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उत्तर खण्ड · अध्याय 139

अग्निपालेश्वर की महिमा

अध्याय 138अध्याय-सूचीअध्याय 140

श्लोक 1 (padma.6.139.1)

महादेव उवाच। साभ्रमत्युत्तरे कूले अग्नितीर्थमिति श्रुतम् । तस्याश्चोत्तरपूर्वेण नातिदूरे कृतास्पदम्

mahādeva uvāca sābhramatyuttare kūle agnitīrthamiti śrutam tasyāścottarapūrveṇa nātidūre kṛtāspadam

महादेव ने कहा — साभ्रमती के उत्तरी तट पर अग्नितीर्थ नाम से प्रसिद्ध तीर्थ है। उससे उत्तर-पूर्व दिशा में, अधिक दूर नहीं, एक और स्थान बसा हुआ है।

श्लोक 2 (padma.6.139.2)

तीर्थं पालेश्वरं नाम चंडी यत्र प्रतिष्ठिता । पीठं तद्योगमातॄणां सर्वसिद्धिविधायकम्

tīrthaṁ pāleśvaraṁ nāma caṁḍī yatra pratiṣṭhitā pīṭhaṁ tadyogamātṝṇāṁ sarvasiddhividhāyakam

उस तीर्थ का नाम पालेश्वर है, जहाँ चंडी प्रतिष्ठित हैं। वह योगमाताओं का पीठ है, जो समस्त सिद्धियों को देने वाला है।

श्लोक 3 (padma.6.139.3)

यत्र ताः सर्वदेवानां कार्यार्थे मातरः स्थिताः । परमं यत्नमास्थाय लोकानुग्रहकारणात्

yatra tāḥ sarvadevānāṁ kāryārthe mātaraḥ sthitāḥ paramaṁ yatnamāsthāya lokānugrahakāraṇāt

वहाँ वे माताएँ समस्त देवताओं के कार्य के लिए, लोक-कल्याण के कारण परम प्रयत्न धारण करते हुए स्थित रहती हैं।

श्लोक 4 (padma.6.139.4)

त्रिरात्रमुषितो भूत्वा तस्मिंस्तीर्थे दृढव्रतः । अभिगच्छेत्तमीशानं देवेशं चंडिकेश्वरम्

trirātramuṣito bhūtvā tasmiṁstīrthe dṛḍhavrataḥ abhigacchettamīśānaṁ deveśaṁ caṁḍikeśvaram

दृढ़ व्रत धारण करके उस तीर्थ में तीन रात्रि निवास करके, उस ईशान देवेश चंडिकेश्वर के समक्ष जाना चाहिए।

श्लोक 5 (padma.6.139.5)

साभ्रमत्यां कृतस्नानो मातृतीर्थस्य संनिधौ । समाधिविधिना युक्तो गच्छेद्वै मातृमंडलम्

sābhramatyāṁ kṛtasnāno mātṛtīrthasya saṁnidhau samādhividhinā yukto gacchedvai mātṛmaṁḍalam

साभ्रमती में स्नान करके, मातृ-तीर्थ के निकट, समाधि की विधि से युक्त होकर मातृ-मंडल में जाना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.6.139.6)

गोसहस्रप्रदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः । अग्नितीर्थे नरः स्नात्वा चामुंडादर्शने कृते

gosahasrapradānasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ agnitīrthe naraḥ snātvā cāmuṁḍādarśane kṛte

ऐसा मनुष्य सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त करता है। अग्नितीर्थ में स्नान करके, चामुंडा के दर्शन करने पर,

श्लोक 7 (padma.6.139.7)

न भयं जायते तस्य रक्षोभूतपिशाचजम् । गोखुरा च नदी यत्र साभ्रमत्यां तु संगता

na bhayaṁ jāyate tasya rakṣobhūtapiśācajam gokhurā ca nadī yatra sābhramatyāṁ tu saṁgatā

उसे राक्षसों, भूतों और पिशाचों से उत्पन्न भय कभी नहीं होता। जहाँ गोखुरा नदी साभ्रमती में मिलती है,

श्लोक 8 (padma.6.139.8)

तत्र तीर्थसहस्राणि तिष्ठंतीति सुरेश्वरि । श्राद्धं तत्र प्रकर्त्तव्यं तिलचूर्णेन पार्वति

tatra tīrthasahasrāṇi tiṣṭhaṁtīti sureśvari śrāddhaṁ tatra prakarttavyaṁ tilacūrṇena pārvati

हे सुरेश्वरि, वहाँ सहस्रों तीर्थ निवास करते हैं। हे पार्वती, वहाँ तिल-चूर्ण के साथ श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 9 (padma.6.139.9)

पिंडान्दत्त्वा द्विजान्भोज्य अक्षयं पदमाप्नुयात् । यत्र कुकर्दमो राजा पापिष्ठो दुर्द्धरः खलः

piṁḍāndattvā dvijānbhojya akṣayaṁ padamāpnuyāt yatra kukardamo rājā pāpiṣṭho durddharaḥ khalaḥ

पिंड-दान देकर और ब्राह्मणों को भोजन कराकर मनुष्य अक्षय पद को प्राप्त करता है। वहाँ कुकर्दम नामक राजा था, जो अत्यंत पापी, दुर्दम्य और दुष्ट था।

श्लोक 10 (padma.6.139.10)

मूढोऽहंकारसंयुक्तो द्विजानां परिनिंदकः । गोघ्नोऽपि बलहा चैव पापिष्ठो दुर्दमः सदा

mūḍho'haṁkārasaṁyukto dvijānāṁ pariniṁdakaḥ goghno'pi balahā caiva pāpiṣṭho durdamaḥ sadā

वह मूर्ख, अहंकार से युक्त, ब्राह्मणों की सर्वदा निंदा करने वाला, गौ-हत्यारा और बलहत्यारा, सदा पापी और दुर्दम्य था।

श्लोक 11 (padma.6.139.11)

राज्यं च कुर्वतस्तस्य पुरे पिंडारसंज्ञके । तदा मृत्तिः समापन्ना धर्मे योगे सुरेश्वरि

rājyaṁ ca kurvatastasya pure piṁḍārasaṁjñake tadā mṛttiḥ samāpannā dharme yoge sureśvari

पिंडार नामक नगर में राज्य करते हुए, हे सुरेश्वरि, धर्म के अभाव में उसकी मृत्यु हुई।

श्लोक 12 (padma.6.139.12)

मृतोऽसौ तत्र संजातः प्रेतरूपो महेश्वरि । पीतास्यः शुष्कतुंडश्च पीतरोमाऽथ कर्कशः

mṛto'sau tatra saṁjātaḥ pretarūpo maheśvari pītāsyaḥ śuṣkatuṁḍaśca pītaromā'tha karkaśaḥ

हे महेश्वरि, मरकर वह वहीं प्रेत-रूप में उत्पन्न हुआ — पीले मुख वाला, सूखी चोंच वाला, पीले रोम वाला और कर्कश।

श्लोक 13 (padma.6.139.13)

उच्चस्तरो बहुरोमा क्षुत्पिपासाप्रपीडितः । वायुभक्षं प्रकुर्वाणः प्रगच्छति इतस्ततः

uccastaro bahuromā kṣutpipāsāprapīḍitaḥ vāyubhakṣaṁ prakurvāṇaḥ pragacchati itastataḥ

ऊँचे कद वाला, अत्यंत रोमों से भरा, भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित, केवल वायु का ही आहार करते हुए वह इधर-उधर भटकता था।

श्लोक 14 (padma.6.139.14)

बहुप्रेतैः समायुक्तो हाहेति करुणो रुदन् । किं कर्तव्यमिति प्राहुः प्रेतास्ते वै समीपगाः

bahupretaiḥ samāyukto hāheti karuṇo rudan kiṁ kartavyamiti prāhuḥ pretāste vai samīpagāḥ

अनेक प्रेतों से घिरा हुआ, वह करुणापूर्ण स्वर में 'हाय-हाय' करते हुए रोता था। पास आने वाले वे प्रेत पूछते — 'अब क्या करना चाहिए?'

श्लोक 15 (padma.6.139.15)

तेऽपि तदा रोदमानाः क्षुत्पिपासादि पीडिताः । अन्ये प्रेता दुरात्मानो राज्ञः संगतिमाययुः

te'pi tadā rodamānāḥ kṣutpipāsādi pīḍitāḥ anye pretā durātmāno rājñaḥ saṁgatimāyayuḥ

वे भी उस समय रोते हुए, भूख-प्यास आदि से पीड़ित थे। अन्य दुरात्मा प्रेत भी उस राजा की संगति में आ मिले।

श्लोक 16 (padma.6.139.16)

राज्ञा सार्द्धं च गच्छंति लोकान्विजनकान्बहून् । नोदकमथवा चान्नं न मार्गे दृश्यते कदा

rājñā sārddhaṁ ca gacchaṁti lokānvijanakānbahūn nodakamathavā cānnaṁ na mārge dṛśyate kadā

राजा के साथ वे अनेक निर्जन प्रदेशों में जाते थे; न कभी जल दिखाई देता था, न अन्न, न मार्ग ही कहीं दिखाई देता था।

श्लोक 17 (padma.6.139.17)

ते प्रेता दुष्टरूपाश्च विचरंति महीतले । भक्षंति शवमांसानि पिबंति रुधिरं सदा

te pretā duṣṭarūpāśca vicaraṁti mahītale bhakṣaṁti śavamāṁsāni pibaṁti rudhiraṁ sadā

वे दुष्ट-रूपी प्रेत पृथ्वी पर विचरण करते थे; वे शवों का मांस खाते थे और सदा रक्त पीते थे।

श्लोक 18 (padma.6.139.18)

एवं कुकर्दमो राजा सदा तैः परिवारितः । कदाचिद्दैवयोगेन गुरोराश्रममन्वगात्

evaṁ kukardamo rājā sadā taiḥ parivāritaḥ kadāciddaivayogena gurorāśramamanvagāt

इस प्रकार राजा कुकर्दम सदा उनसे घिरा रहता था। किसी दैव-योग से एक बार वह किसी गुरु के आश्रम की ओर जा पहुँचा।

श्लोक 19 (padma.6.139.19)

पूर्वजन्मकृतं पुण्यं तेन योगेन संगतः । पार्वत्युवाच। किं कृतं तेन वै पुण्यं वद विश्वेश्वर प्रभो

pūrvajanmakṛtaṁ puṇyaṁ tena yogena saṁgataḥ pārvatyuvāca kiṁ kṛtaṁ tena vai puṇyaṁ vada viśveśvara prabho

पूर्वजन्म में किए गए पुण्य के कारण ही उस योग से उसका संबंध हुआ। पार्वती ने कहा — हे विश्वेश्वर प्रभो, बताइए, उसने कौन-सा पुण्य किया था?

श्लोक 20 (padma.6.139.20)

अयं पापी दुरात्मा च ब्राह्मणानां च दुःखदः । सत्संगतिः कथं जाता तन्मे दुस्तरतो वद

ayaṁ pāpī durātmā ca brāhmaṇānāṁ ca duḥkhadaḥ satsaṁgatiḥ kathaṁ jātā tanme dustarato vada

'यह तो पापी, दुरात्मा और ब्राह्मणों को दुःख देने वाला था — इसे सत्संगति कैसे प्राप्त हुई, यह मुझे कठिनता के साथ भी बताइए।'

श्लोक 21 (padma.6.139.21)

महादेव उवाच। एतेन नरदेवेन पूर्वजन्मनि यत्कृतम् । तत्सर्वं कथयिष्यामि शृणु त्वं नगनंदिनि

mahādeva uvāca etena naradevena pūrvajanmani yatkṛtam tatsarvaṁ kathayiṣyāmi śṛṇu tvaṁ naganaṁdini

महादेव ने कहा — इस राजा ने पूर्वजन्म में जो किया था, वह सब मैं बताऊँगा। हे पर्वत-पुत्री, सुनो।

श्लोक 22 (padma.6.139.22)

पूर्वजन्मन्ययं देवि ब्राह्मणो वेदपाठकः । संपूज्य च महादेवं कृत्वा चातिथिपूजनम्

pūrvajanmanyayaṁ devi brāhmaṇo vedapāṭhakaḥ saṁpūjya ca mahādevaṁ kṛtvā cātithipūjanam

हे देवि, पूर्वजन्म में यह एक वेद-पाठी ब्राह्मण था। महादेव की पूजा करके, अतिथियों की भी पूजा करके,

श्लोक 23 (padma.6.139.23)

भोजनं कुरुते नित्यमसौ वाडवसत्तमः । तेन पुण्यप्रभावेन पुरो पिंडारसंज्ञके

bhojanaṁ kurute nityamasau vāḍavasattamaḥ tena puṇyaprabhāvena puro piṁḍārasaṁjñake

वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा भोजन करता था। उसी पुण्य के प्रभाव से पिंडार नामक नगर में —

श्लोक 24 (padma.6.139.24)

राजा वै तत्र संजातः कुकर्दम इति श्रुतः । कर्मणा मनसा चैव न कृतं पुण्यमेव च

rājā vai tatra saṁjātaḥ kukardama iti śrutaḥ karmaṇā manasā caiva na kṛtaṁ puṇyameva ca

वह कुकर्दम नामक राजा के रूप में उत्पन्न हुआ। किंतु उसने कर्म और मन से कोई पुण्य नहीं किया।

श्लोक 25 (padma.6.139.25)

तेन देवाभियोगेन मृतो वै प्रेतराडभूत् । शुष्कास्यः शुष्करूपश्च पीतवर्णः करालकः

tena devābhiyogena mṛto vai pretarāḍabhūt śuṣkāsyaḥ śuṣkarūpaśca pītavarṇaḥ karālakaḥ

उसी दैव-योग के कारण मरकर वह प्रेतों का राजा बन गया — सूखे मुख वाला, सूखे रूप वाला, पीले रंग का और विकराल।

श्लोक 26 (padma.6.139.26)

पूर्वजन्मकृतं पुण्यं न नश्यति सुरेश्वरि । तेन पुण्याभियोगेन संगतो गुरुणाश्रमे

pūrvajanmakṛtaṁ puṇyaṁ na naśyati sureśvari tena puṇyābhiyogena saṁgato guruṇāśrame

हे सुरेश्वरि, पूर्वजन्म में किया गया पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। उसी पुण्य-योग के कारण वह गुरु के आश्रम में जा मिला।

श्लोक 27 (padma.6.139.27)

कहोडो वर्तते तत्र तेन दृष्टोऽथ प्रेतराट् । शुष्कास्यः शुष्करूपश्च पीतवर्णः करालकः

kahoḍo vartate tatra tena dṛṣṭo'tha pretarāṭ śuṣkāsyaḥ śuṣkarūpaśca pītavarṇaḥ karālakaḥ

वहाँ कहोड मुनि रहते थे। उन्होंने उस प्रेतराज को देखा — सूखे मुख वाला, सूखे रूप वाला, पीले रंग का और विकराल।

श्लोक 28 (padma.6.139.28)

गंभीराक्षो महापापी दुष्टैः प्रेतैश्च संयुतः । ऊर्द्ध्वरोमा जटायुक्तः कालरूपो भयंकरः

gaṁbhīrākṣo mahāpāpī duṣṭaiḥ pretaiśca saṁyutaḥ ūrddhvaromā jaṭāyuktaḥ kālarūpo bhayaṁkaraḥ

गहरी आँखों वाला, महापापी, दुष्ट प्रेतों से घिरा हुआ, खड़े रोमों वाला, जटाओं से युक्त, काल के समान भयंकर रूप वाला।

श्लोक 29 (padma.6.139.29)

एवं दृष्ट्वा तदा देवि विह्वलो वाडवोऽभवत् । कहोड उवाच। अस्मिन्मनोरमे चाहं स्थाने वै परमाद्भुते

evaṁ dṛṣṭvā tadā devi vihvalo vāḍavo'bhavat kahoḍa uvāca asminmanorame cāhaṁ sthāne vai paramādbhute

हे देवि, उसे इस प्रकार देखकर उस ब्राह्मण को विह्वलता हुई। कहोड ने कहा — इस मनोरम और परम अद्भुत स्थान में,

श्लोक 30 (padma.6.139.30)

अग्निपालेश्वरे तीर्थे नित्यं तिष्ठामि भूमिप । यजमानस्त्वमस्माकं कथं जातोऽसि प्रेतराट्

agnipāleśvare tīrthe nityaṁ tiṣṭhāmi bhūmipa yajamānastvamasmākaṁ kathaṁ jāto'si pretarāṭ

'अग्निपालेश्वर तीर्थ में मैं सदा निवास करता हूँ, हे भूमिप। तुम तो हमारे यजमान थे — तुम प्रेतों का राजा कैसे बन गए?'

श्लोक 31 (padma.6.139.31)

दुरात्मा दुष्टरूपश्च कालरूपो भयंकरः । केन कर्मविपाकेन जातो वै भूतले शुभे

durātmā duṣṭarūpaśca kālarūpo bhayaṁkaraḥ kena karmavipākena jāto vai bhūtale śubhe

'दुरात्मा, दुष्ट-रूप वाला, काल के समान भयंकर — किस कर्म के फल से तुम इस शुभ भूतल पर ऐसे बने?'

श्लोक 32 (padma.6.139.32)

प्रेत उवाच। शृणु वाडव मे पापं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् । अहं कुकर्दमो राजा पुरे पिंडारसंज्ञके

preta uvāca śṛṇu vāḍava me pāpaṁ pūrvajanmani yatkṛtam ahaṁ kukardamo rājā pure piṁḍārasaṁjñake

प्रेत ने कहा — हे ब्राह्मण, सुनो, पूर्वजन्म में मैंने जो पाप किया था, वह सुनो। मैं पिंडार नामक नगर का राजा कुकर्दम था।

श्लोक 33 (padma.6.139.33)

तत्रस्थेन मया देव यत्कृतं तच्छृणुष्व हि । ब्रह्मणां हिंसनं चैव पुराऽसत्यादिभाषणम्

tatrasthena mayā deva yatkṛtaṁ tacchṛṇuṣva hi brahmaṇāṁ hiṁsanaṁ caiva purā'satyādibhāṣaṇam

वहाँ रहकर मैंने जो किया, हे देव, वह सुनो — मैंने ब्राह्मणों की हिंसा की, तथा पहले सदा असत्य आदि वचन कहे।

श्लोक 34 (padma.6.139.34)

प्रजानां पीडनं चैव जीवानां हिंसनं सदा । गवां वै दुःखकर्ताऽहं ब्राह्मणव्रतलोपनः

prajānāṁ pīḍanaṁ caiva jīvānāṁ hiṁsanaṁ sadā gavāṁ vai duḥkhakartā'haṁ brāhmaṇavratalopanaḥ

मैंने प्रजा को पीड़ा दी, प्राणियों की सदा हिंसा की; मैंने गौओं को दुःख दिया, ब्राह्मणों के व्रतों का लोप किया।

श्लोक 35 (padma.6.139.35)

अस्नातः सर्वदा विप्र सज्जनानां विदूषकः । विष्णुनिंदापरो नित्यं वैष्णवानां च निंदकः

asnātaḥ sarvadā vipra sajjanānāṁ vidūṣakaḥ viṣṇuniṁdāparo nityaṁ vaiṣṇavānāṁ ca niṁdakaḥ

हे विप्र, मैं सदा बिना स्नान किए रहता था, सज्जनों को दूषित करने वाला था; सदा विष्णु की निंदा में रत रहता था, और वैष्णवों की भी निंदा करता था।

श्लोक 36 (padma.6.139.36)

दुराचारो दुरात्मा च वृषलीसंयुतः सदा । तत्र तत्र प्रभुंजानो नाऽहं शौचपरायणः

durācāro durātmā ca vṛṣalīsaṁyutaḥ sadā tatra tatra prabhuṁjāno nā'haṁ śaucaparāyaṇaḥ

मैं दुराचारी, दुरात्मा और सदा नीच स्त्रियों में लिप्त रहा; जहाँ-तहाँ भोजन करता था, कभी शौच-नियम का पालन नहीं करता था।

श्लोक 37 (padma.6.139.37)

तेन कर्माभियोगेन मृतो वै द्विजराट्ततः । प्रेतयोनिं प्रपन्नोऽस्मि दुःखी जातो ह्यनेकधा

tena karmābhiyogena mṛto vai dvijarāṭtataḥ pretayoniṁ prapanno'smi duḥkhī jāto hyanekadhā

उन्हीं कर्मों के वेग से मरकर, हे द्विजराज, मैं प्रेत-योनि को प्राप्त हुआ, और अनेक प्रकार से दुःखी होकर जन्मा।

श्लोक 38 (padma.6.139.38)

यस्य माता पिता नास्ति यस्य स्वजनबांधवाः । तस्य बंधुर्गुरुर्माता पितापि गुरुरेव च

yasya mātā pitā nāsti yasya svajanabāṁdhavāḥ tasya baṁdhurgururmātā pitāpi gurureva ca

जिसकी न माता है, न पिता, न स्वजन-बांधव — उसके लिए तो गुरु ही बंधु है, गुरु ही माता है, और गुरु ही पिता भी है।

श्लोक 39 (padma.6.139.39)

इति ज्ञात्वा तु भो ब्रह्मन्मुक्तिं दातुं त्वमर्हसि

iti jñātvā tu bho brahmanmuktiṁ dātuṁ tvamarhasi

यह जानकर, हे ब्रह्मन्, आप ही मुझे मुक्ति देने के योग्य हैं।

श्लोक 40 (padma.6.139.40)

कहोड उवाच। शृणु त्वं नृपतिश्रेष्ठ करिष्ये वचनं तव । मुक्तिं यास्यति वै सद्यो भवांस्त्विह न संशयः

kahoḍa uvāca śṛṇu tvaṁ nṛpatiśreṣṭha kariṣye vacanaṁ tava muktiṁ yāsyati vai sadyo bhavāṁstviha na saṁśayaḥ

कहोड ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ, सुनो, मैं तुम्हारा वचन पूरा करूँगा। तुम यहाँ शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करोगे, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 41 (padma.6.139.41)

एकादश पुरोगाश्च प्रेता ये तव संगताः । ते चापि मुक्तिमायांति सुतीर्थेऽस्मिन्विशेषतः

ekādaśa purogāśca pretā ye tava saṁgatāḥ te cāpi muktimāyāṁti sutīrthe'sminviśeṣataḥ

तुम्हारे साथ जो ग्यारह प्रमुख प्रेत हैं, वे भी इस उत्तम तीर्थ में विशेष रूप से मुक्ति प्राप्त करेंगे।

श्लोक 42 (padma.6.139.42)

तदा वै तेन विप्रेण तीर्थे गत्वा सुरेश्वरि । सर्वैश्चकारयामास तिलपिंडोदकक्रियाः

tadā vai tena vipreṇa tīrthe gatvā sureśvari sarvaiścakārayāmāsa tilapiṁḍodakakriyāḥ

हे सुरेश्वरि, तब उस ब्राह्मण ने तीर्थ में जाकर, सबके लिए तिल-पिंड-जल की क्रियाएँ करवाईं।

श्लोक 43 (padma.6.139.43)

न मासो न तिथिर्देवी तीर्थे गत्वा पुनः पुनः । कर्त्तव्यं श्राद्धकर्मादि ब्रह्मणोक्तं पुरा मम

na māso na tithirdevī tīrthe gatvā punaḥ punaḥ karttavyaṁ śrāddhakarmādi brahmaṇoktaṁ purā mama

हे देवि, वहाँ न किसी विशेष मास की, न तिथि की आवश्यकता है — बार-बार तीर्थ में जाकर श्राद्ध-कर्म आदि करना चाहिए, ऐसा पहले ब्रह्मा ने मुझसे कहा था।

श्लोक 44 (padma.6.139.44)

कृते कर्मणि देवेशि मुक्तास्ते तीर्थराजके । विमानवरमारूढास्ते गता मामकीं पुरीम्

kṛte karmaṇi deveśi muktāste tīrtharājake vimānavaramārūḍhāste gatā māmakīṁ purīm

हे देवेशि, वह कर्म पूर्ण होने पर वे सब उस तीर्थराज में मुक्त हो गए। उत्तम विमान पर चढ़कर वे मेरी नगरी को चले गए।

श्लोक 45 (padma.6.139.45)

संगता गोखुरा यत्र साभ्रमत्या सुरेश्वरि । तत्र स्नानं च दानं च कोटियज्ञफलं लभेत्

saṁgatā gokhurā yatra sābhramatyā sureśvari tatra snānaṁ ca dānaṁ ca koṭiyajñaphalaṁ labhet

हे सुरेश्वरि, जहाँ गोखुरा नदी साभ्रमती से मिलती है, वहाँ स्नान और दान करने से करोड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 46 (padma.6.139.46)

यत्राग्नितीर्थं वर्तेत कपालेश्वरसंज्ञकम् । तत्र मुक्तिस्तु संप्रोक्ता सत्यं सत्यं भवेद्ध्रुवम्

yatrāgnitīrthaṁ varteta kapāleśvarasaṁjñakam tatra muktistu saṁproktā satyaṁ satyaṁ bhaveddhruvam

जहाँ अग्नितीर्थ है, जिसे कपालेश्वर के नाम से जाना जाता है, वहाँ मुक्ति ही घोषित की गई है — सत्य है, सत्य है, यह निश्चित रूप से होकर रहेगा।

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