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उत्तर खण्ड · अध्याय 97

जलंधर-देव संग्राम

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

श्लोक 1 (padma.6.97.1)

नारद उवाच । ये देवैर्निर्जिताः पूर्वं दैत्याः पातालसंस्थिताः

nārada uvāca ye devairnirjitāḥ pūrvaṁ daityāḥ pātālasaṁsthitāḥ

नारद ने कहा - जो दैत्य पूर्वकाल में देवताओं द्वारा पराजित होकर पाताल में रह रहे थे -

श्लोक 2 (padma.6.97.2)

ते हि भूमंडलं जाता निर्भयास्तमुपासितुम् । कदाचिच्छिन्नशिरसं राहुं दृष्ट्वा स दैत्यराट् । पप्रच्छ भार्गवं विप्रं केनेदं विहितं प्रभो

te hi bhūmaṁḍalaṁ jātā nirbhayāstamupāsitum kadācicchinnaśirasaṁ rāhuṁ dṛṣṭvā sa daityarāṭ papraccha bhārgavaṁ vipraṁ kenedaṁ vihitaṁ prabho

- वे निर्भय होकर उसकी उपासना करने भूमंडल पर आ गए। एक बार कटे हुए सिर वाले राहु को देखकर उस दैत्यराज ने भार्गव ब्राह्मण से पूछा - हे प्रभो! यह किसने किया है?

श्लोक 3 (padma.6.97.3)

भार्गवस्तस्य शिरसश्छेदं राहोः शशंस ह । अमृतार्थं समुद्रस्य मथनं देवकारितम्

bhārgavastasya śirasaśchedaṁ rāhoḥ śaśaṁsa ha amṛtārthaṁ samudrasya mathanaṁ devakāritam

भार्गव ने उसे राहु के सिर के कटने की और अमृत के लिए समुद्र-मंथन की कथा बताई, जिसे देवताओं ने कराया था।

श्लोक 4 (padma.6.97.4)

रत्नापहरणं चैव दैत्यानां च पराभवम् । तच्छ्रुत्वा क्रोधरक्ताक्षः स्वपितुर्मथनं तदा

ratnāpaharaṇaṁ caiva daityānāṁ ca parābhavam tacchrutvā krodharaktākṣaḥ svapiturmathanaṁ tadā

उन्होंने रत्नों के अपहरण तथा दैत्यों की पराजय की भी कथा बताई। इसे सुनकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाला वह अपने पिता के मथन को सुनकर -

श्लोक 5 (padma.6.97.5)

स दूतं प्रेषयामास घस्मरं शक्रसंनिधौ । दूतस्त्रिविष्टपं गत्वा सुधर्मां प्राप्य सत्वरम्

sa dūtaṁ preṣayāmāsa ghasmaraṁ śakrasaṁnidhau dūtastriviṣṭapaṁ gatvā sudharmāṁ prāpya satvaram

- उसने घस्मर नामक दूत को इंद्र के पास भेजा। दूत स्वर्ग में जाकर शीघ्रता से सुधर्मा सभा में पहुँचा।

श्लोक 6 (padma.6.97.6)

गर्वादखर्वमौलिस्तु देवेंद्रं वाक्यमब्रवीत् । दूत उवाच । जलंधरोऽब्धितनयः सर्वदैत्यजनेश्वरः

garvādakharvamaulistu deveṁdraṁ vākyamabravīt dūta uvāca jalaṁdharo'bdhitanayaḥ sarvadaityajaneśvaraḥ

गर्व से सिर ऊँचा किए हुए उसने देवेंद्र से यह वचन कहा। दूत ने कहा - समुद्र-पुत्र जलंधर, जो सभी दैत्यों के स्वामी हैं -

श्लोक 7 (padma.6.97.7)

दूतोऽहं प्रेषितस्तेन स यदाह शृणुष्व तत् । कस्मात्त्वया मम पिता मथितः सागरोऽद्रिणा

dūto'haṁ preṣitastena sa yadāha śṛṇuṣva tat kasmāttvayā mama pitā mathitaḥ sāgaro'driṇā

- ने मुझे दूत बनाकर भेजा है। वे जो कहते हैं, वह सुनो - तुमने पर्वत से मेरे पिता समुद्र को क्यों मथ डाला?

श्लोक 8 (padma.6.97.8)

नीतानि सर्वरत्नानि तानि शीघ्रं प्रयच्छ मे । इति दूतवचः श्रुत्वा विस्मितस्त्रिदशाधिपः । उवाच घस्मरं घोरं भयरोषसमन्वितः

nītāni sarvaratnāni tāni śīghraṁ prayaccha me iti dūtavacaḥ śrutvā vismitastridaśādhipaḥ uvāca ghasmaraṁ ghoraṁ bhayaroṣasamanvitaḥ

जो सभी रत्न ले लिए गए हैं, वे शीघ्र मुझे दे दो। यह दूत का वचन सुनकर आश्चर्यचकित देवेंद्र ने भय और क्रोध से युक्त होकर उस घोर घस्मर से कहा -

श्लोक 9 (padma.6.97.9)

ईश्वर उवाच । शृणु दूत मया पूर्वं मथितः सागरो यथा । अद्रयो मद्भयाद्भीताः स्वकुक्षिस्थास्तथा कृताः

īśvara uvāca śṛṇu dūta mayā pūrvaṁ mathitaḥ sāgaro yathā adrayo madbhayādbhītāḥ svakukṣisthāstathā kṛtāḥ

इंद्र ने कहा - हे दूत! सुनो, जिस प्रकार मैंने पूर्वकाल में समुद्र को मथा था, और पर्वत, मेरे भय से डरकर, अपने गर्भ में छिप गए थे -

श्लोक 10 (padma.6.97.10)

अन्येऽपि मद्द्विषस्तेन रक्षिता दितिजास्तथा । तस्मात्तद्रत्नजातं तु मयाप्यपहृतं किल

anye'pi maddviṣastena rakṣitā ditijāstathā tasmāttadratnajātaṁ tu mayāpyapahṛtaṁ kila

- वैसे ही मेरे अन्य शत्रु दितिपुत्र भी उसी के द्वारा रक्षित हुए थे। इसलिए उससे उत्पन्न रत्न-समूह भी निश्चय ही मैंने ही अपहृत किया था।

श्लोक 11 (padma.6.97.11)

शंखोऽप्येवं पुरा देवानद्विषत्सागरात्मजः । ममानुजेन निहतः प्रविष्टः सागरोदरम्

śaṁkho'pyevaṁ purā devānadviṣatsāgarātmajaḥ mamānujena nihataḥ praviṣṭaḥ sāgarodaram

उसी प्रकार पूर्वकाल में सागर-पुत्र शंख भी देवताओं का शत्रु था; मेरे छोटे भाई द्वारा वह मारा गया और सागर के गर्भ में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 12 (padma.6.97.12)

तद्गच्छ कथयस्वास्यसर्वं मथनकारणम्

tadgaccha kathayasvāsyasarvaṁ mathanakāraṇam

इसलिए जाओ और अपने स्वामी को मथन का यह सारा कारण बताओ।

श्लोक 13 (padma.6.97.13)

नारद उवाच । इत्थं विसर्जितो दूतस्तदेंद्रेणागमद्गृहम् । तदिंद्रवचनं दैत्यराजायाकथयत्तदा

nārada uvāca itthaṁ visarjito dūtastadeṁdreṇāgamadgṛham tadiṁdravacanaṁ daityarājāyākathayattadā

नारद ने कहा - इस प्रकार इंद्र द्वारा विदा किया गया दूत घर लौटा और उसने इंद्र के इस वचन को दैत्यराज को बता दिया।

श्लोक 14 (padma.6.97.14)

तन्निशम्य तदा दैत्यो रोषात्प्रस्फुरिताधरः । उद्योगमकरोत्तूर्णं सर्वदेवजिगीषया

tanniśamya tadā daityo roṣātprasphuritādharaḥ udyogamakarottūrṇaṁ sarvadevajigīṣayā

यह सुनकर वह दैत्य क्रोध से काँपते होठों वाला हो गया और सभी देवताओं पर विजय पाने की इच्छा से शीघ्र युद्ध की तैयारी करने लगा।

श्लोक 15 (padma.6.97.15)

तदोद्योगे सुरेंद्रस्य दिग्भ्यः पातालतस्तथा । दितिजाः प्रत्यपद्यंत शतशः कोटिशस्तथा

tadodyoge sureṁdrasya digbhyaḥ pātālatastathā ditijāḥ pratyapadyaṁta śataśaḥ koṭiśastathā

उस उद्योग के समय, दिशाओं से तथा पाताल से भी दितिपुत्र सैकड़ों और करोड़ों की संख्या में इंद्र के विरुद्ध एकत्र होने लगे।

श्लोक 16 (padma.6.97.16)

अथ शुंभनिशुंभाद्यैर्बलाधिपतिकोटिभिः । गत्वा त्रिविष्टपं दैत्यो युद्धायाधिष्ठितोऽभवत्

atha śuṁbhaniśuṁbhādyairbalādhipatikoṭibhiḥ gatvā triviṣṭapaṁ daityo yuddhāyādhiṣṭhito'bhavat

फिर शुंभ, निशुंभ आदि करोड़ों सेनापतियों के साथ जाकर वह दैत्य स्वर्ग पर युद्ध के लिए डट गया।

श्लोक 17 (padma.6.97.17)

निर्ययुस्त्वमरावत्या देवा युद्धाय दंशिताः । पुरमावृत्य तिष्ठंति दृष्ट्वा दैत्यबलं महत्

niryayustvamarāvatyā devā yuddhāya daṁśitāḥ puramāvṛtya tiṣṭhaṁti dṛṣṭvā daityabalaṁ mahat

देवगण कवच धारण कर अमरावती से युद्ध के लिए निकले, किंतु दैत्यों की विशाल सेना देखकर वे नगर को घेरकर ही खड़े रहे।

श्लोक 18 (padma.6.97.18)

ततः समभवद्युद्धं देवदानवसेनयोः । मुशलैः परिघैर्बाणैर्गदापरशुशक्तिभिः

tataḥ samabhavadyuddhaṁ devadānavasenayoḥ muśalaiḥ parighairbāṇairgadāparaśuśaktibhiḥ

तब देवताओं और दानवों की सेनाओं में मूसलों, गदाओं-जैसे परिघों, बाणों, गदाओं, फरसों और भालों से युद्ध होने लगा।

श्लोक 19 (padma.6.97.19)

तेऽन्योन्यं समधावेतां जघ्नतुश्च परस्परम् । क्षणेनाभवतां सेने रुधिरौघ परिप्लुते

te'nyonyaṁ samadhāvetāṁ jaghnatuśca parasparam kṣaṇenābhavatāṁ sene rudhiraugha pariplute

वे एक-दूसरे पर टूट पड़े और परस्पर एक-दूसरे को मारने लगे। एक ही क्षण में दोनों सेनाएँ रक्त की धाराओं से भीग गईं।

श्लोक 20 (padma.6.97.20)

पतितैः पात्यमानैश्च गजाश्वरथपत्तिभिः । व्यराजत रणे भूमिः संध्याभ्रपटलैरिव

patitaiḥ pātyamānaiśca gajāśvarathapattibhiḥ vyarājata raṇe bhūmiḥ saṁdhyābhrapaṭalairiva

गिरे हुए और गिराए जा रहे हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पैदल सैनिकों से युद्धभूमि संध्या के मेघ-समूहों के समान सुशोभित हो रही थी।

श्लोक 21 (padma.6.97.21)

तत्र युद्धे हतान्दैत्यान्भार्गवस्तूदतिष्ठयत् । विद्ययाऽमृतजीविन्या मंत्रितैस्तोयबिंदुभिः

tatra yuddhe hatāndaityānbhārgavastūdatiṣṭhayat vidyayā'mṛtajīvinyā maṁtritaistoyabiṁdubhiḥ

उस युद्ध में मारे गए दैत्यों को भार्गव अपनी मृतसंजीवनी विद्या से, अभिमंत्रित जल-बिंदुओं के द्वारा फिर से उठा खड़ा करते थे।

श्लोक 22 (padma.6.97.22)

देवास्तत्र तथा युद्धे जीवयेदंगिरस्सुतः । दिव्यौषधीः समानीय द्रोणदेश्याः पुनः पुनः

devāstatra tathā yuddhe jīvayedaṁgirassutaḥ divyauṣadhīḥ samānīya droṇadeśyāḥ punaḥ punaḥ

उसी प्रकार युद्ध में देवताओं को अंगिरा-पुत्र जीवित करते थे, द्रोणाचल पर्वत की दिव्य औषधियाँ बार-बार लाकर।

श्लोक 23 (padma.6.97.23)

दृष्ट्वा देवांस्तथा युद्धे पुनरेव समुत्थितान् । जलंधरः क्रोधवशो भार्गवं वाक्यमब्रवीत्

dṛṣṭvā devāṁstathā yuddhe punareva samutthitān jalaṁdharaḥ krodhavaśo bhārgavaṁ vākyamabravīt

देवताओं को युद्ध में इस प्रकार बार-बार पुनर्जीवित होते देखकर, क्रोध के वशीभूत जलंधर ने भार्गव से यह वचन कहा।

श्लोक 24 (padma.6.97.24)

जलंधर उवाच । मया देवा हता युद्धे उत्तिष्ठंति कथं पुनः । तव संजीवनीविद्या नैवान्यत्रेति विश्रुतम्

jalaṁdhara uvāca mayā devā hatā yuddhe uttiṣṭhaṁti kathaṁ punaḥ tava saṁjīvanīvidyā naivānyatreti viśrutam

जलंधर ने कहा - मेरे द्वारा युद्ध में मारे गए देवता फिर से कैसे उठ खड़े होते हैं? आपकी संजीवनी विद्या के अतिरिक्त और कहीं भी ऐसी विद्या सुनी नहीं गई है।

श्लोक 25 (padma.6.97.25)

भृगुरुवाच । दिव्यौषधीः समानीय द्रोणाद्रेरंगिराः सुरान् । जीवयत्येष वै शीघ्रं द्रोणाद्रिं समपाहर

bhṛguruvāca divyauṣadhīḥ samānīya droṇādreraṁgirāḥ surān jīvayatyeṣa vai śīghraṁ droṇādriṁ samapāhara

भृगु ने कहा - अंगिरा द्रोणाचल पर्वत से दिव्य औषधियाँ लाकर देवताओं को शीघ्र जीवित कर देते हैं। तुम द्रोणाचल पर्वत को ही हरा लो।

श्लोक 26 (padma.6.97.26)

नारद उवाच । इत्युक्तः स तु दैत्येंद्रो नीत्वा द्रोणाचलं तदा । प्राक्षिपत्सागरे तूर्णं पुनरागान्महाहवम्

nārada uvāca ityuktaḥ sa tu daityeṁdro nītvā droṇācalaṁ tadā prākṣipatsāgare tūrṇaṁ punarāgānmahāhavam

नारद ने कहा - ऐसा कहे जाने पर उस दैत्येंद्र ने द्रोणाचल पर्वत को उठाकर शीघ्र समुद्र में फेंक दिया, और फिर महासंग्राम में लौट आया।

श्लोक 27 (padma.6.97.27)

अथ देवान्हतान्दृष्ट्वा द्रोणाद्रिमगमद्गुरुः । तावत्तत्र गिरींद्रं तं न ददर्श सुरार्चितः

atha devānhatāndṛṣṭvā droṇādrimagamadguruḥ tāvattatra girīṁdraṁ taṁ na dadarśa surārcitaḥ

फिर देवताओं को मारा गया देखकर देवगुरु द्रोणाचल पर्वत की ओर गए, किंतु वहाँ देवताओं द्वारा पूजित उस पर्वतराज को उन्होंने नहीं देखा।

श्लोक 28 (padma.6.97.28)

ज्ञात्वा दैत्यहृतं द्रोणं विषण्णो भयविह्वलः । आगत्य दूराद्व्याजह्रे श्वासाकुलितविग्रहः

jñātvā daityahṛtaṁ droṇaṁ viṣaṇṇo bhayavihvalaḥ āgatya dūrādvyājahre śvāsākulitavigrahaḥ

यह जानकर कि द्रोणाचल दैत्य द्वारा हर लिया गया है, वह विषण्ण और भय से व्याकुल हो गया। दूर से आकर, श्वास से व्याकुल शरीर वाले उसने पुकारा -

श्लोक 29 (padma.6.97.29)

पलायध्वं पलायध्वं नायं जेतुं हि शक्यते । रुद्रांशसंभवो ह्येष स्मरध्वं शक्रचेष्टितम्

palāyadhvaṁ palāyadhvaṁ nāyaṁ jetuṁ hi śakyate rudrāṁśasaṁbhavo hyeṣa smaradhvaṁ śakraceṣṭitam

भागो! भागो! यह जीता नहीं जा सकता। यह रुद्र के अंश से उत्पन्न है। हे इंद्र! अपने ही किए कर्म को याद करो!

श्लोक 30 (padma.6.97.30)

श्रुत्वा तद्वचनं देवा भयविह्वलितास्तदा । दैत्यैस्तैर्वध्यमानास्ते पलायंत दिशो दश

śrutvā tadvacanaṁ devā bhayavihvalitāstadā daityaistairvadhyamānāste palāyaṁta diśo daśa

यह वचन सुनकर देवगण भय से व्याकुल हो गए, और उन दैत्यों द्वारा मारे जाते हुए वे दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 31 (padma.6.97.31)

देवान्विदारितान्दृष्ट्वा दैत्यः सागरनंदनः । शंखभेरीजयरवैः प्रविवेशामरावतीम्

devānvidāritāndṛṣṭvā daityaḥ sāgaranaṁdanaḥ śaṁkhabherījayaravaiḥ praviveśāmarāvatīm

देवताओं को इस प्रकार तितर-बितर देखकर सागर-पुत्र दैत्य शंख, भेरी और विजय-घोष के साथ अमरावती में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 32 (padma.6.97.32)

प्रविष्टे नगरं दैत्ये देवाःशक्रपुरोगमाः । सुवर्णाद्रिगुहां प्राप्य न्यवसन्दैत्यतापिताः

praviṣṭe nagaraṁ daitye devāḥśakrapurogamāḥ suvarṇādriguhāṁ prāpya nyavasandaityatāpitāḥ

उस दैत्य के नगर में प्रविष्ट होने पर इंद्र के नेतृत्व वाले देवगण, दैत्य से पीड़ित होकर, सुवर्ण-पर्वत की गुफा में जाकर निवास करने लगे।

श्लोक 33 (padma.6.97.33)

ततश्च सर्वेष्वसुराधिकारेष्विंद्रादिकानां विनिवेशयत्तदा । शुंभादिकान्दैत्यवरान्पृथक्पृथक्स्वयं सुवर्णाद्रिगुहामगात्पुनः

tataśca sarveṣvasurādhikāreṣviṁdrādikānāṁ viniveśayattadā śuṁbhādikāndaityavarānpṛthakpṛthaksvayaṁ suvarṇādriguhāmagātpunaḥ

फिर सभी स्थानों पर, जहाँ पहले इंद्र आदि देवताओं का अधिकार था, उसने शुंभ आदि श्रेष्ठ दैत्यों को अलग-अलग स्थापित कर दिया, और वह स्वयं पुनः सुवर्ण-पर्वत की गुफा की ओर चल पड़ा।

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