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पाताल खण्ड · अध्याय 96

वराह-पृथ्वी संवाद और ब्राह्मण-यम संवाद: स्वर्ग-नरक के मार्ग

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97

श्लोक 1 (padma.5.96.1)

ऋषय ऊचुः - सूतसूतमहाप्राज्ञ जीवजीव शतंसमाः । यद्वयं पुण्यसमयं श्राविता जगतो हितम्

ṛṣaya ūcuḥ - sūtasūtamahāprājña jīvajīva śataṁsamāḥ yadvayaṁ puṇyasamayaṁ śrāvitā jagato hitam

ऋषियों ने कहा— हे महाप्राज्ञ सूत! हे सूतपुत्र! सैकड़ों वर्ष जीवित रहो; आपने जगत के हित के लिए हमें यह पुण्यमय प्रसंग सुनाया है।

श्लोक 2 (padma.5.96.2)

वद भूयोऽपि भूयिष्ठं पिबामस्तावकं वचः । पायंपायं न तृप्यामो वयं सूत तदुत्तमम्

vada bhūyo'pi bhūyiṣṭhaṁ pibāmastāvakaṁ vacaḥ pāyaṁpāyaṁ na tṛpyāmo vayaṁ sūta taduttamam

आप और भी अधिक कहिए, हम आपकी वाणी पान करते हैं; हे सूत! उस उत्तम वाणी को बार-बार पीकर भी हम तृप्त नहीं होते।

श्लोक 3 (padma.5.96.3)

सूत उवाच- अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । संवादमादिलोकस्य जगतां जगदीशितुः

sūta uvāca- atrāpyudāharaṁtīmamitihāsaṁ purātanam saṁvādamādilokasya jagatāṁ jagadīśituḥ

सूत ने कहा— इस विषय में भी लोग यह प्राचीन इतिहास कहते हैं — आदिपुरुष जगदीश्वर का संसार के आदिस्वरूपा (पृथ्वी) के साथ संवाद।

श्लोक 4 (padma.5.96.4)

षट्सहस्राणिचोच्छ्रायो विस्तारेण पुनस्त्रयम् । एवं नवसहस्राणि योजनानां विधाय च

ṣaṭsahasrāṇicocchrāyo vistāreṇa punastrayam evaṁ navasahasrāṇi yojanānāṁ vidhāya ca

छह हज़ार योजन ऊँची और तीन हज़ार योजन विस्तार वाली — इस प्रकार नौ हज़ार योजन की पृथ्वी को —

श्लोक 5 (padma.5.96.5)

वामया दंष्ट्रया गृह्य उद्धृतादौ वसुंधरा । दिव्यवर्षसहस्रं वै दंष्ट्रया धारिता मही

vāmayā daṁṣṭrayā gṛhya uddhṛtādau vasuṁdharā divyavarṣasahasraṁ vai daṁṣṭrayā dhāritā mahī

अपने बाएँ दाँत से पकड़कर, आरंभ में उद्धार करते हुए, वराह भगवान ने दिव्य सहस्र वर्षों तक उस पृथ्वी को दाँत पर धारण किया।

श्लोक 6 (padma.5.96.6)

धर्माख्यानप्रसंगेन सोवाच विनयाद्विभुम् । पृथिव्युवाच- एते द्वादश मासा वै षष्टिर्दिनशतत्रयम्

dharmākhyānaprasaṁgena sovāca vinayādvibhum pṛthivyuvāca- ete dvādaśa māsā vai ṣaṣṭirdinaśatatrayam

धर्म-कथा के प्रसंग में पृथ्वी ने विनयपूर्वक उस प्रभु से कहा। पृथ्वी ने कहा— ये बारह मास, तीन सौ साठ दिन —

श्लोक 7 (padma.5.96.7)

एषां किमुत्तमं पुण्यं प्रियं च तव केशव । पवित्रः कार्तिको मासस्तुलासंस्थे दिवाकरे

eṣāṁ kimuttamaṁ puṇyaṁ priyaṁ ca tava keśava pavitraḥ kārtiko māsastulāsaṁsthe divākare

हे केशव! इनमें आपको कौन-सा सबसे उत्तम और प्रिय पुण्यकाल है? पुराण में सूर्य के तुला राशि में रहने पर कार्तिक मास को पवित्र कहा गया है।

श्लोक 8 (padma.5.96.8)

मकरस्थे रवौ मासः पुराणे पावनः स्मृतः । मेषस्थे माधवो मासो भास्करे पठ्यते बुधैः

makarasthe ravau māsaḥ purāṇe pāvanaḥ smṛtaḥ meṣasthe mādhavo māso bhāskare paṭhyate budhaiḥ

सूर्य के मकर राशि में रहने पर वह मास पुराण में पावन कहा गया है; सूर्य के मेष राशि में रहने पर विद्वान उसे माधव मास कहते हैं।

श्लोक 9 (padma.5.96.9)

मार्गशीर्षोऽपि मासानां पावनः परिकीर्तितः । एवं मासाः पवित्रास्ते वासराः केपि कीर्तिताः

mārgaśīrṣo'pi māsānāṁ pāvanaḥ parikīrtitaḥ evaṁ māsāḥ pavitrāste vāsarāḥ kepi kīrtitāḥ

मार्गशीर्ष मास भी मासों में पवित्रतम कहा गया है। इस प्रकार जो मास पवित्र कहे गए, और जो दिन भी कहे गए —

श्लोक 10 (padma.5.96.10)

युगादयो युगांताश्च तथा कल्पादयोऽपि च । सर्वेभ्योऽप्यधिकं मासमेतेभ्यो वद पावनम्

yugādayo yugāṁtāśca tathā kalpādayo'pi ca sarvebhyo'pyadhikaṁ māsametebhyo vada pāvanam

युगों के आरंभ और अंत, तथा कल्पों के आरंभ भी — इन सबसे भी अधिक जो पवित्र मास हो, वह मुझे बताइए।

श्लोक 11 (padma.5.96.11)

सर्वयज्ञमय श्रीमन्नेकं निश्चित्य मे वद । वराह उवाच- विधिनाविधिनाचैव ये यजंति नराधमाः

sarvayajñamaya śrīmannekaṁ niścitya me vada varāha uvāca- vidhināvidhinācaiva ye yajaṁti narādhamāḥ

हे श्रीमन्! समस्त यज्ञों से युक्त एक मास निश्चित करके मुझे बताइए। वराह ने कहा— जो अधम मनुष्य विधिपूर्वक या अविधिपूर्वक यजन करते हैं —

श्लोक 12 (padma.5.96.12)

माधवे मासि मां भक्त्या तैश्च पूज्योऽस्म्यहं सदा । हिरण्याक्षो वरारोहे माधवे तु मधुर्हत

mādhave māsi māṁ bhaktyā taiśca pūjyo'smyahaṁ sadā hiraṇyākṣo varārohe mādhave tu madhurhata

माधवमास में मेरी भक्तिपूर्वक पूजा करने वाले उन सबसे मैं सदा पूजित होता हूँ। हे सुंदरी! हिरण्याक्ष और मधु दैत्य, दोनों —

श्लोक 13 (padma.5.96.13)

आदिदैत्यावुभावेतौ हत्वा त्वं तु समुद्धृता । त्रेतायुगे त्रयी धर्मो ज्ञानवर्णव्यवस्थितिः

ādidaityāvubhāvetau hatvā tvaṁ tu samuddhṛtā tretāyuge trayī dharmo jñānavarṇavyavasthitiḥ

उन दोनों आदि-दैत्यों का वध करके तुम्हें उद्धार किया गया। त्रेतायुग में तीनों वेदों का धर्म और ज्ञान-वर्णाश्रम की व्यवस्था —

श्लोक 14 (padma.5.96.14)

माधवे मासि संभूता तेन मे माधवःप्रियः । त्रेतायुगं तृतीयायां शुक्लायां मासि माधवे

mādhave māsi saṁbhūtā tena me mādhavaḥpriyaḥ tretāyugaṁ tṛtīyāyāṁ śuklāyāṁ māsi mādhave

माधवमास में ही उत्पन्न हुई, इसलिए मुझे माधव प्रिय है। त्रेतायुग की शुरुआत, माधवमास की शुक्ल तृतीया को —

श्लोक 15 (padma.5.96.15)

प्रवृत्तं च त्रयी धर्माः प्रवृत्तास्ते प्रवर्द्धिताः । अक्षया सोच्यते लोके तृतीया हरिवल्लभा

pravṛttaṁ ca trayī dharmāḥ pravṛttāste pravarddhitāḥ akṣayā socyate loke tṛtīyā harivallabhā

तीनों वेदों के धर्म प्रवृत्त होकर बढ़े। लोक में वह तृतीया 'अक्षय' कही जाती है और हरि को अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 16 (padma.5.96.16)

स्नाने दानार्चने श्राद्धे जपे पूर्वजतर्प्पणे । येऽर्चयंति यवैर्विष्णुं श्राद्धं कुर्वंति यत्नतः

snāne dānārcane śrāddhe jape pūrvajatarppaṇe ye'rcayaṁti yavairviṣṇuṁ śrāddhaṁ kurvaṁti yatnataḥ

स्नान, दान, अर्चन, श्राद्ध, जप और पितृ-तर्पण में — जो यव से विष्णु की पूजा करते हैं, जो यत्नपूर्वक श्राद्ध करते हैं —

श्लोक 17 (padma.5.96.17)

तेषां ददाम्यहं सर्वं यन्मनोऽभीष्टमुत्तमम् । ये ददंत्यपि दानानि धन्यास्ते धार्मिका नराः

teṣāṁ dadāmyahaṁ sarvaṁ yanmano'bhīṣṭamuttamam ye dadaṁtyapi dānāni dhanyāste dhārmikā narāḥ

उन्हें मैं वह सब देता हूँ जो उनके मन को अत्यंत अभीष्ट हो। जो दान भी देते हैं, वे धार्मिक मनुष्य धन्य हैं।

श्लोक 18 (padma.5.96.18)

ये यजंति हरेर्नित्यमध्वरैर्विविधैरपि । माधवे यजते यो मां तेभ्यस्तदधिकं फलम्

ye yajaṁti harernityamadhvarairvividhairapi mādhave yajate yo māṁ tebhyastadadhikaṁ phalam

जो नित्य विविध यज्ञों से हरि का यजन करते हैं, और जो माधवमास में मेरा यजन करते हैं, उन्हें उनसे भी अधिक फल मिलता है।

श्लोक 19 (padma.5.96.19)

स्नानं दानं जपो होमस्तपो यज्ञ व्रतादिकम् । वैशाखे यत्कृतं देवि तस्य पुण्यफलं शृणु

snānaṁ dānaṁ japo homastapo yajña vratādikam vaiśākhe yatkṛtaṁ devi tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

हे देवी! स्नान, दान, जप, हवन, तप, यज्ञ, व्रत आदि जो वैशाख में किए जाते हैं, उनका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 20 (padma.5.96.20)

मन्वंतराणां कोट्यस्तु दशपंच च सप्त च । मत्सान्निध्यगतास्तेपि तिष्ठंति भयवर्जिताः

manvaṁtarāṇāṁ koṭyastu daśapaṁca ca sapta ca matsānnidhyagatāstepi tiṣṭhaṁti bhayavarjitāḥ

पंद्रह और सात करोड़ मन्वंतर भी — वे सब भी मेरे सांनिध्य को प्राप्त होकर निर्भय होकर स्थित रहते हैं।

श्लोक 21 (padma.5.96.21)

यद्यपि स्युर्ग्रहाः सर्वे क्रूरा जन्मव्ययाष्टकाः । प्रातःस्नानेन वैशाखे सर्वे सौम्या भवंति ते

yadyapi syurgrahāḥ sarve krūrā janmavyayāṣṭakāḥ prātaḥsnānena vaiśākhe sarve saumyā bhavaṁti te

यद्यपि जन्म-व्यय के आठों क्रूर ग्रह हों, फिर भी वैशाख में प्रातः-स्नान से वे सब सौम्य हो जाते हैं।

श्लोक 22 (padma.5.96.22)

वैशाखे मासि यो विप्रान्भोजयेद्भक्तितत्परः । सिक्थेसिक्थे भवेत्तृप्तिः पितॄणां युगसंख्यया

vaiśākhe māsi yo viprānbhojayedbhaktitatparaḥ sikthesikthe bhavettṛptiḥ pitṝṇāṁ yugasaṁkhyayā

जो भक्तिपरायण होकर वैशाखमास में ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके प्रत्येक कौर से युगों की गिनती तक पितरों की तृप्ति होती है।

श्लोक 23 (padma.5.96.23)

यच्छंति तत्र मधुराधिकभोजनानि ये वायवाशन तिलोदक भोजनानि । छत्रांबराणि चरणोचितरक्षणानि धन्यास्त एव परितोषकराहि विष्णोः

yacchaṁti tatra madhurādhikabhojanāni ye vāyavāśana tilodaka bhojanāni chatrāṁbarāṇi caraṇocitarakṣaṇāni dhanyāsta eva paritoṣakarāhi viṣṇoḥ

जो वहाँ मधुर और प्रचुर भोजन देते हैं, जो पथिकों को तिल-जल का भोजन देते हैं, छाता-वस्त्र और चरणों के उपयुक्त रक्षा-साधन देते हैं, वे ही धन्य हैं जो विष्णु को संतुष्ट करते हैं।

श्लोक 24 (padma.5.96.24)

विशेषादिह दातव्यास्तिला मधुसमन्विताः । धर्माय बृहते दीर्घ दुरितक्षय हेतवे

viśeṣādiha dātavyāstilā madhusamanvitāḥ dharmāya bṛhate dīrgha duritakṣaya hetave

विशेष रूप से यहाँ मधु मिश्रित तिल दान करने चाहिए, जो महान धर्म और दीर्घकालिक पापक्षय के हेतु हैं।

श्लोक 25 (padma.5.96.25)

एवंकृते तु यत्पुण्यं प्राप्यते मनुजैश्च तैः । तत्कैर्गणयितुं शक्यं वर्षकोटिशतैरपि

evaṁkṛte tu yatpuṇyaṁ prāpyate manujaiśca taiḥ tatkairgaṇayituṁ śakyaṁ varṣakoṭiśatairapi

इस प्रकार करने पर मनुष्यों को जो पुण्य प्राप्त होता है, उसे करोड़ों-अरबों वर्षों में भी कौन गिन सकता है?

श्लोक 26 (padma.5.96.26)

पुत्रपौत्रादिसंपत्ति दीर्घायूंषि यथेप्सितम् । इहाप्नोति परत्रापि मामेव प्रतिपद्यते

putrapautrādisaṁpatti dīrghāyūṁṣi yathepsitam ihāpnoti paratrāpi māmeva pratipadyate

पुत्र-पौत्र आदि की संपत्ति, इच्छानुसार दीर्घायु — इसे वह यहाँ प्राप्त करता है, और परलोक में भी मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 27 (padma.5.96.27)

अनेकजन्मार्जित पातकावली विलीयते माधव मज्जनेन । जनस्य तत्रोषसि पुण्यतीर्थे यथाविधानं श्रयते तथा वा

anekajanmārjita pātakāvalī vilīyate mādhava majjanena janasya tatroṣasi puṇyatīrthe yathāvidhānaṁ śrayate tathā vā

अनेक जन्मों में अर्जित पापों की शृंखला माधव-स्नान से विलीन हो जाती है, चाहे मनुष्य उस पुण्यतीर्थ में प्रातःकाल यथाविधि स्नान करे या न करे।

श्लोक 28 (padma.5.96.28)

यः परित्यज्य वैशाखं व्रतमन्यदुपाचरेत् । स करस्थं महारत्नं हित्वा लोष्टं हि याचते

yaḥ parityajya vaiśākhaṁ vratamanyadupācaret sa karasthaṁ mahāratnaṁ hitvā loṣṭaṁ hi yācate

जो वैशाख-व्रत को त्यागकर अन्य व्रत का आचरण करता है, वह मानो हाथ में स्थित महारत्न को त्यागकर मिट्टी का ढेला माँगता है।

श्लोक 29 (padma.5.96.29)

सूतउवाच- एवं स भगवान्पूर्वमादिदेवो वदद्विभुः । माधवं मासमुद्दिश्य जगत्यां जगतीधरः

sūtauvāca- evaṁ sa bhagavānpūrvamādidevo vadadvibhuḥ mādhavaṁ māsamuddiśya jagatyāṁ jagatīdharaḥ

सूत ने कहा— हे महीसुरो! इस प्रकार सर्वप्रथम उस भगवान आदिदेव, विश्व के आधार, प्रभु ने माधवमास के विषय में जगत में कहा।

श्लोक 30 (padma.5.96.30)

किमत्र बहुनोक्तेन न तदस्ति महीसुराः । यदप्राप्यं भवेन्मासि माधवे माधवार्चनात्

kimatra bahunoktena na tadasti mahīsurāḥ yadaprāpyaṁ bhavenmāsi mādhave mādhavārcanāt

अधिक कहने से क्या लाभ? माधवमास में माधव की अर्चना से ऐसा कुछ भी नहीं जो अप्राप्य हो।

श्लोक 31 (padma.5.96.31)

शृणुध्वं च पुरावृत्तमिहार्थे परमाद्भुतम् । ब्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः

śṛṇudhvaṁ ca purāvṛttamihārthe paramādbhutam brāhmaṇasya ca saṁvādaṁ yamasya ca mahātmanaḥ

इस विषय में एक अत्यंत अद्भुत प्राचीन वृत्तांत सुनो — एक ब्राह्मण और महात्मा यम के संवाद का।

श्लोक 32 (padma.5.96.32)

मध्यदेशे महाग्रामो ब्राह्मणानां बभूव ह । गंगायमुनयोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः

madhyadeśe mahāgrāmo brāhmaṇānāṁ babhūva ha gaṁgāyamunayormadhye yāmunasya gireradhaḥ

मध्यदेश में गंगा और यमुना के बीच, यमुना के पर्वत के नीचे, ब्राह्मणों का एक बड़ा गाँव था।

श्लोक 33 (padma.5.96.33)

विद्वांसस्तत्र भूयिष्ठा ब्राह्मणाश्चावसंस्तदा । अथ प्राह यमः कंचित्पुरुषं कृष्णपिंगलम्

vidvāṁsastatra bhūyiṣṭhā brāhmaṇāścāvasaṁstadā atha prāha yamaḥ kaṁcitpuruṣaṁ kṛṣṇapiṁgalam

वहाँ अनेक विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे। तब यम ने किसी काले-भूरे रंग के पुरुष से कहा —

श्लोक 34 (padma.5.96.34)

रक्ताक्षमूर्द्ध्वरोमाणं काकजंघाक्षिनासिकम् । गच्छ त्वं भो महाग्रामं गत्वा ब्राह्मणमानय

raktākṣamūrddhvaromāṇaṁ kākajaṁghākṣināsikam gaccha tvaṁ bho mahāgrāmaṁ gatvā brāhmaṇamānaya

लाल आँखों वाले, ऊर्ध्व रोम वाले, कौवे जैसी टाँगों-आँखों-नाक वाले — 'तुम उस बड़े गाँव में जाकर एक ब्राह्मण को ले आओ —

श्लोक 35 (padma.5.96.35)

वसिष्ठगोत्रसंभूतं नामतो यज्ञदत्तकम् । शमे निविष्टं विद्वांसं यज्ञकर्मविशारदम्

vasiṣṭhagotrasaṁbhūtaṁ nāmato yajñadattakam śame niviṣṭaṁ vidvāṁsaṁ yajñakarmaviśāradam

वसिष्ठ गोत्र में उत्पन्न, यज्ञदत्त नाम वाले, शम में स्थित, विद्वान, यज्ञकर्म में निपुण उसे लाओ।

श्लोक 36 (padma.5.96.36)

नचान्यमानयेथास्त्वं सगोत्रं तस्य पार्श्वतः । सहितादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययन जन्मना

nacānyamānayethāstvaṁ sagotraṁ tasya pārśvataḥ sahitādṛgguṇastena tulyo'dhyayana janmanā

तुम उसके स्थान पर उसके सगोत्र किसी अन्य को मत लाना, चाहे वह गुण, अध्ययन और जन्म में उसके समान हो —

श्लोक 37 (padma.5.96.37)

आकृत्या च तथा चिह्नैः समस्तेनैव सत्तमः । तमानय यथोद्दिष्टा पूजा कार्या हि तस्य मे

ākṛtyā ca tathā cihnaiḥ samastenaiva sattamaḥ tamānaya yathoddiṣṭā pūjā kāryā hi tasya me

आकृति और चिह्नों में भी सर्वथा समान हो, तो भी उसी को यथोद्दिष्ट लाना; उसकी पूजा मेरे द्वारा की जानी है।

श्लोक 38 (padma.5.96.38)

स गत्वा प्रतिकूलं तु चकार यमशासनम् । तमेव मानयामास प्रतिषिद्धो यमेन यः

sa gatvā pratikūlaṁ tu cakāra yamaśāsanam tameva mānayāmāsa pratiṣiddho yamena yaḥ

वह जाकर यम की आज्ञा के विपरीत कार्य कर बैठा — यम द्वारा निषिद्ध जो व्यक्ति था, उसी को उसने आदरपूर्वक ले आया।

श्लोक 39 (padma.5.96.39)

तस्मै यमः समुत्थाय पूजां कृत्वा च धर्मवित् । प्रोवाच नीयतामेष सोऽन्य आनीयतामिति

tasmai yamaḥ samutthāya pūjāṁ kṛtvā ca dharmavit provāca nīyatāmeṣa so'nya ānīyatāmiti

धर्मज्ञ यम ने उठकर उसकी पूजा की, और फिर कहा— 'इसे वापस ले जाओ, दूसरे को लाओ।'

श्लोक 40 (padma.5.96.40)

सूत उवाच- एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विजः । उवाच धर्मराजं तं निर्विण्णो गमनाय वै

sūta uvāca- evamukte tu vacane dharmarājena sa dvijaḥ uvāca dharmarājaṁ taṁ nirviṇṇo gamanāya vai

सूत ने कहा— धर्मराज के इस प्रकार कहने पर वह ब्राह्मण खिन्न होकर वापस जाने के लिए धर्मराज से बोला।

श्लोक 41 (padma.5.96.41)

ब्राह्मण उवाच- कस्मादहमिहानीतः कस्मात्प्रेरयसे पुनः । गंतुं नैवोत्सहे तत्र मर्त्यलोकं पुनः प्रभो

brāhmaṇa uvāca- kasmādahamihānītaḥ kasmātprerayase punaḥ gaṁtuṁ naivotsahe tatra martyalokaṁ punaḥ prabho

ब्राह्मण ने कहा— मुझे यहाँ किसलिए लाया गया, और अब क्यों वापस भेजा जा रहा है? हे प्रभो! अब मैं फिर से मृत्युलोक जाने का उत्साह नहीं रखता।

श्लोक 42 (padma.5.96.42)

यम उवाच- इह क्षीणायुषां पुंसां वासः पुण्यवतां भवेत् । अयं वै धर्मराजस्य लोको धर्मः प्रकीर्तितः

yama uvāca- iha kṣīṇāyuṣāṁ puṁsāṁ vāsaḥ puṇyavatāṁ bhavet ayaṁ vai dharmarājasya loko dharmaḥ prakīrtitaḥ

यम ने कहा— यह जो क्षीण आयु वाले पुण्यात्मा पुरुषों का निवास-स्थान है, यह धर्मराज का ही लोक है, जिसे 'धर्म' कहा गया है।

श्लोक 43 (padma.5.96.43)

सौख्यभूमिरियं सर्वा धर्मराजोऽहमीश्वरः । पुण्यापुण्यानुसारेण जंतूनां सुखदुःखदः

saukhyabhūmiriyaṁ sarvā dharmarājo'hamīśvaraḥ puṇyāpuṇyānusāreṇa jaṁtūnāṁ sukhaduḥkhadaḥ

यह संपूर्ण भूमि सुख की भूमि है; मैं धर्मराज, इसका ईश्वर हूँ; पुण्य-पाप के अनुसार प्राणियों को सुख-दुःख देने वाला हूँ।

श्लोक 44 (padma.5.96.44)

पापिनां यमरूपोऽस्मि नृणां निरयदायकः । तथा पुण्यवतां सौख्य स्वर्गदो धर्म मूर्तिमान्

pāpināṁ yamarūpo'smi nṛṇāṁ nirayadāyakaḥ tathā puṇyavatāṁ saukhya svargado dharma mūrtimān

पापियों के लिए मैं यमरूप हूँ, मनुष्यों को नरक देने वाला; परंतु पुण्यवानों के लिए मैं सुखदाता, स्वर्गदाता, धर्म का साक्षात् मूर्तिमान रूप हूँ।

श्लोक 45 (padma.5.96.45)

गच्छ विप्र त्वमद्यैव निलयं स्वं यथागतः । अद्यापि दशवर्षाणामायुस्ते परिवर्तते

gaccha vipra tvamadyaiva nilayaṁ svaṁ yathāgataḥ adyāpi daśavarṣāṇāmāyuste parivartate

हे विप्र! तुम आज ही वापस अपने घर जाओ, जैसे आए थे; अब भी दस वर्ष तुम्हारी आयु शेष है।

श्लोक 46 (padma.5.96.46)

क्षये तवायुषः प्राप्तिर्लोकस्यास्य भविष्यति । प्रष्टव्यं च त्वया ह्यन्यत्पृच्छस्व प्रब्रवीमि ते

kṣaye tavāyuṣaḥ prāptirlokasyāsya bhaviṣyati praṣṭavyaṁ ca tvayā hyanyatpṛcchasva prabravīmi te

आयु के क्षय होने पर तुम्हें इस लोक की प्राप्ति होगी। तुम्हें और भी जो पूछना हो, पूछो; मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 47 (padma.5.96.47)

ब्राह्मण उवाच- यत्कृत्वा सुमहत्पुण्यं स्वर्गः स्याद्ब्रूहि तन्मम । सर्वस्य हि प्रमाणंत्वं धर्माधर्मविनिश्चये

brāhmaṇa uvāca- yatkṛtvā sumahatpuṇyaṁ svargaḥ syādbrūhi tanmama sarvasya hi pramāṇaṁtvaṁ dharmādharmaviniścaye

ब्राह्मण ने कहा— जिस महान पुण्य को करने से स्वर्ग प्राप्त हो, वह मुझे बताइए; धर्म और अधर्म के निर्णय में आप ही सबके लिए प्रमाण हैं।

श्लोक 48 (padma.5.96.48)

यदि देव मया सम्यग्गंतव्यं निजमंदिरे । तद्ब्रूहि कर्मणा केन पतंति नरके नराः

yadi deva mayā samyaggaṁtavyaṁ nijamaṁdire tadbrūhi karmaṇā kena pataṁti narake narāḥ

हे देव! यदि मुझे भलीभाँति अपने घर जाना है, तो बताइए — किस कर्म से मनुष्य नरक में गिरते हैं?

श्लोक 49 (padma.5.96.49)

व्रजंति केन वै स्वर्गं तत्सर्वं कृपया वद । यम उवाच- कर्मणा मनसा वाचा ये धर्मविमुखा नराः

vrajaṁti kena vai svargaṁ tatsarvaṁ kṛpayā vada yama uvāca- karmaṇā manasā vācā ye dharmavimukhā narāḥ

और किससे मनुष्य स्वर्ग जाते हैं — यह सब कृपापूर्वक बताइए। यम ने कहा— जो मनुष्य मन, वचन और कर्म से धर्म से विमुख हैं —

श्लोक 50 (padma.5.96.50)

विष्णुभक्तिविहीना ये ते वै निरयगामिनः । पश्यंति भेदबुद्ध्या ये ब्रह्माणं शंकरं हरिम्

viṣṇubhaktivihīnā ye te vai nirayagāminaḥ paśyaṁti bhedabuddhyā ye brahmāṇaṁ śaṁkaraṁ harim

जो विष्णु-भक्ति से रहित हैं, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। जो भेद-बुद्धि से ब्रह्मा, शंकर और हरि को देखते हैं —

श्लोक 51 (padma.5.96.51)

विरक्ता विष्णुविद्यासु नरा निरयगामिनः । कुलदेशोचितं कर्म यस्त्यक्त्वान्यत्समाचरेत्

viraktā viṣṇuvidyāsu narā nirayagāminaḥ kuladeśocitaṁ karma yastyaktvānyatsamācaret

जो विष्णु-विद्या से विरक्त हैं, वे मनुष्य नरकगामी हैं। जो अपने कुल-देश के उचित कर्म को त्यागकर अन्य आचरण करता है —

श्लोक 52 (padma.5.96.52)

कामाद्वा यदि वा मोहात्स याति नरकं नरः । अयाज्ययाजकश्चैव याज्यानां च विवर्जकः

kāmādvā yadi vā mohātsa yāti narakaṁ naraḥ ayājyayājakaścaiva yājyānāṁ ca vivarjakaḥ

काम या मोह के वशीभूत होकर, वह मनुष्य नरक जाता है। जो अयोग्य का पुरोहित बनता है और योग्य यजमानों को त्याग देता है —

श्लोक 53 (padma.5.96.53)

विरतो विष्णुविद्यासु स भुंक्ते नरकान्बहून् । अदत्वा पितृदेवेभ्यो विप्रेभ्यो मर्त्यबंधुषु

virato viṣṇuvidyāsu sa bhuṁkte narakānbahūn adatvā pitṛdevebhyo viprebhyo martyabaṁdhuṣu

जो विष्णु-विद्या से विरत है, वह अनेक नरकों को भोगता है। जो पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों और सांसारिक बंधुओं को कुछ दिए बिना —

श्लोक 54 (padma.5.96.54)

सधनो म्रियते पापः स याति नरकान्बहून् । सर्वाण्यन्नानि सिद्धानि पाकभेदं करोति यः

sadhano mriyate pāpaḥ sa yāti narakānbahūn sarvāṇyannāni siddhāni pākabhedaṁ karoti yaḥ

धनवान होकर पापपूर्वक मर जाता है, वह अनेक नरकों में जाता है। जो सिद्ध किए गए सभी अन्नों में पक्षपात करता है —

श्लोक 55 (padma.5.96.55)

अवैश्वदेवं भुंजीत स याति नरकं चिरम् । बहुद्रोहेण भूतानां येऽजयंति धनं द्विज

avaiśvadevaṁ bhuṁjīta sa yāti narakaṁ ciram bahudroheṇa bhūtānāṁ ye'jayaṁti dhanaṁ dvija

जो वैश्वदेव यज्ञ के बिना भोजन करता है, वह दीर्घकाल तक नरक में जाता है। हे द्विज! जो प्राणियों को अत्यंत सताकर धन कमाते हैं —

श्लोक 56 (padma.5.96.56)

धनवंतो निरयगा दांभिका दुःखभागिनः । नास्तिक्यादथ वा लोभान्मोहात्काले यथोदिते

dhanavaṁto nirayagā dāṁbhikā duḥkhabhāginaḥ nāstikyādatha vā lobhānmohātkāle yathodite

वे धनवान, दंभी और दुःखभागी नरकगामी हैं। जो अश्रद्धा, लोभ या मोह के कारण उचित समय पर —

श्लोक 57 (padma.5.96.57)

भक्त्या न श्राद्धदा ये स्युः पच्यंते नरकेषु ते । दीयमानस्य वित्तस्य ब्राह्मणेभ्यस्तु पापकृत्

bhaktyā na śrāddhadā ye syuḥ pacyaṁte narakeṣu te dīyamānasya vittasya brāhmaṇebhyastu pāpakṛt

भक्तिपूर्वक श्राद्ध नहीं करते, वे नरकों में पकाए जाते हैं। ब्राह्मणों को दिए जा रहे धन में जो पापी विघ्न डालता है —

श्लोक 58 (padma.5.96.58)

विघ्नमाचरते योऽसौ नरो निरयगो भवेत् । सामान्य दक्षिणां लब्ध्वा गृह्णात्येको विमोहतः

vighnamācarate yo'sau naro nirayago bhavet sāmānya dakṣiṇāṁ labdhvā gṛhṇātyeko vimohataḥ

वह मनुष्य नरकगामी होता है। जो मोहवश सामान्य दक्षिणा में से अकेला ही ग्रहण कर लेता है —

श्लोक 59 (padma.5.96.59)

नास्तिक्यभावनिरतो नरः स्यान्नरकालये । असहिष्णुतया तस्य गुणानां कारणं भवेत्

nāstikyabhāvanirato naraḥ syānnarakālaye asahiṣṇutayā tasya guṇānāṁ kāraṇaṁ bhavet

वह अश्रद्धालु मनुष्य नरकवासी होता है। असहिष्णुता के कारण जो दूसरों के गुणों का [अनादर] करता है —

श्लोक 60 (padma.5.96.60)

महत्पापं समुत्पन्नं कारणं नरकस्य तत् । निर्दोषां सुहृदां भार्यां त्यजन्कालेन याति यः

mahatpāpaṁ samutpannaṁ kāraṇaṁ narakasya tat nirdoṣāṁ suhṛdāṁ bhāryāṁ tyajankālena yāti yaḥ

यह बड़े पाप और नरक का कारण बनता है। जो निर्दोष, सुहृद पत्नी को समय आने पर त्याग देता है —

श्लोक 61 (padma.5.96.61)

न वहेत यशस्तेषां स नरो नरके पतेत् । अधर्मं धर्ममिति यो वदन्मोहवशं गतः

na vaheta yaśasteṣāṁ sa naro narake patet adharmaṁ dharmamiti yo vadanmohavaśaṁ gataḥ

उसका यश नहीं टिकता, वह मनुष्य नरक में गिरता है। जो मोहवश अधर्म को धर्म कहता है —

श्लोक 62 (padma.5.96.62)

हैतुको नास्तिको यस्तु स नरो निरयालयः । मनसा योऽन्यभावेन वचसा चान्यथा वदेत्

haituko nāstiko yastu sa naro nirayālayaḥ manasā yo'nyabhāvena vacasā cānyathā vadet

जो कुतर्की और नास्तिक है, वह मनुष्य नरकवासी है। जो मन में कुछ और सोचकर वाणी से कुछ और कहता है —

श्लोक 63 (padma.5.96.63)

हृदयं कलुषं कुर्यात्स नरो नरके वसेत् । अवमन्य च ये यांति भगवत्कीर्तनं नराः

hṛdayaṁ kaluṣaṁ kuryātsa naro narake vaset avamanya ca ye yāṁti bhagavatkīrtanaṁ narāḥ

जो हृदय को कलुषित रखता है, वह मनुष्य नरक में वास करता है। जो भगवान के कीर्तन का अनादर करते हैं —

श्लोक 64 (padma.5.96.64)

ते यांति नरकं घोरं तेन पापेन कर्मणा । पश्यंतो भगवद्द्वारं नामशास्त्र परिच्छदम्

te yāṁti narakaṁ ghoraṁ tena pāpena karmaṇā paśyaṁto bhagavaddvāraṁ nāmaśāstra paricchadam

वे उसी पाप-कर्म के कारण घोर नरक जाते हैं। भगवान के मंदिर के द्वार, नाम और शास्त्र के अवलोकन को देखते हुए भी —

श्लोक 65 (padma.5.96.65)

अकृत्वा तत्प्रणामादि ते यांति नरकौकसः । विनापराधेन नराः कृत्वा पत्न्यधिवेदनम्

akṛtvā tatpraṇāmādi te yāṁti narakaukasaḥ vināparādhena narāḥ kṛtvā patnyadhivedanam

जो प्रणाम आदि किए बिना [चले जाते हैं], वे नरकवासी होते हैं। जो बिना किसी अपराध के पत्नी होते हुए दूसरा विवाह करके —

श्लोक 66 (padma.5.96.66)

त्यजंति सुकलत्रं ये ते यांति नरके नराः । न शृणोति गुरोर्वाक्यं धर्मशास्त्रं च यो नरः

tyajaṁti sukalatraṁ ye te yāṁti narake narāḥ na śṛṇoti gurorvākyaṁ dharmaśāstraṁ ca yo naraḥ

अच्छी पत्नी को त्याग देते हैं, वे मनुष्य नरक में जाते हैं। जो गुरु के वचन और धर्मशास्त्र को नहीं सुनता —

श्लोक 67 (padma.5.96.67)

परेषां चेतसः क्लेशकारी निरयगो भवेत् । पश्यतां बंधु बालानां प्रकर्षी मिष्टमश्नुते

pareṣāṁ cetasaḥ kleśakārī nirayago bhavet paśyatāṁ baṁdhu bālānāṁ prakarṣī miṣṭamaśnute

जो दूसरों के मन को क्लेश पहुँचाता है, वह नरकगामी होता है। जो बंधु-बालकों के देखते हुए भी अकेले स्वादिष्ट भोजन खाता है —

श्लोक 68 (padma.5.96.68)

स याति नरकं घोरं केवलोदरपूरकः । तुला मकर मेषेषु प्रातः स्नानं न यश्चरेत्

sa yāti narakaṁ ghoraṁ kevalodarapūrakaḥ tulā makara meṣeṣu prātaḥ snānaṁ na yaścaret

वह केवल अपना पेट भरने वाला घोर नरक जाता है। जो तुला, मकर और मेष राशियों में प्रातः-स्नान नहीं करता —

श्लोक 69 (padma.5.96.69)

नद्यादिषु च नास्तिक्यस्तस्य स्यान्नरकालयः । वैष्णवं जनमालोक्य नाभ्युत्थानं करोति यः

nadyādiṣu ca nāstikyastasya syānnarakālayaḥ vaiṣṇavaṁ janamālokya nābhyutthānaṁ karoti yaḥ

नदी आदि में उसका यह अश्रद्धाभाव ही उसके लिए नरक का घर बनता है। जो वैष्णव जन को देखकर भी खड़ा नहीं होता —

श्लोक 70 (padma.5.96.70)

प्रणयादरतो विप्र स नरो नरकातिथिः । काष्ठैर्वा शंकुभिर्वापि शूलैरश्मभिरेव च

praṇayādarato vipra sa naro narakātithiḥ kāṣṭhairvā śaṁkubhirvāpi śūlairaśmabhireva ca

हे विप्र! प्रेम और आदर से रहित वह मनुष्य नरक का अतिथि बनता है। जो लकड़ी, कीलों, भालों या पत्थरों से —

श्लोक 71 (padma.5.96.71)

ये मार्गांश्चैव रुंधंति ते वै निरयगामिनः । आद्यं पुरुषमीशानं सर्वलोकमहेश्वरम्

ye mārgāṁścaiva ruṁdhaṁti te vai nirayagāminaḥ ādyaṁ puruṣamīśānaṁ sarvalokamaheśvaram

मार्गों को अवरुद्ध करते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। आदि पुरुष, सबके ईश्वर, सर्वलोक-महेश्वर विष्णु का —

श्लोक 72 (padma.5.96.72)

न चिन्तयंति ये विष्णुं ते वै निरयगामिनः । क्षेत्रवृत्ति गृहच्छेदं प्रीतिच्छेदं च ये नराः

na cintayaṁti ye viṣṇuṁ te vai nirayagāminaḥ kṣetravṛtti gṛhacchedaṁ prīticchedaṁ ca ye narāḥ

जो चिंतन नहीं करते, वे भी निश्चय ही नरकगामी हैं। जो लोग खेत के अधिकार, घर के विभाजन और प्रेम-विच्छेद —

श्लोक 73 (padma.5.96.73)

आशाच्छेदं च कुर्वंति ते नरा नरकौकसः । आगतान्भोजनार्थं च ब्राह्मणान्वृत्तिकर्शितान्

āśācchedaṁ ca kurvaṁti te narā narakaukasaḥ āgatānbhojanārthaṁ ca brāhmaṇānvṛttikarśitān

और आशा के विच्छेद का कारण बनते हैं, वे मनुष्य नरकवासी हैं। जो भोजनार्थ आए हुए, वृत्ति से क्षीण ब्राह्मणों की —

श्लोक 74 (padma.5.96.74)

यः परीक्षेत मूढात्मा स ज्ञेयो नरकातिथिः । अनाथं वैष्णवं दीनं रोगार्तं वृद्धमेव च

yaḥ parīkṣeta mūḍhātmā sa jñeyo narakātithiḥ anāthaṁ vaiṣṇavaṁ dīnaṁ rogārtaṁ vṛddhameva ca

मूढ़ बुद्धि से परीक्षा लेता है, वह नरक का अतिथि जानना चाहिए। अनाथ, दीन, रोगपीड़ित और वृद्ध वैष्णव पर —

श्लोक 75 (padma.5.96.75)

नानुकंपंति ये मूढास्ते वै निरयगामिनः । नियमांस्तु समादाय ये पश्चादजितेंद्रियाः

nānukaṁpaṁti ye mūḍhāste vai nirayagāminaḥ niyamāṁstu samādāya ye paścādajiteṁdriyāḥ

जो मूढ़ लोग दया नहीं करते, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। जो व्रतों को ग्रहण करके बाद में इंद्रियों को वश में न रखकर —

श्लोक 76 (padma.5.96.76)

विलोपयंति तान्भूयस्ते वै निरयगामिनः । शृणु विप्र यथा यांति नराः स्वर्गं दयालवः

vilopayaṁti tānbhūyaste vai nirayagāminaḥ śṛṇu vipra yathā yāṁti narāḥ svargaṁ dayālavaḥ

उन्हें फिर से भंग कर देते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी हैं। हे विप्र! अब सुनो, जो दयालु मनुष्य जिस प्रकार स्वर्ग जाते हैं —

श्लोक 77 (padma.5.96.77)

समासेनैव वक्ष्यामि किंचित्ते गौरवादहम् । येऽर्चयंति हरिं देवंजिष्णुं विष्णुं सनातनम्

samāsenaiva vakṣyāmi kiṁcitte gauravādaham ye'rcayaṁti hariṁ devaṁjiṣṇuṁ viṣṇuṁ sanātanam

मैं तुम्हारे सम्मान में उसे संक्षेप में कुछ कहूँगा। जो जिष्णु, सनातन विष्णु देव हरि की पूजा करते हैं —

श्लोक 78 (padma.5.96.78)

नारायणमजं कृष्णं विष्वक्सेनं चतुर्भुजम् । ध्यायंति पुरुषं दिव्यमच्युतं ये स्मरंति च

nārāyaṇamajaṁ kṛṣṇaṁ viṣvaksenaṁ caturbhujam dhyāyaṁti puruṣaṁ divyamacyutaṁ ye smaraṁti ca

नारायण, अज, कृष्ण, चतुर्भुज विष्वक्सेन का — जो उस दिव्य पुरुष अच्युत का ध्यान करते और स्मरण करते हैं —

श्लोक 79 (padma.5.96.79)

लभंते तेऽच्युतस्थानं श्रुतिरेषा पुरातनी । इदमेवहि मांगल्यमिदमेव धनार्जनम्

labhaṁte te'cyutasthānaṁ śrutireṣā purātanī idamevahi māṁgalyamidameva dhanārjanam

वे अच्युत के धाम को प्राप्त करते हैं — यह प्राचीन श्रुति-वचन है। यही मंगल है, यही धन-अर्जन है —

श्लोक 80 (padma.5.96.80)

जीवितस्य फलं चैतद्यद्दामोदरकीर्तनम् । कीर्तनाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः

jīvitasya phalaṁ caitadyaddāmodarakīrtanam kīrtanāddevadevasya viṣṇoramitatejasaḥ

यही जीवन का फल है, अर्थात् दामोदर का कीर्तन। देवताओं के देव, अपरिमित तेजस्वी विष्णु के कीर्तन से —

श्लोक 81 (padma.5.96.81)

दुरितानि विलीयंते तमांसीव दिनोदये । गाथां गायंति ये नित्यं वैष्णवीं श्रद्धयान्विताः

duritāni vilīyaṁte tamāṁsīva dinodaye gāthāṁ gāyaṁti ye nityaṁ vaiṣṇavīṁ śraddhayānvitāḥ

समस्त पाप वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे दिन के उदय से अंधकार। जो सदा श्रद्धापूर्वक वैष्णवी कथा गाते हैं —

श्लोक 82 (padma.5.96.82)

स्वाध्यायनिरता नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः । सर्वान्क्लेशान्परित्यज्य विष्णुमेव स्तुवंति ये

svādhyāyaniratā nityaṁ te narāḥ svargagāminaḥ sarvānkleśānparityajya viṣṇumeva stuvaṁti ye

जो नित्य स्वाध्याय में रत रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो सब क्लेशों को त्यागकर केवल विष्णु की ही स्तुति करते हैं —

श्लोक 83 (padma.5.96.83)

स्वधर्मनिरता धीरास्ते नराः स्वर्गगामिनः । वासुदेवजपासक्तानपि पापकृतो जनान्

svadharmaniratā dhīrāste narāḥ svargagāminaḥ vāsudevajapāsaktānapi pāpakṛto janān

जो अपने ही धर्म में स्थिर और धीर हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। वासुदेव के जप में लीन, यहाँ तक कि पाप करने वाले लोगों के पास भी —

श्लोक 84 (padma.5.96.84)

नोपसर्पन्ति तान्विप्र यमदूताश्च दारुणाः । नान्यत्पश्यन्ति जंतूनां विहाय हरिकीर्तनम्

nopasarpanti tānvipra yamadūtāśca dāruṇāḥ nānyatpaśyanti jaṁtūnāṁ vihāya harikīrtanam

हे विप्र! भयंकर यमदूत भी नहीं जाते। जो हरि के कीर्तन के अतिरिक्त प्राणियों में कुछ और नहीं देखते —

श्लोक 85 (padma.5.96.85)

सर्वपापप्रशमनं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तम । ये याचिताः प्रहृष्यंति प्रियं दत्वा वदंति च

sarvapāpapraśamanaṁ prāyaścittaṁ dvijottama ye yācitāḥ prahṛṣyaṁti priyaṁ datvā vadaṁti ca

हे द्विजोत्तम! वह (कीर्तन) समस्त पापों को शांत करने वाला प्रायश्चित्त है। जो याचकों को पाकर प्रसन्न होते हैं, और प्रिय वस्तु देकर स्नेह से बोलते हैं —

श्लोक 86 (padma.5.96.86)

त्यक्तदानफला ये च ते नराःस्वर्गगामिनः । वर्जयंति दिवास्वापं नराः सर्वसहाश्च ये

tyaktadānaphalā ye ca te narāḥsvargagāminaḥ varjayaṁti divāsvāpaṁ narāḥ sarvasahāśca ye

जिन्होंने दान का फल त्याग दिया है, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो दिन में सोना त्यागते हैं, और जो सबका सहन करते हैं —

श्लोक 87 (padma.5.96.87)

पर्वण्याश्रयभूता ये ते मर्त्याः स्वर्गगामिनः । द्विषतामपि ये दोषान्न वदंति कदाचन

parvaṇyāśrayabhūtā ye te martyāḥ svargagāminaḥ dviṣatāmapi ye doṣānna vadaṁti kadācana

जो पर्व के दिनों में आश्रय बनते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो शत्रुओं के भी दोष कभी नहीं कहते —

श्लोक 88 (padma.5.96.88)

कीर्तयंति गुणांश्चैव ते नराः स्वर्गगामिनः । ये परेषां श्रियं दृष्ट्वा न वितप्यंति मत्सरात्

kīrtayaṁti guṇāṁścaiva te narāḥ svargagāminaḥ ye pareṣāṁ śriyaṁ dṛṣṭvā na vitapyaṁti matsarāt

बल्कि उनके गुणों का ही कीर्तन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो दूसरों की समृद्धि देखकर ईर्ष्या से संतप्त नहीं होते —

श्लोक 89 (padma.5.96.89)

प्रहृष्टाश्चाभिनंदंति ते नराः स्वर्गगामिनः । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च श्रुतिशास्त्रोक्तमेव च

prahṛṣṭāścābhinaṁdaṁti te narāḥ svargagāminaḥ pravṛttau ca nivṛttau ca śrutiśāstroktameva ca

बल्कि प्रसन्न होकर अभिनंदन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो श्रुति और शास्त्र में कहे गए प्रवृत्ति और निवृत्ति धर्म का —

श्लोक 90 (padma.5.96.90)

आदरंति प्रतीता ये ते नराः स्वर्गगामिनः । यस्मिन्कस्मिन्कुले जाता दयावंतो यशस्विनः

ādaraṁti pratītā ye te narāḥ svargagāminaḥ yasminkasminkule jātā dayāvaṁto yaśasvinaḥ

विश्वासपूर्वक आदर करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जिस किसी भी कुल में जन्मे हों, जो दयावान और यशस्वी हैं —

श्लोक 91 (padma.5.96.91)

सानुक्रोशाः सदाचारास्ते नराः स्वर्गगामिनः । ये पूताः परदारांश्च कर्मणा मनसा गिरा

sānukrośāḥ sadācārāste narāḥ svargagāminaḥ ye pūtāḥ paradārāṁśca karmaṇā manasā girā

जो करुणाशील और सदाचारी हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो कर्म, मन और वाणी से पवित्र रहकर दूसरों की पत्नियों को —

श्लोक 92 (padma.5.96.92)

रमयंति न सत्वस्थास्तेनराः स्वर्गगामिनः । सदा कर्मयथोक्तेन कुर्वंति विहितानि च

ramayaṁti na satvasthāstenarāḥ svargagāminaḥ sadā karmayathoktena kurvaṁti vihitāni ca

अपने चित्त में भी नहीं भोगते, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो सदा शास्त्रोक्त कर्म करते हैं और विहित कर्मों को —

श्लोक 93 (padma.5.96.93)

आत्मशक्तिं च विज्ञाय ते नराः स्वर्गगामिनः । मनो वाक्कायिके धर्मे श्रद्धां यः कुरुते सदा

ātmaśaktiṁ ca vijñāya te narāḥ svargagāminaḥ mano vākkāyike dharme śraddhāṁ yaḥ kurute sadā

अपनी शक्ति जानकर करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो मन, वचन और शरीर से किए जाने वाले धर्म में सदा श्रद्धा रखता है —

श्लोक 94 (padma.5.96.94)

साधूनां संमतो यश्च स भवेद्देवतातिथिः । वचोवेगं मनोवेगं यो वेगमुदरोद्भवम्

sādhūnāṁ saṁmato yaśca sa bhaveddevatātithiḥ vacovegaṁ manovegaṁ yo vegamudarodbhavam

और जो सज्जनों द्वारा सम्मानित है, वह देवताओं का अतिथि बनता है। वाणी का वेग, मन का वेग, उदर से उत्पन्न वेग —

श्लोक 95 (padma.5.96.95)

उपस्थवेगं सहते स स्वर्गी जायते नरः । येषां गुणेषु संतोषो वाणी येषां श्रुतं प्रति

upasthavegaṁ sahate sa svargī jāyate naraḥ yeṣāṁ guṇeṣu saṁtoṣo vāṇī yeṣāṁ śrutaṁ prati

और काम-वेग को जो सहन करता है, वह मनुष्य स्वर्ग-प्राप्त होता है। जिनका संतोष गुणों में है, जिनकी वाणी श्रुत (शास्त्र) के प्रति है —

श्लोक 96 (padma.5.96.96)

परमार्थे मतिर्येषां ते शिष्टाः स्वर्गगामिनः । व्रतं रक्षंति ये कोपाच्छ्रियं रक्षंति मत्सरात्

paramārthe matiryeṣāṁ te śiṣṭāḥ svargagāminaḥ vrataṁ rakṣaṁti ye kopācchriyaṁ rakṣaṁti matsarāt

जिनकी बुद्धि परमार्थ में है, वे शिष्ट पुरुष स्वर्गगामी हैं। जो क्रोध से व्रत की, ईर्ष्या से लक्ष्मी की रक्षा करते हैं —

श्लोक 97 (padma.5.96.97)

विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः । मतिं रक्षंति ये लोभान्मनो रक्षंति कामतः

vidyāṁ mānāpamānābhyāmātmānaṁ tu pramādataḥ matiṁ rakṣaṁti ye lobhānmano rakṣaṁti kāmataḥ

अपनी विद्या को मान-अपमान से, और स्वयं को प्रमाद से बचाते हैं; जो लोभ से बुद्धि की और काम से मन की रक्षा करते हैं —

श्लोक 98 (padma.5.96.98)

धर्मं रक्षंति दुःसंगात्ते नराः स्वर्गगामिनः । एकादश्यां च विधिवदुपवासपरायणाः

dharmaṁ rakṣaṁti duḥsaṁgātte narāḥ svargagāminaḥ ekādaśyāṁ ca vidhivadupavāsaparāyaṇāḥ

जो कुसंगति से धर्म की रक्षा करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। हे विप्र! जो एकादशी को विधिपूर्वक उपवास में तत्पर रहते हैं —

श्लोक 99 (padma.5.96.99)

शुक्लेऽसिते च ये विप्र ते नराः स्वर्गगामिनः । मातेव सर्वबालानामौषधं रोगिणा मिव

śukle'site ca ye vipra te narāḥ svargagāminaḥ māteva sarvabālānāmauṣadhaṁ rogiṇā miva

शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जैसे सब बालकों के लिए माता, और रोगी के लिए औषधि —

श्लोक 100 (padma.5.96.100)

रक्षार्थं सर्वलोकानां निर्मितैकादशी तिथिः । एकादशी समं किंचित्पादत्राणं न विद्यते

rakṣārthaṁ sarvalokānāṁ nirmitaikādaśī tithiḥ ekādaśī samaṁ kiṁcitpādatrāṇaṁ na vidyate

वैसे ही सब लोकों की रक्षा के लिए एकादशी तिथि बनाई गई है। एकादशी के समान कोई भी उपाय (त्राण) नहीं है।

श्लोक 101 (padma.5.96.101)

तामुपोष्य विधानेन पुरुषाः स्वर्गगामिनः । एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति द्विज

tāmupoṣya vidhānena puruṣāḥ svargagāminaḥ ekādaśendriyaiḥ pāpaṁ yatkṛtaṁ bhavati dvija

उस एकादशी का विधिपूर्वक उपवास करने वाले पुरुष स्वर्गगामी हैं। हे द्विज! ग्यारह इंद्रियों से जो पाप हुआ हो —

श्लोक 102 (padma.5.96.102)

नरो निर्द्धूय तत्तूर्णं प्रीतः स्वर्गतिमान्भवेत् । अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च

naro nirddhūya tattūrṇaṁ prītaḥ svargatimānbhavet aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca

उसे मनुष्य शीघ्र ही उतारकर प्रसन्न होकर स्वर्गगामी बन जाता है। हज़ारों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय यज्ञ भी —

श्लोक 103 (padma.5.96.103)

एकादश्युपवासस्य कलां नार्हंति षोडशीम् । एकतः क्रतवः सर्वे सर्वतीर्थतपांसि च

ekādaśyupavāsasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm ekataḥ kratavaḥ sarve sarvatīrthatapāṁsi ca

एकादशी के उपवास की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। एक ओर सभी यज्ञ, सभी तीर्थ और तप —

श्लोक 104 (padma.5.96.104)

महादानादिदानानि व्रतं वैष्णवमेकतः । वैष्णवव्रतजो धर्मो धर्मो यज्ञादिसंभवः

mahādānādidānāni vrataṁ vaiṣṇavamekataḥ vaiṣṇavavratajo dharmo dharmo yajñādisaṁbhavaḥ

महादान आदि दान, और दूसरी ओर वैष्णव-व्रत — यज्ञादि से उत्पन्न धर्म और वैष्णव-व्रत से उत्पन्न धर्म —

श्लोक 105 (padma.5.96.105)

एकत्र तुलितौ धात्रा तत्र पूर्वो भवेद्गुरुः । हरिवासर भक्तानामच्युतानंतभाषिणाम्

ekatra tulitau dhātrā tatra pūrvo bhavedguruḥ harivāsara bhaktānāmacyutānaṁtabhāṣiṇām

जब विधाता ने इन दोनों को तराजू पर तौला, तब उसमें (वैष्णव-व्रत) ही भारी सिद्ध हुआ। हरि-वासर (एकादशी) के भक्तों से, जो 'अच्युत', 'अनंत' बोलते रहते हैं —

श्लोक 106 (padma.5.96.106)

नाहं शास्ता विशेषेण तेभ्यो विप्र बिभेम्यहम् । येषां पुत्रश्च पौत्रश्च एकादश्यामुपोषितः

nāhaṁ śāstā viśeṣeṇa tebhyo vipra bibhemyaham yeṣāṁ putraśca pautraśca ekādaśyāmupoṣitaḥ

हे विप्र! मैं उनका विशेष रूप से शासक नहीं हूँ, बल्कि मैं स्वयं उनसे डरता हूँ। जिनके पुत्र और पौत्र भी एकादशी का उपवास करते हैं —

श्लोक 107 (padma.5.96.107)

सहात्मना स पुरुषाञ्छतमुद्धरते बलात् । उपोषणं ततः कुर्यात्पक्षयोरुभयोरपि

sahātmanā sa puruṣāñchatamuddharate balāt upoṣaṇaṁ tataḥ kuryātpakṣayorubhayorapi

वह स्वयं सहित सौ पुरुषों को बलपूर्वक उद्धार कर देता है। इसलिए दोनों पक्षों में उपवास करना चाहिए।

श्लोक 108 (padma.5.96.108)

एकादश्यां स पुरुषो भुक्तिमुक्त्येकभाजनम् । जया च विजया चैव जयंती पापनाशिनी

ekādaśyāṁ sa puruṣo bhuktimuktyekabhājanam jayā ca vijayā caiva jayaṁtī pāpanāśinī

एकादशी के व्रत से वह पुरुष भोग और मोक्ष दोनों का एकमात्र पात्र बनता है। जया, विजया, जयंती और पापनाशिनी —

श्लोक 109 (padma.5.96.109)

त्रिस्पृशा वंजुली चैव पक्षसंवर्धिनी वरा । तिलदुग्धा परा ज्ञेया अखंडद्वादशी तथा

trispṛśā vaṁjulī caiva pakṣasaṁvardhinī varā tiladugdhā parā jñeyā akhaṁḍadvādaśī tathā

त्रिस्पृशा, वंजुली, पक्षसंवर्धिनी, वरा, तिलद्वादशी, परा और अखंडद्वादशी —

श्लोक 110 (padma.5.96.110)

मनोरथाख्या च परा भीमद्वादशिका तथा । इत्येवमादयो भेदा द्वादश्याः संत्यनेकशः

manorathākhyā ca parā bhīmadvādaśikā tathā ityevamādayo bhedā dvādaśyāḥ saṁtyanekaśaḥ

मनोरथा नामक और भीमद्वादशी भी — इस प्रकार द्वादशी के अनेक भेद हैं।

श्लोक 111 (padma.5.96.111)

व्रतेष्वेतेषु ये शक्ता ज्ञेयास्ते ब्रह्मणि स्थिताः । श्रोतारो धर्मशास्त्राणां धर्मप्रत्यय संगताः

vrateṣveteṣu ye śaktā jñeyāste brahmaṇi sthitāḥ śrotāro dharmaśāstrāṇāṁ dharmapratyaya saṁgatāḥ

जो इन व्रतों में समर्थ हैं, उन्हें ब्रह्म में स्थित समझना चाहिए। धर्मशास्त्रों को सुनने वाले, धर्म में दृढ़ विश्वास रखने वाले —

श्लोक 112 (padma.5.96.112)

प्रियंकराश्च बालानां स्वर्गलोकं व्रजंति ते । मासिमास्येकदिवसे दर्शे श्राद्धव्रता नराः

priyaṁkarāśca bālānāṁ svargalokaṁ vrajaṁti te māsimāsyekadivase darśe śrāddhavratā narāḥ

और बालकों के प्रिय — वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। जिनके पितर प्रत्येक मास की एक अमावस्या को श्राद्ध-व्रत से —

श्लोक 113 (padma.5.96.113)

तृप्यंति पितरो येषां ते धन्याः स्वर्गगामिनः । भोजनेषूपपन्नेषु भोज्यं यच्छंति सादरात्

tṛpyaṁti pitaro yeṣāṁ te dhanyāḥ svargagāminaḥ bhojaneṣūpapanneṣu bhojyaṁ yacchaṁti sādarāt

तृप्त होते हैं, वे धन्य स्वर्गगामी हैं। भोजन के समय, आदरपूर्वक जो भोज्य वस्तु देते हैं —

श्लोक 114 (padma.5.96.114)

अभिन्नमुखरागेण शिष्टास्ते स्वर्गगामिनः

abhinnamukharāgeṇa śiṣṭāste svargagāminaḥ

बिना मुख का भाव बदले — वे शिष्ट पुरुष स्वर्गगामी हैं।

श्लोक 115 (padma.5.96.115)

ये भक्तिमंतो मधुसूदनस्य नारायणस्याखिलनायकस्य । सत्येन हीना रजसापि युक्ता गच्छंति ते नाकमनंतपुण्याः

ye bhaktimaṁto madhusūdanasya nārāyaṇasyākhilanāyakasya satyena hīnā rajasāpi yuktā gacchaṁti te nākamanaṁtapuṇyāḥ

जो सर्वनायक नारायण, मधुसूदन के भक्त हैं, वे सत्य से रहित होकर भी रज-गुण से युक्त होने पर भी अनंत पुण्य वाले होकर स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 116 (padma.5.96.116)

वितस्तां यमुनां सीतां पुण्यां गोदावरीं नदीम् । सेवंते ये शुभाचाराः स्नानदानपरायणाः

vitastāṁ yamunāṁ sītāṁ puṇyāṁ godāvarīṁ nadīm sevaṁte ye śubhācārāḥ snānadānaparāyaṇāḥ

जो शुभ आचरण वाले, स्नान-दान में तत्पर लोग वितस्ता, यमुना, सीता और पुण्य गोदावरी नदी की सेवा करते हैं —

श्लोक 117 (padma.5.96.117)

न ते पश्यंति पंथानं नरकस्य कदाचन । ये नर्मदायामिह शर्मदायां मज्जंति तुष्यंत्यपि दर्शनेन

na te paśyaṁti paṁthānaṁ narakasya kadācana ye narmadāyāmiha śarmadāyāṁ majjaṁti tuṣyaṁtyapi darśanena

वे कभी भी नरक का मार्ग नहीं देखते। जो यहाँ कल्याणदायिनी नर्मदा में डूबते हैं, वे दर्शनमात्र से भी संतुष्ट हो जाते हैं —

श्लोक 118 (padma.5.96.118)

विधूय पापानि महेशलोकं गच्छंति ते तत्र चिरं रमंते

vidhūya pāpāni maheśalokaṁ gacchaṁti te tatra ciraṁ ramaṁte

पापों को धोकर वे महेश के लोक को जाते हैं और वहाँ दीर्घकाल तक रमण करते हैं।

श्लोक 119 (padma.5.96.119)

स्नाताश्चर्मनदी तीरे त्रिरात्रं नियता नराः । व्यासाश्रमे विशेषेण ते नरा नाकिनः स्मृताः

snātāścarmanadī tīre trirātraṁ niyatā narāḥ vyāsāśrame viśeṣeṇa te narā nākinaḥ smṛtāḥ

जो मनुष्य चर्मण्वती नदी के तट पर तीन रात्रि संयमपूर्वक स्नान करते हैं, विशेषतः व्यास के आश्रम में, वे मनुष्य स्वर्गवासी माने जाते हैं।

श्लोक 120 (padma.5.96.120)

गंगाजले प्रयागे च केदारे पुष्करे तथा । व्यासाश्रमे प्रभासे च मृतास्ते विष्णुगामिनः

gaṁgājale prayāge ca kedāre puṣkare tathā vyāsāśrame prabhāse ca mṛtāste viṣṇugāminaḥ

गंगाजल में, प्रयाग में, केदार में, पुष्कर में, व्यास के आश्रम में और प्रभास में मरने वाले विष्णुलोकगामी होते हैं।

श्लोक 121 (padma.5.96.121)

द्वारवत्यां कुरुक्षेत्रे योगाभ्यासेन वा मृताः । हरिरित्यक्षरं वक्त्रे येषां ते न पुनर्भवाः

dvāravatyāṁ kurukṣetre yogābhyāsena vā mṛtāḥ harirityakṣaraṁ vaktre yeṣāṁ te na punarbhavāḥ

द्वारका में, कुरुक्षेत्र में, या योगाभ्यास द्वारा मरने वाले, जिनके मुख में 'हरि' यह अक्षर हो, उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 122 (padma.5.96.122)

त्रिरात्रमपि ये विप्र द्वारवत्यां पुरि स्थिताः । मज्जंति गोमती तीरे धन्यास्ते केशवप्रियाः

trirātramapi ye vipra dvāravatyāṁ puri sthitāḥ majjaṁti gomatī tīre dhanyāste keśavapriyāḥ

हे विप्र! द्वारका नगरी में तीन रात्रि रहकर जो गोमती नदी के तट पर स्नान करते हैं, वे धन्य केशव-प्रिय हैं।

श्लोक 123 (padma.5.96.123)

नरनारायणावासे त्रिरात्रं ये समाश्रिताः । मर्त्यलोके च नंदायां धन्यास्ते केशवप्रियाः

naranārāyaṇāvāse trirātraṁ ye samāśritāḥ martyaloke ca naṁdāyāṁ dhanyāste keśavapriyāḥ

नर-नारायण के आश्रम में जो तीन रात्रि आश्रय लेते हैं, तथा मृत्युलोक में नंदा नदी में भी — वे धन्य केशव-प्रिय हैं।

श्लोक 124 (padma.5.96.124)

षण्मासमुषिता विप्र पुरुषोत्तमसंनिधौ । ते नूनमच्युतात्मानो दृष्ट्वा स्युरघहारिणः

ṣaṇmāsamuṣitā vipra puruṣottamasaṁnidhau te nūnamacyutātmāno dṛṣṭvā syuraghahāriṇaḥ

हे विप्र! छह मास पुरुषोत्तम-क्षेत्र के समीप रहने वाले निश्चय ही अच्युत-स्वरूप होकर, दर्शनमात्र से पापहारी बन जाते हैं।

श्लोक 125 (padma.5.96.125)

अनेक जन्मार्जितपुण्यतोये मज्जंति तोये मणिकर्णिकायाः । नमंति विश्वेशमवाप्यकाशीं ते वै मयापीह भवंति वंद्याः

aneka janmārjitapuṇyatoye majjaṁti toye maṇikarṇikāyāḥ namaṁti viśveśamavāpyakāśīṁ te vai mayāpīha bhavaṁti vaṁdyāḥ

अनेक जन्मों में अर्जित पुण्य से युक्त जो मणिकर्णिका के जल में डूबते हैं, काशी प्राप्त करके विश्वेश को नमन करते हैं, वे मेरे लिए भी यहाँ वंदनीय हो जाते हैं।

श्लोक 126 (padma.5.96.126)

पूजयित्वा हरिं ये तु भूमौ दर्भ तिलैः सह । तिलान्विकीर्य लोहं च दत्वा धेनुं पयस्विनीम्

pūjayitvā hariṁ ye tu bhūmau darbha tilaiḥ saha tilānvikīrya lohaṁ ca datvā dhenuṁ payasvinīm

जो भूमि पर कुश और तिल सहित हरि की पूजा करके, तिल बिखेरकर, लोहा और दूध देने वाली गाय दान करके —

श्लोक 127 (padma.5.96.127)

ये मृता विधिवद्विप्र ते नराः स्वर्गगामिनः । उत्पाद्य पुत्रान्संस्थाप्य पितृपैतामहे पदे

ye mṛtā vidhivadvipra te narāḥ svargagāminaḥ utpādya putrānsaṁsthāpya pitṛpaitāmahe pade

हे विप्र! जो इस प्रकार विधिपूर्वक मरते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। पुत्रों को उत्पन्न करके पितृ-पितामह के पद पर स्थापित करके —

श्लोक 128 (padma.5.96.128)

निर्ममा निरहंकारा ये मृतास्तेऽपि नाकिनः । स्तैन्यान्निवृत्ताः सततं संतुष्टाः स्वधनेन च

nirmamā nirahaṁkārā ye mṛtāste'pi nākinaḥ stainyānnivṛttāḥ satataṁ saṁtuṣṭāḥ svadhanena ca

जो ममता और अहंकार से रहित होकर मरते हैं, वे भी स्वर्गवासी होते हैं। जो सदा चोरी से दूर रहकर, अपने ही धन से संतुष्ट —

श्लोक 129 (padma.5.96.129)

स्वभाग्येनोपजीवंति ते नराः स्वर्गगामिनः । श्लक्ष्णां वाणीं निराबाधां मधुरोपाय वर्जिताम्

svabhāgyenopajīvaṁti te narāḥ svargagāminaḥ ślakṣṇāṁ vāṇīṁ nirābādhāṁ madhuropāya varjitām

अपने भाग्य के अनुसार जीवन-यापन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। जो मधुर, अबाधक और सरल वाणी से —

श्लोक 130 (padma.5.96.130)

स्वागतेनाभिभाषंते ते नराः स्वर्गगामिनः । शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये

svāgatenābhibhāṣaṁte te narāḥ svargagāminaḥ śubhānāmaśubhānāṁ ca karmaṇāṁ phalasaṁcaye

अतिथि का स्वागत करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। शुभ और अशुभ कर्मों के फल-संचय में —

श्लोक 131 (padma.5.96.131)

विपाकज्ञाश्च ये विप्र ते नराः स्वर्गगामिनः । धनधर्मप्रवृत्तानां धर्ममार्गानुयायिनाम्

vipākajñāśca ye vipra te narāḥ svargagāminaḥ dhanadharmapravṛttānāṁ dharmamārgānuyāyinām

हे विप्र! जो उनके परिपाक को जानते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी हैं। धन और धर्म में प्रवृत्त, धर्म-मार्ग के अनुयायियों को —

श्लोक 132 (padma.5.96.132)

प्रोत्साहं वर्धयंते ये मोदंते दिवि ते नराः । हेमंते वह्निदो यश्च तथा ग्रीष्मे जलप्रदः

protsāhaṁ vardhayaṁte ye modaṁte divi te narāḥ hemaṁte vahnido yaśca tathā grīṣme jalapradaḥ

जो प्रोत्साहन देकर उनका उत्साह बढ़ाते हैं, वे स्वर्ग में आनंदित होते हैं। हेमंत में जो अग्नि (उष्णता का साधन) देता है, ग्रीष्म में जो जल देता है —

श्लोक 133 (padma.5.96.133)

वर्षा स्वाश्रमदाता च स स्वर्गे मोदते चिरम् । पुण्यकालेषु सर्वेषु नित्य नैमित्तिकादिषु

varṣā svāśramadātā ca sa svarge modate ciram puṇyakāleṣu sarveṣu nitya naimittikādiṣu

वर्षा में जो अपने घर में आश्रय देता है, वह स्वर्ग में दीर्घकाल तक आनंदित रहता है। सभी पुण्यकालों में — नित्य, नैमित्तिक आदि में —

श्लोक 134 (padma.5.96.134)

भक्त्या यः कुरुते श्राद्धं स नूनं सुरलोकभाक्

bhaktyā yaḥ kurute śrāddhaṁ sa nūnaṁ suralokabhāk

जो भक्तिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह निश्चय ही देवलोक का भागी बनता है।

श्लोक 135 (padma.5.96.135)

दानं दरिद्रस्य विभोः क्षमित्वं यूनां तपो ज्ञानवतां च मौनम् । इच्छानिवृत्तिश्च सुखोचितानां दया च भूतेषु दिवं नयंति

dānaṁ daridrasya vibhoḥ kṣamitvaṁ yūnāṁ tapo jñānavatāṁ ca maunam icchānivṛttiśca sukhocitānāṁ dayā ca bhūteṣu divaṁ nayaṁti

संपन्न का दरिद्र को दान, युवाओं की क्षमाशीलता, ज्ञानवानों का तप और मौन, सुखयोग्यों की इच्छा-निवृत्ति, और प्राणियों पर दया — ये सब स्वर्ग की ओर ले जाते हैं।

श्लोक 136 (padma.5.96.136)

द्विविधः कर्मसंबंधः पापपुण्यसमुद्भवः । सत्यमेव समाश्रित्य क्रियते ह्यत्र निर्णयः

dvividhaḥ karmasaṁbaṁdhaḥ pāpapuṇyasamudbhavaḥ satyameva samāśritya kriyate hyatra nirṇayaḥ

पाप और पुण्य से उत्पन्न कर्म-संबंध दो प्रकार का है; यहाँ सत्य का ही आश्रय लेकर निर्णय किया जाता है।

श्लोक 137 (padma.5.96.137)

तपोध्यानसमायुक्तं तारणाय भवांबुधेः । पापं तु पतनायोक्तं सत्यमेव न संशयः

tapodhyānasamāyuktaṁ tāraṇāya bhavāṁbudheḥ pāpaṁ tu patanāyoktaṁ satyameva na saṁśayaḥ

तप और ध्यान से युक्त सत्य ही इस भवसागर से पार कराने वाला कहा गया है; पाप तो, संदेह नहीं, पतन की ओर ले जाने वाला कहा गया है।

श्लोक 138 (padma.5.96.138)

बलेन परिचारेण शौर्येणाभियुतस्य च । पुण्यहीनस्य वै पुंसस्तद्बलादिव लीयते

balena paricāreṇa śauryeṇābhiyutasya ca puṇyahīnasya vai puṁsastadbalādiva līyate

बल, सेवकों और शौर्य से युक्त होते हुए भी, जो पुरुष पुण्य से रहित है, वह उस बल आदि के साथ ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 139 (padma.5.96.139)

उन्नता गिरि दुर्गेषु वृक्षाः संति सुपुष्टकाः । पतंति वातवेगेन समूलास्तु घना अपि

unnatā giri durgeṣu vṛkṣāḥ saṁti supuṣṭakāḥ pataṁti vātavegena samūlāstu ghanā api

पर्वत के दुर्गम स्थानों पर ऊँचे, सुपुष्ट वृक्ष भी होते हैं, फिर भी बड़े-बड़े घने वृक्ष भी वायु के वेग से जड़ सहित गिर जाते हैं।

श्लोक 140 (padma.5.96.140)

सत्यधर्मविहीनास्ते तथा यांति यमालयम् । सामान्यं सर्वजंतूंनां बलं धर्मस्तु केवलः

satyadharmavihīnāste tathā yāṁti yamālayam sāmānyaṁ sarvajaṁtūṁnāṁ balaṁ dharmastu kevalaḥ

सत्य और धर्म से रहित लोग भी वैसे ही यमलोक जाते हैं। सभी प्राणियों का बल सामान्यतः धर्म ही है, और कुछ नहीं —

श्लोक 141 (padma.5.96.141)

येन संतरते जंतुरिहलोके परत्र च । मया सर्वमिदं सम्यक्स्वर्गमार्ग प्रदायकम्

yena saṁtarate jaṁturihaloke paratra ca mayā sarvamidaṁ samyaksvargamārga pradāyakam

जिससे प्राणी इस लोक में और परलोक में भी पार होता है। मैंने यह सब भलीभाँति, स्वर्ग का मार्ग बताने वाला —

श्लोक 142 (padma.5.96.142)

समासेन समाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

samāsena samākhyātaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

संक्षेप में बता दिया है। और क्या सुनना चाहते हो?

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