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पाताल खण्ड · अध्याय 95

माधव-पूजन-विधि और राजा अंबरीष का पूर्वजन्म

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

श्लोक 1 (padma.5.95.1)

सूत उवाच- यातुं तमुद्यतं नत्वा मुनिं राजा ततो मुदा । विधिं पप्रच्छ संक्षिप्तं स्नानदानक्रियोचितम्

sūta uvāca- yātuṁ tamudyataṁ natvā muniṁ rājā tato mudā vidhiṁ papraccha saṁkṣiptaṁ snānadānakriyocitam

सूत ने कहा— तब राजा ने जाने को उद्यत उन मुनि को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक स्नान और दान की क्रिया से संबंधित विधि संक्षेप में पूछी।

श्लोक 2 (padma.5.95.2)

अंबरीष उवाच- मुने वैशाखमासेऽस्मिन्को विधिः किं तपोऽधिकम् । किं च दानं कथं स्नानं कथं केशवपूजनम्

aṁbarīṣa uvāca- mune vaiśākhamāse'sminko vidhiḥ kiṁ tapo'dhikam kiṁ ca dānaṁ kathaṁ snānaṁ kathaṁ keśavapūjanam

अंबरीष ने कहा— हे मुने! इस वैशाखमास में क्या विधि है, कौन-सी तपस्या श्रेष्ठ है, क्या दान है, स्नान कैसे किया जाए, केशव की पूजा कैसे हो?

श्लोक 3 (padma.5.95.3)

कृपया वद विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं हरिप्रियः । विशेषतोऽपि पूजाया विधिं तीर्थपदे वद

kṛpayā vada viprarṣe sarvajñastvaṁ haripriyaḥ viśeṣato'pi pūjāyā vidhiṁ tīrthapade vada

हे विप्रर्षे! आप सर्वज्ञ हैं और हरि के प्रिय हैं, कृपया बताइए; विशेष रूप से तीर्थस्थल में पूजा की विधि भी बताइए।

श्लोक 4 (padma.5.95.4)

नारद उवाच-। मेषसंक्रमणे भानोर्माधवे मासि सत्तम । महानद्यां नदीतीरे नदे सरसि निर्झरे

nārada uvāca- meṣasaṁkramaṇe bhānormādhave māsi sattama mahānadyāṁ nadītīre nade sarasi nirjhare

नारद ने कहा— हे उत्तम! जब सूर्य मेष राशि में हो, माधवमास में, किसी बड़ी नदी में, नदी-तट पर, नद में, सरोवर में, या झरने में —

श्लोक 5 (padma.5.95.5)

देवखातेऽथवा स्नायाद्यथाप्राप्ते जलाशये । दीर्घिका कूप वापीषु नियतात्मा हरिं स्मरन्

devakhāte'thavā snāyādyathāprāpte jalāśaye dīrghikā kūpa vāpīṣu niyatātmā hariṁ smaran

या देवखात में, या जो भी जलाशय मिले, दीर्घिका, कूप या बावली में — संयमित होकर हरि का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.5.95.6)

मधुमासस्य शुक्लायामेकादश्यामुपोषितः । पंचदश्यां च वा वीर मेषसंक्रमणेऽपि वा

madhumāsasya śuklāyāmekādaśyāmupoṣitaḥ paṁcadaśyāṁ ca vā vīra meṣasaṁkramaṇe'pi vā

हे वीर! मधुमास की शुक्ल एकादशी को उपवास करके, या पूर्णिमा को, अथवा मेष-संक्रांति पर भी —

श्लोक 7 (padma.5.95.7)

वैशाखस्नाननियमं ब्राह्मणानामनुज्ञया । मधुसूदनमभ्यर्च्य कुर्यात्सुस्नानपूर्वकम्

vaiśākhasnānaniyamaṁ brāhmaṇānāmanujñayā madhusūdanamabhyarcya kuryātsusnānapūrvakam

ब्राह्मणों की अनुमति लेकर वैशाख-स्नान का नियम लेना चाहिए, और अच्छी तरह स्नानपूर्वक मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 8 (padma.5.95.8)

वैशाखं सकलं मासं मेषसंक्रमणे रवेः । प्रातः सनियमः स्नास्ये प्रीयतां मधुसूदनः

vaiśākhaṁ sakalaṁ māsaṁ meṣasaṁkramaṇe raveḥ prātaḥ saniyamaḥ snāsye prīyatāṁ madhusūdanaḥ

संकल्प करे— 'सूर्य के मेष राशि में रहते हुए, संपूर्ण वैशाखमास प्रातःकाल नियमपूर्वक मैं स्नान करूँगा; मधुसूदन प्रसन्न हों।'

श्लोक 9 (padma.5.95.9)

मधुहंतुः प्रसादेन ब्राह्मणानामनुग्रहात् । निर्विघ्नमस्तु मे पुण्यंवैशाखस्नानमन्वहम्

madhuhaṁtuḥ prasādena brāhmaṇānāmanugrahāt nirvighnamastu me puṇyaṁvaiśākhasnānamanvaham

'मधु के संहारक की कृपा से, ब्राह्मणों के अनुग्रह से, मेरा यह प्रतिदिन का पुण्य वैशाख-स्नान निर्विघ्न हो।'

श्लोक 10 (padma.5.95.10)

माधवे मेषगे भानौ मुरारे मधुसूदन । प्रातःस्नानेन मे नाथ यथोक्तफलदो भव

mādhave meṣage bhānau murāre madhusūdana prātaḥsnānena me nātha yathoktaphalado bhava

'हे मधुसूदन! सूर्य के मेष राशि में रहते हुए, हे मुरारि, हे नाथ! मेरे प्रातः-स्नान से कथित फल देने वाले बनिए।'

श्लोक 11 (padma.5.95.11)

यथा ते माधवो मासो वल्लभो मधुसूदन । प्रातःस्नानेन मे तस्मिन्फलदः पापहा भव

yathā te mādhavo māso vallabho madhusūdana prātaḥsnānena me tasminphaladaḥ pāpahā bhava

'हे मधुसूदन! जैसे यह माधवमास आपको प्रिय है, वैसे ही मेरे इस प्रातः-स्नान में फलदाता और पापनाशक बनिए।'

श्लोक 12 (padma.5.95.12)

एवमुच्चार्य तत्तीर्थे पादौ प्रक्षाल्य वाग्यतः । स्मरन्नारायणं देवं स्नानं कुर्याद्विधानतः

evamuccārya tattīrthe pādau prakṣālya vāgyataḥ smarannārāyaṇaṁ devaṁ snānaṁ kuryādvidhānataḥ

इस प्रकार कहकर, उस तीर्थ में पैर धोकर, मौन रहकर, नारायण देव का स्मरण करते हुए विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।

श्लोक 13 (padma.5.95.13)

तीर्थं प्रकल्पयेद्धीमान्मूलमंत्रमिमं पठन् । ॐनमोनारायणायमूलमंत्र उदाहृतः

tīrthaṁ prakalpayeddhīmānmūlamaṁtramimaṁ paṭhan oṁnamonārāyaṇāyamūlamaṁtra udāhṛtaḥ

बुद्धिमान व्यक्ति यह मूल मंत्र पढ़ते हुए तीर्थ की कल्पना करे — 'ॐ नमो नारायणाय' यह मूल मंत्र कहा गया है।

श्लोक 14 (padma.5.95.14)

दर्भपाणिस्तु विधिवदाचांतः प्रणतो भुवि । चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समंततः

darbhapāṇistu vidhivadācāṁtaḥ praṇato bhuvi caturhastasamāyuktaṁ caturasraṁ samaṁtataḥ

हाथ में कुश लेकर, विधिपूर्वक आचमन करके, भूमि पर प्रणाम करके, चार हाथ की चौकोर भूमि सब ओर से तैयार करे।

श्लोक 15 (padma.5.95.15)

प्रकल्प्यावाहयेद्गंगां मंत्रेणानेन मानवः । विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता

prakalpyāvāhayedgaṁgāṁ maṁtreṇānena mānavaḥ viṣṇupādaprasūtāsi vaiṣṇavī viṣṇudevatā

इस मंत्र से मनुष्य गंगा का आवाहन करे— 'तुम विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, वैष्णवी, जिसकी देवता विष्णु हैं —

श्लोक 16 (padma.5.95.16)

त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणांतिकात् । तिस्रःकोट्योर्द्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्

trāhi nastvenasastasmādājanmamaraṇāṁtikāt tisraḥkoṭyorddhakoṭī ca tīrthānāṁ vāyurabravīt

'हमें जन्म से मृत्यु-पर्यंत के इस पाप से बचाओ।' वायुदेव ने कहा है कि साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं —

श्लोक 17 (padma.5.95.17)

दिवि भुव्यंतरिक्षे च तानि ते संति जाह्नवि । नंदिनीत्येव ते नाम वेदेषु नलिनीति च

divi bhuvyaṁtarikṣe ca tāni te saṁti jāhnavi naṁdinītyeva te nāma vedeṣu nalinīti ca

हे जाह्नवी! वे सब स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष में तुम में ही स्थित हैं। वेदों में तुम्हारा नाम 'नंदिनी' और 'नलिनी' भी है।

श्लोक 18 (padma.5.95.18)

दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वगाथा शिवप्रिया । विद्याधरी महादेवी तथा लोकप्रसादिनी

dakṣā pṛthvī ca vihagā viśvagāthā śivapriyā vidyādharī mahādevī tathā lokaprasādinī

तुम दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वगाथा, शिवप्रिया, विद्याधरी, महादेवी और लोकप्रसादिनी भी हो।

श्लोक 19 (padma.5.95.19)

क्षेमंकरी जाह्नवी च शांता शांतिप्रदायिनी । एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत्

kṣemaṁkarī jāhnavī ca śāṁtā śāṁtipradāyinī etāni puṇyanāmāni snānakāle prakīrtayet

तुम क्षेमंकरी, जाह्नवी, शांता और शांतिप्रदायिनी भी हो।' स्नान के समय ये पुण्य नाम कहने चाहिए।

श्लोक 20 (padma.5.95.20)

भवेत्संनिहिता तत्र गंगा त्रिपथगामिनी । सप्तवाराभि जप्तेन करसंपुटयोजिते

bhavetsaṁnihitā tatra gaṁgā tripathagāminī saptavārābhi japtena karasaṁpuṭayojite

हाथ जोड़कर इसे सात बार जपने से त्रिपथगामिनी गंगा वहाँ साक्षात् उपस्थित हो जाती है।

श्लोक 21 (padma.5.95.21)

मूर्ध्नि कृत्वा जलं भूपश्चतुर्वा पंच सप्त वा । स्नानं कृत्वा मृदा तद्वदामंत्र्य तु विधानतः

mūrdhni kṛtvā jalaṁ bhūpaścaturvā paṁca sapta vā snānaṁ kṛtvā mṛdā tadvadāmaṁtrya tu vidhānataḥ

हे राजन्! चार, पाँच या सात बार सिर पर जल डालकर स्नान करके, फिर विधिपूर्वक मिट्टी लेकर उसका आवाहन करना चाहिए।

श्लोक 22 (padma.5.95.22)

अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे । मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्

aśvakrāṁte rathakrāṁte viṣṇukrāṁte vasuṁdhare mṛttike hara me pāpaṁ yanmayā duṣkṛtaṁ kṛtam

'हे अश्व-रथ-विष्णु द्वारा विचरित वसुंधरे! हे मिट्टी! मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, वह पाप हर लो —

श्लोक 23 (padma.5.95.23)

उद्धृतासि वराहेण विष्णुना शतबाहुना । नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते

uddhṛtāsi varāheṇa viṣṇunā śatabāhunā namaste sarvalokānāṁ prabhavāraṇi suvrate

'तुम शतबाहु विष्णु द्वारा वराह रूप में उद्धृत हुई हो; हे सुव्रते, सब लोकों की उत्पत्ति-स्थान! तुम्हें नमस्कार है।'

श्लोक 24 (padma.5.95.24)

एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य तु विधानतः । उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधापयेत्

evaṁ snātvā tataḥ paścādācamya tu vidhānataḥ utthāya vāsasī śukle śuddhe tu paridhāpayet

इस प्रकार स्नान करके, फिर विधिपूर्वक आचमन करके, उठकर दो शुभ्र और शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए।

श्लोक 25 (padma.5.95.25)

ततस्तु तर्प्पणं कुर्य्यात्त्रैलोक्याप्यायनाय वै । ब्रह्माणं तर्प्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्

tatastu tarppaṇaṁ kuryyāttrailokyāpyāyanāya vai brahmāṇaṁ tarppayetpūrvaṁ viṣṇuṁ rudraṁ prajāpatim

फिर तीनों लोकों की तृप्ति के लिए तर्पण करना चाहिए; सबसे पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापति को तर्पण दे —

श्लोक 26 (padma.5.95.26)

देवान्यक्षांस्तथा नागान्गंधर्वाप्सरसोसुरान् । क्रूरान्सर्पान्सुपर्णांश्च तरून्वै जंतुकान्खगान्

devānyakṣāṁstathā nāgāngaṁdharvāpsarasosurān krūrānsarpānsuparṇāṁśca tarūnvai jaṁtukānkhagān

देवताओं, यक्षों, नागों, गंधर्वों-अप्सराओं-असुरों को, क्रूर सर्पों, गरुड़ों, वृक्षों, कीट-पतंगों और पक्षियों को —

श्लोक 27 (padma.5.95.27)

विद्याधराञ्जलधरांस्तथैवाकाशगामिनः । निराधाराश्च ये जीवाः पापकर्मरताश्च ये

vidyādharāñjaladharāṁstathaivākāśagāminaḥ nirādhārāśca ye jīvāḥ pāpakarmaratāśca ye

विद्याधरों, मेघों, तथा आकाशगामी जीवों को, और उन सब निराश्रय जीवों को जो पापकर्म में रत हैं —

श्लोक 28 (padma.5.95.28)

तेषामाप्यायनार्थाय दीयते सलिलं मया । कृतोपवीती देवेषु निवीती च भवेन्नरः

teṣāmāpyāyanārthāya dīyate salilaṁ mayā kṛtopavītī deveṣu nivītī ca bhavennaraḥ

इन सबकी तृप्ति के लिए मेरे द्वारा यह जल दिया जाता है। देवताओं के तर्पण में उपवीत बायें कंधे पर, अन्यत्र गले में डालकर मनुष्य करे।

श्लोक 29 (padma.5.95.29)

मनुष्यांस्तर्प्पयेद्भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा । सनकः सनंदनश्चैव तृतीयश्च सनातनः

manuṣyāṁstarppayedbhaktyā brahmaputrānṛṣīṁstathā sanakaḥ sanaṁdanaścaiva tṛtīyaśca sanātanaḥ

मनुष्यों को भक्तिपूर्वक तर्पण दे, और ब्रह्मा के पुत्र ऋषियों को भी — सनक, सनंदन और तीसरे सनातन को —

श्लोक 30 (padma.5.95.30)

कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पंचशिखस्तथा । ते सर्वे तृप्तिमायांतु मद्दत्तेनांबुना सदा

kapilaścāsuriścaiva voḍhuḥ paṁcaśikhastathā te sarve tṛptimāyāṁtu maddattenāṁbunā sadā

कपिल, आसुरि और वोढु, तथा पंचशिख को भी। ये सब मेरे द्वारा दिए गए जल से सदा तृप्त हों।

श्लोक 31 (padma.5.95.31)

मरीचिमत्र्यंगिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च

marīcimatryaṁgirasau pulastyaṁ pulahaṁ kratum pracetasaṁ vasiṣṭhaṁ ca bhṛguṁ nāradameva ca

मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद को भी —

श्लोक 32 (padma.5.95.32)

देवब्रह्मऋषीन्सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः । अपसव्यं ततः कुर्यात्सव्यं जान्वाच्य भूतले

devabrahmaṛṣīnsarvāṁstarpayedakṣatodakaiḥ apasavyaṁ tataḥ kuryātsavyaṁ jānvācya bhūtale

सभी देव-ब्रह्मऋषियों को अक्षत-जल से तर्पण दे। इसके बाद उपवीत को दाहिने कंधे पर रखकर, भूमि पर दायाँ घुटना टेककर —

श्लोक 33 (padma.5.95.33)

अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मंतस्तथोष्मपाः । कव्यानलान्बर्हिषदस्तथा वै चाज्यपाः पुनः

agniṣvāttāstathā saumyā haviṣmaṁtastathoṣmapāḥ kavyānalānbarhiṣadastathā vai cājyapāḥ punaḥ

अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मंत, ऊष्मप, कव्यानल, बर्हिषद और पुनः आज्यप —

श्लोक 34 (padma.5.95.34)

संतर्पयेत्पितॄन्भक्त्या सतिलोदकचंदनैः । यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चांतकाय च

saṁtarpayetpitṝnbhaktyā satilodakacaṁdanaiḥ yamāya dharmarājāya mṛtyave cāṁtakāya ca

इन पितरों को तिल-जल और चंदन से भक्तिपूर्वक तृप्त करे; यम को, धर्मराज को, मृत्यु को और अंतक को —

श्लोक 35 (padma.5.95.35)

वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च । उदुंबराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने

vaivasvatāya kālāya sarvabhūtakṣayāya ca uduṁbarāya dadhnāya nīlāya parameṣṭhine

वैवस्वत को, काल को, सर्वभूतक्षय को, उदुंबर को, दध्न को, नील को, परमेष्ठी को —

श्लोक 36 (padma.5.95.36)

वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः । दर्भपाणिस्तु विधिवत्पितॄन्संतर्पयेत्ततः

vṛkodarāya citrāya citraguptāya vai namaḥ darbhapāṇistu vidhivatpitṝnsaṁtarpayettataḥ

वृकोदर को, चित्र को, चित्रगुप्त को नमस्कार करके — कुश हाथ में लेकर विधिपूर्वक पितरों को तर्पण दे।

श्लोक 37 (padma.5.95.37)

पित्रादीन्नामगोत्रेण तथा मातामहानपि । संतर्प्य विधिना सर्वानिमं मंत्रमुदीरयेत्

pitrādīnnāmagotreṇa tathā mātāmahānapi saṁtarpya vidhinā sarvānimaṁ maṁtramudīrayet

पिता आदि को और नाना आदि को भी नाम-गोत्र से विधिपूर्वक तृप्त करके यह मंत्र बोले —

श्लोक 38 (padma.5.95.38)

ये बांधवा बांधवा ये येऽन्यजन्मनि बांधवाः । ते तृप्तिमखिलां यांतु येऽस्मत्तस्तोयकांक्षिणः

ye bāṁdhavā bāṁdhavā ye ye'nyajanmani bāṁdhavāḥ te tṛptimakhilāṁ yāṁtu ye'smattastoyakāṁkṣiṇaḥ

'जो बंधु हैं, जो अन्य जन्म में बंधु थे, वे सब — जो हमसे जल की इच्छा रखते हैं — पूर्ण तृप्ति को प्राप्त हों।'

श्लोक 39 (padma.5.95.39)

आचम्य विधिवत्सम्यगालिखेत्पद्ममग्रतः । साक्षतैश्च सपुष्पैश्च सलिलारुणचंदनैः

ācamya vidhivatsamyagālikhetpadmamagrataḥ sākṣataiśca sapuṣpaiśca salilāruṇacaṁdanaiḥ

विधिपूर्वक आचमन करके, आगे एक कमल बनाना चाहिए — अक्षत, पुष्प, जल, लाल चंदन और साधारण चंदन से युक्त।

श्लोक 40 (padma.5.95.40)

अर्घं दद्यात्प्रयत्नेन सूर्य्यनामानुकीर्त्तनैः । नमस्ते विष्णुरूपाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे

arghaṁ dadyātprayatnena sūryyanāmānukīrttanaiḥ namaste viṣṇurūpāya namaste brahmarūpiṇe

सूर्य के नामों का उच्चारण करते हुए यत्नपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए— 'विष्णुरूप को नमस्कार, ब्रह्मरूप को नमस्कार —

श्लोक 41 (padma.5.95.41)

सहस्ररश्मये सूर्य नमस्ते सर्वतेजसे । नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते भक्तवत्सल

sahasraraśmaye sūrya namaste sarvatejase namaste rudravapuṣe namaste bhaktavatsala

'हे सूर्य, सहस्ररश्मि, सर्वतेजस्वी! तुम्हें नमस्कार; रुद्ररूप को नमस्कार, हे भक्तवत्सल! तुम्हें नमस्कार।'

श्लोक 42 (padma.5.95.42)

पद्मनाभ नमस्तेऽस्तु कुंडलांगदभूषित । नमस्ते सर्वलोकेश सुप्तानामुपबोधन

padmanābha namaste'stu kuṁḍalāṁgadabhūṣita namaste sarvalokeśa suptānāmupabodhana

'हे पद्मनाभ! तुम्हें नमस्कार, हे कुंडल-अंगद से भूषित! हे सर्वलोकेश्वर, सोए हुओं को जगाने वाले! तुम्हें नमस्कार।'

श्लोक 43 (padma.5.95.43)

सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वदा । सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर

sukṛtaṁ duṣkṛtaṁ caiva sarvaṁ paśyasi sarvadā satyadeva namaste'stu prasīda mama bhāskara

'तुम सदा सत्कर्म और दुष्कर्म सब देखते हो; हे सत्यदेव! तुम्हें नमस्कार; हे भास्कर! मुझ पर प्रसन्न हो।'

श्लोक 44 (padma.5.95.44)

दिवाकर नमस्तेस्तु प्रभाकर नमोस्तु ते । एवं सूर्यं नमस्कृत्य सप्त कृत्वा प्रदक्षिणम्

divākara namastestu prabhākara namostu te evaṁ sūryaṁ namaskṛtya sapta kṛtvā pradakṣiṇam

'हे दिवाकर! तुम्हें नमस्कार, हे प्रभाकर! तुम्हें नमस्कार।' इस प्रकार सूर्य को नमस्कार करके सात बार प्रदक्षिणा करके —

श्लोक 45 (padma.5.95.45)

द्विजं गां कांचनं स्पृष्ट्वा पश्चाच्च स्वगृहं व्रजेत् । आश्रमस्थांस्ततः पूज्य प्रतिमां चापि पूजयेत्

dvijaṁ gāṁ kāṁcanaṁ spṛṣṭvā paścācca svagṛhaṁ vrajet āśramasthāṁstataḥ pūjya pratimāṁ cāpi pūjayet

ब्राह्मण, गाय और सुवर्ण का स्पर्श करके फिर अपने घर जाना चाहिए। वहाँ आश्रम में रहने वालों की पूजा करके प्रतिमा की भी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 46 (padma.5.95.46)

पूर्वं भक्त्यैव गोविंदं गृही च नियतात्मवान् । पूजयेद्भक्तितो राजन्नुभयत्र यथाविधि

pūrvaṁ bhaktyaiva goviṁdaṁ gṛhī ca niyatātmavān pūjayedbhaktito rājannubhayatra yathāvidhi

हे राजन्! पहले भक्तिपूर्वक गोविंद की, फिर गृहस्थ को संयमित होकर, दोनों स्थानों पर विधिवत भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 47 (padma.5.95.47)

विशेषादपि वैशाखे योऽर्चयेन्मधुसूदनम् । सर्वं संवत्सरं यावदर्चितस्तेन माधवः

viśeṣādapi vaiśākhe yo'rcayenmadhusūdanam sarvaṁ saṁvatsaraṁ yāvadarcitastena mādhavaḥ

विशेषरूप से वैशाख में जो मधुसूदन की अर्चना करता है, उसके द्वारा मानो पूरे वर्ष माधव पूजित रहते हैं।

श्लोक 48 (padma.5.95.48)

माधवे मासि संप्राप्ते मेषस्थे कर्मसाक्षिणि । केशवप्रीतये कुर्यात्केशवव्रतसंचयम्

mādhave māsi saṁprāpte meṣasthe karmasākṣiṇi keśavaprītaye kuryātkeśavavratasaṁcayam

मेष राशि में स्थित, कर्मसाक्षी सूर्य के साथ, माधवमास आने पर केशव की प्रसन्नता के लिए केशव-व्रतों का संचय करना चाहिए।

श्लोक 49 (padma.5.95.49)

दद्यादनेकदानानि तिलाज्यप्रभृतीन्यपि । जन्मकोटिसमुद्भूत पातकांतकराणि च

dadyādanekadānāni tilājyaprabhṛtīnyapi janmakoṭisamudbhūta pātakāṁtakarāṇi ca

तिल-घृत आदि अनेक दान देने चाहिए, जो करोड़ों जन्मों से संचित पापों का अंत करने वाले हैं।

श्लोक 50 (padma.5.95.50)

जलान्नशर्कराधेनुतिलधेनुमुखानि च । वित्तमानेन देयानि दानानीप्सितसिद्धये

jalānnaśarkarādhenutiladhenumukhāni ca vittamānena deyāni dānānīpsitasiddhaye

जल, अन्न, शक्कर, तिल-धेनु आदि दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार, इच्छित सिद्धि के लिए देने चाहिए।

श्लोक 51 (padma.5.95.51)

वैशाखं सकलं मासं नित्यस्नायी जितेंद्रियः । जपन्हविष्यं भुंजानः सर्वपापैः प्रमुच्यते

vaiśākhaṁ sakalaṁ māsaṁ nityasnāyī jiteṁdriyaḥ japanhaviṣyaṁ bhuṁjānaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate

जो जितेंद्रिय होकर संपूर्ण वैशाखमास प्रतिदिन स्नान करता है, जप करता है और हविष्यान्न खाता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 52 (padma.5.95.52)

एकभुक्तमथो नक्तमयाचितमतंद्रितः । माधवे मासि यः कुर्याल्लभते सर्वमीप्सितम्

ekabhuktamatho naktamayācitamataṁdritaḥ mādhave māsi yaḥ kuryāllabhate sarvamīpsitam

जो अनालसी होकर एकभुक्त, या रात्रि-भोजन, या अयाचित भोजन का नियम माधवमास में लेता है, वह सब इच्छित वस्तुएँ प्राप्त करता है।

श्लोक 53 (padma.5.95.53)

वैशाखे विधिना स्नानद्वयं नद्यादिके बहिः । हविष्यं ब्रह्मचर्यं च भूशय्या नियमस्थितिः

vaiśākhe vidhinā snānadvayaṁ nadyādike bahiḥ haviṣyaṁ brahmacaryaṁ ca bhūśayyā niyamasthitiḥ

वैशाख में नदी आदि बाहरी स्थान पर विधिपूर्वक दो बार स्नान, हविष्यान्न, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन और नियम में रहना —

श्लोक 54 (padma.5.95.54)

व्रतं दानं जपो होमो मधुसूदनपूजनम् । अपि जन्मसहस्रोत्थं पापं दहति दारुणम्

vrataṁ dānaṁ japo homo madhusūdanapūjanam api janmasahasrotthaṁ pāpaṁ dahati dāruṇam

व्रत, दान, जप, हवन और मधुसूदन-पूजन — ये हज़ार जन्मों में उपार्जित घोर पाप को भी जला देते हैं।

श्लोक 55 (padma.5.95.55)

यथैव माधवो ध्यातो विनाशयति किल्बिषम् । तथैव माधवे स्नानं नियमेन विनिर्मितम्

yathaiva mādhavo dhyāto vināśayati kilbiṣam tathaiva mādhave snānaṁ niyamena vinirmitam

जैसे ध्यान किए गए माधव पाप का नाश करते हैं, वैसे ही नियमपूर्वक किया गया माधवमास का स्नान भी पाप का नाश करता है।

श्लोक 56 (padma.5.95.56)

तीर्थे चानुदिनं स्नानं तिलैश्च पितृतर्पणम् । दानं धर्मघटादीनां मधुसूदनपूजनम्

tīrthe cānudinaṁ snānaṁ tilaiśca pitṛtarpaṇam dānaṁ dharmaghaṭādīnāṁ madhusūdanapūjanam

तीर्थ में प्रतिदिन स्नान, तिल से पितृ-तर्पण, धर्मार्थ घट आदि का दान, मधुसूदन-पूजन —

श्लोक 57 (padma.5.95.57)

माधवे मासि कुर्वीत मधुसूदनतुष्टिदम् । तिलोदकसुवर्णान्न शर्करांबरभूषणम्

mādhave māsi kurvīta madhusūdanatuṣṭidam tilodakasuvarṇānna śarkarāṁbarabhūṣaṇam

ये सब माधवमास में मधुसूदन को संतोष देने वाले हैं। तिल, जल, सुवर्ण, अन्न, शक्कर, वस्त्र और आभूषण —

श्लोक 58 (padma.5.95.58)

पादत्राणातपत्रांबु कुंभान्दद्याद्द्विजातिषु । त्रिसंध्यं पूजयेदीशं भक्तितो मधुसूदनम्

pādatrāṇātapatrāṁbu kuṁbhāndadyāddvijātiṣu trisaṁdhyaṁ pūjayedīśaṁ bhaktito madhusūdanam

पादुका, छाता, जल के घड़े — ये द्विजों को देने चाहिए। तीनों संध्याओं में भक्तिपूर्वक मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 59 (padma.5.95.59)

साक्षाद्विमलया लक्ष्म्या समुपेतं समाहितः । सुवर्णतिलपात्रैश्च ब्राह्मणाञ्छक्तितो बहून्

sākṣādvimalayā lakṣmyā samupetaṁ samāhitaḥ suvarṇatilapātraiśca brāhmaṇāñchaktito bahūn

साक्षात् निर्मल लक्ष्मी सहित उन्हें ध्यान करते हुए, स्वर्ण-तिल के पात्रों से सामर्थ्य अनुसार अनेक ब्राह्मणों को —

श्लोक 60 (padma.5.95.60)

तर्पयेदुदपात्रैर्यो ब्रह्महत्यां व्यपोहति । वैशाखे मासि यः स्नात्वा प्रातर्नद्यां समाहितः

tarpayedudapātrairyo brahmahatyāṁ vyapohati vaiśākhe māsi yaḥ snātvā prātarnadyāṁ samāhitaḥ

जल-पात्रों से तर्पण करने वाला ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर कर देता है। जो वैशाखमास में प्रातःकाल नदी में संयमित होकर स्नान कर —

श्लोक 61 (padma.5.95.61)

पूजयित्वा हरिं भक्त्या पुष्पैः कालोद्भवैः फलैः । पूजयेद्ब्राह्मणं शक्त्या पाखंडालापवर्जितः

pūjayitvā hariṁ bhaktyā puṣpaiḥ kālodbhavaiḥ phalaiḥ pūjayedbrāhmaṇaṁ śaktyā pākhaṁḍālāpavarjitaḥ

ऋतु में उत्पन्न फूलों और फलों से भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करके, सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण की पूजा पाखंडियों की बातचीत से दूर रहकर करता है —

श्लोक 62 (padma.5.95.62)

तर्पयेद्वस्त्रगोदानै रत्नाद्यैर्धनसंचयैः । अन्यद्वित्तं यथाशक्ति स्तोकं स्तोकं समाचरेत्

tarpayedvastragodānai ratnādyairdhanasaṁcayaiḥ anyadvittaṁ yathāśakti stokaṁ stokaṁ samācaret

वस्त्र, गाय, रत्न आदि संचित धन से तर्पण करे; अन्य धन भी सामर्थ्य के अनुसार थोड़ा-थोड़ा करके दे।

श्लोक 63 (padma.5.95.63)

पश्चाद्विनिःस्वः पुरुषो माधवे मासि माधवम् । पुष्पार्चनविधानेन पूजयेन्मधुसूदनम्

paścādviniḥsvaḥ puruṣo mādhave māsi mādhavam puṣpārcanavidhānena pūjayenmadhusūdanam

जिसके पास धन न हो, वह भी माधवमास में केवल पुष्प-अर्चना विधि से मधुसूदन की पूजा करे।

श्लोक 64 (padma.5.95.64)

सर्वपापविनिर्मुक्तः पितॄणां तारयेच्छतम् । सजन्मशतसाहस्रं न शोकफलभाग्भवेत्

sarvapāpavinirmuktaḥ pitṝṇāṁ tārayecchatam sajanmaśatasāhasraṁ na śokaphalabhāgbhavet

वह सब पापों से मुक्त होकर सौ पितरों को तार देता है; लाख जन्मों तक वह शोक का भागी नहीं बनता।

श्लोक 65 (padma.5.95.65)

न च व्याधिभयं तस्य न दारिद्र्यं न बंधनम् । स विष्णुभक्तो जायेत धन्यो जन्मनिजन्मनि

na ca vyādhibhayaṁ tasya na dāridryaṁ na baṁdhanam sa viṣṇubhakto jāyeta dhanyo janmanijanmani

उसे न रोग का भय होता है, न दरिद्रता, न बंधन। वह जन्म-जन्म में धन्य विष्णुभक्त बनता है।

श्लोक 66 (padma.5.95.66)

यावद्युगसहस्राणि शतमष्टोत्तरं भवेत् । तावत्स्वर्गे वसेद्वीर भूपतिश्च पुनर्भवेत्

yāvadyugasahasrāṇi śatamaṣṭottaraṁ bhavet tāvatsvarge vasedvīra bhūpatiśca punarbhavet

हे वीर! एक सौ आठ हज़ार युगों तक वह स्वर्ग में निवास करता है, और फिर राजा बनकर पुनः जन्म लेता है।

श्लोक 67 (padma.5.95.67)

भूपतेर्विविधान्भोगान्भुक्त्वा चैव यथासुखम् । माधवस्य प्रसादेन माधवे लीयते ततः

bhūpatervividhānbhogānbhuktvā caiva yathāsukham mādhavasya prasādena mādhave līyate tataḥ

राजा के रूप में इच्छानुसार विविध भोगों का उपभोग करके, माधव की कृपा से अंततः वह माधव में लीन हो जाता है।

श्लोक 68 (padma.5.95.68)

शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि समासान्माधवार्चनम् । वैदिकं तांत्रिकं वापि मिश्रकं पापनाशनम्

śṛṇu rājanpravakṣyāmi samāsānmādhavārcanam vaidikaṁ tāṁtrikaṁ vāpi miśrakaṁ pāpanāśanam

हे राजन्! सुनिए, मैं संक्षेप में माधव-पूजन बताता हूँ — वैदिक, तांत्रिक या मिश्र, जो पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 69 (padma.5.95.69)

नह्यंतोऽनंतपारस्य नांतः पूजाविधेर्नृप । अथ संक्षिप्य चोच्येत यथावदनुपूर्वशः

nahyaṁto'naṁtapārasya nāṁtaḥ pūjāvidhernṛpa atha saṁkṣipya cocyeta yathāvadanupūrvaśaḥ

हे राजन्! उस अनंत के अंत का, और पूजा-विधि का भी अंत नहीं है। अतः संक्षेप में क्रमानुसार बताता हूँ।

श्लोक 70 (padma.5.95.70)

वैदिकस्तांत्रिको मिश्रः श्रीविष्णोस्त्रिविधो मखः । त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना हरिमर्चयेत्

vaidikastāṁtriko miśraḥ śrīviṣṇostrividho makhaḥ trayāṇāmīpsitenaiva vidhinā harimarcayet

श्रीविष्णु की पूजा वैदिक, तांत्रिक और मिश्र — इस प्रकार तीन प्रकार की है। इन तीनों में से जिस इच्छित विधि से चाहे, हरि की पूजा करे।

श्लोक 71 (padma.5.95.71)

वैदिको मिश्रको वापि विप्रादीनां विधीयते । तांत्रिको विष्णुभक्तस्य शूद्रस्यापि प्रकीर्तितः

vaidiko miśrako vāpi viprādīnāṁ vidhīyate tāṁtriko viṣṇubhaktasya śūdrasyāpi prakīrtitaḥ

वैदिक या मिश्र विधि ब्राह्मणादि के लिए विहित है; तांत्रिक विधि विष्णुभक्त, यहाँ तक कि शूद्र के लिए भी कही गई है।

श्लोक 72 (padma.5.95.72)

यथा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः । यजेच्च विधिवद्विष्णुं ब्रह्मचारी समाहितः

yathā svanigamenoktaṁ dvijatvaṁ prāpya pūruṣaḥ yajecca vidhivadviṣṇuṁ brahmacārī samāhitaḥ

जैसा अपने वेद-शाखा में कहा गया हो, उसके अनुसार द्विजत्व प्राप्त पुरुष संयमित ब्रह्मचारी होकर विधिपूर्वक विष्णु का यजन करे।

श्लोक 73 (padma.5.95.73)

अर्चयेत्स्थंडिलेऽग्नौ वा सूर्येऽप्सु हृदि वा द्विजे । द्रव्येण भक्तियुक्तेन स्वगुरुं तदनुज्ञया

arcayetsthaṁḍile'gnau vā sūrye'psu hṛdi vā dvije dravyeṇa bhaktiyuktena svaguruṁ tadanujñayā

स्थंडिल में, अग्नि में, सूर्य में, जल में, हृदय में या ब्राह्मण में — भक्तियुक्त द्रव्य से, गुरु की अनुमति से गुरु की भी पूजा करे।

श्लोक 74 (padma.5.95.74)

पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदंतोंऽगशुद्धये । उभयोरपि च स्नानं मंत्रैर्मृद्ग्रहणादिना

pūrvaṁ snānaṁ prakurvīta dhautadaṁtoṁ'gaśuddhaye ubhayorapi ca snānaṁ maṁtrairmṛdgrahaṇādinā

पहले शरीर-शुद्धि के लिए दाँत साफ करके स्नान करना चाहिए; दोनों (वैदिक-तांत्रिक) में स्नान मंत्रों, मिट्टी लेने आदि से किया जाता है।

श्लोक 75 (padma.5.95.75)

संध्योपास्त्यादिकर्माणि वेदतंत्रोदितानि वै । पूजांते कल्पयेत्सम्यक्संकल्पं कर्मपावनम्

saṁdhyopāstyādikarmāṇi vedataṁtroditāni vai pūjāṁte kalpayetsamyaksaṁkalpaṁ karmapāvanam

संध्योपासना आदि कर्म वेद-तंत्र में कहे गए हैं; पूजा के अंत में कर्म को पवित्र करने वाला संकल्प भलीभाँति करना चाहिए।

श्लोक 76 (padma.5.95.76)

शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती । मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता

śailī dārumayī lauhī lepyā lekhyā ca saikatī manomayī maṇimayī pratimāṣṭavidhā smṛtā

शैली, दारुमयी, धातु की, लेप की, चित्रित, बालू की, मनोमयी और मणिमयी — प्रतिमा आठ प्रकार की कही गई है।

श्लोक 77 (padma.5.95.77)

चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमंदिरम् । उद्वासा वाहनेन स्तः स्थिरायां माधवार्चने

calācaleti dvividhā pratiṣṭhā jīvamaṁdiram udvāsā vāhanena staḥ sthirāyāṁ mādhavārcane

चल और अचल — इस प्रकार प्रतिष्ठा दो प्रकार की है, जीव का मंदिर है; स्थिर माधव-पूजा में उद्वासन और वाहन दोनों होते हैं।

श्लोक 78 (padma.5.95.78)

अस्थिरायां विकल्पः स्यात्स्थंडिले तु भवेद्द्वयम् । स्नापनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्

asthirāyāṁ vikalpaḥ syātsthaṁḍile tu bhaveddvayam snāpanaṁ tvavilepyāyāmanyatra parimārjanam

अस्थिर में विकल्प होता है, स्थंडिल में दोनों होते हैं; जो लेप से न बनी हो उसका स्नपन होता है, अन्यत्र परिमार्जन।

श्लोक 79 (padma.5.95.79)

द्रव्यैः प्रसिद्धैर्देवेज्या प्रतिमादिष्वमायिनः । भक्तस्य च यथालब्धैर्भक्तिभावेन चैव हि

dravyaiḥ prasiddhairdevejyā pratimādiṣvamāyinaḥ bhaktasya ca yathālabdhairbhaktibhāvena caiva hi

प्रसिद्ध द्रव्यों से निष्कपट भाव से प्रतिमा आदि में देवपूजा होती है, और भक्त द्वारा जो कुछ मिले उसी से भक्तिभाव में भी।

श्लोक 80 (padma.5.95.80)

स्नानालंकरणं श्रेष्ठमर्चायामेव भूपते । स्थंडिलेष्वपि विन्यासो वह्नावाज्यहुतं हविः

snānālaṁkaraṇaṁ śreṣṭhamarcāyāmeva bhūpate sthaṁḍileṣvapi vinyāso vahnāvājyahutaṁ haviḥ

हे राजन्! पूजित प्रतिमा में स्नान और अलंकरण श्रेष्ठ है; स्थंडिल में स्थापन, अग्नि में घृत-आहुति श्रेष्ठ है।

श्लोक 81 (padma.5.95.81)

सूर्ये चाभ्यर्हणं श्रेष्ठं स्थंडिले सलिलादिभिः । श्रद्धयोपहृतं श्रेष्ठं हरौ भक्तेन वार्यपि

sūrye cābhyarhaṇaṁ śreṣṭhaṁ sthaṁḍile salilādibhiḥ śraddhayopahṛtaṁ śreṣṭhaṁ harau bhaktena vāryapi

सूर्य में अभ्यर्चन श्रेष्ठ है, स्थंडिल में जल आदि से; श्रद्धा से अर्पित वस्तु श्रेष्ठ है — हरि को भक्त द्वारा दिया गया जल भी श्रेष्ठ है।

श्लोक 82 (padma.5.95.82)

गंधो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः । शुचिः संभृतसंभारः प्राग्दर्भैः कल्पितासनः

gaṁdho dhūpaḥ sumanaso dīpo'nnādyaṁ ca kiṁ punaḥ śuciḥ saṁbhṛtasaṁbhāraḥ prāgdarbhaiḥ kalpitāsanaḥ

गंध, धूप, फूल, दीप, अन्न — फिर और क्या कहें? शुद्ध होकर, सामग्री एकत्रित करके, पूर्व दिशा में मुख करके कुश के आसन पर बैठे।

श्लोक 83 (padma.5.95.83)

आसीनः प्रागुदग्वक्त्रो ह्यर्चायामथ सम्मुखः । कृतन्यासः कृतन्यासां हर्यर्चां पाणिना स्पृशेत्

āsīnaḥ prāgudagvaktro hyarcāyāmatha sammukhaḥ kṛtanyāsaḥ kṛtanyāsāṁ haryarcāṁ pāṇinā spṛśet

पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठकर, या प्रतिमा के सम्मुख होकर, न्यास करके, न्यास की गई हरि-प्रतिमा को हाथ से स्पर्श करे।

श्लोक 84 (padma.5.95.84)

कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत् । तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च

kalaśaṁ prokṣaṇīyaṁ ca yathāvadupasādhayet tadadbhirdevayajanaṁ dravyāṇyātmānameva ca

कलश और प्रोक्षणी पात्र विधिपूर्वक तैयार करे; उस जल से पूजा-स्थान, सामग्री और स्वयं को छिड़के।

श्लोक 85 (padma.5.95.85)

प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैस्तु सादयेत् । पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दापयेत्

prokṣya pātrāṇi trīṇyadbhistaistairdravyaistu sādayet pādyārghyācamanīyārthaṁ trīṇi pātrāṇi dāpayet

उस जल से तीन पात्रों को छिड़ककर उन-उन सामग्रियों से भरे; पाद्य, अर्घ्य और आचमन के लिए तीन पात्र रखे।

श्लोक 86 (padma.5.95.86)

हृतशीर्ष्णा च शिखया गायत्र्या चाभिमंत्रयेत् । पिंडे वाय्वग्निसंसिद्धे हृत्पद्मस्थां परां विभोः

hṛtaśīrṣṇā ca śikhayā gāyatryā cābhimaṁtrayet piṁḍe vāyvagnisaṁsiddhe hṛtpadmasthāṁ parāṁ vibhoḥ

शिर और शिखा मंत्रों तथा गायत्री से अभिमंत्रित करे; शरीर में वायु-अग्नि से सिद्ध, हृदय-कमल में स्थित प्रभु की परा शक्ति —

श्लोक 87 (padma.5.95.87)

अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादांते सिद्धिभाविताम् । तयात्मभूतया पिंडे व्याप्ते संपूज्य तन्मयः

aṇvīṁ jīvakalāṁ dhyāyennādāṁte siddhibhāvitām tayātmabhūtayā piṁḍe vyāpte saṁpūjya tanmayaḥ

अणु जीव-कला का ध्यान करे, जो नादांत में सिद्धि से भावित है; उस आत्मरूपिणी शक्ति से शरीर में व्याप्त होकर, तन्मय होकर पूजा करे।

श्लोक 88 (padma.5.95.88)

आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्तां गां तां प्रपूजयेत् । पाद्यार्घ्यस्नानार्हणादीनुपचारान्प्रकल्पयेत्

āvāhyārcādiṣu sthāpya nyastāṁ gāṁ tāṁ prapūjayet pādyārghyasnānārhaṇādīnupacārānprakalpayet

आवाहन करके प्रतिमा आदि में स्थापित उस न्यस्त देवता की पूजा करे; पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अर्हण आदि उपचार तैयार करे।

श्लोक 89 (padma.5.95.89)

धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वासनं हरेः । पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्

dharmādibhiśca navabhiḥ kalpayitvāsanaṁ hareḥ padmamaṣṭadalaṁ tatra karṇikākesarojjvalam

धर्म आदि नौ गुणों से हरि का आसन कल्पित करके, वहाँ कर्णिका-केसर से उज्ज्वल अष्टदल कमल —

श्लोक 90 (padma.5.95.90)

उभाभ्यां वेदतंत्राभ्यां हरेरुभयसिद्धये । सुदर्शनं पांचजन्यं गदासीषु धनुर्हलम्

ubhābhyāṁ vedataṁtrābhyāṁ harerubhayasiddhaye sudarśanaṁ pāṁcajanyaṁ gadāsīṣu dhanurhalam

वेद और तंत्र दोनों से हरि की दोनों प्रकार की सिद्धि के लिए — सुदर्शन, पांचजन्य, गदा, खड्ग, धनुष और हल —

श्लोक 91 (padma.5.95.91)

मुशलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् । नंदं सुनंदं गरुडं प्रचंडं चंडमेव च

muśalaṁ kaustubhaṁ mālāṁ śrīvatsaṁ cānupūjayet naṁdaṁ sunaṁdaṁ garuḍaṁ pracaṁḍaṁ caṁḍameva ca

मूसल, कौस्तुभ, माला और श्रीवत्स की भी पूजा करे; नंद, सुनंद, गरुड़, प्रचंड और चंड की भी —

श्लोक 92 (padma.5.95.92)

महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम् । दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून्सुरान्

mahābalaṁ balaṁ caiva kumudaṁ kumudekṣaṇam durgāṁ vināyakaṁ vyāsaṁ viṣvaksenaṁ gurūnsurān

महाबल और बल की, कुमुद और कुमुदेक्षण की, दुर्गा, विनायक, व्यास, विष्वक्सेन, गुरुओं और देवताओं की —

श्लोक 93 (padma.5.95.93)

स्वेस्वे स्थानेष्वभिमुखान्पूजयेत्प्रोक्षणादिभिः । चंदनोशीरकर्पूर कुंकुमागुरुवासितैः

svesve sthāneṣvabhimukhānpūjayetprokṣaṇādibhiḥ caṁdanośīrakarpūra kuṁkumāguruvāsitaiḥ

अपने-अपने स्थान पर सम्मुख होकर छिड़काव आदि से पूजा करे — चंदन, उशीर, कर्पूर, कुंकुम और अगुरु से सुगंधित जल से।

श्लोक 94 (padma.5.95.94)

सलिलै स्नापयेन्मंत्रैर्नित्यं वा विभवे सति । स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया

salilai snāpayenmaṁtrairnityaṁ vā vibhave sati svarṇagharmānuvākena mahāpuruṣavidyayā

मंत्रों सहित जल से स्नान कराए, संभव हो तो प्रतिदिन; स्वर्णघर्म अनुवाक और महापुरुष विद्या से भी।

श्लोक 95 (padma.5.95.95)

पौरुषेणापि सूक्तेन सामनीराजनादिभिः । वस्त्रोपवीताभरण पत्रस्रग्गंधलेपनैः

pauruṣeṇāpi sūktena sāmanīrājanādibhiḥ vastropavītābharaṇa patrasraggaṁdhalepanaiḥ

पुरुषसूक्त से भी, सामगान और नीराजन आदि से; वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पत्र, माला और चंदन-लेप से —

श्लोक 96 (padma.5.95.96)

अलंकुर्वीत सप्रेम विष्णुभक्तो यथोचितम् । पाद्यमाचमनीयं च गंधं सुमनसोक्षतान्

alaṁkurvīta saprema viṣṇubhakto yathocitam pādyamācamanīyaṁ ca gaṁdhaṁ sumanasokṣatān

विष्णुभक्त प्रेमपूर्वक यथोचित अलंकृत करे। पाद्य, आचमनीय, गंध, पुष्प और अक्षत —

श्लोक 97 (padma.5.95.97)

गंधधूपोपहार्याणि दद्याद्वै श्रद्धयार्चकः । गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्

gaṁdhadhūpopahāryāṇi dadyādvai śraddhayārcakaḥ guḍapāyasasarpīṁṣi śaṣkulyāpūpamodakān

गंध, धूप और उपहार श्रद्धापूर्वक अर्चक अर्पित करे; गुड़-खीर-घृत, शष्कुली, अपूप और मोदक —

श्लोक 98 (padma.5.95.98)

पायसं दधिसर्पिश्च नैवेद्यं स विकल्पयेत् । अभ्यंगोन्मर्दनादर्श दंतधावाभिषेचनम्

pāyasaṁ dadhisarpiśca naivedyaṁ sa vikalpayet abhyaṁgonmardanādarśa daṁtadhāvābhiṣecanam

खीर, दही और घी को नैवेद्य के रूप में विकल्पतः चढ़ाए; अभ्यंग, उबटन, दर्पण दिखाना, दंत-धावन, अभिषेक —

श्लोक 99 (padma.5.95.99)

अन्नाद्यं नृत्यगीतानि सर्वाणि स्युरथान्वहम् । विधिना विहिते कुंडे मेखलावर्तवेदिभिः

annādyaṁ nṛtyagītāni sarvāṇi syurathānvaham vidhinā vihite kuṁḍe mekhalāvartavedibhiḥ

अन्न-भोजन, नृत्य-गीत — ये सब प्रतिदिन होने चाहिए। विधिपूर्वक बनाए गए कुंड में, मेखला और वेदी सहित —

श्लोक 100 (padma.5.95.100)

अग्निमाधाय परितः समूहेत्पाणिनोदकम् । परिस्तीर्याथ पर्युक्ष्य दत्वा इध्मं यथाविधि

agnimādhāya paritaḥ samūhetpāṇinodakam paristīryātha paryukṣya datvā idhmaṁ yathāvidhi

अग्नि स्थापित करके चारों ओर हाथ से जल एकत्र करे; कुश बिछाकर, छिड़ककर, विधिपूर्वक समिधा देकर —

श्लोक 101 (padma.5.95.101)

प्रोक्षण्यासाद्य द्रव्याणि प्रोक्षण्यैवाज्यसेचनम् । तप्तजांबूनदप्रख्यं शंखचक्रगदांबुजैः

prokṣaṇyāsādya dravyāṇi prokṣaṇyaivājyasecanam taptajāṁbūnadaprakhyaṁ śaṁkhacakragadāṁbujaiḥ

छिड़ककर सामग्री एकत्र करके उसी जल से घृत-सेचन करे; तपाए हुए सुवर्ण के समान, शंख-चक्र-गदा-कमल से युक्त —

श्लोक 102 (padma.5.95.102)

लसच्चतुर्भुजं शांतं पद्मकिंजल्कवाससम् । स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवरांगदम्

lasaccaturbhujaṁ śāṁtaṁ padmakiṁjalkavāsasam sphuratkirīṭakaṭakakaṭisūtravarāṁgadam

देदीप्यमान चतुर्भुज, शांत, कमल-केसर के रंग का वस्त्र धारण किए, चमकते मुकुट-कड़े-करधनी-भुजबंद से युक्त —

श्लोक 103 (padma.5.95.103)

श्रीवत्सवक्षसंभ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् । ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणि हविषा सघृतानि च

śrīvatsavakṣasaṁbhrājatkaustubhaṁ vanamālinam dhyāyannabhyarcya dārūṇi haviṣā saghṛtāni ca

श्रीवत्स और वक्षस्थल पर देदीप्यमान कौस्तुभ से युक्त, वनमाला धारण किए — इस रूप का ध्यान करके पूजा करके, घृतयुक्त समिधाओं से —

श्लोक 104 (padma.5.95.104)

प्रास्याज्यभागावाघारौ दत्वा चाज्यप्लुतं हविः । अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत्

prāsyājyabhāgāvāghārau datvā cājyaplutaṁ haviḥ abhyarcyātha namaskṛtya pārṣadebhyo baliṁ haret

आज्यभाग और आघार अर्पित करके, घृतसिक्त हवि देकर, पूजा और नमस्कार करके पार्षदों को बलि अर्पित करे।

श्लोक 105 (padma.5.95.105)

मूलमंत्रं जपेद्ब्रह्मन्स्मरन्नारायणात्मकम् । दत्वाचमनमुच्छिष्टं विष्वक्सेनाय कल्पयेत्

mūlamaṁtraṁ japedbrahmansmarannārāyaṇātmakam datvācamanamucchiṣṭaṁ viṣvaksenāya kalpayet

हे ब्रह्मन्! नारायणस्वरूप का स्मरण करते हुए मूल मंत्र का जप करे; आचमन देकर उच्छिष्ट विष्वक्सेन को अर्पित करे।

श्लोक 106 (padma.5.95.106)

मुखवासं तु सुरभिं तांबूलाद्यमुपाहरेत् । उपगायन्गृणन्नित्यं कर्माण्यभिरवाक्षरैः

mukhavāsaṁ tu surabhiṁ tāṁbūlādyamupāharet upagāyangṛṇannityaṁ karmāṇyabhiravākṣaraiḥ

सुगंधित मुखवास और ताम्बूल आदि अर्पित करे; गुनगुनाते-गाते हुए नित्य कर्मों को अभिरव-अक्षरों से करे —

श्लोक 107 (padma.5.95.107)

सत्कथां श्रावयञ्छृण्वन्मुहूर्तं क्षणिको भवेत् । स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि

satkathāṁ śrāvayañchṛṇvanmuhūrtaṁ kṣaṇiko bhavet stavairuccāvacaiḥ stotraiḥ paurāṇaiḥ prākṛtairapi

सत्कथा सुनाते-सुनते कुछ क्षण बिताए; उच्च-नीच स्तवों, स्तोत्रों, पौराणिक और लोकभाषा के भी स्तोत्रों से —

श्लोक 108 (padma.5.95.108)

स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वंदेत दंडवत् । शिरस्तत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्

stutvā prasīda bhagavanniti vaṁdeta daṁḍavat śirastatpādayoḥ kṛtvā bāhubhyāṁ ca parasparam

स्तुति करके 'हे भगवन्! प्रसन्न हों' कहते हुए दंडवत् प्रणाम करे — सिर को उनके चरणों में रखकर, दोनों भुजाओं को परस्पर मिलाकर —

श्लोक 109 (padma.5.95.109)

प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात् । इति शेषान्हरेर्दत्ताञ्छिरस्याधाय सादरम्

prapannaṁ pāhi māmīśa bhītaṁ mṛtyugrahārṇavāt iti śeṣānharerdattāñchirasyādhāya sādaram

'हे ईश! मैं शरणागत, मृत्यु-रूपी ग्रह के सागर से भयभीत हूँ, मेरी रक्षा करो' — इस प्रकार हरि द्वारा दिए गए शेष को आदरपूर्वक सिर पर रखकर —

श्लोक 110 (padma.5.95.110)

उद्वासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि चात्मनः । अर्चादिषु पदं यत्र श्रद्धावांस्तत्र चार्चयेत्

udvāsayeccedudvāsyaṁ jyotirjyotiṣi cātmanaḥ arcādiṣu padaṁ yatra śraddhāvāṁstatra cārcayet

यदि उद्वासन करना हो तो उद्वासन करे, अपनी ज्योति को उस ज्योति में मिलाकर; जहाँ श्रद्धावान हो, वहीं प्रतिमा आदि में पूजा करे।

श्लोक 111 (padma.5.95.111)

सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्मानमवस्थितम् । एवं क्रियायोगपथैः पुमान्वैदिकतांत्रिकैः

sarvabhūteṣvātmani ca sarvātmānamavasthitam evaṁ kriyāyogapathaiḥ pumānvaidikatāṁtrikaiḥ

सब भूतों में और अपने में स्थित सर्वात्मा को — इस प्रकार वैदिक-तांत्रिक क्रिया-योग मार्गों से मनुष्य —

श्लोक 112 (padma.5.95.112)

अर्च्चयेच्च यतः सिद्धिं हरेर्विंदत्यभीप्सिताम् । तामर्चां संप्रतिष्ठाप्य मंदिरं कारयेद्दृढम्

arccayecca yataḥ siddhiṁ harerviṁdatyabhīpsitām tāmarcāṁ saṁpratiṣṭhāpya maṁdiraṁ kārayeddṛḍham

पूजा करता है, जिससे उसे हरि की अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। उस पूजा-प्रतिमा को सुस्थापित करके दृढ़ मंदिर बनवाना चाहिए।

श्लोक 113 (padma.5.95.113)

पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवादिकम् । पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम्

puṣpodyānāni ramyāṇi pūjāyātrotsavādikam pūjādīnāṁ pravāhārthaṁ mahāparvasvathānvaham

रमणीय पुष्प-उद्यान, पूजा-यात्रा-उत्सव आदि, और पूजा आदि की निरंतरता के लिए महापर्वों में तथा प्रतिदिन भी —

श्लोक 114 (padma.5.95.114)

क्षेत्रापणपुरग्रामान्दत्वा सायुज्यतामियात् । प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्

kṣetrāpaṇapuragrāmāndatvā sāyujyatāmiyāt pratiṣṭhayā sārvabhaumaṁ sadmanā bhuvanatrayam

क्षेत्र, बाजार, नगर और गाँव दान करके सायुज्य प्राप्त होता है; प्रतिष्ठा से सार्वभौम पद, मंदिर बनवाने से तीनों लोक —

श्लोक 115 (padma.5.95.115)

पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिस्तत्साम्यतामियात् । तमेव नैरपेक्षेण भक्तियोगेन विंदते

pūjādinā brahmalokaṁ tribhistatsāmyatāmiyāt tameva nairapekṣeṇa bhaktiyogena viṁdate

पूजा आदि से ब्रह्मलोक, और तीनों से उसी की समता प्राप्त होती है; परंतु उसे तो निष्काम भक्तियोग से ही पाया जाता है।

श्लोक 116 (padma.5.95.116)

भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेद्धरिम्

bhaktiyogaṁ sa labhate evaṁ yaḥ pūjayeddharim

जो इस प्रकार हरि की पूजा करता है, वह भक्तियोग को प्राप्त करता है।

श्लोक 117 (padma.5.95.117)

यत्कृष्णप्रणिपातधूलिधवलं तद्वर्ष्म तद्वच्छुभं । ते नेत्रे तपसार्जिते सुरुचिरे याभ्यां हरिर्दृश्यते । सा बुद्धिर्विमलेंदु शंखधवला या माधवव्यापिनी । सा जिह्वा मृदुभाषिणी नृप मुहुर्या स्तौति नारायणम्

yatkṛṣṇapraṇipātadhūlidhavalaṁ tadvarṣma tadvacchubhaṁ te netre tapasārjite surucire yābhyāṁ harirdṛśyate sā buddhirvimaleṁdu śaṁkhadhavalā yā mādhavavyāpinī sā jihvā mṛdubhāṣiṇī nṛpa muhuryā stauti nārāyaṇam

कृष्ण के चरणों में प्रणिपात की धूलि से धवल हुआ शरीर ही शुभ है; वे नेत्र ही तपस्या से सफल हैं जिनसे हरि का दर्शन होता है; वह बुद्धि ही निर्मल चंद्र और शंख के समान धवल है जो माधव में व्याप्त है; हे राजन्! वही जिह्वा मृदुभाषिणी है जो बार-बार नारायण की स्तुति करती है।

श्लोक 118 (padma.5.95.118)

मूलमंत्रेण कर्तव्यं स्त्रीशूद्रैरपि पूजनम् । श्रद्धया स्वगुरूद्दिष्टमार्गेणान्यैश्च वैष्णवः

mūlamaṁtreṇa kartavyaṁ strīśūdrairapi pūjanam śraddhayā svagurūddiṣṭamārgeṇānyaiśca vaiṣṇavaḥ

मूल मंत्र से स्त्री और शूद्रों को भी पूजा करनी चाहिए, श्रद्धापूर्वक अपने गुरु द्वारा बताए गए मार्ग से; और अन्य वैष्णवों को भी।

श्लोक 119 (padma.5.95.119)

इदं ते सर्वमाख्यातं पावनं माधवार्चनम् । विशेषान्माधवे मासि त्वमेतत्कुरु भूपते

idaṁ te sarvamākhyātaṁ pāvanaṁ mādhavārcanam viśeṣānmādhave māsi tvametatkuru bhūpate

यह पवित्र माधव-अर्चन आपको संपूर्ण बताया गया। हे भूपते! विशेष रूप से माधवमास में इसे कीजिए।

श्लोक 120 (padma.5.95.120)

सूत उवाच- इत्येवमाकर्ण्य वचो विचित्रं पुण्यं पवित्रं विधिनंदनस्य । प्रणम्य बद्धांजलिराह राजा सकौतुकी भागवतप्रधानः

sūta uvāca- ityevamākarṇya vaco vicitraṁ puṇyaṁ pavitraṁ vidhinaṁdanasya praṇamya baddhāṁjalirāha rājā sakautukī bhāgavatapradhānaḥ

सूत ने कहा— नारद के इस अद्भुत, पुण्य और पवित्र वचन को सुनकर, कौतुकयुक्त, भागवतों में श्रेष्ठ राजा ने प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।

श्लोक 121 (padma.5.95.121)

अंबरीष उवाच- समस्तभूमीवलयेश्वरोऽहमव्याहताज्ञो विबुधप्रसेवी । गोविंदपादांबुजदत्तचित्तः स्वचित्तसंतोषितभूमिदेवः

aṁbarīṣa uvāca- samastabhūmīvalayeśvaro'hamavyāhatājño vibudhaprasevī goviṁdapādāṁbujadattacittaḥ svacittasaṁtoṣitabhūmidevaḥ

अंबरीष ने कहा— मैं समस्त भूमंडल का अबाधित आज्ञा वाला स्वामी हूँ, विद्वानों की सेवा करने वाला; मेरा चित्त गोविंद के चरण-कमलों में समर्पित है, और अपने संतुष्ट चित्त से मैं ब्राह्मणों को संतुष्ट रखता हूँ।

श्लोक 122 (padma.5.95.122)

विख्यातराजोचितवंशरत्नं निरंतरं धर्मरुचिर्यशस्वी । सौंदर्यशौर्योदयदानशीलः सुपुत्रवानस्मि जितारिवर्गः

vikhyātarājocitavaṁśaratnaṁ niraṁtaraṁ dharmaruciryaśasvī sauṁdaryaśauryodayadānaśīlaḥ suputravānasmi jitārivargaḥ

मैं विख्यात राजवंश का रत्न हूँ, निरंतर धर्मरुचि और यशस्वी हूँ, सौंदर्य-शौर्य-उदारता-दानशीलता से युक्त, सुपुत्रवान और शत्रुसमूह को जीतने वाला हूँ।

श्लोक 123 (padma.5.95.123)

केनापि पुण्येन पवित्रबुद्धिर्जातोहमीदृग्गुणसंतश्रीः । इयं पुनः श्रीरिव पुण्यमूर्तिर्लब्धा कुतः कांतिमती च कांता

kenāpi puṇyena pavitrabuddhirjātohamīdṛgguṇasaṁtaśrīḥ iyaṁ punaḥ śrīriva puṇyamūrtirlabdhā kutaḥ kāṁtimatī ca kāṁtā

किसी पुण्य से मैं ऐसी पवित्र बुद्धि और गुण-संपन्न श्री लेकर जन्मा हूँ। और यह लक्ष्मी जैसी पुण्यमूर्ति, कांतिमती पत्नी, मुझे कहाँ से प्राप्त हुई?

श्लोक 124 (padma.5.95.124)

इदं मे सुकृतं सर्वं पुराजन्मनि चेष्टितम् । समादिश मुने सम्यक्सर्वज्ञोसि दयानिधे

idaṁ me sukṛtaṁ sarvaṁ purājanmani ceṣṭitam samādiśa mune samyaksarvajñosi dayānidhe

यह सब मेरा पूर्वजन्म का सुकृत-आचरण है। हे मुने! हे दयानिधे! आप सर्वज्ञ हैं, भलीभाँति बताइए।

श्लोक 125 (padma.5.95.125)

नारद उवाच- इयं रूपवती नाम वेश्यासीदन्यजन्मनि । सांप्रतं तव भार्या या सत्याचारातिसुंदरी

nārada uvāca- iyaṁ rūpavatī nāma veśyāsīdanyajanmani sāṁprataṁ tava bhāryā yā satyācārātisuṁdarī

नारद ने कहा— यह जो अब सत्याचार-संपन्न, अति सुंदर तुम्हारी पत्नी है, वह अन्य जन्म में रूपवती नामक वेश्या थी।

श्लोक 126 (padma.5.95.126)

वेश्याधर्मेण वर्तेत यथोद्दिष्टेन भाविनी । कुर्वती किल कर्माणि शुभानि द्विजशासनात्

veśyādharmeṇa varteta yathoddiṣṭena bhāvinī kurvatī kila karmāṇi śubhāni dvijaśāsanāt

वह भाग्यशालिनी वेश्या-धर्म के अनुसार जीवन बिताती हुई भी ब्राह्मणों के निर्देश से शुभ कर्म किया करती थी।

श्लोक 127 (padma.5.95.127)

देवदास इति ख्यातो हेमकारो भवानभूत् । पूर्वजन्मनि वै तस्या रुचेर्भर्ता भुजंगमः

devadāsa iti khyāto hemakāro bhavānabhūt pūrvajanmani vai tasyā rucerbhartā bhujaṁgamaḥ

तुम, देवदास नामक स्वर्णकार थे, पूर्वजन्म में; और उसका पति रुचि नामक सर्प था।

श्लोक 128 (padma.5.95.128)

इयं भवंतं भजते रुची रूपवती पुनः । व्ययार्थमयनं धर्मं स्थिता विज्ञानमुत्तमम्

iyaṁ bhavaṁtaṁ bhajate rucī rūpavatī punaḥ vyayārthamayanaṁ dharmaṁ sthitā vijñānamuttamam

यह रूपवती फिर से रुचि (तुम्हें) चाहती थी, और व्यय-योग्य धर्म तथा उत्तम विज्ञान में स्थित थी।

श्लोक 129 (padma.5.95.129)

आकर्ण्य चैकदा धर्मं वैशाखस्नानसंभवम् । चक्रे धर्मवती तोये स्नानं मेषगते रवौ

ākarṇya caikadā dharmaṁ vaiśākhasnānasaṁbhavam cakre dharmavatī toye snānaṁ meṣagate ravau

एक बार वैशाख-स्नान से उत्पन्न धर्म को सुनकर उस धर्मपरायण स्त्री ने मेष राशि में सूर्य के रहते जल में स्नान किया।

श्लोक 130 (padma.5.95.130)

दानं दत्तवती दक्षा वेश्या रूपवती सदा । ब्राह्मणाय नमस्कारं भक्त्यादरपुरःसरम्

dānaṁ dattavatī dakṣā veśyā rūpavatī sadā brāhmaṇāya namaskāraṁ bhaktyādarapuraḥsaram

वह चतुर वेश्या रूपवती सदा दान देती थी, और भक्ति-आदर सहित ब्राह्मणों को नमस्कार करती थी।

श्लोक 131 (padma.5.95.131)

स तया देवदासस्त्वं बोधितः स्नेहयंत्रितः । कृतवान्बुद्धितः स्नानं माधवे मासि सादरम्

sa tayā devadāsastvaṁ bodhitaḥ snehayaṁtritaḥ kṛtavānbuddhitaḥ snānaṁ mādhave māsi sādaram

तुम, देवदास, स्नेह से बँधकर उसके द्वारा समझाए गए, और बुद्धिपूर्वक आदरसहित माधवमास में स्नान किया।

श्लोक 132 (padma.5.95.132)

तत्र त्रेतायुगस्यादौ तृतीयामाप्यनिर्मलाम् । सुवर्णकारं सोवाच देवदासं तमादरात्

tatra tretāyugasyādau tṛtīyāmāpyanirmalām suvarṇakāraṁ sovāca devadāsaṁ tamādarāt

त्रेतायुग के आरंभ में उसने आदरपूर्वक उस स्वर्णकार देवदास से निर्मल तृतीया के दिन कहा।

श्लोक 133 (padma.5.95.133)

वेश्योवाच- उत्तमं कुरु सौवर्णं मधुसूदनमच्युतम् । पूजयित्वा यवैर्देवमेतैः संतर्प्य चानलम्

veśyovāca- uttamaṁ kuru sauvarṇaṁ madhusūdanamacyutam pūjayitvā yavairdevametaiḥ saṁtarpya cānalam

वेश्या ने कहा— उत्तम स्वर्ण से अच्युत मधुसूदन की प्रतिमा बनाओ; इन यवों से देव की पूजा करके अग्नि को तृप्त करके —

श्लोक 134 (padma.5.95.134)

ब्राह्मणाय च दास्यामि ब्राह्मणानामनुज्ञया । दानमेतत्पुराणेषु कथ्यते तत्र चाक्षयम्

brāhmaṇāya ca dāsyāmi brāhmaṇānāmanujñayā dānametatpurāṇeṣu kathyate tatra cākṣayam

मैं ब्राह्मणों की अनुमति से इसे किसी ब्राह्मण को दान दूँगी। पुराणों में यह दान अक्षय कहा गया है।

श्लोक 135 (padma.5.95.135)

अक्षयेति तृतीयासौ ब्राह्मणेभ्यः श्रुतं मया । शुक्ला वैशाखमासस्य तदक्षयफलप्रदम्

akṣayeti tṛtīyāsau brāhmaṇebhyaḥ śrutaṁ mayā śuklā vaiśākhamāsasya tadakṣayaphalapradam

मैंने ब्राह्मणों से सुना है कि यह तृतीया 'अक्षय' कहलाती है; वैशाखमास की शुक्ल तृतीया अक्षय फल देने वाली है।

श्लोक 136 (padma.5.95.136)

अस्यां दास्यामि तं हैमं मधुसूदनमव्ययम् । नारद उवाच- इति तस्य वचः श्रुत्वा मधुरं हेमकारकः

asyāṁ dāsyāmi taṁ haimaṁ madhusūdanamavyayam nārada uvāca- iti tasya vacaḥ śrutvā madhuraṁ hemakārakaḥ

इसी दिन मैं वह स्वर्णमय, अव्यय मधुसूदन दान दूँगी। नारद ने कहा— उसके ये मधुर वचन सुनकर स्वर्णकार ने —

श्लोक 137 (padma.5.95.137)

चक्रे सुवर्णप्रतिमामच्युतस्यापि सुंदरीम् । सत्यभावेन धर्मार्थमिति चौर्यविवर्जितः

cakre suvarṇapratimāmacyutasyāpi suṁdarīm satyabhāvena dharmārthamiti cauryavivarjitaḥ

सत्यभाव से, धर्म के लिए, चोरी से रहित होकर अच्युत की सुंदर स्वर्णप्रतिमा बनाई।

श्लोक 138 (padma.5.95.138)

यथोद्दिष्टस्य चंद्रस्य प्रतिमां लक्षणान्विताम् । ददौ सा च विधानेन स्नात्वा विप्राय सुंदरीम्

yathoddiṣṭasya caṁdrasya pratimāṁ lakṣaṇānvitām dadau sā ca vidhānena snātvā viprāya suṁdarīm

यथोचित लक्षणों से युक्त, चंद्रमा के समान सुंदर उस प्रतिमा को उसने बनाया; और वह स्नान करके विधिपूर्वक उसे ब्राह्मण को दे दिया।

श्लोक 139 (padma.5.95.139)

पूजयित्वा ततस्तस्यामक्षयायां तिथौ नृप

pūjayitvā tatastasyāmakṣayāyāṁ tithau nṛpa

हे राजन्! उस अक्षय तिथि पर उसकी पूजा करके —

श्लोक 140 (padma.5.95.140)

कालेन कियता वेश्या सा मृता धर्मनिष्ठिता । देवदासोऽपि स ततो मृतः स्वीयायुषक्षये

kālena kiyatā veśyā sā mṛtā dharmaniṣṭhitā devadāso'pi sa tato mṛtaḥ svīyāyuṣakṣaye

कुछ समय बाद वह धर्मनिष्ठ वेश्या मर गई; देवदास भी अपनी आयु के क्षय होने पर तब मर गया।

श्लोक 141 (padma.5.95.141)

तेन पुण्येन भूपाल हेमकारोऽन्य जन्मनि । स त्वं प्राप्तो महीं राजन्नशेषगुणसंयुतः

tena puṇyena bhūpāla hemakāro'nya janmani sa tvaṁ prāpto mahīṁ rājannaśeṣaguṇasaṁyutaḥ

हे भूपाल! उसी पुण्य से वह स्वर्णकार दूसरे जन्म में तुम बनकर, हे राजन्! समस्त गुणों से युक्त होकर इस पृथ्वी को प्राप्त हुए।

श्लोक 142 (padma.5.95.142)

सापि रूपवती वेश्या तेन धर्मेण तेऽभवत् । नाम्ना कांतिमती कांता प्रणयेन परिप्लुता

sāpi rūpavatī veśyā tena dharmeṇa te'bhavat nāmnā kāṁtimatī kāṁtā praṇayena pariplutā

और वह रूपवती वेश्या भी उसी धर्म से तुम्हारी प्रेम से परिपूर्ण, कांतिमती नामक प्रिय पत्नी बनी।

श्लोक 143 (padma.5.95.143)

विविधा वासना वीर कर्मणां पूर्वसंभवाः । विचित्रा गतयस्तात ज्ञायंते न बुधैरपि

vividhā vāsanā vīra karmaṇāṁ pūrvasaṁbhavāḥ vicitrā gatayastāta jñāyaṁte na budhairapi

हे वीर! कर्मों की पूर्वजन्म से उत्पन्न वासनाएँ अनेक प्रकार की हैं; हे तात! उनकी विचित्र गतियाँ विद्वानों को भी ज्ञात नहीं होतीं।

श्लोक 144 (padma.5.95.144)

तमेनं माधवं मासं प्रतिकार्यं न संशयः । गोपितं तेन देवेन ब्रह्मणा माधवेन च

tamenaṁ mādhavaṁ māsaṁ pratikāryaṁ na saṁśayaḥ gopitaṁ tena devena brahmaṇā mādhavena ca

इसलिए इस माधवमास का सत्कार अवश्य करना चाहिए, इसमें संदेह नहीं; इसे ब्रह्मा देव और स्वयं माधव ने गुप्त रखा है।

श्लोक 145 (padma.5.95.145)

असाधुसंगैरनवाप्तविद्यैरसंयतैराश्रमधर्महीनैः । अभूततीर्थैरकृतव्रतैस्तैर्न लभ्यते माधवमासधर्मः

asādhusaṁgairanavāptavidyairasaṁyatairāśramadharmahīnaiḥ abhūtatīrthairakṛtavrataistairna labhyate mādhavamāsadharmaḥ

दुर्जनों की संगति करने वालों, विद्याहीनों, असंयमितों, आश्रम-धर्म से रहित, तीर्थ न गए हुओं और व्रत न किए हुओं को माधवमास का धर्म प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 146 (padma.5.95.146)

गोविंदकेशवमुकुंदहरे मुरारे लक्ष्मीनिवास मधुसूदन कृष्ण विष्णो । वाणी वरा न वदने वसतीति येषां वैशाखमासनियमो भवते न तेषाम्

goviṁdakeśavamukuṁdahare murāre lakṣmīnivāsa madhusūdana kṛṣṇa viṣṇo vāṇī varā na vadane vasatīti yeṣāṁ vaiśākhamāsaniyamo bhavate na teṣām

जिनके मुख में 'हे गोविंद, केशव, मुकुंद, हरे, मुरारे, लक्ष्मीनिवास, मधुसूदन, कृष्ण, विष्णु' — यह श्रेष्ठ वाणी नहीं बसती, उनके लिए वैशाखमास का व्रत नहीं है।

श्लोक 147 (padma.5.95.147)

ये साधुसाधु वचनानि हिताधिकानि नाकर्णयंति च हरेश्चरितामृतानि । पश्यंति ये न कमलापतिकेतनानि वैशाखमासनियमं न हि ते लभंते

ye sādhusādhu vacanāni hitādhikāni nākarṇayaṁti ca hareścaritāmṛtāni paśyaṁti ye na kamalāpatiketanāni vaiśākhamāsaniyamaṁ na hi te labhaṁte

जो हितकारी सज्जन-वचनों और हरि के अमृत-चरितों को नहीं सुनते, जो लक्ष्मीपति के मंदिरों के दर्शन नहीं करते, वे वैशाखमास के व्रत को नहीं पाते।

श्लोक 148 (padma.5.95.148)

शुश्रूषिता न गुरवो न वराय कन्या दत्ता समाय समये समलंकृता यैः । अध्यापिता न तनया विनयादि धर्मं वैशाखमासनियमं न हि ते लभंते

śuśrūṣitā na guravo na varāya kanyā dattā samāya samaye samalaṁkṛtā yaiḥ adhyāpitā na tanayā vinayādi dharmaṁ vaiśākhamāsaniyamaṁ na hi te labhaṁte

जिन्होंने गुरुजनों की सेवा नहीं की, समय पर सुयोग्य वर को अलंकृत कन्या नहीं दी, पुत्रियों को विनय आदि धर्म नहीं सिखाया — वे वैशाखमास के व्रत को नहीं पाते।

श्लोक 149 (padma.5.95.149)

सूत उवाच- इत्येवमादिश्य मुनिर्नरेश मामंत्र्य तं मंत्रविदग्रगण्यः । स्नातुं ययौ माधवमासि गंगामभ्यर्चितस्तेन तदा स विप्राः

sūta uvāca- ityevamādiśya munirnareśa māmaṁtrya taṁ maṁtravidagragaṇyaḥ snātuṁ yayau mādhavamāsi gaṁgāmabhyarcitastena tadā sa viprāḥ

सूत ने कहा— हे विप्रो! इस प्रकार राजा को उपदेश देकर, मंत्रवेत्ताओं में अग्रणी वे मुनि उससे विदा लेकर, उसके द्वारा पूजित होकर, माधवमास में गंगा-स्नान के लिए चले गए।

श्लोक 150 (padma.5.95.150)

विधिं स राजापि ततश्चकार वैशाखमासस्य मुनिप्रणीतम् । पत्न्यासमं पुण्यधिया तमेव संचिंतयँल्लोकपवित्रकीर्तिः

vidhiṁ sa rājāpi tataścakāra vaiśākhamāsasya munipraṇītam patnyāsamaṁ puṇyadhiyā tameva saṁciṁtaya~llokapavitrakīrtiḥ

तत्पश्चात् राजा ने भी अपनी पत्नी सहित, पुण्य-बुद्धि से उन्हीं का चिंतन करते हुए, मुनि द्वारा बताई गई वैशाखमास की विधि का पालन किया, जिनकी कीर्ति लोक को पवित्र करने वाली है।

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