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उत्तर खण्ड · अध्याय 80

पुंडरीक-भक्ति माहात्म्य

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (padma.6.80.1)

श्रीपार्वत्युवाच । अहो विष्णोश्च माहात्म्यं वद विश्वेश्वर प्रभोः । यन्माहात्म्यं पुनः श्रुत्वा न भवे जायते क्वचित्

śrīpārvatyuvāca aho viṣṇośca māhātmyaṁ vada viśveśvara prabhoḥ yanmāhātmyaṁ punaḥ śrutvā na bhave jāyate kvacit

श्रीपार्वती ने कहा - हे विश्वेश्वर! हे प्रभो! विष्णु की महिमा कहिए, जिस महिमा को सुनकर मनुष्य पुनः संसार में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 2 (padma.6.80.2)

महादेव उवाच । शृणु सुन्दरि वक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् । श्रुत्वा तु लभते पुण्यं ह्यंते मोक्षमवाप्नुयात्

mahādeva uvāca śṛṇu sundari vakṣyāmi viṣṇormāhātmyamuttamam śrutvā tu labhate puṇyaṁ hyaṁte mokṣamavāpnuyāt

महादेव ने कहा - हे सुंदरी! सुनो, मैं विष्णु की उत्तम महिमा कहता हूँ। इसे सुनकर मनुष्य पुण्य प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष पाता है।

श्लोक 3 (padma.6.80.3)

देवव्रतं महाप्राज्ञं ध्यानयोगपरायणम् । आश्रयं सर्वशास्त्राणां यतेंद्रियमकल्मषम्

devavrataṁ mahāprājñaṁ dhyānayogaparāyaṇam āśrayaṁ sarvaśāstrāṇāṁ yateṁdriyamakalmaṣam

देवव्रत (भीष्म), जो महाप्राज्ञ, ध्यान-योग में तत्पर, समस्त शास्त्रों के आश्रय, जितेंद्रिय और निष्पाप थे -

श्लोक 4 (padma.6.80.4)

अप्रधृष्यं महाभागं देवैरपि सवासवैः । सत्यसंधं जितक्रोधं समत्वे परिनिष्ठितम्

apradhṛṣyaṁ mahābhāgaṁ devairapi savāsavaiḥ satyasaṁdhaṁ jitakrodhaṁ samatve pariniṣṭhitam

- जो देवताओं और इंद्र सहित किसी से भी पराजित न होने वाले, महान भाग्यशाली, सत्यप्रतिज्ञ, क्रोध पर विजय पाने वाले तथा समत्व में स्थित थे -

श्लोक 5 (padma.6.80.5)

नारायणे जगन्नाथे शरण्ये भक्तवत्सले । परां निष्ठामनुप्राप्तं वाङ्मनः काय कर्मभिः

nārāyaṇe jagannāthe śaraṇye bhaktavatsale parāṁ niṣṭhāmanuprāptaṁ vāṅmanaḥ kāya karmabhiḥ

- और जो शरणदाता, भक्तवत्सल जगन्नाथ नारायण में मन, वचन और कर्म से परम निष्ठा को प्राप्त थे -

श्लोक 6 (padma.6.80.6)

गुणनामाश्रयं शांतं भीष्मं कुरु पितामहम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ पप्रच्छेदं युधिष्ठिरः

guṇanāmāśrayaṁ śāṁtaṁ bhīṣmaṁ kuru pitāmaham praṇamya śirasā bhūmau papracchedaṁ yudhiṣṭhiraḥ

- उन शांत स्वभाव वाले, गुणों और नाम के आश्रय, कुरुवंश के पितामह भीष्म को भूमि पर सिर झुकाकर प्रणाम कर युधिष्ठिर ने यह प्रश्न पूछा -

श्लोक 7 (padma.6.80.7)

युधिष्ठिर उवाच । केचिदाहुः परं धर्मं केचिदाहुः परं धनम् । केचिद्दानं प्रशंसंति समुदायं तथापरे

yudhiṣṭhira uvāca kecidāhuḥ paraṁ dharmaṁ kecidāhuḥ paraṁ dhanam keciddānaṁ praśaṁsaṁti samudāyaṁ tathāpare

युधिष्ठिर ने कहा - कुछ लोग धर्म को श्रेष्ठ कहते हैं, कुछ लोग धन को श्रेष्ठ कहते हैं; कुछ लोग दान की प्रशंसा करते हैं, और कुछ लोग समुदाय की।

श्लोक 8 (padma.6.80.8)

सांख्यं केचित्प्रशंसंति योगमन्ये तथा परम् । केचिज्ज्ञानं प्रशंसंति केचिदाहुः परं श्रुतम् । सम्यक्ध्यानं परं केचित्केचिद्वैराग्यमुत्तमम्

sāṁkhyaṁ kecitpraśaṁsaṁti yogamanye tathā param kecijjñānaṁ praśaṁsaṁti kecidāhuḥ paraṁ śrutam samyakdhyānaṁ paraṁ kecitkecidvairāgyamuttamam

कुछ लोग सांख्य की प्रशंसा करते हैं, अन्य योग को श्रेष्ठ बताते हैं; कुछ लोग ज्ञान की प्रशंसा करते हैं, कुछ श्रुति को श्रेष्ठ कहते हैं; कुछ सम्यक् ध्यान को श्रेष्ठ मानते हैं, कुछ उत्तम वैराग्य को।

श्लोक 9 (padma.6.80.9)

अग्निष्टोमादिकं कर्म तथा केचित्परं विदुः । आत्मज्ञानं परं केचित्समलोष्टाश्मकांचनाः

agniṣṭomādikaṁ karma tathā kecitparaṁ viduḥ ātmajñānaṁ paraṁ kecitsamaloṣṭāśmakāṁcanāḥ

कुछ लोग अग्निष्टोम आदि यज्ञ-कर्म को श्रेष्ठ मानते हैं; कुछ, जिनके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं, आत्मज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं।

श्लोक 10 (padma.6.80.10)

यमांश्च नियमांश्चैव केचिद्वैराग्यमुत्तमम् । कारुण्यं च परे केचिदहिंसां च तपस्विनः

yamāṁśca niyamāṁścaiva kecidvairāgyamuttamam kāruṇyaṁ ca pare kecidahiṁsāṁ ca tapasvinaḥ

कुछ यम-नियमों को श्रेष्ठ मानते हैं, कुछ उत्तम वैराग्य को; कुछ तपस्वी लोग करुणा को और कुछ अहिंसा को श्रेष्ठ मानते हैं।

श्लोक 11 (padma.6.80.11)

शौचं केचित्परं प्राहुः केचिद्देवार्चनं नराः । व्यामोहं चात्र गच्छंति व्यामुग्धाः पापकर्मभिः

śaucaṁ kecitparaṁ prāhuḥ keciddevārcanaṁ narāḥ vyāmohaṁ cātra gacchaṁti vyāmugdhāḥ pāpakarmabhiḥ

कुछ लोग शौच को श्रेष्ठ कहते हैं, कुछ देवपूजा को। इस विषय में पापकर्मों से मोहग्रस्त लोग भ्रम को ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 12 (padma.6.80.12)

यदेतेषु परं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः । वक्तुमर्हसि धर्मज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर

yadeteṣu paraṁ kṛtyamanuṣṭheyaṁ mahātmabhiḥ vaktumarhasi dharmajña sarvaśāstrabhṛtāṁ vara

हे धर्मज्ञ! हे समस्त शास्त्रों के धारण करने वालों में श्रेष्ठ! इन सबमें जो महात्माओं के द्वारा आचरण करने योग्य परम कृत्य है, वह मुझे बताने योग्य आप ही हैं।

श्लोक 13 (padma.6.80.13)

महादेव उवाच । भूर्लोके या कथा जाता भैष्मी यौधिष्ठिरी सति । तामहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां च हिताय वै । एतान्प्रश्नांस्तदा श्रुत्वा प्राह भीष्मो युधिष्ठिरम्

mahādeva uvāca bhūrloke yā kathā jātā bhaiṣmī yaudhiṣṭhirī sati tāmahaṁ saṁpravakṣyāmi lokānāṁ ca hitāya vai etānpraśnāṁstadā śrutvā prāha bhīṣmo yudhiṣṭhiram

महादेव ने कहा - हे सति! भूलोक में भीष्म और युधिष्ठिर के बीच जो यह कथा हुई, उसे मैं लोकों के हित के लिए कहता हूँ। इन प्रश्नों को सुनकर भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा -

श्लोक 14 (padma.6.80.14)

भीष्म उवाच । श्रूयतामिदमत्यंतं गूढं संसारमोचनम् । श्रोतव्यं यत्त्वया सम्यग्ज्ञातव्यं धर्मनंदन

bhīṣma uvāca śrūyatāmidamatyaṁtaṁ gūḍhaṁ saṁsāramocanam śrotavyaṁ yattvayā samyagjñātavyaṁ dharmanaṁdana

भीष्म ने कहा - हे धर्मनंदन! सुनो, यह अत्यंत गूढ़ और संसार से मुक्ति दिलाने वाला रहस्य है, जिसे तुम्हें भलीभाँति सुनना और जानना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.6.80.15)

अत्रैवोदाहरंतीमं पुण्यं चैव पुरातनम् । पुंडरीकस्य संवादं महर्षेर्नारदस्य च

atraivodāharaṁtīmaṁ puṇyaṁ caiva purātanam puṁḍarīkasya saṁvādaṁ maharṣernāradasya ca

इस विषय में यह पुण्यमय और पुरातन कथा दी जाती है - पुंडरीक और महर्षि नारद के संवाद की।

श्लोक 16 (padma.6.80.16)

ब्राह्मणः श्रुतिसंपन्नः पुंडरीको महामतिः । आश्रमे प्रथमे तिष्ठन्गुरूणां वशगः सदा

brāhmaṇaḥ śrutisaṁpannaḥ puṁḍarīko mahāmatiḥ āśrame prathame tiṣṭhangurūṇāṁ vaśagaḥ sadā

पुंडरीक नामक एक वेदज्ञ, महाबुद्धिमान ब्राह्मण था, जो प्रथम आश्रम में रहते हुए सदा गुरुओं के वश में रहता था।

श्लोक 17 (padma.6.80.17)

जितेंद्रियो जितक्रोधः संध्योपासनतत्परः । वेदवेदांगनिपुणः शास्त्रेषु च विचक्षणः

jiteṁdriyo jitakrodhaḥ saṁdhyopāsanatatparaḥ vedavedāṁganipuṇaḥ śāstreṣu ca vicakṣaṇaḥ

वह जितेंद्रिय, क्रोधविजयी, संध्योपासना में तत्पर, वेद-वेदांगों में निपुण तथा शास्त्रों में पटु था।

श्लोक 18 (padma.6.80.18)

समिद्भिः साधुहव्येन सायंप्रातर्हुतानलः । ध्यात्वा जगत्पतिं विष्णुं सम्यगाराधयद्विभुम्

samidbhiḥ sādhuhavyena sāyaṁprātarhutānalaḥ dhyātvā jagatpatiṁ viṣṇuṁ samyagārādhayadvibhum

वह प्रातः और सायं समिधाओं और उत्तम हव्य से अग्नि में हवन करता था। जगत्पति विष्णु का ध्यान कर वह उस विभु की भलीभाँति आराधना करता था।

श्लोक 19 (padma.6.80.19)

तपः स्वाध्यायनिरतः साक्षाद्ब्रह्मसुतो यथा । उदकेंधनपुष्पाद्यैरसकृत्पूजयन्गुरुम्

tapaḥ svādhyāyanirataḥ sākṣādbrahmasuto yathā udakeṁdhanapuṣpādyairasakṛtpūjayangurum

वह तप और स्वाध्याय में लीन रहता था, मानो साक्षात् ब्रह्मा का पुत्र हो। जल, ईंधन, पुष्प आदि से वह बार-बार अपने गुरु की सेवा करता था।

श्लोक 20 (padma.6.80.20)

मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्भिक्षाहारी विमत्सरः । ब्रह्मविद्यामधीयानः प्राणायामपरायणः

mātāpitrośca śuśrūṣurbhikṣāhārī vimatsaraḥ brahmavidyāmadhīyānaḥ prāṇāyāmaparāyaṇaḥ

वह माता-पिता की सेवा करने वाला, भिक्षा से जीवन-यापन करने वाला, ईर्ष्यारहित, ब्रह्मविद्या का अध्ययन करने वाला तथा प्राणायाम में तत्पर था।

श्लोक 21 (padma.6.80.21)

तस्य सर्वात्मभूतस्य संसारे निस्पृहस्य च । महात्मनो बुद्धिरासीत्संसारार्णवतारिणी

tasya sarvātmabhūtasya saṁsāre nispṛhasya ca mahātmano buddhirāsītsaṁsārārṇavatāriṇī

सर्वभूतों में आत्मवत् भाव रखने वाले और संसार से निस्पृह उस महात्मा की बुद्धि संसार-सागर से पार उतारने वाली थी।

श्लोक 22 (padma.6.80.22)

मातरं पितरं चैव भातॄनथ सुहृज्जनान् । मित्राणि मातुलांश्चैव सखीन्संबंधिबांधवान्

mātaraṁ pitaraṁ caiva bhātṝnatha suhṛjjanān mitrāṇi mātulāṁścaiva sakhīnsaṁbaṁdhibāṁdhavān

माता, पिता, भाइयों, हितैषी जनों, मित्रों, मामाओं, सखाओं तथा संबंधियों-बांधवों को -

श्लोक 23 (padma.6.80.23)

धनधान्यसमृद्धं च ग्रहं वा शक्रसंनिभम् । क्षेत्राणि सुमहार्हाणि सर्वसस्योद्भवानि च

dhanadhānyasamṛddhaṁ ca grahaṁ vā śakrasaṁnibham kṣetrāṇi sumahārhāṇi sarvasasyodbhavāni ca

- धन-धान्य से समृद्ध और इंद्र के भवन के समान अपने घर को, बहुमूल्य खेतों को जो सभी प्रकार की फसलें उगाते थे -

श्लोक 24 (padma.6.80.24)

परित्यज्य महासत्वस्तृणानीव महासुखी । विचचार महीं रम्यां शाकमूलफलाशनः

parityajya mahāsatvastṛṇānīva mahāsukhī vicacāra mahīṁ ramyāṁ śākamūlaphalāśanaḥ

- इन सबको उस महान् सत्वशाली ने तिनकों के समान त्याग दिया और परम सुखी होकर, शाक-मूल-फल खाते हुए, वह रमणीय पृथ्वी पर विचरण करने लगा।

श्लोक 25 (padma.6.80.25)

गंगां च यमुनां चैव गोमतीमथ गंडिकाम् । शतद्रुं च पयोष्णीं च सरयूं च सरस्वतीम्

gaṁgāṁ ca yamunāṁ caiva gomatīmatha gaṁḍikām śatadruṁ ca payoṣṇīṁ ca sarayūṁ ca sarasvatīm

गंगा, यमुना, गोमती, गंडकी, शतद्रु, पयोष्णी, सरयू और सरस्वती नदी -

श्लोक 26 (padma.6.80.26)

प्रयागं नर्मदां चैव शोणं चैव महानदम् । प्रभासं विंध्यतीर्थानि हिमवत्प्रभवानि च

prayāgaṁ narmadāṁ caiva śoṇaṁ caiva mahānadam prabhāsaṁ viṁdhyatīrthāni himavatprabhavāni ca

प्रयाग, नर्मदा, महानदी शोण, प्रभास, विंध्य के तीर्थ तथा हिमालय से उत्पन्न तीर्थ -

श्लोक 27 (padma.6.80.27)

आश्रमेषु च यानि स्युर्नैमिषे पुष्करादिषु । कुरुक्षेत्रे च यानि स्युस्तथा गोवर्द्धनादिषु

āśrameṣu ca yāni syurnaimiṣe puṣkarādiṣu kurukṣetre ca yāni syustathā govarddhanādiṣu

- जो भी आश्रम नैमिष, पुष्कर आदि में हों, और जो कुरुक्षेत्र में तथा गोवर्धन आदि में हों -

श्लोक 28 (padma.6.80.28)

अन्यानि सुमहातेजास्तीर्थानि सुसमाहितः । विचचार महायोगी यथाकाले यथाविधि

anyāni sumahātejāstīrthāni susamāhitaḥ vicacāra mahāyogī yathākāle yathāvidhi

- और अन्य महातेजस्वी तीर्थ - उन सबमें वह महायोगी एकाग्रचित्त होकर उचित समय पर विधिपूर्वक विचरण करता रहा।

श्लोक 29 (padma.6.80.29)

कदाचिदात्मवान्धीरः शालग्रामं तपोधनः । पुंडरीको महाभागः पूर्वकर्मवशानुगः

kadācidātmavāndhīraḥ śālagrāmaṁ tapodhanaḥ puṁḍarīko mahābhāgaḥ pūrvakarmavaśānugaḥ

एक बार आत्मसंयमी, धीर, तपोधन, महाभाग्यशाली पुंडरीक अपने पूर्वजन्म के कर्म के अनुसार शालग्राम क्षेत्र में आ पहुँचा।

श्लोक 30 (padma.6.80.30)

संसेव्यमानं मुनिभिस्तत्वविद्भिस्तपोधनैः । मुनीनामास्पदं रम्यं पुराणेष्वपि विश्रुतम्

saṁsevyamānaṁ munibhistatvavidbhistapodhanaiḥ munīnāmāspadaṁ ramyaṁ purāṇeṣvapi viśrutam

वह स्थान तत्वज्ञ, तपोधन मुनियों द्वारा सेवित, मुनियों का रमणीय निवास-स्थान और पुराणों में भी प्रसिद्ध था।

श्लोक 31 (padma.6.80.31)

भूषितं चैव चक्राद्यैश्चक्रांकितशिलातलम् । रम्यं विविक्तविस्तीर्णं सदा विष्णुप्रसादकम्

bhūṣitaṁ caiva cakrādyaiścakrāṁkitaśilātalam ramyaṁ viviktavistīrṇaṁ sadā viṣṇuprasādakam

वह चक्र आदि चिह्नों से सुशोभित था, जिसका शिला-तल चक्र से अंकित था; रमणीय, एकांत, विस्तृत तथा सदा विष्णु को प्रसन्न करने वाला था।

श्लोक 32 (padma.6.80.32)

किंच चक्रांकितास्तत्र प्राणिनः पुण्यदर्शनाः । विचिरंति यथाकामं पूण्यतीर्थप्रदर्शिनः

kiṁca cakrāṁkitāstatra prāṇinaḥ puṇyadarśanāḥ viciraṁti yathākāmaṁ pūṇyatīrthapradarśinaḥ

और वहाँ चक्र-चिह्नित, दर्शन मात्र से पुण्यदायक जीव इच्छानुसार विचरते थे, मानो पवित्र तीर्थ का ही दर्शन कराते हों।

श्लोक 33 (padma.6.80.33)

तस्मिन्क्षेत्रे महापुण्ये शालिग्रामे महामतिः । स्नात्वा देवह्दे तीर्थे सरस्वत्यां च सुव्रतः

tasminkṣetre mahāpuṇye śāligrāme mahāmatiḥ snātvā devahde tīrthe sarasvatyāṁ ca suvrataḥ

उस महापुण्यमय शालिग्राम क्षेत्र में उस महाबुद्धिमान, उत्तम व्रतधारी ने देवह्रद तीर्थ में और सरस्वती नदी में स्नान किया।

श्लोक 34 (padma.6.80.34)

जातिस्मर्यां चक्रकुंडे चक्रनद्याश्रितेषु च । तथान्यान्यपि तीर्थानि तस्मिन्नेव चचार सः

jātismaryāṁ cakrakuṁḍe cakranadyāśriteṣu ca tathānyānyapi tīrthāni tasminneva cacāra saḥ

जातिस्मरा नदी में, चक्रकुंड में और चक्रनदी के तटवर्ती तीर्थों में भी, तथा अन्य तीर्थों में भी वह उसी क्षेत्र में विचरण करता रहा।

श्लोक 35 (padma.6.80.35)

ततः क्षेत्रप्रभावेन तीर्थानां चैव तेजसा । मनःप्रसादमभजत्तस्मिन्नेव महामनाः

tataḥ kṣetraprabhāvena tīrthānāṁ caiva tejasā manaḥprasādamabhajattasminneva mahāmanāḥ

फिर उस क्षेत्र के प्रभाव से और उन तीर्थों के तेज से उस महामना ने उसी स्थान पर मन की प्रसन्नता प्राप्त की।

श्लोक 36 (padma.6.80.36)

सोऽपि तीर्थविशुद्धात्मा पुंडरीकस्तपोधनः । तत्रैव वसतिं चक्रे ध्यानयोगपरायणः

so'pi tīrthaviśuddhātmā puṁḍarīkastapodhanaḥ tatraiva vasatiṁ cakre dhyānayogaparāyaṇaḥ

तीर्थों से पवित्र आत्मा वाला वह तपोधन पुंडरीक ध्यान-योग में तत्पर होकर वहीं निवास करने लगा।

श्लोक 37 (padma.6.80.37)

तत्रैव सिद्धिमाकांक्षन्नाराध्य गरुडध्वजम् । शास्त्रोक्तेन विधानेन भक्त्या परमया पुनः

tatraiva siddhimākāṁkṣannārādhya garuḍadhvajam śāstroktena vidhānena bhaktyā paramayā punaḥ

वहीं सिद्धि की आकांक्षा से गरुड़ध्वज (विष्णु) की शास्त्रोक्त विधि से परम भक्ति के साथ आराधना करता हुआ -

श्लोक 38 (padma.6.80.38)

उवास चिरमेकाकी निर्द्वंद्वः सजितेंद्रियः । शाकमूलफलाहारः संतुष्टः समदर्शनः

uvāsa ciramekākī nirdvaṁdvaḥ sajiteṁdriyaḥ śākamūlaphalāhāraḥ saṁtuṣṭaḥ samadarśanaḥ

- वह अकेला ही जितेंद्रिय, द्वंद्वरहित होकर दीर्घकाल तक वहाँ रहा, शाक-मूल-फल खाकर संतुष्ट और समदर्शी बना रहा।

श्लोक 39 (padma.6.80.39)

यमैश्चनियमैश्चैव तथैवासनबंधनैः । प्राणायामैश्च तीर्थैश्च प्रत्याहारैश्च संततैः

yamaiścaniyamaiścaiva tathaivāsanabaṁdhanaiḥ prāṇāyāmaiśca tīrthaiśca pratyāhāraiśca saṁtataiḥ

यम-नियमों से, आसन-बंधों से, प्राणायाम से, तीर्थों से तथा निरंतर प्रत्याहार से -

श्लोक 40 (padma.6.80.40)

धारणाभिस्तथा ध्यानैः समाधिभिरतंद्रितः । योगाभ्यासं सदा सम्यक्चक्रे विगतकिल्बिषः

dhāraṇābhistathā dhyānaiḥ samādhibhirataṁdritaḥ yogābhyāsaṁ sadā samyakcakre vigatakilbiṣaḥ

- धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा, आलस्यरहित होकर उस निष्पाप ने सदा भलीभाँति योगाभ्यास किया।

श्लोक 41 (padma.6.80.41)

वैदिकैश्चांगिकैश्चैव तथा पौराणिकैरपि । आराधयति सर्वेशं ततः शुद्धिमवाप सः

vaidikaiścāṁgikaiścaiva tathā paurāṇikairapi ārādhayati sarveśaṁ tataḥ śuddhimavāpa saḥ

वैदिक, आंगिक तथा पौराणिक विधियों से सर्वेश्वर की आराधना करते हुए उसने शुद्धि प्राप्त की।

श्लोक 42 (padma.6.80.42)

रागद्वेषविनिर्मुक्तः स्वधर्मइव रूपवान् । आराधयामास देवं तद्गतेनांतरात्मना

rāgadveṣavinirmuktaḥ svadharmaiva rūpavān ārādhayāmāsa devaṁ tadgatenāṁtarātmanā

राग-द्वेष से मुक्त, मानो स्वधर्म का साक्षात् रूप, वह अपनी अंतरात्मा को उसी में लीन कर देव की आराधना करता रहा।

श्लोक 43 (padma.6.80.43)

तुतोष भगवान्विष्णुः पुंडरीकायतेक्षणः । भगवान्नारदमिति प्रसन्नोऽस्म्यस्य धीमतः

tutoṣa bhagavānviṣṇuḥ puṁḍarīkāyatekṣaṇaḥ bhagavānnāradamiti prasanno'smyasya dhīmataḥ

कमल के समान विशाल नेत्रों वाले भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और नारद जी से कहा - मैं इस बुद्धिमान से प्रसन्न हूँ।

श्लोक 44 (padma.6.80.44)

ततः कदाचित्तं देशं नारदः परमार्थवित् । जगाम सुमहातेजाः साक्षादादित्यसन्निभः

tataḥ kadācittaṁ deśaṁ nāradaḥ paramārthavit jagāma sumahātejāḥ sākṣādādityasannibhaḥ

तब एक बार परमार्थ के ज्ञाता, महातेजस्वी और साक्षात् सूर्य के समान नारद उस स्थान पर गए।

श्लोक 45 (padma.6.80.45)

तं द्रष्टुकामो भगवान्पुंडरीकं तपोनिधिम् । विष्णुभक्तिपरीतात्मा वैष्णवानां हिते रतः

taṁ draṣṭukāmo bhagavānpuṁḍarīkaṁ taponidhim viṣṇubhaktiparītātmā vaiṣṇavānāṁ hite rataḥ

तप की निधि पुंडरीक को देखने की इच्छा से, विष्णु-भक्ति से परिपूर्ण आत्मा वाले, वैष्णवों के हित में रत भगवान नारद वहाँ गए।

श्लोक 46 (padma.6.80.46)

स दृष्ट्वा नारदं प्राप्तं तेजोमंडलमंडितम् । महामतिर्महोदारः सर्ववेदैकभाजनम्

sa dṛṣṭvā nāradaṁ prāptaṁ tejomaṁḍalamaṁḍitam mahāmatirmahodāraḥ sarvavedaikabhājanam

तेज के मंडल से सुशोभित, सभी वेदों के एकमात्र आश्रय, महामति और महान् उदार नारद को आया हुआ देखकर -

श्लोक 47 (padma.6.80.47)

प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनांतरात्मना । अर्घं दत्त्वा विधानेन प्रणाममकरोत्पुनः

prāṁjaliḥ praṇato bhūtvā prahṛṣṭenāṁtarātmanā arghaṁ dattvā vidhānena praṇāmamakarotpunaḥ

- हाथ जोड़कर, प्रणाम कर, हर्षित अंतरात्मा से, विधिपूर्वक अर्घ्य देकर पुंडरीक ने पुनः प्रणाम किया।

श्लोक 48 (padma.6.80.48)

कोऽयमत्यद्भुताकारस्तेजस्वी हृद्यवेषधृक् । आतोद्यहस्तः सुमुखो जयमंडलमंडितः

ko'yamatyadbhutākārastejasvī hṛdyaveṣadhṛk ātodyahastaḥ sumukho jayamaṁḍalamaṁḍitaḥ

यह अत्यंत अद्भुत रूप वाला, तेजस्वी, मनोहर वेशधारी, हाथ में वाद्य लिए, सुमुख, विजय-मंडल से सुशोभित कौन है -

श्लोक 49 (padma.6.80.49)

विवस्वानथवा वह्निरिंद्रो वरुण एव वा । इति संचिंतयन्स्थित्वा जगाद परमद्युतिम्

vivasvānathavā vahniriṁdro varuṇa eva vā iti saṁciṁtayansthitvā jagāda paramadyutim

- क्या यह सूर्य है, अथवा अग्नि, इंद्र या वरुण? इस प्रकार विचार कर वह उस परम तेजस्वी से बोला।

श्लोक 50 (padma.6.80.50)

पुंडरीक उवाच । को भवानिह संप्राप्तः कुतो वा परमद्युतिः । त्वद्दर्शनं हि भगवन्प्रायेण भुवि दुर्लभम्

puṁḍarīka uvāca ko bhavāniha saṁprāptaḥ kuto vā paramadyutiḥ tvaddarśanaṁ hi bhagavanprāyeṇa bhuvi durlabham

पुंडरीक ने कहा - आप कौन हैं जो यहाँ पधारे हैं, और परम तेजस्वी! आप कहाँ से आए हैं? हे भगवन्! आपका दर्शन तो पृथ्वी पर प्रायः दुर्लभ है।

श्लोक 51 (padma.6.80.51)

नैव दृष्टः पुमान्वापि मया तव समः प्रभो । वक्तुमर्हस्यशेषेण यत्प्रदिष्टं मयानघ

naiva dṛṣṭaḥ pumānvāpi mayā tava samaḥ prabho vaktumarhasyaśeṣeṇa yatpradiṣṭaṁ mayānagha

हे प्रभो! मैंने आपके समान कोई पुरुष कभी नहीं देखा। हे निष्पाप! जो मैंने पूछा है, वह आप संपूर्ण रूप से बताने योग्य हैं।

श्लोक 52 (padma.6.80.52)

नारद उवाच । नारदोऽहंमनुप्राप्तस्त्वद्दर्शनकुतूहलात् । प्रभावं भगवद्भक्तं त्वादृशं सततं द्विज

nārada uvāca nārado'haṁmanuprāptastvaddarśanakutūhalāt prabhāvaṁ bhagavadbhaktaṁ tvādṛśaṁ satataṁ dvija

नारद ने कहा - मैं नारद हूँ, तुम्हारे दर्शन की उत्सुकता से यहाँ आया हूँ। हे द्विज! तुम्हारे जैसे भगवद्भक्त का प्रभाव सदा महान होता है -

श्लोक 53 (padma.6.80.53)

स्मृतः संतोषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तमः । पुनाति भगवद्भक्तश्चांडालोऽपि यदृच्छया

smṛtaḥ saṁtoṣito vāpi pūjito vā dvijottamaḥ punāti bhagavadbhaktaścāṁḍālo'pi yadṛcchayā

- हे द्विजोत्तम! भगवद्भक्त का स्मरण करने मात्र से, उसे संतुष्ट करने से अथवा पूजने से, चाहे वह चांडाल भी क्यों न हो, वह अपने आप पवित्र कर देता है।

श्लोक 54 (padma.6.80.54)

दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः । शंखचक्रगदापाणेस्त्रैलोक्यस्यैकचक्षुषः

dāso'haṁ vāsudevasya devadevasya śārṅgiṇaḥ śaṁkhacakragadāpāṇestrailokyasyaikacakṣuṣaḥ

मैं वासुदेव का दास हूँ - देवों के देव, शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले, शंख-चक्र-गदा हाथ में लिए हुए, तीनों लोकों के एकमात्र नेत्र स्वरूप।

श्लोक 55 (padma.6.80.55)

इत्युक्तो नारदेनासौ भक्तिपर्याकुलात्मना । प्रोवाच मधुरं विप्रं तद्दर्शनसुविस्मितः

ityukto nāradenāsau bhaktiparyākulātmanā provāca madhuraṁ vipraṁ taddarśanasuvismitaḥ

नारद के इस प्रकार कहने पर, भक्ति से विह्वल आत्मा वाला पुंडरीक उनके दर्शन से चकित होकर उस ब्राह्मण से मधुर वचन बोला।

श्लोक 56 (padma.6.80.56)

पुंडरीक उवाच । धन्योऽहं देहिनां मध्ये सुपूज्योऽहं सुरैरपि । कृतार्थाः पितरो मेऽद्य संप्राप्तं जन्मनः फलम्

puṁḍarīka uvāca dhanyo'haṁ dehināṁ madhye supūjyo'haṁ surairapi kṛtārthāḥ pitaro me'dya saṁprāptaṁ janmanaḥ phalam

पुंडरीक ने कहा - मैं सभी देहधारियों में धन्य हूँ, देवताओं के लिए भी पूज्य हूँ। आज मेरे पितर कृतार्थ हो गए, आज मुझे मेरे जन्म का फल प्राप्त हुआ।

श्लोक 57 (padma.6.80.57)

अनुगृह्णीष्व देवर्षे त्वद्भक्तस्य विशेषतः । तं करिष्याम्यहं विद्वन्भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः

anugṛhṇīṣva devarṣe tvadbhaktasya viśeṣataḥ taṁ kariṣyāmyahaṁ vidvanbhrāmyamāṇaḥ svakarmabhiḥ

हे देवर्षे! अपने भक्त पर विशेष रूप से अनुग्रह कीजिए। हे विद्वन्! अपने ही कर्मों के फेर में भटकता हुआ मैं वही करूँगा जो आप कहें।

श्लोक 58 (padma.6.80.58)

कर्तव्यं परमं गुह्यं उपदेष्टुं त्वमर्हसि । त्वं गतिः सर्वभूतानां वैष्णवानां विशेषतः

kartavyaṁ paramaṁ guhyaṁ upadeṣṭuṁ tvamarhasi tvaṁ gatiḥ sarvabhūtānāṁ vaiṣṇavānāṁ viśeṣataḥ

जो परम गुह्य कर्तव्य है, वह उपदेश देने योग्य आप ही हैं। आप ही सभी प्राणियों की, और विशेष रूप से वैष्णवों की, गति हैं।

श्लोक 59 (padma.6.80.59)

नारद उवाच । अनेकानीह शास्त्राणि कर्माणि च तथा द्विज । धर्मवर्गं बहुविधं तथैव भुवि मानसम्

nārada uvāca anekānīha śāstrāṇi karmāṇi ca tathā dvija dharmavargaṁ bahuvidhaṁ tathaiva bhuvi mānasam

नारद ने कहा - हे द्विज! इस संसार में अनेक शास्त्र हैं और अनेक कर्म हैं; इसी प्रकार पृथ्वी पर बहुविध धर्म-समूह और मानसिक साधनाएँ भी हैं।

श्लोक 60 (padma.6.80.60)

वैलक्षण्यं च जगतस्तस्मादेव द्विजोत्तम । अन्यथा सर्वसत्वानां सुखं वा दुःखमेव च

vailakṣaṇyaṁ ca jagatastasmādeva dvijottama anyathā sarvasatvānāṁ sukhaṁ vā duḥkhameva ca

हे द्विजोत्तम! इसीलिए संसार में विविधता है। अन्यथा सभी प्राणियों को सुख अथवा दुःख समान ही होता।

श्लोक 61 (padma.6.80.61)

विज्ञानमात्रं क्षणिकं निरात्मकमिदं जगत् । इति कैश्चित्परिज्ञातं बाह्यार्थनिरपेक्षकम्

vijñānamātraṁ kṣaṇikaṁ nirātmakamidaṁ jagat iti kaiścitparijñātaṁ bāhyārthanirapekṣakam

कुछ लोगों ने इस जगत को केवल विज्ञान मात्र, क्षणिक और आत्मारहित माना है, जो बाह्य पदार्थों की अपेक्षा नहीं रखता।

श्लोक 62 (padma.6.80.62)

अव्यक्ताज्जायते नित्यं नित्यान्नित्यमिदं जगत् । इत्येवं प्राहुरपरे तत्रैव लयमेति च

avyaktājjāyate nityaṁ nityānnityamidaṁ jagat ityevaṁ prāhurapare tatraiva layameti ca

दूसरे कहते हैं कि यह जगत नित्य अव्यक्त से उत्पन्न होता है, नित्य से नित्य ही उत्पन्न होता है, और उसी में पुनः लीन हो जाता है।

श्लोक 63 (padma.6.80.63)

आत्मनो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्वगतास्तथा । अन्ये मतिमतां श्रेष्ठास्तत्वालोकनतत्पराः

ātmano bahavaḥ proktā nityāḥ sarvagatāstathā anye matimatāṁ śreṣṭhāstatvālokanatatparāḥ

कुछ अन्य विचारशीलों में श्रेष्ठ, तत्व-दर्शन में तत्पर लोग आत्माओं को अनेक, नित्य और सर्वव्यापी कहते हैं।

श्लोक 64 (padma.6.80.64)

यावच्छरीरमात्मानं प्रतिपन्नास्तथापरे । हस्तिकीटादिदेहेऽपि महांतमंडमेव च

yāvaccharīramātmānaṁ pratipannāstathāpare hastikīṭādidehe'pi mahāṁtamaṁḍameva ca

कुछ अन्य आत्मा को शरीर के बराबर मानते हैं - हाथी और कीड़े आदि के शरीर में भी, और ब्रह्माण्ड में विशाल अंड के समान भी।

श्लोक 65 (padma.6.80.65)

यथाऽद्यजगतोवृत्तिस्तथा कालांतरेष्वपि । प्रवाहो नित्यमेवैष कः कर्त्तेति च केचन

yathā'dyajagatovṛttistathā kālāṁtareṣvapi pravāho nityamevaiṣa kaḥ kartteti ca kecana

कुछ लोग कहते हैं कि जैसा आज जगत का व्यवहार है, वैसा ही अन्य कालों में भी था; यह प्रवाह सदा से ऐसा ही है, इसका कोई कर्ता नहीं है।

श्लोक 66 (padma.6.80.66)

यद्यत्प्रत्यक्षविषयं तत्तदत्र न विद्यते । कुतः स्वर्गादयः संतीत्यन्ये विजितमानसाः

yadyatpratyakṣaviṣayaṁ tattadatra na vidyate kutaḥ svargādayaḥ saṁtītyanye vijitamānasāḥ

जो कुछ भी प्रत्यक्ष का विषय नहीं है, वह यहाँ है ही नहीं - तो फिर स्वर्ग आदि कैसे हो सकते हैं? ऐसा कुछ मन को वश में रखने वाले अन्य लोग कहते हैं।

श्लोक 67 (padma.6.80.67)

निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरं च तथापरे । अत्यंतभिन्नमतयः परमार्थपराङ्मुखाः

nirīśvaramidaṁ prāhuḥ seśvaraṁ ca tathāpare atyaṁtabhinnamatayaḥ paramārthaparāṅmukhāḥ

कुछ इसे ईश्वररहित कहते हैं, तो कुछ अन्य ईश्वरयुक्त; ये सभी अत्यंत भिन्न मत रखने वाले परमार्थ से विमुख लोग हैं।

श्लोक 68 (padma.6.80.68)

एवं मन्येऽपि कुहका यथामति यथाश्रुतम् । वदंति विविधैर्भेदैः स्वयुक्ति स्थितिकारकाः

evaṁ manye'pi kuhakā yathāmati yathāśrutam vadaṁti vividhairbhedaiḥ svayukti sthitikārakāḥ

इस प्रकार अनेक धूर्त, अपनी बुद्धि और सुनी हुई बातों के अनुसार, अपने-अपने तर्क को स्थापित करते हुए विविध भेदों से बोलते हैं।

श्लोक 69 (padma.6.80.69)

तर्केष्ववहितो भूत्वा कथयामि तपोधन । परमार्थमिमं पुण्यं घोरं संसारनाशनम्

tarkeṣvavahito bhūtvā kathayāmi tapodhana paramārthamimaṁ puṇyaṁ ghoraṁ saṁsāranāśanam

हे तपोधन! इन तर्कों के प्रति सावधान होकर मैं यह पुण्यमय परमार्थ बताता हूँ, जो घोर संसार का नाश करने वाला है।

श्लोक 70 (padma.6.80.70)

तन्मूलमनुजानंति ततो देवादयो नराः । प्रमाणेनोपलभ्यंते न प्रमाणं विमोहितैः

tanmūlamanujānaṁti tato devādayo narāḥ pramāṇenopalabhyaṁte na pramāṇaṁ vimohitaiḥ

उसी मूल तत्व को गण-देवता और मनुष्य आदि जानते हैं। वे प्रमाण से ही जाने जाते हैं, मोहग्रस्त लोगों के लिए वह प्रमाण नहीं है।

श्लोक 71 (padma.6.80.71)

अनागतमतीतं च विप्रकृष्टमतीव यत् । न गृहीतं यथाशक्त्या वर्त्तमानार्थनिष्ठितम्

anāgatamatītaṁ ca viprakṛṣṭamatīva yat na gṛhītaṁ yathāśaktyā varttamānārthaniṣṭhitam

जो भविष्य, भूत तथा अत्यंत दूरस्थ है, वह अपनी सामर्थ्य से ग्रहण नहीं किया जा सकता, जबकि वर्तमान वस्तु में ही स्थित बुद्धि होती है।

श्लोक 72 (padma.6.80.72)

आगमो मुनिभिः प्रोक्तो पूर्वरूपक्रमागतः । प्रमाणं स तु विज्ञेयः परमार्थप्रसाधकः

āgamo munibhiḥ prokto pūrvarūpakramāgataḥ pramāṇaṁ sa tu vijñeyaḥ paramārthaprasādhakaḥ

मुनियों द्वारा कहा गया, पूर्व रूप-क्रम से चला आया आगम (शास्त्र) ही वह प्रमाण जानना चाहिए, जो परमार्थ को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 73 (padma.6.80.73)

यदभ्यासबलाज्ज्ञानं रागद्वेषमलापहम् । उत्पद्यते द्विजश्रेष्ठ सोऽयमागमसंज्ञकः

yadabhyāsabalājjñānaṁ rāgadveṣamalāpaham utpadyate dvijaśreṣṭha so'yamāgamasaṁjñakaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! जो ज्ञान अभ्यास के बल से राग-द्वेष के मल को दूर करने वाला उत्पन्न होता है, वही आगम कहलाता है।

श्लोक 74 (padma.6.80.74)

फलं कर्म च यत्तत्वं विज्ञानं दर्शनं विभुम् । जात्यादिकल्पनाहीनं द्वितीयागमलक्षणम्

phalaṁ karma ca yattatvaṁ vijñānaṁ darśanaṁ vibhum jātyādikalpanāhīnaṁ dvitīyāgamalakṣaṇam

फल, कर्म, तत्व, विज्ञान तथा उस विभु का दर्शन - जाति आदि की कल्पना से रहित - यह दूसरे प्रकार के आगम का लक्षण है।

श्लोक 75 (padma.6.80.75)

आत्मसंवेदनं नित्यं सनातनमतींद्रियम् । चिन्मात्रममृतं ज्ञेयमनंतमजमव्ययम्

ātmasaṁvedanaṁ nityaṁ sanātanamatīṁdriyam cinmātramamṛtaṁ jñeyamanaṁtamajamavyayam

वह आत्म-अनुभूति नित्य, सनातन, इंद्रियों से परे, केवल चैतन्यस्वरूप, अमृत, ज्ञेय, अनंत, अजन्मा और अव्यय है।

श्लोक 76 (padma.6.80.76)

व्यक्ताव्यक्तस्वरूपेण व्यक्तस्थितमनंजनम् । व्याप्ता विष्णुरिति ख्यातं ख्यातभिन्नमवस्थितम्

vyaktāvyaktasvarūpeṇa vyaktasthitamanaṁjanam vyāptā viṣṇuriti khyātaṁ khyātabhinnamavasthitam

व्यक्त और अव्यक्त दोनों स्वरूपों में स्थित, निर्मल, व्यापक - वह 'विष्णु' नाम से प्रसिद्ध है, जो प्रसिद्ध होते हुए भी सामान्य वस्तुओं से भिन्न स्थित है।

श्लोक 77 (padma.6.80.77)

योगिध्येयमविज्ञेयं परमार्थपराङ्मुखैः । लक्ष्यते बुद्धिभिर्भिन्नमभिभिन्नं न चात्मनि

yogidhyeyamavijñeyaṁ paramārthaparāṅmukhaiḥ lakṣyate buddhibhirbhinnamabhibhinnaṁ na cātmani

वह योगियों के ध्यान का विषय है, परमार्थ से विमुख लोगों के लिए अज्ञेय है; भिन्न-भिन्न बुद्धियों द्वारा भिन्न रूप से लक्षित होता है, किंतु स्वयं आत्मा में वह भिन्न नहीं है।

श्लोक 78 (padma.6.80.78)

शृणुष्वावहितस्तात कथयामि तवानघ । यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वं पृच्छतो मम सुव्रत

śṛṇuṣvāvahitastāta kathayāmi tavānagha yatproktaṁ brahmaṇā pūrvaṁ pṛcchato mama suvrata

हे तात! हे निष्पाप! हे उत्तम व्रतधारी! सावधान होकर सुनो, मैं तुम्हें वही बताता हूँ जो पहले ब्रह्मा ने मेरे पूछने पर कहा था।

श्लोक 79 (padma.6.80.79)

कदाचिद्ब्रह्मलोकस्थं ब्रह्माणं च पितामहम् । प्रणिपत्य यथान्यायमपृच्छमजमव्ययम्

kadācidbrahmalokasthaṁ brahmāṇaṁ ca pitāmaham praṇipatya yathānyāyamapṛcchamajamavyayam

एक बार ब्रह्मलोक में स्थित पितामह ब्रह्मा को विधिपूर्वक प्रणाम कर मैंने उस अजन्मा, अव्यय से पूछा था -

श्लोक 80 (padma.6.80.80)

किमु ज्ञानं परं प्रोक्तं कश्च योगः परो मतः । एतन्मे तत्त्वतो ब्रह्मन्समाचक्ष्व पितामह

kimu jñānaṁ paraṁ proktaṁ kaśca yogaḥ paro mataḥ etanme tattvato brahmansamācakṣva pitāmaha

- हे ब्रह्मन्! हे पितामह! कौन-सा ज्ञान परम कहा गया है और कौन-सा योग परम माना गया है? यह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 81 (padma.6.80.81)

ब्रह्मोवाच । शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् । अल्पग्रंथं प्रभूतार्थमदुःखोपासनक्रियम्

brahmovāca śṛṇuṣvāvahitastāta jñānayogamanuttamam alpagraṁthaṁ prabhūtārthamaduḥkhopāsanakriyam

ब्रह्मा ने कहा - हे तात! सावधान होकर सुनो - मैं वह सर्वोत्तम ज्ञान-योग बताता हूँ, जो शब्दों में संक्षिप्त, अर्थ में विशाल तथा जिसकी उपासना-विधि दुःखरहित है।

श्लोक 82 (padma.6.80.82)

यः परं परया प्रोक्तः पुरुषः पंचविंशकः । स एव सर्वभूतात्मा तेन इत्यभिधीयते

yaḥ paraṁ parayā proktaḥ puruṣaḥ paṁcaviṁśakaḥ sa eva sarvabhūtātmā tena ityabhidhīyate

जो परम पुरुष परा वाणी द्वारा पच्चीसवाँ तत्व कहा गया है, वही सभी प्राणियों की आत्मा है; उसी कारण वह 'तेन' इस प्रकार कहा जाता है।

श्लोक 83 (padma.6.80.83)

नारायणो जगद्धाम परमात्मा सनातनः । जगतः सृष्टिसंहार परिपालनतत्परः

nārāyaṇo jagaddhāma paramātmā sanātanaḥ jagataḥ sṛṣṭisaṁhāra paripālanatatparaḥ

नारायण ही जगत के आधार, सनातन परमात्मा हैं, जो जगत की सृष्टि, संहार और पालन में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 84 (padma.6.80.84)

त्रयाणामात्मनां चैको देवदेवः सनातनः । आराध्यः सर्वदा ब्रह्मन्ते पश्यंति जगत्पतिम्

trayāṇāmātmanāṁ caiko devadevaḥ sanātanaḥ ārādhyaḥ sarvadā brahmante paśyaṁti jagatpatim

हे ब्रह्मन्! वे तीनों देवात्माओं के भी एकमात्र सनातन देवाधिदेव हैं, जो सदा आराधना के योग्य हैं; वे योगीजन उस जगत्पति को देखते हैं।

श्लोक 85 (padma.6.80.85)

यथा जगदवस्थानं यथा कालांतरे पुनः । भूतं भव्यं भविष्यं च विप्रकृष्टं तथैव च

yathā jagadavasthānaṁ yathā kālāṁtare punaḥ bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyaṁ ca viprakṛṣṭaṁ tathaiva ca

जगत की जो स्थिति है, कालांतर में जो पुनः होगी, जो हुआ, जो होगा और जो हो रहा है, तथा जो अत्यंत दूरस्थ है -

श्लोक 86 (padma.6.80.86)

स्थूलं सूक्ष्मं तथा चान्यत्पश्यंति ज्ञानचक्षुषा । तच्चित्तास्तद्गतप्राणा नारायणपरायणाः

sthūlaṁ sūkṣmaṁ tathā cānyatpaśyaṁti jñānacakṣuṣā taccittāstadgataprāṇā nārāyaṇaparāyaṇāḥ

- स्थूल, सूक्ष्म तथा अन्य सब कुछ - नारायण में मन और प्राण को लगाए, नारायण-परायण योगीजन ज्ञान-नेत्र से देखते हैं।

श्लोक 87 (padma.6.80.87)

अन्यथा मंदबुद्धीनां प्रतिभाति दुरात्मनाम् । कुतर्कज्ञानदुष्टानां विभक्तेंद्रियवादिनाम्

anyathā maṁdabuddhīnāṁ pratibhāti durātmanām kutarkajñānaduṣṭānāṁ vibhakteṁdriyavādinām

इसके विपरीत मंदबुद्धि, दुरात्मा, कुतर्क से दूषित ज्ञान वाले तथा इंद्रियों के आधार पर भिन्न-भिन्न वाद करने वालों को यह भिन्न ही प्रतीत होता है।

श्लोक 88 (padma.6.80.88)

नारद उवाच । श्रूयतामन्यदपि वै कथ्यमानं मयानघ । ब्रह्मणैव पुरा प्रोक्तं जगतः कारणात्मना

nārada uvāca śrūyatāmanyadapi vai kathyamānaṁ mayānagha brahmaṇaiva purā proktaṁ jagataḥ kāraṇātmanā

नारद ने कहा - हे निष्पाप! एक और बात सुनो जो मैं कहने जा रहा हूँ, जिसे पहले जगत के कारणस्वरूप ब्रह्मा ने ही कहा था।

श्लोक 89 (padma.6.80.89)

देवानामिंद्रमुख्यानामृषीणां चैव सुव्रत । हितानि कथयामास पृच्छतां कमलासनः

devānāmiṁdramukhyānāmṛṣīṇāṁ caiva suvrata hitāni kathayāmāsa pṛcchatāṁ kamalāsanaḥ

हे सुव्रत! इंद्र आदि प्रमुख देवताओं तथा ऋषियों के पूछने पर कमलासन ने उनके हित की बातें कही थीं।

श्लोक 90 (padma.6.80.90)

ब्रह्मोवाच । नारायणपरो धर्मस्तथालोकाश्च शाश्वताः । नारायणपरा यज्ञाः शास्त्राणि विविधानि च

brahmovāca nārāyaṇaparo dharmastathālokāśca śāśvatāḥ nārāyaṇaparā yajñāḥ śāstrāṇi vividhāni ca

ब्रह्मा ने कहा - धर्म नारायण-परायण है, और शाश्वत लोक भी नारायण-परायण हैं। यज्ञ नारायण-परायण हैं, और विविध शास्त्र भी।

श्लोक 91 (padma.6.80.91)

वेदाः सांगास्तथा चान्ये विष्णुर्विश्वेश्वरो हरिः । पृथिव्यादीनि विबुधाः पंचभूतानि सोऽव्ययः

vedāḥ sāṁgāstathā cānye viṣṇurviśveśvaro hariḥ pṛthivyādīni vibudhāḥ paṁcabhūtāni so'vyayaḥ

वेद अपने अंगों सहित तथा अन्य सभी नारायण-परायण हैं। विश्वेश्वर हरि ही विष्णु हैं; हे विद्वानों! पृथ्वी आदि पाँच महाभूत भी वही अव्यय स्वरूप हैं।

श्लोक 92 (padma.6.80.92)

सर्वं विष्णुमयं ज्ञेयं विबुधैः सकलं जगत् । तथापि मानुषाः पाप न जानंति विमोहिताः

sarvaṁ viṣṇumayaṁ jñeyaṁ vibudhaiḥ sakalaṁ jagat tathāpi mānuṣāḥ pāpa na jānaṁti vimohitāḥ

विद्वानों को यह जानना चाहिए कि सम्पूर्ण जगत विष्णुमय है। फिर भी मोहग्रस्त पापी मनुष्य इसे नहीं जानते।

श्लोक 93 (padma.6.80.93)

तस्यैव मायया व्याप्तं चराचरमिदं जगत् । तन्मनास्तद्गतप्राणो जानाति परमार्थवित्

tasyaiva māyayā vyāptaṁ carācaramidaṁ jagat tanmanāstadgataprāṇo jānāti paramārthavit

उसी की माया से यह चराचर जगत व्याप्त है। जिसका मन और प्राण उसी में लगा है, वही परमार्थ को जानने वाला जान पाता है।

श्लोक 94 (padma.6.80.94)

ईश्वरः सर्वभूतानां विष्णुस्त्रैलोक्यपालकः । तस्मिन्नेतज्जगत्सर्वं तिष्ठति प्रभवत्यपि

īśvaraḥ sarvabhūtānāṁ viṣṇustrailokyapālakaḥ tasminnetajjagatsarvaṁ tiṣṭhati prabhavatyapi

विष्णु ही सभी प्राणियों के ईश्वर और तीनों लोकों के पालक हैं। यह सारा जगत उन्हीं में स्थित है और उन्हीं से उत्पन्न होता है।

श्लोक 95 (padma.6.80.95)

जगत्संहरते रुद्रः पालने विष्णुरुच्यते । उत्पत्तौ चाहमेवात्र तथान्ये लोकपालकाः

jagatsaṁharate rudraḥ pālane viṣṇurucyate utpattau cāhamevātra tathānye lokapālakāḥ

रुद्र जगत का संहार करते हैं, पालन में विष्णु कहे जाते हैं; उत्पत्ति में इस विषय में मैं ही हूँ, तथा अन्य लोकपाल भी हैं।

श्लोक 96 (padma.6.80.96)

सर्वाधारो निराधारः सकलो निष्कलस्तथा । अणुर्महांस्तथाप्यन्यत्तस्माच्च परतः परः

sarvādhāro nirādhāraḥ sakalo niṣkalastathā aṇurmahāṁstathāpyanyattasmācca parataḥ paraḥ

वह सबका आधार होते हुए भी निराधार है, संपूर्ण होते हुए भी अंशरहित है; अणु भी है और महान भी, फिर भी उससे भी परे और श्रेष्ठ है।

श्लोक 97 (padma.6.80.97)

तमेव शरणं यात सर्वसंहारकर्मगम् । स पिता जनितास्माकं कीर्तितो मधुसूदनः

tameva śaraṇaṁ yāta sarvasaṁhārakarmagam sa pitā janitāsmākaṁ kīrtito madhusūdanaḥ

उसी की शरण में जाओ, जो सम्पूर्ण संहार-कर्म में भी संलग्न है। वे मधुसूदन ही हमारे जन्मदाता पिता के रूप में कीर्तित हैं।

श्लोक 98 (padma.6.80.98)

एवमुक्ताः सुराः सर्वे ब्रह्मणा पद्मयोनिना । प्रणेमुः सर्वलोकेशं देवं विष्णुं जनार्दनम्

evamuktāḥ surāḥ sarve brahmaṇā padmayoninā praṇemuḥ sarvalokeśaṁ devaṁ viṣṇuṁ janārdanam

कमल से उत्पन्न ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सभी देवताओं ने सर्वलोकेश देव विष्णु जनार्दन को प्रणाम किया।

श्लोक 99 (padma.6.80.99)

तस्मात्त्वमपि विप्रर्षे नारायणपरो भव । तदन्यः को महोदारः प्रार्थितं दातुर्महति

tasmāttvamapi viprarṣe nārāyaṇaparo bhava tadanyaḥ ko mahodāraḥ prārthitaṁ dāturmahati

इसलिए हे विप्रर्षे! तुम भी नारायण-परायण बनो। उनके अतिरिक्त और कौन इतना महान् उदार है कि जो माँगा जाए वह दे सके?

श्लोक 100 (padma.6.80.100)

पितरं मातरं चैव तमेव पुरुषोत्तमम् । परिगृह्णीष्व लोकेशं देवदेवं जगत्पतिम्

pitaraṁ mātaraṁ caiva tameva puruṣottamam parigṛhṇīṣva lokeśaṁ devadevaṁ jagatpatim

उसी पुरुषोत्तम को अपना पिता और माता मानकर स्वीकार करो - उन्हीं लोकेश्वर, देवाधिदेव, जगत्पति को।

श्लोक 101 (padma.6.80.101)

अग्निकार्येण वै तेन तपसाध्ययनेन वै । तोषयेद्देवदेवेशं गुरुं नित्यमतंद्रितः

agnikāryeṇa vai tena tapasādhyayanena vai toṣayeddevadeveśaṁ guruṁ nityamataṁdritaḥ

अग्निहोत्र-कर्म से, तप से और अध्ययन से - इन सबसे उस देवाधिदेव गुरु को आलस्यरहित होकर सदा प्रसन्न करना चाहिए।

श्लोक 102 (padma.6.80.102)

स्वर्गे क्षयं तथा भोगमनुष्ठेयं तथैव च । परिगृह्णीष्व विप्रर्षे तमेव पुरुषोत्तमम्

svarge kṣayaṁ tathā bhogamanuṣṭheyaṁ tathaiva ca parigṛhṇīṣva viprarṣe tameva puruṣottamam

स्वर्ग में भी क्षय और भोग दोनों हैं - यह जानकर हे विप्रर्षे! उसी पुरुषोत्तम को स्वीकार करो।

श्लोक 103 (padma.6.80.103)

किं तेन मंत्रैर्बहुभिः किं तेन बहुभिर्व्रतैः । ॐ नमोनारायणायेति मंत्रः सर्वार्थसाधकः

kiṁ tena maṁtrairbahubhiḥ kiṁ tena bahubhirvrataiḥ oṁ namonārāyaṇāyeti maṁtraḥ sarvārthasādhakaḥ

अनेक मंत्रों से क्या लाभ, अनेक व्रतों से क्या लाभ? 'ॐ नमो नारायणाय' - यही एक मंत्र सभी अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 104 (padma.6.80.104)

चीरवासा जटी विप्र दंडीमुंडित एव वा । विभूषितो वा विप्रेंद्र न लिंगं धर्मकारणम्

cīravāsā jaṭī vipra daṁḍīmuṁḍita eva vā vibhūṣito vā vipreṁdra na liṁgaṁ dharmakāraṇam

हे विप्र! चाहे कोई वल्कल-वस्त्रधारी हो, जटाधारी हो, दंडधारी हो या मुंडित हो, या आभूषण से सज्जित हो - हे विप्रेंद्र! बाह्य चिह्न ही धर्म का कारण नहीं है।

श्लोक 105 (padma.6.80.105)

ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचारपराः सदा । तेपि यांति परं स्थानं नारायणपरायणाः

ye nṛśaṁsā durātmānaḥ pāpācāraparāḥ sadā tepi yāṁti paraṁ sthānaṁ nārāyaṇaparāyaṇāḥ

जो क्रूर, दुरात्मा और सदा पापाचार में रत रहे हों, वे भी यदि नारायण-परायण हो जाएँ, तो परम स्थान को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 106 (padma.6.80.106)

लिप्यंते न च पापौघैर्वैष्णवं वीतकिल्बिषाः

lipyaṁte na ca pāpaughairvaiṣṇavaṁ vītakilbiṣāḥ

निष्पाप वैष्णव पापों के समूह से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 107 (padma.6.80.107)

पुनंति सकलं लोकं अहिंसाजितमानसाः

punaṁti sakalaṁ lokaṁ ahiṁsājitamānasāḥ

अहिंसा से जिनका मन जीता गया है, ऐसे वैष्णव सम्पूर्ण लोक को पवित्र करते हैं।

श्लोक 108 (padma.6.80.108)

क्षत्रबंधुरिति ख्यातो राजा प्राणिविहिंसकः । प्राप्तवान्परमं धाम वैष्णवं केशवालयात्

kṣatrabaṁdhuriti khyāto rājā prāṇivihiṁsakaḥ prāptavānparamaṁ dhāma vaiṣṇavaṁ keśavālayāt

'क्षत्रबंधु' नामक एक राजा, जो प्राणियों की हिंसा करने वाला था, वह भी केशव के धाम से वैष्णव परम पद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 109 (padma.6.80.109)

अंबरीषो महासत्वो राजा परमतत्ववित् । हृषीकेशं समाराध्य वैष्णवं पदमाप्तवान्

aṁbarīṣo mahāsatvo rājā paramatatvavit hṛṣīkeśaṁ samārādhya vaiṣṇavaṁ padamāptavān

महान् सत्वशाली, परम तत्वज्ञानी राजा अंबरीष ने हृषीकेश की आराधना कर वैष्णव पद प्राप्त किया।

श्लोक 110 (padma.6.80.110)

अन्ये ब्रह्मर्षयः शांता बहवः संशितव्रताः । ध्यात्वा च परमात्मानं संसिद्धिं परमां गताः

anye brahmarṣayaḥ śāṁtā bahavaḥ saṁśitavratāḥ dhyātvā ca paramātmānaṁ saṁsiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

अन्य अनेक शांत, दृढ़-व्रतधारी ब्रह्मर्षि भी परमात्मा का ध्यान कर परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 111 (padma.6.80.111)

प्रह्लादः परमाह्लादः पुरा नारायणं हरिम् । सेवितोऽभ्यर्चितो ध्यातस्तेनैव परिरक्षितः

prahlādaḥ paramāhlādaḥ purā nārāyaṇaṁ harim sevito'bhyarcito dhyātastenaiva parirakṣitaḥ

प्रह्लाद, जो परम आनंदस्वरूप था, उसने पूर्वकाल में नारायण हरि की सेवा की, पूजा की और ध्यान किया, और उन्हीं के द्वारा उसकी रक्षा हुई।

श्लोक 112 (padma.6.80.112)

भरतो नाम तेजस्वी राजा परमधार्मिकः । उपास्यैनं चिरं कालं परां मुक्तिमवाप्तवान्

bharato nāma tejasvī rājā paramadhārmikaḥ upāsyainaṁ ciraṁ kālaṁ parāṁ muktimavāptavān

भरत नामक तेजस्वी, परम धार्मिक राजा ने दीर्घकाल तक उनकी उपासना कर परम मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 113 (padma.6.80.113)

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । केशवाराधनं हित्वा नैव यांति परां गतिम्

brahmacārī gṛhastho vā vānaprastho'tha bhikṣukaḥ keśavārādhanaṁ hitvā naiva yāṁti parāṁ gatim

ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो, वानप्रस्थ हो या संन्यासी - केशव की आराधना को छोड़कर कोई भी परम गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 114 (padma.6.80.114)

जन्मांतरसहस्रेषु यस्य स्यान्मतिरीदृशी । दासोऽहं विष्णुभक्तानामिति सर्वार्थसाधकः

janmāṁtarasahasreṣu yasya syānmatirīdṛśī dāso'haṁ viṣṇubhaktānāmiti sarvārthasādhakaḥ

हजारों जन्मों में भी जिस किसी की ऐसी बुद्धि हो जाए कि 'मैं विष्णुभक्तों का दास हूँ' - यही भावना सभी अर्थों को सिद्ध करने वाली है।

श्लोक 115 (padma.6.80.115)

स याति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः । किं पुनस्तद्गतप्राणाः पुरुषाः संशितव्रताः

sa yāti viṣṇusālokyaṁ puruṣo nātra saṁśayaḥ kiṁ punastadgataprāṇāḥ puruṣāḥ saṁśitavratāḥ

ऐसा पुरुष विष्णु के लोक में निवास प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। फिर जिनके प्राण ही उन्हीं में लगे हैं, ऐसे दृढ़-व्रती पुरुषों की तो बात ही क्या!

श्लोक 116 (padma.6.80.116)

अनन्यमानसैर्नित्यं ध्यातव्यस्तत्वचिंतकैः । नारायणो जगद्व्यापी परमात्मा सनातनः

ananyamānasairnityaṁ dhyātavyastatvaciṁtakaiḥ nārāyaṇo jagadvyāpī paramātmā sanātanaḥ

अनन्यचित्त तत्वचिंतकों द्वारा सदा उस सनातन परमात्मा नारायण का ध्यान करना चाहिए, जो सारे जगत में व्याप्त है।

श्लोक 117 (padma.6.80.117)

भीष्म उवाच । इत्येवमुक्त्वा देवर्षिस्तत्रैवांतरधीयत । परोपकारनिरतो नारदः परमार्थवित्

bhīṣma uvāca ityevamuktvā devarṣistatraivāṁtaradhīyata paropakāranirato nāradaḥ paramārthavit

भीष्म ने कहा - इस प्रकार कहकर, दूसरों के उपकार में तत्पर, परमार्थ के ज्ञाता देवर्षि नारद वहीं से अंतर्धान हो गए।

श्लोक 118 (padma.6.80.118)

पुंडरीकोऽपि धर्मात्मा नारायणपरायणः । ॐ नमो नारायणायेति मंत्रमष्टाक्षरं जपन्

puṁḍarīko'pi dharmātmā nārāyaṇaparāyaṇaḥ oṁ namo nārāyaṇāyeti maṁtramaṣṭākṣaraṁ japan

धर्मात्मा पुंडरीक भी नारायण-परायण होकर 'ॐ नमो नारायणाय' इस आठ अक्षरों वाले मंत्र का जप करने लगा।

श्लोक 119 (padma.6.80.119)

प्रसीद मम विश्वात्मन्निति वाचं वदन्सदा । हृत्पुंडरीके गोविंदं प्रतिष्ठाप्यामृतात्मकम्

prasīda mama viśvātmanniti vācaṁ vadansadā hṛtpuṁḍarīke goviṁdaṁ pratiṣṭhāpyāmṛtātmakam

हे विश्वात्मन्! मुझ पर प्रसन्न हों - ऐसा सदा कहते हुए, वह अमृतस्वरूप गोविंद को अपने हृदय-कमल में स्थापित करता रहा।

श्लोक 120 (padma.6.80.120)

तपस्वी विमले सौम्ये शालग्रामे तपोधनः । उवास चिरमेकाकी निर्द्वंद्वो निष्परिग्रहः

tapasvī vimale saumye śālagrāme tapodhanaḥ uvāsa ciramekākī nirdvaṁdvo niṣparigrahaḥ

वह तपस्वी, तप में धनी, निर्मल और सौम्य शालग्राम क्षेत्र में द्वंद्वरहित और परिग्रहरहित होकर दीर्घकाल तक अकेला रहा।

श्लोक 121 (padma.6.80.121)

स्वप्नेऽपि केशवान्नान्यत्पश्यतीति महामतिः । निद्रापि नैव तस्यासीत्पुरुषार्थविरोधिनी

svapne'pi keśavānnānyatpaśyatīti mahāmatiḥ nidrāpi naiva tasyāsītpuruṣārthavirodhinī

वह महाबुद्धिमान स्वप्न में भी केशव के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखता था; पुरुषार्थ के विरुद्ध जाने वाली नींद भी उसे नहीं आती थी।

श्लोक 122 (padma.6.80.122)

तपसा ब्रह्मचर्येण शौचेन च विशेषतः । जन्मजन्मांतरारूढे संस्कारे च यथा तथा

tapasā brahmacaryeṇa śaucena ca viśeṣataḥ janmajanmāṁtarārūḍhe saṁskāre ca yathā tathā

तप से, ब्रह्मचर्य से और विशेष रूप से शौच से, तथा जन्म-जन्मांतर से आरूढ़ संस्कार के अनुसार -

श्लोक 123 (padma.6.80.123)

प्रसादाद्देवदेवस्य सर्वलोकस्य साक्षिणः । अवाप परमां सिद्धिं वैष्णवीं वीतकिल्बिषः

prasādāddevadevasya sarvalokasya sākṣiṇaḥ avāpa paramāṁ siddhiṁ vaiṣṇavīṁ vītakilbiṣaḥ

- देवाधिदेव, सम्पूर्ण जगत के साक्षी, की कृपा से वह निष्पाप होकर परम वैष्णव सिद्धि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 124 (padma.6.80.124)

शंखचक्रगदापाणिं पीतवाससमच्युतम् । श्यामलं पुंडरीकाक्षं स ददर्श सदाकृतिम्

śaṁkhacakragadāpāṇiṁ pītavāsasamacyutam śyāmalaṁ puṁḍarīkākṣaṁ sa dadarśa sadākṛtim

उसने शंख-चक्र-गदाधारी, पीतांबरधारी, श्यामवर्ण, कमल के समान नेत्रों वाले तथा सदा एकरूप अच्युत का साक्षात् दर्शन किया।

श्लोक 125 (padma.6.80.125)

सिंहा व्याघ्रास्तथा चान्ये मृगाः प्राणिविहिंसकाः । विरोधं सहजं हित्वा समेतास्तस्य संनिधौ

siṁhā vyāghrāstathā cānye mṛgāḥ prāṇivihiṁsakāḥ virodhaṁ sahajaṁ hitvā sametāstasya saṁnidhau

सिंह, व्याघ्र तथा अन्य हिंसक पशु भी अपना सहज वैर त्यागकर उसके समीप एकत्र हो गए।

श्लोक 126 (padma.6.80.126)

विचरंति यथाकामं प्रसन्नेंद्रियवृत्तयः । परस्परहितं रम्यं संप्राप्तं पांडुनंदन

vicaraṁti yathākāmaṁ prasanneṁdriyavṛttayaḥ parasparahitaṁ ramyaṁ saṁprāptaṁ pāṁḍunaṁdana

हे पांडुनंदन! वे प्रसन्न इंद्रियों वाले होकर इच्छानुसार विचरने लगे, और उन्होंने परस्पर रमणीय हित प्राप्त किया।

श्लोक 127 (padma.6.80.127)

तथा प्रसन्नं सलिलं सरसां सरितामपि । ऋतवः सुप्रन्नाश्च विमलेंद्रियसंयुताः

tathā prasannaṁ salilaṁ sarasāṁ saritāmapi ṛtavaḥ suprannāśca vimaleṁdriyasaṁyutāḥ

सरोवरों और नदियों का जल भी निर्मल हो गया; ऋतुएँ भी प्रसन्न और स्वच्छ इंद्रियों से युक्त हो गईं।

श्लोक 128 (padma.6.80.128)

मारुताश्च सुखस्पर्शा वृक्षाः पुष्पफलान्विताः । आनुकूल्यं ययुः सर्वे पदार्थास्तस्य धीमतः

mārutāśca sukhasparśā vṛkṣāḥ puṣpaphalānvitāḥ ānukūlyaṁ yayuḥ sarve padārthāstasya dhīmataḥ

वायु सुखद स्पर्श वाली हो गई, वृक्ष फूलों और फलों से युक्त हो गए - उस बुद्धिमान के लिए सभी पदार्थ अनुकूल हो गए।

श्लोक 129 (padma.6.80.129)

प्रसन्नमभवत्तस्मै प्रसन्नं सचराचरम् । प्रसन्ने देवदेवेशे गोविंदे भक्तवत्सले

prasannamabhavattasmai prasannaṁ sacarācaram prasanne devadeveśe goviṁde bhaktavatsale

भक्तवत्सल देवाधिदेव गोविंद के प्रसन्न होने पर, चराचर सहित सम्पूर्ण जगत ही उसके प्रति प्रसन्न हो गया।

श्लोक 130 (padma.6.80.130)

ततः कदाचिद्भगवान्पुंडरीकस्य धीमतः । आविरासीज्जगन्नाथः पुंडरीकायतेक्षणः

tataḥ kadācidbhagavānpuṁḍarīkasya dhīmataḥ āvirāsījjagannāthaḥ puṁḍarīkāyatekṣaṇaḥ

तब एक बार भगवान जगन्नाथ, जिनके नेत्र कमल के समान विशाल हैं, उस बुद्धिमान पुंडरीक के समक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 131 (padma.6.80.131)

शंखचक्रगदापाणिः पीतवासाः समुज्ज्वलः । पुंडरीकविशालाक्षश्चंद्रबिंबनिभाननः

śaṁkhacakragadāpāṇiḥ pītavāsāḥ samujjvalaḥ puṁḍarīkaviśālākṣaścaṁdrabiṁbanibhānanaḥ

वे शंख-चक्र-गदाधारी, पीतांबरधारी, अत्यंत उज्ज्वल, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले तथा चंद्रबिंब के समान मुखमंडल वाले थे।

श्लोक 132 (padma.6.80.132)

किंकिणीकुंडली हारी केयूरी कटिसूत्रवान् । श्रीवत्सांकः पीतवासाः कौस्तुभेन विभूषितः

kiṁkiṇīkuṁḍalī hārī keyūrī kaṭisūtravān śrīvatsāṁkaḥ pītavāsāḥ kaustubhena vibhūṣitaḥ

वे घुंघरूदार करधनी, कुंडल, हार, बाजूबंद और मेखला से युक्त थे; श्रीवत्स-चिह्न से अंकित, पीतांबरधारी और कौस्तुभमणि से विभूषित थे।

श्लोक 133 (padma.6.80.133)

वनमालापरीतांगः स्फुरन्मुकुटकुंडलः । स्फुरता ब्रह्मसूत्रेण मुक्तादामविलंबिना

vanamālāparītāṁgaḥ sphuranmukuṭakuṁḍalaḥ sphuratā brahmasūtreṇa muktādāmavilaṁbinā

उनके अंग वनमाला से घिरे हुए थे, मुकुट और कुंडल चमक रहे थे, और चमकते हुए यज्ञोपवीत तथा मुक्ताओं की माला लटक रही थी।

श्लोक 134 (padma.6.80.134)

विराजमानो देवेशश्चामरव्यजनादिभिः । देवैः सिद्धैः सदेवेंद्रैर्गंधर्वैर्मुनिभिर्वरैः

virājamāno deveśaścāmaravyajanādibhiḥ devaiḥ siddhaiḥ sadeveṁdrairgaṁdharvairmunibhirvaraiḥ

वे देवेश्वर चंवर और पंखे आदि से सुशोभित थे, तथा देवों, सिद्धों, इंद्र सहित देवगणों, गंधर्वों और श्रेष्ठ मुनियों से -

श्लोक 135 (padma.6.80.135)

यक्षैर्नागवरैश्चैवसेव्यमानोऽप्सरोगणैः । तं दृष्ट्वा देवदेवेशं पुंडरीकोऽनघः स्वयम्

yakṣairnāgavaraiścaivasevyamāno'psarogaṇaiḥ taṁ dṛṣṭvā devadeveśaṁ puṁḍarīko'naghaḥ svayam

- यक्षों, श्रेष्ठ नागों और अप्सराओं के समूहों द्वारा सेवित थे। उन देवाधिदेव को देखकर निष्पाप पुंडरीक स्वयं -

श्लोक 136 (padma.6.80.136)

ततो बुद्ध्या महात्मानं तुष्टाव च जनार्दनम् । प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनांतरात्मना

tato buddhyā mahātmānaṁ tuṣṭāva ca janārdanam prāṁjaliḥ praṇato bhūtvā prahṛṣṭenāṁtarātmanā

- फिर अपनी बुद्धि से उस महात्मा जनार्दन की स्तुति करने लगा, हाथ जोड़कर, प्रणाम कर, हर्षित अंतरात्मा से।

श्लोक 137 (padma.6.80.137)

पुंडरीक उवाच । नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यं सर्वलोकैकचक्षुषे । निरंजनाय नित्याय निर्गुणाय महात्मने

puṁḍarīka uvāca namo'stu viṣṇave tubhyaṁ sarvalokaikacakṣuṣe niraṁjanāya nityāya nirguṇāya mahātmane

पुंडरीक ने कहा - हे विष्णु! आपको नमस्कार है, जो सभी लोकों के एकमात्र नेत्र हैं। हे निर्मल, नित्य, निर्गुण, महात्मन्! आपको नमस्कार।

श्लोक 138 (padma.6.80.138)

त्वमीशः सर्वभूतानां तथैव च निरीश्वरः । तथाभयार्तिनाशायगोविंदोगरुडध्वजः

tvamīśaḥ sarvabhūtānāṁ tathaiva ca nirīśvaraḥ tathābhayārtināśāyagoviṁdogaruḍadhvajaḥ

आप ही सभी प्राणियों के ईश्वर हैं, और साथ ही स्वयं निरीश्वर भी हैं; भय और पीड़ा के नाश के लिए ही आप गोविंद, गरुड़ध्वज कहलाते हैं।

श्लोक 139 (padma.6.80.139)

अनुग्रहेणभूतानांअनेकाकारधारिणे । त्वयि सर्वमिदं प्राहुस्त्वन्मयं चैव केवलम्

anugraheṇabhūtānāṁanekākāradhāriṇe tvayi sarvamidaṁ prāhustvanmayaṁ caiva kevalam

प्राणियों पर अनुग्रह करने के लिए आप अनेक रूप धारण करते हैं। यह सब कुछ आप में ही है, और यह केवल आपसे ही निर्मित है, ऐसा वे ज्ञानीजन कहते हैं।

श्लोक 140 (padma.6.80.140)

त्वमस्माज्जगतो भिन्नो निर्मितं च जगत्त्वया । नमोस्तु नाभिप्रसवनलिनाय नमो नमः

tvamasmājjagato bhinno nirmitaṁ ca jagattvayā namostu nābhiprasavanalināya namo namaḥ

आप इस जगत से भिन्न हैं, और यह जगत भी आपके द्वारा ही निर्मित है। आपकी नाभि से उत्पन्न कमल को नमस्कार है, बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 141 (padma.6.80.141)

नमः समस्तवेदांतविश्रुतात्मविभूतये । त्वमेव सर्वदेवेश कारणं कैटभार्दन

namaḥ samastavedāṁtaviśrutātmavibhūtaye tvameva sarvadeveśa kāraṇaṁ kaiṭabhārdana

समस्त वेदांत में प्रसिद्ध आत्म-विभूति को नमस्कार। हे सर्वदेवेश! हे कैटभ के संहारक! आप ही सबके कारण हैं।

श्लोक 142 (padma.6.80.142)

प्रसीद हृदयावास शंखचक्रगदाधर । नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते

prasīda hṛdayāvāsa śaṁkhacakragadādhara namaḥ samastabhūtānāmādibhūtāya bhūbhṛte

हे हृदय में निवास करने वाले, हे शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले! प्रसन्न हों। सभी प्राणियों के आदि-भूत, पृथ्वी को धारण करने वाले को नमस्कार।

श्लोक 143 (padma.6.80.143)

अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे । यस्य ब्रह्मादयो देवा न विदंति सुरेश्वराः

anekarūparūpāya viṣṇave prabhaviṣṇave yasya brahmādayo devā na vidaṁti sureśvarāḥ

अनेक रूपों में स्वरूप धारण करने वाले, सर्वसमर्थ विष्णु को नमस्कार, जिन्हें ब्रह्मा आदि देवगण और देवेश्वर भी नहीं जानते।

श्लोक 144 (padma.6.80.144)

महिमानं तपोमेयं तस्मै तुभ्यं नमाम्यहम् । वाचामगोचरो यस्य महिमा तव नाप्यते

mahimānaṁ tapomeyaṁ tasmai tubhyaṁ namāmyaham vācāmagocaro yasya mahimā tava nāpyate

जिनकी महिमा तप से भी नहीं मापी जा सकती, उन आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आपकी महिमा वाणी की पहुँच से परे है, वह किसी से भी प्राप्त नहीं की जा सकती।

श्लोक 145 (padma.6.80.145)

जात्यादिभिरसंस्पृष्टः सदा ध्येयोऽसि तत्त्वतः । तथा विभेदरूपेण भक्तानामनुकंपया

jātyādibhirasaṁspṛṣṭaḥ sadā dhyeyo'si tattvataḥ tathā vibhedarūpeṇa bhaktānāmanukaṁpayā

जाति आदि से अस्पृष्ट होकर भी आप सदा तत्वतः ध्यान करने योग्य हैं; तथा भक्तों पर करुणा करके आप भिन्न-भिन्न रूपों में भी प्रकट होते हैं।

श्लोक 146 (padma.6.80.146)

मत्स्यकूर्मादिरूपेण दृश्यसे पुरुषोत्तम । भीष्म उवाच । पुंडरीको जगन्नाथं संस्तुवन्पुरुषोत्तमम्

matsyakūrmādirūpeṇa dṛśyase puruṣottama bhīṣma uvāca puṁḍarīko jagannāthaṁ saṁstuvanpuruṣottamam

हे पुरुषोत्तम! आप मत्स्य, कूर्म आदि रूपों में दिखाई देते हैं। भीष्म ने कहा - इस प्रकार पुरुषोत्तम जगन्नाथ की स्तुति करते हुए पुंडरीक ने -

श्लोक 147 (padma.6.80.147)

तमेवालोकयद्वीर चिरप्रार्थितदर्शनम् । तमाह भगवान्विष्णुः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः

tamevālokayadvīra ciraprārthitadarśanam tamāha bhagavānviṣṇuḥ padmanābhastrivikramaḥ

- हे वीर! उन्हीं का, जिनका दर्शन उसने चिरकाल से चाहा था, अवलोकन करता रहा। तब पद्मनाभ त्रिविक्रम भगवान विष्णु ने उससे कहा -

श्लोक 148 (padma.6.80.148)

पुंडरीकं महाभागं तथा गंभीरया गिरा

puṁḍarīkaṁ mahābhāgaṁ tathā gaṁbhīrayā girā

- उस महाभाग्यशाली पुंडरीक से गंभीर वाणी में।

श्लोक 149 (padma.6.80.149)

श्रीभगवानुवाच । प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पुंडरीक महामते । वरं वृष्णीष्व दास्यामि यत्ते मनसि वर्त्तते

śrībhagavānuvāca prīto'smi vatsa bhadraṁ te puṁḍarīka mahāmate varaṁ vṛṣṇīṣva dāsyāmi yatte manasi varttate

श्रीभगवान ने कहा - हे वत्स! हे महामते पुंडरीक! तुम्हारा कल्याण हो, मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो, जो तुम्हारे मन में है वह मैं दूँगा।

श्लोक 150 (padma.6.80.150)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदेवस्य भाषितम् । एवं विज्ञापयामास पुंडरीको महामतिः

etacchrutvā tu vacanaṁ devadevasya bhāṣitam evaṁ vijñāpayāmāsa puṁḍarīko mahāmatiḥ

देवाधिदेव के इस वचन को सुनकर महामति पुंडरीक ने इस प्रकार निवेदन किया -

श्लोक 151 (padma.6.80.151)

पुंडरीक उवाच । क्वाहमत्यंत दुर्बुद्धिः क्व भवंतो हितैषिणः । यद्धितं मम देवेश तदाज्ञापय माधव

puṁḍarīka uvāca kvāhamatyaṁta durbuddhiḥ kva bhavaṁto hitaiṣiṇaḥ yaddhitaṁ mama deveśa tadājñāpaya mādhava

पुंडरीक ने कहा - कहाँ मैं अत्यंत मंदबुद्धि, और कहाँ हितैषी आप! हे देवेश! हे माधव! जो मेरा हित हो, वही आज्ञा दीजिए।

श्लोक 152 (padma.6.80.152)

एवमुक्तः स भगवान्सुप्रीतश्च ततोऽब्रवीत् । पुंडरीकं महाभागं कृतांजलिमुपस्थितम्

evamuktaḥ sa bhagavānsuprītaśca tato'bravīt puṁḍarīkaṁ mahābhāgaṁ kṛtāṁjalimupasthitam

ऐसा कहे जाने पर वे भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए और हाथ जोड़े खड़े महाभाग्यशाली पुंडरीक से बोले -

श्लोक 153 (padma.6.80.153)

आगच्छ कुशलं तेऽस्तु मयैव सह सुव्रत । उपकारी च नित्यात्मा मया त्वं सर्वदा सह

āgaccha kuśalaṁ te'stu mayaiva saha suvrata upakārī ca nityātmā mayā tvaṁ sarvadā saha

- आओ, तुम्हारा कल्याण हो, हे उत्तम व्रतधारी, मेरे ही साथ चलो। तुम मेरे सदा उपकारी और नित्य साथी बनो, सदा मेरे साथ रहो।

श्लोक 154 (padma.6.80.154)

भीष्म उवाच । एवमुक्तवति प्रीत्या श्रीधरे भक्तवत्सले । दिवि दुंदुभयो नेदुः पुष्पवर्षं पपात ह

bhīṣma uvāca evamuktavati prītyā śrīdhare bhaktavatsale divi duṁdubhayo neduḥ puṣpavarṣaṁ papāta ha

भीष्म ने कहा - भक्तवत्सल श्रीधर द्वारा प्रेमपूर्वक ऐसा कहे जाने पर आकाश में दुंदुभियाँ बज उठीं और पुष्पों की वर्षा हुई।

श्लोक 155 (padma.6.80.155)

ब्रह्मादयस्तथा देवाः साधुसाध्विति चाब्रुवन् । जगुः सिद्धाश्च गंधर्वाः किन्नराश्च विशेषतः

brahmādayastathā devāḥ sādhusādhviti cābruvan jaguḥ siddhāśca gaṁdharvāḥ kinnarāśca viśeṣataḥ

ब्रह्मा आदि देवगण 'साधु साधु' कहने लगे; सिद्ध, गंधर्व और विशेष रूप से किन्नर गान करने लगे।

श्लोक 156 (padma.6.80.156)

तत्रैव तमुपादाय देवदेवो जगत्पतिः । जगाम गरुडारूढः सर्वलोकनमस्कृतः

tatraiva tamupādāya devadevo jagatpatiḥ jagāma garuḍārūḍhaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ

वहीं उसे साथ लेकर देवाधिदेव जगत्पति गरुड़ पर आरूढ़ होकर चले गए, सभी लोकों द्वारा नमस्कृत होते हुए।

श्लोक 157 (padma.6.80.157)

तस्मात्त्वमपि राजेंद्र विष्णुभक्तिसमन्वितः । तच्चित्तस्तद्गतप्राणस्तद्भक्तानां हिते रतः

tasmāttvamapi rājeṁdra viṣṇubhaktisamanvitaḥ taccittastadgataprāṇastadbhaktānāṁ hite rataḥ

इसलिए हे राजेंद्र! तुम भी विष्णु-भक्ति से युक्त होकर, उन्हीं में चित्त और प्राण लगाकर, उनके भक्तों के हित में रत रहो।

श्लोक 158 (padma.6.80.158)

अर्चयित्वा यथायोग्यं भजस्व पुरुषोत्तमम् । शृणुष्व तत्कथां पुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्

arcayitvā yathāyogyaṁ bhajasva puruṣottamam śṛṇuṣva tatkathāṁ puṇyāṁ sarvapāpapraṇāśinīm

यथायोग्य पूजा कर पुरुषोत्तम की भक्ति करो। उनकी वह पुण्यमय कथा सुनो, जो सभी पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 159 (padma.6.80.159)

येनोपायेन राजेंद्र विष्णुभक्तिसमन्वितः । प्रीतो भवति विश्वात्मा तत्कुरुष्व सुविस्तरम्

yenopāyena rājeṁdra viṣṇubhaktisamanvitaḥ prīto bhavati viśvātmā tatkuruṣva suvistaram

हे राजेंद्र! जिस उपाय से विष्णुभक्ति से युक्त होकर विश्वात्मा प्रसन्न होते हैं, उसे विस्तारपूर्वक करो।

श्लोक 160 (padma.6.80.160)

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतैरपि । प्राप्नुवंति नरा नैव नारायणपराङ्मुखाः

aśvamedhaśatairiṣṭvā vājapeyaśatairapi prāpnuvaṁti narā naiva nārāyaṇaparāṅmukhāḥ

सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ करके भी, जो लोग नारायण से विमुख हैं, वे उस फल को नहीं प्राप्त करते।

श्लोक 161 (padma.6.80.161)

सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति

sakṛduccaritaṁ yena harirityakṣaradvayam baddhaḥ parikarastena mokṣāya gamanaṁ prati

जिसने एक बार भी 'हरि' इन दो अक्षरों का उच्चारण किया है, उसने मोक्ष की ओर जाने के लिए कमर कस ली है।

श्लोक 162 (padma.6.80.162)

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिंदीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः

lābhasteṣāṁ jayasteṣāṁ kutasteṣāṁ parājayaḥ yeṣāmiṁdīvaraśyāmo hṛdayastho janārdanaḥ

जिनके हृदय में नीलकमल के समान श्याम जनार्दन विराजमान हैं, उनका ही लाभ है, उनकी ही विजय है - उनकी पराजय कहाँ से हो सकती है?

श्लोक 163 (padma.6.80.163)

य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वापि समाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति

ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ paṭhedvāpi samāhitaḥ sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो कोई इसे नित्य सुनता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 164 (padma.6.80.164)

ईश्वर उवाच । एतद्वै नाममाहात्म्यं श्रुत्वा वै नगनंदिनि । धर्मार्थकाममोक्षास्तु भवंति च न संशयः

īśvara uvāca etadvai nāmamāhātmyaṁ śrutvā vai naganaṁdini dharmārthakāmamokṣāstu bhavaṁti ca na saṁśayaḥ

ईश्वर ने कहा - हे पर्वतपुत्री! इस नाम-माहात्म्य को सुनकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - ये सब प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 165 (padma.6.80.165)

शुक्ले कुलेऽवतीर्णो यो ब्राह्मणो वेदतत्परः । वैष्णवो विष्णुरूपोऽसौ नान्यो विप्रस्तु कर्हिचित्

śukle kule'vatīrṇo yo brāhmaṇo vedatatparaḥ vaiṣṇavo viṣṇurūpo'sau nānyo viprastu karhicit

जो ब्राह्मण शुद्ध कुल में जन्मा और वेद में तत्पर है, यदि वह वैष्णव है तो वह साक्षात् विष्णुस्वरूप ही है; अन्य ब्राह्मण कभी वैसा नहीं होता।

श्लोक 166 (padma.6.80.166)

मुखे नामोच्चरन्विष्णोर्हृदये ध्यानतत्परः । शंखचक्रधरो विद्वन्मालां तुलसिजां दधत्

mukhe nāmoccaranviṣṇorhṛdaye dhyānatatparaḥ śaṁkhacakradharo vidvanmālāṁ tulasijāṁ dadhat

मुख से विष्णु के नाम का उच्चारण करते हुए, हृदय में ध्यान में तत्पर, शंख-चक्र धारण करने वाला, विद्वान, तुलसी की माला धारण करने वाला -

श्लोक 167 (padma.6.80.167)

जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो भुक्त्वा भोगांस्त्वनेकशः । एकविंशतिकुलैः सार्द्धं विष्णुलोके स मोदते

jīvanmuktaḥ sa vijñeyo bhuktvā bhogāṁstvanekaśaḥ ekaviṁśatikulaiḥ sārddhaṁ viṣṇuloke sa modate

- ऐसा व्यक्ति जीवन्मुक्त जानना चाहिए। अनेक भोगों को भोगकर वह अपने इक्कीस कुलों सहित विष्णुलोक में आनंद करता है।

श्लोक 168 (padma.6.80.168)

पुंडरीको यथा शक्त्या मुक्तो ह्यत्र न संशयः । भक्तिभावेन गोविंदस्तुष्टिं प्राप्नोति शाश्वतीम्

puṁḍarīko yathā śaktyā mukto hyatra na saṁśayaḥ bhaktibhāvena goviṁdastuṣṭiṁ prāpnoti śāśvatīm

जैसे पुंडरीक अपनी भक्ति के द्वारा यहाँ से मुक्त हुआ, इसमें संदेह नहीं; भक्तिभाव से गोविंद शाश्वत संतोष प्राप्त कराते हैं।

श्लोक 169 (padma.6.80.169)

कलौ वै हरिगीतं तु स्वगृहे वा विशेषतः । सामगानसमं प्रोक्तं देवार्चनसमाधिषु

kalau vai harigītaṁ tu svagṛhe vā viśeṣataḥ sāmagānasamaṁ proktaṁ devārcanasamādhiṣu

कलियुग में हरि-गीत का गान, विशेष रूप से अपने घर में, सामगान के समान कहा गया है, तथा देवपूजा और समाधि में भी उसी के समान फलदायक है।

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