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उत्तर खण्ड · अध्याय 146

रुद्र-महालय तीर्थ

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

श्लोक 1 (padma.6.146.1)

महादेव उवाच । ततो गच्छेत देवेशि तीर्थं रुद्र महालयम् । केदारानुपमं साक्षाद्रुद्रेण परिनिर्मितम्

mahādeva uvāca tato gaccheta deveśi tīrthaṁ rudra mahālayam kedārānupamaṁ sākṣādrudreṇa parinirmitam

महादेव ने कहा — हे देवेशि, इसके बाद रुद्र-महालय नामक तीर्थ में जाना चाहिए, जो केदार के समान अनुपम है, जिसे साक्षात् रुद्र ने ही रचा है।

श्लोक 2 (padma.6.146.2)

श्राद्धं तत्रैव कर्तव्यं पितॄणां तृप्तिकारणम् । तत्र श्राद्धप्रदानेन पितरः सपितामहाः

śrāddhaṁ tatraiva kartavyaṁ pitṝṇāṁ tṛptikāraṇam tatra śrāddhapradānena pitaraḥ sapitāmahāḥ

वहीं पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करना चाहिए। वहाँ श्राद्ध देने से पितर और पितामह सभी —

श्लोक 3 (padma.6.146.3)

तृप्ताः समभिगच्छंति रुद्रस्य परमं पदम् । वृषमुत्सृजते यस्तु तत्र रुद्र महालये

tṛptāḥ samabhigacchaṁti rudrasya paramaṁ padam vṛṣamutsṛjate yastu tatra rudra mahālaye

तृप्त होकर रुद्र के परम पद को प्राप्त होते हैं। जो कोई रुद्र-महालय में बैल छोड़ता है,

श्लोक 4 (padma.6.146.4)

कार्तिक्यामथ वैशाख्यां रुद्रेण सह मोदते । केदारे उदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते

kārtikyāmatha vaiśākhyāṁ rudreṇa saha modate kedāre udakaṁ pītvā punarjanma na vidyate

कार्तिक अथवा वैशाख मास में, वह रुद्र के साथ आनंदित होता है। केदार में जल पीकर मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 5 (padma.6.146.5)

अत्र तु स्नानमात्रेण मुक्तिभागी न संशयः । एकस्मिन्समये देवि त्यक्त्वा कैलासमागतः

atra tu snānamātreṇa muktibhāgī na saṁśayaḥ ekasminsamaye devi tyaktvā kailāsamāgataḥ

यहाँ केवल स्नान करने से ही मनुष्य मुक्ति का भागी बनता है, इसमें कोई संशय नहीं। एक बार, हे देवि, मैं कैलास छोड़कर यहाँ आया था।

श्लोक 6 (padma.6.146.6)

साभ्रमतीं महागंगां ज्ञात्वा लोकहिताय वै । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च कृत्वा तीर्थमनुत्तमम्

sābhramatīṁ mahāgaṁgāṁ jñātvā lokahitāya vai tatra snātvā ca pītvā ca kṛtvā tīrthamanuttamam

साभ्रमती महागंगा को लोक-कल्याण के लिए जानकर, वहाँ स्नान करके, जल पीकर, और उस अनुपम तीर्थ को बनाकर,

श्लोक 7 (padma.6.146.7)

ततोहं च स्वकं स्थानं कैलासं प्रति भामिनि । तदनंतरं महापुण्यं तीर्थं जातं महालयम्

tatohaṁ ca svakaṁ sthānaṁ kailāsaṁ prati bhāmini tadanaṁtaraṁ mahāpuṇyaṁ tīrthaṁ jātaṁ mahālayam

हे भामिनी, फिर मैं अपने ही स्थान कैलास को लौट गया। उसके बाद यह अत्यंत पुण्यमय तीर्थ महालय के नाम से प्रकट हुआ।

श्लोक 8 (padma.6.146.8)

रुद्र महालयमिति लोके ख्यातिं गमिष्यति । कार्तिक्यामथ वैशाख्यां ये गच्छंति सुरोत्तमे । न तेषां विद्यते दुःखं सर्वसंसारजं पुनः

rudra mahālayamiti loke khyātiṁ gamiṣyati kārtikyāmatha vaiśākhyāṁ ye gacchaṁti surottame na teṣāṁ vidyate duḥkhaṁ sarvasaṁsārajaṁ punaḥ

वह संसार में 'रुद्र-महालय' नाम से विख्यात होगा। हे देवोत्तम, जो कार्तिक अथवा वैशाख मास में वहाँ जाते हैं, उन्हें संसार से उत्पन्न कोई दुःख फिर कभी नहीं होता।

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