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क्रिया खण्ड (क्रियायोगसार) · अध्याय 1

मुनियों का क्रियायोगसार हेतु प्रश्न

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (padma.7.1.1)

श्रीगणेशाय नमः । अथ क्रियायोगसारखण्डमारभ्यते । लक्ष्मीनाथपदारविंदयुगलं । ब्रह्मेश्वराद्यामरश्रेणीनम्रशिरोलिरोलिमा अमलं। वंदामहे संततम् । भक्त्या योगिमनस्तडागसुषमासंदोहपुष्यत्तमं गङ्गाम्भोमकरं दविन्दुनिकरं संसारदुःखापहम्

śrīgaṇeśāya namaḥ atha kriyāyogasārakhaṇḍamārabhyate lakṣmīnāthapadāraviṁdayugalaṁ brahmeśvarādyāmaraśreṇīnamraśirolirolimā amalaṁ vaṁdāmahe saṁtatam bhaktyā yogimanastaḍāgasuṣamāsaṁdohapuṣyattamaṁ gaṅgāmbhomakaraṁ davindunikaraṁ saṁsāraduḥkhāpaham

श्री गणेश को नमस्कार। अब क्रियायोगसार-खण्ड आरम्भ किया जाता है। हम उन लक्ष्मीपति (विष्णु) के निर्मल चरण-कमल-युगल को सदा प्रणाम करते हैं, जिन्हें ब्रह्मा-ईश्वर आदि देवताओं की पंक्तियाँ झुके सिर से वन्दन करती हैं; और भक्तिपूर्वक उस परम सुन्दरता को स्मरण करते हैं, जो योगियों के मन-सरोवर की शोभा का संग्रह है, जिससे गंगा-जल उत्पन्न होता है, जो चन्द्रमा-सी शीतल किरणों का समूह है और संसार के दुःख को हरने वाली है।

श्लोक 2 (padma.7.1.2)

यो मूर्तीर्बहुधा विधाय भगवान्रक्षन्नशेषं जगद्यत्पादार्चनतत्परा न हि पुनर्मज्जंति विश्वार्णवे । सर्वप्राणिहृदंबुजेषु वसतिर्यस्य प्रभोः संततं रम्यक्रोडवपुर्धराय हरये देवाय तस्मै नमः

yo mūrtīrbahudhā vidhāya bhagavānrakṣannaśeṣaṁ jagadyatpādārcanatatparā na hi punarmajjaṁti viśvārṇave sarvaprāṇihṛdaṁbujeṣu vasatiryasya prabhoḥ saṁtataṁ ramyakroḍavapurdharāya haraye devāya tasmai namaḥ

जो भगवान् अनेक रूप धारण करके सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करते हैं, और जिनके चरणों की पूजा में तत्पर भक्त पुनः इस संसार-सागर में नहीं डूबते; जो समस्त प्राणियों के हृदय-कमल में सदा निवास करते हैं, उन सुन्दर शूकर-रूपधारी (वराह) प्रभु हरि को नमस्कार है।

श्लोक 3 (padma.7.1.3)

वेदेभ्य उद्धृत्य समस्तधर्मान्योऽयं पुराणेषु जगाद देवः । व्यासस्वरूपेण जगद्धिताय वंदेतमेतं कमला समेतम्

vedebhya uddhṛtya samastadharmānyo'yaṁ purāṇeṣu jagāda devaḥ vyāsasvarūpeṇa jagaddhitāya vaṁdetametaṁ kamalā sametam

जिस देव ने वेदों से समस्त धर्मों का उद्धार करके इस पुराण में उन्हें कहा है, जगत् के हित के लिए व्यास के रूप में प्रकट उस लक्ष्मीसहित भगवान् को मैं वन्दन करता हूँ।

श्लोक 4 (padma.7.1.4)

एकदा मुनयः सर्वे सर्वलोकहितैषिणः । सुरम्ये नैमिषारण्ये गोष्ठींचक्रुर्मनोरमाम्

ekadā munayaḥ sarve sarvalokahitaiṣiṇaḥ suramye naimiṣāraṇye goṣṭhīṁcakrurmanoramām

एक समय सम्पूर्ण लोकों का हित चाहने वाले सभी मुनि रमणीय नैमिषारण्य में एक सुन्दर सभा में एकत्र हुए।

श्लोक 5 (padma.7.1.5)

तत्रांतरे महातेजा व्यासशिष्यो महायशाः । सूतः शिष्यगणैर्युक्तः समायातो हरिं स्मरन्

tatrāṁtare mahātejā vyāsaśiṣyo mahāyaśāḥ sūtaḥ śiṣyagaṇairyuktaḥ samāyāto hariṁ smaran

उसी समय व्यास के शिष्य, महातेजस्वी एवं महायशस्वी सूत जी, अपने शिष्यों के साथ हरि का स्मरण करते हुए वहाँ आये।

श्लोक 6 (padma.7.1.6)

तमायांतं समालोक्य सूतं शास्त्रार्थपारगम् । नेमुः सर्वे समुत्थाय शौनकाद्यास्तपोधनाः

tamāyāṁtaṁ samālokya sūtaṁ śāstrārthapāragam nemuḥ sarve samutthāya śaunakādyāstapodhanāḥ

शास्त्रार्थ में पारंगत सूत जी को आते देखकर शौनक आदि सभी तपस्वी मुनि उठकर उन्हें प्रणाम करने लगे।

श्लोक 7 (padma.7.1.7)

सोऽपि तान्सहसा भक्त्या मुनीन्परमवैष्णवान् । ननाम दंडवद्भूमौ सर्वधर्मविदांवरः

so'pi tānsahasā bhaktyā munīnparamavaiṣṇavān nanāma daṁḍavadbhūmau sarvadharmavidāṁvaraḥ

समस्त धर्मों के ज्ञाता श्रेष्ठ सूत जी ने भी उन परम वैष्णव मुनियों को भक्तिपूर्वक तुरन्त भूमि पर दण्डवत् प्रणाम किया।

श्लोक 8 (padma.7.1.8)

वरासने महाबुद्धिस्तैर्द्दत्ते मुनिसत्तमैः । उवास ह मुनिर्मध्ये सर्वैः शिष्यगणैर्वृतः

varāsane mahābuddhistairddatte munisattamaiḥ uvāsa ha munirmadhye sarvaiḥ śiṣyagaṇairvṛtaḥ

उन महामुनियों द्वारा दिये गये श्रेष्ठ आसन पर वे महाबुद्धिमान् मुनि विराजमान हुए और अपने शिष्यों से घिरे हुए उन सबके मध्य बैठे।

श्लोक 9 (padma.7.1.9)

तत्रोपविष्टं तं सूतं शौनको मुनिसत्तमः । बद्धाञ्जलिरिमां वाचमुवाच विनयान्वितः

tatropaviṣṭaṁ taṁ sūtaṁ śaunako munisattamaḥ baddhāñjalirimāṁ vācamuvāca vinayānvitaḥ

वहाँ बैठे हुए सूत जी से विनयपूर्वक हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ शौनक ने यह वचन कहा।

श्लोक 10 (padma.7.1.10)

शौनक उवाच- महर्षे सूत सर्वज्ञ कलिकाले समागते । केनोपायेन भगवन्भूरिभक्तिर्भवेन्नृणाम्

śaunaka uvāca- maharṣe sūta sarvajña kalikāle samāgate kenopāyena bhagavanbhūribhaktirbhavennṛṇām

शौनक ने कहा — हे महर्षि सूत! हे सर्वज्ञ! कलिकाल के आ जाने पर किस उपाय से हे भगवन्, मनुष्यों में प्रचुर भक्ति उत्पन्न हो सकती है?

श्लोक 11 (padma.7.1.11)

कलौ सर्वे भविष्यंति पापकर्मरता जनाः । वेदविद्याविहीनाश्च तेषां श्रेयः कथं भवेत्

kalau sarve bhaviṣyaṁti pāpakarmaratā janāḥ vedavidyāvihīnāśca teṣāṁ śreyaḥ kathaṁ bhavet

कलियुग में सभी लोग पापकर्मों में रत रहेंगे और वेद-विद्या से रहित होंगे; उनका कल्याण किस प्रकार होगा?

श्लोक 12 (padma.7.1.12)

कलावन्नगताः प्राणा लोकाः स्वल्पायुषस्तथा । निर्धनाश्च भविष्यंति नानादुःखप्रपीडिताः

kalāvannagatāḥ prāṇā lokāḥ svalpāyuṣastathā nirdhanāśca bhaviṣyaṁti nānāduḥkhaprapīḍitāḥ

कलियुग में प्राणियों की आयु अल्प तथा दुर्बल हो जाएगी, वे निर्धन होंगे और नाना दुःखों से पीड़ित रहेंगे।

श्लोक 13 (padma.7.1.13)

प्रयाससाध्यं सुकृतं शास्त्रेषु क्रियते द्विज । तस्मात्केऽपि करिष्यंति कलौ न सुकृतं जनाः

prayāsasādhyaṁ sukṛtaṁ śāstreṣu kriyate dvija tasmātke'pi kariṣyaṁti kalau na sukṛtaṁ janāḥ

हे द्विज! शास्त्रों में जो पुण्यकर्म बताया गया है, वह बड़े परिश्रम से सिद्ध होता है; इसलिए कलियुग में कोई भी मनुष्य पुण्यकर्म नहीं कर सकेगा।

श्लोक 14 (padma.7.1.14)

सुकृतेषु विनष्टेषु प्रवृत्ते पापकर्मणि । सवंशाः प्रलयं सर्वे गमिष्यंति दुराशयाः

sukṛteṣu vinaṣṭeṣu pravṛtte pāpakarmaṇi savaṁśāḥ pralayaṁ sarve gamiṣyaṁti durāśayāḥ

पुण्यकर्मों के नष्ट हो जाने और पापकर्मों के प्रवृत्त होने पर, दुर्बुद्धि लोग अपने कुल सहित सब प्रलय को प्राप्त होंगे।

श्लोक 15 (padma.7.1.15)

स्वल्पश्रमैरल्पवित्तैरल्पकालैश्च सत्तम । यथा भवेन्महापुण्यं तद्वै कथय सूतज

svalpaśramairalpavittairalpakālaiśca sattama yathā bhavenmahāpuṇyaṁ tadvai kathaya sūtaja

हे सत्तम! अल्प परिश्रम, अल्प धन और अल्प समय में जिस प्रकार महान् पुण्य प्राप्त हो सके, वह हे सूतपुत्र! आप कृपया कहें।

श्लोक 16 (padma.7.1.16)

यस्योपदेशतः पुण्यं पापं वा कुर्वते जनाः । स तद्भागी भवेन्मर्त्य इति शास्त्रेषु निश्चितम्

yasyopadeśataḥ puṇyaṁ pāpaṁ vā kurvate janāḥ sa tadbhāgī bhavenmartya iti śāstreṣu niścitam

शास्त्रों में यह निश्चित है कि जिसके उपदेश से लोग पुण्य अथवा पाप करते हैं, वह मनुष्य भी उसका भागी होता है।

श्लोक 17 (padma.7.1.17)

पुण्योपदेशः सदयः कैतवैश्च विवर्जितः । पापमार्गविरोधी च चत्वारः केशवोपमाः

puṇyopadeśaḥ sadayaḥ kaitavaiśca vivarjitaḥ pāpamārgavirodhī ca catvāraḥ keśavopamāḥ

दयायुक्त, छल-कपट से रहित और पाप-मार्ग का विरोधी पुण्य-उपदेश देने वाले — ये चार प्रकार के लोग साक्षात् केशव के समान माने गये हैं।

श्लोक 18 (padma.7.1.18)

ज्ञानं संप्राप्य संसारे यः परेभ्यो न यच्छति । ज्ञानरूपी हरिस्तस्मै प्रसन्न इव नेक्षते

jñānaṁ saṁprāpya saṁsāre yaḥ parebhyo na yacchati jñānarūpī haristasmai prasanna iva nekṣate

जो मनुष्य संसार में ज्ञान प्राप्त करके दूसरों को नहीं देता, ज्ञानस्वरूप हरि भी उस पर प्रसन्न दृष्टि से नहीं देखते।

श्लोक 19 (padma.7.1.19)

ज्ञानरत्नैश्च रत्नैश्च परसंतोषकृन्नरः । स ज्ञेयः सुमतिर्नूनं नररूपधरो हरिः

jñānaratnaiśca ratnaiśca parasaṁtoṣakṛnnaraḥ sa jñeyaḥ sumatirnūnaṁ nararūpadharo hariḥ

जो मनुष्य ज्ञानरूपी रत्नों और वास्तविक रत्नों दोनों से दूसरों को सन्तुष्ट करता है, वह निश्चय ही सुमति और मनुष्य-रूपधारी साक्षात् हरि जानना चाहिए।

श्लोक 20 (padma.7.1.20)

त्वमेव मुनिशार्दूल वेदवेदाङ्गपारगः । त्वदृते न हि वक्ताऽन्यो यतस्त्वं व्यासशासितः

tvameva muniśārdūla vedavedāṅgapāragaḥ tvadṛte na hi vaktā'nyo yatastvaṁ vyāsaśāsitaḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! आप ही वेद-वेदांग में पारंगत हैं; आपके सिवा और कोई वक्ता नहीं है, क्योंकि आप स्वयं व्यास द्वारा शिक्षित हैं।

श्लोक 21 (padma.7.1.21)

सूत उवाच- धन्योऽसि त्वं मुनिश्रेष्ठ त्वमेव वैष्णवाग्रणीः । यतः समस्तलोकानां हितं वाञ्छसि सर्वदा

sūta uvāca- dhanyo'si tvaṁ muniśreṣṭha tvameva vaiṣṇavāgraṇīḥ yataḥ samastalokānāṁ hitaṁ vāñchasi sarvadā

सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! आप धन्य हैं, आप ही वैष्णवों में अग्रणी हैं, क्योंकि आप सदा सम्पूर्ण लोकों का हित चाहते हैं।

श्लोक 22 (padma.7.1.22)

शृणु शौनक वक्ष्यामि यत्त्वया श्रोतुमिच्छितम् । सर्वलोकहितार्थाय वैष्णवानां विशेषतः

śṛṇu śaunaka vakṣyāmi yattvayā śrotumicchitam sarvalokahitārthāya vaiṣṇavānāṁ viśeṣataḥ

हे शौनक! सुनिये, मैं वही कहूँगा जो आपने सुनना चाहा है — समस्त लोकों के हित के लिए और विशेषतः वैष्णवों के हित के लिए।

श्लोक 23 (padma.7.1.23)

पृष्टो जैमिनिना सर्वं यदुवाच शृणुष्व तत् । महर्षिर्जैमिनिर्नाम योगाभ्यासरतः सदा

pṛṣṭo jaimininā sarvaṁ yaduvāca śṛṇuṣva tat maharṣirjaiminirnāma yogābhyāsarataḥ sadā

जो कुछ जैमिनि द्वारा पूछे जाने पर व्यास जी ने कहा था, वह सब सुनिए। योगाभ्यास में सदा रत महर्षि जैमिनि नामक मुनि थे।

श्लोक 24 (padma.7.1.24)

प्रणम्य शिरसा व्यासं पप्रच्छ मुनिसत्तमः । जैमिनिरुवाच- भगवन्सर्वधर्मज्ञ व्यास सत्यवती सुत

praṇamya śirasā vyāsaṁ papraccha munisattamaḥ jaiminiruvāca- bhagavansarvadharmajña vyāsa satyavatī suta

उस श्रेष्ठ मुनि ने सिर झुकाकर व्यास को प्रणाम करके पूछा। जैमिनि ने कहा — हे भगवन्! हे सर्वधर्मज्ञ व्यास! हे सत्यवती-पुत्र!

श्लोक 25 (padma.7.1.25)

कलौ कस्माद्भवेन्मोक्षस्तन्ममाचक्ष्व मूलतः । सूत उवाच- जैमिनेर्वचनं श्रुत्वा व्यासः संतुष्टमानसः

kalau kasmādbhavenmokṣastanmamācakṣva mūlataḥ sūta uvāca- jaiminervacanaṁ śrutvā vyāsaḥ saṁtuṣṭamānasaḥ

कलियुग में मोक्ष किस प्रकार सम्भव है, वह मुझे मूल से बताइये। सूत जी ने कहा — जैमिनि के वचन सुनकर प्रसन्नचित्त व्यास जी ने,

श्लोक 26 (padma.7.1.26)

प्रारेभे मुनिशार्दूल कथां मंगलसंयुताम् । व्यास उवाच- जैमिने मुनिशार्दूल धन्योऽसि त्वं महामते

prārebhe muniśārdūla kathāṁ maṁgalasaṁyutām vyāsa uvāca- jaimine muniśārdūla dhanyo'si tvaṁ mahāmate

हे मुनिश्रेष्ठ! मंगलमय कथा आरम्भ की। व्यास जी ने कहा — हे महामते जैमिनि! हे मुनिश्रेष्ठ! तुम धन्य हो,

श्लोक 27 (padma.7.1.27)

नारायणकथां श्रोतुं यतो वांछसि सर्वदा । सत्कथाश्रवणे बुद्धिर्यस्य यस्य प्रवर्तते

nārāyaṇakathāṁ śrotuṁ yato vāṁchasi sarvadā satkathāśravaṇe buddhiryasya yasya pravartate

क्योंकि तुम सदा नारायण की कथा सुनने की इच्छा रखते हो। सत्कथा-श्रवण में जिस-जिसकी बुद्धि प्रवृत्त होती है,

श्लोक 28 (padma.7.1.28)

तस्य तस्य भवेज्ज्ञानं ज्ञानं मोक्षप्रदं विदुः। न वैष्णवकथा यस्मै रोचते पापिने भुवि

tasya tasya bhavejjñānaṁ jñānaṁ mokṣapradaṁ viduḥ na vaiṣṇavakathā yasmai rocate pāpine bhuvi

उस-उसको ज्ञान प्राप्त होता है, और ज्ञान को ही मोक्षदायक माना गया है। जिसे वैष्णव-कथा प्रिय नहीं लगती, वह इस पृथ्वी पर पापी है।

श्लोक 29 (padma.7.1.29)

वृथैव सृष्ट्वा विधिना भूमिर्भारवती कृता । कथायै जगती वक्तुं श्लाघ्यते वैष्णवैर्जनैः

vṛthaiva sṛṣṭvā vidhinā bhūmirbhāravatī kṛtā kathāyai jagatī vaktuṁ ślāghyate vaiṣṇavairjanaiḥ

विधाता ने व्यर्थ ही सृष्टि करके इस भार-वाहक पृथ्वी को बनाया है, यदि वैष्णवजन इस पृथ्वी पर कथा सुनाने के योग्य न हों।

श्लोक 30 (padma.7.1.30)

तां मिथ्यामिव यो वक्ति स ज्ञेयः पापिनां वरः । यस्मिन्दिने मुनिश्रेष्ठ श्रूयते न हरेः कथा

tāṁ mithyāmiva yo vakti sa jñeyaḥ pāpināṁ varaḥ yasmindine muniśreṣṭha śrūyate na hareḥ kathā

जो उस कथा को मिथ्या के समान कहता है, वह पापियों में श्रेष्ठ (अर्थात् महापापी) जानना चाहिए। हे मुनिश्रेष्ठ! जिस दिन हरि की कथा नहीं सुनी जाती,

श्लोक 31 (padma.7.1.31)

तद्दिनं दुर्दिनं मन्ये घनच्छन्नं न दुर्दिनम् । यत्र यत्र महीभागे वैष्णवी वर्तते कथा

taddinaṁ durdinaṁ manye ghanacchannaṁ na durdinam yatra yatra mahībhāge vaiṣṇavī vartate kathā

उस दिन को मैं दुर्दिन मानता हूँ, न कि घने बादलों से आच्छादित दिन को दुर्दिन कहता हूँ। जिस पृथ्वी-खण्ड में वैष्णवी कथा होती है,

श्लोक 32 (padma.7.1.32)

सांनिध्यं तत्र भगवान्न जहाति कदाचन । यो वैष्णवकथारम्भे विघ्नकृन्मानवो भवेत्

sāṁnidhyaṁ tatra bhagavānna jahāti kadācana yo vaiṣṇavakathārambhe vighnakṛnmānavo bhavet

वहाँ भगवान् कभी अपनी उपस्थिति नहीं छोड़ते। जो मनुष्य वैष्णव-कथा के आरम्भ में विघ्न डालता है,

श्लोक 33 (padma.7.1.33)

तमेव शप्त्वा भगवान्दैवतैः सह गच्छति । प्रभावं वासुदेवस्य श्रुत्वा हृष्यंति ये जनाः

tameva śaptvā bhagavāndaivataiḥ saha gacchati prabhāvaṁ vāsudevasya śrutvā hṛṣyaṁti ye janāḥ

उसे शाप देकर भगवान् अपने देवगणों सहित वहाँ से चले जाते हैं। जो लोग वासुदेव के प्रभाव को सुनकर हर्षित होते हैं,

श्लोक 34 (padma.7.1.34)

ज्ञेयास्त एव देवांशाः पूज्या दृश्याश्च सत्तमाः । नारायणप्रभावं ये श्रुत्वा चोपहसंति वै

jñeyāsta eva devāṁśāḥ pūjyā dṛśyāśca sattamāḥ nārāyaṇaprabhāvaṁ ye śrutvā copahasaṁti vai

वे साक्षात् देवांश ही जानने चाहिए, वे ही पूज्य और दर्शनीय हैं, हे सत्तम। जो नारायण के प्रभाव को सुनकर उसका उपहास करते हैं,

श्लोक 35 (padma.7.1.35)

ते विज्ञेया दानवांशा नरा नरकभागिनः । तत्र तीर्थानि सर्वाणि गङ्गादीनि द्विजोत्तम

te vijñeyā dānavāṁśā narā narakabhāginaḥ tatra tīrthāni sarvāṇi gaṅgādīni dvijottama

वे दानवों के अंश और नरकगामी जानने चाहिए। हे द्विजोत्तम! वहाँ गंगा आदि समस्त तीर्थ,

श्लोक 36 (padma.7.1.36)

देवर्षयश्च देवाश्च मुनयश्च तपोधनाः । शृण्वतां लोकसंघानां पापव्याधिविनाशनी

devarṣayaśca devāśca munayaśca tapodhanāḥ śṛṇvatāṁ lokasaṁghānāṁ pāpavyādhivināśanī

देवर्षि, देवता और तपोधन मुनि निवास करते हैं, जो लोकसमूहों को सुनने पर पाप-रूपी व्याधि का नाश करने वाली,

श्लोक 37 (padma.7.1.37)

नारायणकथा यत्र वर्तते प्रतिवासरम् । मुने क्रियायोगसारं बह्वर्थं पापनाशनम्

nārāyaṇakathā yatra vartate prativāsaram mune kriyāyogasāraṁ bahvarthaṁ pāpanāśanam

नारायण की कथा प्रतिदिन प्रचलित रहती है। हे मुने! क्रियायोगसार अनेक अर्थों से युक्त और पाप का नाश करने वाला है,

श्लोक 38 (padma.7.1.38)

नारायणकथोपेतं सेतिहासं निशामय

nārāyaṇakathopetaṁ setihāsaṁ niśāmaya

जो नारायण की कथा और इतिहास से युक्त है, उसे ध्यानपूर्वक सुनिए।

अध्याय-सूचीअध्याय 2