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उत्तर खण्ड · अध्याय 243

विश्वदर्शन

अध्याय 242अध्याय-सूचीअध्याय 244

श्लोक 1 (padma.6.243.1)

शंकर उवाच- अथ तस्मिन्दिने पुण्ये शुभलग्ने शुभान्विते । मंगलस्याभिषेकार्थं मंगलं चक्रिरे जनाः ।

śaṁkara uvāca atha tasmindine puṇye śubhalagne śubhānvite maṁgalasyābhiṣekārthaṁ maṁgalaṁ cakrire janāḥ

शंकर जी ने कहा — तब उस पुण्य दिन, शुभ लग्न और शुभ मुहूर्त में, लोगों ने उस मंगलमय राम के अभिषेक के लिए मांगलिक कार्य किए।

श्लोक 2 (padma.6.243.2)

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ कश्यपः । मार्कंडेयश्च मौद्गल्यः पर्वतो नारदस्तथा ।

vasiṣṭho vāmadevaśca jābāliratha kaśyapaḥ mārkaṁḍeyaśca maudgalyaḥ parvato nāradastathā

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, मार्कण्डेय, मौद्गल्य, पर्वत और नारद —

श्लोक 3 (padma.6.243.3)

एते महर्षयस्तत्र जपहोमपुरस्सरम् । अभिषेकं शुभं चक्रुर्मुनयो राजसत्तमम् ।

ete maharṣayastatra japahomapurassaram abhiṣekaṁ śubhaṁ cakrurmunayo rājasattamam

इन महर्षियों ने वहाँ जप-होम के साथ उस श्रेष्ठ राजा का शुभ अभिषेक किया।

श्लोक 4 (padma.6.243.4)

नानारत्नमये दिव्ये हेमपीठे शुभान्विते । निवेश्य सीतया सार्द्धं श्रिया इव जनार्दनम् ।

nānāratnamaye divye hemapīṭhe śubhānvite niveśya sītayā sārddhaṁ śriyā iva janārdanam

नाना रत्नों से जड़े दिव्य, शुभ स्वर्ण-सिंहासन पर सीता सहित उन्हें बिठाकर — जैसे श्री के साथ जनार्दन को —

श्लोक 5 (padma.6.243.5)

सौवर्णकलशैर्दिव्यैर्नानारत्नमयैः शुभैः । सर्वतीर्थोदकैः पुण्यैर्माङ्गल्यद्रव्यसंयुतैः ।

sauvarṇakalaśairdivyairnānāratnamayaiḥ śubhaiḥ sarvatīrthodakaiḥ puṇyairmāṅgalyadravyasaṁyutaiḥ

नाना रत्नों से जड़े शुभ दिव्य स्वर्ण-कलशों से, सब तीर्थों के पवित्र जल से, मांगलिक द्रव्यों से युक्त,

श्लोक 6 (padma.6.243.6)

दूर्वाग्रतुलसीपत्रपुष्पगंधसमन्वितैः । मंत्रपूतजलैः शुद्धैर्मुनयः संशितव्रताः ।

dūrvāgratulasīpatrapuṣpagaṁdhasamanvitaiḥ maṁtrapūtajalaiḥ śuddhairmunayaḥ saṁśitavratāḥ

दूब की नोक, तुलसीदल, फूल और सुगंध से युक्त, मंत्र-पवित्र शुद्ध जल से — कठोर व्रतधारी मुनियों ने —

श्लोक 7 (padma.6.243.7)

अजपन्वैष्णवान्सूक्तान्चतुर्वेदमयान्शुभान् । अभिषेकं शुभं चक्रुः काकुत्स्थं जगतः पतिम् ।

ajapanvaiṣṇavānsūktāncaturvedamayānśubhān abhiṣekaṁ śubhaṁ cakruḥ kākutsthaṁ jagataḥ patim

चारों वेदों के शुभ वैष्णव सूक्तों का जप करते हुए, काकुत्स्थ जगत्पति का शुभ अभिषेक किया।

श्लोक 8 (padma.6.243.8)

तस्मिन्शुभतमे लग्ने देवदुंदुभयो दिवि । विनेदुः पुष्पवर्षाणि ववृषुश्च समंततः ।

tasminśubhatame lagne devaduṁdubhayo divi vineduḥ puṣpavarṣāṇi vavṛṣuśca samaṁtataḥ

उस अत्यंत शुभ मुहूर्त में आकाश में देव-दुंदुभियाँ बज उठीं, और चारों ओर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 9 (padma.6.243.9)

दिव्यांबरैर्भूषणैश्च दिव्यगंधानुलेपनैः । पुष्पैर्नानाविधैर्दिव्यैर्देव्या सह रघूद्वहः ।

divyāṁbarairbhūṣaṇaiśca divyagaṁdhānulepanaiḥ puṣpairnānāvidhairdivyairdevyā saha raghūdvahaḥ

दिव्य वस्त्रों, आभूषणों, दिव्य सुगंधित अनुलेपनों और नाना प्रकार के दिव्य फूलों से देवी सहित रघुश्रेष्ठ —

श्लोक 10 (padma.6.243.10)

अलंकृतश्च शुशुभे मुनिभिर्वेदपारगैः । छत्रं च चामरं दिव्यं धृतवान्लक्ष्मणस्तदा ।

alaṁkṛtaśca śuśubhe munibhirvedapāragaiḥ chatraṁ ca cāmaraṁ divyaṁ dhṛtavānlakṣmaṇastadā

अलंकृत होकर वेदपारगामी मुनियों से घिरे हुए सुशोभित हो रहे थे। लक्ष्मण ने तब दिव्य छत्र और चामर धारण किया।

श्लोक 11 (padma.6.243.11)

पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ तालवृंतौ विरेजतुः । दर्पणं प्रददौ श्रीमान्राक्षसेंद्रो विभीषणः ।

pārśve bharataśatrughnau tālavṛṁtau virejatuḥ darpaṇaṁ pradadau śrīmānrākṣaseṁdro vibhīṣaṇaḥ

उनके पार्श्व में भरत और शत्रुघ्न पंखे लिए सुशोभित थे। श्रीमान् राक्षसराज विभीषण ने दर्पण अर्पित किया।

श्लोक 12 (padma.6.243.12)

दधार पूर्णकलशं सुग्रीवो वानरेश्वरः । जाम्बवांश्च महातेजाः पुष्पमालां मनोहराम् ।

dadhāra pūrṇakalaśaṁ sugrīvo vānareśvaraḥ jāmbavāṁśca mahātejāḥ puṣpamālāṁ manoharām

वानरेश्वर सुग्रीव ने पूर्ण कलश धारण किया, और महातेजस्वी जाम्बवान ने मनोहर पुष्पमाला अर्पित की।

श्लोक 13 (padma.6.243.13)

वालिपुत्रस्तु तांबूलं सकर्पूरं ददौ हरेः । हनुमान्दीपकां दिव्यां सुषेणश्च ध्वजं शुभम् ।

vāliputrastu tāṁbūlaṁ sakarpūraṁ dadau hareḥ hanumāndīpakāṁ divyāṁ suṣeṇaśca dhvajaṁ śubham

वालि-पुत्र (अंगद) ने हरि को कपूर सहित तांबूल अर्पित किया; हनुमान ने दिव्य दीप, और सुषेण ने शुभ ध्वज धारण किया।

श्लोक 14 (padma.6.243.14)

परिवार्य महात्मानं मंत्रिणः समुपासिरे । सृष्टिर्जयंतो विजयः सौराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः ।

parivārya mahātmānaṁ maṁtriṇaḥ samupāsire sṛṣṭirjayaṁto vijayaḥ saurāṣṭro rāṣṭravarddhanaḥ

उस महात्मा को घेरकर मंत्रीगण उनकी सेवा में उपस्थित थे — सृष्टि, जयंत, विजय, सौराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन,

श्लोक 15 (padma.6.243.15)

अकोपो धर्मपालश्च सुमंत्रो मंत्रिणः स्मृताः । राजानश्च नरव्याघ्रा नानाजनपदेश्वराः ।

akopo dharmapālaśca sumaṁtro maṁtriṇaḥ smṛtāḥ rājānaśca naravyāghrā nānājanapadeśvarāḥ

अकोप, धर्मपाल और सुमंत्र — ये उनके मंत्री माने जाते हैं। नरश्रेष्ठ राजागण और नाना जनपदों के स्वामी,

श्लोक 16 (padma.6.243.16)

पौराश्च नैगमा वृद्धा राजानं पर्युपासत । ऋक्षैश्च वानरेंद्रैश्च मंत्रिभिः पृथिवीश्वरैः ।

paurāśca naigamā vṛddhā rājānaṁ paryupāsata ṛkṣaiśca vānareṁdraiśca maṁtribhiḥ pṛthivīśvaraiḥ

नगरवासी, वृद्ध व्यापारीगण भी राजा की सेवा में उपस्थित थे। ऋक्ष, वानरेंद्र, मंत्री, राजा,

श्लोक 17 (padma.6.243.17)

राक्षसैर्द्विजमुख्यैश्च किंकरैश्च समावृतः । परे व्योम्नि यथा लीनो दैवतैः कमलापतिः ।

rākṣasairdvijamukhyaiśca kiṁkaraiśca samāvṛtaḥ pare vyomni yathā līno daivataiḥ kamalāpatiḥ

राक्षस, श्रेष्ठ द्विज और सेवकों से घिरे हुए — जैसे कमलापति देवताओं से घिरे परम आकाश में विराजते हैं —

श्लोक 18 (padma.6.243.18)

तथा नृपवरः श्रीमान्साकेते शुशुभे तदा । इंदीवरदलश्यामं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।

tathā nṛpavaraḥ śrīmānsākete śuśubhe tadā iṁdīvaradalaśyāmaṁ padmapatranibhekṣaṇam

वैसे ही वे श्रीमान् श्रेष्ठ राजा साकेत में तब सुशोभित हो रहे थे — नीलकमल-दल के समान श्याम, कमलपत्र जैसे नेत्रों वाले,

श्लोक 19 (padma.6.243.19)

आजानुबाहुं काकुत्स्थं पीतवस्त्रधरं हरिम् । कंबुग्रीवं महोरस्कं विचित्राभरणैर्युतम् ।

ājānubāhuṁ kākutsthaṁ pītavastradharaṁ harim kaṁbugrīvaṁ mahoraskaṁ vicitrābharaṇairyutam

घुटनों तक लंबी भुजाओं वाले काकुत्स्थ हरि, पीतांबरधारी, शंख जैसी ग्रीवा, विशाल वक्षस्थल, विचित्र आभूषणों से युक्त,

श्लोक 20 (padma.6.243.20)

देव्या सह समासीनमभिषिक्तं रघूत्तमम् । विमानस्थाः सुरगणा हर्षनिर्भरमानसाः ।

devyā saha samāsīnamabhiṣiktaṁ raghūttamam vimānasthāḥ suragaṇā harṣanirbharamānasāḥ

देवी सहित विराजमान, अभिषिक्त रघूत्तम — विमानों में स्थित देवगण हर्ष से भरे मन से —

श्लोक 21 (padma.6.243.21)

तुष्टुवुर्जयशब्देन गंधर्वाप्सरसां गणाः । अभिषिक्तस्ततो रामो वसिष्ठाद्यैर्महर्षिभिः ।

tuṣṭuvurjayaśabdena gaṁdharvāpsarasāṁ gaṇāḥ abhiṣiktastato rāmo vasiṣṭhādyairmaharṣibhiḥ

गंधर्व-अप्सराओं के समूहों सहित जय-जयकार से स्तुति करने लगे। तब वसिष्ठ आदि महर्षियों द्वारा अभिषिक्त राम —

श्लोक 22 (padma.6.243.22)

शुशुभे सीतया देव्या नारायण इव श्रिया । अतिमर्त्यतयाभीत उपासितुं पदांबुजम् ।

śuśubhe sītayā devyā nārāyaṇa iva śriyā atimartyatayābhīta upāsituṁ padāṁbujam

देवी सीता के साथ वैसे ही सुशोभित हुए जैसे श्री के साथ नारायण। मनुष्यातीत उस रूप को देखकर, उनके चरणकमलों की उपासना में भयभीत होकर —

श्लोक 23 (padma.6.243.23)

दृष्ट्वा तुष्टाव हृष्टात्मा शंकरो हृष्टमागतः । कृतांजलिपुटो भूत्वा सानंदो गद्गदाकुलः । हर्षयन्सकलान्देवान्मुनीनपि च वानरान् ।

dṛṣṭvā tuṣṭāva hṛṣṭātmā śaṁkaro hṛṣṭamāgataḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā sānaṁdo gadgadākulaḥ harṣayansakalāndevānmunīnapi ca vānarān

उन्हें देखकर हर्षित शंकर आगे आए। हाथ जोड़कर, आनंदित होकर, गद्गद वाणी में, सब देवताओं, मुनियों और वानरों को भी हर्षित करते हुए [स्तुति करने लगे]।

श्लोक 24 (padma.6.243.24)

महादेव उवाच- नमो मूलप्रकृतये नित्याय परमात्मने । सच्चिदानंदरूपाय विश्वरूपाय वेधसे ।

mahādeva uvāca namo mūlaprakṛtaye nityāya paramātmane saccidānaṁdarūpāya viśvarūpāya vedhase

महादेव जी ने कहा — मूल प्रकृति को, नित्य परमात्मा को, सच्चिदानंद-स्वरूप, विश्वरूप विधाता को नमस्कार।

श्लोक 25 (padma.6.243.25)

नमो निरंतरानंद कन्दमूलाय विष्णवे । जगत्त्रयकृतानंद मूर्त्तये दिव्यमूर्त्तये ।

namo niraṁtarānaṁda kandamūlāya viṣṇave jagattrayakṛtānaṁda mūrttaye divyamūrttaye

अखंड आनंद के मूल-कंद विष्णु को नमस्कार। तीनों लोकों को आनंद देने वाली मूर्ति, दिव्य मूर्ति को नमस्कार।

श्लोक 26 (padma.6.243.26)

नमो ब्रह्मेंद्रपूज्याय शंकराभयदाय च । नमो विष्णुस्वरूपाय सर्वरूपनमोनमः ।

namo brahmeṁdrapūjyāya śaṁkarābhayadāya ca namo viṣṇusvarūpāya sarvarūpanamonamaḥ

ब्रह्मा-इंद्र द्वारा पूजित, शंकर को अभय देने वाले को नमस्कार। विष्णुस्वरूप को नमस्कार, सर्वरूप को बारंबार नमस्कार।

श्लोक 27 (padma.6.243.27)

उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणे त्रिगुणात्मने । नमोस्तु निर्गतोपाधिस्वरूपाय महात्मने ।

utpattisthitisaṁhārakāriṇe triguṇātmane namostu nirgatopādhisvarūpāya mahātmane

उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाले, त्रिगुणात्मा को नमस्कार। सब उपाधियों से रहित स्वरूप वाले, महात्मा को नमस्कार —

श्लोक 28 (padma.6.243.28)

अनया विद्यया देव्या सीतयोपाधिकारिणे । नमः पुंप्रकृतिभ्यां च युवाभ्यां जगतां कृते ।

anayā vidyayā devyā sītayopādhikāriṇe namaḥ puṁprakṛtibhyāṁ ca yuvābhyāṁ jagatāṁ kṛte

जो इस विद्यारूपिणी देवी सीता के माध्यम से उपाधि धारण करते हैं। जगत के हित के लिए पुरुष और प्रकृति रूप आप दोनों को नमस्कार।

श्लोक 29 (padma.6.243.29)

जगन्मातापितृभ्यां च जनन्यै राघवाय च । नमः प्रपंचरूपिण्यै निष्प्रपंचस्वरूपिणे ।

jaganmātāpitṛbhyāṁ ca jananyai rāghavāya ca namaḥ prapaṁcarūpiṇyai niṣprapaṁcasvarūpiṇe

जगत के माता-पिता को, जननी सीता और राघव को नमस्कार। प्रपंच-स्वरूपिणी को, निष्प्रपंच स्वरूप वाले को नमस्कार।

श्लोक 30 (padma.6.243.30)

नमो ध्यानस्वरूपिण्यै योगिध्येयात्ममूर्त्तये । परिणामापरीणामरिक्ताभ्यां च नमोनमः ।

namo dhyānasvarūpiṇyai yogidhyeyātmamūrttaye pariṇāmāparīṇāmariktābhyāṁ ca namonamaḥ

ध्यान-स्वरूपिणी को, योगियों के ध्येय-स्वरूप को नमस्कार। परिणाम और अपरिणाम दोनों से रिक्त आप दोनों को बारंबार नमस्कार।

श्लोक 31 (padma.6.243.31)

कूटस्थबीजरूपिण्यै सीतायै राघवाय च । सीता लक्ष्मीर्भवान्विष्णुः सीता गौरी भवान्शिवः ।

kūṭasthabījarūpiṇyai sītāyai rāghavāya ca sītā lakṣmīrbhavānviṣṇuḥ sītā gaurī bhavānśivaḥ

कूटस्थ बीज-स्वरूपिणी सीता और राघव को नमस्कार। सीता लक्ष्मी हैं, आप विष्णु हैं; सीता गौरी हैं, आप शिव हैं;

श्लोक 32 (padma.6.243.32)

सीता स्वयं हि सावित्रि भवान्ब्रह्मा चतुर्मुखः । सीता शची भवान्शक्रः सीता स्वाहानलो भवान् ।

sītā svayaṁ hi sāvitri bhavānbrahmā caturmukhaḥ sītā śacī bhavānśakraḥ sītā svāhānalo bhavān

सीता स्वयं सावित्री हैं, आप चतुर्मुख ब्रह्मा हैं; सीता शची हैं, आप शक्र हैं; सीता स्वाहा हैं, आप अग्नि हैं;

श्लोक 33 (padma.6.243.33)

सीता संहारिणी देवी यमरूपधरो भवान् । सीता हि सर्वसम्पत्तिः कुबेरस्त्वं रघूत्तम ।

sītā saṁhāriṇī devī yamarūpadharo bhavān sītā hi sarvasampattiḥ kuberastvaṁ raghūttama

सीता संहारिणी देवी हैं, आप यम-रूपधारी हैं। सीता ही सर्व सम्पत्ति हैं, हे रघूत्तम, आप कुबेर हैं।

श्लोक 34 (padma.6.243.34)

सीता देवी च रुद्राणी भवान्रुद्रो महाबलः । सीता तु रोहिणी देवी चंद्रस्त्वं लोकसौख्यदः ।

sītā devī ca rudrāṇī bhavānrudro mahābalaḥ sītā tu rohiṇī devī caṁdrastvaṁ lokasaukhyadaḥ

सीता देवी रुद्राणी हैं, आप महाबली रुद्र हैं। सीता देवी रोहिणी हैं, आप लोकसुखदाता चंद्रमा हैं।

श्लोक 35 (padma.6.243.35)

सीता संज्ञा भवान्सूर्यः सीता रात्रिर्दिवा भवान् । सीतादेवी महाकाली महाकालो भवान्सदा ।

sītā saṁjñā bhavānsūryaḥ sītā rātrirdivā bhavān sītādevī mahākālī mahākālo bhavānsadā

सीता संज्ञा हैं, आप सूर्य हैं; सीता रात्रि हैं, आप दिन हैं। सीता देवी महाकाली हैं, आप सदा महाकाल हैं।

श्लोक 36 (padma.6.243.36)

स्त्रीलिङ्गेषु त्रिलोकेषु यत्तत्सर्वं हि जानकी । पुन्नाम लांछितं यत्तु तत्सर्वं हि भवान्प्रभो ।

strīliṅgeṣu trilokeṣu yattatsarvaṁ hi jānakī punnāma lāṁchitaṁ yattu tatsarvaṁ hi bhavānprabho

तीनों लोकों में स्त्री-लिंग जो कुछ भी है, वह सब जानकी ही हैं। हे प्रभु, जो कुछ भी पुरुष-नाम से चिह्नित है, वह सब आप ही हैं।

श्लोक 37 (padma.6.243.37)

सर्वत्र सर्वदेवेश सीता सर्वत्र धारिणी । तदात्वमपिचत्रातुंतच्छक्तिर्विश्वधारिणी ।

sarvatra sarvadeveśa sītā sarvatra dhāriṇī tadātvamapicatrātuṁtacchaktirviśvadhāriṇī

हे सर्वदेवेश, सीता सर्वत्र सबकी धारक हैं; और आप भी उसकी रक्षा के लिए वही विश्वधारिणी शक्ति बन जाते हैं।

श्लोक 38 (padma.6.243.38)

तस्मात्कोटिगुणं पुण्यं युवाभ्यां परिचिह्नितम् । चिह्नितं शिवशक्तिभ्यां चरितं तव शांतिदम् ।

tasmātkoṭiguṇaṁ puṇyaṁ yuvābhyāṁ paricihnitam cihnitaṁ śivaśaktibhyāṁ caritaṁ tava śāṁtidam

इसलिए आप दोनों द्वारा चिह्नित पुण्य करोड़ों गुना है — शिव-शक्ति दोनों से अंकित आपका यह शांतिदायक चरित्र है।

श्लोक 39 (padma.6.243.39)

आवां राम जगत्पूज्यौ मम पूज्यौ सदा युवाम् । त्वन्नामजापिनी गौरी त्वन्मंत्रजपवानहम् ।

āvāṁ rāma jagatpūjyau mama pūjyau sadā yuvām tvannāmajāpinī gaurī tvanmaṁtrajapavānaham

हे राम, हम दोनों (शिव-पार्वती) जगत्पूज्य होते हुए भी सदा आप दोनों की पूजा करते हैं। गौरी आपके नाम का जप करती हैं, और मैं आपके मंत्र का जप करता हूँ।

श्लोक 40 (padma.6.243.40)

मुमूर्षोर्मणिकर्ण्यां तु अर्द्धोदकनिवासिनः । अहं दिशामि ते मंत्रं तारकं ब्रह्मदायकम् ।

mumūrṣormaṇikarṇyāṁ tu arddhodakanivāsinaḥ ahaṁ diśāmi te maṁtraṁ tārakaṁ brahmadāyakam

मणिकर्णिका में मरणासन्न, आधे जल में निवास करने वाले [प्राणी] को मैं आपका तारक-मंत्र, ब्रह्म-दायक मंत्र प्रदान करता हूँ।

श्लोक 41 (padma.6.243.41)

अतस्त्वं जानकीनाथ परब्रह्मासि निश्चितम् । त्वन्मायामोहितास्सर्वे न त्वां जानंति तत्वतः ।

atastvaṁ jānakīnātha parabrahmāsi niścitam tvanmāyāmohitāssarve na tvāṁ jānaṁti tatvataḥ

इसलिए, हे जानकीनाथ, आप निश्चय ही परब्रह्म हैं। आपकी माया से सब मोहित हैं, कोई भी आपको यथार्थ रूप में नहीं जानता।

श्लोक 42 (padma.6.243.42)

ईश्वर उवाच- इत्युक्तः शंभुना रामः प्रसादप्रवणोऽभवत् । दिव्यरूपधरः श्रीमानद्भुताद्भुतदर्शनः ।

īśvara uvāca ityuktaḥ śaṁbhunā rāmaḥ prasādapravaṇo'bhavat divyarūpadharaḥ śrīmānadbhutādbhutadarśanaḥ

ईश्वर जी ने कहा — शंभु द्वारा ऐसा कहे जाने पर राम कृपा-प्रवण हो गए, और अपना अद्भुत-से-अद्भुत, श्रीमान् दिव्य रूप धारण किया।

श्लोक 43 (padma.6.243.43)

तथा तं रूपमालोक्य नरवानरदेवताः । न द्रष्टुमपिशक्तास्ते तेजसं महदद्भुतम् ।

tathā taṁ rūpamālokya naravānaradevatāḥ na draṣṭumapiśaktāste tejasaṁ mahadadbhutam

उस रूप को देखकर मनुष्य, वानर और देवता उस महान अद्भुत तेज को देख भी न सके।

श्लोक 44 (padma.6.243.44)

भयाद्वै त्रिदशश्रेष्ठाः प्रणेमुश्चातिभक्तितः । भीता विज्ञाय रामोऽपि नरवानरदेवताः । मायामानुषतां प्राप्य स देवानब्रवीत्पुनः ।

bhayādvai tridaśaśreṣṭhāḥ praṇemuścātibhaktitaḥ bhītā vijñāya rāmo'pi naravānaradevatāḥ māyāmānuṣatāṁ prāpya sa devānabravītpunaḥ

भय से श्रेष्ठ देवगण भी अत्यंत भक्तिभाव से प्रणाम करने लगे। मनुष्यों, वानरों और देवताओं को भयभीत जानकर राम ने भी पुनः मायामय मानव रूप धारण करके देवताओं से कहा।

श्लोक 45 (padma.6.243.45)

रामचंद्र उवाच- शृणुध्वं देवता यो मां प्रत्यहं संस्तुविष्यति । स्तवेन शंभुनोक्तेन देवतुल्यो भवेन्नरः ।

rāmacaṁdra uvāca śṛṇudhvaṁ devatā yo māṁ pratyahaṁ saṁstuviṣyati stavena śaṁbhunoktena devatulyo bhavennaraḥ

रामचंद्र जी ने कहा — हे देवताओ, सुनो — जो प्रतिदिन शंभु द्वारा कहे गए इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा, वह मनुष्य देवताओं के समान हो जाएगा।

श्लोक 46 (padma.6.243.46)

विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मत्स्वरूपं समश्नुते । रणे जयमवाप्नोति न क्वचित्प्रतिहन्यते ।

vimuktaḥ sarvapāpebhyo matsvarūpaṁ samaśnute raṇe jayamavāpnoti na kvacitpratihanyate

सब पापों से मुक्त होकर वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त करता है। रणभूमि में वह विजय पाता है, कहीं भी पराजित नहीं होता।

श्लोक 47 (padma.6.243.47)

भूतवेतालकृत्याभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते । अपुत्रो लभते पुत्रं पतिं विंदति कन्यका ।

bhūtavetālakṛtyābhirgrahaiścāpi na bādhyate aputro labhate putraṁ patiṁ viṁdati kanyakā

भूत-वेताल की कृत्याओं और ग्रहों से भी बाधित नहीं होता। संतानहीन को संतान मिलती है, कन्या को पति मिलता है।

श्लोक 48 (padma.6.243.48)

दरिद्रः श्रियमाप्नोति सत्ववाञ्शीलवान्भवेत् । आत्मतुल्यबलः श्रीमाञ्जायते नात्र संशयः ।

daridraḥ śriyamāpnoti satvavāñśīlavānbhavet ātmatulyabalaḥ śrīmāñjāyate nātra saṁśayaḥ

दरिद्र संपत्ति पाता है, सत्त्वगुणी और शीलवान बनता है — निःसंदेह वह स्वयं जितना ही बलशाली, श्रीमान बन जाता है।

श्लोक 49 (padma.6.243.49)

निर्विघ्नं सर्वकार्येषु सर्वारंभेषु वै नृणाम् । यंयं कामयते मर्त्यः सुदुर्लभमनोरथम् ।

nirvighnaṁ sarvakāryeṣu sarvāraṁbheṣu vai nṛṇām yaṁyaṁ kāmayate martyaḥ sudurlabhamanoratham

मनुष्यों के सब कार्यों में, सब आरंभों में कोई विघ्न नहीं आता। मनुष्य जिस-जिस दुर्लभ कामना को चाहता है —

श्लोक 50 (padma.6.243.50)

षण्मासात्सिद्धिमाप्नोति स्तवस्यास्य प्रसादतः । यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम् । तत्फलं कोटिगुणितं स्तवेनानेन लभ्यते ।

ṣaṇmāsātsiddhimāpnoti stavasyāsya prasādataḥ yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu yatphalam tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ stavenānena labhyate

इस स्तोत्र की कृपा से छह महीनों में उसकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। सब तीर्थों का जो पुण्य है, सब यज्ञों का जो फल है, वह फल करोड़ों गुना होकर इस स्तोत्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 51 (padma.6.243.51)

ईश्वर उवाच- इत्युक्त्वा रामचंद्रोऽसौ विससर्ज महेश्वरम् । ब्रह्मादि त्रिदशान्सर्वान्विससर्ज समागतान् ।

īśvara uvāca ityuktvā rāmacaṁdro'sau visasarja maheśvaram brahmādi tridaśānsarvānvisasarja samāgatān

ईश्वर जी ने कहा — ऐसा कहकर रामचंद्र ने महेश्वर को विदा किया, और वहाँ आए ब्रह्मा आदि सब देवताओं को भी विदा किया।

श्लोक 52 (padma.6.243.52)

अर्चिता मानवाः सर्वे नरवानरदेवताः । विसृष्टा रामचंद्रेण प्रीत्या परमया युताः ।

arcitā mānavāḥ sarve naravānaradevatāḥ visṛṣṭā rāmacaṁdreṇa prītyā paramayā yutāḥ

पूजित सब मनुष्य, वानर और देवता परम प्रेम से युक्त होकर रामचंद्र द्वारा विदा किए गए।

श्लोक 53 (padma.6.243.53)

इत्थं विसृष्टाः खलु ते च सर्वे सुखं तदा जग्मुरतीवहृष्टाः । परं पठंतः स्तवमीश्वरोक्तं रामं स्मरंतो वरविश्वरूपम् ।

itthaṁ visṛṣṭāḥ khalu te ca sarve sukhaṁ tadā jagmuratīvahṛṣṭāḥ paraṁ paṭhaṁtaḥ stavamīśvaroktaṁ rāmaṁ smaraṁto varaviśvarūpam

इस प्रकार विदा किए गए वे सब उस समय अत्यंत हर्षित होकर सुखपूर्वक चले गए — ईश्वर-कथित उस स्तोत्र का पाठ करते हुए, राम के उस श्रेष्ठ विश्वरूप का स्मरण करते हुए।

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