उत्तर खण्ड · अध्याय 159
कोटराक्षी महात्म्य (सिद्धक्षेत्र)
श्लोक 1 (padma.6.159.1)
महादेव उवाच। तस्माद्दूरतरे देवि सिद्धक्षेत्रमनुत्तमम् । अनिरुद्धो वृतः पूर्वं उषार्थे चित्रलेखया
mahādeva uvāca tasmāddūratare devi siddhakṣetramanuttamam aniruddho vṛtaḥ pūrvaṃ uṣārthe citralekhayā
महादेव ने कहा — हे देवी! उससे कुछ दूर एक अनुपम सिद्धक्षेत्र है। वहाँ पूर्वकाल में चित्रलेखा द्वारा उषा के हेतु अनिरुद्ध का चयन किया गया,
श्लोक 2 (padma.6.159.2)
नीतो बाणासुरपुरं तिष्ठति स्म गृहे पुरा । पाशैर्बाणैश्च संरुद्धः कोटराक्षीमथास्मरत्
nīto bāṇāsurapuraṃ tiṣṭhati sma gṛhe purā pāśairbāṇaiśca saṃruddhaḥ koṭarākṣīmathāsmarat
और उन्हें बाणासुर की नगरी ले जाया गया, जहाँ वे पूर्वकाल में बंधनगृह में रहे — पाशों और बाणों से बाँधे गए, तब उन्होंने कोटराक्षी का स्मरण किया,
श्लोक 3 (padma.6.159.3)
साक्षाद्या वैष्णवी शक्तिः सदा रक्षण तत्परा । सेयं देवी नदीतीरे कृष्णेनात्र प्रतिष्ठिता
sākṣādyā vaiṣṇavī śaktiḥ sadā rakṣaṇa tatparā seyaṃ devī nadītīre kṛṣṇenātra pratiṣṭhitā
जो साक्षात् वैष्णवी शक्ति ही हैं, सदा रक्षा में तत्पर। यह देवी इस नदी के तट पर कृष्ण द्वारा प्रतिष्ठित की गई थीं,
श्लोक 4 (padma.6.159.4)
जित्वा बाणासुरं संख्ये द्वारकां प्रतिगच्छता । अनिरुद्धस्य स्तोत्रेण साक्षात्सांनिध्यमागता
jitvā bāṇāsuraṃ saṃkhye dvārakāṃ pratigacchatā aniruddhasya stotreṇa sākṣātsāṃnidhyamāgatā
जब वे संग्राम में बाणासुर को जीतकर द्वारका लौट रहे थे; अनिरुद्ध की स्तुति से वे साक्षात् वहाँ प्रकट हुईं।
श्लोक 5 (padma.6.159.5)
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा वर्षमेकं प्रयत्नतः । कोटराक्षीमुखं दृष्ट्वा लक्ष्मीमाप्नोति पुष्कलाम्
tatra tīrthe naraḥ snātvā varṣamekaṃ prayatnataḥ koṭarākṣīmukhaṃ dṛṣṭvā lakṣmīmāpnoti puṣkalām
उस तीर्थ में एक वर्ष तक प्रयत्नपूर्वक स्नान करके, कोटराक्षी के मुख का दर्शन करने से मनुष्य प्रचुर लक्ष्मी प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (padma.6.159.6)
सिद्धतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा कोटरवासिनीम् । सिंहयुक्तेन यानेन रुद्रलोके महीयते
siddhatīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā koṭaravāsinīm siṃhayuktena yānena rudraloke mahīyate
सिद्धतीर्थ में स्नान करके, कोटरवासिनी का दर्शन करके, मनुष्य सिंह-युक्त विमान से रुद्रलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 7 (padma.6.159.7)
यस्यां वै स्मरणादेव मुक्तः सोऽपि वरानने । अतोयेऽत्र प्रगच्छंति ते नरा मुक्तिभागिनः
yasyāṃ vai smaraṇādeva muktaḥ so'pi varānane atoye'tra pragacchaṃti te narā muktibhāginaḥ
हे वरानने! जिनके स्मरण मात्र से वे (अनिरुद्ध) भी मुक्त हो गए थे। इसलिए जो यहाँ आते हैं, वे मुक्तिभागी होते हैं।
श्लोक 8 (padma.6.159.8)
तत्र गत्वा विशेषेण स्नानं कृत्वा तु पार्वति । कोटराक्ष्यास्ततः स्तोत्रं पठेद्वै बुद्धिपूर्वकम्
tatra gatvā viśeṣeṇa snānaṃ kṛtvā tu pārvati koṭarākṣyāstataḥ stotraṃ paṭhedvai buddhipūrvakam
हे पार्वती! वहाँ जाकर विशेष रूप से स्नान करके, फिर बुद्धिपूर्वक कोटराक्षी का यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए —
श्लोक 9 (padma.6.159.9)
कोटराक्षी विश्वरूपा महामाया बलाधिका । त्रिपुरा त्रिपुरघ्नी च शिवा वै शिवरूपिणी
koṭarākṣī viśvarūpā mahāmāyā balādhikā tripurā tripuraghnī ca śivā vai śivarūpiṇī
"कोटराक्षी, विश्वरूपा, महामाया, बलाधिका; त्रिपुरा, त्रिपुरघ्नी, शिवा, शिवरूपिणी;
श्लोक 10 (padma.6.159.10)
कन्या सारस्वती प्रोक्ता दुर्गा दुर्गतिहारिणी । भैरवी भैरवाक्षी च लक्ष्मी देवी जनप्रिया
kanyā sārasvatī proktā durgā durgatihāriṇī bhairavī bhairavākṣī ca lakṣmī devī janapriyā
कन्या, सारस्वती के नाम से कही गई; दुर्गा, दुर्गतिहारिणी; भैरवी, भैरवाक्षी; तथा लक्ष्मी, जनप्रिया देवी।"
श्लोक 11 (padma.6.159.11)
एतानि बहुधोक्तानि नामानि च सुरेश्वरि । ये पठंति नरश्रेष्ठास्ते यांति शिवसन्निधौ
etāni bahudhoktāni nāmāni ca sureśvari ye paṭhaṃti naraśreṣṭhāste yāṃti śivasannidhau
हे सुरेश्वरी! इन अनेक प्रकार से कहे गए नामों को जो श्रेष्ठ पुरुष पढ़ते हैं, वे शिव के सान्निध्य को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 12 (padma.6.159.12)
अनिरुद्धकृतं स्तोत्रं ये जपंति मनीषिणः । मुच्यंते कष्टबंधात्ते सत्यंसत्यं वरानने
aniruddhakṛtaṃ stotraṃ ye japaṃti manīṣiṇaḥ mucyaṃte kaṣṭabaṃdhātte satyaṃsatyaṃ varānane
जो बुद्धिमान अनिरुद्ध द्वारा रचित इस स्तोत्र का जप करते हैं, वे कष्ट-बंधन से मुक्त हो जाते हैं — सत्य, सत्य, हे वरानने!
श्लोक 13 (padma.6.159.13)
तीर्थानां परमं तीर्थं कोटरानिर्मितं भुवि । दर्शनादेव नश्यंति पापानां राशयस्तथा
tīrthānāṃ paramaṃ tīrthaṃ koṭarānirmitaṃ bhuvi darśanādeva naśyaṃti pāpānāṃ rāśayastathā
यह पृथ्वी पर तीर्थों में परम तीर्थ है, जो स्वयं कोटरा द्वारा निर्मित है। इसके दर्शन मात्र से पापों की राशियाँ भी नष्ट हो जाती हैं।