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उत्तर खण्ड · अध्याय 167

चंडेश एवं गाणपत्य तीर्थ महात्म्य

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168

श्लोक 1 (padma.6.167.1)

अत्र तीर्थात्परं तीर्थं चंडेश इति विश्रुतम् । यत्र चंडेश्वरो देवो नित्यं तिष्ठति भूतिदः

atra tīrthātparaṃ tīrthaṃ caṃḍeśa iti viśrutam yatra caṃḍeśvaro devo nityaṃ tiṣṭhati bhūtidaḥ

इस तीर्थ से आगे "चंडेश" नाम से विख्यात एक तीर्थ है, जहाँ ऐश्वर्यदाता देव चंडेश्वर नित्य निवास करते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.167.2)

यं दृष्ट्वा मुच्यते पापादज्ञानादथवा कृतात् । सर्वाभिर्देवताभिश्च मिलित्वा नगरं कृतम् । चंडेश इति विख्यातं नाम्ना चैव महेश्वरि

yaṃ dṛṣṭvā mucyate pāpādajñānādathavā kṛtāt sarvābhirdevatābhiśca militvā nagaraṃ kṛtam caṃḍeśa iti vikhyātaṃ nāmnā caiva maheśvari

जिनका दर्शन करने से मनुष्य अज्ञान से या जानबूझकर किए गए पाप से मुक्त हो जाता है। सभी देवताओं ने मिलकर यहाँ एक नगर बनाया, जो "चंडेश" नाम से विख्यात है, हे महेश्वरी।

श्लोक 3 (padma.6.167.3)

इति चंडेशतीर्थम् । अत्र तीर्थात्परं तीर्थं गाणपत्यं ततो भुवि । साभ्रमत्यां समीपे तु विख्यातं देवि निर्मितम्

iti caṃḍeśatīrtham atra tīrthātparaṃ tīrthaṃ gāṇapatyaṃ tato bhuvi sābhramatyāṃ samīpe tu vikhyātaṃ devi nirmitam

(इस प्रकार चंडेश तीर्थ।) इस तीर्थ से आगे पृथ्वी पर "गाणपत्य" नामक एक और तीर्थ है, जो साभ्रमती के समीप निर्मित, हे देवी, विख्यात है।

श्लोक 4 (padma.6.167.4)

तत्र स्नात्वा नरो देवि मुच्यते नात्र संशयः । मन्ये साभ्रमती तीरे जनानां हितकाम्यया

tatra snātvā naro devi mucyate nātra saṃśayaḥ manye sābhramatī tīre janānāṃ hitakāmyayā

हे देवी! वहाँ स्नान करके मनुष्य मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। मेरा मानना है कि साभ्रमती के तट पर, जनों के हित की कामना से,

श्लोक 5 (padma.6.167.5)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागरांतानि यानि च । तानि सर्वाणि संत्यज्य तीर्थे वै परमाद्भुते

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni sāgarāṃtāni yāni ca tāni sarvāṇi saṃtyajya tīrthe vai paramādbhute

पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, समुद्र तक जितने भी हैं, उन सबको छोड़कर, इस परम अद्भुत तीर्थ में,

श्लोक 6 (padma.6.167.6)

श्राद्धं करोति यस्तत्र रुद्रभक्त्या जितेंद्रियः । फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा सर्वयज्ञसमुद्भवम्

śrāddhaṃ karoti yastatra rudrabhaktyā jiteṃdriyaḥ phalaṃ prāpnoti śuddhātmā sarvayajñasamudbhavam

जो रुद्र-भक्ति से जितेंद्रिय होकर वहाँ श्राद्ध करता है, वह शुद्धात्मा सभी यज्ञों से उत्पन्न फल प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (padma.6.167.7)

पितॄनुदिश्य यत्किंचिद्गणतीर्थे प्रदीयते । तत्सर्वं जायते क्षिप्रं गणनाथप्रसादतः

pitṝnudiśya yatkiṃcidgaṇatīrthe pradīyate tatsarvaṃ jāyate kṣipraṃ gaṇanāthaprasādataḥ

पितरों के उद्देश्य से गण-तीर्थ में जो कुछ भी थोड़ा-सा भी दिया जाता है, वह सब गणनाथ की कृपा से शीघ्र फलित होता है।

श्लोक 8 (padma.6.167.8)

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वृषं विप्राय दापयेत् । सर्वलोकानतिक्रम्य स गच्छेत्परमां गतिम्

tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā vṛṣaṃ viprāya dāpayet sarvalokānatikramya sa gacchetparamāṃ gatim

उस तीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य ब्राह्मण को बैल दान देता है, वह सभी लोकों को लांघकर परम गति को प्राप्त होता है।

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