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उत्तर खण्ड · अध्याय 31

जन्माष्टमी व्रत

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (padma.6.31.1)

नारद उवाच ।देवदेव जगन्नाथ भक्तानामभयप्रद । व्रतं ब्रूहि महादेव कृपां कृत्वा ममोपरि

nārada uvāca devadeva jagannātha bhaktānāmabhayaprada vrataṁ brūhi mahādeva kṛpāṁ kṛtvā mamopari

नारद ने कहा — हे देवाधिदेव, जगन्नाथ, भक्तों को अभय देने वाले! मुझ पर कृपा करके, हे महादेव! वह व्रत बताइए।

श्लोक 2 (padma.6.31.2)

श्रीमहादेव उवाच ।सार्वभौमः पुरा ह्यासीद्धरिश्चंद्रो महीपतिः । तस्यतुष्टोऽददद्ब्रह्मा पुरीं कामदुघां शुभाम्

śrīmahādeva uvāca sārvabhaumaḥ purā hyāsīddhariścaṁdro mahīpatiḥ tasyatuṣṭo'dadadbrahmā purīṁ kāmadughāṁ śubhām

श्री महादेव ने कहा — पहले हरिश्चंद्र नाम का एक चक्रवर्ती राजा था; उससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे एक शुभ, सर्वकामनापूर्ण नगरी दी।

श्लोक 3 (padma.6.31.3)

सर्वरत्नमयीं दिव्यां बालार्कसदृशप्रभाम् । तत्र स्थितो महीपालो सप्तद्वीपां वसुंधराम्

sarvaratnamayīṁ divyāṁ bālārkasadṛśaprabhām tatra sthito mahīpālo saptadvīpāṁ vasuṁdharām

सभी रत्नों से बनी, दिव्य, उदीयमान सूर्य के समान प्रभा वाली; वहाँ स्थित होकर वह राजा,

श्लोक 4 (padma.6.31.4)

पालयामास धर्मेण पिता पुत्रमिवौरसम् । प्रभूतधनधान्यस्तु पुत्रदौहित्रवान्नृपः

pālayāmāsa dharmeṇa pitā putramivaurasam prabhūtadhanadhānyastu putradauhitravānnṛpaḥ

सातों द्वीपों वाली पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन करता था, जैसे पिता अपने ही पुत्र का करता है। प्रचुर धन-धान्य और पुत्र-पौत्रों वाला वह राजा,

श्लोक 5 (padma.6.31.5)

स पालयन्शुभं राज्यं परं विस्मयमागतः । न तादृशमभूत्पूर्वं राज्यं कस्य हि कर्हिचित्

sa pālayanśubhaṁ rājyaṁ paraṁ vismayamāgataḥ na tādṛśamabhūtpūrvaṁ rājyaṁ kasya hi karhicit

अपने शुभ राज्य का पालन करते हुए परम विस्मय को प्राप्त हुआ — 'पहले कभी किसी का ऐसा राज्य नहीं हुआ,

श्लोक 6 (padma.6.31.6)

न चेदृशं नरैरन्यैर्विमानमधिरोहितम् । कस्येह कर्मणो व्यष्टिर्येनाहं सुरराडिव

na cedṛśaṁ narairanyairvimānamadhirohitam kasyeha karmaṇo vyaṣṭiryenāhaṁ surarāḍiva

न ही किसी और मनुष्य ने ऐसे विमान पर आरोहण किया है। यह किस कर्म का अंश है, जिससे मैं मानो देवराज के समान हूँ?'

श्लोक 7 (padma.6.31.7)

इति चिंतापरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । ददर्श पार्थिववरो मेरुं शिखरिणां वरम्

iti ciṁtāparo bhūtvā vimānavaramāsthitaḥ dadarśa pārthivavaro meruṁ śikhariṇāṁ varam

इस प्रकार चिंतामग्न होकर, अपने श्रेष्ठ विमान पर बैठे उस श्रेष्ठ राजा ने शिखरों में श्रेष्ठ मेरु पर्वत को देखा।

श्लोक 8 (padma.6.31.8)

तत्रास्ते च महात्मासौ द्वितीय इव भास्करः । आसीनं पर्वतवरे शैलपट्टे हिरण्मये

tatrāste ca mahātmāsau dvitīya iva bhāskaraḥ āsīnaṁ parvatavare śailapaṭṭe hiraṇmaye

वहाँ, स्वर्ण-शिला पर, पर्वतों में श्रेष्ठ मेरु पर बैठे हुए, मानो दूसरे सूर्य के समान वे महात्मा विराजते थे —

श्लोक 9 (padma.6.31.9)

सनत्कुमारं ब्रह्मर्षिं ज्ञानयोगपरायणम् । दृष्ट्वा ह्यवातरद्राजा प्रष्टुकामोऽथ विस्मयम्

sanatkumāraṁ brahmarṣiṁ jñānayogaparāyaṇam dṛṣṭvā hyavātaradrājā praṣṭukāmo'tha vismayam

ज्ञानयोग में तत्पर ब्रह्मर्षि सनत्कुमार। उन्हें देखकर, अपना विस्मय पूछने की इच्छा से राजा तुरंत उतर पड़ा।

श्लोक 10 (padma.6.31.10)

ववंदे चरणौ हृष्टस्तेनापि स च नंदितः । सुखोपविष्टस्तु नृपः पप्रच्छ मुनिपुंगवम्

vavaṁde caraṇau hṛṣṭastenāpi sa ca naṁditaḥ sukhopaviṣṭastu nṛpaḥ papraccha munipuṁgavam

हर्षित होकर उसने उनके चरणों में वंदना की, और उन्होंने भी उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया; सुखपूर्वक बैठकर राजा ने उस मुनिश्रेष्ठ से पूछा —

श्लोक 11 (padma.6.31.11)

भगवन्दुर्ल्लभा लोके संपच्चेयं यथा मम । कर्मणा केन लभ्येत कश्चाहं पूर्वजन्मनि

bhagavandurllabhā loke saṁpacceyaṁ yathā mama karmaṇā kena labhyeta kaścāhaṁ pūrvajanmani

'हे भगवन्! संसार में दुर्लभ यह मेरी संपत्ति किस कर्म से प्राप्त हुई है, और पूर्वजन्म में मैं कौन था?

श्लोक 12 (padma.6.31.12)

तत्त्वं कथय मे सर्वमनुग्राह्योऽस्मि ते यदि । सनत्कुमार उवाच । शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि पूर्ववृत्तस्य कारणम्

tattvaṁ kathaya me sarvamanugrāhyo'smi te yadi sanatkumāra uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi pūrvavṛttasya kāraṇam

वह तत्त्व मुझे पूरा बताइए, यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ।' सनत्कुमार ने कहा — 'हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हारे पूर्व-वृत्तांत का कारण बताता हूँ,

श्लोक 13 (padma.6.31.13)

येन कृत्वा विशेषेण तव चानुग्रहोऽभवत् । त्वमासीः पूर्वजनुषि सुवैश्यः सत्यवाक्शुचिः

yena kṛtvā viśeṣeṇa tava cānugraho'bhavat tvamāsīḥ pūrvajanuṣi suvaiśyaḥ satyavākśuciḥ

जिसके कारण विशेष रूप से तुम पर यह अनुग्रह हुआ। तुम अपने पूर्व जन्म में एक अच्छे, सत्यवादी, पवित्र वैश्य थे।

श्लोक 14 (padma.6.31.14)

स्वं कर्म ते परित्यक्तं ततस्त्यक्तस्तु बांधवैः । सत्वं वृत्तिपरिक्षीणो भार्ययानुगतस्तथा

svaṁ karma te parityaktaṁ tatastyaktastu bāṁdhavaiḥ satvaṁ vṛttiparikṣīṇo bhāryayānugatastathā

तुमने अपना व्यापार त्याग दिया था, फिर बांधवों द्वारा भी त्यागे गए; आजीविका से क्षीण होकर, पत्नी के साथ,

श्लोक 15 (padma.6.31.15)

निर्गतः स्वजनांस्त्यक्त्वा परप्रेषणलिप्सया । न च प्रेषणदो ह्यासीत्काले दुर्भिक्षपीडितः

nirgataḥ svajanāṁstyaktvā parapreṣaṇalipsayā na ca preṣaṇado hyāsītkāle durbhikṣapīḍitaḥ

तुम अपने ही लोगों को छोड़कर, दूसरे की सेवा पाने की इच्छा से निकल पड़े; परंतु उस अकाल-पीड़ित समय में तुम्हें कोई सेवा देने वाला नहीं मिला।

श्लोक 16 (padma.6.31.16)

ततः कदाचिद्गहने सरश्चोत्फुल्लपंकजम् । दृष्ट्वा तत्र कृतो भावो गृह्णीवः पंकजानि वै

tataḥ kadācidgahane saraścotphullapaṁkajam dṛṣṭvā tatra kṛto bhāvo gṛhṇīvaḥ paṁkajāni vai

फिर एक बार, किसी घने स्थान में, खिले हुए कमलों वाला एक सरोवर देखकर, तुम्हारे मन में यह भाव उठा — 'हम इन कमलों को ले लें।'

श्लोक 17 (padma.6.31.17)

एतावदुक्त्वा पुष्पाणि तान्यादाय पदे पदे । आस्थितौ नगरीं पुण्यां नाम्ना वाराणसीं शुभाम्

etāvaduktvā puṣpāṇi tānyādāya pade pade āsthitau nagarīṁ puṇyāṁ nāmnā vārāṇasīṁ śubhām

इतना कहकर, उन फूलों को लेकर कदम-कदम चलते हुए, तुम दोनों उस पुण्यमय, शुभ नगरी वाराणसी पहुँचे।

श्लोक 18 (padma.6.31.18)

ततो विक्रयतः कश्चिनैव गृह्णाति पंकजम् । तन्मठान्निर्गतः कश्चित्तत्रैव प्रांगणे स्थितः

tato vikrayataḥ kaścinaiva gṛhṇāti paṁkajam tanmaṭhānnirgataḥ kaścittatraiva prāṁgaṇe sthitaḥ

फिर बेचने पर भी कोई तुम्हारा कमल नहीं लेता था; उस स्थान से निकलकर तुम किसी आँगन में जा खड़े हुए।

श्लोक 19 (padma.6.31.19)

तत्र स्थाने प्रविशता श्रुतो वादित्रनिस्वनः । कस्मिंश्च श्रूयते ह्येष वादित्रस्य च निस्वनः

tatra sthāne praviśatā śruto vāditranisvanaḥ kasmiṁśca śrūyate hyeṣa vāditrasya ca nisvanaḥ

उस स्थान में प्रवेश करते हुए तुमने वाद्यों की ध्वनि सुनी; तुमने पूछा — 'यह वाद्य-ध्वनि कहाँ से सुनाई दे रही है?'

श्लोक 20 (padma.6.31.20)

इति पृष्टे तदा तूर्ये तेनोक्ते प्रस्थितोंतरम् । काशिराजस्तु विख्यात इंद्रद्युम्नस्तु पार्थिवः

iti pṛṣṭe tadā tūrye tenokte prasthitoṁtaram kāśirājastu vikhyāta iṁdradyumnastu pārthivaḥ

इस प्रकार पूछे जाने पर, जब उसने बताया, तब तुम आगे की ओर चल पड़े। काशी का इंद्रद्युम्न नाम से विख्यात एक राजा था।

श्लोक 21 (padma.6.31.21)

तस्यास्ति दुहिता ख्याता नाम्ना चंद्रावती सती । उपोषिता महाभागा जयंतीमष्टमीं शुभाम्

tasyāsti duhitā khyātā nāmnā caṁdrāvatī satī upoṣitā mahābhāgā jayaṁtīmaṣṭamīṁ śubhām

उसकी चंद्रावती नाम से विख्यात एक पुत्री थी, सती और महाभाग्यशाली, जो शुभ जयंती अष्टमी का उपवास कर रही थी।

श्लोक 22 (padma.6.31.22)

तत्रागतोऽसौ वैश्यस्तु यत्र तिष्ठति सा शुभा । संतुष्टचित्तः स तदा हर्षस्तत्रागतो महान्

tatrāgato'sau vaiśyastu yatra tiṣṭhati sā śubhā saṁtuṣṭacittaḥ sa tadā harṣastatrāgato mahān

वहाँ वह वैश्य (तुम) आया, जहाँ वह शुभा स्थित थी; संतुष्ट चित्त से, वहाँ महान हर्ष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 23 (padma.6.31.23)

तत्र स्थाने त्वया दृष्टो देव वैतानिको विधिः । आदित्यसहितो यत्र पूज्यते भगवान्हरिः

tatra sthāne tvayā dṛṣṭo deva vaitāniko vidhiḥ ādityasahito yatra pūjyate bhagavānhariḥ

उस स्थान में तुमने वह देव-यज्ञ की विधि देखी, हे देव, जहाँ आदित्य सहित भगवान हरि पूजे जाते थे।

श्लोक 24 (padma.6.31.24)

तद्भक्त्या च त्वया पत्न्या सह पुष्पार्चनं कृतम् । शेषैस्तु प्रकरस्तत्र कृतः पुष्पमयस्तथा

tadbhaktyā ca tvayā patnyā saha puṣpārcanaṁ kṛtam śeṣaistu prakarastatra kṛtaḥ puṣpamayastathā

उसके प्रति भक्ति से तुमने पत्नी सहित फूलों से अर्चना की; शेष फूलों से वहाँ एक फूल-समूह भी बनाया गया।

श्लोक 25 (padma.6.31.25)

तं दृष्ट्वा विस्मिता साह केनेहाभ्यर्चनं कृतम् । ज्ञात्वा तत्कर्मतत्सर्वं कृतं संरक्षणं तथा

taṁ dṛṣṭvā vismitā sāha kenehābhyarcanaṁ kṛtam jñātvā tatkarmatatsarvaṁ kṛtaṁ saṁrakṣaṇaṁ tathā

उसे देखकर वह विस्मित हुई — 'यहाँ यह अर्चना किसने की है?' तुम्हारे उस पूरे कर्म को, और उसके संरक्षण को जानकर,

श्लोक 26 (padma.6.31.26)

ततस्तुष्टा तु सा तुभ्यं ददौ वित्तं बहुस्वयम् । त्वया वित्तं नो गृहीतं भोजनायानुमंत्रितः

tatastuṣṭā tu sā tubhyaṁ dadau vittaṁ bahusvayam tvayā vittaṁ no gṛhītaṁ bhojanāyānumaṁtritaḥ

वह प्रसन्न होकर तुम्हें स्वयं बहुत सा धन देने लगी। भोजन के लिए बुलाए जाने पर भी तुमने वह धन नहीं लिया।

श्लोक 27 (padma.6.31.27)

न गृहीतं भोजनं च न च वित्तं त्वया तदा । आदित्यो विष्णुसंयुक्तः पूजितोऽसौ यथाविधि

na gṛhītaṁ bhojanaṁ ca na ca vittaṁ tvayā tadā ādityo viṣṇusaṁyuktaḥ pūjito'sau yathāvidhi

न भोजन लिया, न उस समय धन ही लिया; विष्णु सहित सूर्य की तुमने विधिपूर्वक पूजा की।

श्लोक 28 (padma.6.31.28)

ततः प्रभातसमये रक्षमाणस्तया सदा । विश्रंभयित्वा तान्सर्वान्निर्गतोऽसि यथेच्छया

tataḥ prabhātasamaye rakṣamāṇastayā sadā viśraṁbhayitvā tānsarvānnirgato'si yathecchayā

फिर प्रातःकाल के समय तक, उसके साथ सदा रक्षा करते हुए, उन सबको आश्वस्त करके तुम अपनी इच्छा से चले गए।

श्लोक 29 (padma.6.31.29)

तदेतदन्यजनुषि सुकृतं चार्जितं त्वया । पंचत्वं च त्वया प्राप्तं स्वीयकर्मानुयोगतः

tadetadanyajanuṣi sukṛtaṁ cārjitaṁ tvayā paṁcatvaṁ ca tvayā prāptaṁ svīyakarmānuyogataḥ

यही अन्य जन्म में तुम्हारे द्वारा अर्जित सुकृत है, और अपने ही कर्म के अनुसरण से तुमने मृत्यु प्राप्त की।

श्लोक 30 (padma.6.31.30)

तेन पुण्येन महता विमानमागमत्तदा । तत्फलं भुज्यते भूप पूर्वजन्मकृतं च यत्

tena puṇyena mahatā vimānamāgamattadā tatphalaṁ bhujyate bhūpa pūrvajanmakṛtaṁ ca yat

उसी महापुण्य से तब विमान आया; हे राजन्! वही फल भोगा जा रहा है, तथा पूर्व जन्म में किए गए कर्म का भी।'

श्लोक 31 (padma.6.31.31)

हरिश्चंद्र उवाच ।केनैव च विधानेन कस्मिन्मासे च सा तिथिः । कर्त्तव्या तन्ममाचक्ष्व अनुग्राह्योऽस्मि ते यदि

hariścaṁdra uvāca kenaiva ca vidhānena kasminmāse ca sā tithiḥ karttavyā tanmamācakṣva anugrāhyo'smi te yadi

हरिश्चंद्र ने कहा — 'किस विधि से और किस महीने में वह तिथि मनानी चाहिए, वह मुझे बताइए, यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ।'

श्लोक 32 (padma.6.31.32)

सनत्कुमार उवाच ।शृणुष्वावहितो राजन्कथ्यमानं मया तव । श्रावणस्य तु मासस्य कृष्णाष्टम्यां नराधिप

sanatkumāra uvāca śṛṇuṣvāvahito rājankathyamānaṁ mayā tava śrāvaṇasya tu māsasya kṛṣṇāṣṭamyāṁ narādhipa

सनत्कुमार ने कहा — 'हे राजन्! ध्यान से सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावण मास की कृष्ण अष्टमी को, हे नराधिप!

श्लोक 33 (padma.6.31.33)

रोहिणी यदि लभ्येत जयंती नाम सा तिथिः । भूयोभूयो महाराज भवेज्जन्मनि कारणम्

rohiṇī yadi labhyeta jayaṁtī nāma sā tithiḥ bhūyobhūyo mahārāja bhavejjanmani kāraṇam

यदि रोहिणी नक्षत्र मिल जाए, तो वह तिथि 'जयंती' कहलाती है; हे महाराज! यह बार-बार शुभ जन्म का कारण बनती है।

श्लोक 34 (padma.6.31.34)

विधानमस्या वक्ष्यामि यथोक्तं ब्रह्मणा मम । यत्कृत्वा मुक्तपापस्तु विष्णुलोकं प्रगच्छति

vidhānamasyā vakṣyāmi yathoktaṁ brahmaṇā mama yatkṛtvā muktapāpastu viṣṇulokaṁ pragacchati

इसकी विधि मैं बताऊँगा, जैसी ब्रह्मा ने मुझे बताई है, जिसे करके व्यक्ति पापमुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 35 (padma.6.31.35)

उपोषितस्ततः कृत्वा स्नानं कृष्णतिलैः सह । स्थापयेदव्रणं कुंभं पंचरत्नसमन्वितम्

upoṣitastataḥ kṛtvā snānaṁ kṛṣṇatilaiḥ saha sthāpayedavraṇaṁ kuṁbhaṁ paṁcaratnasamanvitam

उपवास करके, फिर काले तिलों सहित स्नान करके, पाँच रत्नों से युक्त एक अखंडित कलश स्थापित करना चाहिए —

श्लोक 36 (padma.6.31.36)

वज्रमौक्तिकवैडूर्य पुष्परागेंद्रनीलकम् । पंचरत्नं प्रशस्तं तु इति कात्यायनोऽब्रवीत्

vajramauktikavaiḍūrya puṣparāgeṁdranīlakam paṁcaratnaṁ praśastaṁ tu iti kātyāyano'bravīt

वज्र, मोती, वैडूर्य, पुष्पराग और इंद्रनील — यही श्रेष्ठ पंच-रत्न हैं, ऐसा कात्यायन ने कहा है।

श्लोक 37 (padma.6.31.37)

तस्योपरि न्यसेत्पात्रं सौवर्णं लक्षणान्वितम् । सौवर्णां विन्यसेत्तत्र यशोदां नंदगेहिनीम्

tasyopari nyasetpātraṁ sauvarṇaṁ lakṣaṇānvitam sauvarṇāṁ vinyasettatra yaśodāṁ naṁdagehinīm

उसके ऊपर उचित लक्षणों से युक्त एक सुवर्ण-पात्र रखना चाहिए; उसमें नंद की पत्नी सुवर्ण-यशोदा को स्थापित करना चाहिए,

श्लोक 38 (padma.6.31.38)

ददमानां तु पुत्रस्य स्तनं वै विस्मिताननाम् । पिबमानं स्तनं मातुरपरं पाणिना स्पृशत्

dadamānāṁ tu putrasya stanaṁ vai vismitānanām pibamānaṁ stanaṁ māturaparaṁ pāṇinā spṛśat

पुत्र को स्तन देती हुई, विस्मित मुख वाली, माता का स्तन पीते हुए बालक को, जो दूसरे हाथ से उसे स्पर्श कर रहा हो,

श्लोक 39 (padma.6.31.39)

आलोक्य मातरं प्रेम्णा सुखयंतं मुहुर्मुहुः । सौवर्णं कारयेद्देवं यावच्छक्तिश्च विद्यते

ālokya mātaraṁ premṇā sukhayaṁtaṁ muhurmuhuḥ sauvarṇaṁ kārayeddevaṁ yāvacchaktiśca vidyate

प्रेमपूर्वक माता को देखते हुए, उसे बार-बार सुख देते हुए — यह देव जितनी सामर्थ्य हो उतना सुवर्ण से बनवाना चाहिए।

श्लोक 40 (padma.6.31.40)

द्वि निष्कमात्रं कर्तव्यं यदि शक्तिश्च विद्यते । त्रिलोहेनैव कर्तव्यं सौवर्णेनाथवा पुनः

dvi niṣkamātraṁ kartavyaṁ yadi śaktiśca vidyate trilohenaiva kartavyaṁ sauvarṇenāthavā punaḥ

यदि सामर्थ्य हो तो कम से कम दो निष्क वजन का बनाना चाहिए; तीन धातुओं से भी बनाया जा सकता है, या फिर सुवर्ण से ही।

श्लोक 41 (padma.6.31.41)

तद्वच्च रोहिणीं कुर्यात्सौवर्णी राजतः शशी । अंगुष्ठमात्रस्तु शशी रोहिणी चतुरंगुला

tadvacca rohiṇīṁ kuryātsauvarṇī rājataḥ śaśī aṁguṣṭhamātrastu śaśī rohiṇī caturaṁgulā

वैसे ही रोहिणी चाँदी से और चंद्रमा सोने से बनाना चाहिए; चंद्रमा अँगूठे के बराबर और रोहिणी चार अंगुल की हो।

श्लोक 42 (padma.6.31.42)

कर्णयोः कुंडले दद्यात्कंठाभरणकं गले । एवं कृत्वा तु गोविंदं मात्रासार्द्धं जगत्पतिम्

karṇayoḥ kuṁḍale dadyātkaṁṭhābharaṇakaṁ gale evaṁ kṛtvā tu goviṁdaṁ mātrāsārddhaṁ jagatpatim

कानों में कुंडल और गले में कंठ-आभूषण देना चाहिए; इस प्रकार उचित माप के गोविंद, जगत्पति को बनवाकर,

श्लोक 43 (padma.6.31.43)

क्षीरादिस्नपनं कृत्वा चंदनेनानुलेपयेत् । श्वेतवस्त्रयुगच्छत्रं पुष्पमालोपशोभितम्

kṣīrādisnapanaṁ kṛtvā caṁdanenānulepayet śvetavastrayugacchatraṁ puṣpamālopaśobhitam

दूध आदि से स्नान कराकर चंदन का लेप करना चाहिए; श्वेत वस्त्र-युगल, छत्र और पुष्प-माला से सुशोभित करना चाहिए,

श्लोक 44 (padma.6.31.44)

नैवेद्यैर्विविधैर्भक्षैः फलैर्नानाविधैरपि । दीपं च कारयेत्तत्र पुष्पमंडपशोभितम्

naivedyairvividhairbhakṣaiḥ phalairnānāvidhairapi dīpaṁ ca kārayettatra puṣpamaṁḍapaśobhitam

विविध नैवेद्य, मिष्ठान्न और अनेक प्रकार के फलों से; वहाँ पुष्प-मंडप से सुशोभित एक दीप भी लगाना चाहिए।

श्लोक 45 (padma.6.31.45)

गीतं नृत्यं च वाद्यं च कारयेद्भक्तिमान्बुधैः । एवं कृत्वा विधानं तु यथाविभवसारतः । गुरुं संपूजयेत् पश्चात्पूजां तत्र समापयेत्

gītaṁ nṛtyaṁ ca vādyaṁ ca kārayedbhaktimānbudhaiḥ evaṁ kṛtvā vidhānaṁ tu yathāvibhavasārataḥ guruṁ saṁpūjayet paścātpūjāṁ tatra samāpayet

भक्तिमान विद्वानों द्वारा गीत, नृत्य और वाद्य कराने चाहिए। इस प्रकार अपनी सामर्थ्य और साधन के अनुसार विधि पूर्ण करके, फिर गुरु की पूजा करके पूजा को वहीं समाप्त करना चाहिए।

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