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उत्तर खण्ड · अध्याय 145

सोमेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

श्लोक 1 (padma.6.145.1)

श्रीमहादेव उवाच। ततो गच्छेः महत्तीर्थे संगमेश्वरमुत्तमम् । यत्र हस्तिमती पुण्या साभ्रमत्या हि संगता

śrīmahādeva uvāca tato gaccheḥ mahattīrthe saṁgameśvaramuttamam yatra hastimatī puṇyā sābhramatyā hi saṁgatā

श्री महादेव ने कहा — इसके बाद उत्तम संगमेश्वर नामक महातीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ पुण्यमयी हस्तिमती साभ्रमती के साथ संगम करती है।

श्लोक 2 (padma.6.145.2)

शापं कौडिन्यमुनितः प्राप्य शुष्काभवन्नदी । बहिश्चर्येति नाम्ना वै लोके ख्यातिमुपागता

śāpaṁ kauḍinyamunitaḥ prāpya śuṣkābhavannadī bahiścaryeti nāmnā vai loke khyātimupāgatā

कौंडिन्य मुनि से शाप प्राप्त कर वह नदी सूख गई थी; तब से वह संसार में 'बहिश्चर्या' नाम से विख्यात हो गई।

श्लोक 3 (padma.6.145.3)

तत्तीर्थं संप्रवक्ष्यामि पुण्यं त्रैलोक्यविश्रुतम् । सर्वपापहरं पुण्यं त्रैलोक्ये चापि विश्रुतम्

tattīrthaṁ saṁpravakṣyāmi puṇyaṁ trailokyaviśrutam sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ trailokye cāpi viśrutam

उस तीर्थ का वर्णन मैं करूँगा, जो पुण्यमय और तीनों लोकों में विख्यात है, समस्त पापों को हरने वाला और तीनों लोकों में प्रसिद्ध पुण्यमय है।

श्लोक 4 (padma.6.145.4)

यत्र तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं प्रगच्छति

yatra tīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṁ pragacchati

उस तीर्थ में स्नान करके और देव महेश्वर के दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (padma.6.145.5)

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि एतच्छापस्य कारणम् । यथैह शुष्करूपा हि जाता शापस्य कारणात्

śṛṇu devi pravakṣyāmi etacchāpasya kāraṇam yathaiha śuṣkarūpā hi jātā śāpasya kāraṇāt

हे देवि, सुनो, अब मैं इस शाप का कारण बताऊँगा — यह नदी शाप के ही कारण सूखे रूप को प्राप्त हुई थी।

श्लोक 6 (padma.6.145.6)

यत्र साभ्रमती पुण्या गंगा नाम महानदी । तत्र हस्तिमती नाम गंगया सह संगता

yatra sābhramatī puṇyā gaṁgā nāma mahānadī tatra hastimatī nāma gaṁgayā saha saṁgatā

जहाँ पुण्यमयी गंगा नामक महानदी साभ्रमती है, वहाँ हस्तिमती नामक नदी गंगा के साथ संगम करती थी।

श्लोक 7 (padma.6.145.7)

तत्रारब्धं च मुनिना तपो वै परमं महत् । एवं बहुगते काले ऋषिणा परमात्मना

tatrārabdhaṁ ca muninā tapo vai paramaṁ mahat evaṁ bahugate kāle ṛṣiṇā paramātmanā

वहाँ एक मुनि द्वारा परम महान तप आरंभ किया गया। इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर, परमात्म-ज्ञानी उस ऋषि ने —

श्लोक 8 (padma.6.145.8)

आराधितो हृषीकेशो नारायणनिरंजनः । तस्यास्तटे तु देवेशि वर्षाणि च बहून्यपि

ārādhito hṛṣīkeśo nārāyaṇaniraṁjanaḥ tasyāstaṭe tu deveśi varṣāṇi ca bahūnyapi

हृषीकेश, निर्मल नारायण की आराधना की। हे देवेशि, उसके तट पर कई वर्ष भी —

श्लोक 9 (padma.6.145.9)

गतानि च विशेषेण मुनेस्तस्य तु पार्वति । कदाचिद्दैवयोगाच्च वर्षाकालः समागतः

gatāni ca viśeṣeṇa munestasya tu pārvati kadāciddaivayogācca varṣākālaḥ samāgataḥ

हे पार्वती, उस मुनि के लिए विशेष रूप से बीत गए। किसी दैव-योग से एक बार वर्षा-ऋतु आ पहुँची।

श्लोक 10 (padma.6.145.10)

नदी तत्र तु संपूर्णा कालयोगेन सुव्रते । तत्कौंडिन्येन ऋषिणा स्थानं त्यक्तं तदा निशि

nadī tatra tu saṁpūrṇā kālayogena suvrate tatkauṁḍinyena ṛṣiṇā sthānaṁ tyaktaṁ tadā niśi

हे सुव्रते, समय के प्रभाव से वह नदी वहाँ जल से भर गई। तब कौंडिन्य ऋषि ने रात्रि में वह स्थान छोड़ दिया।

श्लोक 11 (padma.6.145.11)

रात्रौ दुःखं महज्जातं हाहेति करुणो रुदन् । किं कर्तव्यमिति ध्यायन्नतिचिंतापरोऽभवत्

rātrau duḥkhaṁ mahajjātaṁ hāheti karuṇo rudan kiṁ kartavyamiti dhyāyannaticiṁtāparo'bhavat

रात्रि में उन्हें बड़ा दुःख हुआ, वे 'हाय-हाय' कहते हुए करुणापूर्वक रोए। 'अब क्या करूँ' — ऐसा सोचते हुए वे अत्यंत चिंतित हो गए।

श्लोक 12 (padma.6.145.12)

आश्रमो हि महादिव्यो ऋषिणैव समायुतः । स गतो वारियोगेन हस्तिमत्यां सुरोत्तमे

āśramo hi mahādivyo ṛṣiṇaiva samāyutaḥ sa gato vāriyogena hastimatyāṁ surottame

वह अत्यंत दिव्य आश्रम, जो उन्हीं ऋषि के द्वारा युक्त था, जल के प्रवाह में बह गया, हे देवोत्तम, हस्तिमती में।

श्लोक 13 (padma.6.145.13)

फलानि चैव मूलानि पुस्तकानि बहून्यपि । तानि तस्यां गतान्येव वारियोगेन सुंदरि

phalāni caiva mūlāni pustakāni bahūnyapi tāni tasyāṁ gatānyeva vāriyogena suṁdari

हे सुंदरी, उनके फल, कंद-मूल और अनेक पुस्तकें भी — वे सब जल के प्रवाह में उसी नदी में बह गए।

श्लोक 14 (padma.6.145.14)

स कौंडिन्यो ऋषिश्रेष्ठः शशाप तां नदीं किल । उदकेन विना त्वं च भविष्यसि कलौ युगे

sa kauṁḍinyo ṛṣiśreṣṭhaḥ śaśāpa tāṁ nadīṁ kila udakena vinā tvaṁ ca bhaviṣyasi kalau yuge

उस ऋषिश्रेष्ठ कौंडिन्य ने उस नदी को शाप दे दिया — 'तुम कलियुग में जल से रहित हो जाओगी।'

श्लोक 15 (padma.6.145.15)

एवं स दत्त्वा वै शापं हस्तिमत्या महेश्वरि । गतोऽसौ विप्रप्रवरो विष्णुलोकं सनातनम्

evaṁ sa dattvā vai śāpaṁ hastimatyā maheśvari gato'sau viprapravaro viṣṇulokaṁ sanātanam

हे महेश्वरि, इस प्रकार हस्तिमती को शाप देकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण विष्णु के सनातन धाम को चला गया।

श्लोक 16 (padma.6.145.16)

अद्यापि वर्तते तीर्थं संगमेश्वरसंज्ञकम् । यं दृष्ट्वा मुच्यते पापी ब्रह्महत्यादि पातकात्

adyāpi vartate tīrthaṁ saṁgameśvarasaṁjñakam yaṁ dṛṣṭvā mucyate pāpī brahmahatyādi pātakāt

आज भी संगमेश्वर नामक वह तीर्थ विद्यमान है, जिसे देखकर पापी भी ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है।

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