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उत्तर खण्ड · अध्याय 241

परशुरामचरित

अध्याय 240अध्याय-सूचीअध्याय 242

श्लोक 1 (padma.6.241.1)

ईश्वर उवाच- भृगुपुत्रो महानासीज्जमदग्निर्द्विजोत्तमः । समस्तवेदवेदांगपारगश्च महातपाः ।

īśvara uvāca bhṛguputro mahānāsījjamadagnirdvijottamaḥ samastavedavedāṁgapāragaśca mahātapāḥ

ईश्वर जी ने कहा — भृगु के पुत्र, महान् जमदग्नि, श्रेष्ठ द्विज, समस्त वेद-वेदांगों के पारगामी, महातपस्वी हुए।

श्लोक 2 (padma.6.241.2)

तपस्तेपे सुधर्मात्मा महेंद्रं प्रति भामिनि । सहस्रवर्षपर्य्यंतं गंगायाः पुलिने शुभे ।

tapastepe sudharmātmā maheṁdraṁ prati bhāmini sahasravarṣaparyyaṁtaṁ gaṁgāyāḥ puline śubhe

हे भामिनी, उस धर्मात्मा ने गंगा के शुभ तट पर हज़ार वर्षों तक महेंद्र को लक्ष्य करके तप किया।

श्लोक 3 (padma.6.241.3)

ततः प्रसन्नः प्राहेदं भगवान्पाकशासनः । इंद्र उवाच- वरं वृणीष्व विप्रेंद्र यत्ते मनसि वर्त्तते ।

tataḥ prasannaḥ prāhedaṁ bhagavānpākaśāsanaḥ iṁdra uvāca varaṁ vṛṇīṣva vipreṁdra yatte manasi varttate

तब प्रसन्न होकर भगवान् पाकशासन (इंद्र) ने यह कहा। इंद्र जी ने कहा — हे विप्रेंद्र, जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो।

श्लोक 4 (padma.6.241.4)

ईश्वर उवाच- ततः प्रोवाच विप्रर्षिः परितुष्टं शतक्रतुम् । जमदग्निरुवाच- सुरभिं देहि मे देव सर्वकामदुघां सदा ।

īśvara uvāca tataḥ provāca viprarṣiḥ parituṣṭaṁ śatakratum jamadagniruvāca surabhiṁ dehi me deva sarvakāmadughāṁ sadā

ईश्वर जी ने कहा — तब उस विप्रर्षि ने प्रसन्न इंद्र से कहा। जमदग्नि जी ने कहा — हे देव, मुझे सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली कामधेनु सुरभि सदा के लिए दीजिए।

श्लोक 5 (padma.6.241.5)

ईश्वर उवाच- ततः प्रसन्नो देवेशस्तस्मै विप्राय गोत्रभित् । प्रददौ सुरभिं देवीं सर्वकामदुघां तदा ।

īśvara uvāca tataḥ prasanno deveśastasmai viprāya gotrabhit pradadau surabhiṁ devīṁ sarvakāmadughāṁ tadā

ईश्वर जी ने कहा — तब प्रसन्न देवेश इंद्र ने उस विप्र को सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली देवी सुरभि प्रदान की।

श्लोक 6 (padma.6.241.6)

स लब्ध्वा सुरभीं देवीं जमदग्निर्महातपाः । उवास महदैश्वर्यः शतक्रतुरिवापरः ।

sa labdhvā surabhīṁ devīṁ jamadagnirmahātapāḥ uvāsa mahadaiśvaryaḥ śatakraturivāparaḥ

वह देवी सुरभि पाकर महातपस्वी जमदग्नि दूसरे इंद्र के समान महान ऐश्वर्य के साथ रहने लगे।

श्लोक 7 (padma.6.241.7)

रेणुकस्य सुतां रम्यां रेणुकां नामनामतः । उपयेमे विधानेन जमदग्निर्महातपाः ।

reṇukasya sutāṁ ramyāṁ reṇukāṁ nāmanāmataḥ upayeme vidhānena jamadagnirmahātapāḥ

महातपस्वी जमदग्नि ने रेणुक की सुंदर पुत्री, जो रेणुका नाम से पुकारी जाती थी, से विधिपूर्वक विवाह किया।

श्लोक 8 (padma.6.241.8)

तया सह स धर्मात्मा रेमे वर्षाण्यनेकशः । पौलोम्या शुभया देव्या यथा संक्रन्दनो विभुः ।

tayā saha sa dharmātmā reme varṣāṇyanekaśaḥ paulomyā śubhayā devyā yathā saṁkrandano vibhuḥ

उस धर्मात्मा ने उसके साथ अनेक वर्षों तक आनंद से समय बिताया, जैसे प्रभु इंद्र शुभ देवी पौलोमी के साथ करते हैं।

श्लोक 9 (padma.6.241.9)

ततः स पुत्रकामत्वादिष्टिं चक्रे सुधार्म्मिकः । इष्ट्या संतोषयामास पाकशासनमीश्वरम् ।

tataḥ sa putrakāmatvādiṣṭiṁ cakre sudhārmmikaḥ iṣṭyā saṁtoṣayāmāsa pākaśāsanamīśvaram

तब पुत्र की कामना से उस धर्मात्मा ने यज्ञ किया, और उस यज्ञ से पाकशासन ईश्वर को संतुष्ट किया।

श्लोक 10 (padma.6.241.10)

परितुष्टः शचीभर्त्ता तस्मै पुत्रं महाबलम् । महौजसं महाबाहुं सर्वशत्रुप्रतापनम् ।

parituṣṭaḥ śacībharttā tasmai putraṁ mahābalam mahaujasaṁ mahābāhuṁ sarvaśatrupratāpanam

संतुष्ट होकर शचीपति इंद्र ने उसे महाबली, महातेजस्वी, महाबाहु, सब शत्रुओं का ताप हरने वाला पुत्र [देने का वर दिया]।

श्लोक 11 (padma.6.241.11)

अथ कालेन विप्रेंद्रो रेणुकायां शुचिस्मिते । पुत्रमुत्पादयामास महावीर्य्यं बलान्वितम् ।

atha kālena vipreṁdro reṇukāyāṁ śucismite putramutpādayāmāsa mahāvīryyaṁ balānvitam

तब समय आने पर उस श्रेष्ठ विप्र ने मधुरहास्य रेणुका के गर्भ से महापराक्रमी, बलवान पुत्र उत्पन्न किया,

श्लोक 12 (padma.6.241.12)

विष्णोरंशांशभागेन सर्वलक्षणलक्षिणम् । तस्मिन्सुते महावीर्य्ये भृगुस्तस्य पितामहः ।

viṣṇoraṁśāṁśabhāgena sarvalakṣaṇalakṣiṇam tasminsute mahāvīryye bhṛgustasya pitāmahaḥ

जो विष्णु के अंश के अंश-भाग से उत्पन्न, सब शुभ लक्षणों से युक्त था। उस महापराक्रमी पुत्र के लिए उसके पितामह भृगु ने —

श्लोक 13 (padma.6.241.13)

नाम चास्मै ददौ हर्षाद्विष्णोरंशोपलक्षितम् । चक्रेऽथ नामधेयं तु राम इत्यस्य शोभनम् ।

nāma cāsmai dadau harṣādviṣṇoraṁśopalakṣitam cakre'tha nāmadheyaṁ tu rāma ityasya śobhanam

हर्षपूर्वक उसे विष्णु के अंश से चिह्नित नाम दिया — उन्होंने उसका शुभ नामकरण 'राम' किया।

श्लोक 14 (padma.6.241.14)

जमदग्नेः समुत्पन्नो जामदग्न्य इतीरितः । तद्भार्गवान्वयः सोऽपि ववृधे द्विजपुंगवः ।

jamadagneḥ samutpanno jāmadagnya itīritaḥ tadbhārgavānvayaḥ so'pi vavṛdhe dvijapuṁgavaḥ

जमदग्नि से उत्पन्न होने से वे जामदग्न्य कहलाए; उस भार्गव कुल में जन्मे वह श्रेष्ठ द्विज बड़े होने लगे।

श्लोक 15 (padma.6.241.15)

उपनीतं स्तुतो येन सर्वविद्याविशारदः । तपस्तप्तुं जगामाथ शालग्रामाचलं प्रति ।

upanītaṁ stuto yena sarvavidyāviśāradaḥ tapastaptuṁ jagāmātha śālagrāmācalaṁ prati

उपनयन संस्कार होने पर, सबकी प्रशंसा प्राप्त, सब विद्याओं में निपुण वे शालग्राम पर्वत की ओर तप करने चले गए।

श्लोक 16 (padma.6.241.16)

ददर्श कश्यपं तत्र ब्रह्मर्षिममितौजसम् । हर्षेण पूरितस्तस्मिन्मरीचितनयो द्विजः ।

dadarśa kaśyapaṁ tatra brahmarṣimamitaujasam harṣeṇa pūritastasminmarīcitanayo dvijaḥ

वहाँ उन्होंने अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि कश्यप का दर्शन किया। उनसे मिलकर हर्ष से भरे उस मरीचि-पुत्र (कश्यप) ने —

श्लोक 17 (padma.6.241.17)

विधिना प्रददौ तस्मै मंत्रं वैष्णवमव्ययम् । लब्धमंत्रस्तदा रामं कश्यपात्तु महात्मनः ।

vidhinā pradadau tasmai maṁtraṁ vaiṣṇavamavyayam labdhamaṁtrastadā rāmaṁ kaśyapāttu mahātmanaḥ

विधिपूर्वक उन्हें अविनाशी वैष्णव मंत्र प्रदान किया। उस महात्मा कश्यप से मंत्र पाकर राम ने —

श्लोक 18 (padma.6.241.18)

पूजयामास विधिना स तदा कमलापतिम् । षडक्षरं महामंत्रं जपन्नेव दिवानिशम् ।

pūjayāmāsa vidhinā sa tadā kamalāpatim ṣaḍakṣaraṁ mahāmaṁtraṁ japanneva divāniśam

विधिपूर्वक उस कमलापति की पूजा की, और दिन-रात उस छह अक्षरों वाले महामंत्र का जप करते रहे,

श्लोक 19 (padma.6.241.19)

ध्यायन्कमलपत्राक्षं विष्णुं सर्वगतं हरिम् । तपस्तेपे स धर्मात्मा बहुवर्षाणि भार्गवः ।

dhyāyankamalapatrākṣaṁ viṣṇuṁ sarvagataṁ harim tapastepe sa dharmātmā bahuvarṣāṇi bhārgavaḥ

कमलपत्र जैसे नेत्रों वाले, सर्वव्यापी विष्णु हरि का ध्यान करते हुए, उस धर्मात्मा भार्गव ने अनेक वर्षों तक तप किया।

श्लोक 20 (padma.6.241.20)

जितेंद्रियस्तु यतवाक्तदा तस्थौ महातपाः । जमदग्निस्तु विप्रर्षिः स्थितो गंगातटे शुभे ।

jiteṁdriyastu yatavāktadā tasthau mahātapāḥ jamadagnistu viprarṣiḥ sthito gaṁgātaṭe śubhe

जितेंद्रिय और वाणी को संयत रखते हुए वह महातपस्वी वहीं ठहरे रहे। और सागे विप्रर्षि जमदग्नि गंगा के शुभ तट पर —

श्लोक 21 (padma.6.241.21)

चकार विधिवद्धर्म्यं यज्ञदानादिकं महत् । धेन्वाः प्रसादादिंद्रस्य संपूर्णास्तस्य सम्पदः ।

cakāra vidhivaddharmyaṁ yajñadānādikaṁ mahat dhenvāḥ prasādādiṁdrasya saṁpūrṇāstasya sampadaḥ

विधिपूर्वक बड़े धर्मपूर्ण यज्ञ-दान आदि करते रहे। इंद्र की उस [कामधेनु] गाय की कृपा से उनकी सम्पदाएँ पूर्ण हो गईं।

श्लोक 22 (padma.6.241.22)

कस्यचित्त्वथकालस्य हैहयाधिपतिः प्रभुः । विजित्वा सर्वराष्ट्राणि सर्वसैन्यसमावृतः ।

kasyacittvathakālasya haihayādhipatiḥ prabhuḥ vijitvā sarvarāṣṭrāṇi sarvasainyasamāvṛtaḥ

कुछ समय पश्चात् हैहयों के बलवान् स्वामी ने, सब राष्ट्रों को जीतकर, संपूर्ण सेना सहित —

श्लोक 23 (padma.6.241.23)

भार्गवस्याश्रमं प्राप्य जमदग्नेर्महीपतिः । समीक्ष्य तं महाभागं ववंदे मुनिसत्तमम् ।

bhārgavasyāśramaṁ prāpya jamadagnermahīpatiḥ samīkṣya taṁ mahābhāgaṁ vavaṁde munisattamam

भार्गव जमदग्नि के आश्रम में पहुँचकर, उस महात्मा मुनिश्रेष्ठ को देखकर वंदना की।

श्लोक 24 (padma.6.241.24)

पृष्ट्वा तु कुशलं तस्य महर्षेर्भावितात्मनः । प्रददौ नृपतिस्तस्मै वस्त्राण्याभरणानि च ।

pṛṣṭvā tu kuśalaṁ tasya maharṣerbhāvitātmanaḥ pradadau nṛpatistasmai vastrāṇyābharaṇāni ca

उस भावित-आत्मा महर्षि का कुशल-क्षेम पूछकर राजा ने उन्हें वस्त्र और आभूषण भेंट किए।

श्लोक 25 (padma.6.241.25)

स च संपूजयामास राजानं गृहमागतम् । मधुपर्केण विधिना पूजयित्वा नृपोत्तमम् ।

sa ca saṁpūjayāmāsa rājānaṁ gṛhamāgatam madhuparkeṇa vidhinā pūjayitvā nṛpottamam

और उन्होंने घर आए राजा का सत्कार किया — मधुपर्क विधि से उस श्रेष्ठ राजा की पूजा करके —

श्लोक 26 (padma.6.241.26)

ससैन्याय नृपेंद्राय भोजनं प्रददौ मुनिः । प्रार्थिता सुरभिस्तेन भार्गवेण सुधीमता ।

sasainyāya nṛpeṁdrāya bhojanaṁ pradadau muniḥ prārthitā surabhistena bhārgaveṇa sudhīmatā

मुनि ने सेना सहित उस राजेंद्र को भोजन कराया। उस सुबुद्धि भार्गव ने कामधेनु सुरभि से प्रार्थना की,

श्लोक 27 (padma.6.241.27)

संपूर्णमन्नपानादि ससर्ज शबला तदा । अक्षय्यमन्नपानादि तया सृष्टं महातपाः ।

saṁpūrṇamannapānādi sasarja śabalā tadā akṣayyamannapānādi tayā sṛṣṭaṁ mahātapāḥ

तब उस शबला गाय ने संपूर्ण अन्न-पान आदि उत्पन्न कर दिया। उसके द्वारा उत्पन्न वह अन्न-पान अक्षय था —

श्लोक 28 (padma.6.241.28)

ससैन्याय नृपेंद्राय प्रददौ मुनिसत्तमः । तां दृष्ट्वा शबलां राजा कुतूहलसमन्वितः ।

sasainyāya nṛpeṁdrāya pradadau munisattamaḥ tāṁ dṛṣṭvā śabalāṁ rājā kutūhalasamanvitaḥ

उसे उस मुनिश्रेष्ठ ने सेना सहित राजेंद्र को दे दिया। उस शबला को देखकर राजा कुतूहल से भर गया,

श्लोक 29 (padma.6.241.29)

स्पृहां चकारयामास तस्यां गवि सुदुर्म्मतिः । अयाचत्सुरभिं तत्र जमदग्निं नृपोत्तमः ।

spṛhāṁ cakārayāmāsa tasyāṁ gavi sudurmmatiḥ ayācatsurabhiṁ tatra jamadagniṁ nṛpottamaḥ

और उस अत्यंत दुर्बुद्धि राजा के मन में उस गाय के प्रति लालसा उत्पन्न हो गई। उस श्रेष्ठ राजा ने वहीं जमदग्नि से सुरभि की याचना की।

श्लोक 30 (padma.6.241.30)

कार्त्तवीर्य उवाच- शबलां देहि मे विप्र कपिलां सर्वकामदाम् । अन्यधेनुसहस्राणि दास्यामि तव सुव्रत ।

kārttavīrya uvāca śabalāṁ dehi me vipra kapilāṁ sarvakāmadām anyadhenusahasrāṇi dāsyāmi tava suvrata

कार्तवीर्य ने कहा — हे विप्र, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाली वह कपिला शबला मुझे दे दीजिए। हे सुव्रत, मैं इसके बदले हज़ारों अन्य गायें दूँगा।

श्लोक 31 (padma.6.241.31)

ईश्वर उवाच- इत्युक्तस्तेन राज्ञाथ जमदग्निर्महातपाः । जमदग्निरुवाच-। न देया शबला राजन्मया तव महीपते ।

īśvara uvāca ityuktastena rājñātha jamadagnirmahātapāḥ jamadagniruvāca na deyā śabalā rājanmayā tava mahīpate

ईश्वर जी ने कहा — उस राजा के ऐसा कहने पर महातपस्वी जमदग्नि ने कहा। जमदग्नि जी ने कहा — हे राजन्, हे भूपते, शबला मुझसे तुम्हें नहीं दी जा सकती।

श्लोक 32 (padma.6.241.32)

इयं च देवदेवेन शक्रेण परिपालिता । देवतानां धनं राजन्दातव्यं स्यात्कथं मया ।

iyaṁ ca devadevena śakreṇa paripālitā devatānāṁ dhanaṁ rājandātavyaṁ syātkathaṁ mayā

यह तो देवाधिदेव इंद्र द्वारा पालित है। हे राजन्, देवताओं का धन मुझसे कैसे दिया जा सकता है?

श्लोक 33 (padma.6.241.33)

ईश्वर उवाच- इत्युक्तः स तदा राजा क्रोधेन कलुषीकृतः । बलाज्जग्राह शबलां सर्वसैन्यसमावृतः ।

īśvara uvāca ityuktaḥ sa tadā rājā krodhena kaluṣīkṛtaḥ balājjagrāha śabalāṁ sarvasainyasamāvṛtaḥ

ईश्वर जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर क्रोध से कलुषित हुए उस राजा ने संपूर्ण सेना सहित बलपूर्वक शबला को छीन लिया।

श्लोक 34 (padma.6.241.34)

ततः क्रुद्धा महाभागा शबला वरवर्णिनि । जघान तस्य सैन्यानि शृंगैः खुरतलैरपि ।

tataḥ kruddhā mahābhāgā śabalā varavarṇini jaghāna tasya sainyāni śṛṁgaiḥ khuratalairapi

तब हे शुभवर्णे, क्रोधित हुई वह महाभाग्यशाली शबला ने अपने सींगों और खुरों से उसकी सेनाओं का संहार कर डाला।

श्लोक 35 (padma.6.241.35)

घातयित्वा मुहूर्त्तेन तत्सैन्यं शबला बलात् । अंतर्द्धानं गता देवी ययौ शक्रांतिकं क्षणात् ।

ghātayitvā muhūrttena tatsainyaṁ śabalā balāt aṁtarddhānaṁ gatā devī yayau śakrāṁtikaṁ kṣaṇāt

क्षणभर में बलपूर्वक उस सेना का संहार करके वह देवी अंतर्धान होकर तुरंत इंद्र के पास चली गई।

श्लोक 36 (padma.6.241.36)

स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा सोऽर्जुनः क्रोधमूर्च्छितः । मुष्टिना ताडयामास भार्गवं द्विजसत्तमम् ।

svasainyaṁ nihataṁ dṛṣṭvā so'rjunaḥ krodhamūrcchitaḥ muṣṭinā tāḍayāmāsa bhārgavaṁ dvijasattamam

अपनी सेना को मारा गया देखकर वह अर्जुन (कार्तवीर्य) क्रोध से मूर्च्छित होकर मुट्ठी से उस श्रेष्ठ भार्गव द्विज पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 37 (padma.6.241.37)

ताडितस्तेन बहुशो विकलांगः प्रकल्पितः । पपात सहसा भूमौ ममार द्विजसत्तमः ।

tāḍitastena bahuśo vikalāṁgaḥ prakalpitaḥ papāta sahasā bhūmau mamāra dvijasattamaḥ

बार-बार प्रहार से उनके अंग विकल हो गए, और वह श्रेष्ठ द्विज सहसा भूमि पर गिरकर मर गए।

श्लोक 38 (padma.6.241.38)

हत्वा मुनिवरं तत्र पापत्मा हैहयाधिपः । महासैन्यपरीवारो विवेश नगरं स्वकम् ।

hatvā munivaraṁ tatra pāpatmā haihayādhipaḥ mahāsainyaparīvāro viveśa nagaraṁ svakam

उस श्रेष्ठ मुनि को मारकर वह पापात्मा हैहयराज महान सेना सहित अपनी नगरी में लौट गया।

श्लोक 39 (padma.6.241.39)

रामस्तु देवदेवेशं पूजयामास भार्गवः । तेन संपूजितो देवः प्रसन्नः प्राह केशवः ।

rāmastu devadeveśaṁ pūjayāmāsa bhārgavaḥ tena saṁpūjito devaḥ prasannaḥ prāha keśavaḥ

इधर भार्गव राम देवाधिदेव की पूजा में लीन थे। उनके द्वारा भलीभाँति पूजित प्रसन्न केशव देव ने कहा।

श्लोक 40 (padma.6.241.40)

श्रीभगवानुवाच- प्रीतोस्मि तपसा वत्स भवतो नियतात्मनः । संप्रदास्यामि ते विप्र मच्छक्तिं परमां शुभाम् ।

śrībhagavānuvāca prītosmi tapasā vatsa bhavato niyatātmanaḥ saṁpradāsyāmi te vipra macchaktiṁ paramāṁ śubhām

श्रीभगवान् ने कहा — हे वत्स, मैं तुम्हारे संयत तप से प्रसन्न हूँ। हे विप्र, मैं तुम्हें अपनी परम शुभ शक्ति प्रदान करूँगा।

श्लोक 41 (padma.6.241.41)

आवेशितोऽथ मच्छक्त्या जहि दुष्टान्नृपोत्तमान् । भूभारकविनाशाय देवतानां हिताय वै ।

āveśito'tha macchaktyā jahi duṣṭānnṛpottamān bhūbhārakavināśāya devatānāṁ hitāya vai

मेरी शक्ति से आविष्ट होकर पृथ्वी के भार-रूप दुष्ट श्रेष्ठ राजाओं को, देवताओं के हित के लिए, मार डालो।

श्लोक 42 (padma.6.241.42)

ईश्वर उवाच- इत्युक्त्वा प्रददौ देवः परशुं शत्रुधर्षणम् । वैष्णवं च महच्चापं दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः । दत्वा प्रोवाच भगवाञ्जामदग्निं जनार्द्दनः ।

īśvara uvāca ityuktvā pradadau devaḥ paraśuṁ śatrudharṣaṇam vaiṣṇavaṁ ca mahaccāpaṁ divyānyastrāṇyanekaśaḥ datvā provāca bhagavāñjāmadagniṁ janārddanaḥ

ईश्वर जी ने कहा — ऐसा कहकर देव ने शत्रुनाशक परशु, वैष्णव महाधनुष तथा अनेक दिव्य अस्त्र प्रदान किए; उन्हें देकर भगवान् जनार्दन ने जामदग्न्य से कहा।

श्लोक 43 (padma.6.241.43)

श्रीभगवानुवाच- मदोत्कटान्नृपान्हत्वा बहुशः परवीरहा । गृहाण पृथिवीं सर्वां सागरान्तां द्विजोत्तम ।

śrībhagavānuvāca madotkaṭānnṛpānhatvā bahuśaḥ paravīrahā gṛhāṇa pṛthivīṁ sarvāṁ sāgarāntāṁ dvijottama

श्रीभगवान् ने कहा — हे शत्रुवीरनाशक, मद से उन्मत्त राजाओं को बार-बार मारकर, हे द्विजोत्तम, समुद्रपर्यंत समस्त पृथ्वी ग्रहण करो।

श्लोक 44 (padma.6.241.44)

पालयस्व च धर्मेण वीर्य्येण महता वृतः । कालेन मत्पदं चापि मत्प्रसादाद्गमिष्यसि ।

pālayasva ca dharmeṇa vīryyeṇa mahatā vṛtaḥ kālena matpadaṁ cāpi matprasādādgamiṣyasi

महान पराक्रम से युक्त होकर उसका धर्मपूर्वक पालन करो। समय आने पर मेरी कृपा से तुम मेरे ही पद को प्राप्त होगे।

श्लोक 45 (padma.6.241.45)

ईश्वर उवाच- इत्युक्त्वांतर्हितो देवो वरं दत्वा द्विजन्मने । रामोऽपि चाथ सहसा प्रययौ पितुराश्रमम् ।

īśvara uvāca ityuktvāṁtarhito devo varaṁ datvā dvijanmane rāmo'pi cātha sahasā prayayau piturāśramam

ईश्वर जी ने कहा — ऐसा कहकर, उस द्विज को वर देकर, देव अंतर्धान हो गए। राम भी तत्काल अपने पिता के आश्रम को चल पड़े।

श्लोक 46 (padma.6.241.46)

पितरं निहतं दृष्ट्वा भार्गवः क्रोधमूर्च्छितः । निष्क्षत्रां कर्तुमन्विच्छन्महीं नृपसमाकुलाम् ।

pitaraṁ nihataṁ dṛṣṭvā bhārgavaḥ krodhamūrcchitaḥ niṣkṣatrāṁ kartumanvicchanmahīṁ nṛpasamākulām

पिता को मारा हुआ देखकर वह भार्गव क्रोध से मूर्च्छित हो गया, और राजाओं से भरी पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करने का संकल्प करने लगा।

श्लोक 47 (padma.6.241.47)

जगाम हैहयपतेर्नगरं नृपसंवृतम् । क्रोधावेशज्वलद्गात्रो द्वार्य्यतिष्ठदुदायुधः ।

jagāma haihayapaternagaraṁ nṛpasaṁvṛtam krodhāveśajvaladgātro dvāryyatiṣṭhadudāyudhaḥ

वह हैहयराज की, राजाओं से घिरी नगरी में गया। क्रोधावेश से जलते शरीर वाला, हथियार उठाए वह द्वार पर खड़ा हो गया।

श्लोक 48 (padma.6.241.48)

तं दृष्ट्वा तत्पुरजना जामदग्न्यं महौजसम् । जाज्वल्यमानं वपुषा कालाग्निमिव मेनिरे ।

taṁ dṛṣṭvā tatpurajanā jāmadagnyaṁ mahaujasam jājvalyamānaṁ vapuṣā kālāgnimiva menire

उस महातेजस्वी जामदग्न्य को अपने तेज से जलता हुआ देखकर वहाँ के नगरवासी उसे प्रलयाग्नि के समान मानने लगे।

श्लोक 49 (padma.6.241.49)

भयार्ता विद्रुताः सर्वे राजानं हैहयाधिपम् । शशंसुस्तं महासत्वं सर्वायुधसमन्वितम् ।

bhayārtā vidrutāḥ sarve rājānaṁ haihayādhipam śaśaṁsustaṁ mahāsatvaṁ sarvāyudhasamanvitam

भयभीत होकर सब भाग खड़े हुए, और हैहयराज को उस सब आयुधों से युक्त महाबली की सूचना दी।

श्लोक 50 (padma.6.241.50)

श्रुत्वा स राजा तद्वाक्यं प्राह विस्मितचेतसा । हैहयाधिप उवाच- कोऽसौ मम पुरद्वारि सायुधः संस्थितो बलात् ।

śrutvā sa rājā tadvākyaṁ prāha vismitacetasā haihayādhipa uvāca ko'sau mama puradvāri sāyudhaḥ saṁsthito balāt

यह सुनकर विस्मित मन से उस राजा ने कहा। हैहयराज ने कहा — मेरे नगर-द्वार पर बलपूर्वक सशस्त्र खड़ा वह कौन है?

श्लोक 51 (padma.6.241.51)

महेंद्रो वा यमो वापि रुद्रो वा धनदोऽपि वा । सायुधो मत्पुरद्वारि स्थातुं शक्तो न कर्हिचित् ।

maheṁdro vā yamo vāpi rudro vā dhanado'pi vā sāyudho matpuradvāri sthātuṁ śakto na karhicit

महेंद्र हो या यम, रुद्र हो या कुबेर — कोई भी सशस्त्र होकर मेरे नगर-द्वार पर कभी खड़ा नहीं रह सकता!

श्लोक 52 (padma.6.241.52)

महादेव उवाच- इत्युक्त्वा पार्थिवेंद्रो ऽसौ किंकरान्सुमहाबलान् । प्रेरयामास तं द्रष्टुं गृह्णीतेत्याह दुर्मतिः ।

mahādeva uvāca ityuktvā pārthiveṁdro 'sau kiṁkarānsumahābalān prerayāmāsa taṁ draṣṭuṁ gṛhṇītetyāha durmatiḥ

महादेव जी ने कहा — ऐसा कहकर उस दुर्बुद्धि राजा ने अपने महाबली सेवकों को उसे देखने के लिए भेजा, 'पकड़ लो' यह कहते हुए।

श्लोक 53 (padma.6.241.53)

ते गत्वा ददृशुर्वीरं पुरद्वारि महाबलम् । ज्वलंतमिव कालाग्निं दुर्निरीक्ष्यं स्वतेजसा ।

te gatvā dadṛśurvīraṁ puradvāri mahābalam jvalaṁtamiva kālāgniṁ durnirīkṣyaṁ svatejasā

वे जाकर नगर-द्वार पर उस महाबली वीर को देखने लगे, जो अपने ही तेज से देखे न जा सकने योग्य, प्रलयाग्नि की तरह प्रज्वलित था।

श्लोक 54 (padma.6.241.54)

तस्य संदर्शनेऽप्यत्र न शक्तास्ते महाबलाः । ग्रहीतुकामस्तं वीरं समंतात्प्रययुर्भृशम् ।

tasya saṁdarśane'pyatra na śaktāste mahābalāḥ grahītukāmastaṁ vīraṁ samaṁtātprayayurbhṛśam

उसे देखने में भी वे महाबली समर्थ न हो सके; फिर भी उस वीर को पकड़ने की इच्छा से वे चारों ओर से उस पर टूट पड़े।

श्लोक 55 (padma.6.241.55)

तान्दृष्ट्वा सायुधान्सर्वान्पार्थिवेन्द्रस्य किंकरान् । प्रहसन्प्राह विप्रेन्द्रो जामदग्निर्महाबलः ।

tāndṛṣṭvā sāyudhānsarvānpārthivendrasya kiṁkarān prahasanprāha viprendro jāmadagnirmahābalaḥ

राजा के उन सब सशस्त्र सेवकों को देखकर वह महाबली विप्रश्रेष्ठ जामदग्न्य हँसते हुए बोला।

श्लोक 56 (padma.6.241.56)

परशुराम उवाच- भार्गवस्य सुतो रामः संप्राप्तोऽहं नराधमाः । स्वपितुर्निधनात्सर्वान्हनिष्यामि नृपोत्तमान् ।

paraśurāma uvāca bhārgavasya suto rāmaḥ saṁprāpto'haṁ narādhamāḥ svapiturnidhanātsarvānhaniṣyāmi nṛpottamān

परशुराम ने कहा — हे नराधमो, मैं भार्गव-पुत्र राम आ पहुँचा हूँ। अपने पिता की मृत्यु के लिए मैं इन सब श्रेष्ठ राजाओं को मार डालूँगा।

श्लोक 57 (padma.6.241.57)

कार्तवीर्यस्य रुधिरं मत्पित्रे तिलसंयुतम् । दास्यामि पिण्डदानं च तच्छिरः कमलेन वै ।

kārtavīryasya rudhiraṁ matpitre tilasaṁyutam dāsyāmi piṇḍadānaṁ ca tacchiraḥ kamalena vai

कार्तवीर्य के रक्त को तिल मिलाकर अपने पिता को पिंडदान दूँगा, और उसका सिर ही उस पिंड के लिए कमल बनाकर अर्पित करूँगा।

श्लोक 58 (padma.6.241.58)

महादेव उवाच- इत्युक्तास्ते महावीर्य्याः किंकरास्तस्य भूपतेः । शरैः स्म ताडयामासुः पलालैरिव पावकम् ।

mahādeva uvāca ityuktāste mahāvīryyāḥ kiṁkarāstasya bhūpateḥ śaraiḥ sma tāḍayāmāsuḥ palālairiva pāvakam

महादेव जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर उस राजा के वे महापराक्रमी सेवक बाणों से उस पर वैसे ही टूट पड़े जैसे पुआल से अग्नि पर प्रहार किया जाए।

श्लोक 59 (padma.6.241.59)

ततः क्रुद्धो महावीर्यो रामस्सत्यपराक्रमः । वैष्णवं चापमाकृष्य ज्यानिनादमथाकरोत् ।

tataḥ kruddho mahāvīryo rāmassatyaparākramaḥ vaiṣṇavaṁ cāpamākṛṣya jyāninādamathākarot

तब क्रोधित हुए सत्य-पराक्रमी महाबली राम ने वैष्णव धनुष खींचकर उसकी प्रत्यंचा की टंकार की।

श्लोक 60 (padma.6.241.60)

तेन नादेन महता पूरितं भुवनत्रयम् । देवानामपि संत्रासो बभूव महदद्भुतम् ।

tena nādena mahatā pūritaṁ bhuvanatrayam devānāmapi saṁtrāso babhūva mahadadbhutam

उस महान ध्वनि से तीनों लोक भर गए, और देवताओं को भी अत्यंत अद्भुत भय व्याप्त हो गया।

श्लोक 61 (padma.6.241.61)

ततः पावकसंकाशैराशुगैः सुमहाबलः । ताडयामास तान्वीरान्किंकरान्वै महाबलान् ।

tataḥ pāvakasaṁkāśairāśugaiḥ sumahābalaḥ tāḍayāmāsa tānvīrānkiṁkarānvai mahābalān

तब उस महाबली ने अग्नि के समान बाणों से उन वीर, महाबली सेवकों को मार गिराया।

श्लोक 62 (padma.6.241.62)

हत्वा तु किंकरास्तस्य पार्थिवस्य महात्मनः । कालाग्निरिव संतस्थौ सर्वभूतभयंकरः ।

hatvā tu kiṁkarāstasya pārthivasya mahātmanaḥ kālāgniriva saṁtasthau sarvabhūtabhayaṁkaraḥ

उस महात्मा राजा के सेवकों को मारकर वे प्रलयाग्नि की भाँति, सब प्राणियों के लिए भयंकर होकर खड़े रहे।

श्लोक 63 (padma.6.241.63)

श्रुत्वा तु किंकरान्स्वस्य हतान्रामेण धीमता । हैहयाधिपतिर्वीरः क्रोधसंरक्तलोचनः ।

śrutvā tu kiṁkarānsvasya hatānrāmeṇa dhīmatā haihayādhipatirvīraḥ krodhasaṁraktalocanaḥ

अपने सेवकों को बुद्धिमान राम द्वारा मारा गया सुनकर, हैहयराज वीर, क्रोध से लाल नेत्रों वाला होकर —

श्लोक 64 (padma.6.241.64)

निर्य्ययौ सहसैन्येन यत्रास्ते भागवोऽव्ययः । तं दृष्ट्वा घोरसंकाशं ज्वलंतं स्वेन तेजसा ।

niryyayau sahasainyena yatrāste bhāgavo'vyayaḥ taṁ dṛṣṭvā ghorasaṁkāśaṁ jvalaṁtaṁ svena tejasā

सेना सहित वहाँ निकल पड़ा जहाँ वह अविनाशी भार्गव खड़ा था। अपने ही तेज से जलते हुए, उस घोर दिखने वाले को देखकर —

श्लोक 65 (padma.6.241.65)

त्रस्ताः सर्वे जनास्तत्र शंकमाना जनक्षयम् । ततो युद्धं महाघोरं रामस्य नृपतेस्तदा ।

trastāḥ sarve janāstatra śaṁkamānā janakṣayam tato yuddhaṁ mahāghoraṁ rāmasya nṛpatestadā

वहाँ के सब लोग जनसंहार की आशंका से भयभीत हो गए। तब राजा और राम के बीच अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ,

श्लोक 66 (padma.6.241.66)

शस्त्रास्त्रपातनैर्भीमैर्मेघयोरिव वर्षतोः । ततो रामो महातेजास्तत्सैन्यं नृपतेस्तदा ।

śastrāstrapātanairbhīmairmeghayoriva varṣatoḥ tato rāmo mahātejāstatsainyaṁ nṛpatestadā

जैसे दो मेघ भयंकर वर्षा करते हों, वैसे ही शस्त्र-अस्त्रों की वर्षा से। तब महातेजस्वी राम ने उस राजा की सेना को —

श्लोक 67 (padma.6.241.67)

निर्ददाह क्षणात्सर्वं वैष्णवास्त्रेण लीलया । ततः परशुना रामस्तीक्ष्णेनामितविक्रमः ।

nirdadāha kṣaṇātsarvaṁ vaiṣṇavāstreṇa līlayā tataḥ paraśunā rāmastīkṣṇenāmitavikramaḥ

वैष्णवास्त्र से क्षणभर में लीलामात्र से पूरी तरह भस्म कर दिया। फिर अमित पराक्रमी राम ने तीक्ष्ण परशु से —

श्लोक 68 (padma.6.241.68)

चिच्छेद बाहुसाहस्रं कार्त्तवीर्यस्य दुर्मतेः । न शशाक महावीर्यो योद्धुं रामेण भूपतिः ।

ciccheda bāhusāhasraṁ kārttavīryasya durmateḥ na śaśāka mahāvīryo yoddhuṁ rāmeṇa bhūpatiḥ

दुर्बुद्धि कार्तवीर्य की सहस्र भुजाएँ काट डालीं। वह महापराक्रमी राजा राम से युद्ध करने में समर्थ न हो सका।

श्लोक 69 (padma.6.241.69)

नष्टवीर्य्यो बभूवात्र पापेन स्वेन दुर्म्मतिः । चिच्छेद तच्छिरः क्रुद्धो रेणुकातनयो बली ।

naṣṭavīryyo babhūvātra pāpena svena durmmatiḥ ciccheda tacchiraḥ kruddho reṇukātanayo balī

अपने ही पाप से उस दुर्बुद्धि का बल नष्ट हो गया। क्रोधित होकर रेणुका के बलवान् पुत्र ने उसका सिर काट डाला,

श्लोक 70 (padma.6.241.70)

महाद्रिशृड्गंवज्रेण यथा देवपतिर्बली । हत्वा सहस्रबाहुं तं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।

mahādriśṛḍgaṁvajreṇa yathā devapatirbalī hatvā sahasrabāhuṁ taṁ jāmadagnyaḥ pratāpavān

जैसे बलवान् देवराज इंद्र वज्र से महापर्वत के शिखर को काट डालते हैं। उस सहस्रबाहु को मारकर प्रतापी जामदग्न्य ने —

श्लोक 71 (padma.6.241.71)

जघान पार्थिवान्सर्वान्क्रुद्धः परशुना मृधे । रामं दृष्ट्वा महारौद्रं पार्थिवाः पृथिवीतले ।

jaghāna pārthivānsarvānkruddhaḥ paraśunā mṛdhe rāmaṁ dṛṣṭvā mahāraudraṁ pārthivāḥ pṛthivītale

क्रोधवश युद्ध में परशु से सब राजाओं का संहार कर डाला। उस अत्यंत भयंकर राम को देखकर पृथ्वी के सब राजा —

श्लोक 72 (padma.6.241.72)

भयार्त्ता विद्रुताः सर्वे मातंगा इव केसरिम् । विद्रुतानपि भूपालान्पितुर्निधनमन्युना ।

bhayārttā vidrutāḥ sarve mātaṁgā iva kesarim vidrutānapi bhūpālānpiturnidhanamanyunā

भयभीत होकर वैसे ही भाग गए जैसे सिंह से हाथी भागते हैं। पिता की मृत्यु के शोक-क्रोध से, भागे हुए राजाओं को भी —

श्लोक 73 (padma.6.241.73)

जघान भार्गवः क्रुद्धो नागानिव खगेश्वरः । निःक्षत्रं कृतवान्सर्वं जामदग्निः प्रतापवान् ।

jaghāna bhārgavaḥ kruddho nāgāniva khageśvaraḥ niḥkṣatraṁ kṛtavānsarvaṁ jāmadagniḥ pratāpavān

क्रोधित भार्गव ने मार डाला, जैसे पक्षीराज गरुड़ नागों को मारते हैं। प्रतापी जामदग्नि ने संपूर्ण पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित कर दिया,

श्लोक 74 (padma.6.241.74)

ररक्ष भगवानेकमिक्ष्वाकोः सुमहत्कुलम् । मातामहस्यान्वयत्वाद्रेणुकावचनादथ ।

rarakṣa bhagavānekamikṣvākoḥ sumahatkulam mātāmahasyānvayatvādreṇukāvacanādatha

किंतु उन भगवान् ने इक्ष्वाकु के महान कुल को अकेला बचा रखा, क्योंकि रेणुका के कहने पर वह उनके नानिहाल का ही वंश था।

श्लोक 75 (padma.6.241.75)

तान्भ्रष्टराज्यान्कृत्वा वै मातामहकुलोद्भवान् । न हत्वा मनुवंशांस्तान्रामो नृपकुलांतकः ।

tānbhraṣṭarājyānkṛtvā vai mātāmahakulodbhavān na hatvā manuvaṁśāṁstānrāmo nṛpakulāṁtakaḥ

नृपकुल-नाशक राम ने अपने ननिहाल के उन वंशजों, मनु के वंशधरों को, राज्यभ्रष्ट तो कर दिया, पर उन्हें मारा नहीं।

श्लोक 76 (padma.6.241.76)

सर्वं तु भूभृतां वंशं नाशयामास वीर्य्यवान् । कृत्वा चोर्वीं तु निःक्षत्रां जमदग्निसुतो बली ।

sarvaṁ tu bhūbhṛtāṁ vaṁśaṁ nāśayāmāsa vīryyavān kṛtvā corvīṁ tu niḥkṣatrāṁ jamadagnisuto balī

किंतु उस पराक्रमी ने राजाओं के शेष सारे वंशों का नाश कर दिया। पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करके बलवान् जमदग्नि-पुत्र ने —

श्लोक 77 (padma.6.241.77)

अश्वमेधं महायज्ञं चकार विधिवद्द्विजः । प्रददौ विप्रमुख्येभ्यः सप्तद्वीपवतीं महीम् ।

aśvamedhaṁ mahāyajñaṁ cakāra vidhivaddvijaḥ pradadau vipramukhyebhyaḥ saptadvīpavatīṁ mahīm

विधिपूर्वक महान अश्वमेध यज्ञ किया। उन्होंने श्रेष्ठ विप्रों को सप्तद्वीपवती पृथ्वी दान में दे दी।

श्लोक 78 (padma.6.241.78)

दत्वा महीं स विप्रेभ्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् । तपस्तप्तुं ययौ सोऽथ नरनारायणाश्रमम् ।

datvā mahīṁ sa viprebhyo jāmadagnyaḥ pratāpavān tapastaptuṁ yayau so'tha naranārāyaṇāśramam

पृथ्वी को विप्रों को दान करके वह प्रतापी जामदग्न्य नर-नारायण के आश्रम में तप करने चले गए।

श्लोक 79 (padma.6.241.79)

एतत्ते कथितं देवि जामदग्नेर्महात्मनः । शक्त्यावेशावतारस्य चरितं शार्ङ्गिणः प्रभोः ।

etatte kathitaṁ devi jāmadagnermahātmanaḥ śaktyāveśāvatārasya caritaṁ śārṅgiṇaḥ prabhoḥ

हे देवी, यह महात्मा जमदग्नि-पुत्र, शार्ङ्गधारी प्रभु के शक्त्यावेश-अवतार का चरित्र तुमसे कहा गया।

श्लोक 80 (padma.6.241.80)

नोपास्यं हि भवेत्तस्य शक्त्यावेशान्महात्मनः । उपास्यौ भगवद्भक्तैर्विप्रमुख्यैर्महात्मभिः ।

nopāsyaṁ hi bhavettasya śaktyāveśānmahātmanaḥ upāsyau bhagavadbhaktairvipramukhyairmahātmabhiḥ

उस महात्मा के शक्त्यावेश-रूप की उपासना [पूर्ण अवतारों के समान] नहीं की जाती। भगवद्भक्तों तथा महात्मा श्रेष्ठ विप्रों द्वारा उपासनीय तो —

श्लोक 81 (padma.6.241.81)

रामकृष्णावतारौ तु परिपूर्णौ हि सद्गुणैः । उपास्यमानावृषिभिरपवर्गप्रदौ नृणाम् ।

rāmakṛṣṇāvatārau tu paripūrṇau hi sadguṇaiḥ upāsyamānāvṛṣibhirapavargapradau nṛṇām

राम और कृष्ण के अवतार ही हैं, जो सद्गुणों से परिपूर्ण हैं; ऋषियों द्वारा उपासित वे ही मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।

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