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उत्तर खण्ड · अध्याय 30

दीप-व्रत माहात्म्य

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (padma.6.30.1)

नारद उवाच ।ब्रह्मन्संवत्सराख्यस्य दीपस्य विधिमुत्तमम् । सर्वव्रतप्रधानस्य माहात्म्यं प्रवदस्व मे

nārada uvāca brahmansaṁvatsarākhyasya dīpasya vidhimuttamam sarvavratapradhānasya māhātmyaṁ pravadasva me

नारद ने कहा — हे ब्रह्मन्! सभी व्रतों में प्रधान संवत्सर नामक दीप की उत्तम विधि और महिमा मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.30.2)

येन व्रतानि सर्वाणि कृतान्येव न संशयः । सर्वकामसमृद्धिश्च सर्वपापक्षयो भवेत्

yena vratāni sarvāṇi kṛtānyeva na saṁśayaḥ sarvakāmasamṛddhiśca sarvapāpakṣayo bhavet

जिससे सभी व्रत निःसंदेह पूर्ण हो जाते हैं, और समस्त कामनाओं की समृद्धि तथा समस्त पापों का क्षय होता है।

श्लोक 3 (padma.6.30.3)

महादेव उवाच ।वदामि तव देवर्षे रहस्यं पापनाशनम् । यच्छ्रुत्वा ब्रह्महा गोघ्नो मित्रघ्नो गुरुतल्पगः

mahādeva uvāca vadāmi tava devarṣe rahasyaṁ pāpanāśanam yacchrutvā brahmahā goghno mitraghno gurutalpagaḥ

महादेव ने कहा — हे देवर्षे! मैं तुम्हें पाप-नाशक एक रहस्य बताता हूँ, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा, गोहत्यारा, मित्र-घातक, गुरु-पत्नी-गामी,

श्लोक 4 (padma.6.30.4)

विश्वासघाती क्रूरात्मा मुक्तिमाप्नोति शाश्वतीम् । शतं कुलानामुद्धृत्य विष्णोर्लोकं स गच्छति

viśvāsaghātī krūrātmā muktimāpnoti śāśvatīm śataṁ kulānāmuddhṛtya viṣṇorlokaṁ sa gacchati

विश्वासघाती, क्रूर आत्मा वाला भी शाश्वत मुक्ति पाता है; सौ कुलों का उद्धार करके वह विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 5 (padma.6.30.5)

तदहं कथयिष्यामि दीपव्रतमनुत्तमम् । संवत्सरप्रमाणस्य विधिं माहात्म्यमेव च

tadahaṁ kathayiṣyāmi dīpavratamanuttamam saṁvatsarapramāṇasya vidhiṁ māhātmyameva ca

वह मैं तुम्हें बताऊँगा — यह अनुपम दीप-व्रत, एक वर्ष के परिमाण की विधि और महिमा दोनों।

श्लोक 6 (padma.6.30.6)

हेमंते प्रथमे मासि प्राप्य ह्येकादशीं शुभाम् । ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय कामक्रोधविवर्जितः

hemaṁte prathame māsi prāpya hyekādaśīṁ śubhām brāhme muhūrtte cotthāya kāmakrodhavivarjitaḥ

हेमंत के पहले महीने में शुभ एकादशी को पाकर, ब्राह्म मुहूर्त में उठकर, काम-क्रोध से रहित होकर,

श्लोक 7 (padma.6.30.7)

नदीसंगमतीर्थेषु तडागेषु सरित्सु च । स्नानं समाचरेत्तत्र गृहे वा नियतात्मवान्

nadīsaṁgamatīrtheṣu taḍāgeṣu saritsu ca snānaṁ samācarettatra gṛhe vā niyatātmavān

नदी-संगम तीर्थों में, तालाबों और नदियों में, या घर में ही संयत मन से स्नान करना चाहिए।

श्लोक 8 (padma.6.30.8)

स्नातोऽहं सर्वतीर्थे तत्स्नानं देहि मे सदा

snāto'haṁ sarvatīrthe tatsnānaṁ dehi me sadā

'मैं सभी तीर्थों में स्नान कर चुका हूँ — मुझे वह स्नान सदा प्रदान कीजिए।'

श्लोक 9 (padma.6.30.9)

स्नानमंत्रः । देवान्पितॄंश्च संतर्प्य कृतजप्यो जितेंद्रियः । ततः संपूजयेद्देवं लक्ष्मीनारायणं प्रभुम् । पंचामृतेन संस्नाप्य ततो गंधोदकेन च

snānamaṁtraḥ devānpitṝṁśca saṁtarpya kṛtajapyo jiteṁdriyaḥ tataḥ saṁpūjayeddevaṁ lakṣmīnārāyaṇaṁ prabhum paṁcāmṛtena saṁsnāpya tato gaṁdhodakena ca

स्नान-मंत्र — देवताओं और पितरों को तर्पण देकर, जप करके, इंद्रियों को वश में करके, फिर देव लक्ष्मीनारायण प्रभु की पूजा करनी चाहिए, पंचामृत से स्नान कराकर फिर गंधोदक से भी।

श्लोक 10 (padma.6.30.10)

स्नातोऽसि लक्ष्म्या सहितो देवदेव जगत्पते । मां समुद्धर देवेश घोरात्संसारबंधनात्

snāto'si lakṣmyā sahito devadeva jagatpate māṁ samuddhara deveśa ghorātsaṁsārabaṁdhanāt

'लक्ष्मी सहित आप स्नात हुए हैं, हे देवाधिदेव, जगत्पते! मुझे इस भयंकर संसार-बंधन से उबार लीजिए, हे देवेश!'

श्लोक 11 (padma.6.30.11)

ततः संपूजयेद्देवं लक्ष्म्या सह जनार्दनम् । मंत्रैस्तु वैदिकैर्भक्त्या तथा पौराणिकैरपि

tataḥ saṁpūjayeddevaṁ lakṣmyā saha janārdanam maṁtraistu vaidikairbhaktyā tathā paurāṇikairapi

फिर वैदिक मंत्रों से भक्तिपूर्वक, तथा पौराणिक मंत्रों से भी, लक्ष्मी सहित देव जनार्दन की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 12 (padma.6.30.12)

अतो देवेति गंधादि पौरुषेणापि वा पुनः । नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः

ato deveti gaṁdhādi pauruṣeṇāpi vā punaḥ namo matsyāya devāya kūrmadevāya vai namaḥ

'अब से, हे देव!' — यह कहकर गंध आदि से, या अपनी ही वाणी से भी — 'मत्स्य देव को नमस्कार, कूर्म देव को नमस्कार,

श्लोक 13 (padma.6.30.13)

नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः । नमोऽस्तु बुद्धदेवाय कल्किने च नमोनमः

namo vārāhadevāya narasiṁhāya vai namaḥ namo'stu buddhadevāya kalkine ca namonamaḥ

वराह देव को नमस्कार, नरसिंह को नमस्कार; बुद्ध देव को नमस्कार, कल्कि को बार-बार नमस्कार,

श्लोक 14 (padma.6.30.14)

नमोऽस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः । नमः सर्वात्मने तुभ्यं शि रइत्यभिपूजयेत् । केशवादीनि नामानि तैर्वा संपूजयेद्धरिम्

namo'stu rāmadevāya viṣṇudevāya te namaḥ namaḥ sarvātmane tubhyaṁ śi raityabhipūjayet keśavādīni nāmāni tairvā saṁpūjayeddharim

राम देव को नमस्कार, विष्णु देव को आपको नमस्कार; सबके आत्मा आपको नमस्कार' — इस तरह 'श्री' कहकर पूजा करनी चाहिए; या केशव आदि नामों से हरि की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 15 (padma.6.30.15)

वनस्पतिरसो दिव्यः सुरभिर्गंधवाञ्छुचिः । धूपोऽयं देवदेवेश नमस्ते प्रतिगृह्यताम्

vanaspatiraso divyaḥ surabhirgaṁdhavāñchuciḥ dhūpo'yaṁ devadeveśa namaste pratigṛhyatām

'वनस्पति का यह दिव्य रस, सुगंधित, शुद्ध — यह धूप, हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार, इसे ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 16 (padma.6.30.16)

धूपमंत्रः । दीपस्तमो नाशयति दीपः कांतिं प्रयच्छति । तस्माद्दीपप्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः

dhūpamaṁtraḥ dīpastamo nāśayati dīpaḥ kāṁtiṁ prayacchati tasmāddīpapradānena prīyatāṁ me janārdanaḥ

धूप-मंत्र — 'दीप अंधकार का नाश करता है, दीप कांति प्रदान करता है; इसलिए इस दीप के अर्पण से जनार्दन मुझसे प्रसन्न हों।'

श्लोक 17 (padma.6.30.17)

दीपमंत्रः । नैवेद्यमिदमन्नाद्यं देवदेव जगत्पते । लक्ष्म्या सह गृहाण त्वं परमामृतमुत्तमम्

dīpamaṁtraḥ naivedyamidamannādyaṁ devadeva jagatpate lakṣmyā saha gṛhāṇa tvaṁ paramāmṛtamuttamam

दीप-मंत्र — 'यह नैवेद्य, अन्न आदि से युक्त, हे देवाधिदेव, जगत्पते! लक्ष्मी सहित इसे ग्रहण कीजिए, यह परम अमृत-तुल्य उत्तम भोग है।'

श्लोक 18 (padma.6.30.18)

नैवेद्यमंत्रः । अर्घ्यं दद्यात्ततो भक्त्या एवं ध्यात्वा जनार्दनम् । फलेन चैव हस्तेन शंखेनादाय चोदकम्

naivedyamaṁtraḥ arghyaṁ dadyāttato bhaktyā evaṁ dhyātvā janārdanam phalena caiva hastena śaṁkhenādāya codakam

नैवेद्य-मंत्र — फिर इस प्रकार जनार्दन का ध्यान करते हुए भक्तिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए, हाथ में फल लेकर, शंख से जल लेकर —

श्लोक 19 (padma.6.30.19)

जन्मांतरसहस्रेण यन्मया पातकं कृतम् । तत्सर्वं नाशमायातु प्रसादात्तव केशव

janmāṁtarasahasreṇa yanmayā pātakaṁ kṛtam tatsarvaṁ nāśamāyātu prasādāttava keśava

'हज़ारों जन्मों में मैंने जो भी पाप किए हैं, वह सब आपकी कृपा से नष्ट हो जाए, हे केशव!'

श्लोक 20 (padma.6.30.20)

इति अर्घमंत्रः । ततः कुंभं नवं शुभ्रं घृतपूर्णं समानयेत् । लक्ष्मीनारायणस्याग्रे तैलपूर्णमथापि वा

iti arghamaṁtraḥ tataḥ kuṁbhaṁ navaṁ śubhraṁ ghṛtapūrṇaṁ samānayet lakṣmīnārāyaṇasyāgre tailapūrṇamathāpi vā

यह अर्घ्य-मंत्र। फिर लक्ष्मीनारायण के सामने एक नया, शुभ, घी से भरा कलश लाना चाहिए, या तेल से भरा भी।

श्लोक 21 (padma.6.30.21)

तस्योपरि न्यसेत्पात्रं ताम्रं मृन्मयमेव च । नवतंतुसमां वर्तिं तस्मिन्पात्रे तु निर्वपेत्

tasyopari nyasetpātraṁ tāmraṁ mṛnmayameva ca navataṁtusamāṁ vartiṁ tasminpātre tu nirvapet

उसके ऊपर ताँबे या मिट्टी का एक पात्र रखना चाहिए; उस पात्र में नौ धागों के बराबर बत्ती डालनी चाहिए।

श्लोक 22 (padma.6.30.22)

ततः प्रबोधयेद्दीपं स्थाप्य कुंभं सुनिश्चलम् । पुष्पगंधादिभिः पूज्य ततः संकल्पयेच्छुचिः

tataḥ prabodhayeddīpaṁ sthāpya kuṁbhaṁ suniścalam puṣpagaṁdhādibhiḥ pūjya tataḥ saṁkalpayecchuciḥ

फिर कलश को स्थिर रखकर दीप जलाना चाहिए; फूल-गंध आदि से पूजा करके, शुद्ध होकर संकल्प करना चाहिए —

श्लोक 23 (padma.6.30.23)

मंत्रेणानेन देवर्षे असमीरेषु धामसु । कामो भूतस्य भव्यस्य सम्राडेको विराजते

maṁtreṇānena devarṣe asamīreṣu dhāmasu kāmo bhūtasya bhavyasya samrāḍeko virājate

हे देवर्षे! इस मंत्र से — 'निश्चल भवनों में जो कामना भूत और भविष्य की है, वह एक सम्राट अकेला ही विराजमान है।

श्लोक 24 (padma.6.30.24)

दीपः संवत्सरं यावत्मयायं परिकल्पितः । अग्निहोत्रमविच्छिन्नं प्रीयतां मम केशव

dīpaḥ saṁvatsaraṁ yāvatmayāyaṁ parikalpitaḥ agnihotramavicchinnaṁ prīyatāṁ mama keśava

यह दीप, मेरे द्वारा पूरे वर्ष के लिए संकल्पित, अखंडित अग्निहोत्र-तुल्य है — हे केशव! मुझसे प्रसन्न हों।'

श्लोक 25 (padma.6.30.25)

ततो जितेंद्रियो भूत्वा श्रुतिज्ञानपरायणः । नालपेत्पतितान्पापांस्तथा पाखण्डिनो नरान्

tato jiteṁdriyo bhūtvā śrutijñānaparāyaṇaḥ nālapetpatitānpāpāṁstathā pākhaṇḍino narān

फिर इंद्रियों को वश में करके, श्रुति-ज्ञान में तत्पर होकर, पतित पापियों और पाखंडी मनुष्यों से बातचीत नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 26 (padma.6.30.26)

रात्रौ जागरणं गीतं नृत्यवाद्यादिकैस्तथा । पुण्यपाठैश्च विविधैर्धर्माख्यानैरुपोषणैः

rātrau jāgaraṇaṁ gītaṁ nṛtyavādyādikaistathā puṇyapāṭhaiśca vividhairdharmākhyānairupoṣaṇaiḥ

रात्रि में जागरण, गीत, नृत्य-वाद्य आदि, तथा विविध पुण्य-पाठों, धर्म-आख्यानों और उपवासों के साथ —

श्लोक 27 (padma.6.30.27)

ततः प्रभातसमये कृतपूर्वाह्णिक क्रियः । ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या यथाशक्त्या प्रपूजयेत्

tataḥ prabhātasamaye kṛtapūrvāhṇika kriyaḥ brāhmaṇānbhojayedbhaktyā yathāśaktyā prapūjayet

फिर प्रातःकाल में पूर्वाह्न की क्रियाएँ करके, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका सत्कार करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.6.30.28)

स्वयं च पारणं कृत्वा प्रणिपत्य विसर्जयेत् । एवं संवत्सरं यावदहोरात्रं दृढव्रतः

svayaṁ ca pāraṇaṁ kṛtvā praṇipatya visarjayet evaṁ saṁvatsaraṁ yāvadahorātraṁ dṛḍhavrataḥ

स्वयं भी उपवास तोड़कर, प्रणाम करके विदा करना चाहिए। इस प्रकार पूरे वर्ष तक, अहोरात्र दृढ़ व्रत से,

श्लोक 29 (padma.6.30.29)

दीपं पलसुवर्णेन तदर्द्धार्द्धेन वा पुनः । वर्तिस्तु राजती प्रोक्ता द्विपलार्द्धार्द्धिकापि वा

dīpaṁ palasuvarṇena tadarddhārddhena vā punaḥ vartistu rājatī proktā dvipalārddhārddhikāpi vā

एक पल सोने के बराबर, या उसका आधा-चौथाई का दीप; और चाँदी की बत्ती, दो पल या उसका आधा-चौथाई भी कही गई है।

श्लोक 30 (padma.6.30.30)

घृतपूर्णं तथा कुंभं ताम्रपात्रसमन्वितम् । लक्ष्मीनारायणो देवो यथाशक्त्या हिरण्मयः

ghṛtapūrṇaṁ tathā kuṁbhaṁ tāmrapātrasamanvitam lakṣmīnārāyaṇo devo yathāśaktyā hiraṇmayaḥ

घी से भरा कलश, ताँबे के पात्र सहित; लक्ष्मीनारायण देव अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने के बनवाने चाहिए,

श्लोक 31 (padma.6.30.31)

कार्यो भक्तिमता पुंसा मुक्तिद्वारमभीप्सता । ततो निमंत्रयेद्विद्वान्ब्रह्मणान्साधुसत्तमान्

kāryo bhaktimatā puṁsā muktidvāramabhīpsatā tato nimaṁtrayedvidvānbrahmaṇānsādhusattamān

मुक्ति के द्वार की इच्छा रखने वाले भक्तिमान पुरुष द्वारा। फिर विद्वान को श्रेष्ठ, साधु ब्राह्मणों को आमंत्रित करना चाहिए —

श्लोक 32 (padma.6.30.32)

द्वादशोत्तमपक्षे तु विप्रान्षण्मध्यमे तथा । अन्यथा कारयेत्त्रीन्वा एकं कर्मकरं द्विजम्

dvādaśottamapakṣe tu viprānṣaṇmadhyame tathā anyathā kārayettrīnvā ekaṁ karmakaraṁ dvijam

श्रेष्ठ पक्ष में बारह विप्र, मध्यम में छह, अन्यथा तीन, या एक कार्यकारी द्विज भी।

श्लोक 33 (padma.6.30.33)

सपत्नीकं द्विजं शांतं क्रियावंतं विशेषतः । इतिहासपुराणज्ञं धर्मज्ञं मृदुमेव च

sapatnīkaṁ dvijaṁ śāṁtaṁ kriyāvaṁtaṁ viśeṣataḥ itihāsapurāṇajñaṁ dharmajñaṁ mṛdumeva ca

पत्नी सहित, शांत, विशेष रूप से क्रियावान, इतिहास-पुराण के ज्ञाता, धर्मज्ञ और कोमल स्वभाव वाला,

श्लोक 34 (padma.6.30.34)

पितृभक्तं गुरुपरं देवब्राह्मणपूजकम् । पादार्घदानविधिना वस्त्रालंकारभूषणैः

pitṛbhaktaṁ guruparaṁ devabrāhmaṇapūjakam pādārghadānavidhinā vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ

पितृ-भक्त, गुरु-परायण, देव-ब्राह्मण-पूजक — पादार्घ्य दान की विधि से, वस्त्र-आभूषण-भूषणों से,

श्लोक 35 (padma.6.30.35)

संपूज्य पत्न्या सहितमेकं भक्त्या च पूर्ववत् । लक्ष्मीनारायणं देवं दीपवर्तियुतं तथा

saṁpūjya patnyā sahitamekaṁ bhaktyā ca pūrvavat lakṣmīnārāyaṇaṁ devaṁ dīpavartiyutaṁ tathā

पत्नी सहित उसकी पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजा करके — एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विशेष रूप से — दीप-बत्ती सहित लक्ष्मीनारायण देव को,

श्लोक 36 (padma.6.30.36)

ताम्रपात्रोपरिस्थाप्य घृतकुंभेन संयुतम् । ब्राह्मणाय ततो दद्याद्ध्यात्वा नारायणं परम् । मंत्रेणानेन देवर्षे तमहं कथयामि ते

tāmrapātroparisthāpya ghṛtakuṁbhena saṁyutam brāhmaṇāya tato dadyāddhyātvā nārāyaṇaṁ param maṁtreṇānena devarṣe tamahaṁ kathayāmi te

ताँबे के पात्र पर स्थापित, घी के कलश सहित, फिर परम नारायण का ध्यान करते हुए ब्राह्मण को देना चाहिए; हे देवर्षे! उस मंत्र को मैं तुम्हें बताता हूँ —

श्लोक 37 (padma.6.30.37)

अविद्या तमसा व्याप्ते संसारे पापनाशनः । ज्ञानप्रदो मोक्षदश्च तस्माद्दत्तो मयानघ

avidyā tamasā vyāpte saṁsāre pāpanāśanaḥ jñānaprado mokṣadaśca tasmāddatto mayānagha

'अज्ञान के अंधकार से व्याप्त इस संसार में पाप-नाशक, ज्ञान और मोक्ष देने वाला यह — इसलिए, हे निष्पाप! मेरे द्वारा दिया गया है।'

श्लोक 38 (padma.6.30.38)

इति दीपमंत्रः । दक्षिणां च यथाशक्त्या दत्त्वा विप्राय भक्तितः । भोजयेद्ब्राह्मणान्पश्चाद्घृतपायसमोदकैः

iti dīpamaṁtraḥ dakṣiṇāṁ ca yathāśaktyā dattvā viprāya bhaktitaḥ bhojayedbrāhmaṇānpaścādghṛtapāyasamodakaiḥ

यह दीप-मंत्र। भक्तिपूर्वक अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को दक्षिणा देकर, फिर ब्राह्मणों को घी, खीर और मोदकों से भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 39 (padma.6.30.39)

वस्त्रैराच्छादयेत्पश्चात्सपत्नीकं तथा द्विजम् । शय्यां सोपस्करां दद्याद्धेनुं चैव सवत्सकाम्

vastrairācchādayetpaścātsapatnīkaṁ tathā dvijam śayyāṁ sopaskarāṁ dadyāddhenuṁ caiva savatsakām

फिर पत्नी सहित उस द्विज को वस्त्रों से ढकना चाहिए; सामग्री सहित शय्या और बछड़े सहित गाय भी देनी चाहिए।

श्लोक 40 (padma.6.30.40)

तेभ्यस्तु दक्षिणां दद्याद्यथावित्तानुसारतः । सुहृत्स्वजनबंधूश्च भोजयेत्पूजयेत्तथा

tebhyastu dakṣiṇāṁ dadyādyathāvittānusārataḥ suhṛtsvajanabaṁdhūśca bhojayetpūjayettathā

उन्हें अपनी संपत्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए; मित्रों, स्वजनों और बंधुओं को भी भोजन कराना और सम्मानित करना चाहिए।

श्लोक 41 (padma.6.30.41)

एवं महोत्सवं कुर्याद्दीपव्रत समापने । ततो विसर्जयेत्पश्चात्प्रणिपत्य क्षमापयेत्

evaṁ mahotsavaṁ kuryāddīpavrata samāpane tato visarjayetpaścātpraṇipatya kṣamāpayet

इस प्रकार दीप-व्रत की समाप्ति पर महोत्सव करना चाहिए। फिर प्रणाम करके क्षमा माँगकर विदा करना चाहिए।

श्लोक 42 (padma.6.30.42)

एवं कृते तु यत्पुण्यं तथा सांक्रांतिकैश्च यत् । संवत्सराख्य दीपस्य तत्फलं प्राप्यते नरैः

evaṁ kṛte tu yatpuṇyaṁ tathā sāṁkrāṁtikaiśca yat saṁvatsarākhya dīpasya tatphalaṁ prāpyate naraiḥ

इस प्रकार किए जाने पर जो पुण्य होता है, तथा जो संक्रांति-व्रतों से होता है, संवत्सर नामक दीप का वह फल मनुष्यों को प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (padma.6.30.43)

मासव्रतैश्च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्यते नरैः । संवत्सरस्य दीपस्य व्रतेन चरितेन च

māsavrataiśca yatpuṇyaṁ tatpuṇyaṁ prāpyate naraiḥ saṁvatsarasya dīpasya vratena caritena ca

मास-व्रतों से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य मनुष्यों को संवत्सर-दीप के व्रत और आचरण से प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (padma.6.30.44)

दानव्रतैर्यथासंख्यैर्यश्च योगव्रतैस्तथा । तत्फलं समवाप्नोति दीपे सांवत्सरे कृते

dānavratairyathāsaṁkhyairyaśca yogavrataistathā tatphalaṁ samavāpnoti dīpe sāṁvatsare kṛte

यथासंख्य दान-व्रतों से और योग-व्रतों से जो फल मिलता है, वह फल संवत्सर-दीप किए जाने पर प्राप्त होता है।

श्लोक 45 (padma.6.30.45)

गोभूहिरण्यदानानि गृहादीनां विशेषतः । यत्फलं लभते विद्वान्तत्फलं दीपदो भवेत्

gobhūhiraṇyadānāni gṛhādīnāṁ viśeṣataḥ yatphalaṁ labhate vidvāntatphalaṁ dīpado bhavet

गौ, भूमि, स्वर्ण दान से, और विशेष रूप से घर आदि के दान से विद्वान को जो फल मिलता है, वही फल दीपदाता को होता है।

श्लोक 46 (padma.6.30.46)

दीपदः कांतिमाप्नोति दीपदो धनमक्षयम् । दीपदो ज्ञानमाप्नोति दीपदः परमं सुखम्

dīpadaḥ kāṁtimāpnoti dīpado dhanamakṣayam dīpado jñānamāpnoti dīpadaḥ paramaṁ sukham

दीपदाता कांति पाता है, दीपदाता अक्षय धन पाता है; दीपदाता ज्ञान पाता है, दीपदाता परम सुख पाता है।

श्लोक 47 (padma.6.30.47)

दीपदानाच्च सौभाग्यं विद्यामत्यंतनिर्मलाम् । आरोग्यं परमामृद्धिं लभते नात्र संशयः

dīpadānācca saubhāgyaṁ vidyāmatyaṁtanirmalām ārogyaṁ paramāmṛddhiṁ labhate nātra saṁśayaḥ

दीपदान से सौभाग्य, अत्यंत निर्मल विद्या, आरोग्य और परम समृद्धि प्राप्त होती है — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 48 (padma.6.30.48)

दीपदः सुभगां भार्यां सर्वलक्षणसंयुताम् । पुत्रान्पौत्रान्प्रपौत्रांश्च संततिं चाक्षया लभेत्

dīpadaḥ subhagāṁ bhāryāṁ sarvalakṣaṇasaṁyutām putrānpautrānprapautrāṁśca saṁtatiṁ cākṣayā labhet

दीपदाता सर्व-लक्षण-संपन्न, सौभाग्यशाली पत्नी पाता है; पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और अक्षय संतति भी पाता है।

श्लोक 49 (padma.6.30.49)

ब्राह्मणः परमं ज्ञानं क्षत्रियो राज्यमुत्तमम् । वैश्यो धनपशून्सर्वाञ्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्

brāhmaṇaḥ paramaṁ jñānaṁ kṣatriyo rājyamuttamam vaiśyo dhanapaśūnsarvāñchūdraḥ sukhamavāpnuyāt

ब्राह्मण परम ज्ञान पाता है, क्षत्रिय उत्तम राज्य; वैश्य समस्त धन-पशु पाता है, शूद्र सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 50 (padma.6.30.50)

कुमारी चापि भर्तारं सर्वलक्षणसंयुतम् । प्राप्नोति परमायुश्च पुत्रान्पौत्रांश्च पुष्कलान्

kumārī cāpi bhartāraṁ sarvalakṣaṇasaṁyutam prāpnoti paramāyuśca putrānpautrāṁśca puṣkalān

अविवाहित कन्या भी सर्व-लक्षण-संपन्न पति पाती है; परम आयु और प्रचुर पुत्र-पौत्र भी पाती है।

श्लोक 51 (padma.6.30.51)

वैधव्यं नैव युवती कदाचिदपि पश्यति । न वियोगमवाप्नोति दीपदानप्रभावतः

vaidhavyaṁ naiva yuvatī kadācidapi paśyati na viyogamavāpnoti dīpadānaprabhāvataḥ

युवती कभी भी विधवापन नहीं देखती; दीपदान के प्रभाव से उसे वियोग भी नहीं होता।

श्लोक 52 (padma.6.30.52)

नाधयो व्याधयश्चैव जायंते दीपदानतः । भयात्प्रमुच्यते भीतो बद्धो मुच्येत बंधनात्

nādhayo vyādhayaścaiva jāyaṁte dīpadānataḥ bhayātpramucyate bhīto baddho mucyeta baṁdhanāt

दीपदान से न मानसिक पीड़ाएँ होती हैं, न रोग; भयभीत भय से मुक्त होता है, बंधन में बँधा बंधन से मुक्त होता है।

श्लोक 53 (padma.6.30.53)

ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्दीपव्रतपरायणः । मुच्यते नात्र संदेहो ब्रह्मणो वचनं यथा

brahmahatyādibhiḥ pāpairdīpavrataparāyaṇaḥ mucyate nātra saṁdeho brahmaṇo vacanaṁ yathā

दीप-व्रत में तत्पर मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई संदेह नहीं, यह ब्रह्मा का ही वचन है।

श्लोक 54 (padma.6.30.54)

चांद्रायणानि कृच्छ्राणि चरितानि न संशयः । येन सांवत्सरो दीपो बोधितः शाश्वतो हरेः

cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi caritāni na saṁśayaḥ yena sāṁvatsaro dīpo bodhitaḥ śāśvato hareḥ

जिसने हरि के लिए संवत्सर-दीप को शाश्वत रूप से जलाया है, उसके द्वारा चांद्रायण और कृच्छ्र व्रत भी निःसंदेह पूर्ण किए हुए ही माने जाते हैं।

श्लोक 55 (padma.6.30.55)

ते धन्यास्ते महात्मानस्तैः प्राप्तं जन्मनः फलम् । यैः संपूज्य हरिं भक्त्या दीपःसांवत्सरः कृतः

te dhanyāste mahātmānastaiḥ prāptaṁ janmanaḥ phalam yaiḥ saṁpūjya hariṁ bhaktyā dīpaḥsāṁvatsaraḥ kṛtaḥ

वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उन्होंने जन्म का फल पाया है, जिन्होंने भक्तिपूर्वक हरि की पूजा करके संवत्सर-दीप किया है।

श्लोक 56 (padma.6.30.56)

येऽपि संवर्त्तयंतीह दीपवर्तिविलोकनाः । ते यांति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्

ye'pi saṁvarttayaṁtīha dīpavartivilokanāḥ te yāṁti paramaṁ sthānaṁ yatsurairapi durlabham

जो यहाँ दीप की बत्ती को देखते हुए उसकी देखभाल करते हैं, वे उस परम स्थान को जाते हैं जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 57 (padma.6.30.57)

येन तैलं च वर्तिं च यथाशक्त्या प्रदीपके । प्रक्षेपयंति सततं ते यांति परमां गतिम्

yena tailaṁ ca vartiṁ ca yathāśaktyā pradīpake prakṣepayaṁti satataṁ te yāṁti paramāṁ gatim

जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीपक में सतत तेल और बत्ती डालता है, वह परम गति प्राप्त करता है।

श्लोक 58 (padma.6.30.58)

गच्छंतं दीपकं शांतिं न शक्नोति प्रबोधितुम् । कथयत्यन्यलोकानां तेऽपि तत्फलभागिनः

gacchaṁtaṁ dīpakaṁ śāṁtiṁ na śaknoti prabodhitum kathayatyanyalokānāṁ te'pi tatphalabhāginaḥ

बुझते हुए दीपक को जो जगा नहीं सकता, पर उसकी बात दूसरे लोकों को बताता है, वे भी उसी फल के भागी होते हैं।

श्लोक 59 (padma.6.30.59)

स्तोकं स्तोकं च भिक्षित्वा तैलं दीपार्थमेव च । करोति दीपकं विष्णोः पुण्यं तेनापि लभ्यते

stokaṁ stokaṁ ca bhikṣitvā tailaṁ dīpārthameva ca karoti dīpakaṁ viṣṇoḥ puṇyaṁ tenāpi labhyate

थोड़ा-थोड़ा भीख माँगकर, केवल दीप के लिए तेल जुटाकर जो विष्णु का दीपक बनाता है, उसे भी पुण्य मिलता है।

श्लोक 60 (padma.6.30.60)

दीपं प्रज्वाल्यमानं तु यः पश्यत्यधमो नरः । कृतांजलिपुटो विष्णोर्विष्णुलोकमवाप्नुयात्

dīpaṁ prajvālyamānaṁ tu yaḥ paśyatyadhamo naraḥ kṛtāṁjalipuṭo viṣṇorviṣṇulokamavāpnuyāt

जो नीच मनुष्य भी जलते हुए दीप को हाथ जोड़कर विष्णु के प्रति देखता है, वह विष्णुलोक प्राप्त करता है।

श्लोक 61 (padma.6.30.61)

दीपप्रज्वालने बुद्धिं यो दद्यात्कुरुते स्वयम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्

dīpaprajvālane buddhiṁ yo dadyātkurute svayam sarvapāpavinirmukto viṣṇulokamavāpnuyāt

जो दीप जलाने में सहायता की सोच रखता है या स्वयं करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक प्राप्त करता है।

श्लोक 62 (padma.6.30.62)

अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । यस्य श्रवणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

atrāpyudāharaṁtīmamitihāsaṁ purātanam yasya śravaṇamātreṇa mucyate sarvakilbiṣaiḥ

यहाँ भी लोग इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जिसे सुनने मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 63 (padma.6.30.63)

सरस्वत्यास्तटे रम्ये सिद्धाश्रम इति श्रुतः । तत्रोवास द्विजः पूर्वं कपिलो नाम वेदवित्

sarasvatyāstaṭe ramye siddhāśrama iti śrutaḥ tatrovāsa dvijaḥ pūrvaṁ kapilo nāma vedavit

सरस्वती के सुंदर तट पर सिद्धाश्रम नाम से प्रसिद्ध एक स्थान था; वहाँ पहले वेदज्ञ कपिल नाम का एक द्विज रहता था।

श्लोक 64 (padma.6.30.64)

व्रतोपवासनिरतो दरिद्र श्रोःत्रियस्तथा । भिक्षावृत्त्या च कुरुते कुटुंब परिपालनम्

vratopavāsanirato daridra śroḥtriyastathā bhikṣāvṛttyā ca kurute kuṭuṁba paripālanam

व्रत-उपवास में रत, निर्धन श्रोत्रिय, वह भिक्षा-वृत्ति से अपने परिवार का पालन करता था।

श्लोक 65 (padma.6.30.65)

व्रतोपवासनियमैर्विष्णुमाराधयत्यसौ । विष्णुं संपूज्य विधिवद्दीपं बोधयते सदा

vratopavāsaniyamairviṣṇumārādhayatyasau viṣṇuṁ saṁpūjya vidhivaddīpaṁ bodhayate sadā

वह व्रत-उपवास के नियमों से विष्णु की आराधना करता था; विधिवत् विष्णु की पूजा करके वह सदा दीप जलाता था।

श्लोक 66 (padma.6.30.66)

समादाय च तत्तैलं स्वगृहे पूज्य केशवम् । दीपं भक्त्या च परया बोधयेद्धरितुष्टये

samādāya ca tattailaṁ svagṛhe pūjya keśavam dīpaṁ bhaktyā ca parayā bodhayeddharituṣṭaye

वह तेल लेकर अपने घर में केशव की पूजा करके, हरि की संतुष्टि के लिए परम भक्ति से दीप जलाता था।

श्लोक 67 (padma.6.30.67)

एवं प्रवर्त्तमानस्य कपिलस्य महात्मनः । मार्जारस्तीक्ष्णंदंष्ट्रस्तु मूषकान्भक्षयेत्सदा

evaṁ pravarttamānasya kapilasya mahātmanaḥ mārjārastīkṣṇaṁdaṁṣṭrastu mūṣakānbhakṣayetsadā

महात्मा कपिल के इस प्रकार क्रियाशील रहते हुए, तीक्ष्ण दाढ़ों वाली एक बिल्ली चूहों को सदा खा जाती थी।

श्लोक 68 (padma.6.30.68)

तत्रागच्छति भक्ष्यार्थं मूषकानामहर्निशम् । कृत्वा ध्यानं स भक्ष्यार्थं नित्यं नारायणाग्रतः

tatrāgacchati bhakṣyārthaṁ mūṣakānāmaharniśam kṛtvā dhyānaṁ sa bhakṣyārthaṁ nityaṁ nārāyaṇāgrataḥ

वह भोजन के लिए दिन-रात वहाँ आती, जहाँ वह भिक्षा के लिए नारायण के सामने नित्य ध्यान करता था।

श्लोक 69 (padma.6.30.69)

भक्षिता बहवस्तेन मूषका द्विजवेश्मनि । ये ये तैलार्थमायांति वर्त्यपाहरणाय च

bhakṣitā bahavastena mūṣakā dvijaveśmani ye ye tailārthamāyāṁti vartyapāharaṇāya ca

उस द्विज के घर में उसने बहुत से चूहे खा डाले — जो भी चूहे तेल के लिए या बत्ती चुराने आते थे,

श्लोक 70 (padma.6.30.70)

तांस्तांस्तु भक्षयत्येव मूषकान्ध्यानतत्परः । एवं प्रवर्तमानस्य कदाचित्कालपर्ययात्

tāṁstāṁstu bhakṣayatyeva mūṣakāndhyānatatparaḥ evaṁ pravartamānasya kadācitkālaparyayāt

उन-उन चूहों को वह ध्यान-तत्पर रहते हुए खा जाती थी। इस प्रकार क्रम चलते-चलते किसी समय, काल बीतने पर,

श्लोक 71 (padma.6.30.71)

एकादश्यां स कपिलो ब्राह्मणः स्वगृहे शुचिः । सोपवासः सपत्नीकः पूजयामास चाच्युतम्

ekādaśyāṁ sa kapilo brāhmaṇaḥ svagṛhe śuciḥ sopavāsaḥ sapatnīkaḥ pūjayāmāsa cācyutam

एकादशी को उस ब्राह्मण कपिल ने अपने घर में शुद्ध होकर, पत्नी सहित उपवास रखकर अच्युत की पूजा की।

श्लोक 72 (padma.6.30.72)

ततो जागरणं चक्रे स्तुतिनृत्यपरायणः । अर्द्धरात्रे तु संप्राप्ते निद्रया मोहितो द्विजः

tato jāgaraṇaṁ cakre stutinṛtyaparāyaṇaḥ arddharātre tu saṁprāpte nidrayā mohito dvijaḥ

फिर उसने स्तुति और नृत्य में तत्पर होकर जागरण किया; अर्धरात्रि होने पर वह द्विज नींद से मोहित हो गया।

श्लोक 73 (padma.6.30.73)

मार्जारश्चागतस्तत्र तीक्ष्णदंष्ट्रो लघुक्रमः । लक्षयामास नैवेद्यं गृहकोणे स्थितः सदा

mārjāraścāgatastatra tīkṣṇadaṁṣṭro laghukramaḥ lakṣayāmāsa naivedyaṁ gṛhakoṇe sthitaḥ sadā

तीक्ष्ण दाढ़ों वाली, हल्की चाल से चलने वाली वह बिल्ली वहाँ आई, और घर के कोने में स्थित होकर सदा की तरह नैवेद्य को देखने लगी।

श्लोक 74 (padma.6.30.74)

अद्राक्षीन्मूषिकां क्षुद्रा तैलपानार्थमागताम् । मंदतेजसि दीपे तु वर्त्यपाहरणोचिताम्

adrākṣīnmūṣikāṁ kṣudrā tailapānārthamāgatām maṁdatejasi dīpe tu vartyapāharaṇocitām

उसने देखा कि एक छोटा चूहा, तेल पीने के लिए आया है, मंद-तेज दीपक की बत्ती चुराने के इरादे से।

श्लोक 75 (padma.6.30.75)

समुत्पत्य पदाक्रम्य तदा सा बिलमाविशत् । तस्याः पादेन वै वर्त्या दीपः संबोधितो भृशम्

samutpatya padākramya tadā sā bilamāviśat tasyāḥ pādena vai vartyā dīpaḥ saṁbodhito bhṛśam

तब उछलकर, पैर से दबाकर, वह चूहा बिल में घुस गया; उसके पैर से बत्ती हिल उठी और दीप तीव्रता से जल उठा।

श्लोक 76 (padma.6.30.76)

तैलपात्रं च नमितं सुप्रकाशोऽभवत्तदा । ब्राह्मणोऽपि जजागार त्यक्त्वा निद्रां विमोहिनीम्

tailapātraṁ ca namitaṁ suprakāśo'bhavattadā brāhmaṇo'pi jajāgāra tyaktvā nidrāṁ vimohinīm

तेल का पात्र झुक गया और तब दीप अत्यंत प्रकाशमान हो उठा। ब्राह्मण भी मोहक निद्रा त्यागकर जाग उठा।

श्लोक 77 (padma.6.30.77)

मार्जारोऽपि च तां रात्रीमजाग्रच्चाखुभक्षकः । ततः प्रभाते विमले कृत्वा नित्यक्रियां द्विजः

mārjāro'pi ca tāṁ rātrīmajāgraccākhubhakṣakaḥ tataḥ prabhāte vimale kṛtvā nityakriyāṁ dvijaḥ

वह चूहा-भक्षक बिल्ली भी उस रात्रि जागती रही। फिर स्वच्छ प्रातःकाल में नित्य-क्रिया करके वह द्विज,

श्लोक 78 (padma.6.30.78)

ततश्च पारणं चक्रे विप्रो बंधुजनैः सह । एवं प्रवर्त्तमानस्य कपिलस्य महात्मनः

tataśca pāraṇaṁ cakre vipro baṁdhujanaiḥ saha evaṁ pravarttamānasya kapilasya mahātmanaḥ

फिर उस विप्र ने बंधुजनों के साथ उपवास तोड़ा। इस प्रकार क्रियाशील रहते हुए महात्मा कपिल के,

श्लोक 79 (padma.6.30.79)

बभूवुः पुत्रपौत्राश्च धनधान्यमनुत्तमम् । आरोग्यं परमामृद्धिमवाप महतीं श्रियम्

babhūvuḥ putrapautrāśca dhanadhānyamanuttamam ārogyaṁ paramāmṛddhimavāpa mahatīṁ śriyam

पुत्र-पौत्र और अनुपम धन-धान्य उत्पन्न हुए; उसे आरोग्य, परम समृद्धि और महान संपत्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 80 (padma.6.30.80)

दीपव्रतप्रभावेन कपिलो मोक्षमागतः । संभेद्य मंडलं पुण्यं सवितुः शशिनस्तथा

dīpavrataprabhāvena kapilo mokṣamāgataḥ saṁbhedya maṁḍalaṁ puṇyaṁ savituḥ śaśinastathā

दीप-व्रत के प्रभाव से कपिल को मोक्ष प्राप्त हुआ, सूर्य और चंद्रमा के पुण्य-मंडल को भेदकर,

श्लोक 81 (padma.6.30.81)

दीपज्योतिःस्वरूपेण परमात्मा नियुक्तवान् । मूषिकापि च कालेन ममार बिलमध्यतः

dīpajyotiḥsvarūpeṇa paramātmā niyuktavān mūṣikāpi ca kālena mamāra bilamadhyataḥ

परमात्मा ने उसे दीप की ज्योति के स्वरूप में नियुक्त किया। चूहा भी समय आने पर बिल के भीतर ही मर गया,

श्लोक 82 (padma.6.30.82)

विमानवरमासाद्य विष्णुलोकं जगाम सा । मार्जारोऽपि च कालांते मृतः स्वर्गं जगाम सः

vimānavaramāsādya viṣṇulokaṁ jagāma sā mārjāro'pi ca kālāṁte mṛtaḥ svargaṁ jagāma saḥ

और श्रेष्ठ विमान पाकर वह विष्णुलोक गया। बिल्ली भी काल के अंत में मरकर स्वर्ग गई,

श्लोक 83 (padma.6.30.83)

विमानवरमारुह्य देवगंधर्वसेवितम् । अप्सरोभिः परिवृतो विद्याधरगणैर्युतः

vimānavaramāruhya devagaṁdharvasevitam apsarobhiḥ parivṛto vidyādharagaṇairyutaḥ

देव-गंधर्वों से सेवित एक श्रेष्ठ विमान पर सवार होकर, अप्सराओं से घिरी, विद्याधर-गणों सहित,

श्लोक 84 (padma.6.30.84)

स्तूयमानो महातेजा जयशब्दादि मंगलैः । स्तूयमानः स वै नागैर्विष्णुलोकं जगाम सः

stūyamāno mahātejā jayaśabdādi maṁgalaiḥ stūyamānaḥ sa vai nāgairviṣṇulokaṁ jagāma saḥ

जय-जयकार आदि मंगल-ध्वनियों से स्तुत होती हुई, महातेजस्वी वह नागों द्वारा भी स्तुत होकर विष्णुलोक गई।

श्लोक 85 (padma.6.30.85)

कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । भुक्त्वा च विपुलान्भोगान्ततो राजाभवद्भुवि

kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca bhuktvā ca vipulānbhogāntato rājābhavadbhuvi

हज़ारों करोड़ कल्प और सैकड़ों करोड़ कल्प तक विपुल भोगों को भोगकर, वह फिर पृथ्वी पर राजा बनी,

श्लोक 86 (padma.6.30.86)

सुधर्मा नाम धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः । रूपवान्सुभगश्चैव महाबलपराक्रमः

sudharmā nāma dharmātmā devabrāhmaṇapūjakaḥ rūpavānsubhagaścaiva mahābalaparākramaḥ

सुधर्मा नाम से, धर्मात्मा, देव-ब्राह्मण-पूजक, रूपवान, सौभाग्यशाली और महाबली-पराक्रमी।

श्लोक 87 (padma.6.30.87)

तस्य प्रियतमा भार्या सर्वलक्षणसंयुता । भर्तृभक्ता तथा शीला नाम्ना सा रूपसुंदरी

tasya priyatamā bhāryā sarvalakṣaṇasaṁyutā bhartṛbhaktā tathā śīlā nāmnā sā rūpasuṁdarī

उसकी अत्यंत प्रिय पत्नी, सर्व-लक्षण-संपन्न, पति-भक्त और सुशील, नाम से रूपसुंदरी, रूप में सुंदर थी।

श्लोक 88 (padma.6.30.88)

सर्वासां चैव नारीणां मध्ये सा सुभगाभवत् । पुत्राश्च बहवो जातास्तथा दुहितरो घनाः

sarvāsāṁ caiva nārīṇāṁ madhye sā subhagābhavat putrāśca bahavo jātāstathā duhitaro ghanāḥ

सभी स्त्रियों में वही सबसे सौभाग्यशाली थी; उनके अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, और बहुत सी पुत्रियाँ भी।

श्लोक 89 (padma.6.30.89)

एवं विहरतोस्तद्वद्दंपत्योः प्रीतिपूर्वकम् । आगतः कार्त्तिको मासो हरिनेत्रावबोधकृत्

evaṁ viharatostadvaddaṁpatyoḥ prītipūrvakam āgataḥ kārttiko māso harinetrāvabodhakṛt

इस प्रकार उस दंपती के प्रेमपूर्वक विहार करते हुए, हरि के नेत्रों को जगाने वाला कार्तिक मास आया।

श्लोक 90 (padma.6.30.90)

तस्मिन्दीपाः प्रबोध्यंते नारायणपरायणैः । कृच्छ्रचांद्रायणादीनि व्रतानि नियमास्तथा

tasmindīpāḥ prabodhyaṁte nārāyaṇaparāyaṇaiḥ kṛcchracāṁdrāyaṇādīni vratāni niyamāstathā

उस मास में नारायण-परायण लोगों द्वारा दीप जगाए जाते हैं, कृच्छ्र-चांद्रायण आदि व्रत और नियम भी,

श्लोक 91 (padma.6.30.91)

क्रियंते विष्णुभक्तैश्च संसारभयभीरुभिः । अथ प्रबोधिनीं प्राप्य राजा राज्ञीमथाब्रवीत्

kriyaṁte viṣṇubhaktaiśca saṁsārabhayabhīrubhiḥ atha prabodhinīṁ prāpya rājā rājñīmathābravīt

संसार के भय से डरे विष्णु-भक्तों द्वारा किए जाते हैं। फिर प्रबोधिनी को पाकर राजा ने रानी से कहा —

श्लोक 92 (padma.6.30.92)

भद्रे प्रबोधिनी पुण्या विष्णोर्नाभिसरोरुहे । करिष्याम्यद्य पूजां च सोपवासो जितेंद्रियः

bhadre prabodhinī puṇyā viṣṇornābhisaroruhe kariṣyāmyadya pūjāṁ ca sopavāso jiteṁdriyaḥ

'हे भद्रे! प्रबोधिनी विष्णु के नाभि-कमल में परम पुण्यमयी है; आज मैं उपवास रखकर, इंद्रियों को वश में करके पूजा करूँगा।

श्लोक 93 (padma.6.30.93)

स्नात्वा च पुष्करे तीर्थे पुंडरीकाक्षमच्युतम् । पूजयिष्यामि देवेशं लक्ष्म्या सह जनार्दनम्

snātvā ca puṣkare tīrthe puṁḍarīkākṣamacyutam pūjayiṣyāmi deveśaṁ lakṣmyā saha janārdanam

पुष्कर तीर्थ में स्नान करके मैं लक्ष्मी सहित पुंडरीकाक्ष, अच्युत, देवेश जनार्दन की पूजा करूँगा।'

श्लोक 94 (padma.6.30.94)

इति सा वांछितं श्रुत्वा भर्तुः प्रियहिते रता । उवाच वचनं गुह्यं भर्त्तारं चारुहासिनी

iti sā vāṁchitaṁ śrutvā bhartuḥ priyahite ratā uvāca vacanaṁ guhyaṁ bharttāraṁ cāruhāsinī

इस प्रकार अपने पति की इच्छा सुनकर, पति के प्रिय-हित में रत, सुहासिनी रानी ने पति से एक गुप्त बात कही —

श्लोक 95 (padma.6.30.95)

रूपसुंदर्युवाच ।ममापि हृदये कामः समुत्पन्नो नराधिप । रूपसौंदर्यवांछा च हृदये मम वर्त्तते

rūpasuṁdaryuvāca mamāpi hṛdaye kāmaḥ samutpanno narādhipa rūpasauṁdaryavāṁchā ca hṛdaye mama varttate

रूपसुंदरी ने कहा — 'हे राजन्! मेरे भी हृदय में एक इच्छा उत्पन्न हुई है; रूप और सौंदर्य की कामना मेरे हृदय में है।

श्लोक 96 (padma.6.30.96)

पुष्करं प्रथमं तीर्थं गंतुमिच्छे त्वया सह । ततो राजा तया सार्द्धमागतः पुष्करं तदा

puṣkaraṁ prathamaṁ tīrthaṁ gaṁtumicche tvayā saha tato rājā tayā sārddhamāgataḥ puṣkaraṁ tadā

मैं भी आपके साथ प्रथम तीर्थ पुष्कर जाना चाहती हूँ।' तब राजा उसके साथ पुष्कर पहुँचा,

श्लोक 97 (padma.6.30.97)

हस्त्यश्वरथवृंदैश्च समागत्य पुरोहितैः । ततः स्नात्वा तथा ध्यायन्तर्पयन्पितृदेवताः

hastyaśvarathavṛṁdaiśca samāgatya purohitaiḥ tataḥ snātvā tathā dhyāyantarpayanpitṛdevatāḥ

हाथी, घोड़े, रथों के समूहों के साथ, पुरोहितों सहित; फिर स्नान करके, ध्यान करते हुए, पितरों और देवताओं को तर्पण देते हुए,

श्लोक 98 (padma.6.30.98)

पूजयामास देवेशं पुंडरीकाक्षमच्युतम् । दीपमालाकुले तत्र सर्वतः सुमनोहरे

pūjayāmāsa deveśaṁ puṁḍarīkākṣamacyutam dīpamālākule tatra sarvataḥ sumanohare

उसने देवाधिदेव पुंडरीकाक्ष अच्युत की पूजा की, वहाँ सब ओर से अत्यंत मनोहर, दीप-मालाओं से भरे स्थान में।

श्लोक 99 (padma.6.30.99)

ददर्श लिखितं तत्र मार्जारं देवतालये । तं दृष्ट्वा प्राकृतं कर्म जन्म स्मृत्वा नृपस्तदा

dadarśa likhitaṁ tatra mārjāraṁ devatālaye taṁ dṛṣṭvā prākṛtaṁ karma janma smṛtvā nṛpastadā

वहाँ उसने देवालय में एक चित्रित बिल्ली को देखा। उसे देखकर, अपने पूर्व जन्म का कर्म स्मरण करके, राजा ने तब,

श्लोक 100 (padma.6.30.100)

मुखपंकजमालोक्य प्रियायाः प्रजहास च । रूपसुंदर्युवाच ।मम सन्मुखमालोक्य भर्तः किं स्मितकारणम्

mukhapaṁkajamālokya priyāyāḥ prajahāsa ca rūpasuṁdaryuvāca mama sanmukhamālokya bhartaḥ kiṁ smitakāraṇam

अपनी प्रिया के मुख-कमल को देखकर हँस पड़ा। रूपसुंदरी ने कहा — 'हे भर्ता! मेरे ही मुख को देखकर आपकी हँसी का क्या कारण है?'

श्लोक 101 (padma.6.30.101)

कथयामास हृष्टात्मा प्राक्तनं कर्मणः फलम् । राजोवाच ।अहमासं पुरा देवि मार्जारो ब्राह्मणालये

kathayāmāsa hṛṣṭātmā prāktanaṁ karmaṇaḥ phalam rājovāca ahamāsaṁ purā devi mārjāro brāhmaṇālaye

प्रसन्न मन से उसने अपने पूर्व कर्म का फल बताया। राजा ने कहा — 'हे देवी! मैं पहले एक ब्राह्मण के घर में बिल्ली था।

श्लोक 102 (padma.6.30.102)

भक्षिता मूषकास्तत्र मया शतसहस्रशः । ततो नारायणस्याग्रे दीपः संरक्षितो यतः

bhakṣitā mūṣakāstatra mayā śatasahasraśaḥ tato nārāyaṇasyāgre dīpaḥ saṁrakṣito yataḥ

वहाँ मैंने सैकड़ों-हज़ारों चूहे खाए; परंतु उससे नारायण के सामने का दीप सुरक्षित रहा,

श्लोक 103 (padma.6.30.103)

व्याजेनापि मया देविप्राप्तं तत्कर्मणः फलम् । विष्णुलोकमनुप्राप्य राज्यं प्राप्तं मयाधुना

vyājenāpi mayā deviprāptaṁ tatkarmaṇaḥ phalam viṣṇulokamanuprāpya rājyaṁ prāptaṁ mayādhunā

हे देवी! उसी अप्रत्यक्ष कर्म से मुझे उस कर्म का यह फल मिला; विष्णुलोक प्राप्त करके अब मुझे यह राज्य मिला है।'

श्लोक 104 (padma.6.30.104)

रूपसुंदर्युवाच । ममापि स्मरणं जातं प्राकृतस्य च जन्मनः । मूषिका चाहमप्यासं क्षुद्रा ब्राह्मणवेश्मनि

rūpasuṁdaryuvāca mamāpi smaraṇaṁ jātaṁ prākṛtasya ca janmanaḥ mūṣikā cāhamapyāsaṁ kṣudrā brāhmaṇaveśmani

रूपसुंदरी ने कहा — 'मुझे भी अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो आया है; मैं भी एक ब्राह्मण के घर में एक छोटी चुहिया थी।

श्लोक 105 (padma.6.30.105)

कार्तिके च प्रबोधिन्यां मंदीभूते च दीपके । वर्त्यग्राहरणार्थाय निर्गताहं तदा बिलात्

kārtike ca prabodhinyāṁ maṁdībhūte ca dīpake vartyagrāharaṇārthāya nirgatāhaṁ tadā bilāt

कार्तिक की प्रबोधिनी को, दीपक मंद पड़ने पर, बत्ती का सिरा पकड़ने के लिए मैं तब बिल से निकली।

श्लोक 106 (padma.6.30.106)

दृष्ट्वा नारायणं देवं पूजितं कुसुमैस्तथा । निद्राभिभूतं विप्रं च वर्त्तिः कृष्टा मया तदा

dṛṣṭvā nārāyaṇaṁ devaṁ pūjitaṁ kusumaistathā nidrābhibhūtaṁ vipraṁ ca varttiḥ kṛṣṭā mayā tadā

फूलों से पूजित देव नारायण को और नींद से अभिभूत ब्राह्मण को देखकर, मैंने तब बत्ती खींची।

श्लोक 107 (padma.6.30.107)

उत्थितस्त्वं यदा तत्र मां गृहीतुं कृतक्षणः । दृष्ट्वा त्वं च प्रणष्टाहं प्रविष्टा बिलमध्यतः

utthitastvaṁ yadā tatra māṁ gṛhītuṁ kṛtakṣaṇaḥ dṛṣṭvā tvaṁ ca praṇaṣṭāhaṁ praviṣṭā bilamadhyataḥ

जब आप उठे, मुझे पकड़ने के लिए तत्पर, तो आपको देखकर मैं भाग गई और बिल में घुस गई।

श्लोक 108 (padma.6.30.108)

विशंत्या मम पादेन दीपवर्त्तिर्विजृंभिता । तैलपात्रं च नमितं तेनाहं सुखभागिनी

viśaṁtyā mama pādena dīpavarttirvijṛṁbhitā tailapātraṁ ca namitaṁ tenāhaṁ sukhabhāginī

भीतर घुसते हुए मेरे ही पैर से दीप की बत्ती हिल गई और तेल का पात्र झुक गया — उससे मैं सुख की भागी बनी।

श्लोक 109 (padma.6.30.109)

तन्मया राजराजेंद्र दीपं चैव प्रकाशितम् । इदानीं च मया प्राप्तं रूपलावण्यमुत्तमम्

tanmayā rājarājeṁdra dīpaṁ caiva prakāśitam idānīṁ ca mayā prāptaṁ rūpalāvaṇyamuttamam

हे राजराजेंद्र! उसी से दीप प्रकाशित हुआ; अब मुझे यह उत्तम रूप और लावण्य प्राप्त हुआ है।

श्लोक 110 (padma.6.30.110)

त्वं च भर्त्ता तथा राज्यं पुत्राश्चैवंविधं सुखम् । दीपप्रबोधनाज्जातं ज्ञानमत्यंत दुर्ल्लभम्

tvaṁ ca bharttā tathā rājyaṁ putrāścaivaṁvidhaṁ sukham dīpaprabodhanājjātaṁ jñānamatyaṁta durllabham

आप पति के रूप में, राज्य, पुत्र और ऐसा सुख — यह अत्यंत दुर्लभ ज्ञान दीप जलाने से ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 111 (padma.6.30.111)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन दीपव्रतमनुत्तमम् । आवां हि परया भक्त्या कुर्वश्चैव विशेषतः

tasmātsarvaprayatnena dīpavratamanuttamam āvāṁ hi parayā bhaktyā kurvaścaiva viśeṣataḥ

इसलिए हम दोनों को हर प्रयत्न से, विशेष रूप से परम भक्ति के साथ, यह अनुपम दीप-व्रत करना चाहिए।

श्लोक 112 (padma.6.30.112)

तदेतत्कर्मणः प्राप्तं फलं राज्यादिसंपदः । पूर्वजन्मस्मृतं चापि सर्वपापक्षयस्तथा

tadetatkarmaṇaḥ prāptaṁ phalaṁ rājyādisaṁpadaḥ pūrvajanmasmṛtaṁ cāpi sarvapāpakṣayastathā

यह राज्य आदि संपदा का फल भी हमें उसी कर्म से मिला है, पूर्व जन्म का स्मरण भी, और सब पापों का क्षय भी।

श्लोक 113 (padma.6.30.113)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन विधिमंत्रादिपूर्वकम् । दीपव्रतं कृतं पुंभिः पुण्यं चंद्रार्कतारकम्

tasmātsarvaprayatnena vidhimaṁtrādipūrvakam dīpavrataṁ kṛtaṁ puṁbhiḥ puṇyaṁ caṁdrārkatārakam

इसलिए हर प्रयत्न से, विधि-मंत्र आदि के साथ, मनुष्यों को दीप-व्रत करना चाहिए, जो चंद्र-सूर्य-तारों के समान पुण्यमय है।'

श्लोक 114 (padma.6.30.114)

इति श्रुत्वा वचो राजा चक्रे दीपव्रतं तदा । प्रियया सह देवर्षे सम्यक्श्रद्धासमन्वितः

iti śrutvā vaco rājā cakre dīpavrataṁ tadā priyayā saha devarṣe samyakśraddhāsamanvitaḥ

यह वचन सुनकर राजा ने, हे देवर्षे! प्रिया सहित, सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर तब दीप-व्रत किया।

श्लोक 115 (padma.6.30.115)

तस्मिंस्तु पुष्करे तीर्थे कृत्वा दीपव्रतं तु तौ । अवापतुः परां मुक्तिं देवदानवदुर्ल्लभाम्

tasmiṁstu puṣkare tīrthe kṛtvā dīpavrataṁ tu tau avāpatuḥ parāṁ muktiṁ devadānavadurllabhām

उस पुष्कर तीर्थ में दीप-व्रत करके उन दोनों ने देव-दानवों के लिए भी दुर्लभ परम मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 116 (padma.6.30.116)

एतद्दीपस्य माहात्म्यं ये शृण्वंति नरा भुवि । सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयांति हरिमंदिरम्

etaddīpasya māhātmyaṁ ye śṛṇvaṁti narā bhuvi sarvapāpavinirmuktāḥ prayāṁti harimaṁdiram

जो मनुष्य पृथ्वी पर इस दीप की महिमा सुनते हैं, वे सभी पापों से मुक्त होकर हरि-मंदिर जाते हैं।

श्लोक 117 (padma.6.30.117)

ये च कुर्वंति पुरुषाः स्त्रियो वा भक्तितत्पराः । ते सर्वे पापनिर्मुक्ता यांति ब्रह्मसनातनम्

ye ca kurvaṁti puruṣāḥ striyo vā bhaktitatparāḥ te sarve pāpanirmuktā yāṁti brahmasanātanam

जो भी पुरुष या स्त्रियाँ भक्तिपूर्वक इसे करते हैं, वे सभी पापमुक्त होकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 118 (padma.6.30.118)

दीपव्रतमिदं विद्वन्कथितं ते विमुक्तिदम् । सर्वसौख्यप्रदं धन्यं महाव्रतमिदं तव

dīpavratamidaṁ vidvankathitaṁ te vimuktidam sarvasaukhyapradaṁ dhanyaṁ mahāvratamidaṁ tava

हे विद्वन्! यह मुक्तिदायक दीप-व्रत तुम्हें बताया गया है; तुम्हारा यह महाव्रत सर्व-सुखदायक और धन्य है।

श्लोक 119 (padma.6.30.119)

नेत्ररोगा विनश्यंति यथा पापप्रभावजाः । आधयो व्याधयः सर्वे नश्यंते हि कृतेक्षणात्

netrarogā vinaśyaṁti yathā pāpaprabhāvajāḥ ādhayo vyādhayaḥ sarve naśyaṁte hi kṛtekṣaṇāt

पाप के प्रभाव से उत्पन्न नेत्र-रोग नष्ट हो जाते हैं; इसे करने मात्र से सभी मानसिक और शारीरिक पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 120 (padma.6.30.120)

न दारिद्र्यं न शोकं च न मोहो न च विभ्रमः । गृहे लक्ष्मीः समायाति जन्मजन्मनि वाडव

na dāridryaṁ na śokaṁ ca na moho na ca vibhramaḥ gṛhe lakṣmīḥ samāyāti janmajanmani vāḍava

न दरिद्रता होती है, न शोक, न मोह, न भ्रम; हे वाडव! जन्म-जन्मांतर में घर में लक्ष्मी का वास होता है।

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