उत्तर खण्ड · अध्याय 147
खड्गतीर्थ
श्लोक 1 (padma.6.147.1)
महादेव उवाच। देवि वै श्रूयतां तीर्थं देवानामपि दुर्ल्लभम् । खड्गतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्
mahādeva uvāca devi vai śrūyatāṁ tīrthaṁ devānāmapi durllabham khaḍgatīrthamiti khyātaṁ sarvapāpapraṇāśanam
महादेव ने कहा — हे देवि, सुनो, एक ऐसा तीर्थ है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है — खड्गतीर्थ नाम से विख्यात, समस्त पापों का नाश करने वाला।
श्लोक 2 (padma.6.147.2)
खड्गतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा खङ्गेश्वरं शिवम् । न नरो दुर्गतिं गच्छेत्स्वर्गलोकं प्रगच्छति
khaḍgatīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā khaṅgeśvaraṁ śivam na naro durgatiṁ gacchetsvargalokaṁ pragacchati
खड्गतीर्थ में स्नान करके और खड्गेश्वर शिव के दर्शन करके मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता, वह स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (padma.6.147.3)
खड्गधारेश्वरं देवं यः पश्यति सुरोत्तमे । कार्तिक्यां तु विशेषेण पूजनं तत्र कारयेत्
khaḍgadhāreśvaraṁ devaṁ yaḥ paśyati surottame kārtikyāṁ tu viśeṣeṇa pūjanaṁ tatra kārayet
हे देवोत्तम, जो कोई खड्गधारेश्वर देव के दर्शन करता है, उसे कार्तिक मास में विशेष रूप से वहाँ पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 4 (padma.6.147.4)
अयं विश्वेश्वरो देवः सर्वदा भुवि वल्लभे । सर्वं ददाति सर्वेशो वांच्छितार्थप्रदायकः
ayaṁ viśveśvaro devaḥ sarvadā bhuvi vallabhe sarvaṁ dadāti sarveśo vāṁcchitārthapradāyakaḥ
हे प्रिये, यह विश्वेश्वर देव इस भूतल पर सदा वल्लभ हैं; वे सर्वेश समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, वे सब कुछ देते हैं।
श्लोक 5 (padma.6.147.5)
वैशाखे राज्यकामार्थी यः पश्यति तमीश्वरम् । तमर्थं लभते क्षिप्रं विश्वनाथप्रसादतः
vaiśākhe rājyakāmārthī yaḥ paśyati tamīśvaram tamarthaṁ labhate kṣipraṁ viśvanāthaprasādataḥ
वैशाख मास में राज्य की कामना रखने वाला जो व्यक्ति उस ईश्वर के दर्शन करता है, वह विश्वनाथ की कृपा से शीघ्र ही उस अर्थ को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 6 (padma.6.147.6)
पुष्पैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्दीपैर्वा नगनंदिनि । फलप्रदानैर्बिल्वैश्च विश्वेशं पूजयेत्ततः
puṣpairdhūpaiśca naivedyairdīpairvā naganaṁdini phalapradānairbilvaiśca viśveśaṁ pūjayettataḥ
हे पर्वत-पुत्री, फूलों, धूप, नैवेद्य, दीप, फलों के अर्पण और बिल्वपत्रों से विश्वेश की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 7 (padma.6.147.7)
धनधान्यप्रदं चाशु पुत्रपौत्रादिसंपदः । प्राप्यंते नात्र संदेहः श्रीविश्वेश्वरपूजनात्
dhanadhānyapradaṁ cāśu putrapautrādisaṁpadaḥ prāpyaṁte nātra saṁdehaḥ śrīviśveśvarapūjanāt
श्री विश्वेश्वर की पूजा से शीघ्र ही धन-धान्य, पुत्र-पौत्र आदि की संपत्ति प्राप्त होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।