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उत्तर खण्ड · अध्याय 160

तीर्थराज महात्म्य

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

श्लोक 1 (padma.6.160.1)

महादेव उवाच। अस्मात्तीर्थात्परं तीर्थं तीर्थराजेति विश्रुतम् । सप्तनद्यो वहंत्यत्र चंदनोदकमिश्रितम्

mahādeva uvāca asmāttīrthātparaṃ tīrthaṃ tīrtharājeti viśrutam saptanadyo vahaṃtyatra caṃdanodakamiśritam

महादेव ने कहा — इस तीर्थ से आगे "तीर्थराज" नाम से विख्यात एक तीर्थ है। यहाँ चंदन-मिश्रित जल वाली सात नदियाँ बहती हैं।

श्लोक 2 (padma.6.160.2)

अन्यतीर्थाच्छतगुणं स्नानं चात्र विशिष्यते । देवानां प्रवरो देवो यत्रास्ते वामनः स्वयम्

anyatīrthācchataguṇaṃ snānaṃ cātra viśiṣyate devānāṃ pravaro devo yatrāste vāmanaḥ svayam

यहाँ स्नान अन्य तीर्थों से सौ गुना श्रेष्ठ माना जाता है। यहाँ देवताओं में श्रेष्ठ स्वयं वामन देव विराजमान हैं।

श्लोक 3 (padma.6.160.3)

द्वादश्यां माघमासस्य दद्याद्यस्तिलधेनुकम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः कुलानां तारयेच्छतम्

dvādaśyāṃ māghamāsasya dadyādyastiladhenukam vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ kulānāṃ tārayecchatam

माघ मास की द्वादशी को जो तिल-धेनु का दान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर सौ कुलों का उद्धार करता है।

श्लोक 4 (padma.6.160.4)

पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः । श्राद्धं कृतं तेन समाः सहस्रं रहस्यमेतत्पितरो वदंति

pānīyamapyatra tilairvimiśraṃ dadyātpitṛbhyaḥ prayato manuṣyaḥ śrāddhaṃ kṛtaṃ tena samāḥ sahasraṃ rahasyametatpitaro vadaṃti

जो पवित्र मनुष्य यहाँ तिल-मिश्रित जल पितरों को अर्पित करता है, उसके द्वारा किया गया श्राद्ध सहस्र वर्षों तक फलदायी रहता है — यह रहस्य स्वयं पितर बताते हैं।

श्लोक 5 (padma.6.160.5)

तीर्थेऽस्मिन्भोजयेद्यो वै ब्राह्मणान्गुडपायसैः । एकस्मिन्भोजिते विप्रे सहस्रं भोजितं भवेत्

tīrthe'sminbhojayedyo vai brāhmaṇānguḍapāyasaiḥ ekasminbhojite vipre sahasraṃ bhojitaṃ bhavet

जो इस तीर्थ में ब्राह्मणों को गुड़-खीर खिलाता है, एक विप्र को भोजन कराने से सहस्र विप्रों को भोजन कराने का फल मिलता है।

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