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उत्तर खण्ड · अध्याय 29

गोपीचंदन माहात्म्य

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (padma.6.29.1)

महादेव उवाच ।अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि शृणु देवर्षिसत्तम । गोपीचंदनमाहात्म्यं यथादृष्टं श्रुतं मया

mahādeva uvāca athānyatsaṁpravakṣyāmi śṛṇu devarṣisattama gopīcaṁdanamāhātmyaṁ yathādṛṣṭaṁ śrutaṁ mayā

महादेव ने कहा — अब मैं तुम्हें कुछ और बताऊँगा, हे देवर्षिश्रेष्ठ! सुनो — गोपीचंदन की महिमा, जैसी मैंने देखी और सुनी है।

श्लोक 2 (padma.6.29.2)

ब्राह्मणो वाथ वैश्यो वा शूद्रो वाप्यथवा द्विजः । गोपीचंदनलिप्तांगो मुच्यते ब्रह्महत्यया

brāhmaṇo vātha vaiśyo vā śūdro vāpyathavā dvijaḥ gopīcaṁdanaliptāṁgo mucyate brahmahatyayā

चाहे ब्राह्मण हो, वैश्य हो, या शूद्र या द्विज ही क्यों न हो, जिसका शरीर गोपीचंदन से लिप्त है, वह ब्रह्महत्या से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (padma.6.29.3)

तिलकं कुरुते यस्तु गोपीचंदनसंभवम् । मद्यपानादिदोषैस्तु मुच्यते नात्र संशयः

tilakaṁ kurute yastu gopīcaṁdanasaṁbhavam madyapānādidoṣaistu mucyate nātra saṁśayaḥ

जो गोपीचंदन से बना तिलक धारण करता है, वह मद्यपान आदि दोषों से भी निःसंदेह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (padma.6.29.4)

गोपीचंदनलिप्तांगो वैष्णवो विष्णुतत्परः । सर्वदोषैः प्रमुच्येत यथा गंगांभसा पुनः

gopīcaṁdanaliptāṁgo vaiṣṇavo viṣṇutatparaḥ sarvadoṣaiḥ pramucyeta yathā gaṁgāṁbhasā punaḥ

गोपीचंदन से लिप्त शरीर वाला, विष्णु-भक्त वैष्णव, गंगाजल से जैसे शुद्ध होता है वैसे ही सभी दोषों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (padma.6.29.5)

ब्रह्महा मद्यपानी च स्वर्णस्तेयी तथैव च । गुरुतल्पगमो वाथ शूद्रो वाप्यथ वै द्विजः

brahmahā madyapānī ca svarṇasteyī tathaiva ca gurutalpagamo vātha śūdro vāpyatha vai dvijaḥ

ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, स्वर्ण-चोर, गुरु-पत्नी-गामी, चाहे शूद्र हो या द्विज,

श्लोक 6 (padma.6.29.6)

स सद्यो मुच्यते पापादाजन्मशतकारणात् । द्वादशतिलकं प्रोक्तं सर्वेषां वै विशेषतः

sa sadyo mucyate pāpādājanmaśatakāraṇāt dvādaśatilakaṁ proktaṁ sarveṣāṁ vai viśeṣataḥ

वह सैकड़ों जन्मों के संचित पाप से भी तुरंत मुक्त हो जाता है। बारह तिलक-चिह्न विशेष रूप से सबके लिए बताए गए हैं —

श्लोक 7 (padma.6.29.7)

वैष्णवानां ब्राह्मणानां कर्तव्यं भूतिमिच्छताम् । दंडाकारं ललाटे स्यात्पद्माकारं तु वक्षसि

vaiṣṇavānāṁ brāhmaṇānāṁ kartavyaṁ bhūtimicchatām daṁḍākāraṁ lalāṭe syātpadmākāraṁ tu vakṣasi

अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले वैष्णवों और ब्राह्मणों को ये धारण करने चाहिए: ललाट पर दंड के आकार का, वक्षस्थल पर कमल के आकार का,

श्लोक 8 (padma.6.29.8)

वेणुपत्रनिभं बाहुमूलेऽन्यद्दीपकाकृति । उच्चैश्चक्राणि चत्वारि बाहुमूले तु दक्षिणे

veṇupatranibhaṁ bāhumūle'nyaddīpakākṛti uccaiścakrāṇi catvāri bāhumūle tu dakṣiṇe

बाँह के मूल में बाँस के पत्ते जैसा, दूसरा दीपक के आकार का; दाहिनी भुजा के मूल में ऊँचे चार चक्र,

श्लोक 9 (padma.6.29.9)

नाममुद्राद्वयं नीचैः शंखमेकं तयोरपि । मध्ये ततः पार्श्वयोस्तु द्वे द्वे पद्मे च धारयेत्

nāmamudrādvayaṁ nīcaiḥ śaṁkhamekaṁ tayorapi madhye tataḥ pārśvayostu dve dve padme ca dhārayet

नीचे दो नाम-मुद्राएँ, उन दोनों के बीच एक शंख; फिर दोनों ओर दो-दो कमल धारण करने चाहिए।

श्लोक 10 (padma.6.29.10)

वामेऽपि चतुरः शंखान्नाममुद्रे च पूर्ववत् । चक्रमेकंगदे द्वे द्वे तयोरिति विभेदतः

vāme'pi caturaḥ śaṁkhānnāmamudre ca pūrvavat cakramekaṁgade dve dve tayoriti vibhedataḥ

बाईं ओर भी चार शंख, और पूर्ववत् नाम-मुद्राएँ; एक चक्र, दोनों ओर दो-दो गदा — इस प्रकार भेद करना चाहिए।

श्लोक 11 (padma.6.29.11)

ललाटे च गदामेकां नाममुद्रां तथा हृदि । त्रीणित्रीणि विचित्राणि मध्ये शाखावुभावुभौ

lalāṭe ca gadāmekāṁ nāmamudrāṁ tathā hṛdi trīṇitrīṇi vicitrāṇi madhye śākhāvubhāvubhau

ललाट पर एक गदा, हृदय पर भी नाम-मुद्रा; मध्य में तीन-तीन विचित्र चिह्न, दोनों ओर दो शाखाएँ।

श्लोक 12 (padma.6.29.12)

हृदि पार्श्वे स्तनादूर्ध्वं गदापद्मानि बाहुवत् । त्रीणि चत्वारि चक्राणि कर्णमूले द्वयोरधः

hṛdi pārśve stanādūrdhvaṁ gadāpadmāni bāhuvat trīṇi catvāri cakrāṇi karṇamūle dvayoradhaḥ

हृदय के पार्श्व में, स्तन के ऊपर, बाहु के समान गदा और कमल; तीन-चार चक्र, दोनों कानों के मूल के नीचे,

श्लोक 13 (padma.6.29.13)

एकमेकं तदन्येषु तिलकेषु च धारयेत् । संप्रदायजमुद्रां तु धार्या शिष्टानुसारतः

ekamekaṁ tadanyeṣu tilakeṣu ca dhārayet saṁpradāyajamudrāṁ tu dhāryā śiṣṭānusārataḥ

शेष तिलकों में एक-एक धारण करना चाहिए। अपनी संप्रदाय की मुद्रा विद्वानों के अनुसार धारण करनी चाहिए।

श्लोक 14 (padma.6.29.14)

यथारुच्यथवा धार्या न तत्र नियमा यतः । आचांडालाद्विशुद्ध्यंति तिलकस्यैव धारणात्

yathārucyathavā dhāryā na tatra niyamā yataḥ ācāṁḍālādviśuddhyaṁti tilakasyaiva dhāraṇāt

या अपनी इच्छा के अनुसार धारण की जा सकती है — इसमें कोई नियम नहीं है, क्योंकि तिलक के धारण मात्र से चांडाल तक शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 15 (padma.6.29.15)

चांडालादधिकं मन्ये वैष्णवानां हि निंदकम् । स च विष्णुसमो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा

cāṁḍālādadhikaṁ manye vaiṣṇavānāṁ hi niṁdakam sa ca viṣṇusamo jñeyo nātra kāryā vicāraṇā

मैं वैष्णवों की निंदा करने वाले को चांडाल से भी बढ़कर मानता हूँ; उसे विष्णु के समान ही जानना चाहिए, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.6.29.16)

वैष्णवो ब्राह्मणो यस्तु विष्णुध्यानेषु तत्परः । नांतरस्तस्य वै ज्ञेयः स वै विष्णुर्भवेदिह

vaiṣṇavo brāhmaṇo yastu viṣṇudhyāneṣu tatparaḥ nāṁtarastasya vai jñeyaḥ sa vai viṣṇurbhavediha

जो ब्राह्मण वैष्णव है, विष्णु के ध्यान में तत्पर है, उसमें कोई अंतर नहीं समझना चाहिए — वह यहाँ स्वयं विष्णु ही बन जाता है।

श्लोक 17 (padma.6.29.17)

शंखचक्रधरो विप्रो वेदाध्ययनतत्परः । स वै नारायण इति वेदे चैव तु पठ्यते

śaṁkhacakradharo vipro vedādhyayanatatparaḥ sa vai nārāyaṇa iti vede caiva tu paṭhyate

शंख-चक्र धारण करने वाला, वेदाध्ययन में तत्पर ब्राह्मण, वह सचमुच 'नारायण' है — यह वेद में भी पढ़ा जाता है।

श्लोक 18 (padma.6.29.18)

तप्तचक्रधरो विप्रः पंक्तिपावनपावनः । तस्य भक्तियुतो ब्रह्मन्महापापैः प्रमुच्यते

taptacakradharo vipraḥ paṁktipāvanapāvanaḥ tasya bhaktiyuto brahmanmahāpāpaiḥ pramucyate

तप्त चक्र धारण करने वाला ब्राह्मण पंक्ति का भी पावन करने वाला होता है; हे ब्रह्मन्! उसके प्रति भक्तिशील मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 19 (padma.6.29.19)

तुलसीपत्रमालां वा तुलसीकाष्ठसंभवाम् । धृत्वा वै ब्राह्मणो भूयान्मुक्तिभागी न संशयः

tulasīpatramālāṁ vā tulasīkāṣṭhasaṁbhavām dhṛtvā vai brāhmaṇo bhūyānmuktibhāgī na saṁśayaḥ

जो ब्राह्मण तुलसी-पत्तों की माला या तुलसी-काष्ठ से बनी माला धारण करता है, वह निःसंदेह मुक्ति का भागी होता है।

श्लोक 20 (padma.6.29.20)

विष्णुरूपो यतो विप्रो वैष्णवः स इह स्मृतः । पंचत्वे यस्य तिलकं गोपीचंदनसंभवम्

viṣṇurūpo yato vipro vaiṣṇavaḥ sa iha smṛtaḥ paṁcatve yasya tilakaṁ gopīcaṁdanasaṁbhavam

चूँकि ब्राह्मण इस प्रकार विष्णु का ही रूप बन जाता है, इसलिए वह यहाँ वैष्णव कहलाता है; जिसके मृत्यु के समय गोपीचंदन से बना तिलक हो,

श्लोक 21 (padma.6.29.21)

विमानं स समारुह्य याति विष्णोः परं पदम् । कलौ नारद वक्ष्यामि तिलकं गोपिचंदनम्

vimānaṁ sa samāruhya yāti viṣṇoḥ paraṁ padam kalau nārada vakṣyāmi tilakaṁ gopicaṁdanam

वह विमान पर सवार होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है। हे नारद! कलियुग में मैं गोपीचंदन के तिलक की बात कहूँगा —

श्लोक 22 (padma.6.29.22)

ये कुर्वंति नरश्रेष्ठा न तेषां दुर्गतिः क्वचित् । शंखं चैव तथा चक्रं दक्षिणे चापि सव्यके

ye kurvaṁti naraśreṣṭhā na teṣāṁ durgatiḥ kvacit śaṁkhaṁ caiva tathā cakraṁ dakṣiṇe cāpi savyake

जो श्रेष्ठ मनुष्य इसे धारण करते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। शंख और चक्र भी, दाहिने और बाएँ दोनों हाथों में,

श्लोक 23 (padma.6.29.23)

हस्ते धृत्वा विशेषेण महापापैः प्रमुच्यते । मद्यपानरता ये च ये च स्त्रीबालघातकाः

haste dhṛtvā viśeṣeṇa mahāpāpaiḥ pramucyate madyapānaratā ye ca ye ca strībālaghātakāḥ

विशेष रूप से हाथ में धारण करने से महापापों से मुक्ति मिलती है। जो मद्यपान में लगे रहते हैं, जो स्त्री-बालक-हत्यारे हैं,

श्लोक 24 (padma.6.29.24)

अगम्यागमका ये वै दृश्यंते भुवि वाडव । भक्तानां दर्शनादेव मुक्तिस्तेषां न संशयः

agamyāgamakā ye vai dṛśyaṁte bhuvi vāḍava bhaktānāṁ darśanādeva muktisteṣāṁ na saṁśayaḥ

हे वाडव! जो पृथ्वी पर अगम्यागमन (निषिद्ध संबंध) करते दिखाई देते हैं — भक्तों के दर्शन मात्र से ही उनकी मुक्ति निश्चित है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 25 (padma.6.29.25)

संसारे तुच्छसारेस्मिन्कुतो वै वैष्णवा जनाः । अहं हि वैष्णवो जातो विष्णोर्भक्तिप्रसादतः

saṁsāre tucchasāresminkuto vai vaiṣṇavā janāḥ ahaṁ hi vaiṣṇavo jāto viṣṇorbhaktiprasādataḥ

इस तुच्छ-सार संसार में वैष्णव लोग भला कहाँ से आते हैं? मैं स्वयं विष्णु की भक्ति की कृपा से ही वैष्णव बना हूँ।

श्लोक 26 (padma.6.29.26)

काश्यां निवसतां ह्यत्र रामरामेति संजपन् । तेन पुण्यादियोगेन शिवो वै नात्र संशयः

kāśyāṁ nivasatāṁ hyatra rāmarāmeti saṁjapan tena puṇyādiyogena śivo vai nātra saṁśayaḥ

काशी में निवास करते हुए जो निरंतर 'राम-राम' जपते हैं, उसी पुण्य-योग से, इसमें कोई संदेह नहीं, वे शिव-स्वरूप ही हो जाते हैं।

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