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उत्तर खण्ड · अध्याय 14

श्रीमन् माधव की माया-कथा

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (padma.6.14.1)

युधिष्ठिर उवाच ।इति मायामहेशेन मोहिता गिरिजा यदा । अतः किं समभूद्ब्रह्मन्तन्ममाख्यातुमर्हसि

yudhiṣṭhira uvāca iti māyāmaheśena mohitā girijā yadā ataḥ kiṁ samabhūdbrahmantanmamākhyātumarhasi

युधिष्ठिर ने कहा — हे ब्रह्मन्! जब गिरिजा इस प्रकार उस मायावी महेश से मोहित हो गईं, तब आगे क्या हुआ? वह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.14.2)

नारद उवाच ।क्षीराब्धौ तु शयानस्य चुक्षोभ हृदयं हरेः । अकस्मादेव राजेंद्र नयनेऽश्रुपरिप्लुते

nārada uvāca kṣīrābdhau tu śayānasya cukṣobha hṛdayaṁ hareḥ akasmādeva rājeṁdra nayane'śrupariplute

नारद ने कहा — क्षीरसागर में शयन करते हुए हरि का हृदय अचानक ही व्याकुल हो उठा, हे राजेंद्र! उनके नेत्र आँसुओं से भर गए।

श्लोक 3 (padma.6.14.3)

दृष्ट्वा तन्महदुत्पातलक्षणं भगवांस्ततः । उत्थाय शेषपर्यंकान्मां च वायुं विलोक्य च

dṛṣṭvā tanmahadutpātalakṣaṇaṁ bhagavāṁstataḥ utthāya śeṣaparyaṁkānmāṁ ca vāyuṁ vilokya ca

उस महान अपशकुन को देखकर भगवान शेष-शय्या से उठे, और मुझे तथा वायु को देखकर,

श्लोक 4 (padma.6.14.4)

किं कार्यमिति गोविंदस्तन्नागारिमथास्मरत् । स चाग्रे स्मृतिमात्रेण तस्थौ बद्धांजलिः प्रभो

kiṁ kāryamiti goviṁdastannāgārimathāsmarat sa cāgre smṛtimātreṇa tasthau baddhāṁjaliḥ prabho

'क्या करना है' सोचते हुए गोविंद ने नागारि (गरुड़) का स्मरण किया; और वह उसी स्मरण मात्र से हाथ जोड़े उनके सामने आ खड़ा हुआ, हे प्रभो!

श्लोक 5 (padma.6.14.5)

विनतानंदनं दृष्ट्वा पुरतः प्राह केशवः । सुपर्ण तत्र गच्छ त्वं यत्र युद्धं प्रवर्तते

vinatānaṁdanaṁ dṛṣṭvā purataḥ prāha keśavaḥ suparṇa tatra gaccha tvaṁ yatra yuddhaṁ pravartate

विनता के पुत्र को सामने देखकर केशव ने कहा — 'हे सुपर्ण! तुम वहाँ जाओ, जहाँ युद्ध चल रहा है।

श्लोक 6 (padma.6.14.6)

हतो जालंधरो वीरो हरो वा तेन मोहितः । दृष्ट्वा तं शीघ्रमागत्य कथयस्व ममाखिलम्

hato jālaṁdharo vīro haro vā tena mohitaḥ dṛṣṭvā taṁ śīghramāgatya kathayasva mamākhilam

वीर जालंधर मारा गया है, या हर उसके द्वारा मोहित हो गए हैं — यह देखकर शीघ्र लौट आओ और मुझे सब कुछ बताओ।

श्लोक 7 (padma.6.14.7)

जालंधरेशयोर्युद्धं द्रष्टुं शक्तस्त्वमेव हि । कोऽन्यो महाहवे तस्मिन्ज्ञात्वा याति शरीरवान्

jālaṁdhareśayoryuddhaṁ draṣṭuṁ śaktastvameva hi ko'nyo mahāhave tasminjñātvā yāti śarīravān

जालंधर और ईश्वर के युद्ध को देखने में तुम ही समर्थ हो; उस महासंग्राम को समझकर भला कौन शरीरधारी और वहाँ जा सकता है?

श्लोक 8 (padma.6.14.8)

कदाचिद्दुर्गमं तत्र युद्धं शस्त्रास्त्रवृष्टिभिः । अथ त्वं बाणसंचारं गत्वापि हितविग्रहः

kadāciddurgamaṁ tatra yuddhaṁ śastrāstravṛṣṭibhiḥ atha tvaṁ bāṇasaṁcāraṁ gatvāpi hitavigrahaḥ

वहाँ कभी-कभी शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा से युद्ध दुर्गम हो सकता है; अतः बाणों की उस बौछार में जाकर भी अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए,

श्लोक 9 (padma.6.14.9)

संदृष्ट्वा पार्वतीवृत्तिं शीघ्रमायातुमर्हसि । दैत्यमायानिरासार्थं विचिंत्य भगवांस्त्वरन्

saṁdṛṣṭvā pārvatīvṛttiṁ śīghramāyātumarhasi daityamāyānirāsārthaṁ viciṁtya bhagavāṁstvaran

पार्वती की स्थिति को देखकर तुम्हें शीघ्र लौट आना चाहिए।' दैत्य की माया का निवारण करने के उपाय पर विचार करते हुए, शीघ्रता से भगवान ने —

श्लोक 10 (padma.6.14.10)

गुटिकां सर्वसिद्धां च गरुडाय ददौ हरिः । अनया न भ्रमो वीर तथेत्युक्त्वा मुखेक्षिपत्

guṭikāṁ sarvasiddhāṁ ca garuḍāya dadau hariḥ anayā na bhramo vīra tathetyuktvā mukhekṣipat

हरि ने गरुड़ को सर्वसिद्धिदायक एक गोली दी — 'इससे तुम्हें कोई भ्रम नहीं होगा, हे वीर।' 'ऐसा ही हो' कहकर उसने उसे मुख में डाल लिया।

श्लोक 11 (padma.6.14.11)

एवं संप्रेरितः पत्री हरिं कृत्वा प्रदक्षिणम् । निश्चक्राम खमाविश्य जगामाद्भुतवेगवान्

evaṁ saṁpreritaḥ patrī hariṁ kṛtvā pradakṣiṇam niścakrāma khamāviśya jagāmādbhutavegavān

इस प्रकार भेजे जाने पर, हरि की प्रदक्षिणा करके, वह पंखधारी आकाश में प्रवेश करके अद्भुत वेग से चल पड़ा।

श्लोक 12 (padma.6.14.12)

तत्र गत्वा रणं घोरं दैत्यसंघैः स दुःसहम् । दृष्टवानखिलेनासौ न किंचिज्ज्ञातवान्किल

tatra gatvā raṇaṁ ghoraṁ daityasaṁghaiḥ sa duḥsaham dṛṣṭavānakhilenāsau na kiṁcijjñātavānkila

वहाँ जाकर उसने दैत्य-समूहों से असहनीय वह भयंकर युद्ध देखा; सब कुछ देखने पर भी वह वास्तव में कुछ भी नहीं समझ सका।

श्लोक 13 (padma.6.14.13)

तस्मादुत्पत्य वेगेन गतोऽसौ मानसोत्तरम् । शैलं तुंगतरं दुर्गमगम्यं मरुतामपि

tasmādutpatya vegena gato'sau mānasottaram śailaṁ tuṁgataraṁ durgamagamyaṁ marutāmapi

वहाँ से वेगपूर्वक उड़कर वह मानसोत्तर पर्वत की ओर गया, जो अत्यंत ऊँचा और वायु के लिए भी दुर्गम था।

श्लोक 14 (padma.6.14.14)

विलोकयन्न ददृशे गौरीस्थानं पतंगराट् । तत्रागत्य भुजंगारिर्ध्वनिं संश्रुतवान्किल

vilokayanna dadṛśe gaurīsthānaṁ pataṁgarāṭ tatrāgatya bhujaṁgārirdhvaniṁ saṁśrutavānkila

खोजते हुए भी उस पक्षिराज को गौरी का स्थान नहीं मिला; वहाँ जाकर सर्पों के शत्रु (गरुड़) ने एक ध्वनि सुनी।

श्लोक 15 (padma.6.14.15)

गत्वा समीपे ददृशे मायापशुपतिं ततः । गरुडो गुटिकां क्षिप्य मुखेन भ्रममाप सः

gatvā samīpe dadṛśe māyāpaśupatiṁ tataḥ garuḍo guṭikāṁ kṣipya mukhena bhramamāpa saḥ

पास जाकर उसने तब मायावी पशुपति को देखा; गरुड़ ने वह गोली मुख में डालकर पहले स्वयं भ्रमित हुआ,

श्लोक 16 (padma.6.14.16)

ज्ञात्वा बुद्ध्वाथ दैत्योऽयमिति नायं वृषध्वजः । हा कष्टमिति चोक्त्वा च रुदन्नागत्य चार्णवम्

jñātvā buddhvātha daityo'yamiti nāyaṁ vṛṣadhvajaḥ hā kaṣṭamiti coktvā ca rudannāgatya cārṇavam

फिर समझकर जान लिया — 'यह दैत्य है, यह वृषभध्वज नहीं है'; 'हाय, यह क्या अनर्थ हुआ' कहकर वह रोते हुए सागर के पास आया,

श्लोक 17 (padma.6.14.17)

कथयामास वृत्तांतं पुरतः कैटभद्विषः । देव जालंधरेणायं हरो देवो विडंबितः

kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ purataḥ kaiṭabhadviṣaḥ deva jālaṁdhareṇāyaṁ haro devo viḍaṁbitaḥ

और कैटभ के शत्रु (विष्णु) के सामने पूरा वृत्तांत सुनाया — 'हे देव! जालंधर द्वारा शिव देव का यह अपमान किया गया है;

श्लोक 18 (padma.6.14.18)

उमा प्रतारिता तेन पापेन छद्मरूपिणा । सुरस्त्वं यदि गोविंद समरं प्रतियाह्यतः

umā pratāritā tena pāpena chadmarūpiṇā surastvaṁ yadi goviṁda samaraṁ pratiyāhyataḥ

उमा को उस पापी ने छद्म रूप धारण करके धोखा दिया है। हे गोविंद! यदि आप सचमुच देव हैं, तो अब युद्ध की ओर लौटिए।

श्लोक 19 (padma.6.14.19)

मायायुद्धं तु देवेश कुरु जालंधरं प्रति । तस्य राज्ञी मया दृष्टा पीठे जालंधरे शुभे

māyāyuddhaṁ tu deveśa kuru jālaṁdharaṁ prati tasya rājñī mayā dṛṣṭā pīṭhe jālaṁdhare śubhe

हे देवेश! आप स्वयं जालंधर के प्रति माया-युद्ध कीजिए। मैंने उसकी रानी को शुभ जालंधर-पीठ में देखा है,

श्लोक 20 (padma.6.14.20)

प्रासादभूम्यां क्रीडंती वाद्यगीतादिवर्त्तनैः । सा सुंदरतरा गौर्या रंभोर्वश्योः शतादपि

prāsādabhūmyāṁ krīḍaṁtī vādyagītādivarttanaiḥ sā suṁdaratarā gauryā raṁbhorvaśyoḥ śatādapi

राजमहल की भूमि पर वाद्य-गीत आदि के बीच क्रीड़ा करती हुई; वह सौ रंभाओं और उर्वशियों से भी अधिक सुंदर है।

श्लोक 21 (padma.6.14.21)

नेदानीं मानुषे लोके न पातालेषु तत्समा । भार्या तेन समा वेश्या नारीणां का कथा हरे

nedānīṁ mānuṣe loke na pātāleṣu tatsamā bhāryā tena samā veśyā nārīṇāṁ kā kathā hare

अब मनुष्य-लोक में तो क्या, पातालों में भी उसके समान कोई नहीं है। हे हरि! उसके समान वेश्या तो क्या, अन्य स्त्रियों की तो बात ही क्या!

श्लोक 22 (padma.6.14.22)

यस्तां स्पृशति देहेन सकृतार्थः पुमान्भवेत् । तव श्यालकपत्नी च हर त्वं तां रम प्रियाम् । शंकरस्योपकारं च कुरु चैवात्मनः सुखम्

yastāṁ spṛśati dehena sakṛtārthaḥ pumānbhavet tava śyālakapatnī ca hara tvaṁ tāṁ rama priyām śaṁkarasyopakāraṁ ca kuru caivātmanaḥ sukham

जो कोई भी उसे अपने शरीर से स्पर्श कर ले, वह पुरुष उसी क्षण कृतार्थ हो जाता है। वह मानो आपकी ही साली-सम है — उसे हरकर, उस प्रिया को भोगिए; इस प्रकार शंकर का भी उपकार होगा और आपको भी सुख मिलेगा।'

श्लोक 23 (padma.6.14.23)

नारद उवाच ।श्रुत्वा तार्क्ष्यस्य वचनं तं निर्भर्त्स्य रमाप्रियः । सम्यग्व्यवस्य चोपायं विससर्ज द्रुतं द्विजम्

nārada uvāca śrutvā tārkṣyasya vacanaṁ taṁ nirbhartsya ramāpriyaḥ samyagvyavasya copāyaṁ visasarja drutaṁ dvijam

नारद ने कहा — गरुड़ का यह वचन सुनकर रमापति (विष्णु) ने उसे डाँटा, फिर भी अपने ही उपाय का भलीभाँति निश्चय करके उस पक्षी को शीघ्र विदा किया।

श्लोक 24 (padma.6.14.24)

श्रियंपतार्य्य संछाद्य मंचके पीतवाससा । निर्गतोऽन्येन रूपेण योगि मायाबलेन च

śriyaṁpatāryya saṁchādya maṁcake pītavāsasā nirgato'nyena rūpeṇa yogi māyābalena ca

पीले वस्त्र से ढकी शय्या पर श्री (लक्ष्मी) को छिपाकर, वे स्वयं एक और रूप में — योगी के रूप में, माया-बल से — निकल पड़े,

श्लोक 25 (padma.6.14.25)

वृंदारिकानुरागेण मोहितो मधुसूदनः । दृष्ट्वा हरिं तु गच्छंतं प्रतिछन्नं युधिष्ठिर

vṛṁdārikānurāgeṇa mohito madhusūdanaḥ dṛṣṭvā hariṁ tu gacchaṁtaṁ pratichannaṁ yudhiṣṭhira

मानो वृंदा के प्रति अनुराग से मोहित; मधुसूदन [इस प्रकार चले]। हे युधिष्ठिर! हरि को इस प्रकार छद्म रूप में जाते देखकर,

श्लोक 26 (padma.6.14.26)

शेषोप्यन्यतमेनासौ रूपेणागत्य केशवम् । जगाद भक्त्या त्वं तिष्ठ ममानुज्ञातुमर्हसि

śeṣopyanyatamenāsau rūpeṇāgatya keśavam jagāda bhaktyā tvaṁ tiṣṭha mamānujñātumarhasi

शेष भी एक और रूप धारण करके केशव के पास आया और भक्तिपूर्वक कहा — 'रुकिए, मुझे भी आज्ञा दीजिए।

श्लोक 27 (padma.6.14.27)

किं करोमि क्व गच्छामि ब्रूहि कार्यं जनार्दन । सदा तव मुखं दृष्ट्वा भोक्ष्यामीति भवेत्सुखम्

kiṁ karomi kva gacchāmi brūhi kāryaṁ janārdana sadā tava mukhaṁ dṛṣṭvā bhokṣyāmīti bhavetsukham

मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ — मुझे कार्य बताइए, हे जनार्दन! सदा आपका ही मुख देखकर मुझे सुख मिलेगा।'

श्लोक 28 (padma.6.14.28)

श्रीभगवानुवाच ।जालंधरस्त्रियं रम्यां हरिष्ये हरकारणात् । पार्वत्याश्चोपकाराय संछाद्य स्वात्मनस्तनुम्

śrībhagavānuvāca jālaṁdharastriyaṁ ramyāṁ hariṣye harakāraṇāt pārvatyāścopakārāya saṁchādya svātmanastanum

श्री भगवान ने कहा — 'हर के लिए और पार्वती के हित के लिए, अपना ही रूप छिपाकर, मैं जालंधर की सुंदर पत्नी को हर लूँगा।

श्लोक 29 (padma.6.14.29)

एहि यामो वयं बंधो कांतारं दुरतिक्रमम् । वृंदाकर्षणसिद्ध्यर्थमित्युक्त्वा तौ वनं गतौ

ehi yāmo vayaṁ baṁdho kāṁtāraṁ duratikramam vṛṁdākarṣaṇasiddhyarthamityuktvā tau vanaṁ gatau

आओ, हम दोनों उस दुर्गम वन में चलें, हे मित्र, वृंदा को खींच लाने के प्रयोजन से।' यह कहकर वे दोनों वन में गए।

श्लोक 30 (padma.6.14.30)

ततो विष्णुश्च शेषश्च जटावल्कलधारिणौ । आश्रमं चक्रतुः पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्

tato viṣṇuśca śeṣaśca jaṭāvalkaladhāriṇau āśramaṁ cakratuḥ puṇyaṁ sarvakāmaphalapradam

तब जटा और वल्कल धारण किए विष्णु और शेष ने वहाँ सभी कामनाओं का फल देने वाला एक पवित्र आश्रम बनाया।

श्लोक 31 (padma.6.14.31)

तयोः शिष्याः प्रशिष्याश्च बभूवुः कामरूपिणः । सिंहव्याघ्रवराहाश्च ऋक्षवानरमर्कटाः

tayoḥ śiṣyāḥ praśiṣyāśca babhūvuḥ kāmarūpiṇaḥ siṁhavyāghravarāhāśca ṛkṣavānaramarkaṭāḥ

उनके शिष्य और प्रशिष्य इच्छानुसार रूप धारण करने वाले — सिंह, बाघ, वराह, भालू, वानर और बंदर — बन गए।

श्लोक 32 (padma.6.14.32)

अथ तस्मिन्वने वृंदां मंत्रेणाकर्षयद्धरिः । तस्या हृदयसंतापं चकार मधुसूदनः

atha tasminvane vṛṁdāṁ maṁtreṇākarṣayaddhariḥ tasyā hṛdayasaṁtāpaṁ cakāra madhusūdanaḥ

फिर हरि ने उस वन में मंत्र से वृंदा को आकर्षित किया; मधुसूदन ने उसके हृदय में जलन उत्पन्न कर दी।

श्लोक 33 (padma.6.14.33)

एतस्मिन्नंतरे राज्ञी तापमुग्रमुपागता । चामरांश्चालयामास दिव्यस्त्रीकरचालितान्

etasminnaṁtare rājñī tāpamugramupāgatā cāmarāṁścālayāmāsa divyastrīkaracālitān

इसी बीच रानी को भी अत्यंत तीव्र संताप घेर आया; उसने दिव्य स्त्रियों के हाथों से चलाए जाने वाले चँवर झुलवाए,

श्लोक 34 (padma.6.14.34)

प्रियस्यागमनं तन्वीं चिंतयंती मुहुर्मुहुः । चंदनागुरुलिप्तांगी मूर्च्छां याति हि सत्वरम्

priyasyāgamanaṁ tanvīṁ ciṁtayaṁtī muhurmuhuḥ caṁdanāguruliptāṁgī mūrcchāṁ yāti hi satvaram

बार-बार अपने प्रिय के आगमन की चिंता करती हुई, वह कोमलांगी चंदन-अगरु से लिप्त शरीर लिए शीघ्र ही मूर्च्छित हो जाती थी।

श्लोक 35 (padma.6.14.35)

तुर्ययामे विभावर्याश्चतुर्दश्यां नृपांगना । स्वप्नं ददर्श भयदं वैधव्यभयसूचकम्

turyayāme vibhāvaryāścaturdaśyāṁ nṛpāṁganā svapnaṁ dadarśa bhayadaṁ vaidhavyabhayasūcakam

रात्रि के चौथे प्रहर में, चतुर्दशी को, राजरानी ने वैधव्य-भय की सूचना देने वाला एक भयावह स्वप्न देखा।

श्लोक 36 (padma.6.14.36)

जालंधरशिरः शुष्कं मर्दितं पांडुभस्मना । गृध्रेण कृष्टनयनं छिन्नकर्णाग्रनासिकम्

jālaṁdharaśiraḥ śuṣkaṁ marditaṁ pāṁḍubhasmanā gṛdhreṇa kṛṣṭanayanaṁ chinnakarṇāgranāsikam

जालंधर का सिर मुरझाया हुआ, पीली भस्म से लिपटा, गिद्ध द्वारा नोची हुई आँखों वाला, कान और नासिका के अगले भाग से रहित —

श्लोक 37 (padma.6.14.37)

मुक्तकेशी करालास्या कृष्णवर्णारुणांबरा । चखाद काली रक्तास्या हस्ते विधृतखर्परा

muktakeśī karālāsyā kṛṣṇavarṇāruṇāṁbarā cakhāda kālī raktāsyā haste vidhṛtakharparā

खुले केशों, विकराल मुख, काले वर्ण, लाल वस्त्र वाली, लाल मुख वाली काली उसे चबा रही थी, हाथ में खप्पर लिए हुए।

श्लोक 38 (padma.6.14.38)

ईदृशं ददृशे स्वप्नं तथात्मानं विडंबितम् । दैत्यक्षयगुणोपेतं सा ददर्श नृपांगना

īdṛśaṁ dadṛśe svapnaṁ tathātmānaṁ viḍaṁbitam daityakṣayaguṇopetaṁ sā dadarśa nṛpāṁganā

ऐसा स्वप्न, और अपने आप को भी इस प्रकार अपमानित होते हुए, राजरानी ने दैत्य के विनाश के चिह्नों सहित देखा।

श्लोक 39 (padma.6.14.39)

ततः प्रबुद्धाऽसुरराजपत्नी गीतेन वाद्येन च मागधानाम् । गेयप्रबंधैः स्तवनैर्व चोभिर्वं शस्तवैः किंपुरुषप्रपाठितैः

tataḥ prabuddhā'surarājapatnī gītena vādyena ca māgadhānām geyaprabaṁdhaiḥ stavanairva cobhirvaṁ śastavaiḥ kiṁpuruṣaprapāṭhitaiḥ

तब उस असुरराज-पत्नी को मागधों के गीत-वाद्य से, स्तुति-गान से, किंपुरुषों द्वारा पढ़े गए वंश-स्तवनों से जगाया गया।

श्लोक 40 (padma.6.14.40)

ततस्तान्सकलान्श्रांतान्धनं दत्वा प्रसादजम् । निवार्य विप्रानाहूय स्वप्नं दृष्टं न्यवेदयत् । तं स्वप्नं ब्राह्मणाः श्रुत्वा तामूचुः शास्त्रपारगाः

tatastānsakalānśrāṁtāndhanaṁ datvā prasādajam nivārya viprānāhūya svapnaṁ dṛṣṭaṁ nyavedayat taṁ svapnaṁ brāhmaṇāḥ śrutvā tāmūcuḥ śāstrapāragāḥ

फिर उन सब थके हुए गायकों को कृपापूर्वक धन देकर, उन्हें रोककर, ब्राह्मणों को बुलाकर उसने अपना देखा हुआ स्वप्न बताया। शास्त्रों में निपुण उन ब्राह्मणों ने वह स्वप्न सुनकर उससे कहा —

श्लोक 41 (padma.6.14.41)

द्विजा ऊचुः ।देवि दुःस्वप्नमत्युग्रमचिंत्यं भयदायकम् । देहि दानं द्विजातिभ्यो ह्यचिंत्य भयनाशकम्

dvijā ūcuḥ devi duḥsvapnamatyugramaciṁtyaṁ bhayadāyakam dehi dānaṁ dvijātibhyo hyaciṁtya bhayanāśakam

द्विजों ने कहा — 'हे देवी! यह अत्यंत भयंकर, अकल्पनीय, भय देने वाला दुःस्वप्न है — द्विजों को दान दीजिए, जो अकल्पनीय भय को भी नष्ट कर देता है।

श्लोक 42 (padma.6.14.42)

धेनुर्वासांसि रत्नानि गजांश्चाभरणानि च । ब्राह्मणाः परिसंतुष्टाः सिषिचुस्तां नृपस्त्रियम्

dhenurvāsāṁsi ratnāni gajāṁścābharaṇāni ca brāhmaṇāḥ parisaṁtuṣṭāḥ siṣicustāṁ nṛpastriyam

गाय, वस्त्र, रत्न, हाथी और आभूषण — ब्राह्मण पूर्णतः संतुष्ट होकर उस राजरानी को आशीर्वाद-जल से सींचने लगे।

श्लोक 43 (padma.6.14.43)

अभिषिक्तापि सा वृंदा ज्वरेण परितप्यते । विसृज्य विप्रप्रवरान्प्रासादमगमत्तदा

abhiṣiktāpi sā vṛṁdā jvareṇa paritapyate visṛjya viprapravarānprāsādamagamattadā

इस प्रकार आशीर्वाद पाकर भी वृंदा ज्वर से संतप्त रही; श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विदा करके वह तब अपने महल में गई।

श्लोक 44 (padma.6.14.44)

तत्र स्थितापि स्वपुरं ददृशे दीप्तमंगला । ततः स्वकर्मणा राजन्नाकृष्टा हरिणा तु सा

tatra sthitāpi svapuraṁ dadṛśe dīptamaṁgalā tataḥ svakarmaṇā rājannākṛṣṭā hariṇā tu sā

वहाँ खड़ी होकर भी उसे अपनी ही मंगलमय नगरी मानो जलती हुई-सी दिखाई दी; तब, हे राजन्! हरि के प्रयत्न से खिंची हुई वह,

श्लोक 45 (padma.6.14.45)

न शशाक गृहे स्थातुं ततो राज्ञी वनं ययौ । रथमश्वतरीयुक्तं स्मरदूतीसखीवहम्

na śaśāka gṛhe sthātuṁ tato rājñī vanaṁ yayau rathamaśvatarīyuktaṁ smaradūtīsakhīvaham

घर में ठहर नहीं सकी, और रानी वन की ओर चली गई — खच्चरों से जुते रथ पर, अपनी सखी स्मरदूती द्वारा संचालित,

श्लोक 46 (padma.6.14.46)

समारुह्य क्षणात्तन्वी प्राप्ता सौभाग्यकाननम् । नानावृक्षसमायुक्तं नानापक्षिगणान्वितम्

samāruhya kṣaṇāttanvī prāptā saubhāgyakānanam nānāvṛkṣasamāyuktaṁ nānāpakṣigaṇānvitam

उस पर सवार होकर वह कोमलांगी क्षणभर में सौभाग्य-वन पहुँच गई, जो अनेक वृक्षों से युक्त और अनेक पक्षी-समूहों से भरा था,

श्लोक 47 (padma.6.14.47)

पुष्पप्रस्रवणोपेतं स्वर्गनारीविभूषितम् । मंदानिलप्रवेशोऽस्ति यत्र नान्यस्य कस्यचित्

puṣpaprasravaṇopetaṁ svarganārīvibhūṣitam maṁdānilapraveśo'sti yatra nānyasya kasyacit

फूलों और झरनों से भरा, स्वर्ग की स्त्रियों से सुशोभित, जहाँ केवल मंद वायु ही प्रवेश करती थी, अन्य किसी की नहीं।

श्लोक 48 (padma.6.14.48)

वनं वृंदारिका दृष्ट्वा सस्मार पतिमात्मनः । कथं जालंधरं वीरं द्रक्ष्यामि प्राप्तमग्रतः

vanaṁ vṛṁdārikā dṛṣṭvā sasmāra patimātmanaḥ kathaṁ jālaṁdharaṁ vīraṁ drakṣyāmi prāptamagrataḥ

उस वन को देखकर वृंदारिका को अपने पति का स्मरण हो आया — 'वीर जालंधर को आगे आते हुए मैं कैसे देखूँगी?'

श्लोक 49 (padma.6.14.49)

सा तत्र न सुखं लेभे विवेशान्यतमं वनम् । सखीरथसमायुक्ता विष्णुमायाविमोहिता

sā tatra na sukhaṁ lebhe viveśānyatamaṁ vanam sakhīrathasamāyuktā viṣṇumāyāvimohitā

वहाँ उसे सुख नहीं मिला, और विष्णु की माया से मोहित होकर, सखी सहित रथ पर वह वन के दूसरे भाग में चली गई।

श्लोक 50 (padma.6.14.50)

ततो विलोकयामास विपिनं तरुसंकुलम् । उरुपाषाणसंरुद्धं कुरंगाक्षी भयावहम्

tato vilokayāmāsa vipinaṁ tarusaṁkulam urupāṣāṇasaṁruddhaṁ kuraṁgākṣī bhayāvaham

तब उस मृगनयनी ने वृक्षों से घिरे, विशाल पत्थरों से अवरुद्ध, भयावह एक जंगल को देखा।

श्लोक 51 (padma.6.14.51)

सिंहव्याघ्रभयाकीर्णंशृगालव्यालसेवितम् । द्रुमैः स्पृशच्छिखाकाशैर्गुहासु ध्वांतपूरितम्

siṁhavyāghrabhayākīrṇaṁśṛgālavyālasevitam drumaiḥ spṛśacchikhākāśairguhāsu dhvāṁtapūritam

सिंह-व्याघ्र के भय से व्याप्त, गीदड़ों और सर्पों से सेवित, गगन को छूती चोटियों वाले वृक्षों से युक्त, गुफाओं में अंधकार से भरा हुआ —

श्लोक 52 (padma.6.14.52)

वनं विलोक्य सा भीमं चकिता चपलेक्षणा । स्मरदूतीं सखीं वृंदा जगाद रथवाहिनीम् । रथं प्रेषय मे शीघ्रं स्मरदूति गृहं प्रति

vanaṁ vilokya sā bhīmaṁ cakitā capalekṣaṇā smaradūtīṁ sakhīṁ vṛṁdā jagāda rathavāhinīm rathaṁ preṣaya me śīghraṁ smaradūti gṛhaṁ prati

उस भयानक वन को देखकर चंचल नेत्रों वाली वह चकित हो गई; वृंदा ने रथ चलाने वाली अपनी सखी स्मरदूती से कहा — 'हे स्मरदूति! शीघ्र मेरा रथ घर की ओर भेज दो।'

श्लोक 53 (padma.6.14.53)

स्मरदूतिरुवाच ।नाहं जानामि दिग्भागं न यामि क्व रथं सखि । श्रांता अश्व्यः प्रवर्तंते मार्गश्चात्र न विद्यते

smaradūtiruvāca nāhaṁ jānāmi digbhāgaṁ na yāmi kva rathaṁ sakhi śrāṁtā aśvyaḥ pravartaṁte mārgaścātra na vidyate

स्मरदूती ने कहा — 'हे सखी! मुझे दिशा का पता नहीं, न जानती हूँ रथ को कहाँ ले जाऊँ; घोड़ियाँ थकी हुई अपने आप चल रही हैं, और यहाँ कोई मार्ग भी नहीं है।

श्लोक 54 (padma.6.14.54)

प्रेरितो दैवकेनापि स्यंदनो यातु यत्र च । अत्र कोपि च मांसादो भक्षयिष्यति नान्यथा

prerito daivakenāpi syaṁdano yātu yatra ca atra kopi ca māṁsādo bhakṣayiṣyati nānyathā

भाग्य से प्रेरित यह रथ जहाँ भी जाए, वहीं जाने दो; यहाँ तो कोई मांसाहारी प्राणी हमें खा जाएगा, इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।'

श्लोक 55 (padma.6.14.55)

इत्युक्ता सा द्रुततरा रथं शीघ्रमवाहयत् । स रथो वेगतः प्राप्तो यत्र सिद्धा मुदान्विताः

ityuktā sā drutatarā rathaṁ śīghramavāhayat sa ratho vegataḥ prāpto yatra siddhā mudānvitāḥ

यह कहे जाने पर उसने अत्यंत शीघ्रता से रथ को हाँका; वह रथ वेग से वहाँ जा पहुँचा जहाँ प्रसन्न सिद्धगण थे —

श्लोक 56 (padma.6.14.56)

तत्र सिद्धाश्च दृश्यंते काननं च भयावहम् । न यत्र प्रबलो वायुर्न शब्दः पक्षिणामपि

tatra siddhāśca dṛśyaṁte kānanaṁ ca bhayāvaham na yatra prabalo vāyurna śabdaḥ pakṣiṇāmapi

वहाँ सिद्ध भी दिखाई देते थे और भयावह वन भी, जहाँ न तेज़ हवा थी, न पक्षियों की भी कोई ध्वनि थी।

श्लोक 57 (padma.6.14.57)

न च तेजः प्रकाशोऽस्ति न जलं प्रदिशो दिशः । तत्र प्राप्तरथस्यापि लक्षणेऽभूद्विपर्ययः

na ca tejaḥ prakāśo'sti na jalaṁ pradiśo diśaḥ tatra prāptarathasyāpi lakṣaṇe'bhūdviparyayaḥ

न कोई तेज़ प्रकाश था, न किसी दिशा में जल था; वहाँ पहुँचे रथ के भी सारे लक्षण उलटे हो गए।

श्लोक 58 (padma.6.14.58)

अश्वतर्यो न हेषंते न च शब्दश्च नेमिजः । न चलंति पताकास्ता घंटिका न क्वणंति च

aśvataryo na heṣaṁte na ca śabdaśca nemijaḥ na calaṁti patākāstā ghaṁṭikā na kvaṇaṁti ca

खच्चरियाँ हिनहिनाती नहीं थीं, न पहिये की कोई ध्वनि थी; न पताकाएँ हिलती थीं, न घंटियाँ बजती थीं।

श्लोक 59 (padma.6.14.59)

न स्वनंति महाघंटा ध्वजस्तंभे निवेशिताः । विलोक्यैवंविधं प्राह तत्र वृंदा सखीं प्रति

na svanaṁti mahāghaṁṭā dhvajastaṁbhe niveśitāḥ vilokyaivaṁvidhaṁ prāha tatra vṛṁdā sakhīṁ prati

ध्वजदंड पर लगी बड़ी घंटियाँ भी नहीं बज रही थीं। यह देखकर वृंदा ने वहाँ अपनी सखी से कहा —

श्लोक 60 (padma.6.14.60)

स्मरदूति क्व यास्यामो व्याघ्रसिंहभयं वनम् । न गृहे न सुखं राज्ये मम जातं वने सखि

smaradūti kva yāsyāmo vyāghrasiṁhabhayaṁ vanam na gṛhe na sukhaṁ rājye mama jātaṁ vane sakhi

'हे स्मरदूति! हम कहाँ जाएँ — यह वन तो व्याघ्र-सिंह के भय से भरा है? हे सखी! न घर में, न राज्य में मुझे ऐसा दुःख हुआ, जैसा इस वन में हुआ है।'

श्लोक 61 (padma.6.14.61)

स्मरदूतिरुवाच ।शृणुष्व देवि पश्य त्वं पुरः शैलोऽतिदारुणः । दृष्ट्वाग्रतो न गच्छंति तुरंग्यो भयविह्वलाः

smaradūtiruvāca śṛṇuṣva devi paśya tvaṁ puraḥ śailo'tidāruṇaḥ dṛṣṭvāgrato na gacchaṁti turaṁgyo bhayavihvalāḥ

स्मरदूती ने कहा — 'हे देवी! सुनिए, आगे देखिए, वहाँ एक अत्यंत भयंकर पर्वत है; उसे देखकर ही भयभीत घोड़ियाँ आगे नहीं बढ़तीं।'

श्लोक 62 (padma.6.14.62)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा संत्रस्ता सा नृपांगना । दृष्ट्वा हारं स्वकंठस्थं स्यंदनाच्छीघ्रमुत्थिता

tasyāstadvacanaṁ śrutvā saṁtrastā sā nṛpāṁganā dṛṣṭvā hāraṁ svakaṁṭhasthaṁ syaṁdanācchīghramutthitā

उसकी यह बात सुनकर भयभीत हुई वह राजरानी, अपने ही गले में पड़े हार को देखते हुए, शीघ्र ही रथ से उठ खड़ी हुई।

श्लोक 63 (padma.6.14.63)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो राक्षसो भीषणाकृतिः । त्रिपादः पंचहस्तश्च सप्तनेत्रोऽतिदारुणः

etasminnaṁtare prāpto rākṣaso bhīṣaṇākṛtiḥ tripādaḥ paṁcahastaśca saptanetro'tidāruṇaḥ

इसी बीच एक भयंकर आकृति वाला राक्षस वहाँ आ पहुँचा — तीन पैरों, पाँच हाथों, सात आँखों वाला, अत्यंत भयानक,

श्लोक 64 (padma.6.14.64)

पिंगलो व्याघ्रकर्णश्च सिंहस्कंधस्तथाननः । विहंगेशसमाः केशा लंबंते रुधिरारुणाः

piṁgalo vyāghrakarṇaśca siṁhaskaṁdhastathānanaḥ vihaṁgeśasamāḥ keśā laṁbaṁte rudhirāruṇāḥ

पीले वर्ण का, बाघ के कान और सिंह के कंधे-मुख वाला; उसके बाल पक्षिराज (गरुड़) के पंखों जैसे लटकते हुए, रक्त-लाल थे।

श्लोक 65 (padma.6.14.65)

तं दृष्ट्वा पद्मकोशांगी सहसा सभयाभवत् । नेत्रे कराभ्यामाच्छाद्य चकंपे कदलीव सा

taṁ dṛṣṭvā padmakośāṁgī sahasā sabhayābhavat netre karābhyāmācchādya cakaṁpe kadalīva sā

उसे देखते ही वह कमल-कोश-सी सुकोमल स्त्री सहसा भयभीत हो उठी; दोनों हाथों से आँखें ढककर वह केले के पेड़ की तरह काँप उठी।

श्लोक 66 (padma.6.14.66)

प्रतिहारी प्रतोदं तु त्यक्त्वा राज्ञीमभाषत । भीतां मां त्राहि देवि त्वमयं धावति भक्षितुम्

pratihārī pratodaṁ tu tyaktvā rājñīmabhāṣata bhītāṁ māṁ trāhi devi tvamayaṁ dhāvati bhakṣitum

रथ की द्वारपालिका ने चाबुक छोड़कर रानी से कहा — 'हे देवी! भयभीत मुझे बचाइए, यह मुझे खाने के लिए दौड़ा आ रहा है!'

श्लोक 67 (padma.6.14.67)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो राक्षसो रथसंनिधौ । रथमुत्क्षिप्य हस्तेन भ्रामयंश्चाश्विनीयुतम्

etasminnaṁtare prāpto rākṣaso rathasaṁnidhau rathamutkṣipya hastena bhrāmayaṁścāśvinīyutam

इसी बीच वह राक्षस रथ के समीप पहुँच गया, और एक हाथ से रथ को उठाकर, खच्चरियों सहित उसे घुमाने लगा।

श्लोक 68 (padma.6.14.68)

सा राज्ञी पतिता भूमौ मृगी व्याघ्रभयादिव । स्मरदूती तरोर्मूले छिन्नाशोकलता यथा

sā rājñī patitā bhūmau mṛgī vyāghrabhayādiva smaradūtī tarormūle chinnāśokalatā yathā

वह रानी बाघ के भय से हिरणी की तरह भूमि पर गिर पड़ी; स्मरदूती भी वृक्ष की जड़ में कटी हुई अशोक-लता की भाँति गिर गई।

श्लोक 69 (padma.6.14.69)

ततस्ताश्चाश्विनीः सर्वाः भक्षयामास राक्षसः । तेन राज्ञी धृता हस्ते सिंहेनैणवधूरिव

tatastāścāśvinīḥ sarvāḥ bhakṣayāmāsa rākṣasaḥ tena rājñī dhṛtā haste siṁhenaiṇavadhūriva

फिर उस राक्षस ने उन सभी खच्चरियों को खा डाला; और उस रानी को उसने अपने हाथ में उसी तरह पकड़ लिया जैसे सिंह हिरणी के बच्चे को पकड़ता है।

श्लोक 70 (padma.6.14.70)

तामुवाच ततो रक्षः प्राणैस्ते कारणं यदि । तव भर्ता हतः संख्ये हरेणेति श्रुतं मया

tāmuvāca tato rakṣaḥ prāṇaiste kāraṇaṁ yadi tava bhartā hataḥ saṁkhye hareṇeti śrutaṁ mayā

तब उस राक्षस ने उससे कहा — 'यदि तुम्हें प्राणों की चिंता है, तो सुनो — मैंने सुना है कि तुम्हारा पति युद्ध में हर के हाथों मारा गया है।

श्लोक 71 (padma.6.14.71)

मामासाद्याद्य भर्तारं चिरंजीवाकुतोभया । पिबाथ वारुणीं स्वाद्वीं महामांससमन्विताम् । शृण्वंतीति वचो राज्ञी गतसत्वा इवाभवत्

māmāsādyādya bhartāraṁ ciraṁjīvākutobhayā pibātha vāruṇīṁ svādvīṁ mahāmāṁsasamanvitām śṛṇvaṁtīti vaco rājñī gatasatvā ivābhavat

आज मुझे ही पति के रूप में पाकर, निर्भय होकर चिरंजीवी रहो; यह स्वादिष्ट मदिरा और उत्तम मांस ग्रहण करो।' यह वचन सुनते-सुनते रानी मानो प्राणहीन-सी हो गई।

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