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उत्तर खण्ड · अध्याय 209

मुकुंद और नाई की कथा

अध्याय 208अध्याय-सूचीअध्याय 210

श्लोक 1 (padma.6.209.1)

युधिष्ठिर उवाच- सौभरे कस्य तीर्थस्य माहात्म्यं नारदो मुनिः । वर्णयामास शिबये शक्रतीर्थगतस्य च

yudhiṣṭhira uvāca- saubhare kasya tīrthasya māhātmyaṁ nārado muniḥ varṇayāmāsa śibaye śakratīrthagatasya ca

युधिष्ठिर ने कहा — 'हे सौभरे! शक्रतीर्थ में स्थित किस तीर्थ का माहात्म्य मुनि नारद ने शिबि से वर्णन किया?'

श्लोक 2 (padma.6.209.2)

अतस्तु मम शुश्रूषा जायते मुनिपुंगवः । शिविनारदसंवादं ब्रूहि पुण्यं नताय मे

atastu mama śuśrūṣā jāyate munipuṁgavaḥ śivināradasaṁvādaṁ brūhi puṇyaṁ natāya me

'हे मुनिपुंगव! इसलिए मुझमें उसे सुनने की इच्छा उत्पन्न होती है; मुझ प्रणत को शिबि-नारद का वह पुण्य संवाद सुनाइए।'

श्लोक 3 (padma.6.209.3)

सौभरिरुवाच- धर्मराज शिबीराजा श्रुत्वा नारदवर्णितम् । द्वारकायास्तु माहात्म्यं तमेवापृच्छदादरात्

saubhariruvāca- dharmarāja śibīrājā śrutvā nāradavarṇitam dvārakāyāstu māhātmyaṁ tamevāpṛcchadādarāt

सौभरि ने कहा — 'हे धर्मराज! राजा शिबि ने नारद द्वारा वर्णित द्वारका का माहात्म्य सुनकर, फिर आदरपूर्वक उन्हीं से पूछा—'

श्लोक 4 (padma.6.209.4)

शिबिरुवाच- ब्रह्मांगज सुरश्रेष्ठ श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम् । इंद्रप्रस्थतटस्थाया द्वारकाया मयाद्भुतम्

śibiruvāca- brahmāṁgaja suraśreṣṭha śrutaṁ māhātmyamuttamam iṁdraprasthataṭasthāyā dvārakāyā mayādbhutam

शिबि ने कहा — 'हे ब्रह्मांगज! हे सुरश्रेष्ठ! इंद्रप्रस्थ के तट पर स्थित द्वारका का यह अद्भुत, उत्तम माहात्म्य मैंने सुना।'

श्लोक 5 (padma.6.209.5)

अयोध्यायां यदि मुने किंचिदस्ति पवित्रकम् । चरितं मम तद्ब्रूहि पिपासोस्त्वद्वचोऽमृतम्

ayodhyāyāṁ yadi mune kiṁcidasti pavitrakam caritaṁ mama tadbrūhi pipāsostvadvaco'mṛtam

'हे मुने! यदि अयोध्या में भी कोई पवित्र चरित्र है, तो आपकी अमृतमयी वाणी का प्यासा मैं, वह मुझे बताइए।'

श्लोक 6 (padma.6.209.6)

नारद उवाच- अस्त्यत्र चरितं पुण्यं महापातकनाशनम् । नापितस्याद्ययुक्तस्य मुकुंदस्य द्विजस्य च

nārada uvāca- astyatra caritaṁ puṇyaṁ mahāpātakanāśanam nāpitasyādyayuktasya mukuṁdasya dvijasya ca

नारद ने कहा — 'यहाँ महापातकों का नाश करने वाला एक पुण्य चरित्र है — एक आदि से ही दुष्ट नाई का, और मुकुंद नामक ब्राह्मण का।'

श्लोक 7 (padma.6.209.7)

ब्रह्महा नापितो राजन्नपमृत्युं गतो द्विजः । प्रसादात्कोशलायास्तु द्वावपि स्वर्गतिं गतौ

brahmahā nāpito rājannapamṛtyuṁ gato dvijaḥ prasādātkośalāyāstu dvāvapi svargatiṁ gatau

'हे राजन्! ब्रह्महत्यारा वह नाई, और असमय मृत्यु को प्राप्त हुआ वह ब्राह्मण — कोशला की कृपा से दोनों ही स्वर्ग को गए।'

श्लोक 8 (padma.6.209.8)

चंद्रभागा नदी तीरे पुरी सा च निवेशिता । तत्रास्ति नापितः पापश्चंडकोनाम गर्हितः

caṁdrabhāgā nadī tīre purī sā ca niveśitā tatrāsti nāpitaḥ pāpaścaṁḍakonāma garhitaḥ

'चंद्रभागा नदी के तट पर वह नगरी बसी हुई थी; वहाँ चंडक नामक एक पापी, निंदनीय नाई रहता था।'

श्लोक 9 (padma.6.209.9)

चौर्येण परवित्तानामपहर्ता स पापकृत् । घातकः शस्त्रपाशाद्यैः पांथानामवलुंठकः

cauryeṇa paravittānāmapahartā sa pāpakṛt ghātakaḥ śastrapāśādyaiḥ pāṁthānāmavaluṁṭhakaḥ

'वह पापी चोरी से दूसरों का धन हड़प लेता था; शस्त्र और फंदे आदि से हत्या करने वाला, राहगीरों को लूटने वाला था।'

श्लोक 10 (padma.6.209.10)

द्यूतमद्यरतो नित्यं परस्त्रीलंपटेंद्रियः । भित्वा देवालयं भित्तिमिष्टिका ग्राव विक्रयी

dyūtamadyarato nityaṁ parastrīlaṁpaṭeṁdriyaḥ bhitvā devālayaṁ bhittimiṣṭikā grāva vikrayī

'सदा जुआ और मद्यपान में लीन, पराई स्त्रियों में लोलुपेंद्रिय, वह देवालयों की दीवारें तोड़कर ईंट-पत्थर बेचने वाला था।'

श्लोक 11 (padma.6.209.11)

स तस्योद्वसिताभ्यासे ब्राह्मणो वसति श्रिया । संयुक्तो ब्रह्मकर्मज्ञो मुकुंदो नामतो नृप

sa tasyodvasitābhyāse brāhmaṇo vasati śriyā saṁyukto brahmakarmajño mukuṁdo nāmato nṛpa

'हे नृप! उसके निवास के पड़ोस में मुकुंद नामक एक ब्राह्मण समृद्धि से रहता था, जो ब्रह्मकर्म का ज्ञाता था।'

श्लोक 12 (padma.6.209.12)

स एकदा समालिंग्य तरुणीमात्मयोषितम् । सुष्वाप सुरतायास श्लथांगो निशि निर्भयम्

sa ekadā samāliṁgya taruṇīmātmayoṣitam suṣvāpa suratāyāsa ślathāṁgo niśi nirbhayam

'एक रात, अपनी युवा पत्नी का आलिंगन कर, रति से थके-शिथिल अंगों वाला वह निर्भय होकर सो गया।'

श्लोक 13 (padma.6.209.13)

स चंडको निशीथेऽथ प्रविवेश तदालयम् । मुकुंदस्य समाहर्तुं हर्म्ये भूषादि वस्तु यत्

sa caṁḍako niśīthe'tha praviveśa tadālayam mukuṁdasya samāhartuṁ harmye bhūṣādi vastu yat

'तब वह चंडक आधी रात को उसके घर में घुसा, मुकुंद के भवन में जो भी आभूषण आदि वस्तुएँ थीं, उन्हें उठा ले जाने के लिए।'

श्लोक 14 (padma.6.209.14)

उपकार्या बहिस्थं यत्तद्गृहीत्वोऽगमद्गृहम् । स्वकीयं च पुनस्तस्य ब्राह्मणस्याविशद्गृहम्

upakāryā bahisthaṁ yattadgṛhītvo'gamadgṛham svakīyaṁ ca punastasya brāhmaṇasyāviśadgṛham

'बाहर की कोठरी में जो कुछ था, उसे लेकर वह अपने घर गया; और फिर पुनः उस ब्राह्मण के घर में घुसा।'

श्लोक 15 (padma.6.209.15)

कपाटोत्पाटनार्थी तु यत्नेन महताऽभवत् । लोहयंत्रावरुद्धश्च स नोद्धाटयितुं क्षमः

kapāṭotpāṭanārthī tu yatnena mahatā'bhavat lohayaṁtrāvaruddhaśca sa noddhāṭayituṁ kṣamaḥ

'द्वार को उखाड़ने का इच्छुक वह बड़े प्रयत्न से जुटा; परंतु लोहे की सांकल से बंद होने के कारण वह उसे खोल न सका।'

श्लोक 16 (padma.6.209.16)

आरुरोह तदा तस्य ब्राह्मणस्याविशद्गृहम् । प्रविश्य तद्गृहं क्रूरः कृपणं पाणिनादधत्

āruroha tadā tasya brāhmaṇasyāviśadgṛham praviśya tadgṛhaṁ krūraḥ kṛpaṇaṁ pāṇinādadhat

'तब वह ऊपर चढ़कर उस ब्राह्मण के घर में घुसा; उस घर में प्रवेश कर वह क्रूर हाथ में कृपाण लिए हुए था।'

श्लोक 17 (padma.6.209.17)

अट्टालिकां स पापिष्ठो नापितस्तस्करक्रियः । तत्रापश्यत्प्रसुप्तौ तौ दंपतीरतिविह्वलौ

aṭṭālikāṁ sa pāpiṣṭho nāpitastaskarakriyaḥ tatrāpaśyatprasuptau tau daṁpatīrativihvalau

'वह अत्यंत पापी, चोरी करने वाला नाई उस अट्टालिका में गया; वहाँ उसने रति से अत्यंत विह्वल उस दंपति को सोया हुआ देखा।'

श्लोक 18 (padma.6.209.18)

जगाम च तयोः पार्श्वे हेमभूषाजिघृक्षया । शय्याया एकदेशस्थं गृहीत्वा भूषणं बहु

jagāma ca tayoḥ pārśve hemabhūṣājighṛkṣayā śayyāyā ekadeśasthaṁ gṛhītvā bhūṣaṇaṁ bahu

'वह उनके पास गया, सोने के आभूषण चुराने की इच्छा से; शय्या के एक ओर रखे हुए बहुत से आभूषण लेकर—'

श्लोक 19 (padma.6.209.19)

हर्तुं तदंगतो हस्तं प्रससार स नापितः । तस्करस्पर्शतो विप्रो जजागार भयातुरः

hartuṁ tadaṁgato hastaṁ prasasāra sa nāpitaḥ taskarasparśato vipro jajāgāra bhayāturaḥ

'—उस नाई ने उनके अंगों से भी आभूषण चुराने के लिए हाथ बढ़ाया। चोर के स्पर्श से वह ब्राह्मण भय से आतुर होकर जाग उठा।'

श्लोक 20 (padma.6.209.20)

न किंचिदूचे संमील्य नेत्रे तत्रैव संस्थितः । यदा स तस्करः पापो गृहीत्वा देहभूषणम्

na kiṁcidūce saṁmīlya netre tatraiva saṁsthitaḥ yadā sa taskaraḥ pāpo gṛhītvā dehabhūṣaṇam

'वह कुछ नहीं बोला, और आँखें बंद किए वहीं पड़ा रहा। जब वह पापी चोर शरीर के आभूषण लेकर—'

श्लोक 21 (padma.6.209.21)

चलितः स तदा तेन दोर्भ्यामात्तो द्विजेन हि । पश्चादागत्य वित्तस्यासहमानेन संक्षयम्

calitaḥ sa tadā tena dorbhyāmātto dvijena hi paścādāgatya vittasyāsahamānena saṁkṣayam

'—चलने लगा, तभी ब्राह्मण ने उसे दोनों बाँहों से पकड़ लिया; तब वह चोर, धन के नाश को सहन न करता हुआ पीछे लौटकर—'

श्लोक 22 (padma.6.209.22)

तेनापि नृप चौरेण कृपाणेन हतो द्विजः । विदीर्णोदरमध्यस्तु तातमातरितीरयन्

tenāpi nṛpa caureṇa kṛpāṇena hato dvijaḥ vidīrṇodaramadhyastu tātamātaritīrayan

'—हे नृप! उस चोर ने कृपाण से ब्राह्मण को मार डाला; पेट के बीच से फटा हुआ वह हे पिता, हे माता कहते हुए—'

श्लोक 23 (padma.6.209.23)

वदंतः किंकिमेत्येतत्पार्श्वं तस्या ययुर्जनाः । ददृशुस्तं निःसृतांत्रं रुधिरालिप्तविग्रहम्

vadaṁtaḥ kiṁkimetyetatpārśvaṁ tasyā yayurjanāḥ dadṛśustaṁ niḥsṛtāṁtraṁ rudhirāliptavigraham

'—लोग "क्या हुआ, क्या हुआ" कहते हुए उसके पास गए। उन्होंने देखा कि उसकी आँतें बाहर निकली हुई थीं और उसका शरीर रक्त से लथपथ था।'

श्लोक 24 (padma.6.209.24)

पप्रच्छुश्च मुकुंदेदं कर्म केनेदृशं कृतम् । सोऽपि कृच्छ्रेण महता प्रोवाचेदं स्वबांधवान्

papracchuśca mukuṁdedaṁ karma kenedṛśaṁ kṛtam so'pi kṛcchreṇa mahatā provācedaṁ svabāṁdhavān

'उन्होंने पूछा — "मुकुंद! यह कृत्य किसने किया?" वह भी अत्यंत कष्ट से अपने बंधुजनों से यह कहने लगा—'

श्लोक 25 (padma.6.209.25)

मुकुंद उवाच-। ममैव परिपाकोऽयं पूर्वोपार्जितकर्मणाम् । न कश्चित्सुखदुःखस्य दाता कस्यापि देहिनः

mukuṁda uvāca- mamaiva paripāko'yaṁ pūrvopārjitakarmaṇām na kaścitsukhaduḥkhasya dātā kasyāpi dehinaḥ

मुकुंद ने कहा — 'यह तो मेरे ही पूर्वजन्मार्जित कर्मों का परिपाक है; कोई भी किसी भी प्राणी के सुख-दुःख का दाता नहीं होता।'

श्लोक 26 (padma.6.209.26)

धर्मोऽधर्मश्च तावेव तेषां मूलं पुराकृतौ । नारद उवाच- इत्युक्त्वा स तु भूयस्यापीडया गाढपीडितः

dharmo'dharmaśca tāveva teṣāṁ mūlaṁ purākṛtau nārada uvāca- ityuktvā sa tu bhūyasyāpīḍayā gāḍhapīḍitaḥ

'धर्म और अधर्म ही इन सबके मूल हैं, जो पूर्वकाल में किए गए थे।' नारद ने कहा — 'ऐसा कहकर वह और भी अधिक पीड़ा से गाढ़ रूप से पीड़ित होकर—'

श्लोक 27 (padma.6.209.27)

तत्याज भूपते प्राणान्पश्यतां सुहृदां तदा । विललाप तदा तस्य माता द्विजसती नृप

tatyāja bhūpate prāṇānpaśyatāṁ suhṛdāṁ tadā vilalāpa tadā tasya mātā dvijasatī nṛpa

'—हे भूपते! उसने अपने मित्रों के देखते-देखते प्राण त्याग दिए। हे नृप! तब उस ब्राह्मण की माता विलाप करने लगी।'

श्लोक 28 (padma.6.209.28)

निधाय तच्छिरः स्वांके कुंडलाभ्यामलंकृतम् । मातोवाच- हा हतास्मि त्वया वत्स दशामंत्यां च गच्छता

nidhāya tacchiraḥ svāṁke kuṁḍalābhyāmalaṁkṛtam mātovāca- hā hatāsmi tvayā vatsa daśāmaṁtyāṁ ca gacchatā

'कुंडलों से अलंकृत उसके सिर को अपनी गोद में रखकर माता ने कहा — "हाय! हे वत्स! तू अंतिम दशा को प्राप्त होकर मुझे मार डाला—"'

श्लोक 29 (padma.6.209.29)

दिनश्रीरिव सूर्येण पश्चिमाचललंबिना । यदंगं चंदनालेपयोग्यं तव महामते

dinaśrīriva sūryeṇa paścimācalalaṁbinā yadaṁgaṁ caṁdanālepayogyaṁ tava mahāmate

'—जैसे पश्चिमाचल में डूबते सूर्य से दिन की शोभा समाप्त हो जाती है। हे महामते! जो तेरा शरीर चंदन-लेप के योग्य था—'

श्लोक 30 (padma.6.209.30)

मां मज्जयार्तिशोकाब्धौ तदिदं धूलिधूसरम्

māṁ majjayārtiśokābdhau tadidaṁ dhūlidhūsaram

'—वही आज धूल-धूसरित होकर मुझे व्यथा-शोक के सागर में डुबो रहा है।'

श्लोक 31 (padma.6.209.31)

तांबूलचर्वणेभ्यासो यस्त्वया विहितस्त्वसौ । स एव रुधिरोद्गार मिश्रेण क्रियते ध्रुवम् । तव ये लोचने पूर्वं जिग्यतुः कमलश्रियम्

tāṁbūlacarvaṇebhyāso yastvayā vihitastvasau sa eva rudhirodgāra miśreṇa kriyate dhruvam tava ye locane pūrvaṁ jigyatuḥ kamalaśriyam

'जिस पान-चर्वण के अभ्यास को तूने अपनाया था, वही आज निश्चय ही रक्त की धारा से मिश्रित हो गया है। तेरे जो नेत्र पहले कमल की शोभा को भी जीत लेते थे—'

श्लोक 32 (padma.6.209.32)

त एव सांप्रतं जाते तिमिरौघा वृते इव । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्स त्वं शिष्यानध्यापयात्मनः

ta eva sāṁprataṁ jāte timiraughā vṛte iva uttiṣṭhottiṣṭha vatsa tvaṁ śiṣyānadhyāpayātmanaḥ

'—वे ही अब मानो अंधकार के समूह से ढँके हुए हैं।'

श्लोक 33 (padma.6.209.33)

यथावद्वैश्वदेवांते पूजयातिथिमागतम् । द्वारि स्थिता वयस्यास्ते त्वाह्वयंति प्रयाहि तान्

yathāvadvaiśvadevāṁte pūjayātithimāgatam dvāri sthitā vayasyāste tvāhvayaṁti prayāhi tān

'उठ, उठ, हे वत्स! अपने शिष्यों को पढ़ा; और यथाविधि वैश्वदेव के अंत में आए हुए अतिथि की पूजा कर।'

श्लोक 34 (padma.6.209.34)

दातव्यं यद्ददस्वैभ्यो गृहीतव्यं गृहाण तत् । हाहा देहि प्रतिवचः पतामि तव पादयोः

dātavyaṁ yaddadasvaibhyo gṛhītavyaṁ gṛhāṇa tat hāhā dehi prativacaḥ patāmi tava pādayoḥ

'द्वार पर खड़े तेरे मित्र तुझे बुला रहे हैं, उनके पास जा। जो देने योग्य है उन्हें दे, और जो लेने योग्य है उसे ले।'

श्लोक 35 (padma.6.209.35)

नोचेदहं विमोक्ष्यामि प्राणांस्तव समीपतः । नारद उवाच- इत्युक्त्वा मूर्छिता तस्य मुकुंदस्य प्रसूस्तदा

nocedahaṁ vimokṣyāmi prāṇāṁstava samīpataḥ nārada uvāca- ityuktvā mūrchitā tasya mukuṁdasya prasūstadā

'हाय हाय! मुझे कुछ उत्तर दे — मैं तेरे चरणों में गिरती हूँ। नहीं तो मैं भी तेरे पास ही अपने प्राण त्याग दूँगी।'

श्लोक 36 (padma.6.209.36)

भार्या तस्य शिरः स्वांके विधाय व्यलपच्च सा । भार्योवाच- नाममार्गेण पाथोधे मदीयं वचनं शृणु

bhāryā tasya śiraḥ svāṁke vidhāya vyalapacca sā bhāryovāca- nāmamārgeṇa pāthodhe madīyaṁ vacanaṁ śṛṇu

नारद ने कहा — 'ऐसा कहकर मुकुंद की जननी मूर्छित हो गई; और उसकी पत्नी भी उसके सिर को अपनी गोद में रखकर विलाप करने लगी।' पत्नी ने कहा — 'हे गुण-सागर! नाम लेकर पुकारती हुई मेरी यह बात सुनो।'

श्लोक 37 (padma.6.209.37)

रुष्टोऽसि चेत्समं मात्रा कुतो वद ममाग्रतः । न कदाचित्त्वया साधो मौनमीदृक्कृतं पुरा । केनापि लघुना भ्रात्रा ह्यपमानः कृतस्तव

ruṣṭo'si cetsamaṁ mātrā kuto vada mamāgrataḥ na kadācittvayā sādho maunamīdṛkkṛtaṁ purā kenāpi laghunā bhrātrā hyapamānaḥ kṛtastava

'यदि तुम माता से रुष्ट हो, तो मेरे सामने क्यों नहीं बोलते? हे साधो! तुमने पहले कभी ऐसा मौन नहीं धारण किया। क्या किसी छोटे भाई ने तुम्हारा अपमान किया है?'

श्लोक 38 (padma.6.209.38)

शुकोऽयं पंजरस्थस्ते नान्नमत्ति त्वया विना । भोजयैनं सुसिद्धान्नं कलवाचं च सारिकाम्

śuko'yaṁ paṁjarasthaste nānnamatti tvayā vinā bhojayainaṁ susiddhānnaṁ kalavācaṁ ca sārikām

'तुम्हारा यह पिंजरे में बैठा तोता तुम्हारे बिना अन्न नहीं खाता। इसे सुसिद्ध अन्न खिलाओ, और मधुर बोलने वाली मैना को भी।'

श्लोक 39 (padma.6.209.39)

रामराम हरेकृष्ण विष्णो नामावलीमिति । पाठयोत्तिष्ठ निपुणौ द्वावेतौ सारिकाशुकौ

rāmarāma harekṛṣṇa viṣṇo nāmāvalīmiti pāṭhayottiṣṭha nipuṇau dvāvetau sārikāśukau

'"राम राम, हरे कृष्ण, विष्णो" — इस नामावली को पढ़ाओ; उठो, ये दोनों सारिका और शुक बड़े निपुण हैं।'

श्लोक 40 (padma.6.209.40)

अपराद्धं मया किं ते यत्वं मां नाभिभाषसे । यत्त्वया मे धनं दत्तं तन्मया साधुरक्षिणम्

aparāddhaṁ mayā kiṁ te yatvaṁ māṁ nābhibhāṣase yattvayā me dhanaṁ dattaṁ tanmayā sādhurakṣiṇam

'मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया है कि तुम मुझसे नहीं बोलते? तुमने जो धन मुझे दिया था, उसे मैंने भलीभाँति सुरक्षित रखा है।'

श्लोक 41 (padma.6.209.41)

अर्पितं यत्त्वया नाथ निजतेजो ममोदरे । सूतिकालमहं तस्य नोपेक्षे त्वामनुव्रजे

arpitaṁ yattvayā nātha nijatejo mamodare sūtikālamahaṁ tasya nopekṣe tvāmanuvraje

'हे नाथ! तुमने अपना जो तेज मेरे उदर में स्थापित किया है, उसके प्रसव-काल की मैं उपेक्षा नहीं करूँगी; किंतु मैं तुम्हारा ही अनुसरण करती हूँ।'

श्लोक 42 (padma.6.209.42)

नारद उवाच- एवं विलप्य सा तस्य मुकुंदस्य प्रिया तदा । न रुरोद स्वभर्तारमनुगंतुमना सती

nārada uvāca- evaṁ vilapya sā tasya mukuṁdasya priyā tadā na ruroda svabhartāramanugaṁtumanā satī

नारद ने कहा — 'इस प्रकार विलाप कर, मुकुंद की वह प्रिय पत्नी फिर नहीं रोई, अपने पति का अनुसरण करने के मन वाली वह सती चुप हो गई।'

श्लोक 43 (padma.6.209.43)

अथ तस्य मुकुंदस्य गुरुर्वेदायनाभिधः । संन्यासी पर्यटन्पृथ्वीं तस्य वेश्म ययौ नृप

atha tasya mukuṁdasya gururvedāyanābhidhaḥ saṁnyāsī paryaṭanpṛthvīṁ tasya veśma yayau nṛpa

'हे नृप! तब मुकुंद के गुरु वेदायन नामक संन्यासी, जो पृथ्वी पर भ्रमण करते थे, उसके घर आ पहुँचे।'

श्लोक 44 (padma.6.209.44)

मुकुंदः क्व गतो माता भार्या तस्य च धीमतः । न दृश्यते तदा तेन पृष्टेत्याचष्ट चेटिका

mukuṁdaḥ kva gato mātā bhāryā tasya ca dhīmataḥ na dṛśyate tadā tena pṛṣṭetyācaṣṭa ceṭikā

'"मुकुंद कहाँ गया? और उस बुद्धिमान् की माता और पत्नी कहाँ हैं? कोई दिखाई नहीं दे रहा।" उनके ऐसा पूछने पर एक दासी ने बताया।'

श्लोक 45 (padma.6.209.45)

चेटिकोवाच । स्वामिन्केनापि चौरेण मम स्वामी हतो निशि । स्नुषाया भूषणं नीतं दुकूलानि च सर्वशः

ceṭikovāca svāminkenāpi caureṇa mama svāmī hato niśi snuṣāyā bhūṣaṇaṁ nītaṁ dukūlāni ca sarvaśaḥ

दासी ने कहा — 'हे स्वामी! रात में किसी चोर ने मेरे स्वामी को मार डाला; बहू के सारे आभूषण और वस्त्र भी ले गया।'

श्लोक 46 (padma.6.209.46)

स मृतः पतितो भूमौ हर्म्यस्योपरि तिष्ठति । तस्य माता वधूश्चैव भ्रातरश्च तदंतिके

sa mṛtaḥ patito bhūmau harmyasyopari tiṣṭhati tasya mātā vadhūścaiva bhrātaraśca tadaṁtike

'वह मृत होकर भूमि पर गिरा हुआ ऊपर के भवन में पड़ा है; उसके पास उसकी माता, पत्नी और भाई—'

श्लोक 47 (padma.6.209.47)

विलपंति महाशोकसागरे पतिता गुरो । नारद उवाच- इत्याकर्ण्य परिव्राट्स वचनं चेटिकोदितम्

vilapaṁti mahāśokasāgare patitā guro nārada uvāca- ityākarṇya parivrāṭsa vacanaṁ ceṭikoditam

'—हे गुरु! महाशोक-सागर में डूबे हुए विलाप कर रहे हैं।' नारद ने कहा — 'दासी द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर वह परिव्राजक—'

श्लोक 48 (padma.6.209.48)

आरुह्य हर्म्यमद्राक्षीदात्मांते वासिनं मृतम् । तदंतिके समालोक्य बंधूनां क्रंदतो भृशम्

āruhya harmyamadrākṣīdātmāṁte vāsinaṁ mṛtam tadaṁtike samālokya baṁdhūnāṁ kraṁdato bhṛśam

'—ऊपर चढ़कर उस भवन में गया, और अपने साथ रहने वाले उस मृत शिष्य को देखा; उसके पास बंधुजनों को अत्यंत विलाप करते देखकर—'

श्लोक 49 (padma.6.209.49)

उद्धरिष्यन्निदं धीरः शोकाब्धेस्तानुवाच ह । वेदायन उवाच- देहमुद्दिश्य वात्मानं शोकोऽयं क्रियते त्वया

uddhariṣyannidaṁ dhīraḥ śokābdhestānuvāca ha vedāyana uvāca- dehamuddiśya vātmānaṁ śoko'yaṁ kriyate tvayā

'—उन्हें शोक-सागर से उबारने की इच्छा से उस धीर पुरुष ने उनसे कहा।' वेदायन ने कहा — 'यह शोक तुम शरीर के लिए कर रही हो, या आत्मा के लिए?'

श्लोक 50 (padma.6.209.50)

मातः कथय सत्यं मे नोभयोर्युज्यते हि सः । देहोऽयं भूतसंघातः प्रारब्धेः समुपार्जितः

mātaḥ kathaya satyaṁ me nobhayoryujyate hi saḥ deho'yaṁ bhūtasaṁghātaḥ prārabdheḥ samupārjitaḥ

'हे माता! मुझे सत्य बताओ — यह शोक तो दोनों में से किसी के लिए भी उचित नहीं है। यह शरीर तो प्रारब्ध कर्म से अर्जित भूतों का समूह मात्र है।'

श्लोक 51 (padma.6.209.51)

तेषु क्षीणेषु भूतानां पृथक्त्वमुपजायते । यदेकीभवनं तेषां कर्मभिर्जन्म तन्नृणाम्

teṣu kṣīṇeṣu bhūtānāṁ pṛthaktvamupajāyate yadekībhavanaṁ teṣāṁ karmabhirjanma tannṛṇām

'जब वे क्षीण हो जाते हैं, तब भूतों का पृथक्करण हो जाता है; और कर्मों के कारण उनका एक साथ मिलना ही मनुष्यों का जन्म कहलाता है।'

श्लोक 52 (padma.6.209.52)

तन्नाशे तत्पृथक्त्वं च तदेव मरणं स्मृतम् । एक्यं पृथक्त्वं भूतानां कर्मार्धा नेयतो? बुधैः

tannāśe tatpṛthaktvaṁ ca tadeva maraṇaṁ smṛtam ekyaṁ pṛthaktvaṁ bhūtānāṁ karmārdhā neyato? budhaiḥ

'उसके नष्ट होने पर वही पृथक्करण मृत्यु कहलाती है। भूतों का मिलना और बिछुड़ना कर्मों के अनुसार होता है — यह ज्ञानी पुरुष समझते हैं।'

श्लोक 53 (padma.6.209.53)

अतो देहे न कर्तव्यः शोकः परवशे जडे । अनाद्यविद्यया जीवे दृष्टे मरणजन्मनी

ato dehe na kartavyaḥ śokaḥ paravaśe jaḍe anādyavidyayā jīve dṛṣṭe maraṇajanmanī

'अतः जड़ और परवश शरीर के लिए शोक नहीं करना चाहिए। अनादि अविद्या के कारण ही जीव में जन्म और मृत्यु दिखाई देते हैं।'

श्लोक 54 (padma.6.209.54)

देहस्यात्मन्यहं बुद्ध्या मन्यते नहि तत्र ते । तन्निवृत्तौ स तद्ब्रह्म यच्छुद्धं रूपवर्जितम्

dehasyātmanyahaṁ buddhyā manyate nahi tatra te tannivṛttau sa tadbrahma yacchuddhaṁ rūpavarjitam

'"मैं" इस बुद्धि से मनुष्य शरीर को आत्मा मान लेता है, परंतु वास्तव में वह वहाँ नहीं है। उस भ्रम की निवृत्ति होने पर वही आत्मा ब्रह्म है, जो शुद्ध और रूपरहित है।'

श्लोक 55 (padma.6.209.55)

स्वप्रकाशं जगद्धेतु हेत्वतीतं गुणोर्जितम् । नित्यं विज्ञानमानंद स्वभासा भासयज्जगत्

svaprakāśaṁ jagaddhetu hetvatītaṁ guṇorjitam nityaṁ vijñānamānaṁda svabhāsā bhāsayajjagat

'वह स्वप्रकाश है, जगत् का कारण है, कारणों से परे है, शक्ति-संपन्न है; नित्य, विज्ञानस्वरूप, आनंदस्वरूप है, और अपने ही प्रकाश से जगत् को प्रकाशित करता है।'

श्लोक 56 (padma.6.209.56)

न जिह्वा लेढि तच्चक्षुर्न पश्यति शृणोति न । श्रुतिर्जिघ्रति न घ्राणं न त्वक्स्पृशति कर्हिचित्

na jihvā leḍhi taccakṣurna paśyati śṛṇoti na śrutirjighrati na ghrāṇaṁ na tvakspṛśati karhicit

'न कोई जिह्वा उसे चख सकती है, न आँख उसे देख सकती है, न कान उसे सुन सकते हैं; न नासिका उसे सूँघ सकती है, न त्वचा उसे कभी छू सकती है।'

श्लोक 57 (padma.6.209.57)

अतीतमिंद्रियेभ्यस्तत्स्वप्रकाशकमात्मदृक् । अविषयं मनोदूरं बुद्धेरपि न गोचरम्

atītamiṁdriyebhyastatsvaprakāśakamātmadṛk aviṣayaṁ manodūraṁ buddherapi na gocaram

'वह इंद्रियों से परे, स्वयं-प्रकाशक और आत्म-दृष्टि से ही ग्राह्य है; वह किसी का विषय नहीं है, मन से भी दूर है, और बुद्धि की भी पहुँच से परे है।'

श्लोक 58 (padma.6.209.58)

तस्यावताररूपाणि शुद्धसत्वानि देवताः । सेवंते तन्न जानंति रूपं यत्सदसत्परम्

tasyāvatārarūpāṇi śuddhasatvāni devatāḥ sevaṁte tanna jānaṁti rūpaṁ yatsadasatparam

'देवता, जो शुद्ध सत्वगुण वाले हैं, उसके अवतार-रूपों की सेवा करते हैं; परंतु वे उस रूप को नहीं जानते, जो सत् और असत् से भी परे है।'

श्लोक 59 (padma.6.209.59)

एवं स्वरूपमात्मा यस्तं समुद्दिश्य कः कुधीः । क्रोधं कुर्याद्यतस्तस्य नोत्पत्तिर्नैव संक्षयः

evaṁ svarūpamātmā yastaṁ samuddiśya kaḥ kudhīḥ krodhaṁ kuryādyatastasya notpattirnaiva saṁkṣayaḥ

'ऐसा जिसका स्वरूप है, उस आत्मा को लक्ष्य कर कौन दुर्बुद्धि क्रोध करेगा, जबकि उसकी न उत्पत्ति है और न ही विनाश है?'

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