṁ draviṇaṁ dārā dharā harmyaṁ hayā gajāḥ sukhāni svargamokṣau ca na dūre haribhaktitaḥ

संतान, धन, पत्नी, भूमि, भवन, घोड़े, हाथी, सुख, स्वर्ग-मोक्ष हरि-भक्ति से दूर नहीं हैं।

श्लोक 27 (padma.5.92.27)

एवं शास्त्रोक्तविधिना स्वल्पेनापि न संशयः । पापस्य महतोऽपि स्यात्क्षयः सम्यग्विधानतः

evaṁ śāstroktavidhinā svalpenāpi na saṁśayaḥ pāpasya mahato'pi syātkṣayaḥ samyagvidhānataḥ

इस प्रकार शास्त्रोक्त विधि से, अत्यंत अल्प परिश्रम से भी, इसमें संदेह नहीं, भलीभाँति विधान से महापाप का भी क्षय हो सकता है।

श्लोक 28 (padma.5.92.28)

फलाधिक्यं भवेद्विद्वन्नाधिक्याद्भावकर्मणोः । सूक्ष्मा धर्मस्य गतयो दुर्ज्ञेया विबुधैरपि

phalādhikyaṁ bhavedvidvannādhikyādbhāvakarmaṇoḥ sūkṣmā dharmasya gatayo durjñeyā vibudhairapi

हे विद्वन्! फल की अधिकता (परिश्रम की) अधिकता से नहीं, भाव और कर्म की अधिकता से होती है; धर्म की गति सूक्ष्म है, विद्वानों के लिए भी दुर्जेय है।

श्लोक 29 (padma.5.92.29)

प्रियो माधवमासोऽयं माधवस्य महात्मनः । एकोऽपि त्रिषु लोकेषु समग्रेप्सितदायकः

priyo mādhavamāso'yaṁ mādhavasya mahātmanaḥ eko'pi triṣu lokeṣu samagrepsitadāyakaḥ

यह माधव मास महात्मा माधव को प्रिय है; एक बार भी तीनों लोकों में यह संपूर्ण इच्छित वस्तु देता है।

श्लोक 30 (padma.5.92.30)

पुण्येन गांगेन जलेन काले देशे बुधः स्नानपरः कथंचित् । आजन्मनो भावहतोऽपि दाता न शुध्यतीत्येव मतं ममैतत्

puṇyena gāṁgena jalena kāle deśe budhaḥ snānaparaḥ kathaṁcit ājanmano bhāvahato'pi dātā na śudhyatītyeva mataṁ mamaitat

पुण्यमय गंगा-जल से उचित काल और स्थान पर, किसी प्रकार स्नान में तत्पर विद्वान भी यदि जन्म से भाव-रहित मात्र दाता हो, तो वह शुद्ध नहीं होता यह मेरा मत है।

श्लोक 31 (padma.5.92.31)

प्रज्वाल्य वह्निं घृततैलसिक्तं प्रदक्षिणावर्तशिखं स्वकाले । प्रविश्य दग्धः किल भावदुष्टो न स्वर्गमाप्नोति फलं न चान्यत्

prajvālya vahniṁ ghṛtatailasiktaṁ pradakṣiṇāvartaśikhaṁ svakāle praviśya dagdhaḥ kila bhāvaduṣṭo na svargamāpnoti phalaṁ na cānyat

घी-तेल से सींची अग्नि जलाकर, जिसकी शिखा दाहिनी ओर घूमती है, उचित समय पर उसमें प्रवेश करके, भाव-दुष्ट व्यक्ति निश्चय ही जल जाता है, न स्वर्ग पाता है, न कोई अन्य फल।

श्लोक 32 (padma.5.92.32)

गंगादितीर्थेषु वसंति देवा देवालये यक्षगणाश्च नित्यम् । विनाशनं यांति कृतोपवासा भावोज्झितास्तेन फलं लभंते

gaṁgāditīrtheṣu vasaṁti devā devālaye yakṣagaṇāśca nityam vināśanaṁ yāṁti kṛtopavāsā bhāvojjhitāstena phalaṁ labhaṁte

गंगा आदि तीर्थों में देवता निवास करते हैं, मंदिर में यक्ष-गण भी नित्य निवास करते हैं; उपवास करके भी भाव-रहित लोग विनाश को प्राप्त होते हैं, फिर भी उससे कुछ फल पा लेते हैं।

श्लोक 33 (padma.5.92.33)

भावं ततो हृत्कमले निधाय श्रीमाधवं माधवमासि भक्त्या । यजेत यः स्नानपरो विशुद्धः पुण्यं न शक्ता वयमस्य वक्तुम्

bhāvaṁ tato hṛtkamale nidhāya śrīmādhavaṁ mādhavamāsi bhaktyā yajeta yaḥ snānaparo viśuddhaḥ puṇyaṁ na śaktā vayamasya vaktum

इसलिए भाव को हृदय-कमल में रखकर, माधव मास में भक्तिपूर्वक श्रीमाधव की पूजा करने वाला, स्नान में तत्पर, विशुद्ध जो कोई है, उसका पुण्य हम कहने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 34 (padma.5.92.34)

इहार्थेऽपि पुरावृत्तमाकर्णय महीपते । विचित्रं कथयिष्यामि फलं किमपि कर्मणाम्

ihārthe'pi purāvṛttamākarṇaya mahīpate vicitraṁ kathayiṣyāmi phalaṁ kimapi karmaṇām

इसी विषय में भी पूर्वकाल में जो हुआ, वह सुनो, हे महीपते! मैं कर्मों के किसी अद्भुत फल की कथा कहूँगा।

श्लोक 35 (padma.5.92.35)

तस्य माधवमासस्य प्रसादान्माधवस्य च । यथापि ब्राह्मणी काचित्स्वैरिण्याप शुभं फलम्

tasya mādhavamāsasya prasādānmādhavasya ca yathāpi brāhmaṇī kācitsvairiṇyāpa śubhaṁ phalam

उस माधव मास और माधव की कृपा से, कैसे एक स्वच्छंद ब्राह्मणी ने भी शुभ फल प्राप्त किया।

श्लोक 36 (padma.5.92.36)

दिवोदासेति विख्यातः पुरा कांतीश्वरोऽभवत् । तस्यापत्यं महारत्नं नारीणामुत्तमं सदा

divodāseti vikhyātaḥ purā kāṁtīśvaro'bhavat tasyāpatyaṁ mahāratnaṁ nārīṇāmuttamaṁ sadā

पूर्वकाल में दिवोदास नामक विख्यात राजा था, कांती (काशी) का स्वामी; उसकी संतान, नारियों में सदा उत्तम, एक महारत्न,

श्लोक 37 (padma.5.92.37)

गुणरूपसमायुक्ता सुशीला चारुमंगला । दिव्यादेवीति विख्याता रूपेणाप्रतिमा भुवि

guṇarūpasamāyuktā suśīlā cārumaṁgalā divyādevīti vikhyātā rūpeṇāpratimā bhuvi

गुण-रूप से युक्त, सुशीला, सुंदर-मंगलमयी, दिव्यादेवी नाम से विख्यात, पृथ्वी पर रूप में अनुपम थी।

श्लोक 38 (padma.5.92.38)

पित्रा त्वालोकिता सा तु रूपलावण्यसंयुता । स तां दृष्ट्वा दिवोदासो दिव्यां देवीं सुतां तदा

pitrā tvālokitā sā tu rūpalāvaṇyasaṁyutā sa tāṁ dṛṣṭvā divodāso divyāṁ devīṁ sutāṁ tadā

पिता द्वारा देखी गई, रूप-लावण्य से युक्त, उस दिव्य देवी-सम पुत्री को देखकर दिवोदास ने तब,

श्लोक 39 (padma.5.92.39)

कस्मै च दीयते कन्या सुवराय महात्मने । इति चिंतापरो भूत्वा समालोक्य नरोत्तमः

kasmai ca dīyate kanyā suvarāya mahātmane iti ciṁtāparo bhūtvā samālokya narottamaḥ

यह कन्या किसे दी जाए, किस उत्तम महात्मा वर को? ऐसा चिंतापरायण होकर, विचार करके वह नरोत्तम,

श्लोक 40 (padma.5.92.40)

रूपदेशस्य राजानं सम्यग्ज्ञात्वा महीपतिः । चित्रसेनं महात्मानं समाहूय ततो नृपः

rūpadeśasya rājānaṁ samyagjñātvā mahīpatiḥ citrasenaṁ mahātmānaṁ samāhūya tato nṛpaḥ

रूप-देश के राजा को भलीभाँति जानकर, वह भूपति महात्मा चित्रसेन को बुलाकर,

श्लोक 41 (padma.5.92.41)

कन्यां ददौ दिवोदासश्चित्रसेनाय धीमते । तस्या विवाहकालस्य संप्राप्ते समये नृप

kanyāṁ dadau divodāsaścitrasenāya dhīmate tasyā vivāhakālasya saṁprāpte samaye nṛpa

दिवोदास ने बुद्धिमान चित्रसेन को कन्या दी। जब उसके विवाह का समय आया, हे राजन्!

श्लोक 42 (padma.5.92.42)

मृतोऽसौ चित्रसेनस्तु कालधर्मेण वै किल । दिवोदासश्च धर्मात्मा चिंतयामास भूपतिः

mṛto'sau citrasenastu kāladharmeṇa vai kila divodāsaśca dharmātmā ciṁtayāmāsa bhūpatiḥ

वह चित्रसेन काल-धर्म से मर गया, निश्चय ही। और धर्मात्मा राजा दिवोदास चिंतित हुआ।

श्लोक 43 (padma.5.92.43)

ब्राह्मणांश्च समाहूय पप्रच्छ नृपनंदन । अस्या विवाहकाले तु चित्रसेनो दिवं गतः

brāhmaṇāṁśca samāhūya papraccha nṛpanaṁdana asyā vivāhakāle tu citraseno divaṁ gataḥ

ब्राह्मणों को बुलाकर उस नृपनंदन ने पूछा इसके विवाह के समय ही चित्रसेन स्वर्ग चला गया।

श्लोक 44 (padma.5.92.44)

अस्यास्तु कीदृशं कर्म भविष्यति ब्रुवंतु मे । ब्राह्मण उवाच-। विवाहो जायते राजन्कन्यायास्तु विधानतः

asyāstu kīdṛśaṁ karma bhaviṣyati bruvaṁtu me brāhmaṇa uvāca- vivāho jāyate rājankanyāyāstu vidhānataḥ

इसका ऐसा कैसा कर्म होगा, वह मुझे बताओ। ब्राह्मण ने कहा हे राजन्! कन्या का विवाह विधानपूर्वक होता है,

श्लोक 45 (padma.5.92.45)

पतिर्मृत्युं प्रयात्येव यो वा त्यागं करोति च । महाधिव्याधिना भीतस्त्यागं कृत्वा प्रयाति च

patirmṛtyuṁ prayātyeva yo vā tyāgaṁ karoti ca mahādhivyādhinā bhītastyāgaṁ kṛtvā prayāti ca

पति या तो मृत्यु को प्राप्त होता है या त्याग कर देता है; महाव्याधि से भयभीत होकर त्याग करके चला जाता है।

श्लोक 46 (padma.5.92.46)

प्रव्राजितो भवेद्राजन्धर्मशास्त्रेषु दृश्यते । तस्यां रजस्वलायां च अन्यः पतिर्विधीयते

pravrājito bhavedrājandharmaśāstreṣu dṛśyate tasyāṁ rajasvalāyāṁ ca anyaḥ patirvidhīyate

या वह प्रव्रजित (संन्यासी) हो जाता है, हे राजन्! धर्मशास्त्रों में यह देखा जाता है। उसके रजस्वला होने पर उसके लिए अन्य पति विधान किया जाता है।

श्लोक 47 (padma.5.92.47)

विवाहं तु प्रधानेन पिता कुर्यान्न संशयः । एवं राजन्समादिष्टं धर्मशास्त्रे शुभैर्जनैः

vivāhaṁ tu pradhānena pitā kuryānna saṁśayaḥ evaṁ rājansamādiṣṭaṁ dharmaśāstre śubhairjanaiḥ

किंतु विवाह प्रधान विधि से पिता द्वारा ही करना चाहिए, इसमें संदेह नहीं। हे राजन्! ऐसा धर्मशास्त्र में शुभ जनों द्वारा कहा गया है।

श्लोक 48 (padma.5.92.48)

विवाहः क्रियतामस्या इत्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः । दिवोदासश्च धर्मात्मा ब्राह्मणैस्तु प्रणोदितः

vivāhaḥ kriyatāmasyā ityūcuste dvijottamāḥ divodāsaśca dharmātmā brāhmaṇaistu praṇoditaḥ

इसका विवाह किया जाए ऐसा उन द्विजोत्तमों ने कहा। धर्मात्मा दिवोदास, ब्राह्मणों द्वारा प्रेरित होकर,

श्लोक 49 (padma.5.92.49)

विवाहार्थं महाराज मानसं कृतवान्नृप । पुनर्दत्ता प्रदानेन दिव्यादेवी नृपोत्तम

vivāhārthaṁ mahārāja mānasaṁ kṛtavānnṛpa punardattā pradānena divyādevī nṛpottama

हे महाराज! विवाह के लिए मन बना लिया, हे राजन्! फिर से देकर, हे नृपोत्तम! दिव्यादेवी,

श्लोक 50 (padma.5.92.50)

पुष्पसेनाय पुण्याय तस्मै राज्ञे महात्मने । मृत्युधर्मं गतो राजा विवाहसमयेऽपि सः

puṣpasenāya puṇyāya tasmai rājñe mahātmane mṛtyudharmaṁ gato rājā vivāhasamaye'pi saḥ

पुण्यशाली, महात्मा उस राजा पुष्पसेन को दी गई। वह राजा भी विवाह के समय ही मृत्यु-धर्म को प्राप्त हुआ।

श्लोक 51 (padma.5.92.51)

यदा यदा महाभागो दिव्यादेव्याश्च भूपतिः । करोति स पितोद्योगं विवाहस्यातिदुःखितः

yadā yadā mahābhāgo divyādevyāśca bhūpatiḥ karoti sa pitodyogaṁ vivāhasyātiduḥkhitaḥ

जब-जब वह महाभाग राजा, दिव्यादेवी के विवाह का प्रयत्न करता, अत्यंत दुःखी होकर,

श्लोक 52 (padma.5.92.52)

भर्तापि म्रियते काले प्राप्तलग्नस्तदा तदा । एकविंशतिभर्तारः कालेकाले मृतास्ततः

bhartāpi mriyate kāle prāptalagnastadā tadā ekaviṁśatibhartāraḥ kālekāle mṛtāstataḥ

तब-तब पति भी शुभ मुहूर्त पाकर उसी समय मर जाता। इस प्रकार समय-समय पर इक्कीस पति मर गए।

श्लोक 53 (padma.5.92.53)

ततो राजा महादुःखी संजातः ख्यातविक्रमः । समालोक्य तमाहूय मंत्रिभिः सह निश्चलः

tato rājā mahāduḥkhī saṁjātaḥ khyātavikramaḥ samālokya tamāhūya maṁtribhiḥ saha niścalaḥ

तब विख्यात-पराक्रमी राजा अत्यंत दुःखी हो गया; विचार करके, मंत्रियों सहित स्थिर होकर,

श्लोक 54 (padma.5.92.54)

स्वयंवरे महाबुद्धिं चकार पृथिवीपतिः । अथ तेन समाहूता राजानो विविधा नृपाः

svayaṁvare mahābuddhiṁ cakāra pṛthivīpatiḥ atha tena samāhūtā rājāno vividhā nṛpāḥ

उस पृथ्वीपति ने महाबुद्धि से स्वयंवर का निश्चय किया। फिर उसके द्वारा बुलाए गए नाना राजा,

श्लोक 55 (padma.5.92.55)

स्वयंवरार्थं वै तस्या बहवो धर्मतत्पराः । तस्यास्तु रूपसंक्षुब्धा मृत्युना प्रेषिता नृपाः

svayaṁvarārthaṁ vai tasyā bahavo dharmatatparāḥ tasyāstu rūpasaṁkṣubdhā mṛtyunā preṣitā nṛpāḥ

उसके स्वयंवर के लिए बहुत-से, धर्म में तत्पर, आए। उसके रूप से क्षुब्ध, मृत्यु द्वारा भेजे गए वे राजा,

श्लोक 56 (padma.5.92.56)

संग्रामं चक्रिरे मूढा मृतास्तेऽथ परस्परम् । एवं तेषां क्षयो जातः क्षत्त्रियाणां नरेश्वर

saṁgrāmaṁ cakrire mūḍhā mṛtāste'tha parasparam evaṁ teṣāṁ kṣayo jātaḥ kṣattriyāṇāṁ nareśvara

मूढ़ होकर परस्पर संग्राम करने लगे, और मर गए। इस प्रकार, हे नरेश्वर! उन क्षत्रियों का क्षय हो गया।

श्लोक 57 (padma.5.92.57)

दिव्यादेवी च दुःखार्ता रुरोद करुणं ततः । बालामालोक्य तां राजा रुदंतीं चातिदुःखिताम्

divyādevī ca duḥkhārtā ruroda karuṇaṁ tataḥ bālāmālokya tāṁ rājā rudaṁtīṁ cātiduḥkhitām

दिव्यादेवी भी दुःखार्त होकर करुणापूर्वक रोने लगी। उस बालिका को अत्यंत दुःखी रोते देखकर राजा ने,

श्लोक 58 (padma.5.92.58)

पुरोधसं च धर्मज्ञं ज्ञानवंतं तपस्विनम् । जातूकर्णं प्रणम्यादौ विनयान्वितकंधरः

purodhasaṁ ca dharmajñaṁ jñānavaṁtaṁ tapasvinam jātūkarṇaṁ praṇamyādau vinayānvitakaṁdharaḥ

धर्मज्ञ, ज्ञानवान, तपस्वी पुरोहित जातूकर्ण को पहले प्रणाम करके, विनयपूर्वक झुकी गर्दन से,

श्लोक 59 (padma.5.92.59)

दिवोदास उवाच-। कथयस्व प्रसादेन किमेतस्याहि पातकम् । दिव्यादेव्यास्तु मे पुत्र्या यदेतच्चेष्टितं कृतम्

divodāsa uvāca- kathayasva prasādena kimetasyāhi pātakam divyādevyāstu me putryā yadetacceṣṭitaṁ kṛtam

दिवोदास बोले कृपापूर्वक बताइए, मेरी पुत्री दिव्यादेवी का यह जो आचरण हुआ है, यह किस पाप के कारण है।

श्लोक 60 (padma.5.92.60)

जातूकर्ण उवाच-। तस्यास्तु चेष्टितं वीर दिव्यादेव्या वदाम्यहम् । पूर्वजन्मकृतं सर्वं तन्मे निगदतः शृणु

jātūkarṇa uvāca- tasyāstu ceṣṭitaṁ vīra divyādevyā vadāmyaham pūrvajanmakṛtaṁ sarvaṁ tanme nigadataḥ śṛṇu

जातूकर्ण बोले हे वीर! दिव्यादेवी के आचरण को मैं बताता हूँ; उसके पूर्वजन्म में किए गए सारे कर्म को मुझसे यथाक्रम सुनो।

श्लोक 61 (padma.5.92.61)

आस्ते वाराणसी पुण्या नगरी पापनाशिनी । तस्यामास्ते महाप्राज्ञः सुवीरो नाम नामतः

āste vārāṇasī puṇyā nagarī pāpanāśinī tasyāmāste mahāprājñaḥ suvīro nāma nāmataḥ

पाप-नाशिनी पुण्य नगरी वाराणसी है। उसमें महाप्राज्ञ सुवीर नामक कोई निवास करता था,

श्लोक 62 (padma.5.92.62)

वैश्यजात्यां समुत्पन्नो धनधान्यसमाकुलः । तस्य भार्या महाप्राज्ञ चित्रानाम सुविस्मृता

vaiśyajātyāṁ samutpanno dhanadhānyasamākulaḥ tasya bhāryā mahāprājña citrānāma suvismṛtā

वैश्य-जाति में उत्पन्न, धन-धान्य से भरपूर। हे महाप्राज्ञ! उसकी पत्नी चित्रा नाम की, अत्यंत विस्मृत (धर्म-विस्मृत),

श्लोक 63 (padma.5.92.63)

कुलाचारं परित्यज्य दुराचारेण वर्तते । न मन्यते हि भर्तारं रौद्रकृत्ये च वर्तते

kulācāraṁ parityajya durācāreṇa vartate na manyate hi bhartāraṁ raudrakṛtye ca vartate

कुलाचार त्यागकर दुराचार में रत रहती थी। वह पति को नहीं मानती थी, रौद्र कृत्यों में लगी रहती थी।

श्लोक 64 (padma.5.92.64)

पुण्यकार्यविहीना तु पापं चरति दुर्मतिः । भर्तारं भर्त्सते नित्यं स्वैरिणी कलहप्रिया

puṇyakāryavihīnā tu pāpaṁ carati durmatiḥ bhartāraṁ bhartsate nityaṁ svairiṇī kalahapriyā

पुण्य-कार्यों से रहित, दुर्बुद्धि, वह पाप का आचरण करती थी; पति को सदा कोसने वाली, स्वच्छंद, कलह-प्रिय,

श्लोक 65 (padma.5.92.65)

नित्यं परगृहे वास निरता भ्रमतेऽधिकम् । परच्छिद्रं समापश्येद्दुष्टाभूतेषु सर्वदा

nityaṁ paragṛhe vāsa niratā bhramate'dhikam paracchidraṁ samāpaśyedduṣṭābhūteṣu sarvadā

नित्य पराए घर में रहने में रत, अत्यधिक भटकने वाली; सदा दुष्ट लोगों में दूसरों के छिद्र खोजती रहती थी।

श्लोक 66 (padma.5.92.66)

साधुनिंदारता पापा बहुहास्यकरी सदा । कुसंगतिरता वाचा दुराचारजनप्रिया

sādhuniṁdāratā pāpā bahuhāsyakarī sadā kusaṁgatiratā vācā durācārajanapriyā

वह पापिनी सज्जनों की निंदा में रत, सदा बहुत हास्य करने वाली; कुसंगति में रत, दुराचारी लोगों को वाणी से प्रिय मानने वाली,

श्लोक 67 (padma.5.92.67)

धूर्ताधर्मजनद्वेषकरी चानृतभाषिणी । विज्ञायैवं सुवीरोऽस्या उपयेमे ततोऽपराम्

dhūrtādharmajanadveṣakarī cānṛtabhāṣiṇī vijñāyaivaṁ suvīro'syā upayeme tato'parām

धूर्त-अधर्मी लोगों से द्वेष करने वाली, और झूठ बोलने वाली थी। यह जानकर सुवीर ने फिर दूसरी पत्नी से विवाह किया।

श्लोक 68 (padma.5.92.68)

तया नवीनया वीरो भार्यया सहितोऽनिशम् । यथासुखं स बुभुजे विषयान्मनसः प्रियान्

tayā navīnayā vīro bhāryayā sahito'niśam yathāsukhaṁ sa bubhuje viṣayānmanasaḥ priyān

उस नई पत्नी सहित वीर (सुवीर) निरंतर, मन को प्रिय विषयों को यथासुख भोगता रहा।

श्लोक 69 (padma.5.92.69)

धर्माचारेण पुण्यात्मा सत्यपुण्यमतिः सदा । सत्ययामितया सत्या सुमत्याराधितो बभौ

dharmācāreṇa puṇyātmā satyapuṇyamatiḥ sadā satyayāmitayā satyā sumatyārādhito babhau

धर्माचार से पुण्यात्मा, सदा सत्य-पुण्य-बुद्धि, सत्य में स्थिर, बुद्धिमती सुमति द्वारा आराधित होकर वह सुशोभित हुआ।

श्लोक 70 (padma.5.92.70)

निरस्ता तेन सा चित्रा विचित्रा वरवर्णिनी । स्वैरिणी गुणसंसर्गधर्मविद्वेषिणी ततः

nirastā tena sā citrā vicitrā varavarṇinī svairiṇī guṇasaṁsargadharmavidveṣiṇī tataḥ

उस वरवर्णिनी विचित्र चित्रा को उसने त्याग दिया; स्वच्छंद, गुण-संगति और धर्म से द्वेष रखने वाली वह तब,

श्लोक 71 (padma.5.92.71)

भ्रमते जारसंयुक्ता मुक्ताचारा गतत्रपा । सा पापरतसंयुक्ता रक्ता दूती विकर्मणि

bhramate jārasaṁyuktā muktācārā gatatrapā sā pāparatasaṁyuktā raktā dūtī vikarmaṇi

जार-पुरुष के साथ भटकने लगी, आचार-रहित, लज्जा-रहित; वह पापरत, कामिनी, दुष्कर्म में दूती बन गई,

श्लोक 72 (padma.5.92.72)

कुशला कुट्टिनीकर्म कलासु त्वन्ययोषिताम् । गृहभंगमसौ चक्रे वक्रेण मनसा हिता

kuśalā kuṭṭinīkarma kalāsu tvanyayoṣitām gṛhabhaṁgamasau cakre vakreṇa manasā hitā

अन्य स्त्रियों के लिए कुट्टिनी-कर्म की कलाओं में निपुण। कुटिल मन से उसने घर बिगाड़ने का काम किया,

श्लोक 73 (padma.5.92.73)

साध्वीं नारीं समाहूय पापवाक्यैश्च नोदयेत् । नर्मलोभकथाकेलि प्रत्ययोत्पत्तिहेतुभिः

sādhvīṁ nārīṁ samāhūya pāpavākyaiśca nodayet narmalobhakathākeli pratyayotpattihetubhiḥ

साध्वी स्त्री को बुलाकर पाप-वचनों से उकसाती थी, हास्य-लोभ की बातों और विश्वास उत्पन्न करने वाले कारणों से।

श्लोक 74 (padma.5.92.74)

मनांसि चालयेत्पापा पुरुषाणां च योषिताम् । साधूनां सा स्त्रियो भव्याः परेभ्यः प्रतिपादयेत्

manāṁsi cālayetpāpā puruṣāṇāṁ ca yoṣitām sādhūnāṁ sā striyo bhavyāḥ parebhyaḥ pratipādayet

वह पापिनी पुरुषों और स्त्रियों दोनों के मन डिगा देती थी; वह सज्जनों की भव्य स्त्रियों को दूसरों को सौंप देती थी।

श्लोक 75 (padma.5.92.75)

कारयत्येव कपटं धर्मग्रामविवर्जनम् । एवं वर्षशतं भुक्त्वा पश्चाद्वेश्याविधिस्थिता

kārayatyeva kapaṭaṁ dharmagrāmavivarjanam evaṁ varṣaśataṁ bhuktvā paścādveśyāvidhisthitā

वह छल करके धर्म-ग्राम का त्याग कराती थी। इस प्रकार सौ वर्ष बिताकर, बाद में वेश्या-वृत्ति में स्थित हो गई,

श्लोक 76 (padma.5.92.76)

कालेन निधनं प्राप्ता सततं पापनिश्चया । जाता तव गृहे पुत्री दिव्यादेवीति सा सुता

kālena nidhanaṁ prāptā satataṁ pāpaniścayā jātā tava gṛhe putrī divyādevīti sā sutā

और समय आने पर उसकी मृत्यु हुई, सदा पाप में निश्चित; वह तुम्हारे घर में पुत्री बनी, वही दिव्यादेवी पुत्री,

श्लोक 77 (padma.5.92.77)

सुंदरी रूपसंपन्ना पुरा दृष्टेन नोदिता । नारद उवाच-। इति तस्य वचः श्रुत्वा दिवोदासोऽतिविस्मितः । उवाच राजा मधुरं जातूकर्णं मुनिं वचः

suṁdarī rūpasaṁpannā purā dṛṣṭena noditā nārada uvāca- iti tasya vacaḥ śrutvā divodāso'tivismitaḥ uvāca rājā madhuraṁ jātūkarṇaṁ muniṁ vacaḥ

सुंदरी, रूप-संपन्न, पहले देखे गए (कर्म) से प्रेरित।' नारद बोले उसका यह वचन सुनकर दिवोदास अत्यंत विस्मित होकर, राजा ने मुनि जातूकर्ण से मधुर वचन कहा।

श्लोक 78 (padma.5.92.78)

दिवोदास उवाच-। यदीदृशी सा दुरितप्रचारा सदा दुराचाररता प्रयाता । कथं ममश्रीपतिदैवतस्य महाकुलीनस्य सुतानुरूपा

divodāsa uvāca- yadīdṛśī sā duritapracārā sadā durācāraratā prayātā kathaṁ mamaśrīpatidaivatasya mahākulīnasya sutānurūpā

दिवोदास बोले यदि वह इतने दुराचार में सदा प्रवृत्त, ऐसे मार्ग से गई, तो श्रीपति के दैवत, महाकुलीन के पुत्र के अनुरूप वह कैसे हुई?

श्लोक 79 (padma.5.92.79)

सुदुर्ल्लभं राजकुले विशाले लेभे च सा श्रीमतिजन्मधन्यम् । पुण्येन केनापि मुने पवित्रे चित्रा विचित्रेण च कर्मकर्त्री

sudurllabhaṁ rājakule viśāle lebhe ca sā śrīmatijanmadhanyam puṇyena kenāpi mune pavitre citrā vicitreṇa ca karmakartrī

उस विशाल राजकुल में उस श्रीमती ने अत्यंत दुर्लभ, धन्य जन्म प्राप्त किया। हे पवित्र मुने! किस पुण्य से चित्रा, विचित्र कर्मों वाली, यह प्राप्त कर सकी?

श्लोक 80 (padma.5.92.80)

नारद उवाच-। इति तस्य वचः श्रुत्वा भूमिपस्य मुनिस्ततः । किञ्चिद्विहस्य तु प्राज्ञो वचः सूनृतमब्रवीत्

nārada uvāca- iti tasya vacaḥ śrutvā bhūmipasya munistataḥ kiñcidvihasya tu prājño vacaḥ sūnṛtamabravīt

नारद बोले राजा का यह वचन सुनकर वह मुनि, बुद्धिमान, कुछ मुस्कुराकर सत्य वचन बोला।

श्लोक 81 (padma.5.92.81)

जातूकर्ण उवाच-। चित्रा विचित्रसुरतैरथ वंचयंती प्रच्छन्नकामुकविटान्धनधीविहीनान् । वेश्या बभूव विषपानमितश्चरित्वा कालेन नागनगरे महति प्रसिद्धे

jātūkarṇa uvāca- citrā vicitrasuratairatha vaṁcayaṁtī pracchannakāmukaviṭāndhanadhīvihīnān veśyā babhūva viṣapānamitaścaritvā kālena nāganagare mahati prasiddhe

जातूकर्ण बोले चित्रा नाना प्रकार के प्रेम-कौशल से छिपे कामुकों, दुष्टों, धन-बुद्धि-हीनों को छलती हुई, समय के साथ महान प्रसिद्ध नाग-नगरी में विष-पान (पतित जीवन) करती हुई वेश्या बन गई।

श्लोक 82 (padma.5.92.82)

कोऽपि तत्र समायातः सायं विप्रः समार्दितः । अर्दमानो विशुद्धात्मा नगरे नागसंज्ञके

ko'pi tatra samāyātaḥ sāyaṁ vipraḥ samārditaḥ ardamāno viśuddhātmā nagare nāgasaṁjñake

वहाँ शाम को कोई विप्र आया, पीड़ित, दुःखी होकर, विशुद्ध आत्मावाला नाग नामक नगरी में,

श्लोक 83 (padma.5.92.83)

अपश्यन्नपरं स्थानं मूढश्चित्रागृहं ययौ । तया संमोहितोऽत्यर्थं वेश्यया दृष्टियोगतः

apaśyannaparaṁ sthānaṁ mūḍhaścitrāgṛhaṁ yayau tayā saṁmohito'tyarthaṁ veśyayā dṛṣṭiyogataḥ

अन्य स्थान न देखते हुए, अनजाने में चित्रा के घर चला गया। दृष्टि-योग से उस वेश्या ने उसे अत्यंत मोहित कर दिया,

श्लोक 84 (padma.5.92.84)

पादसंवाहनस्नानतांबूलासनभोजनैः । विलासैस्तोषितः सोऽपि खेदहीनोऽभवत्तदा

pādasaṁvāhanasnānatāṁbūlāsanabhojanaiḥ vilāsaistoṣitaḥ so'pi khedahīno'bhavattadā

पद-संवाहन, स्नान, ताम्बूल, आसन और भोजन से, उन विलासों से संतुष्ट होकर वह भी अपनी थकान से रहित हो गया।

श्लोक 85 (padma.5.92.85)

ततो विचित्रैः सुरतोपचारैरदृष्टबुद्ध्यैव तया स विप्रः । संसेवितोऽयं रजनीमशेषामवाहयद्भावविशेषलुब्धः

tato vicitraiḥ suratopacārairadṛṣṭabuddhyaiva tayā sa vipraḥ saṁsevito'yaṁ rajanīmaśeṣāmavāhayadbhāvaviśeṣalubdhaḥ

फिर विचित्र प्रेम-उपचारों से, अपनी बुद्धि से अनजाने ही, उस विप्र को उसने भलीभाँति सेवा दी, वह विशेष भाव के लोभ से पूरी रात बिताता रहा।

श्लोक 86 (padma.5.92.86)

प्रातः प्रयाणाभिमुखः कथंचिदुवाच चित्रामनुरक्तचित्तः । संतोषितः स्वैश्चरितैः स्वकृत्यैर्वचस्तयाचैकधिया तदानीम्

prātaḥ prayāṇābhimukhaḥ kathaṁciduvāca citrāmanuraktacittaḥ saṁtoṣitaḥ svaiścaritaiḥ svakṛtyairvacastayācaikadhiyā tadānīm

प्रातःकाल जाने को उद्यत होकर, अपने ही आचरण और कर्मों से, और उसकी एकनिष्ठ बुद्धि से संतुष्ट होकर, अनुरक्त मनवाला वह किसी प्रकार चित्रा से यह वचन बोला।

श्लोक 87 (padma.5.92.87)

ब्राह्मण उवाच-। कार्यः प्रत्युपकारस्ते तोषितेन मया प्रिये । स्वदृढं च निजं दुःखं कथयाम्यविशेषतः

brāhmaṇa uvāca- kāryaḥ pratyupakāraste toṣitena mayā priye svadṛḍhaṁ ca nijaṁ duḥkhaṁ kathayāmyaviśeṣataḥ

ब्राह्मण बोले हे प्रिये! तुमसे संतुष्ट होकर मुझे तुम्हारा प्रत्युपकार करना चाहिए; मैं अपना दृढ़ दुःख भी तुम्हें पूर्णतः बताता हूँ।

श्लोक 88 (padma.5.92.88)

पुरा कथां हि वदतां विप्राणां नर्मदातटे । शुभं यत्सर्वपापघ्नं तदाकर्णय सादरम्

purā kathāṁ hi vadatāṁ viprāṇāṁ narmadātaṭe śubhaṁ yatsarvapāpaghnaṁ tadākarṇaya sādaram

पूर्वकाल में नर्मदा-तट पर बातें करते विप्रों से जो शुभ, सर्व-पापनाशक बात सुनी थी, वह आदरपूर्वक सुनो।

श्लोक 89 (padma.5.92.89)

यो दिनत्रयमपि प्रयत्नतः स्नाति मेषउपयादि भास्करे । भास्करेऽनुदित एव माधवे मासि सोऽघनिचयैर्विमुच्यते

yo dinatrayamapi prayatnataḥ snāti meṣaupayādi bhāskare bhāskare'nudita eva mādhave māsi so'ghanicayairvimucyate

जो तीन दिन भी यत्नपूर्वक सूर्य के मेष राशि में आने पर, सूर्योदय से पहले, माधव मास में स्नान करता है, वह पापों के समूह से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 90 (padma.5.92.90)

संपूर्णमपि वैशाखे यो बहिः स्नानमाचरेत् । विधिना माधवं देवमर्चयेत्सोपि पापहा

saṁpūrṇamapi vaiśākhe yo bahiḥ snānamācaret vidhinā mādhavaṁ devamarcayetsopi pāpahā

जो पूर्ण वैशाख में भी बाहर से स्नान करता है, और विधिपूर्वक देव माधव की पूजा करता है, वह भी पाप-नाशक है।

श्लोक 91 (padma.5.92.91)

पुण्यतीर्थे विशेषेण स्नानदानक्रियादिभिः । महापापैर्विमुच्येत मानवो मासि माधवे

puṇyatīrthe viśeṣeṇa snānadānakriyādibhiḥ mahāpāpairvimucyeta mānavo māsi mādhave

पुण्य तीर्थ में विशेषकर स्नान-दान आदि क्रियाओं से मनुष्य माधव मास में महापापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 92 (padma.5.92.92)

तावन्महापापचयः शरीरे शरीरिणस्तिष्ठति निर्विशंकः । यावन्मुदा चोषसि मेषराशिमुपागते मज्जति नो दिनेशे

tāvanmahāpāpacayaḥ śarīre śarīriṇastiṣṭhati nirviśaṁkaḥ yāvanmudā coṣasi meṣarāśimupāgate majjati no dineśe

तब तक ही देहधारी के शरीर में महापाप का समूह निर्भय होकर टिका रहता है, जब तक वह हर्ष से, सूर्य के मेष राशि में पहुँचने पर, प्रातःकाल में डुबकी नहीं लगाता।

श्लोक 93 (padma.5.92.93)

एवमाकर्णितस्तेषां विप्राणां वदतां मया । अनेकदुरितांभोधि तरणे पोत उत्तमः

evamākarṇitasteṣāṁ viprāṇāṁ vadatāṁ mayā anekaduritāṁbhodhi taraṇe pota uttamaḥ

इस प्रकार उन बोलते हुए विप्रों से मैंने सुना कि यह अनेक दुरितों के सागर को पार करने के लिए उत्तम नाव है।

श्लोक 94 (padma.5.92.94)

अदूरे शिवदेहा च वर्ततेऽसौ सरिद्वरा । तत्र स्नातुं गमिष्येऽहं तदाघौघवधाय च

adūre śivadehā ca vartate'sau saridvarā tatra snātuṁ gamiṣye'haṁ tadāghaughavadhāya ca

यहाँ से न दूर शिव-देह (नर्मदा) नामक श्रेष्ठ नदी है; मैं वहाँ स्नान के लिए, उस पाप-समूह के नाश के लिए जाऊँगा।

श्लोक 95 (padma.5.92.95)

यदि ते रोचते कांते विरक्तं वामनो भवेत् । तन्मया त्वं समागच्छ वैशाखस्नानहेतवे

yadi te rocate kāṁte viraktaṁ vāmano bhavet tanmayā tvaṁ samāgaccha vaiśākhasnānahetave

यदि तुम्हें रुचिकर लगे, हे कांते! तो तुम्हारा मन भी विरक्त हो जाए तो तुम भी मेरे साथ वैशाख-स्नान के लिए आओ।

श्लोक 96 (padma.5.92.96)

अनित्यं जीवितमिदं यौवनं चातिसुंदरम् । हेतुर्नरकवासस्य दुर्वारश्च स नो भवेत्

anityaṁ jīvitamidaṁ yauvanaṁ cātisuṁdaram heturnarakavāsasya durvāraśca sa no bhavet

यह जीवन अनित्य है, और अत्यंत सुंदर यौवन नरक-वास का कारण है, जिसे हम टाल नहीं सकते।

श्लोक 97 (padma.5.92.97)

आराधितस्त्वयाहं च पातितो दुरितार्णवे । महतामपि यत्सत्यं दुष्टस्थितशरीरिणाम्

ārādhitastvayāhaṁ ca pātito duritārṇave mahatāmapi yatsatyaṁ duṣṭasthitaśarīriṇām

तुम्हारे द्वारा आराधित होकर भी मैं पाप-सागर में गिराया गया हूँ महान लोगों के लिए भी यह सत्य है, जब शरीर दुष्ट-स्थित हो।

श्लोक 98 (padma.5.92.98)

किमत्र बहुनोक्तेन न विलंबोचितः क्षणः । उद्धरिष्येऽपि भवतीं विरक्तिर्यदि ते हृदि

kimatra bahunoktena na vilaṁbocitaḥ kṣaṇaḥ uddhariṣye'pi bhavatīṁ viraktiryadi te hṛdi

यहाँ बहुत कहने से क्या लाभ? यह क्षण विलंब के योग्य नहीं है। यदि तुम्हारे हृदय में विरक्ति हो, तो मैं तुम्हें भी उद्धार करूँगा।

श्लोक 99 (padma.5.92.99)

चित्रोवाच-। स्वामिन्न दृष्टयोगेन तव संगतिधर्मतः । ध्रुवं विरक्तं मच्चेतो निंद्यमेतद्भवं प्रति

citrovāca- svāminna dṛṣṭayogena tava saṁgatidharmataḥ dhruvaṁ viraktaṁ macceto niṁdyametadbhavaṁ prati

चित्रा बोली हे स्वामी! मात्र दृष्टि-योग से, तुम्हारे साथ के धर्ममय संग से, मेरा चित्त निश्चय ही विरक्त हो गया है, यह जन्म इसके प्रति निंदनीय है।

श्लोक 100 (padma.5.92.100)

नूनमेवं मया शास्त्रे श्रुतं यत्साधुसंगमः । अचिंत्यायै नमस्तस्यै ततो नियतायै पुनः

nūnamevaṁ mayā śāstre śrutaṁ yatsādhusaṁgamaḥ aciṁtyāyai namastasyai tato niyatāyai punaḥ

निश्चय ही मैंने शास्त्र में ऐसा सुना है कि साधु-संगम (ऐसा ही करता है); उस अचिंत्य, फिर सुनिश्चित शक्ति को नमस्कार है।

श्लोक 101 (padma.5.92.101)

जातूकर्ण उवाच-। इति भाष्यततस्तेन समं चित्रा ययौ तदा । विद्यमानं धनं किंचिदादाय मुनिनोदिता

jātūkarṇa uvāca- iti bhāṣyatatastena samaṁ citrā yayau tadā vidyamānaṁ dhanaṁ kiṁcidādāya muninoditā

जातूकर्ण बोले ऐसा कहकर फिर चित्रा उसके साथ चली गई, उस मुनि द्वारा प्रेरित होकर, अपना जो कुछ धन था, उसे लेकर।

श्लोक 102 (padma.5.92.102)

ततः परं सोऽपि पुनर्द्विजन्मा वैशाखमासे शिवदेहदेहम् । अवाप सस्नौ च दिनेशमस्यै स्नानाय सद्योऽथ ददौ दयालुः

tataḥ paraṁ so'pi punardvijanmā vaiśākhamāse śivadehadeham avāpa sasnau ca dineśamasyai snānāya sadyo'tha dadau dayāluḥ

फिर वह द्विजन्मा भी, वैशाख मास में शिव-देह (नर्मदा) के तट पर पहुँचा और स्नान किया; और तब उस दयालु ने तुरंत उसे भी स्नान के लिए वह उपाय बताया।

श्लोक 103 (padma.5.92.103)

हृदयालुरयं विप्रः स्नापयामास तां तदा । यथोचितविधानेन चित्रामुच्चित्रभाषिणीम्

hṛdayālurayaṁ vipraḥ snāpayāmāsa tāṁ tadā yathocitavidhānena citrāmuccitrabhāṣiṇīm

उस हृदयालु विप्र ने तब उस विचित्र-भाषिणी चित्रा को यथोचित विधान से स्नान कराया।

श्लोक 104 (padma.5.92.104)

वैशाखस्नानमाहात्म्यं तत्र शुश्राव सा मुदा । पठमानेषु विप्रेषु पुराणानि पृथक्पृथक्

vaiśākhasnānamāhātmyaṁ tatra śuśrāva sā mudā paṭhamāneṣu vipreṣu purāṇāni pṛthakpṛthak

वहाँ उसने हर्षपूर्वक वैशाख-स्नान का माहात्म्य सुना, जब विप्र पृथक-पृथक पुराणों का पाठ कर रहे थे,

श्लोक 105 (padma.5.92.105)

यस्य श्रवणमात्रेण क्षीयते दुरितांधकः । यथा सूर्योदये नैव तिमिरौघः प्रणश्यति

yasya śravaṇamātreṇa kṣīyate duritāṁdhakaḥ yathā sūryodaye naiva timiraughaḥ praṇaśyati

जिसके श्रवण मात्र से पापों का अंधकार क्षीण हो जाता है, जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार का समूह नष्ट हुए बिना नहीं रहता।

श्लोक 106 (padma.5.92.106)

सा शिवे शिवतनूजले पुनः स्नानतोऽजनिकरे विधानतः । स्नानतो विमलमानसोदया सूर्यकांतिरिव निर्मला बभौ

sā śive śivatanūjale punaḥ snānato'janikare vidhānataḥ snānato vimalamānasodayā sūryakāṁtiriva nirmalā babhau

वह शिव-नदी के जल में विधिपूर्वक पुनः-पुनः स्नान करके, उस स्नान से निर्मल मनवाली होकर, सूर्य की कांति के समान निर्मल हो गई।

श्लोक 107 (padma.5.92.107)

तत्र मज्जंति रेवायां सेवायां निरता हरेः । वैशाखे विविधा लोका लोकानंत्यमभीप्सवः

tatra majjaṁti revāyāṁ sevāyāṁ niratā hareḥ vaiśākhe vividhā lokā lokānaṁtyamabhīpsavaḥ

वहाँ रेवा में, हरि की सेवा में तत्पर, नाना लोग वैशाख में डुबकी लगाते हैं, लोकों की अनंतता चाहते हुए।

श्लोक 108 (padma.5.92.108)

ये नर्मदायामिह शर्मदायामशुद्धकायानपि शोधयंति । विशेषतो माधवमासि मर्त्या भवंति मर्त्याधिपलोकलीलाः

ye narmadāyāmiha śarmadāyāmaśuddhakāyānapi śodhayaṁti viśeṣato mādhavamāsi martyā bhavaṁti martyādhipalokalīlāḥ

जो इस सुखदायिनी नर्मदा में अपने अशुद्ध शरीरों को भी शुद्ध करते हैं, विशेषकर माधव मास में, वे मर्त्य लोग मर्त्याधिप के लोक-सुखों को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 109 (padma.5.92.109)

आजन्मनोऽघस्मरणेन रेवा निहंति दृष्टा दशजन्मजं पुनः । स्नाता कथं चिच्छतयोनिजातं संसेविता यच्छति रुद्रलोकम्

ājanmano'ghasmaraṇena revā nihaṁti dṛṣṭā daśajanmajaṁ punaḥ snātā kathaṁ cicchatayonijātaṁ saṁsevitā yacchati rudralokam

रेवा जन्म से किए गए पापों का स्मरण मात्र से दस जन्मों के पाप को नष्ट कर देती है; स्नान करने पर सैकड़ों जन्मों के पाप को कैसे न नष्ट करे; सेवा करने पर वह रुद्रलोक प्रदान करती है।

श्लोक 110 (padma.5.92.110)

सकलं माधवं मासं सा चित्रा नर्मदाजले । सस्नौ किंचिद्ददौ दानं शक्त्या विप्रेषु नित्यशः

sakalaṁ mādhavaṁ māsaṁ sā citrā narmadājale sasnau kiṁciddadau dānaṁ śaktyā vipreṣu nityaśaḥ

वह चित्रा संपूर्ण माधव मास नर्मदा-जल में स्नान करती रही, और सामर्थ्यानुसार प्रतिदिन ब्राह्मणों को कुछ दान देती रही।

श्लोक 111 (padma.5.92.111)

सर्वपापहरं स्तोत्रं शृणोति श्रद्धया हरेः । विप्राणां तत्र पठतां संगादस्य द्विजन्मनः

sarvapāpaharaṁ stotraṁ śṛṇoti śraddhayā hareḥ viprāṇāṁ tatra paṭhatāṁ saṁgādasya dvijanmanaḥ

वहाँ पढ़ते हुए ब्राह्मणों की, उस द्विजन्मा के संग से, वह श्रद्धापूर्वक हरि का सर्व-पापहर स्तोत्र सुनती थी।

श्लोक 112 (padma.5.92.112)

निमज्ज्य सा माधवमासि पूर्णे रेवाजले तत्र महीसुरेभ्यः । अच्छिद्रमासाद्य यथाविधानं तत्रापि चित्रापि चकार मासम्

nimajjya sā mādhavamāsi pūrṇe revājale tatra mahīsurebhyaḥ acchidramāsādya yathāvidhānaṁ tatrāpi citrāpi cakāra māsam

वह पूर्ण माधव मास में रेवा-जल में डुबकी लगाकर, विधिपूर्वक भू-देवों को निर्दोष रूप से प्राप्त करके, चित्रा ने भी वहाँ मास-व्रत का पालन किया।

श्लोक 113 (padma.5.92.113)

कुटीरकं तं तु नवं विधाय सुदेवनामापि स भूमिदेवः । उवास रेवासलिले निमज्जंश्चित्रोपरोधादनिशं दयातः

kuṭīrakaṁ taṁ tu navaṁ vidhāya sudevanāmāpi sa bhūmidevaḥ uvāsa revāsalile nimajjaṁścitroparodhādaniśaṁ dayātaḥ

नई कुटिया बनाकर, वह भू-देव, सुदेव नाम से, चित्रा के अनुरोध से, दयापूर्वक रेवा के जल में निरंतर डुबकी लगाते हुए रहा।

श्लोक 114 (padma.5.92.114)

अथ कालेन कियता कालधर्ममुपेयिवान् । विप्रस्तदनु सा चित्रा चिरेणैव मृता नृप

atha kālena kiyatā kāladharmamupeyivān viprastadanu sā citrā cireṇaiva mṛtā nṛpa

फिर कुछ काल बाद वह विप्र काल-धर्म को प्राप्त हुआ; उसके बाद चित्रा भी, हे राजन्! चिरकाल बाद ही मरी।

श्लोक 115 (padma.5.92.115)

तेन माधवमासस्य सुकृतेन तदैव सा । पुत्री तवाभवन्नूनमदृष्ट्वा यमयातनाम्

tena mādhavamāsasya sukṛtena tadaiva sā putrī tavābhavannūnamadṛṣṭvā yamayātanām

उस माधव मास के पुण्य से ही वह तभी तुम्हारी पुत्री बनी, निश्चय ही यम की यातना देखे बिना।

श्लोक 116 (padma.5.92.116)

तस्य कर्मविपाकोऽयं यदाप्तं भूपतेः कुलम् । वैष्णवं विशदं वीर दुष्प्राप्यं पापकर्मभिः

tasya karmavipāko'yaṁ yadāptaṁ bhūpateḥ kulam vaiṣṇavaṁ viśadaṁ vīra duṣprāpyaṁ pāpakarmabhiḥ

उस कर्म का यही विपाक है, जिससे उसने पापपूर्ण कर्मों से दुष्प्राप्य, हे वीर! राजा का विशद वैष्णव कुल प्राप्त किया।

श्लोक 117 (padma.5.92.117)

दिव्यादेवी वरं नाम जातं चास्यां नरोत्तम । यच्च दत्तवती चान्नं भोग्यसौख्यसुखानि च

divyādevī varaṁ nāma jātaṁ cāsyāṁ narottama yacca dattavatī cānnaṁ bhogyasaukhyasukhāni ca

वह उत्तम नाम वाली दिव्यादेवी तुम्हारी पुत्री बनी, हे नरोत्तम! और उसने पहले उस ब्राह्मण को अन्न तथा भोग्य सुख भी दिए थे,

श्लोक 118 (padma.5.92.118)

ब्राह्मणाय पुरा तस्मै गणिकात्वेऽपि संगता । स्नात्वा च माधवे मासि किंचित्तत्रापि यद्ददौ

brāhmaṇāya purā tasmai gaṇikātve'pi saṁgatā snātvā ca mādhave māsi kiṁcittatrāpi yaddadau

गणिका होते हुए भी; और माधव मास में स्नान करके जो कुछ वहाँ भी दिया था,

श्लोक 119 (padma.5.92.119)

तस्य दानस्य सा भुंक्ते स्नानस्य च फलोदयम् । पिबते शीतलं तोयं मिष्टान्नं च तथानिशम्

tasya dānasya sā bhuṁkte snānasya ca phalodayam pibate śītalaṁ toyaṁ miṣṭānnaṁ ca tathāniśam

उस दान और स्नान के फल का उदय वह भोगती है; वह सदा शीतल जल और मीठा अन्न पीती-खाती है,

श्लोक 120 (padma.5.92.120)

दिव्यान्भोगान्प्रभुंजाना वर्तते च प्रभोर्गृहे । भुंजते विधिदत्तं च दुःखशोकादिपीडिता

divyānbhogānprabhuṁjānā vartate ca prabhorgṛhe bhuṁjate vidhidattaṁ ca duḥkhaśokādipīḍitā

दिव्य भोगों को भोगती हुई, स्वामी के घर में रहती है; जबकि विधि से दिया हुआ भोगने वाले (अन्य) लोग दुःख-शोक आदि से पीड़ित रहते हैं।

श्लोक 121 (padma.5.92.121)

यत्पुरा नरनारीणां गृहभंगरताऽभवत् । तस्यकर्मविपाकोऽयमस्याः किंचिदुपस्थितः

yatpurā naranārīṇāṁ gṛhabhaṁgaratā'bhavat tasyakarmavipāko'yamasyāḥ kiṁcidupasthitaḥ

पूर्वकाल में जो वह नर-नारियों के घर बिगाड़ने में रत थी, उसी कर्म का यह कुछ विपाक अभी भी उसके पास शेष है।

श्लोक 122 (padma.5.92.122)

माधवस्नानमाहात्म्याद्विनैव यमयातनाम् । महापापापि ते वीर सुंदरी सा सुताभवत्

mādhavasnānamāhātmyādvinaiva yamayātanām mahāpāpāpi te vīra suṁdarī sā sutābhavat

माधव-स्नान के माहात्म्य से, यम की यातना के बिना ही, हे वीर! वह महापापिनी भी तुम्हारी सुंदर पुत्री बन गई।

श्लोक 123 (padma.5.92.123)

एतत्ते सर्वमाख्यातं तव पुत्र्या विचेष्टितम् । सर्वजन्मभवं वीर कर्म दुष्कर्मसंभवम्

etatte sarvamākhyātaṁ tava putryā viceṣṭitam sarvajanmabhavaṁ vīra karma duṣkarmasaṁbhavam

यह सब मैंने तुम्हें बताया है, हे वीर! तुम्हारी पुत्री का यह आचरण, सभी जन्मों में हुआ, दुष्कर्मों से उत्पन्न कर्म।

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