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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 10

ओंकार मंत्र का उपदेश

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.10.1)

ब्रह्मविष्णू ऊचतुः सर्गादिपञ्चकृत्यस्य लक्षणं ब्रूहि नौ प्रभो । शिव उवाच । मत्कृत्यबोधनं गुह्यं कृपया प्रब्रवीमि वाम्

brahmaviṣṇū ūcatuḥ sargādipañcakṛtyasya lakṣaṇaṁ brūhi nau prabho śiva uvāca matkṛtyabodhanaṁ guhyaṁ kṛpayā prabravīmi vām

ब्रह्मा और विष्णु ने कहा — हे प्रभो! हमें सृष्टि आदि पाँच कृत्यों का स्वरूप बताइए। शिव बोले — मेरे कार्यों का यह गुह्य ज्ञान मैं कृपापूर्वक तुम दोनों को बताता हूँ।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.10.2)

सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः । पञ्चैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतौ

sṛṣṭiḥ sthitiśca saṁhārastirobhāvo ’pyanugrahaḥ pañcaiva me jagatkṛtyaṁ nityasiddhamajācyutau

सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह — हे अज (ब्रह्मा) और अच्युत (विष्णु)! ये पाँच ही मेरे जगत्-सम्बन्धी कार्य हैं, जो नित्य सिद्ध हैं।

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.10.3)

सर्गः संसारसंरम्भस्तत्प्रतिष्ठा स्थितिर्मता । संहारो मर्दनं तस्य तिरोभावस्तदुत्क्रमः

sargaḥ saṁsārasaṁrambhastatpratiṣṭhā sthitirmatā saṁhāro mardanaṁ tasya tirobhāvastadutkramaḥ

सृष्टि संसार के आरम्भ को कहते हैं; उसकी स्थिरता ही स्थिति मानी गई है। संहार उसका विनाश है, तिरोभाव उसका समेटा जाना है।

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.10.4)

तन्मोक्षोऽनुग्रहस्तन्मे कृत्यमेवं हि पञ्चकम् । कृत्यमेतद्वहत्यन्यस्तूष्णीं गोपुरबिम्बवत्

tanmokṣo ’nugrahastanme kṛtyamevaṁ hi pañcakam kṛtyametadvahatyanyastūṣṇīṁ gopurabimbavat

उसकी मुक्ति ही अनुग्रह है — इस प्रकार मेरे कार्य पाँच ही हैं। इसके अतिरिक्त जो कोई इस कार्य को धारण करता है, वह मन्दिर के द्वार पर स्थित मूर्ति के समान मौन ही रहता है।

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.10.5)

सर्गादि यच्चतुःकृत्यं संसारपरिजृम्भणम् । पञ्चमं मुक्तिहेतुर्वै नित्यं मयि च सुस्थिरम्

sargādi yaccatuḥkṛtyaṁ saṁsāraparijṛmbhaṇam pañcamaṁ muktiheturvai nityaṁ mayi ca susthiram

सृष्टि आदि जो चार कार्य हैं, वे संसार के विस्तार करने वाले हैं; पाँचवाँ कार्य मुक्ति का कारण है, जो सदा मुझमें ही स्थिर है।

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.10.6)

तदिदं पञ्चभूतेषु दृश्यते मामकैर्जनैः । सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहारः पावके तथा

tadidaṁ pañcabhūteṣu dṛśyate māmakairjanaiḥ sṛṣṭirbhūmau sthitistoye saṁhāraḥ pāvake tathā

यह पाँचों कार्य मेरे भक्तजनों को पाँच भूतों में दिखाई देते हैं — सृष्टि पृथ्वी में, स्थिति जल में तथा संहार अग्नि में।

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.10.7)

तिरोभावोऽनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे । सृज्यते धरया सर्वमद्भिः सर्वं प्रवर्धते

tirobhāvo ’nile tadvadanugraha ihāmbare sṛjyate dharayā sarvamadbhiḥ sarvaṁ pravardhate

तिरोभाव वायु में और उसी प्रकार अनुग्रह यहाँ आकाश में है। पृथ्वी से सब कुछ उत्पन्न होता है, जल से सब कुछ बढ़ता है,

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.10.8)

अर्द्यते तेजसा सर्वं वायुना चापनीयते । व्योम्नानुगृह्यते सर्वं ज्ञेयमेवं हि सूरिभिः

ardyate tejasā sarvaṁ vāyunā cāpanīyate vyomnānugṛhyate sarvaṁ jñeyamevaṁ hi sūribhiḥ

अग्नि से सब कुछ नष्ट होता है और वायु से सब कुछ हर लिया जाता है। आकाश से सबका अनुग्रह होता है — विद्वानों को इसे इसी प्रकार जानना चाहिए।

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.10.9)

पञ्चकृत्यमिदं वोढुं ममास्ति मुखपञ्चकम् । चतुर्दिक्षु चतुर्वक्त्रं तन्मध्ये पञ्चमं मुखम्

pañcakṛtyamidaṁ voḍhuṁ mamāsti mukhapañcakam caturdikṣu caturvaktraṁ tanmadhye pañcamaṁ mukham

इस पंचकृत्य को धारण करने के लिए मेरे पाँच मुख हैं — चार दिशाओं में चार मुख और उनके मध्य में पाँचवाँ मुख।

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.10.10)

युवाभ्यां तपसा लब्धमेतत्कृत्यद्वयं सुतौ । सृष्टिस्थित्यभिधं भाग्यं मत्तः प्रीतादतिप्रियम्

yuvābhyāṁ tapasā labdhametatkṛtyadvayaṁ sutau sṛṣṭisthityabhidhaṁ bhāgyaṁ mattaḥ prītādatipriyam

हे पुत्रो! तुम दोनों ने अपने तप से सृष्टि और स्थिति नामक यह कार्य-युगल प्राप्त किया है — यह मेरे प्रेम से प्राप्त अत्यन्त प्रिय सौभाग्य है।

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.10.11)

तथा रुद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम् । अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते

tathā rudramaheśābhyāmanyatkṛtyadvayaṁ param anugrahākhyaṁ kenāpi labdhuṁ naiva hi śakyate

इसी प्रकार रुद्र और महेश (मुझ) से अन्य श्रेष्ठ कार्य-युगल प्राप्त है; परन्तु अनुग्रह नामक कार्य किसी के भी द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.10.12)

तत्सर्वं पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम् । न तद् रुद्रमहेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादृशम्

tatsarvaṁ paurvikaṁ karma yuvābhyāṁ kālavismṛtam na tad rudramaheśābhyāṁ vismṛtaṁ karma tādṛśam

वह पूर्वकालीन कर्म तुम दोनों को समय के प्रभाव से विस्मृत हो गया है; परन्तु रुद्र और महेश को वैसा कोई कर्म कभी विस्मृत नहीं होता।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.10.13)

रूपे वेषे च कृत्ये च वाहने चासने तथा । आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम्

rūpe veṣe ca kṛtye ca vāhane cāsane tathā āyudhādau ca matsāmyamasmābhistatkṛte kṛtam

रूप में, वेष में, कार्य में, वाहन में, आसन में तथा आयुध आदि में — हमने ही तुम्हारे लिए वह मेरे साथ समानता बनाई थी।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.10.14)

मद्ध्यानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम् । मज्ज्ञाने सति मैवं स्यान्मानं रूपं महेशवत्

maddhyānavirahādvatsau mauḍhyaṁ vāmevamāgatam majjñāne sati maivaṁ syānmānaṁ rūpaṁ maheśavat

हे वत्सो! मेरा ध्यान न करने के कारण ही तुम दोनों में यह मोह उत्पन्न हुआ। यदि मेरा ज्ञान होता, तो केवल महेश के समान रूप होने से ऐसा अभिमान कभी न होता।

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.10.15)

तस्मान्मज्ज्ञानसिद्ध्यर्थं मन्त्रमोङ्कारनामकम् । इतः परं प्रजपतं मामकं मानभञ्जनम्

tasmānmajjñānasiddhyarthaṁ mantramoṅkāranāmakam itaḥ paraṁ prajapataṁ māmakaṁ mānabhañjanam

अतः मेरे ज्ञान की सिद्धि के लिए, अब से ओंकार नामक मेरा मंत्र जपो, जो मान का नाश करने वाला है।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.10.16)

उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम् । ऊँकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः

upādiśaṁ nijaṁ mantramoṅkāramurumaṅgalam ū~kāro manmukhājjajñe prathamaṁ matprabodhakaḥ

मैं अपना महामंगलकारी ओंकार मंत्र उपदेश करता हूँ। 'ॐ' यह अक्षर सर्वप्रथम मेरे मुख से प्रकट हुआ था, जो मुझे प्रकाशित करने वाला है।

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.10.17)

वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः । तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत्

vācako ’yamahaṁ vācyo mantro ’yaṁ hi madātmakaḥ tadanusmaraṇaṁ nityaṁ mamānusmaraṇaṁ bhavet

यह वाचक (नाम) मैं ही हूँ और वाच्य (नामी) भी मैं ही हूँ; यह मंत्र वस्तुतः मेरा ही स्वरूप है। इसका निरन्तर स्मरण ही मेरा निरन्तर स्मरण है।

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.10.18)

अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात् । मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा

akāra uttarāt pūrvamukāraḥ paścimānanāt makāro dakṣiṇamukhād binduḥ prāṅmukhatastathā

'अ' कार उत्तर मुख से पूर्व में, 'उ' कार पश्चिम मुख से, 'म' कार दक्षिण मुख से और बिन्दु पूर्व मुख से प्रकट हुआ,

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.10.19)

नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः । एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत्

nādo madhyamukhādevaṁ pañcadhāsau vijṛmbhitaḥ ekībhūtaḥ punastadvadomityekākṣaro ’bhavat

तथा नाद मध्य मुख से प्रकट हुआ — इस प्रकार यह पाँच रूपों में विस्तृत हुआ। पुनः वे सब एक होकर 'ॐ' इस एक अक्षर के रूप में परिणत हो गए।

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.10.20)

नामरूपात्मकं सर्वं वेदभूतकुलद्वयम् । व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः

nāmarūpātmakaṁ sarvaṁ vedabhūtakuladvayam vyāptametena mantreṇa śivaśaktyośca bodhakaḥ

नाम-रूपात्मक सम्पूर्ण जगत् तथा वेद और प्राणियों के दोनों कुल इसी मंत्र से व्याप्त हैं; यह शिव और शक्ति दोनों का बोधक है।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.10.21)

अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत् । अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम्

asmāt pañcākṣaraṁ jajñe bodhakaṁ sakalasya tat akārādikrameṇaiva nakārādi yathākramam

इसी से सकल (साकार) शिव का बोधक पंचाक्षर मंत्र उत्पन्न हुआ, जिसका क्रम 'अ' आदि के क्रम के अनुसार ही 'न' आदि से आरम्भ होता है।

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.10.22)

अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृकाः पञ्चभेदतः । तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्त्रिपाद्गायत्रिरेव हि

asmāt pañcākṣarājjātā mātṛkāḥ pañcabhedataḥ tasmācchiraścaturvaktrāttripādgāyatrireva hi

इसी पंचाक्षर मंत्र से पाँच भेदों में मातृकाएँ उत्पन्न हुईं; तथा उस चतुर्मुख शिर से त्रिपदा गायत्री उत्पन्न हुई।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.10.23)

वेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मन्त्रकोटयः । तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्

vedaḥ sarvastato jajñe tato vai mantrakoṭayaḥ tattanmantreṇa tatsiddhiḥ sarvasiddhirito bhavet

उससे सम्पूर्ण वेद उत्पन्न हुआ, और उसी से करोड़ों मंत्र प्रकट हुए। प्रत्येक मंत्र से उसकी अपनी सिद्धि मिलती है, परन्तु इस ओंकार से सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.10.24)

अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति । सकला मन्त्रराजानः साक्षाद्भोगप्रदाः शुभाः

anena mantrakandena bhogo mokṣaśca siddhyati sakalā mantrarājānaḥ sākṣādbhogapradāḥ śubhāḥ

इस समस्त मंत्रों के मूल स्रोत से भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं। सभी मंत्रराज साक्षात् शुभ भोग प्रदान करने वाले हैं।

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.10.25)

नन्दिकेश्वर उवाच । पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः प्रकल्प्य मन्त्रं च समादिशत् परम् । निधाय तच्छीर्ष्णि कराम्बुजं शनै- रुदङ्मुखं संस्थितयोः सहाम्बिकः

nandikeśvara uvāca punastayostatra tiraḥ paṭaṁ guruḥ prakalpya mantraṁ ca samādiśat param nidhāya tacchīrṣṇi karāmbujaṁ śanai- rudaṅmukhaṁ saṁsthitayoḥ sahāmbikaḥ

नन्दिकेश्वर बोले — तत्पश्चात् गुरु (शिव) ने माता अम्बिका सहित, उन दोनों के बीच एक अन्तरपट रखकर, उत्तराभिमुख खड़े उन दोनों के शिर पर धीरे-धीरे अपना कर-कमल रखते हुए, उन्हें परम मंत्र का उपदेश दिया।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.10.26)

त्रिरुच्चार्याग्रहीन्मन्त्रं यन्त्रतन्त्रोक्तिपूर्वकम् । शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समार्पयत्

triruccāryāgrahīnmantraṁ yantratantroktipūrvakam śiṣyau ca tau dakṣiṇāyāmātmānaṁ ca samārpayat

यन्त्र-तन्त्र की विधि के अनुसार तीन बार उच्चारण करवाकर उन्होंने मंत्र प्रदान किया, और उन दोनों शिष्यों ने दक्षिणा सहित अपने-आप को गुरु को अर्पित कर दिया।

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.10.27)

प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदन्तिके तमूचतुर्देववरं जगद्गुरुम्

prabaddhahastau kila tau tadantike tamūcaturdevavaraṁ jagadgurum

हाथ जोड़े हुए वे दोनों उनके समीप उस देवश्रेष्ठ जगद्गुरु से इस प्रकार बोले।

श्लोक 28 (shiva.vidyeshvara.10.28)

ब्रह्माच्युतावूचतुः नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे । नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने

brahmācyutāvūcatuḥ namo niṣkalarūpāya namo niṣkalatejase namaḥ sakalanāthāya namaste sakalātmane

ब्रह्मा और अच्युत बोले — निष्कल-स्वरूप को नमस्कार, निष्कल-तेज को नमस्कार। सकल के स्वामी को नमस्कार, सकलात्मा आपको नमस्कार।

श्लोक 29 (shiva.vidyeshvara.10.29)

नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिङ्गिने । नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखाय ते

namaḥ praṇavavācyāya namaḥ praṇavaliṅgine namaḥ sṛṣṭyādikartre ca namaḥ pañcamukhāya te

प्रणव के वाच्य आपको नमस्कार, प्रणव से चिह्नित आपको नमस्कार। सृष्टि आदि के कर्ता को नमस्कार, पंचमुख आपको नमस्कार।

श्लोक 30 (shiva.vidyeshvara.10.30)

पञ्चब्रह्मस्वरूपाय पञ्चकृत्याय ते नमः । आत्मने ब्रह्मणे तुभ्यमनन्तगुणशक्तये

pañcabrahmasvarūpāya pañcakṛtyāya te namaḥ ātmane brahmaṇe tubhyamanantaguṇaśaktaye

पंचब्रह्म-स्वरूप आपको, पंचकृत्यमय आपको नमस्कार। अनन्त गुण और शक्ति वाले हे आत्मा, हे ब्रह्म, आपको नमस्कार।

श्लोक 31 (shiva.vidyeshvara.10.31)

सकलाकलरूपाय शम्भवे गुरवे नमः । इति स्तुत्वा गुरुं पद्यैर्ब्रह्मा विष्णुश्च नेमतुः

sakalākalarūpāya śambhave gurave namaḥ iti stutvā guruṁ padyairbrahmā viṣṇuśca nematuḥ

सकल-निष्कल दोनों रूपों वाले शम्भु गुरु को नमस्कार। इस प्रकार पद्यों द्वारा गुरु की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु ने प्रणाम किया।

श्लोक 32 (shiva.vidyeshvara.10.32)

ईश्वर उवाच । वत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम् । जपतं प्रणवं मन्त्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्

īśvara uvāca vatsakau sarvatattvaṁ ca kathitaṁ darśitaṁ ca vām japataṁ praṇavaṁ mantraṁ devīdiṣṭaṁ madātmakam

ईश्वर बोले — हे वत्सो! तुम दोनों को सम्पूर्ण तत्त्व कह दिया और दिखा दिया गया है। अब देवी द्वारा उपदिष्ट, मेरे ही स्वरूप इस प्रणव मंत्र का जप करो।

श्लोक 33 (shiva.vidyeshvara.10.33)

ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्वतम् । आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जप्यं त्वक्षयं भवेत्

jñānaṁ ca susthiraṁ bhāgyaṁ sarvaṁ bhavati śāśvatam ārdrāyāṁ ca caturdaśyāṁ tajjapyaṁ tvakṣayaṁ bhavet

इससे ज्ञान और सौभाग्य सदा स्थिर तथा शाश्वत हो जाता है। आर्द्रा तिथि और चतुर्दशी को इसका जप अक्षय फल देने वाला होता है।

श्लोक 34 (shiva.vidyeshvara.10.34)

सूर्यगत्या महार्द्रायामेकं कोटिगुणं भवेत् । मृगशीर्षान्तिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा

sūryagatyā mahārdrāyāmekaṁ koṭiguṇaṁ bhavet mṛgaśīrṣāntimo bhāgaḥ punarvasvādimastathā

सूर्य की गति से महा-आर्द्रा के दिन यह करोड़गुना फलदायी होता है। मृगशीर्ष का अन्तिम भाग तथा पुनर्वसु का प्रथम भाग भी उतने ही महत्त्व के हैं।

श्लोक 35 (shiva.vidyeshvara.10.35)

आर्द्रासमं सदा ज्ञेयं पूजाहोमादितर्पणे । दर्शनं तु प्रभाते च प्रातःसङ्गवकालयोः

ārdrāsamaṁ sadā jñeyaṁ pūjāhomāditarpaṇe darśanaṁ tu prabhāte ca prātaḥsaṅgavakālayoḥ

पूजा, हवन आदि तर्पण-कार्यों में इसे सदा आर्द्रा के समान ही जानना चाहिए; और दर्शन का उत्तम समय प्रातःकाल तथा प्रातःसंगव काल है।

श्लोक 36 (shiva.vidyeshvara.10.36)

चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत् । प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते

caturdaśī tathā grāhyā niśīthavyāpinī bhavet pradoṣavyāpinī caiva parayuktā praśasyate

चतुर्दशी वह ग्रहण करनी चाहिए जो मध्यरात्रि में व्याप्त हो; और जो सन्ध्याकाल में व्याप्त होकर अगले दिन से युक्त हो, वह भी श्रेष्ठ मानी गई है।

श्लोक 37 (shiva.vidyeshvara.10.37)

लिङ्गं वेरं च मे तुल्यं यजतां लिङ्गमुत्तमम् । तस्माल्लिङ्गं परं पूज्यं वेरादपि मुमुक्षुभिः

liṅgaṁ veraṁ ca me tulyaṁ yajatāṁ liṅgamuttamam tasmālliṅgaṁ paraṁ pūjyaṁ verādapi mumukṣubhiḥ

लिंग और प्रतिमा दोनों मेरे लिए समान हैं, ऐसा पूजा करने वालों के लिए; तथापि लिंग ही श्रेष्ठ है। इसलिए मुमुक्षुओं के लिए लिंग प्रतिमा से भी बढ़कर पूजनीय है।

श्लोक 38 (shiva.vidyeshvara.10.38)

लिङ्गमोङ्कारमन्त्रेण वेरं पञ्चाक्षरेण तु । स्वयमेव हि सद्द्रव्यैः प्रतिष्ठाप्यं परैरपि

liṅgamoṅkāramantreṇa veraṁ pañcākṣareṇa tu svayameva hi saddravyaiḥ pratiṣṭhāpyaṁ parairapi

लिंग की प्रतिष्ठा ओंकार मंत्र से और प्रतिमा की प्रतिष्ठा पंचाक्षर मंत्र से करनी चाहिए — शुद्ध द्रव्यों के द्वारा, चाहे स्वयं करें या दूसरों के द्वारा करवाएँ।

श्लोक 39 (shiva.vidyeshvara.10.39)

पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत् । इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवान्तर्हितः शिवः

pūjayedupacāraiśca matpadaṁ sulabhaṁ bhavet iti śāsya tathā śiṣyau tatraivāntarhitaḥ śivaḥ

उपचारों सहित पूजा करनी चाहिए, जिससे मेरा पद सहज ही प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार दोनों शिष्यों को उपदेश देकर शिव वहीं अन्तर्धान हो गए।

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