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उत्तर खण्ड · अध्याय 9

सर्वदेव-तेजोमय चक्र की उत्पत्ति

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (padma.6.9.1)

युधिष्ठिर उवाच ।इंद्रादिभिस्तदा देवैः किं कृतं द्विजसत्तम । जालंधरेण विजितैः स्वर्गराज्ये हृते सति

yudhiṣṭhira uvāca iṁdrādibhistadā devaiḥ kiṁ kṛtaṁ dvijasattama jālaṁdhareṇa vijitaiḥ svargarājye hṛte sati

युधिष्ठिर ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! जालंधर द्वारा स्वर्ग-राज्य हर लिए जाने पर, विजित इंद्र आदि देवताओं ने तब क्या किया?

श्लोक 2 (padma.6.9.2)

नारद उवाच । अथ त्यक्त्वा दिवं देवाः प्रापुस्ते दुर्दशां चिरम् । न पीयूषं नैव यज्ञाः ययुः स्थानं स्वयंभुवः

nārada uvāca atha tyaktvā divaṁ devāḥ prāpuste durdaśāṁ ciram na pīyūṣaṁ naiva yajñāḥ yayuḥ sthānaṁ svayaṁbhuvaḥ

नारद ने कहा — तब स्वर्ग खोकर देवता लंबे समय तक अत्यंत दुर्दशा में रहे; न उन्हें अमृत मिला, न यज्ञ, और वे स्वयंभू ब्रह्मा के धाम गए।

श्लोक 3 (padma.6.9.3)

ददृशुर्ब्राह्मभुवने ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । प्राणायामेन युंजानं मनः स्वं परमात्मनि

dadṛśurbrāhmabhuvane brahmāṇaṁ parameṣṭhinam prāṇāyāmena yuṁjānaṁ manaḥ svaṁ paramātmani

ब्रह्मलोक में उन्होंने परमेष्ठी ब्रह्मा को देखा, जो प्राणायाम द्वारा अपने मन को परमात्मा में जोड़े हुए थे।

श्लोक 4 (padma.6.9.4)

ते तुष्टुवुः सुराः सर्वे वाग्भिस्तथ्याभिरादृताः । ततः प्रसन्नो भगवान्किंकरोमीति चाब्रवीत्

te tuṣṭuvuḥ surāḥ sarve vāgbhistathyābhirādṛtāḥ tataḥ prasanno bhagavānkiṁkaromīti cābravīt

सभी देवताओं ने सच्चे वचनों से आदरपूर्वक उनकी स्तुति की; तब प्रसन्न होकर भगवान ने कहा — 'मैं क्या करूँ?'

श्लोक 5 (padma.6.9.5)

ततो निवेदयांचक्रुः ब्रह्मणे विबुधाः पुनः । जालंधरस्य सकलं तथा निजपराभवम्

tato nivedayāṁcakruḥ brahmaṇe vibudhāḥ punaḥ jālaṁdharasya sakalaṁ tathā nijaparābhavam

तब देवताओं ने ब्रह्मा को जालंधर का सारा वृत्तांत और अपनी पराजय की कथा सुनाई।

श्लोक 6 (padma.6.9.6)

क्षणं ध्यात्वा ययौ ब्रह्मा कैलासं त्रिदशैः सह । तस्य शैलस्य पार्श्वे ते वैचित्र्येण समाकुलाः । स्थिताः संतुष्टुवुर्देवा ब्रह्मशक्रपुरोगमाः

kṣaṇaṁ dhyātvā yayau brahmā kailāsaṁ tridaśaiḥ saha tasya śailasya pārśve te vaicitryeṇa samākulāḥ sthitāḥ saṁtuṣṭuvurdevā brahmaśakrapurogamāḥ

क्षणभर ध्यान लगाकर ब्रह्मा तीसों देवताओं सहित कैलास गए; उस पर्वत की विचित्र शोभा से चकित खड़े होकर, ब्रह्मा और इंद्र को आगे रखे वे देवता स्तुति करने लगे —

श्लोक 7 (padma.6.9.7)

नमो भवाय शर्वाय नीलग्रीवाय ते नमः । नमः स्थूलाय सूक्ष्माय बहुरूपाय ते नमः

namo bhavāya śarvāya nīlagrīvāya te namaḥ namaḥ sthūlāya sūkṣmāya bahurūpāya te namaḥ

'भव को नमस्कार, शर्व को नमस्कार, हे नीलकंठ! आपको नमस्कार; स्थूल और सूक्ष्म को नमस्कार, हे बहुरूप! आपको नमस्कार।'

श्लोक 8 (padma.6.9.8)

इति सर्वमुखो भूत्वा वाणीमाकर्ण्य शंकरः । प्रोवाच नंदिनं देवा नानयस्वेति सत्वरम्

iti sarvamukho bhūtvā vāṇīmākarṇya śaṁkaraḥ provāca naṁdinaṁ devā nānayasveti satvaram

इस प्रकार सर्वमुख होकर वह वाणी सुनकर शंकर ने नंदी से कहा — 'उन्हें शीघ्र भीतर ले आओ।'

श्लोक 9 (padma.6.9.9)

श्रुत्वा शंभोर्वचो देवा आहूता नंदिना द्रुतम् । प्रविश्यांतःपुरे देवा ददृशुर्विस्मितेक्षणाः

śrutvā śaṁbhorvaco devā āhūtā naṁdinā drutam praviśyāṁtaḥpure devā dadṛśurvismitekṣaṇāḥ

शंभु का यह वचन सुनकर, नंदी द्वारा शीघ्र बुलाए गए देवता भीतरी कक्ष में प्रवेश करके विस्मित नेत्रों से देखने लगे —

श्लोक 10 (padma.6.9.10)

तत्रासने समासीनं शंकरं लोकशंकरम् । गणैः कोटिसहस्रैस्तु सेवितं भक्तिशालिभिः

tatrāsane samāsīnaṁ śaṁkaraṁ lokaśaṁkaram gaṇaiḥ koṭisahasraistu sevitaṁ bhaktiśālibhiḥ

वहाँ आसन पर विराजमान लोक-कल्याणकारी शंकर को, जो करोड़ों-अरबों भक्तिशाली गणों द्वारा सेवित थे,

श्लोक 11 (padma.6.9.11)

नग्नैर्विरूपैः कुटिलैर्जटिलैर्धूलिधूसरैः । प्रणिपत्याग्रतः प्राह सह देवैः पितामहः

nagnairvirūpaiḥ kuṭilairjaṭilairdhūlidhūsaraiḥ praṇipatyāgrataḥ prāha saha devaiḥ pitāmahaḥ

नग्न, विरूप, टेढ़े, जटाधारी, धूल से धूसरित गणों से घिरे हुए। देवताओं सहित पितामह (ब्रह्मा) ने आगे बढ़कर प्रणाम करके कहा —

श्लोक 12 (padma.6.9.12)

सुखरोगो यथा स्यासीच्छक्रः सोऽयं वृथागतः । कृपां कुरु महादेव शरणागतवत्सल

sukharogo yathā syāsīcchakraḥ so'yaṁ vṛthāgataḥ kṛpāṁ kuru mahādeva śaraṇāgatavatsala

'इंद्र को सुख फिर से मिले, इसीलिए यह व्यर्थ ही यहाँ आया है; हे महादेव! शरणागतों पर वत्सल हे प्रभु, कृपा कीजिए।'

श्लोक 13 (padma.6.9.13)

तत उच्चैर्विभोर्हास्यं श्रुत्वा ब्रह्मा पिनाकिनः । उवाच देवदेवेशं पश्यावस्थां दिवौकसाम्

tata uccairvibhorhāsyaṁ śrutvā brahmā pinākinaḥ uvāca devadeveśaṁ paśyāvasthāṁ divaukasām

तब प्रभु की ऊँची हँसी सुनकर ब्रह्मा ने पिनाकी देवाधिदेव से कहा — 'देखिए, स्वर्गवासियों की यह दशा।'

श्लोक 14 (padma.6.9.14)

ततः सर्वेश्वरो ज्ञात्वा ब्रह्मणो मनसेप्सितम् । शक्रस्य मानभंगं च देवार्थे परमेश्वरः

tataḥ sarveśvaro jñātvā brahmaṇo manasepsitam śakrasya mānabhaṁgaṁ ca devārthe parameśvaraḥ

तब ब्रह्मा के मन की बात और इंद्र के मान-भंग को समझते हुए, देवताओं के हित के लिए वह परमेश्वर, सर्वेश्वर —

श्लोक 15 (padma.6.9.15)

प्रेम्णा भवान्या विज्ञप्तो नृप प्राह वचो हरः । विष्णुना न हतो योऽरि स कथं हन्यते मया

premṇā bhavānyā vijñapto nṛpa prāha vaco haraḥ viṣṇunā na hato yo'ri sa kathaṁ hanyate mayā

भवानी के प्रेमपूर्वक अनुरोध किए जाने पर, हे राजन्! हर ने यह वचन कहा — 'जिसे विष्णु ने भी नहीं मारा, उस शत्रु को मैं कैसे मारूँ?

श्लोक 16 (padma.6.9.16)

पूर्वसृष्टान्यायुधानि वज्रादीनि पितामह । तैः शस्त्रैर्नैव वध्योऽसौ बली जालंधरोऽसुरः

pūrvasṛṣṭānyāyudhāni vajrādīni pitāmaha taiḥ śastrairnaiva vadhyo'sau balī jālaṁdharo'suraḥ

पहले से बने वज्र आदि अस्त्रों से, हे पितामह! वह बलवान असुर जालंधर वध्य नहीं है।

श्लोक 17 (padma.6.9.17)

हेतिभिः पूर्वसंसृष्टैः समयापि न हन्यते । देवाः कुर्वंतु शस्त्रं हि मम प्राणसहं दृढम्

hetibhiḥ pūrvasaṁsṛṣṭaiḥ samayāpi na hanyate devāḥ kurvaṁtu śastraṁ hi mama prāṇasahaṁ dṛḍham

पहले से बने शस्त्रों से भी, वचन-बद्ध होने पर भी वह मारा नहीं जा सकता। देवगण मेरे प्राणों के समान दृढ़ शस्त्र बनाएँ।'

श्लोक 18 (padma.6.9.18)

शंभोरित्युत्तरं श्रुत्वा ब्रह्मोवाचाथ शंकरम् । स्वयं कुरु महाशस्त्रं त्वं वेत्थ स्वात्मनो बलम्

śaṁbhorityuttaraṁ śrutvā brahmovācātha śaṁkaram svayaṁ kuru mahāśastraṁ tvaṁ vettha svātmano balam

शंभु का यह उत्तर सुनकर ब्रह्मा ने शंकर से कहा — 'आप स्वयं ही महाशस्त्र बनाइए, आप ही अपने बल को जानते हैं।'

श्लोक 19 (padma.6.9.19)

इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः । ब्रह्मन्विमुंच तेजस्त्वं क्रोधयुक्तं सुरैः सह

iti tasya vacaḥ śrutvā pratyuvāca maheśvaraḥ brahmanvimuṁca tejastvaṁ krodhayuktaṁ suraiḥ saha

उनका यह वचन सुनकर महेश्वर ने उत्तर दिया — 'हे ब्रह्मन्! आप देवताओं सहित अपना क्रोधयुक्त तेज छोड़िए।'

श्लोक 20 (padma.6.9.20)

ततस्तेजो मुमोचाथ ब्रह्मा ब्रह्मास्त्रसूचकः । रुद्रस्त्रिनेत्रजं तेजस्ततो निर्मुक्तवान्स्वयम्

tatastejo mumocātha brahmā brahmāstrasūcakaḥ rudrastrinetrajaṁ tejastato nirmuktavānsvayam

तब ब्रह्मास्त्र के सूचक ब्रह्मा ने अपना तेज छोड़ा; फिर रुद्र ने भी स्वयं अपने तीसरे नेत्र से उत्पन्न तेज छोड़ा।

श्लोक 21 (padma.6.9.21)

देवाश्च मुमुचुः सर्वे सक्रोधं तेजसां चयम् । अत्रांतरे स्मृतः प्राप्तो हरेण मधुसूदनः

devāśca mumucuḥ sarve sakrodhaṁ tejasāṁ cayam atrāṁtare smṛtaḥ prāpto hareṇa madhusūdanaḥ

सभी देवताओं ने भी अपना-अपना क्रोधयुक्त तेज छोड़ा; इसी बीच हर द्वारा स्मरण किए जाने पर मधुसूदन (विष्णु) वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 22 (padma.6.9.22)

किं करोमीति तेनोक्तः शिवः प्राह जनार्दनम् । विष्णो जालंधरः कस्मान्न हतः संगरे त्वया

kiṁ karomīti tenoktaḥ śivaḥ prāha janārdanam viṣṇo jālaṁdharaḥ kasmānna hataḥ saṁgare tvayā

उनके 'मैं क्या करूँ?' पूछने पर शिव ने जनार्दन से कहा — 'हे विष्णु! तुमने उस युद्ध में जालंधर को क्यों नहीं मारा?

श्लोक 23 (padma.6.9.23)

कथं सुरान्परित्यज्य क्षीराब्धिं शयितुं गतः

kathaṁ surānparityajya kṣīrābdhiṁ śayituṁ gataḥ

देवताओं को त्यागकर तुम क्षीरसागर में सोने के लिए कैसे चले गए?'

श्लोक 24 (padma.6.9.24)

श्रीविष्णुरुवाच । यदि तं हन्मि देवेश श्रीः कथं मम वल्लभा । तस्मात्त्वं पार्वतीकांत जहि जालंधरं रणे

śrīviṣṇuruvāca yadi taṁ hanmi deveśa śrīḥ kathaṁ mama vallabhā tasmāttvaṁ pārvatīkāṁta jahi jālaṁdharaṁ raṇe

श्री विष्णु ने कहा — 'हे देवेश! यदि मैं उसे मारूँ, तो श्री (लक्ष्मी) मेरी प्रिया कैसे रहेगी? इसलिए, हे पार्वती के प्रियतम! आप ही युद्ध में जालंधर को मारिए।'

श्लोक 25 (padma.6.9.25)

तेजस्त्वं क्रोधजं मुंचेत्युक्तः शर्वेण केशवः । मुमोच वैष्णवं तेजः तत्सर्वं समवर्द्धत । तेजः प्रवृद्धं तद्दृष्ट्वा व्यापकं प्राह केशवम्

tejastvaṁ krodhajaṁ muṁcetyuktaḥ śarveṇa keśavaḥ mumoca vaiṣṇavaṁ tejaḥ tatsarvaṁ samavarddhata tejaḥ pravṛddhaṁ taddṛṣṭvā vyāpakaṁ prāha keśavam

शर्व द्वारा 'अपना क्रोधजनित तेज छोड़ो' कहे जाने पर केशव ने अपना वैष्णव तेज छोड़ा, और वह सब मिलकर बढ़ने लगा; उस बढ़ते हुए, व्यापक तेज को देखकर उन्होंने केशव से कहा —

श्लोक 26 (padma.6.9.26)

शंकर उवाच । एतेन तेजसा शीघ्रं ममास्त्रं कर्तुमर्हथ । विश्वकर्मादयस्तच्च श्रुत्वा शंकरभाषितम्

śaṁkara uvāca etena tejasā śīghraṁ mamāstraṁ kartumarhatha viśvakarmādayastacca śrutvā śaṁkarabhāṣitam

शंकर ने कहा — 'इस तेज से शीघ्र ही मेरे लिए एक अस्त्र बनाइए।' शंकर का यह वचन सुनकर विश्वकर्मा आदि —

श्लोक 27 (padma.6.9.27)

निरीक्ष्य च तदाऽन्योऽन्यं किं कुर्म इति शंकिताः । दृष्ट्वा तूष्णीं स्थितांस्तांश्च ज्ञात्वा तन्मनसि स्थितम्

nirīkṣya ca tadā'nyo'nyaṁ kiṁ kurma iti śaṁkitāḥ dṛṣṭvā tūṣṇīṁ sthitāṁstāṁśca jñātvā tanmanasi sthitam

एक-दूसरे को देखकर 'हम क्या करें' सोचते हुए शंकित हो गए; उन्हें चुप खड़ा देखकर और उनके मन की बात समझकर —

श्लोक 28 (padma.6.9.28)

तदाह भगवान्ब्रह्मा अनालोक्यं हि दैवतैः । सोढुं न शक्तास्ते तेजो धर्तुं केन च शक्यते

tadāha bhagavānbrahmā anālokyaṁ hi daivataiḥ soḍhuṁ na śaktāste tejo dhartuṁ kena ca śakyate

तब भगवान ब्रह्मा ने कहा — 'यह देवताओं की दृष्टि से भी परे है; वे इस तेज को सहन करने में असमर्थ हैं — इसे भला कौन धारण कर सकता है?'

श्लोक 29 (padma.6.9.29)

ततः प्रहस्य भगवानुत्पत्योपरि तेजसः । वामांघ्रिपार्ष्णिना शंभुर्ननर्त भ्रमरीचयम्

tataḥ prahasya bhagavānutpatyopari tejasaḥ vāmāṁghripārṣṇinā śaṁbhurnanarta bhramarīcayam

तब हँसते हुए प्रभु उस तेज-राशि के ऊपर उछलकर, बाएँ पैर की एड़ी से भ्रमरी-नृत्य करते हुए नाचने लगे।

श्लोक 30 (padma.6.9.30)

ततो देवा महेंद्राद्यास्तेजसोपरि शंकरम् । नृत्यमानं तदा दृष्ट्वा मुदा वाद्यान्यवादयन्

tato devā maheṁdrādyāstejasopari śaṁkaram nṛtyamānaṁ tadā dṛṣṭvā mudā vādyānyavādayan

तब महेंद्र आदि देवताओं ने तेज के ऊपर नाचते हुए शंकर को देखकर हर्षपूर्वक वाद्ययंत्र बजाए।

श्लोक 31 (padma.6.9.31)

तदाप्रभृति नृत्येषु भ्राम्यते भ्रमरीचयम् । अथ चक्रं समुत्पन्नं शंभोर्नर्तनमर्दनात्

tadāprabhṛti nṛtyeṣu bhrāmyate bhramarīcayam atha cakraṁ samutpannaṁ śaṁbhornartanamardanāt

तभी से नृत्यों में भ्रमरी (चक्कर) घुमाई जाती है; फिर शंभु के नर्तन-मर्दन से एक चक्र उत्पन्न हुआ,

श्लोक 32 (padma.6.9.32)

आरलक्षत्रयोपेतं अस्थिकोटिसमाकुलम् । शर्वांघ्रिकषणात्तस्य तेजसो निसृताः कणाः

āralakṣatrayopetaṁ asthikoṭisamākulam śarvāṁghrikaṣaṇāttasya tejaso nisṛtāḥ kaṇāḥ

तीन तेज धाराओं से युक्त, करोड़ों नुकीली नोकों से भरा हुआ, शर्व के पैर के घर्षण से उस तेज के छिटके हुए कणों से बना।

श्लोक 33 (padma.6.9.33)

विश्वकर्मा च तेनास्त्रं विमानानि च निर्ममे । ततस्ते निर्ज्जरा भीत्या दृष्ट्वा चक्रं सुदर्शनम्

viśvakarmā ca tenāstraṁ vimānāni ca nirmame tataste nirjjarā bhītyā dṛṣṭvā cakraṁ sudarśanam

विश्वकर्मा ने उससे अस्त्र और विमान भी बनाए; तब वे देवगण उस सुदर्शन चक्र को देखकर भय से —

श्लोक 34 (padma.6.9.34)

त्राहित्राहीति देवेशं प्रत्यूचुस्ते सुरान्नृप । पृथ्वीकाठिन्यमादाय लोहानामपि तेजसाम्

trāhitrāhīti deveśaṁ pratyūcuste surānnṛpa pṛthvīkāṭhinyamādāya lohānāmapi tejasām

हे राजन्! 'बचाओ, बचाओ' कहते हुए देवेश से पुकार करने लगे; पृथ्वी की कठोरता और अग्नि-तेज मिश्रित लोहे को लेकर —

श्लोक 35 (padma.6.9.35)

यद्विश्वकर्मणा कोशं कृतं भस्मीकृतं च तत् । सृष्टेन तेन चक्रेण दग्धः कालोऽपतत्क्षितौ

yadviśvakarmaṇā kośaṁ kṛtaṁ bhasmīkṛtaṁ ca tat sṛṣṭena tena cakreṇa dagdhaḥ kālo'patatkṣitau

विश्वकर्मा ने जो कोश (शस्त्रागार) बनाया था, वह भी भस्म हो गया; उस उत्पन्न चक्र से जलकर काल भी पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 36 (padma.6.9.36)

ततस्तद्ब्रह्मणो हस्ते ददौ चक्रं स धूर्जटिः । चक्रार्चिर्निचयैः कूर्चं दृष्ट्वा दग्धमुमापतिः

tatastadbrahmaṇo haste dadau cakraṁ sa dhūrjaṭiḥ cakrārcirnicayaiḥ kūrcaṁ dṛṣṭvā dagdhamumāpatiḥ

तब धूर्जटि (शिव) ने उस चक्र को ब्रह्मा के हाथ में दे दिया; चक्र की ज्वाला-राशि से जली हुई अपनी दाढ़ी (या तेज-समूह) को देखकर उमापति —

श्लोक 37 (padma.6.9.37)

हसित्वा ब्रह्मणो हस्ताद्गृहीत्वा सत्वरं शिवः । दधौ कक्षापुटे चक्रं निधानं निर्धनो यथा

hasitvā brahmaṇo hastādgṛhītvā satvaraṁ śivaḥ dadhau kakṣāpuṭe cakraṁ nidhānaṁ nirdhano yathā

हँसते हुए शीघ्र ही ब्रह्मा के हाथ से उसे ले लिया, और उस चक्र को अपनी काँख में छिपाकर धारण कर लिया, जैसे कोई निर्धन कोई निधि छिपा ले।

श्लोक 38 (padma.6.9.38)

ततो न दृश्यते चक्रं शिवकक्षापुटेस्थितम् । महामूर्खस्य यद्दत्तं दानं तस्य फलं यथा

tato na dṛśyate cakraṁ śivakakṣāpuṭesthitam mahāmūrkhasya yaddattaṁ dānaṁ tasya phalaṁ yathā

तभी से वह चक्र शिव की काँख में छिपा रहकर कभी दिखाई नहीं देता — यह मानो किसी महामूर्ख को दिए गए दान का फल हो।

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