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उत्तर खण्ड · अध्याय 73

राम रक्षा स्तोत्र

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74

श्लोक 1 (padma.6.73.1)

महादेव उवाच- ॐरामरक्षास्तोत्रस्य श्रीमहर्षिर्विश्वामित्रऋषिः । श्रीरामो देवता अनुष्टुप्छंदः । विष्णुप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः

mahādeva uvāca- oṁrāmarakṣāstotrasya śrīmaharṣirviśvāmitraṛṣiḥ śrīrāmo devatā anuṣṭupchaṁdaḥ viṣṇuprītyarthe jape viniyogaḥ

महादेव ने कहा - ॐ, राम-रक्षा-स्तोत्र के ऋषि श्री महर्षि विश्वामित्र हैं, देवता श्री राम हैं, छंद अनुष्टुप् है; विष्णु की प्रसन्नता के लिए इसका जप में विनियोग है।

श्लोक 2 (padma.6.73.2)

अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । ध्यात्वा वै पुंडरीकाक्षं श्रीरामं विष्णुमव्ययम्

atasīpuṣpasaṁkāśaṁ pītavāsasamacyutam dhyātvā vai puṁḍarīkākṣaṁ śrīrāmaṁ viṣṇumavyayam

अलसी के फूल के समान श्याम वर्ण वाले, पीत वस्त्र धारण करने वाले, अच्युत; कमल-नयन, अविनाशी विष्णु-स्वरूप श्री राम का ध्यान करते हुए -

श्लोक 3 (padma.6.73.3)

पातु वो हृदयं रामः श्रीकंठः कंठमेव च । नाभिं पातु मखत्राता कटिं मे विश्वरक्षकः

pātu vo hṛdayaṁ rāmaḥ śrīkaṁṭhaḥ kaṁṭhameva ca nābhiṁ pātu makhatrātā kaṭiṁ me viśvarakṣakaḥ

राम मेरे हृदय की रक्षा करें, श्रीकंठ (सुंदर कंठ वाले) मेरे कंठ की ही रक्षा करें; यज्ञ की रक्षा करने वाले मेरी नाभि की रक्षा करें, विश्व के रक्षक मेरी कमर की रक्षा करें।

श्लोक 4 (padma.6.73.4)

करौ पातु दाशरथिः पादौ मे विश्वरूपधृक् । चक्षुषी पातु वै देव सीतापतिरनुत्तमः

karau pātu dāśarathiḥ pādau me viśvarūpadhṛk cakṣuṣī pātu vai deva sītāpatiranuttamaḥ

दशरथ-पुत्र मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें, विश्वरूपधारी मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें; हे देव! सीता के पति, अनुपम, मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें।

श्लोक 5 (padma.6.73.5)

शिखां मे पातु विश्वात्मा कर्णौ मे पातु कामदः । पार्श्वयोस्तु सुरत्राता कालकोटिदुरासदः

śikhāṁ me pātu viśvātmā karṇau me pātu kāmadaḥ pārśvayostu suratrātā kālakoṭidurāsadaḥ

विश्वात्मा मेरी चोटी की रक्षा करें, कामनाओं को पूर्ण करने वाले मेरे दोनों कानों की रक्षा करें; करोड़ों काल के लिए भी दुर्गम, देवताओं के रक्षक, मेरे दोनों पार्श्वों (कोखों) की रक्षा करें।

श्लोक 6 (padma.6.73.6)

अनंतः सर्वदा पातु शरीरं विश्वनायकः । जिह्वां मे पातु पापघ्नो लोकशिक्षाप्रवर्त्तकः

anaṁtaḥ sarvadā pātu śarīraṁ viśvanāyakaḥ jihvāṁ me pātu pāpaghno lokaśikṣāpravarttakaḥ

अनंत सदा मेरे शरीर की रक्षा करें, विश्व के नायक; पापनाशक, लोक-शिक्षा के प्रवर्तक, मेरी जिह्वा की रक्षा करें।

श्लोक 7 (padma.6.73.7)

राघवः पातु मे दंतान्केशान्रक्षतु केशवः । सक्थिनी पातु मे दत्त विजयो नाम विश्वसृक्

rāghavaḥ pātu me daṁtānkeśānrakṣatu keśavaḥ sakthinī pātu me datta vijayo nāma viśvasṛk

राघव मेरे दाँतों की रक्षा करें, केशव मेरे केशों की रक्षा करें; विजय नामधारी, विश्व के रचयिता, मेरी दोनों जाँघों की रक्षा करें।

श्लोक 8 (padma.6.73.8)

एतां रामबलोपेतां रक्षां यो वै पुमान्पठेत् । स चिरायुः सुखी विद्वान्लभते दिव्यसंपदम्

etāṁ rāmabalopetāṁ rakṣāṁ yo vai pumānpaṭhet sa cirāyuḥ sukhī vidvānlabhate divyasaṁpadam

इस राम-बल से युक्त रक्षा-कवच को जो कोई पुरुष पढ़ता है, वह दीर्घायु, सुखी, विद्वान होकर दिव्य संपत्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (padma.6.73.9)

रक्षां करोति भूतेभ्यः सदा रक्षा तु वैष्णवी । रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति यः स्मरेत्

rakṣāṁ karoti bhūtebhyaḥ sadā rakṣā tu vaiṣṇavī rāmeti rāmabhadreti rāmacaṁdreti yaḥ smaret

यह विष्णु-संबंधी रक्षा सदा भूतों (बुरी शक्तियों) से रक्षा करती है। जो कोई 'राम', 'रामभद्र', 'रामचंद्र' - इस प्रकार स्मरण करता है,

श्लोक 10 (padma.6.73.10)

विमुक्तः स नरः पापान्मुक्तिं प्राप्नोति शाश्वतीम् । वसिष्ठेन इदं प्रोक्तं गुरवे विष्णुरूपिणे

vimuktaḥ sa naraḥ pāpānmuktiṁ prāpnoti śāśvatīm vasiṣṭhena idaṁ proktaṁ gurave viṣṇurūpiṇe

वह मनुष्य पापों से मुक्त होकर शाश्वत मुक्ति प्राप्त करता है। यह वसिष्ठ द्वारा विष्णु-स्वरूप गुरु के प्रति कहा गया था।

श्लोक 11 (padma.6.73.11)

ततो मे ब्रह्मणः प्राप्तं मयोक्तं नारदं प्रति । नारदेन तु भूर्लोके प्रापितं सुजनेष्विह

tato me brahmaṇaḥ prāptaṁ mayoktaṁ nāradaṁ prati nāradena tu bhūrloke prāpitaṁ sujaneṣviha

तत्पश्चात् वह मुझे ब्रह्मा से प्राप्त हुआ, और मैंने इसे नारद से कहा; नारद ने इसे भूलोक में यहाँ सज्जनों तक पहुँचाया।

श्लोक 12 (padma.6.73.12)

सुप्त्वावाथ गृहे वापि मार्गे गच्छंत एव वा । ये पठंति नरश्रेष्ठास्ते नराः पुण्यभागिनः

suptvāvātha gṛhe vāpi mārge gacchaṁta eva vā ye paṭhaṁti naraśreṣṭhāste narāḥ puṇyabhāginaḥ

सोते समय, अथवा घर में, अथवा मार्ग में चलते हुए भी, जो श्रेष्ठ मनुष्य इसे पढ़ते हैं, वे मनुष्य पुण्य के भागी होते हैं।

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