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उत्तर खण्ड · अध्याय 166

देवतीर्थ महात्म्य (पांडुरार्या)

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167

श्लोक 1 (padma.6.166.1)

महादेव उवाच। वैद्यनाथात्परं तीर्थं सर्वसिद्धिप्रदायकम् । तीर्थानामुत्तमं तीर्थं देवतीर्थमनुश्रुतम्

mahādeva uvāca vaidyanāthātparaṃ tīrthaṃ sarvasiddhipradāyakam tīrthānāmuttamaṃ tīrthaṃ devatīrthamanuśrutam

महादेव ने कहा — वैद्यनाथ से आगे सभी सिद्धियाँ देने वाला, तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ, परंपरा से प्रसिद्ध "देवतीर्थ" है।

श्लोक 2 (padma.6.166.2)

विभीषणाद्राक्षसेंद्राद्गृहीत्वा करमोजसा । प्रारब्धो धर्मपुत्रेण राजसूयो महाक्रतुः

vibhīṣaṇādrākṣaseṃdrādgṛhītvā karamojasā prārabdho dharmaputreṇa rājasūyo mahākratuḥ

राक्षसेंद्र विभीषण से बलपूर्वक कर ग्रहण कर, धर्मपुत्र युधिष्ठिर द्वारा महान राजसूय यज्ञ आरंभ किया गया।

श्लोक 3 (padma.6.166.3)

दिग्जये दक्षिणे जाते नकुलेन हि पांडुना । साभ्रमत्यास्तटे देवि पांडुरार्येति विश्रुता

digjaye dakṣiṇe jāte nakulena hi pāṃḍunā sābhramatyāstaṭe devi pāṃḍurāryeti viśrutā

जब दक्षिण दिशा की दिग्विजय पांडु-पुत्र नकुल द्वारा संपन्न हुई, तब, हे देवी, साभ्रमती के तट पर "पांडुरार्या" नाम से विख्यात देवी,

श्लोक 4 (padma.6.166.4)

स्थापिता परया भक्त्या भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । स्नातः साभ्रमतीतोये पांडुरार्यां नमस्य च

sthāpitā parayā bhaktyā bhuktimuktipradāyinī snātaḥ sābhramatītoye pāṃḍurāryāṃ namasya ca

परम भक्ति से स्थापित की गईं, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों देने वाली हैं। साभ्रमती के जल में स्नान करके पांडुरार्या को प्रणाम करने वाला,

श्लोक 5 (padma.6.166.5)

अणिमाद्या सिद्धयोऽष्टौ तथा मेधां महीयसीम् । नरः प्राप्नोति वै नूनं नात्र कार्या विचारणा

aṇimādyā siddhayo'ṣṭau tathā medhāṃ mahīyasīm naraḥ prāpnoti vai nūnaṃ nātra kāryā vicāraṇā

निश्चय ही अणिमा आदि आठों सिद्धियों तथा महान बुद्धि को प्राप्त करता है, इसमें विचार की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 6 (padma.6.166.6)

पांडुरार्यां नमस्कृत्य शुद्धभावेन मानवः । संवत्सरकृता पूजा दातव्या तत्त्वबुद्धिभिः

pāṃḍurāryāṃ namaskṛtya śuddhabhāvena mānavaḥ saṃvatsarakṛtā pūjā dātavyā tattvabuddhibhiḥ

शुद्ध भाव से पांडुरार्या को नमस्कार करके, तत्त्व-बुद्धि वाले मनुष्यों को एक वर्ष तक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 7 (padma.6.166.7)

तत्र तीर्थे तनुं त्यक्त्वा पांडुरार्यासमीपतः । कैलासशिखरं प्राप्य चंडेश्वरगणो भवेत्

tatra tīrthe tanuṃ tyaktvā pāṃḍurāryāsamīpataḥ kailāsaśikharaṃ prāpya caṃḍeśvaragaṇo bhavet

उस तीर्थ में, पांडुरार्या के समीप शरीर त्यागकर, मनुष्य कैलास-शिखर को प्राप्त कर चंडेश्वर के गण-पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (padma.6.166.8)

पुरा हनूमता तत्र तपस्तप्तं सुदुष्करम् । समुद्रप्लवने शक्तिर्जाता तीर्थप्रभावतः

purā hanūmatā tatra tapastaptaṃ suduṣkaram samudraplavane śaktirjātā tīrthaprabhāvataḥ

पूर्वकाल में हनुमान ने वहाँ अत्यंत दुष्कर तप किया था; उसी तीर्थ के प्रभाव से उन्हें समुद्र लांघने की शक्ति प्राप्त हुई थी।

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