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उत्तर खण्ड · अध्याय 7

युद्ध में इन्द्र की पराजय

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (padma.6.7.1)

नारद उवाच ।ततो जालंधरः क्रुद्धः प्राह तं दैत्यसूदनम् । कपटेन बलं हत्वा क्व यास्यसि बलाधम

nārada uvāca tato jālaṁdharaḥ kruddhaḥ prāha taṁ daityasūdanam kapaṭena balaṁ hatvā kva yāsyasi balādhama

नारद ने कहा — तब क्रुद्ध जालंधर ने उस दैत्यसूदन (इंद्र) से कहा — 'छल से बल को मारकर अब कहाँ जाओगे, हे नीच बलशाली?'

श्लोक 2 (padma.6.7.2)

इत्युक्त्वा तं शतमखं सिंधुसूनुः प्रतापवान् । ससूताश्वध्वजरथं छादयामास मार्गणैः

ityuktvā taṁ śatamakhaṁ siṁdhusūnuḥ pratāpavān sasūtāśvadhvajarathaṁ chādayāmāsa mārgaṇaiḥ

यह कहकर प्रतापी सागर-पुत्र ने सारथि, घोड़ों, ध्वजा और रथ सहित उस शतमख (इंद्र) को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 3 (padma.6.7.3)

पपात मूर्च्छितः शक्रो रथोपरि शरैः क्षतः । दृष्ट्वा तं पतितं शक्रं जगर्जार्णवनंदनः

papāta mūrcchitaḥ śakro rathopari śaraiḥ kṣataḥ dṛṣṭvā taṁ patitaṁ śakraṁ jagarjārṇavanaṁdanaḥ

बाणों से घायल शक्र मूर्च्छित होकर रथ पर गिर पड़े; शक्र को गिरा देख सागर-पुत्र गरज उठा।

श्लोक 4 (padma.6.7.4)

मूर्च्छां त्यक्त्वा मुमोचेंद्रो वज्रं जालंधरं प्रति । तदाद्रिदलनं हस्ते गृहीत्वा सिंधुसंभवः

mūrcchāṁ tyaktvā mumoceṁdro vajraṁ jālaṁdharaṁ prati tadādridalanaṁ haste gṛhītvā siṁdhusaṁbhavaḥ

मूर्च्छा त्यागकर इंद्र ने जालंधर पर वज्र छोड़ा; तब सागर-पुत्र ने उस पर्वत-भेदक वज्र को हाथ से पकड़ लिया।

श्लोक 5 (padma.6.7.5)

वज्रं कक्षापुटे धृत्वा रथादुत्तीर्य सत्वरम् । अभ्यधावत दैत्येंद्रो देवेंद्रं धर्तुमाहवे

vajraṁ kakṣāpuṭe dhṛtvā rathāduttīrya satvaram abhyadhāvata daityeṁdro deveṁdraṁ dhartumāhave

वज्र को बगल में दबाकर, शीघ्रता से रथ से उतरकर, दैत्येंद्र देवेंद्र को पकड़ने के लिए युद्ध में दौड़ा।

श्लोक 6 (padma.6.7.6)

ततो दुद्राव मघवा रथं त्यक्त्वा हरिं स्मरन् । रथमिंद्रस्य मदवानारुह्यार्णवनंदनः

tato dudrāva maghavā rathaṁ tyaktvā hariṁ smaran rathamiṁdrasya madavānāruhyārṇavanaṁdanaḥ

तब माघवा रथ छोड़कर हरि का स्मरण करते हुए भाग गए; मदमत्त सागर-पुत्र इंद्र के रथ पर सवार हो गया।

श्लोक 7 (padma.6.7.7)

यंतारं मातलिं कृत्वा ययौ प्राप्तमनोरथः । रथमिंद्रस्य तरसा यत्र यत्र ययौ बले

yaṁtāraṁ mātaliṁ kṛtvā yayau prāptamanorathaḥ rathamiṁdrasya tarasā yatra yatra yayau bale

मातलि को सारथि बनाकर, अपनी इच्छा पूर्ण होने पर, वह वेगपूर्वक इंद्र के रथ को जहाँ-जहाँ बल था वहाँ ले गया।

श्लोक 8 (padma.6.7.8)

जालंधरो महाबाहुः स्वयं चांबुधरो यथा । ततः स कोपात्पुरुषोत्तमः स्वयं खड्गं समुद्यम्य च नंदकं रणे

jālaṁdharo mahābāhuḥ svayaṁ cāṁbudharo yathā tataḥ sa kopātpuruṣottamaḥ svayaṁ khaḍgaṁ samudyamya ca naṁdakaṁ raṇe

महाबाहु जालंधर स्वयं मानो जलधर (मेघ) के समान बढ़ा; तब क्रोध से पुरुषोत्तम (विष्णु) ने स्वयं युद्ध में अपनी नंदक तलवार उठा ली,

श्लोक 9 (padma.6.7.9)

संप्रेरयित्वा गरुडं मनोजवं जघान कोपेन च दैत्यवाहिनीम् । रथान्हयान्कुंजरपत्तिसंघान्स पातयामास बलात्सहस्रशः

saṁprerayitvā garuḍaṁ manojavaṁ jaghāna kopena ca daityavāhinīm rathānhayānkuṁjarapattisaṁghānsa pātayāmāsa balātsahasraśaḥ

और मन के समान वेगवान गरुड़ को भेजकर, क्रोधपूर्वक दैत्य-सेना पर आघात किया; उसने बलपूर्वक हज़ारों रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकों को गिरा दिया।

श्लोक 10 (padma.6.7.10)

जनार्दनः कश्यपसूनुसंवृतश्चकार संख्ये चरितं भयावहम् । केशास्थिमज्जारुधिरौघवाहिनीं पिशाचवेतालविहंगसेविताम्

janārdanaḥ kaśyapasūnusaṁvṛtaścakāra saṁkhye caritaṁ bhayāvaham keśāsthimajjārudhiraughavāhinīṁ piśācavetālavihaṁgasevitām

कश्यप-पुत्र (गरुड़) सहित जनार्दन ने उस युद्ध में एक भयावह दृश्य रच दिया — बाल, हड्डी, मज्जा और रक्त की धाराओं से बहती, पिशाच-वेताल-पक्षियों से सेवित नदी,

श्लोक 11 (padma.6.7.11)

करोरुजंघायुधशस्त्रपूरितां सुदुस्तरां व्याघ्रगजेंद्र सेविताम् । रक्तांत्रहारांगदभूषितांतां विघूर्णनेत्रोत्सवकांतिवाससम्

karorujaṁghāyudhaśastrapūritāṁ sudustarāṁ vyāghragajeṁdra sevitām raktāṁtrahārāṁgadabhūṣitāṁtāṁ vighūrṇanetrotsavakāṁtivāsasam

हाथ, जाँघ, टाँग, अस्त्र-शस्त्रों से भरी, अत्यंत दुस्तर, बाघ और गजराजों से सेवित, आँतों की मालाओं और भुजबंदों से सुसज्जित, घूमती आँखों की चमक ही जिसका उत्सव-वस्त्र था।

श्लोक 12 (padma.6.7.12)

विष्णुना निहतं सैन्यं दृष्ट्वा दानवपुंगवाः । जालंधराज्ञया सर्वे रुरुधुः परितो हरिम्

viṣṇunā nihataṁ sainyaṁ dṛṣṭvā dānavapuṁgavāḥ jālaṁdharājñayā sarve rurudhuḥ parito harim

विष्णु द्वारा नष्ट की गई सेना को देखकर दानव-श्रेष्ठों ने जालंधर की आज्ञा से सब मिलकर हरि को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 13 (padma.6.7.13)

दैत्यास्ते तत्र बाणौघान्वर्षमाणा यथांबुदाः । यथाद्विरेफाः कमलं पर्वतं जलदा इव

daityāste tatra bāṇaughānvarṣamāṇā yathāṁbudāḥ yathādvirephāḥ kamalaṁ parvataṁ jaladā iva

वे दैत्य वहाँ बाणों की झड़ी बरसाने लगे, जैसे बादल पर बादल, जैसे भँवरे कमल पर, जैसे बादल पर्वत पर,

श्लोक 14 (padma.6.7.14)

चूतं यथा पक्षिगणा गगनं धूपसंचयः । न दृश्योऽभूत्तदा विष्णुर्न तार्क्ष्यो रणसंकटे

cūtaṁ yathā pakṣigaṇā gaganaṁ dhūpasaṁcayaḥ na dṛśyo'bhūttadā viṣṇurna tārkṣyo raṇasaṁkaṭe

जैसे पक्षी-समूह आम के वृक्ष पर, जैसे धूप का धुआँ आकाश पर छा जाए — उस युद्ध की सघनता में तब न विष्णु दिखाई दिए, न गरुड़।

श्लोक 15 (padma.6.7.15)

सर्वे ते रथमारूढा सर्वशस्त्रैर्महासुराः । वैकुंठाधिपतिं जघ्नुर्गर्जंतो भीमनिस्वनैः

sarve te rathamārūḍhā sarvaśastrairmahāsurāḥ vaikuṁṭhādhipatiṁ jaghnurgarjaṁto bhīmanisvanaiḥ

वे सभी महादैत्य रथों पर सवार होकर, सभी अस्त्रों से, भयानक गर्जना करते हुए वैकुंठाधिपति (विष्णु) पर आघात करने लगे।

श्लोक 16 (padma.6.7.16)

तान्सर्वान्भीमरूपेण दैत्यारिः कुपितस्तदा । रणे निपातयामास वायुः पर्णचयं यथा

tānsarvānbhīmarūpeṇa daityāriḥ kupitastadā raṇe nipātayāmāsa vāyuḥ parṇacayaṁ yathā

तब दैत्यों के शत्रु ने क्रुद्ध होकर भयानक रूप में उन सबको युद्ध में गिरा दिया, जैसे वायु पत्तों के ढेर को उड़ा दे।

श्लोक 17 (padma.6.7.17)

शैलरोमा ततो विष्णुं दैत्यः कोपादधावत । हरेरपि शरास्तस्य शरीरे शीर्णतां गताः

śailaromā tato viṣṇuṁ daityaḥ kopādadhāvata harerapi śarāstasya śarīre śīrṇatāṁ gatāḥ

तब दैत्य शैलरोमा क्रोधपूर्वक विष्णु की ओर दौड़ा; उसके शरीर पर हरि के भी बाण चूर-चूर होकर बिखर गए।

श्लोक 18 (padma.6.7.18)

शैलरोमा च दैत्यारि शरीरं चाहनच्छरैः । हरिः खड्गं विनिर्धूय शिरस्तस्य जहार ह

śailaromā ca daityāri śarīraṁ cāhanaccharaiḥ hariḥ khaḍgaṁ vinirdhūya śirastasya jahāra ha

शैलरोमा ने भी उस दैत्य-शत्रु (विष्णु) के शरीर पर बाणों से आघात किया; हरि ने तलवार लहराकर उसका सिर काट डाला।

श्लोक 19 (padma.6.7.19)

छिन्ने शिरसि दैत्यस्य कबंधो विक्रमन्रणे । शैलरोमा भुजाभ्यां च तार्क्ष्यं जग्राह पक्षयोः

chinne śirasi daityasya kabaṁdho vikramanraṇe śailaromā bhujābhyāṁ ca tārkṣyaṁ jagrāha pakṣayoḥ

दैत्य का सिर कटने पर भी उसका धड़ युद्ध में पराक्रम दिखाता रहा; शैलरोमा ने अपनी दोनों भुजाओं से गरुड़ को उसके दोनों पंखों से पकड़ लिया।

श्लोक 20 (padma.6.7.20)

शिरश्चोत्पत्य तरसा विलग्नं स्कंधयोर्दृढम् । ततस्तत्रास्ययुद्धेन हृषीकेशोऽपि विस्मितः

śiraścotpatya tarasā vilagnaṁ skaṁdhayordṛḍham tatastatrāsyayuddhena hṛṣīkeśo'pi vismitaḥ

उछलकर वेगपूर्वक उसका कटा सिर फिर से उसके कंधों पर दृढ़ता से जुड़ गया; तब उस धड़-युद्ध को देखकर हृषीकेश भी विस्मित रह गए।

श्लोक 21 (padma.6.7.21)

शिरः संलग्नमालोक्य गरुडो न्यपतद्भुवि । पुनश्चोत्पत्य वेगेन शिरःस्थानं समाश्रयत्

śiraḥ saṁlagnamālokya garuḍo nyapatadbhuvi punaścotpatya vegena śiraḥsthānaṁ samāśrayat

सिर को फिर से जुड़ा हुआ देखकर गरुड़ पृथ्वी पर गिर पड़े; फिर वेगपूर्वक उठकर उन्होंने अपना स्थान (चेतना) पुनः प्राप्त कर लिया।

श्लोक 22 (padma.6.7.22)

शैलरोमा ततो विष्णुं जहार गरुडाद्बली । हरिर्जघ्ने तलेनाशु गतायुश्चापतद्भुवि

śailaromā tato viṣṇuṁ jahāra garuḍādbalī harirjaghne talenāśu gatāyuścāpatadbhuvi

तब बलवान शैलरोमा ने विष्णु को गरुड़ से छीन लिया; हरि ने तुरंत हथेली के प्रहार से उसे मार डाला, और वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 23 (padma.6.7.23)

ततो जालंधरः सूतं खड्गरोमाणमब्रवीत् । संप्रेषय रथं तत्र यत्र देवो जनार्दनः

tato jālaṁdharaḥ sūtaṁ khaḍgaromāṇamabravīt saṁpreṣaya rathaṁ tatra yatra devo janārdanaḥ

तब जालंधर ने अपने सारथि खड्गरोमा से कहा — 'रथ को वहाँ ले चलो, जहाँ देव जनार्दन हैं।'

श्लोक 24 (padma.6.7.24)

जालंधरस्य वचनात्खङ्गरोमानयद्रथम् । दृष्ट्वा तं पुरतो विष्णुमुवाचार्णवनंदनः

jālaṁdharasya vacanātkhaṅgaromānayadratham dṛṣṭvā taṁ purato viṣṇumuvācārṇavanaṁdanaḥ

जालंधर के वचन से खड्गरोमा रथ को वहाँ ले गया; सामने विष्णु को देखकर सागर-पुत्र ने कहा —

श्लोक 25 (padma.6.7.25)

निःशंकं जहि मां विष्णो नाहं त्वा हन्मि माधव । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः

niḥśaṁkaṁ jahi māṁ viṣṇo nāhaṁ tvā hanmi mādhava tasya tadvacanaṁ śrutvā krodhasaṁraktalocanaḥ

'हे विष्णु! निःशंक होकर मुझे मार दो, हे माधव! मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।' उसका यह वचन सुनकर, क्रोध से लाल आँखों वाले —

श्लोक 26 (padma.6.7.26)

नारायणः प्राणहरैः शरैरेनमपूरयत् । विष्णुना च विभिन्नांगोऽर्णवसूनुः प्रतापवान्

nārāyaṇaḥ prāṇaharaiḥ śarairenamapūrayat viṣṇunā ca vibhinnāṁgo'rṇavasūnuḥ pratāpavān

नारायण ने उसे प्राणघातक बाणों से भर दिया; विष्णु द्वारा अंग-अंग बिंधा हुआ भी प्रतापी सागर-पुत्र —

श्लोक 27 (padma.6.7.27)

हरिं संपूरयामास मार्गणौघैर्निरंतरम् । नारायणः प्राणहरैः शरैरेनमपूरयत्

hariṁ saṁpūrayāmāsa mārgaṇaughairniraṁtaram nārāyaṇaḥ prāṇaharaiḥ śarairenamapūrayat

निरंतर बाणों की झड़ी से हरि को भरता रहा; नारायण भी उसे प्राणघातक बाणों से भरते रहे।

श्लोक 28 (padma.6.7.28)

गरुडं पतितं दृष्ट्वासिंधुसूनोः शरैर्भुवि । रथं संस्मारयामास वैकुंठस्थं जनार्दनः

garuḍaṁ patitaṁ dṛṣṭvāsiṁdhusūnoḥ śarairbhuvi rathaṁ saṁsmārayāmāsa vaikuṁṭhasthaṁ janārdanaḥ

सागर-पुत्र के बाणों से गरुड़ को पृथ्वी पर गिरा देख, जनार्दन ने वैकुंठ में खड़े अपने रथ का स्मरण किया।

श्लोक 29 (padma.6.7.29)

सरथस्तस्य संप्राप्तः सूतहीनो हयैर्वृतः । अश्वैर्युतं रथं दृष्ट्वा विस्मितो भगवान्रणे

sarathastasya saṁprāptaḥ sūtahīno hayairvṛtaḥ aśvairyutaṁ rathaṁ dṛṣṭvā vismito bhagavānraṇe

वह रथ, सारथि रहित पर घोड़ों से युक्त, स्वयं उनके पास आ पहुँचा; बिना सारथि के आए उस रथ को देखकर भगवान युद्ध में विस्मित हुए।

श्लोक 30 (padma.6.7.30)

संबोधयित्वा गरुडं सारथ्ये समयोजयत् । स धृत्वा मुकुटं मूर्ध्नि कौस्तुभं हृदये मणिम्

saṁbodhayitvā garuḍaṁ sārathye samayojayat sa dhṛtvā mukuṭaṁ mūrdhni kaustubhaṁ hṛdaye maṇim

गरुड़ को जगाकर उन्होंने उसे सारथि नियुक्त किया; सिर पर मुकुट और वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि धारण करके,

श्लोक 31 (padma.6.7.31)

पुरुषार्थान्हयान्कृत्वा ययौ जालंधरं हरिः । मेदिनीं रथचक्रेण दारयंश्च सुरैः सह

puruṣārthānhayānkṛtvā yayau jālaṁdharaṁ hariḥ medinīṁ rathacakreṇa dārayaṁśca suraiḥ saha

घोड़ों को स्वयं पुरुषार्थ का रूप बनाकर, हरि देवताओं सहित रथ के पहियों से पृथ्वी को चीरते हुए जालंधर की ओर गया।

श्लोक 32 (padma.6.7.32)

जघान तरसा बाणैर्दानवानां च वाहिनीम् । देवराजेन संदिष्टो वीतिहोत्रो रणांगणे

jaghāna tarasā bāṇairdānavānāṁ ca vāhinīm devarājena saṁdiṣṭo vītihotro raṇāṁgaṇe

देवराज की आज्ञा पाकर वीतिहोत्र (अग्नि) ने युद्ध-भूमि में बलपूर्वक बाणों से दानव-सेना को शीघ्र नष्ट कर डाला,

श्लोक 33 (padma.6.7.33)

ददाह दानवानीकं समीरणसमन्वितम् । तदाह तं भगवता दैत्यसैन्यं सुरैः सह

dadāha dānavānīkaṁ samīraṇasamanvitam tadāha taṁ bhagavatā daityasainyaṁ suraiḥ saha

और वायु के सहयोग से दानव-सेना को भस्म कर डाला; तब भगवान की सहायता से देवताओं सहित उस अग्नि ने दैत्य-सेना को जला दिया।

श्लोक 34 (padma.6.7.34)

जालंधरः स्वल्पशेषं दध्यौ दृष्ट्वा बलं स्वकम् । अथाह भार्गवं राजा मत्सैन्यं निहतं सुरैः

jālaṁdharaḥ svalpaśeṣaṁ dadhyau dṛṣṭvā balaṁ svakam athāha bhārgavaṁ rājā matsainyaṁ nihataṁ suraiḥ

अपनी सेना को अत्यल्प शेष देख जालंधर चिंतित हो गया; तब राजा ने भार्गव से कहा — 'देवताओं ने मेरी सेना का नाश कर दिया है।

श्लोक 35 (padma.6.7.35)

त्वयि तिष्ठति मंत्रज्ञे विख्यातो विद्यया भवान् । किं तया विद्यया ब्रह्मन्क्षत्रेणाथ बलेन च

tvayi tiṣṭhati maṁtrajñe vikhyāto vidyayā bhavān kiṁ tayā vidyayā brahmankṣatreṇātha balena ca

आपके होते हुए, हे मंत्रज्ञ, विद्या से विख्यात हे ब्रह्मन्! उस विद्या से, क्षत्रिय-बल से भला क्या लाभ,

श्लोक 36 (padma.6.7.36)

या न रक्षति रोगार्तान्यद्बलं शरणागतान् । जालंधरवचः श्रुत्वा भार्गवस्तमभाषत

yā na rakṣati rogārtānyadbalaṁ śaraṇāgatān jālaṁdharavacaḥ śrutvā bhārgavastamabhāṣata

जो रोगियों और शरणागतों की रक्षा नहीं करता?' जालंधर के वचन सुनकर भार्गव ने उससे कहा —

श्लोक 37 (padma.6.7.37)

पश्य राजन्मम बलं ब्राह्मणस्य रणांगणे । इत्युक्त्वा वारिणा स्पृष्टा हुंकारेण प्रबोधिताः

paśya rājanmama balaṁ brāhmaṇasya raṇāṁgaṇe ityuktvā vāriṇā spṛṣṭā huṁkāreṇa prabodhitāḥ

'हे राजन्! देखो, युद्ध-भूमि में मेरा — एक ब्राह्मण का — बल।' यह कहकर उसने जल छूकर 'हुं' शब्द से उन्हें जगाया,

श्लोक 38 (padma.6.7.38)

उत्थापितास्ते कविना शरौघैः प्राणहारकैः । देवाहता रणे पेतुः समंतात्सिंधुसूनुना

utthāpitāste kavinā śaraughaiḥ prāṇahārakaiḥ devāhatā raṇe petuḥ samaṁtātsiṁdhusūnunā

और उन्हें उठा दिया, प्राणघातक बाणों से चूर, देवताओं द्वारा मारे गए वे भी सागर-पुत्र के आस-पास फिर से गिरे।

श्लोक 39 (padma.6.7.39)

बाणैर्जर्जरदेहास्ते धृतप्राणा नराधिप । न मृतास्त्वमरत्वाच्च बाणैर्भिन्नाश्च सत्तम

bāṇairjarjaradehāste dhṛtaprāṇā narādhipa na mṛtāstvamaratvācca bāṇairbhinnāśca sattama

हे राजन्! बाणों से जर्जर देह वाले वे प्राण धारण किए रहे; हे उत्तम! अमरत्व के कारण बाणों से बिंधकर भी वे मरे नहीं।

श्लोक 40 (padma.6.7.40)

ततो नारायणो देवो बृहस्पतिमभाषत । धिग्बलं दैवतगुरो यो न जीवयसे सुरान्

tato nārāyaṇo devo bṛhaspatimabhāṣata dhigbalaṁ daivataguro yo na jīvayase surān

तब देव नारायण ने बृहस्पति से कहा — 'हे देवगुरु! धिक्कार है आपके बल को, जो आप देवताओं को जीवित नहीं करते!'

श्लोक 41 (padma.6.7.41)

धिषणस्तु जगन्नाथमुवाच त्वरितं तदा । ओषधीभिरहं स्वामिन्जीवयिष्यामि निर्जरान्

dhiṣaṇastu jagannāthamuvāca tvaritaṁ tadā oṣadhībhirahaṁ svāminjīvayiṣyāmi nirjarān

तब धिषण (बृहस्पति) ने तुरंत जगन्नाथ से कहा — 'हे स्वामी! मैं औषधियों से देवताओं को जीवित करूँगा।'

श्लोक 42 (padma.6.7.42)

इत्युक्त्वा धिषणः सोऽपि ययौ क्षीरार्णवस्थितम् । द्रोणमद्रिं तदा गत्वा सुखं गृह्यौषधीः स्वयम्

ityuktvā dhiṣaṇaḥ so'pi yayau kṣīrārṇavasthitam droṇamadriṁ tadā gatvā sukhaṁ gṛhyauṣadhīḥ svayam

यह कहकर धिषण क्षीरसागर में स्थित द्रोण पर्वत पर गया; वहाँ जाकर उसने सुखपूर्वक स्वयं ही औषधियाँ ले लीं,

श्लोक 43 (padma.6.7.43)

गुरुस्तासां च योगेन जीवयामास निर्जरान् । उत्थितास्ते ततो देवा जघ्नुर्दानववाहिनीम्

gurustāsāṁ ca yogena jīvayāmāsa nirjarān utthitāste tato devā jaghnurdānavavāhinīm

और गुरु ने उनके प्रयोग से देवताओं को जीवित कर दिया; तब उठे हुए वे देवता दानव-सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 44 (padma.6.7.44)

देवान्समुत्थितान्दृष्ट्वा बभाषे सिंधुजः कविम् । विना त्वद्विद्यया काव्य कथमेते समुत्थिताः

devānsamutthitāndṛṣṭvā babhāṣe siṁdhujaḥ kavim vinā tvadvidyayā kāvya kathamete samutthitāḥ

देवताओं को फिर से उठा हुआ देखकर सागर-पुत्र ने शुक्राचार्य से कहा — 'हे कवि! तुम्हारी विद्या के बिना ये कैसे उठ गए?'

श्लोक 45 (padma.6.7.45)

इति दैत्योक्तमाकर्ण्य शुक्रः प्राहार्णवात्मजम् । क्षीरसागरमध्यस्थो द्रोणोनाम महागिरिः

iti daityoktamākarṇya śukraḥ prāhārṇavātmajam kṣīrasāgaramadhyastho droṇonāma mahāgiriḥ

दैत्य की यह बात सुनकर शुक्राचार्य ने सागर-पुत्र से कहा — 'क्षीरसागर के बीच द्रोण नामक एक महान पर्वत है।

श्लोक 46 (padma.6.7.46)

औषध्यस्तत्र तिष्ठंति जीवयंति च या मृतान् । तत्र गत्वा सुराचार्यो गृहीत्वोषधिसंचयम्

auṣadhyastatra tiṣṭhaṁti jīvayaṁti ca yā mṛtān tatra gatvā surācāryo gṛhītvoṣadhisaṁcayam

वहाँ ऐसी औषधियाँ हैं जो मृतकों को भी जीवित कर देती हैं; वहाँ जाकर देवाचार्य (बृहस्पति) ने औषधियों का संग्रह लेकर —

श्लोक 47 (padma.6.7.47)

रणे विनिहतान्देवानुत्थापयति मंत्रतः । भार्गवोक्तमथाकर्ण्य सैन्यभारं महाबलः

raṇe vinihatāndevānutthāpayati maṁtrataḥ bhārgavoktamathākarṇya sainyabhāraṁ mahābalaḥ

युद्ध में मारे गए देवताओं को मंत्र से उठा दिया है।' भार्गव के इस कथन को सुनकर, महाबली जालंधर ने सेना का भार —

श्लोक 48 (padma.6.7.48)

शुंभे निक्षिप्य तरसा ययौ जालंधरोऽर्णवम् । अथ प्रविष्टः क्षीराब्धौ वेश्मदिव्यं महाप्रभम्

śuṁbhe nikṣipya tarasā yayau jālaṁdharo'rṇavam atha praviṣṭaḥ kṣīrābdhau veśmadivyaṁ mahāprabham

शीघ्र ही शुंभ को सौंपकर सागर की ओर चला गया; फिर वह क्षीरसागर के भीतर उस दिव्य, महाप्रभावाले भवन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 49 (padma.6.7.49)

प्रविश्य तत्र क्षीराब्धेः क्रीडास्थानं ददर्श सः । नोष्णो न शीतलो वायुर्न तमो यत्र दृश्यते

praviśya tatra kṣīrābdheḥ krīḍāsthānaṁ dadarśa saḥ noṣṇo na śītalo vāyurna tamo yatra dṛśyate

वहाँ प्रवेश करके उसने क्षीरसागर के क्रीड़ा-स्थान को देखा, जहाँ वायु न गर्म थी न शीतल, जहाँ अंधकार कहीं दिखाई नहीं देता था,

श्लोक 50 (padma.6.7.50)

यत्र गायंति नृत्यंति क्रीडंति च वरस्त्रियः । सुपीनस्तनभाराढ्याः कृशोदर्यः सुदंतिकाः

yatra gāyaṁti nṛtyaṁti krīḍaṁti ca varastriyaḥ supīnastanabhārāḍhyāḥ kṛśodaryaḥ sudaṁtikāḥ

जहाँ श्रेष्ठ स्त्रियाँ गाती, नाचती और क्रीड़ा करती थीं — भरे हुए वक्षस्थलों वाली, पतली कमर वाली, सुंदर दाँतों वाली,

श्लोक 51 (padma.6.7.51)

नेत्रविभ्रमविक्षेपैर्नितंबपरिवर्त्तनैः । अंगैः संमोहनै रम्यैर्बाहुवल्लीविचालनैः

netravibhramavikṣepairnitaṁbaparivarttanaiḥ aṁgaiḥ saṁmohanai ramyairbāhuvallīvicālanaiḥ

अपने नेत्रों की चंचल चितवन से, नितंबों की हलचल से, मोहक और मनोहर अंगों से, बेल-सी भुजाओं के संचालन से,

श्लोक 52 (padma.6.7.52)

पादविन्यासरणि तैर्मधुरैर्वचनस्तवैः । सौगंध्यसौख्यदैर्वासैर्नेत्रभ्रमरहुंकृतैः

pādavinyāsaraṇi tairmadhurairvacanastavaiḥ saugaṁdhyasaukhyadairvāsairnetrabhramarahuṁkṛtaiḥ

पदों की चाल की मधुरता से, मीठी स्तुति-वाणी से, सुगंधित और सुखद वस्त्रों से, नेत्रों पर मँडराते भँवरों की गुंजार से,

श्लोक 53 (padma.6.7.53)

चामरांदोललीलाभिः स्रग्भिः स्मितविलोकितैः। सेवां चक्रुर्विलासिन्यस्तत्र सुतः।।

cāmarāṁdolalīlābhiḥ sragbhiḥ smitavilokitaiḥ sevāṁ cakrurvilāsinyastatra sutaḥ

चँवरों के झूलने की क्रीड़ा से, माला से, मुस्कुराती चितवन से — उन विलासिनी स्त्रियों ने वहाँ सेवा की; उधर सागर-पुत्र —

श्लोक 54 (padma.6.7.54)

। क्रीडंतं तत्र दुग्धाब्धिं संवीक्ष्य समरोत्सुकः। अथाह प्रणिपत्यासौ क्षीराब्धिं तात हंसि माम्। द्रोणाचलौषधीर्व्याजादंबुभिः प्लावयस्वतः

krīḍaṁtaṁ tatra dugdhābdhiṁ saṁvīkṣya samarotsukaḥ athāha praṇipatyāsau kṣīrābdhiṁ tāta haṁsi mām droṇācalauṣadhīrvyājādaṁbubhiḥ plāvayasvataḥ

...वहाँ क्रीड़ा करते हुए क्षीरसागर को देखकर, युद्ध के लिए उत्सुक जालंधर ने प्रणाम करके कहा — 'हे तात! आप मुझे मार डालिए। द्रोणाचल की औषधियों के बहाने अपने जल से उसे बहा दीजिए।'

श्लोक 55 (padma.6.7.55)

क्षीरसागर उवाच । तं प्राप्तं शरणं पुत्र प्लावयाम्यूर्मिभिः कथम् । मुनींद्रास्तं न शंसंति यस्त्यजेच्छरणागतम्

kṣīrasāgara uvāca taṁ prāptaṁ śaraṇaṁ putra plāvayāmyūrmibhiḥ katham munīṁdrāstaṁ na śaṁsaṁti yastyajeccharaṇāgatam

क्षीरसागर ने कहा — 'हे पुत्र! जो शरण में आया है, उसे मैं अपनी लहरों से कैसे बहा दूँ? महर्षिजन उसकी प्रशंसा नहीं करते जो शरणागत को त्याग दे।'

श्लोक 56 (padma.6.7.56)

पितृव्यवचनं श्रुत्वा संक्रोधात्संततं गिरिम् । तलप्रहरणेनैव ताडयामास दैत्यराट्

pitṛvyavacanaṁ śrutvā saṁkrodhātsaṁtataṁ girim talapraharaṇenaiva tāḍayāmāsa daityarāṭ

चाचा के इस वचन को सुनकर, अत्यंत क्रोध से दैत्यराज ने उस पर्वत को केवल हथेली के प्रहार से बार-बार पीटा।

श्लोक 57 (padma.6.7.57)

ततो द्रोणगिरी राजन्भीतो जालंधराद्भृशम् । अथाजगाम रूपेण प्राह जालंधरं प्रति

tato droṇagirī rājanbhīto jālaṁdharādbhṛśam athājagāma rūpeṇa prāha jālaṁdharaṁ prati

हे राजन्! तब द्रोणगिरि जालंधर से अत्यंत भयभीत हो उठा, और साकार रूप में आकर जालंधर से कहा —

श्लोक 58 (padma.6.7.58)

तवाहमभवं दासो रक्ष मां शरणागतम् । रसातलं महाबाहो यास्यामि तव शासनात्

tavāhamabhavaṁ dāso rakṣa māṁ śaraṇāgatam rasātalaṁ mahābāho yāsyāmi tava śāsanāt

'मैं आपका दास हो गया; शरणागत मुझे बचाइए। हे महाबाहो! आपकी आज्ञा से मैं रसातल चला जाऊँगा।

श्लोक 59 (padma.6.7.59)

यावत्त्वं कुरुषे राज्यं तावत्स्थास्याम्यहं प्रभो । ओषधीनां विरावेण सिद्धानां रोदनेन च

yāvattvaṁ kuruṣe rājyaṁ tāvatsthāsyāmyahaṁ prabho oṣadhīnāṁ virāveṇa siddhānāṁ rodanena ca

जब तक आप राज्य करेंगे, हे प्रभो, मैं तब तक वहीं ठहरा रहूँगा' — औषधियों के चीत्कार और सिद्धों के रुदन के बीच —

श्लोक 60 (padma.6.7.60)

रसातलं जगामाद्रिः सिंधुसूनोः प्रपश्यतः । ततो जालंधरो वीर आजगाम महारणम्

rasātalaṁ jagāmādriḥ siṁdhusūnoḥ prapaśyataḥ tato jālaṁdharo vīra ājagāma mahāraṇam

वह पर्वत सागर-पुत्र के देखते-देखते रसातल में चला गया। फिर वीर जालंधर महासंग्राम में लौट आया।

श्लोक 61 (padma.6.7.61)

पूर्वकल्पितमारुह्य रथस्थं केशवं ययौ । रथस्थं माधवं दृष्ट्वा जहासोच्चैर्नदीसुतः

pūrvakalpitamāruhya rathasthaṁ keśavaṁ yayau rathasthaṁ mādhavaṁ dṛṣṭvā jahāsoccairnadīsutaḥ

पहले से तैयार अपने रथ पर सवार होकर वह रथस्थ केशव की ओर गया; रथ में बैठे माधव को देखकर नदी-पुत्र (जालंधर) ज़ोर से हँस पड़ा।

श्लोक 62 (padma.6.7.62)

तावत्त्वं तिष्ठ शकटे यावद्धन्यामरीनहम् । एवमुक्त्वा जघानाशु शरैस्तां देववाहिनीम्

tāvattvaṁ tiṣṭha śakaṭe yāvaddhanyāmarīnaham evamuktvā jaghānāśu śaraistāṁ devavāhinīm

'तब तक तुम अपने रथ में ही ठहरो, जब तक मैं अपने शत्रुओं को न मार दूँ' — यह कहकर उसने शीघ्र ही उस देव-सेना को बाणों से मार डाला।

श्लोक 63 (padma.6.7.63)

बाणैर्विदारिता देवास्त्राहीत्यूचुर्बृहस्पतिम् । ततो बृहस्पतिः शीघ्रमगमत्क्षीरसागरम्

bāṇairvidāritā devāstrāhītyūcurbṛhaspatim tato bṛhaspatiḥ śīghramagamatkṣīrasāgaram

बाणों से घायल देवताओं ने बृहस्पति से पुकारा — 'बचाओ!' तब बृहस्पति शीघ्र ही क्षीरसागर की ओर गए।

श्लोक 64 (padma.6.7.64)

अदृष्ट्वा तं ततो द्रोणमभूच्चिन्तापरो नृप । अथागत्य रणं तूर्णममरान्प्राह गीष्पतिः

adṛṣṭvā taṁ tato droṇamabhūccintāparo nṛpa athāgatya raṇaṁ tūrṇamamarānprāha gīṣpatiḥ

हे राजन्! वहाँ द्रोण को न पाकर वे चिंतित हो उठे; फिर शीघ्र युद्ध-भूमि में लौटकर गीष्पति (बृहस्पति) ने देवताओं से कहा —

श्लोक 65 (padma.6.7.65)

पलायध्वं सुराः सर्वे द्रोणाद्रिः क्षयमागतः । एवमुक्तवतस्तस्य गुरोश्चिच्छेद सिंधुजः

palāyadhvaṁ surāḥ sarve droṇādriḥ kṣayamāgataḥ evamuktavatastasya gurościccheda siṁdhujaḥ

'भागो, हे सब देवताओ! द्रोणगिरि नष्ट हो चुका है!' उसके ऐसा कहते ही सागर-पुत्र ने —

श्लोक 66 (padma.6.7.66)

यज्ञोपवीतं केशांश्च बाणैस्तीक्ष्णैर्हसन्सुरान् । ततो दुद्राव वेगेन गुरुः प्राणभयार्दितः

yajñopavītaṁ keśāṁśca bāṇaistīkṣṇairhasansurān tato dudrāva vegena guruḥ prāṇabhayārditaḥ

तीक्ष्ण बाणों से उसका यज्ञोपवीत और केश काट डाले, देवताओं का उपहास करते हुए; तब गुरु प्राण-भय से पीड़ित होकर वेगपूर्वक भाग निकले।

श्लोक 67 (padma.6.7.67)

देवाः सर्वे रणं हित्वा पलायांचक्रिरे नृप । एवं विद्राव्य देवान्वै जनार्द्दनमधावत

devāḥ sarve raṇaṁ hitvā palāyāṁcakrire nṛpa evaṁ vidrāvya devānvai janārddanamadhāvata

हे राजन्! सभी देवता युद्ध छोड़कर भाग निकले; इस प्रकार देवताओं को भगाकर वह जनार्दन की ओर दौड़ा।

श्लोक 68 (padma.6.7.68)

हृषीकेशोऽपि दैत्येशमन्वधावद्रणोत्सुकः । ततो युद्धमभूद्धोरं विष्णोर्जालंधरस्य च

hṛṣīkeśo'pi daityeśamanvadhāvadraṇotsukaḥ tato yuddhamabhūddhoraṁ viṣṇorjālaṁdharasya ca

युद्ध के लिए उत्सुक हृषीकेश भी दैत्येश का पीछा करने लगे; तब विष्णु और जालंधर के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 69 (padma.6.7.69)

दुर्द्धर्षणो बाणजालैः प्लावयामास केशवम् । तान्बाणान्खंडशः कृत्वा पूरयित्वा शरैर्महान्

durddharṣaṇo bāṇajālaiḥ plāvayāmāsa keśavam tānbāṇānkhaṁḍaśaḥ kṛtvā pūrayitvā śarairmahān

दुर्धर्ष जालंधर ने बाणों की झड़ी से केशव को बहा दिया; उन बाणों को टुकड़े-टुकड़े कर, अपने ही बड़े बाणों से भरकर —

श्लोक 70 (padma.6.7.70)

वासुदेवोसुरं बाणैर्जालंधरमपीडयत् । जालंधरो रथं त्यक्त्वा शरपीडितविग्रहः

vāsudevosuraṁ bāṇairjālaṁdharamapīḍayat jālaṁdharo rathaṁ tyaktvā śarapīḍitavigrahaḥ

वासुदेव ने असुर जालंधर को बाणों से पीड़ित किया; जालंधर रथ छोड़कर, बाणों से घायल शरीर लिए —

श्लोक 71 (padma.6.7.71)

विष्णुं विजेतुं दुद्राव संयतिस्थमथ द्रुतम् । तमायांतं रणे दृष्ट्वा हरिर्विव्याध सायकैः

viṣṇuṁ vijetuṁ dudrāva saṁyatisthamatha drutam tamāyāṁtaṁ raṇe dṛṣṭvā harirvivyādha sāyakaiḥ

विष्णु को जीतने के लिए युद्ध-स्थल में डटे उनकी ओर वेगपूर्वक दौड़ा; उसे युद्ध में आते देखकर हरि ने बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 72 (padma.6.7.72)

बाणानंगेसहद्विष्णोः प्राप्तोऽसौ रथसंनिधौ । हस्तेनैकेन गरुडं द्वितीयेन रथं हरेः

bāṇānaṁgesahadviṣṇoḥ prāpto'sau rathasaṁnidhau hastenaikena garuḍaṁ dvitīyena rathaṁ hareḥ

अपने शरीर पर वे बाण सहते हुए वह विष्णु के रथ के समीप पहुँच गया; एक हाथ से गरुड़ को और दूसरे से हरि के रथ को पकड़कर —

श्लोक 73 (padma.6.7.73)

भ्रामयित्वांबरे शश्वत्श्वेतद्वीपे न्यपातयत् । जालंधरकरक्षिप्तो गरुडोऽपि पपात ह

bhrāmayitvāṁbare śaśvatśvetadvīpe nyapātayat jālaṁdharakarakṣipto garuḍo'pi papāta ha

उन्हें आकाश में बार-बार घुमाकर श्वेतद्वीप में फेंक दिया; जालंधर के हाथ से फेंके गए गरुड़ भी वहीं गिर पड़े।

श्लोक 74 (padma.6.7.74)

क्रौंचद्वीपे स तत्रैव विश्राममकरोच्चिरम् । अच्युतः प्रच्युतस्तस्माद्भ्रमतो रथमंडलात्

krauṁcadvīpe sa tatraiva viśrāmamakarocciram acyutaḥ pracyutastasmādbhramato rathamaṁḍalāt

वे क्रौंच-द्वीप में ही लंबे समय तक विश्राम करते रहे; रथ-चक्र से घूमकर छिटके अच्युत (विष्णु) —

श्लोक 75 (padma.6.7.75)

रणमागत्य दैत्येशं तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत । दृष्ट्वा तमागतं भूयः केशवं समरप्रियः

raṇamāgatya daityeśaṁ tiṣṭhatiṣṭhetyabhāṣata dṛṣṭvā tamāgataṁ bhūyaḥ keśavaṁ samarapriyaḥ

युद्ध-भूमि में लौट आए और दैत्येश से बोले — 'ठहरो, ठहरो!' युद्धप्रिय जालंधर ने केशव को फिर से आया देखकर —

श्लोक 76 (padma.6.7.76)

पूरयन्मार्गणैर्भूमिं जगर्जार्णवनंदनः

pūrayanmārgaṇairbhūmiṁ jagarjārṇavanaṁdanaḥ

पृथ्वी को बाणों से भरते हुए सागर-पुत्र गरज उठा।

श्लोक 77 (padma.6.7.77)

विव्याध दैत्यं हरिराशु शक्त्या हृदि स्फुरंत्या स ततः पपात । सूतो न यत्तं समरान्निवासं तं प्राह रे केन कृतोस्म्यलज्जः

vivyādha daityaṁ harirāśu śaktyā hṛdi sphuraṁtyā sa tataḥ papāta sūto na yattaṁ samarānnivāsaṁ taṁ prāha re kena kṛtosmyalajjaḥ

हरि ने शीघ्र ही उस दैत्य को हृदय में चमकती शक्ति से बींध दिया, और वह गिर पड़ा; उसका सारथि, उसे युद्ध-भूमि से लौटता न देख, बोल उठा — 'अरे! किसने मुझे इस प्रकार निर्लज्ज बना दिया?'

श्लोक 78 (padma.6.7.78)

दैत्यारि जालंधरयोर्महत्तदा बभूव युद्धं धरणीतलस्थयोः । प्रेम्णा श्रियस्तं न जघान दानवं स्वयं हरिस्तस्य शरैः पपात

daityāri jālaṁdharayormahattadā babhūva yuddhaṁ dharaṇītalasthayoḥ premṇā śriyastaṁ na jaghāna dānavaṁ svayaṁ haristasya śaraiḥ papāta

तब पृथ्वी पर खड़े हुए दैत्य-शत्रु (विष्णु) और जालंधर के बीच महायुद्ध हुआ; श्री (लक्ष्मी) के प्रेम के कारण उन्होंने उस दानव को नहीं मारा, बल्कि स्वयं हरि ही उसके बाणों से गिर पड़े।

श्लोक 79 (padma.6.7.79)

ततो निरीक्ष्य गोविंदं पतितं धरणीतले । प्रगृह्यार्णवजो दैत्य आरुरोह निजं रथम् । ततस्तमिंदिरा प्राप्ता रुदंती विष्णुवल्लभा

tato nirīkṣya goviṁdaṁ patitaṁ dharaṇītale pragṛhyārṇavajo daitya āruroha nijaṁ ratham tatastamiṁdirā prāptā rudaṁtī viṣṇuvallabhā

तब गोविंद को पृथ्वी पर गिरा देखकर, सागर-पुत्र दैत्य उन्हें पकड़कर अपने रथ पर चढ़ा ले गया; तभी विष्णु की प्रिया इंदिरा (लक्ष्मी) रोती हुई वहाँ आ पहुँचीं।

श्लोक 80 (padma.6.7.80)

संस्थिता कमला तत्र पतिं कमललोचनम् । पतितं तु पतिं वीक्ष्य लक्ष्मीः प्राहार्णवात्मजम्

saṁsthitā kamalā tatra patiṁ kamalalocanam patitaṁ tu patiṁ vīkṣya lakṣmīḥ prāhārṇavātmajam

कमला (लक्ष्मी) वहाँ अपने कमल-नयन पति को देखकर खड़ी हो गईं; अपने पति को गिरा देख लक्ष्मी ने सागर-पुत्र से कहा —

श्लोक 81 (padma.6.7.81)

शृणुष्व वचनं भ्रातर्जितो विष्णुर्धृतस्त्वया । भगिन्या न च वैधव्यं दातुं युक्तं महाबल

śṛṇuṣva vacanaṁ bhrātarjito viṣṇurdhṛtastvayā bhaginyā na ca vaidhavyaṁ dātuṁ yuktaṁ mahābala

'हे भाई! मेरी बात सुनो — तुमने विष्णु को जीतकर पकड़ लिया है; परंतु हे महाबली! अपनी बहन को विधवा बनाना उचित नहीं है।'

श्लोक 82 (padma.6.7.82)

श्रुत्वा तु वचनं तस्या मुमोच जगतः पतिम् । जालंधरो महाबाहुः स्वस्रे भक्त्या ननाम च

śrutvā tu vacanaṁ tasyā mumoca jagataḥ patim jālaṁdharo mahābāhuḥ svasre bhaktyā nanāma ca

उसकी बात सुनकर महाबाहु जालंधर ने जगत के स्वामी को छोड़ दिया, और अपनी बहन को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।

श्लोक 83 (padma.6.7.83)

ववंदे चरणौ विष्णोः स्वसुः स्नेहात्तदांजसा । विष्णुर्जालंधरं प्राह तुष्टोऽस्मि तव कर्मणा । वरं वरय दैत्येश किं प्रयच्छामि ते वरम्

vavaṁde caraṇau viṣṇoḥ svasuḥ snehāttadāṁjasā viṣṇurjālaṁdharaṁ prāha tuṣṭo'smi tava karmaṇā varaṁ varaya daityeśa kiṁ prayacchāmi te varam

बहन के स्नेह से उसने उसी क्षण सच्चे मन से विष्णु के चरणों की भी वंदना की; विष्णु ने जालंधर से कहा — 'मैं तुम्हारे इस कर्म से प्रसन्न हूँ; हे दैत्येश! वर माँगो, मैं तुम्हें क्या वर दूँ?'

श्लोक 84 (padma.6.7.84)

जालंधर उवाच । यदि त्वं मम तुष्टोऽसि शौर्येणानेन केशव । स्थातव्यं मत्पितुः स्थाने त्वया कमलया सह

jālaṁdhara uvāca yadi tvaṁ mama tuṣṭo'si śauryeṇānena keśava sthātavyaṁ matpituḥ sthāne tvayā kamalayā saha

जालंधर ने कहा — 'हे केशव! यदि आप मेरी इस वीरता से प्रसन्न हैं, तो कमला सहित आपको मेरे पिता के स्थान (सागर) में निवास करना होगा।'

श्लोक 85 (padma.6.7.85)

तथेत्युक्त्वा च संस्मृत्य गरुडं धरणीधरः । आरुह्य च जगन्नाथः क्षीराब्धिं प्रियया सह

tathetyuktvā ca saṁsmṛtya garuḍaṁ dharaṇīdharaḥ āruhya ca jagannāthaḥ kṣīrābdhiṁ priyayā saha

'ऐसा ही हो' कहकर, गरुड़ का स्मरण करते हुए पृथ्वी को धारण करने वाले जगन्नाथ अपनी प्रिया सहित उस पर सवार होकर —

श्लोक 86 (padma.6.7.86)

तदाप्रभृति कृष्णस्य वासः श्वशुरमंदिरे । अब्धौ वसति देवेशो लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया

tadāprabhṛti kṛṣṇasya vāsaḥ śvaśuramaṁdire abdhau vasati deveśo lakṣmyāḥ priyacikīrṣayā

तभी से कृष्ण का निवास अपने श्वसुर के भवन (सागर) में हो गया; लक्ष्मी को प्रसन्न करने की इच्छा से देवेश सागर में ही निवास करते हैं।

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