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उत्तर खण्ड · अध्याय 10

कैलास से राहु का पुनरागमन

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (padma.6.10.1)

नारद उवाच ।अत्रोत्तरे मया गत्वा कथितं सिंधुसूनवे । त्वां हंतु सर्ववीरेश प्रतिज्ञा शंभुना कृता । श्रुत्वेत्थं मद्वचो राजंस्ततः पप्रच्छ सोऽसुरः

nārada uvāca atrottare mayā gatvā kathitaṁ siṁdhusūnave tvāṁ haṁtu sarvavīreśa pratijñā śaṁbhunā kṛtā śrutvetthaṁ madvaco rājaṁstataḥ papraccha so'suraḥ

नारद ने कहा — इसके उत्तर में मैंने जाकर सागर-पुत्र से कहा — 'हे समस्त वीरों के स्वामी! शंभु ने तुम्हें मारने की प्रतिज्ञा की है।' हे राजन्! मेरी यह बात सुनकर उस असुर ने तब पूछा —

श्लोक 2 (padma.6.10.2)

जालंधर उवाच । किमस्ति शूलिनो गेहे रत्नजातं महामुने । तन्ममाचक्ष्व सकलं नास्ति युद्धं निरामिषम्

jālaṁdhara uvāca kimasti śūlino gehe ratnajātaṁ mahāmune tanmamācakṣva sakalaṁ nāsti yuddhaṁ nirāmiṣam

जालंधर ने कहा — 'हे महामुने! त्रिशूलधारी के घर में रत्न-समूह क्या है? वह सब मुझे बताइए — बिना किसी सार-तत्त्व के युद्ध नहीं होता।'

श्लोक 3 (padma.6.10.3)

नारद उवाच । भूतिर्गात्रे वृषो जीर्णः फणिनोंऽगे गले विषम् । भिक्षापात्रं करे पुत्रौ गजानन षडाननौ

nārada uvāca bhūtirgātre vṛṣo jīrṇaḥ phaṇinoṁ'ge gale viṣam bhikṣāpātraṁ kare putrau gajānana ṣaḍānanau

नारद ने कहा — 'शरीर पर भस्म, वाहन के रूप में बूढ़ा बैल, अंगों पर सर्प, गले में विष, हाथ में भिक्षा-पात्र, गजमुख और षड्मुख दो पुत्र,

श्लोक 4 (padma.6.10.4)

इत्यादि विभवस्तस्य यदन्यत्तन्निबोध मे । तनया गिरिराजस्य विशाला ह्युन्नतस्तनी

ityādi vibhavastasya yadanyattannibodha me tanayā girirājasya viśālā hyunnatastanī

इत्यादि ही उसका ऐश्वर्य है; पर मुझसे कुछ और भी सुनो — गिरिराज की पुत्री, विशाल नितंबों और उन्नत वक्षस्थल वाली,

श्लोक 5 (padma.6.10.5)

दग्धस्मरोऽपि भगवान्यस्यारूपेण मोहितः । महेशो यद्विनोदाय कुरुते नित्य कौतुकम्

dagdhasmaro'pi bhagavānyasyārūpeṇa mohitaḥ maheśo yadvinodāya kurute nitya kautukam

जिसके रूप से कामदेव को भस्म करने वाले भगवान भी मोहित हो गए; जिसके मनोरंजन के लिए महेश नित्य ही कौतुक करते हैं,

श्लोक 6 (padma.6.10.6)

नृत्यन्गायंश्च ताञ्छंभुः स्वयं भवति हासकः । सा पार्वतीति विख्याता सौंदर्यावधि दैवतम्

nṛtyangāyaṁśca tāñchaṁbhuḥ svayaṁ bhavati hāsakaḥ sā pārvatīti vikhyātā sauṁdaryāvadhi daivatam

उसके लिए नाचते-गाते हुए शंभु स्वयं विदूषक बन जाते हैं। वही पार्वती नाम से विख्यात, सौंदर्य की चरम सीमा रूपी देवी है।

श्लोक 7 (padma.6.10.7)

वृंदा वरांगना राजन्निमाश्चाप्सरसः शुभाः । न चाप्नुवंति पार्वत्याः षोडशीमपि तां कलाम्

vṛṁdā varāṁganā rājannimāścāpsarasaḥ śubhāḥ na cāpnuvaṁti pārvatyāḥ ṣoḍaśīmapi tāṁ kalām

हे राजन्! वृंदा जैसी उत्तम स्त्री और ये शुभ अप्सराएँ भी पार्वती की उस कला का सोलहवाँ अंश भी नहीं पातीं।'

श्लोक 8 (padma.6.10.8)

इत्युक्त्वाहं महीपाल जालंधरममर्षणम् । पश्यतां सर्वदैत्यानामंतर्धानं गतः क्षणात्

ityuktvāhaṁ mahīpāla jālaṁdharamamarṣaṇam paśyatāṁ sarvadaityānāmaṁtardhānaṁ gataḥ kṣaṇāt

हे राजन्! यह कहकर, सभी दैत्यों के देखते-देखते, मैं क्रोधित जालंधर के सामने से क्षणभर में अंतर्धान हो गया।

श्लोक 9 (padma.6.10.9)

अथ स प्रेषयद्दूतं सिंधुजः सिंहिकासुतम् । क्षणेनासाद्य कैलासं देवावासमपश्यत

atha sa preṣayaddūtaṁ siṁdhujaḥ siṁhikāsutam kṣaṇenāsādya kailāsaṁ devāvāsamapaśyata

तब सागर-पुत्र ने सिंहिका-पुत्र (राहु) को दूत बनाकर भेजा; उसने क्षणभर में कैलास पहुँचकर देवताओं के धाम को देखा।

श्लोक 10 (padma.6.10.10)

अत्रांतरे हरिर्भीममापृच्छ्य तु तदा हरम् । जगामालक्षितस्तूर्णं क्षीराब्धिं भेदशंकया

atrāṁtare harirbhīmamāpṛcchya tu tadā haram jagāmālakṣitastūrṇaṁ kṣīrābdhiṁ bhedaśaṁkayā

इसी बीच भयंकर हर से आज्ञा लेकर हरि किसी विवाद की आशंका से अलक्षित होकर शीघ्र ही क्षीरसागर चले गए।

श्लोक 11 (padma.6.10.11)

ददर्श राहुर्भवनं शंकरस्यातिदीप्तिमत् । आत्मानमात्मना वीक्ष्य किमित्याह सुविस्मितः

dadarśa rāhurbhavanaṁ śaṁkarasyātidīptimat ātmānamātmanā vīkṣya kimityāha suvismitaḥ

राहु ने शंकर के अत्यंत तेजोमय भवन को देखा; उसमें अपना ही प्रतिबिंब देखकर वह अत्यंत विस्मित होकर 'यह क्या है' कहने लगा।

श्लोक 12 (padma.6.10.12)

प्रवेष्टुकामो बलिभिर्द्वारि द्वास्थैर्निरोधितः । यत्नवान्स निषिद्धोऽपि तदा ते प्रोद्यतायुधाः

praveṣṭukāmo balibhirdvāri dvāsthairnirodhitaḥ yatnavānsa niṣiddho'pi tadā te prodyatāyudhāḥ

प्रवेश करना चाहते हुए उसे बलवान द्वारपालों ने द्वार पर रोक दिया; प्रयत्न करने पर भी रोके जाने पर, वे शस्त्र उठाए खड़े थे।

श्लोक 13 (padma.6.10.13)

तान्निवार्य गणान्नंदी व्याजहार विधुंतुदम् । कस्त्वं कस्मादिहायातः किं कार्यं तव बर्बर । ब्रूहि कार्यं गणा यावत्त्वां न हन्युर्भयावहाः

tānnivārya gaṇānnaṁdī vyājahāra vidhuṁtudam kastvaṁ kasmādihāyātaḥ kiṁ kāryaṁ tava barbara brūhi kāryaṁ gaṇā yāvattvāṁ na hanyurbhayāvahāḥ

उन गणों को रोककर नंदी ने विधुंतुद (राहु) से कहा — 'तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, क्या काम है, हे असभ्य? काम बताओ, इससे पहले कि ये भयानक गण तुम्हें मार डालें।'

श्लोक 14 (padma.6.10.14)

राहुरुवाच । दूतो जालंधरस्याहं त्वं मां शर्वांतिके नय । न वाच्यमंतरे द्वास्थ महाराजप्रयोजनम्

rāhuruvāca dūto jālaṁdharasyāhaṁ tvaṁ māṁ śarvāṁtike naya na vācyamaṁtare dvāstha mahārājaprayojanam

राहु ने कहा — 'मैं जालंधर का दूत हूँ; मुझे शर्व के समीप ले चलो। हे द्वारपाल! महाराज का प्रयोजन द्वार पर नहीं कहा जाता।'

श्लोक 15 (padma.6.10.15)

नंदी दूतोक्तमाकर्ण्य नीललोहितमाययौ । दंडवत्प्रणिपत्याग्रे स्थित्वा शंकरमब्रवीत्

naṁdī dūtoktamākarṇya nīlalohitamāyayau daṁḍavatpraṇipatyāgre sthitvā śaṁkaramabravīt

दूत की यह बात सुनकर नंदी नीललोहित (शिव) के पास गया, और दंड की भाँति प्रणाम करके उनके सामने खड़े होकर शंकर से कहा —

श्लोक 16 (padma.6.10.16)

सैंहिकेयो महाराज द्वारे तिष्ठति कार्यतः । स प्रयात्वथवायातु भवानाज्ञप्तुमर्हति

saiṁhikeyo mahārāja dvāre tiṣṭhati kāryataḥ sa prayātvathavāyātu bhavānājñaptumarhati

'हे महाराज! सिंहिका-पुत्र किसी काम से द्वार पर खड़ा है; वह जाए या भीतर आए, इसकी आज्ञा आप दें।'

श्लोक 17 (padma.6.10.17)

नंदिनोक्तमथाकर्ण्य त्वरन्निव महेश्वरः । सुप्तामंतःपुराद्देवीं प्रस्थाप्य च सखीवृताम्

naṁdinoktamathākarṇya tvaranniva maheśvaraḥ suptāmaṁtaḥpurāddevīṁ prasthāpya ca sakhīvṛtām

नंदी की यह बात सुनकर महेश्वर ने मानो जल्दी में, सोई हुई देवी को सखियों सहित अंतःपुर से भेज दिया,

श्लोक 18 (padma.6.10.18)

पश्चाद्वास्थं जगादाथ नंदिन्दूतं प्रवेशय । ततो हस्ते प्रगृह्यामुं दूतं नंदी महाबलः

paścādvāsthaṁ jagādātha naṁdindūtaṁ praveśaya tato haste pragṛhyāmuṁ dūtaṁ naṁdī mahābalaḥ

और फिर द्वारपाल से कहा — 'हे नंदी! दूत को प्रवेश कराओ।' तब महाबली नंदी ने उस दूत को हाथ से पकड़कर,

श्लोक 19 (padma.6.10.19)

आनयामास देवानां मध्ये शंभुमदर्शयत् । तं ददर्श तदा राहुर्जटिलं नीलमात्मनि

ānayāmāsa devānāṁ madhye śaṁbhumadarśayat taṁ dadarśa tadā rāhurjaṭilaṁ nīlamātmani

देवताओं के बीच ले जाकर उसे शंभु के दर्शन कराए। राहु ने तब उन्हें देखा — जटाधारी, अपने भीतर नीलकंठ,

श्लोक 20 (padma.6.10.20)

पंचवक्त्रं दशभुजं नागयज्ञोपवीतिनम् । देवीविरहितं मूर्ध्नि चंद्रलेखाविभूषितम्

paṁcavaktraṁ daśabhujaṁ nāgayajñopavītinam devīvirahitaṁ mūrdhni caṁdralekhāvibhūṣitam

पाँच मुखों, दस भुजाओं वाले, नाग को यज्ञोपवीत की तरह धारण किए, देवी से रहित, सिर पर चंद्र-कला से सुशोभित,

श्लोक 21 (padma.6.10.21)

उच्छ्वासोच्छ्वासनिर्मुंचत्पृदाकुगणसेवितम् । सर्वदेवगणोपेतं सेवितं गणकोटिभिः

ucchvāsocchvāsanirmuṁcatpṛdākugaṇasevitam sarvadevagaṇopetaṁ sevitaṁ gaṇakoṭibhiḥ

श्वास-प्रश्वास से छोड़े गए सर्प-समूहों से सेवित, सभी देवगणों से युक्त, करोड़ों गणों से सेवित।

श्लोक 22 (padma.6.10.22)

प्राप्तं ज्ञात्वा ततो दूतं शंभुरालोक्य चाग्रतः । प्राह ब्रूहि तदा राहुर्वक्तुं समुपचक्रमे

prāptaṁ jñātvā tato dūtaṁ śaṁbhurālokya cāgrataḥ prāha brūhi tadā rāhurvaktuṁ samupacakrame

तब दूत के आने की बात जानकर शंभु ने उसकी ओर देखकर कहा — 'कहो' — तब राहु कहने लगा।

श्लोक 23 (padma.6.10.23)

राहुरुवाच । देव जालंधरेणाहं प्रेषितस्तव सन्निधौ । तस्य शिववचः श्रुत्वा मन्मुखेन द्रुतं कुरु

rāhuruvāca deva jālaṁdhareṇāhaṁ preṣitastava sannidhau tasya śivavacaḥ śrutvā manmukhena drutaṁ kuru

राहु ने कहा — 'हे देव! मैं जालंधर द्वारा आपके पास भेजा गया हूँ; मेरे मुख से शिव का वह वचन सुनकर शीघ्र उसका पालन कीजिए —

श्लोक 24 (padma.6.10.24)

गिरिशत्वं तपोनिष्ठो निर्गुणो धर्मवर्जितः । तव नास्ति पिता माता वसु गोत्रादि वर्जितः

giriśatvaṁ taponiṣṭho nirguṇo dharmavarjitaḥ tava nāsti pitā mātā vasu gotrādi varjitaḥ

हे गिरीश! तप में लगे, गुणहीन, धर्मरहित — आपका कोई पिता-माता नहीं, धन-गोत्र आदि से भी रहित हो।

श्लोक 25 (padma.6.10.25)

जालंधरो महाबाहुर्भुंक्तेऽसौ भुवनत्रयम् । तस्यैव वश्यस्त्वमपि ततश्चोक्तं समाचर

jālaṁdharo mahābāhurbhuṁkte'sau bhuvanatrayam tasyaiva vaśyastvamapi tataścoktaṁ samācara

महाबाहु जालंधर तीनों लोकों का भोग करता है; आप भी उसी के वश्य हैं, अतः जो कहा जाए वही करें।

श्लोक 26 (padma.6.10.26)

पुराणपुरुषः कामी वृषारूढः कथं भवान् । एवं वदति संप्राप्तौ सुतौ स्कंदविनायकौ

purāṇapuruṣaḥ kāmī vṛṣārūḍhaḥ kathaṁ bhavān evaṁ vadati saṁprāptau sutau skaṁdavināyakau

पुराण-पुरुष होकर भी आप कामी होकर बैल पर सवार क्यों हैं?' — इस प्रकार कहते हुए, स्कंद और विनायक — उसके दोनों पुत्र वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 27 (padma.6.10.27)

तस्मिन्काले देवदेवो यतवागंगमर्दनम् । चकार च करैर्व्यस्तैर्वासुकिर्भूतलेऽपतत्

tasminkāle devadevo yatavāgaṁgamardanam cakāra ca karairvyastairvāsukirbhūtale'patat

उसी क्षण देवाधिदेव ने वाणी को रोककर, अपने अंगों को हिलाया, और उनके फैले हुए हाथों से वासुकि पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 28 (padma.6.10.28)

हेरंबवाहनस्याखोः पुच्छं ग्रस्तमथाहिना । स्वपत्रं ग्रस्तमालोक्य मुंचमुंचेत्युवाच ह

heraṁbavāhanasyākhoḥ pucchaṁ grastamathāhinā svapatraṁ grastamālokya muṁcamuṁcetyuvāca ha

हेरंब (गणेश) के वाहन चूहे की पूँछ सर्प द्वारा पकड़ ली गई; अपने वाहन को पकड़ा हुआ देखकर उन्होंने 'छोड़ो, छोड़ो' कहा।

श्लोक 29 (padma.6.10.29)

अत्रांतरे स्कंदवाहं क्षुब्धं वीक्ष्य महास्वरम् । तद्भयाद्वासुकिर्ग्रस्तमाखुपुच्छमथोद्गिरत्

atrāṁtare skaṁdavāhaṁ kṣubdhaṁ vīkṣya mahāsvaram tadbhayādvāsukirgrastamākhupucchamathodgirat

इसी बीच स्कंद के वाहन (मयूर) को क्षुब्ध और ऊँची आवाज़ में देखकर, उसके भय से वासुकि ने पकड़ी हुई चूहे की पूँछ को छोड़ दिया।

श्लोक 30 (padma.6.10.30)

अथारुह्य हरस्यांगं गलमावेष्ट्य संस्थितः । तस्य निश्वासपवनैरथ जातो हुताशनः

athāruhya harasyāṁgaṁ galamāveṣṭya saṁsthitaḥ tasya niśvāsapavanairatha jāto hutāśanaḥ

फिर वह हर के शरीर पर चढ़कर उनके गले को लपेटकर बैठ गया; उसकी श्वास की वायु से तब अग्नि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 31 (padma.6.10.31)

तस्योष्मणा चंद्र लेखा जटाजूटाटवी स्थिता । सार्द्रतां तु तदा सायात्प्लावितं तद्वपुर्यथा

tasyoṣmaṇā caṁdra lekhā jaṭājūṭāṭavī sthitā sārdratāṁ tu tadā sāyātplāvitaṁ tadvapuryathā

उसकी गर्मी से जटाजूट के वन में स्थित चंद्र-कला पिघलने लगी, मानो उनका पूरा शरीर उस पिघले जल से भीग गया हो।

श्लोक 32 (padma.6.10.32)

तस्याह्यमृतधाराभिर्ब्रह्ममस्तकमालिका । हरमौलिकपालानामभूत्संजीविता तदा

tasyāhyamṛtadhārābhirbrahmamastakamālikā haramaulikapālānāmabhūtsaṁjīvitā tadā

उसी की अमृत-धाराओं से हर के मस्तक की खोपड़ियों की माला तब पुनः जीवित हो उठी।

श्लोक 33 (padma.6.10.33)

पपाठ पूर्वमभ्यस्तं सर्वयोगश्रुतिक्रमम् । श्रुत्वा परस्पराधीतं विवदंति शिरांस्यथ

papāṭha pūrvamabhyastaṁ sarvayogaśrutikramam śrutvā parasparādhītaṁ vivadaṁti śirāṁsyatha

प्रत्येक ने पहले सीखे हुए समस्त योग-वेद-क्रम का पाठ किया; एक-दूसरे के सीखे हुए को सुनकर वे सिर आपस में विवाद करने लगे —

श्लोक 34 (padma.6.10.34)

अहमादिरहं पूर्वमहमेव परात्परः । अहं स्रष्टा अहं पातेत्युत्सुकानि परस्परम्

ahamādirahaṁ pūrvamahameva parātparaḥ ahaṁ sraṣṭā ahaṁ pātetyutsukāni parasparam

'मैं ही आदि हूँ, मैं ही पहले था, मैं ही परम से भी परे हूँ; मैं ही सृष्टिकर्ता हूँ, मैं ही पालनकर्ता हूँ' — इस प्रकार एक-दूसरे से होड़ करते हुए,

श्लोक 35 (padma.6.10.35)

शोचंत्येतानि नो दत्तं नो भुक्तं न हुतं मया । लोभग्रस्तेन मनसा नो वित्तं ब्रह्मणेऽपि तम्

śocaṁtyetāni no dattaṁ no bhuktaṁ na hutaṁ mayā lobhagrastena manasā no vittaṁ brahmaṇe'pi tam

वे शोक करने लगे — 'मैंने न कुछ दान किया, न भोग किया, न हवन किया; लोभग्रस्त मन से मैंने ब्राह्मण को भी धन नहीं दिया।'

श्लोक 36 (padma.6.10.36)

अथेश्वरजटाजूटादाविरासीद्गणो महान् । त्र्याननस्त्रिचरणस्त्रिपुच्छः सप्तहस्तवान्

atheśvarajaṭājūṭādāvirāsīdgaṇo mahān tryānanastricaraṇastripucchaḥ saptahastavān

तब ईश्वर की जटाओं से एक महान गण प्रकट हुआ — तीन मुख, तीन पैर, तीन पूँछ और सात भुजाओं वाला,

श्लोक 37 (padma.6.10.37)

स च कीर्तिमुखो नाम पिंगलो जटिलो महान् । तं दृष्ट्वा सा कपालाली भयात्तस्थौ मृतेव सा

sa ca kīrtimukho nāma piṁgalo jaṭilo mahān taṁ dṛṣṭvā sā kapālālī bhayāttasthau mṛteva sā

जिसका नाम कीर्तिमुख था, पिंगल वर्ण, विशाल, जटाधारी; उसे देखकर वह खोपड़ियों की पंक्ति भय से मानो मृत होकर स्तब्ध खड़ी हो गई।

श्लोक 38 (padma.6.10.38)

पुरतः प्राह सगणस्ततः कीर्तिमुखः प्रभुम् । प्रणिपत्य शिवं देवमत्यर्थं क्षुधितः प्रभो

purataḥ prāha sagaṇastataḥ kīrtimukhaḥ prabhum praṇipatya śivaṁ devamatyarthaṁ kṣudhitaḥ prabho

फिर अपने गण-समूह सहित कीर्तिमुख ने आगे आकर देव शिव को प्रणाम करके प्रभु से कहा — 'हे प्रभो! मैं अत्यंत क्षुधित हूँ —

श्लोक 39 (padma.6.10.39)

तदोक्तः शंकरेणाहो भक्षय त्वं रणे हतान् । क्षणं विचार्य स गणः क्वाप्यदृष्ट्वा रणं तदा

tadoktaḥ śaṁkareṇāho bhakṣaya tvaṁ raṇe hatān kṣaṇaṁ vicārya sa gaṇaḥ kvāpyadṛṣṭvā raṇaṁ tadā

तब शंकर ने उससे कहा — 'अरे, युद्ध में मारे गए इन्हें खा जाओ!' क्षणभर विचार कर उस गण ने कहीं भी युद्ध न देखकर,

श्लोक 40 (padma.6.10.40)

ब्रह्माणं भक्षितुं प्राप्तः शंकरेण निवारितः । ततः कीर्तिमुखेनाथ स्वांगं सर्वं च भक्षितम्

brahmāṇaṁ bhakṣituṁ prāptaḥ śaṁkareṇa nivāritaḥ tataḥ kīrtimukhenātha svāṁgaṁ sarvaṁ ca bhakṣitam

ब्रह्मा (उन विवादी खोपड़ियों) को खाने के लिए बढ़ा, पर शंकर ने उसे रोक दिया; तब कीर्तिमुख ने अपना ही समूचा शरीर खा डाला,

श्लोक 41 (padma.6.10.41)

बुभुक्षितेन चात्यंतं निषिद्धेन च सर्वतः । तत्साहसं तदा दृष्ट्वा भक्तिं कीर्त्तिमुखस्य च

bubhukṣitena cātyaṁtaṁ niṣiddhena ca sarvataḥ tatsāhasaṁ tadā dṛṣṭvā bhaktiṁ kīrttimukhasya ca

अत्यंत क्षुधित होते हुए भी सब ओर से रोके जाने पर। उस साहस और कीर्तिमुख की भक्ति को देखकर —

श्लोक 42 (padma.6.10.42)

तमुवाचेश्वरः प्रीतः प्रासादे तिष्ठ मे सदा । त्वच्चित्तरहितो यश्च भविष्यति ममालये

tamuvāceśvaraḥ prītaḥ prāsāde tiṣṭha me sadā tvaccittarahito yaśca bhaviṣyati mamālaye

प्रसन्न होकर ईश्वर ने उससे कहा — 'तुम सदा मेरे मंदिर के द्वार पर रहो; जो भी मेरे धाम में तुम्हारे प्रति भक्तिरहित होगा,

श्लोक 43 (padma.6.10.43)

स पतिष्यति शीघ्रं हीत्युक्तः सोंऽतर्हितोऽभवत् । शंभोर्मूध्नि तदा देवा ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः

sa patiṣyati śīghraṁ hītyuktaḥ soṁ'tarhito'bhavat śaṁbhormūdhni tadā devā vavṛṣuḥ puṣpavṛṣṭibhiḥ

वह शीघ्र ही पतित हो जाएगा — ऐसा ही हो।' यह कहकर वह अंतर्धान हो गया; तब देवताओं ने शंभु के मस्तक पर पुष्प-वर्षा की।

श्लोक 44 (padma.6.10.44)

एवमत्यद्भुतं दृष्ट्वा सभायां तु त्रिशूलिनः । स्वर्भानुरपि देवेशं पुनः प्रोवाच विस्मितः

evamatyadbhutaṁ dṛṣṭvā sabhāyāṁ tu triśūlinaḥ svarbhānurapi deveśaṁ punaḥ provāca vismitaḥ

त्रिशूलधारी की सभा में यह अत्यंत अद्भुत घटना देखकर स्वर्भानु (राहु) ने विस्मित होकर फिर से देवेश से कहा —

श्लोक 45 (padma.6.10.45)

स्पृशंति त्वां कथं भावं स्वाधीनं योगिनं बलात् । इंद्रियैः पूज्यसे त्वं हि प्राप्योऽयं विषयैः कथम्

spṛśaṁti tvāṁ kathaṁ bhāvaṁ svādhīnaṁ yoginaṁ balāt iṁdriyaiḥ pūjyase tvaṁ hi prāpyo'yaṁ viṣayaiḥ katham

'योगी होकर भी आपको ये भाव बलपूर्वक कैसे छूते हैं? आप इंद्रियों से पूजे जाते हैं, तो फिर विषयों से आपकी प्राप्ति कैसे हो?

श्लोक 46 (padma.6.10.46)

ब्राह्मादिलोकपालानां पूजां गृह्णासि सर्वतः । न त्वं पश्यसि कं देवं त्वं पूजयसि कंचन

brāhmādilokapālānāṁ pūjāṁ gṛhṇāsi sarvataḥ na tvaṁ paśyasi kaṁ devaṁ tvaṁ pūjayasi kaṁcana

आप ब्रह्मा आदि सभी लोकपालों की पूजा सब ओर से ग्रहण करते हैं — पर आप स्वयं किस देवता को देखते हैं, आप स्वयं किसकी पूजा करते हैं?

श्लोक 47 (padma.6.10.47)

ईश्वरोऽसि कथं लोके भिक्षाभोजी प्रतिष्ठितः । संगोपयसि योगीन्द्र गौरीं रम्यां प्रयच्छ मे

īśvaro'si kathaṁ loke bhikṣābhojī pratiṣṭhitaḥ saṁgopayasi yogīndra gaurīṁ ramyāṁ prayaccha me

भिक्षा से जीवन चलाने वाले आप संसार में 'ईश्वर' कैसे प्रतिष्ठित हैं? हे योगीश्वर! आप गौरी को छिपाकर रखते हैं — उस रमणीय गौरी को मुझे सौंप दीजिए।

श्लोक 48 (padma.6.10.48)

स्कंदलंबोदराभ्यां त्वं पुत्राभ्यां सहितोऽधुना । भिक्षापात्रं गृहीत्वा तु भ्रम नित्यं गृहेगृहे

skaṁdalaṁbodarābhyāṁ tvaṁ putrābhyāṁ sahito'dhunā bhikṣāpātraṁ gṛhītvā tu bhrama nityaṁ gṛhegṛhe

अब स्कंद और लंबोदर दोनों पुत्रों सहित भिक्षा-पात्र लेकर नित्य घर-घर भटकते रहो।'

श्लोक 49 (padma.6.10.49)

एवं बहुविधं तत्र राहुराहेश्वरं प्रति । भगवानपि तच्छ्रुत्वा नोत्तरं किंचिदब्रवीत्

evaṁ bahuvidhaṁ tatra rāhurāheśvaraṁ prati bhagavānapi tacchrutvā nottaraṁ kiṁcidabravīt

इस प्रकार राहु ने वहाँ देवेश के प्रति बहुत कुछ कहा; भगवान ने भी यह सब सुनकर कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 50 (padma.6.10.50)

अथेशं मौनिनं त्यक्त्वा राहुर्नंदिनमब्रवीत् । त्व मंत्री ह्यसि सेनानीर्विकटानन बिंबधृक्

atheśaṁ mauninaṁ tyaktvā rāhurnaṁdinamabravīt tva maṁtrī hyasi senānīrvikaṭānana biṁbadhṛk

तब चुप रहे ईश को छोड़कर राहु ने नंदी से कहा — 'तुम इनके मंत्री और सेनापति हो, विकराल मुख वाले, प्रतिमा धारण करने वाले —

श्लोक 51 (padma.6.10.51)

एवमाचरित भ्रष्टं त्वं शिक्षयितुमर्हसि । नोचेद्रोषेणेंद्र इव पतिष्यति रणे हतः

evamācarita bhraṣṭaṁ tvaṁ śikṣayitumarhasi nocedroṣeṇeṁdra iva patiṣyati raṇe hataḥ

इस प्रकार अनुचित आचरण करने वाले को तुम्हें ही सुधारना चाहिए। नहीं तो क्रोध से इंद्र की भाँति ये भी युद्ध में मारे जाकर गिरेंगे।'

श्लोक 52 (padma.6.10.52)

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य नंदी विज्ञाप्य चेश्वरम् । भ्रूसंज्ञयैव स तदा मतमाज्ञाय शूलिनः

ityākarṇya vacastasya naṁdī vijñāpya ceśvaram bhrūsaṁjñayaiva sa tadā matamājñāya śūlinaḥ

उसकी यह बात सुनकर नंदी ने ईश्वर को सूचित किया; तब त्रिशूलधारी के मत को उनकी भौंहों के संकेत से ही जानकर,

श्लोक 53 (padma.6.10.53)

संपूज्य प्रेषयामास राहुं नंदी गणाग्रणीः । अथ जालंधरं गत्वा कथयामास विस्तरात् । स्वर्भानुस्तस्य वृत्तांतं गौरीरूपं मनोहरम्

saṁpūjya preṣayāmāsa rāhuṁ naṁdī gaṇāgraṇīḥ atha jālaṁdharaṁ gatvā kathayāmāsa vistarāt svarbhānustasya vṛttāṁtaṁ gaurīrūpaṁ manoharam

गणों में अग्रणी नंदी ने राहु का सम्मान करके उसे विदा किया। फिर स्वर्भानु ने जालंधर के पास जाकर उसे यह पूरा वृत्तांत, और गौरी के मनोहर रूप का, विस्तार से वर्णन किया।

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