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उत्तर खण्ड · अध्याय 81

गंगा माहात्म्य

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

श्लोक 1 (padma.6.81.1)

पार्वत्युवाच । गंगायाश्चैव माहात्म्यं पुनर्वद महामते । यच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे वीतरागाः पुनः पुनः

pārvatyuvāca gaṁgāyāścaiva māhātmyaṁ punarvada mahāmate yacchrutvā munayaḥ sarve vītarāgāḥ punaḥ punaḥ

पार्वती ने कहा - हे महामते! अब गंगा की महिमा फिर से कहिए, जिसे सुनकर सभी मुनि बार-बार वीतराग हो जाते हैं।

श्लोक 2 (padma.6.81.2)

माहात्म्यं कीदृशं चैव तस्याः सर्वेश्वर प्रभो । उत्पत्तिश्च श्रुता पूर्वं महिमा न श्रुतो मया । त्वमाद्यः सर्वभूतानां त्वं देवश्च सनातनः

māhātmyaṁ kīdṛśaṁ caiva tasyāḥ sarveśvara prabho utpattiśca śrutā pūrvaṁ mahimā na śruto mayā tvamādyaḥ sarvabhūtānāṁ tvaṁ devaśca sanātanaḥ

हे सर्वेश्वर! हे प्रभो! उसकी क्या महिमा है? मैंने पहले उसकी उत्पत्ति तो सुनी है, किंतु महिमा नहीं सुनी। आप ही सभी प्राणियों के आदि हैं, आप ही सनातन देव हैं।

श्लोक 3 (padma.6.81.3)

महादेव उवाच । बृहस्पतिसमं बुद्ध्या शक्रतुल्यपराक्रमम् । शरतल्पगतं भीष्मं ऋषयो द्रष्टुमाययुः

mahādeva uvāca bṛhaspatisamaṁ buddhyā śakratulyaparākramam śaratalpagataṁ bhīṣmaṁ ṛṣayo draṣṭumāyayuḥ

महादेव ने कहा - बुद्धि में बृहस्पति के समान और पराक्रम में इंद्र के तुल्य, शर-शय्या पर पड़े हुए भीष्म को देखने के लिए ऋषिगण आए।

श्लोक 4 (padma.6.81.4)

अत्रिर्वसिष्ठश्च भृगुः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । अंगिरावगौतमोऽगस्त्यः सुमतिस्त्वापुरात्मवान्

atrirvasiṣṭhaśca bhṛguḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ aṁgirāvagautamo'gastyaḥ sumatistvāpurātmavān

अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, गौतम, अगस्त्य और आत्मसंयमी सुमति - ये सभी वहाँ आए।

श्लोक 5 (padma.6.81.5)

विश्वामित्रः स्थूलशिराः सर्वज्ञः प्रमथाधिपः । रैभ्यो बृहस्पतिर्व्यासः पावनः कश्यपो ध्रुवः

viśvāmitraḥ sthūlaśirāḥ sarvajñaḥ pramathādhipaḥ raibhyo bṛhaspatirvyāsaḥ pāvanaḥ kaśyapo dhruvaḥ

विश्वामित्र, स्थूलशिरा, सर्वज्ञ, प्रमथों के अधिपति, रैभ्य, बृहस्पति, व्यास, पावन, कश्यप और ध्रुव -

श्लोक 6 (padma.6.81.6)

दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कंडेयोऽथ गालवः । उशनाथ भरद्वाजः क्रतुरास्तीक एव च

durvāsā jamadagniśca mārkaṁḍeyo'tha gālavaḥ uśanātha bharadvājaḥ kraturāstīka eva ca

दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कंडेय, गालव, उशना, भरद्वाज, क्रतु और आस्तीक -

श्लोक 7 (padma.6.81.7)

स्थूलाक्षः सर्वलोकाक्षः कण्वो मेधातिथिः कुशः । नारदः पर्वतश्चैव सुधन्वा च्यवनो द्विजः

sthūlākṣaḥ sarvalokākṣaḥ kaṇvo medhātithiḥ kuśaḥ nāradaḥ parvataścaiva sudhanvā cyavano dvijaḥ

स्थूलाक्ष, सर्वलोकाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कुश, नारद, पर्वत, सुधन्वा और द्विज च्यवन -

श्लोक 8 (padma.6.81.8)

मतिभूर्भुवनो धौम्यः शतानंदोकृतव्रणः । जामदग्न्योऽथ रामश्च ऋचीकश्चैवमादयः

matibhūrbhuvano dhaumyaḥ śatānaṁdokṛtavraṇaḥ jāmadagnyo'tha rāmaśca ṛcīkaścaivamādayaḥ

मतिभू, भुवन, धौम्य, शतानंद, अकृतव्रण, जमदग्नि-पुत्र परशुराम और ऋचीक - ये सब तथा और भी अनेक ऋषि आए।

श्लोक 9 (padma.6.81.9)

तान्प्रणम्य यथान्यायं धर्मपुत्रः सहानुजः । पूजयामास विधिवज्जगत्पूज्यांस्तु तेजसः

tānpraṇamya yathānyāyaṁ dharmaputraḥ sahānujaḥ pūjayāmāsa vidhivajjagatpūjyāṁstu tejasaḥ

उन विश्व-पूज्य तेजस्वियों को धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) ने अपने छोटे भाइयों सहित यथाविधि प्रणाम किया और विधिपूर्वक पूजा की।

श्लोक 10 (padma.6.81.10)

ते पूजिता महात्मानः सुखासीनास्तपोधनाः । भीष्माश्रिताः कथाश्चक्रुर्दिव्यधर्माश्रितास्तथा

te pūjitā mahātmānaḥ sukhāsīnāstapodhanāḥ bhīṣmāśritāḥ kathāścakrurdivyadharmāśritāstathā

वे पूजित तपोधन महात्मा सुखपूर्वक बैठकर भीष्म से संबंधित तथा दिव्य धर्म से संबंधित कथाएँ कहने लगे।

श्लोक 11 (padma.6.81.11)

कथांते तु ततस्तेषां ऋषीणां भावितात्मनाम् । प्रणम्य शिरसा भीष्मं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरः

kathāṁte tu tatasteṣāṁ ṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām praṇamya śirasā bhīṣmaṁ papracchedaṁ yudhiṣṭhiraḥ

उन शुद्धचित्त ऋषियों की कथा समाप्त होने पर युधिष्ठिर ने भीष्म को सिर झुकाकर प्रणाम कर यह प्रश्न पूछा।

श्लोक 12 (padma.6.81.12)

युधिष्ठिर उवाच । के देशास्तु महापुण्याः के शैलाः केऽपिचाश्रमाः । सेव्या धर्मार्थिभिर्नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह

yudhiṣṭhira uvāca ke deśāstu mahāpuṇyāḥ ke śailāḥ ke'picāśramāḥ sevyā dharmārthibhirnityaṁ tanme brūhi pitāmaha

युधिष्ठिर ने कहा - हे पितामह! कौन से देश महापुण्यशाली हैं, कौन से पर्वत हैं, कौन से आश्रम हैं, जिनका धर्मार्थियों को सदा सेवन करना चाहिए - यह मुझे बताइए।

श्लोक 13 (padma.6.81.13)

भीष्म उवाच । अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं नरोत्तम । शिलोंछवृत्तेः संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर

bhīṣma uvāca atraivodāharaṁtīmamitihāsaṁ narottama śiloṁchavṛtteḥ saṁvādaṁ siddhasya ca yudhiṣṭhira

भीष्म ने कहा - हे नरोत्तम! हे युधिष्ठिर! इस विषय में शिलोंछवृत्ति (बिखरे अन्न-कण बीनकर जीवनयापन करने वाले) और एक सिद्ध पुरुष के संवाद का यह इतिहास दिया जाता है।

श्लोक 14 (padma.6.81.14)

कश्चित्सिद्धः परिक्रम्य समस्तां पृथिवीमिमाम् । उंछवृत्तेः शिबेराजन्गृहं प्राप्तो महात्मनः

kaścitsiddhaḥ parikramya samastāṁ pṛthivīmimām uṁchavṛtteḥ śiberājangṛhaṁ prāpto mahātmanaḥ

कोई सिद्ध पुरुष इस सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके शिलोंछवृत्ति से जीवनयापन करने वाले महात्मा शिबि के घर आ पहुँचा।

श्लोक 15 (padma.6.81.15)

आत्मविद्यासु तत्वज्ञः सर्वदा स जितेंद्रियः । रागद्वेषपरित्यक्तः कुशली ज्ञानकर्मसु

ātmavidyāsu tatvajñaḥ sarvadā sa jiteṁdriyaḥ rāgadveṣaparityaktaḥ kuśalī jñānakarmasu

वह आत्मविद्या में तत्वज्ञ, सदा जितेंद्रिय, राग-द्वेष से रहित तथा ज्ञान और कर्म दोनों में कुशल था।

श्लोक 16 (padma.6.81.16)

वैष्णवेषु सदा श्रेष्ठो विष्णुधर्मपरायणः । अनिंदको वैष्णवानां सदा धर्मपरायणः

vaiṣṇaveṣu sadā śreṣṭho viṣṇudharmaparāyaṇaḥ aniṁdako vaiṣṇavānāṁ sadā dharmaparāyaṇaḥ

वह वैष्णवों में सदा श्रेष्ठ, विष्णु-धर्म में परायण, वैष्णवों की कभी निंदा न करने वाला तथा सदा धर्मपरायण था।

श्लोक 17 (padma.6.81.17)

योगाभ्यासरतो नित्यं शंखचक्रविधारकः । त्रिकालपूजा तत्वज्ञः श्रीकंठेऽनुरतः सदा

yogābhyāsarato nityaṁ śaṁkhacakravidhārakaḥ trikālapūjā tatvajñaḥ śrīkaṁṭhe'nurataḥ sadā

वह सदा योगाभ्यास में रत, शंख-चक्र धारण करने वाला, त्रिकाल-पूजा के तत्व का ज्ञाता तथा शिव में भी सदा अनुरक्त था।

श्लोक 18 (padma.6.81.18)

वेदविद्यासु विदुषो धर्माधर्मविचारकः । वेदपाठव्रतो नित्यं नित्यं चातिथिपूजकः

vedavidyāsu viduṣo dharmādharmavicārakaḥ vedapāṭhavrato nityaṁ nityaṁ cātithipūjakaḥ

वह वेदविद्या में विद्वान, धर्म-अधर्म का विवेचन करने वाला, सदा वेदपाठ-व्रती तथा सदा अतिथि-पूजक था।

श्लोक 19 (padma.6.81.19)

सतीर्थमतियुक्तस्तु शिलोंछेषु स्थितः सदा । चतुर्वेदेषु यद्ध्यानं गीतं यद्यत्स्वयंभुवा

satīrthamatiyuktastu śiloṁcheṣu sthitaḥ sadā caturvedeṣu yaddhyānaṁ gītaṁ yadyatsvayaṁbhuvā

वह तीर्थों की समझ से युक्त तथा सदा शिलोंछवृत्ति में स्थित था। चारों वेदों में जो ध्यान वर्णित है, स्वयंभू द्वारा जो कुछ गाया गया है -

श्लोक 20 (padma.6.81.20)

तत्सर्वं स च जानाति द्विजो विष्णुस्वरूपधृक् । नानाधर्मार्थविशदो ह्यव्ययेष्टमतिः सदा

tatsarvaṁ sa ca jānāti dvijo viṣṇusvarūpadhṛk nānādharmārthaviśado hyavyayeṣṭamatiḥ sadā

- वह ब्राह्मण, जो विष्णु के स्वरूप को धारण करने वाला था, वह सब जानता था। वह विविध धर्मों और अर्थों में विशद ज्ञान वाला तथा सदा अव्यय परब्रह्म में स्थिर बुद्धि वाला था।

श्लोक 21 (padma.6.81.21)

एकस्मिन्नेव काले तु गतोऽसौ वै शिबेर्गृहम् । तं दृष्ट्वा विधिवच्चैव कृत्वातिथ्यं महामनाः

ekasminneva kāle tu gato'sau vai śibergṛham taṁ dṛṣṭvā vidhivaccaiva kṛtvātithyaṁ mahāmanāḥ

एक समय वह सिद्ध शिबि के घर पहुँचा। उसे देखकर उस महामना ने विधिपूर्वक उसका आतिथ्य किया।

श्लोक 22 (padma.6.81.22)

शिबिः संपृच्छयामास देशानां हितकारणम्

śibiḥ saṁpṛcchayāmāsa deśānāṁ hitakāraṇam

शिबि ने उससे विभिन्न देशों की कल्याणकारी बातें पूछीं।

श्लोक 23 (padma.6.81.23)

उंछवृत्तिरुवाच । के देशाः के जनपदाः के शैलाः केऽपि चाश्रमाः । पुण्या द्विजवर प्रीत्या मह्यं निर्देष्टुमर्हसि

uṁchavṛttiruvāca ke deśāḥ ke janapadāḥ ke śailāḥ ke'pi cāśramāḥ puṇyā dvijavara prītyā mahyaṁ nirdeṣṭumarhasi

शिलोंछवृत्ति वाले शिबि ने कहा - हे द्विजवर! कौन से देश, कौन से जनपद, कौन से पर्वत और कौन से आश्रम पुण्यमय हैं - कृपया प्रेमपूर्वक मुझे बताइए।

श्लोक 24 (padma.6.81.24)

सिद्ध उवाच । ते देशास्ते जनपदास्ते शैलास्तेऽपि चाश्रमाः । पुण्यास्त्रिपथगा येषां मध्ये नित्यं सरिद्वरा

siddha uvāca te deśāste janapadāste śailāste'pi cāśramāḥ puṇyāstripathagā yeṣāṁ madhye nityaṁ saridvarā

सिद्ध ने कहा - वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही पर्वत और वे ही आश्रम पुण्यमय हैं, जिनके मध्य से त्रिपथगा, वह श्रेष्ठ नदी, सदा प्रवाहित होती है।

श्लोक 25 (padma.6.81.25)

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः । गतिं तां न लभेज्जंतुर्गंगां संसेव्य यां लभेत्

tapasā brahmacaryeṇa yajñaistyāgena vā punaḥ gatiṁ tāṁ na labhejjaṁturgaṁgāṁ saṁsevya yāṁ labhet

तप से, ब्रह्मचर्य से, यज्ञों से अथवा त्याग से भी जीव उस गति को प्राप्त नहीं कर सकता, जो गंगा की सेवा करने से वह प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 26 (padma.6.81.26)

स्नातानां तत्र पयसि गांगेये नियतात्मनाम् । तुष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि

snātānāṁ tatra payasi gāṁgeye niyatātmanām tuṣṭirbhavati yā puṁsāṁ na sā kratuśatairapi

वहाँ गंगाजल में स्नान करने वाले संयमी पुरुषों को जो संतोष प्राप्त होता है, वह सौ यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 27 (padma.6.81.27)

अपहृत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः । तथापहृत्य पाप्मानं भाति गंगाजलाप्लुतः

apahṛtya tamastīvraṁ yathā bhātyudaye raviḥ tathāpahṛtya pāpmānaṁ bhāti gaṁgājalāplutaḥ

जैसे सूर्य उदय होकर घोर अंधकार को हरकर प्रकाशित होता है, वैसे ही गंगाजल में स्नान किया हुआ पुरुष पाप को हरकर प्रकाशमान होता है।

श्लोक 28 (padma.6.81.28)

अग्निं प्राप्य यथा विप्र तूलराशिर्विनश्यति । तथा गंगावगाहश्च सर्वं पापं व्यपोहति

agniṁ prāpya yathā vipra tūlarāśirvinaśyati tathā gaṁgāvagāhaśca sarvaṁ pāpaṁ vyapohati

हे विप्र! जैसे अग्नि पाकर रूई का ढेर नष्ट हो जाता है, वैसे ही गंगा में स्नान करने से सभी पाप दूर हो जाते हैं।

श्लोक 29 (padma.6.81.29)

यस्तु सूर्यांशुसंतप्तं गांगेयं सलिलं पिबेत् । स गोनीहारनिर्मुक्तः पावकाद्धि विशिष्यते

yastu sūryāṁśusaṁtaptaṁ gāṁgeyaṁ salilaṁ pibet sa gonīhāranirmuktaḥ pāvakāddhi viśiṣyate

जो सूर्य की किरणों से तपे हुए गंगाजल को पीता है, वह अग्नि से भी बढ़कर विशिष्ट हो जाता है।

श्लोक 30 (padma.6.81.30)

चांद्रायणसहस्रं तु पादेनैकेन यः पुमान् । संप्लुतश्चापि गंगायां यो नरः स विशिष्यते

cāṁdrāyaṇasahasraṁ tu pādenaikena yaḥ pumān saṁplutaścāpi gaṁgāyāṁ yo naraḥ sa viśiṣyate

जो पुरुष एक पैर पर खड़े होकर हजार चांद्रायण व्रत करे, और जो पुरुष गंगा में डुबकी लगाए - वह गंगा-स्नान करने वाला ही विशिष्ट है।

श्लोक 31 (padma.6.81.31)

लंबेदधःशिरा यस्तु वर्षाणामयुतं नरः । मासमेकं तु गंगांभः सेवते यो नरोत्तमः

laṁbedadhaḥśirā yastu varṣāṇāmayutaṁ naraḥ māsamekaṁ tu gaṁgāṁbhaḥ sevate yo narottamaḥ

जो पुरुष दस हजार वर्षों तक सिर के बल लटका रहे, और जो श्रेष्ठ पुरुष एक मास तक गंगाजल की सेवा करता है -

श्लोक 32 (padma.6.81.32)

ब्रह्महत्याविनिर्मुक्तो याति विष्णोरनामयम् । इयं वेणीसमा पुण्या पवित्रा पापनाशिनी

brahmahatyāvinirmukto yāti viṣṇoranāmayam iyaṁ veṇīsamā puṇyā pavitrā pāpanāśinī

- वह ब्रह्महत्या से भी मुक्त होकर विष्णु के निरामय धाम को प्राप्त करता है। यह गंगा त्रिवेणी के समान पुण्यमयी, पवित्र और पापनाशिनी है।

श्लोक 33 (padma.6.81.33)

यस्याः स्मरणमात्रेण बालहा मुच्यते क्षणात् । स प्रयागस्तीर्थराजो वैष्णवानां हि दुर्ल्लभः

yasyāḥ smaraṇamātreṇa bālahā mucyate kṣaṇāt sa prayāgastīrtharājo vaiṣṇavānāṁ hi durllabhaḥ

जिसके स्मरण मात्र से बाल-हत्यारा भी उसी क्षण मुक्त हो जाता है, वह तीर्थराज प्रयाग वैष्णवों के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 34 (padma.6.81.34)

स्नात्वा यत्र नरश्रेष्ठ वैकुंठे सत्वरं व्रजेत् । प्रियाप्रिये न जानाति धर्माधर्मौ न विंदति

snātvā yatra naraśreṣṭha vaikuṁṭhe satvaraṁ vrajet priyāpriye na jānāti dharmādharmau na viṁdati

हे नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करके मनुष्य शीघ्र ही वैकुंठ को जाता है; वह प्रिय-अप्रिय को नहीं जानता, धर्म-अधर्म को भी नहीं जानता।

श्लोक 35 (padma.6.81.35)

स्नात्वा चैव तु गंगायां महापापात्प्रमुच्यते

snātvā caiva tu gaṁgāyāṁ mahāpāpātpramucyate

गंगा में स्नान करने से मनुष्य महापाप से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 36 (padma.6.81.36)

गंगागंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

gaṁgāgaṁgeti yo brūyādyojanānāṁ śatairapi mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो सैकड़ों योजन दूर रहकर भी 'गंगा, गंगा' कहता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 37 (padma.6.81.37)

ब्रह्महा चैव गोघ्नो वा सुरापी बालघातकः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो दिवं याति च सत्वरम्

brahmahā caiva goghno vā surāpī bālaghātakaḥ mucyate sarvapāpebhyo divaṁ yāti ca satvaram

ब्राह्मण की हत्या करने वाला, गौ की हत्या करने वाला, मद्यपान करने वाला अथवा बालक की हत्या करने वाला भी सभी पापों से मुक्त होकर शीघ्र स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 38 (padma.6.81.38)

दर्शनं माधवस्याथ वरस्य दर्शनं तथा । वेण्यां स्नानं प्रकुर्वाणो वैकुंठं प्रति गच्छति

darśanaṁ mādhavasyātha varasya darśanaṁ tathā veṇyāṁ snānaṁ prakurvāṇo vaikuṁṭhaṁ prati gacchati

माधव का दर्शन, तथा श्रेष्ठ तीर्थ का दर्शन, और त्रिवेणी में स्नान करने वाला व्यक्ति वैकुंठ की ओर जाता है।

श्लोक 39 (padma.6.81.39)

उदिते च यथा सूर्ये विलयं याति वै तमः । तथैव तस्यां पापानि नश्यंति स्नानमात्रतः

udite ca yathā sūrye vilayaṁ yāti vai tamaḥ tathaiva tasyāṁ pāpāni naśyaṁti snānamātrataḥ

जैसे सूर्य के उदय होने पर अंधकार लीन हो जाता है, वैसे ही उस गंगा में स्नान मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 40 (padma.6.81.40)

गंगाद्वारे कुशावर्ते गल्लिके(बिल्वके?) नीलपर्वते । स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते

gaṁgādvāre kuśāvarte gallike(bilvake?) nīlaparvate snātvā kanakhale tīrthe punarjanma na vidyate

गंगाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत तथा कनखल तीर्थ में स्नान करने से पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 41 (padma.6.81.41)

एवं ज्ञात्वा नरश्रेष्ठो गंगास्नायी पुनःपुनः । स्नानमात्रेण भो राजन्मुच्यते किल्बिषादतः

evaṁ jñātvā naraśreṣṭho gaṁgāsnāyī punaḥpunaḥ snānamātreṇa bho rājanmucyate kilbiṣādataḥ

हे राजन्! यह जानकर श्रेष्ठ मनुष्य बार-बार गंगा में स्नान करता है; स्नान मात्र से ही वह पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 42 (padma.6.81.42)

देवानां प्रवरो विष्णुर्यज्ञानां चाश्वमेधकः । अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां नदी भागीरथी सदा

devānāṁ pravaro viṣṇuryajñānāṁ cāśvamedhakaḥ aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṁ nadī bhāgīrathī sadā

देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं, यज्ञों में अश्वमेध श्रेष्ठ है, वृक्षों में अश्वत्थ श्रेष्ठ है, और नदियों में सदा भागीरथी श्रेष्ठ है।

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82