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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 9

शिव का स्वयं को महेश्वर रूप में प्रकट करना

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.9.1)

नन्दिकेश्वर उवाच । तत्रान्तरे तौ च नाथं प्रणम्य विधिमाधवौ । बद्धाञ्जलिपुटौ तूष्णीं तस्थतुर्दक्षवामगौ

nandikeśvara uvāca tatrāntare tau ca nāthaṁ praṇamya vidhimādhavau baddhāñjalipuṭau tūṣṇīṁ tasthaturdakṣavāmagau

नन्दिकेश्वर बोले — तदनन्तर ब्रह्मा और विष्णु, दोनों उस स्वामी को प्रणाम कर, हाथ जोड़े हुए मौन होकर उनके दाहिने और बाएँ खड़े हो गए।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.9.2)

तत्र संस्थाप्य तौ देवं सकुटुम्बं वरासने । पूजयामासतुः पूज्यं पुण्यैः पुरुषवस्तुभिः

tatra saṁsthāpya tau devaṁ sakuṭumbaṁ varāsane pūjayāmāsatuḥ pūjyaṁ puṇyaiḥ puruṣavastubhiḥ

वहाँ उन दोनों ने अपने परिवार सहित उस देवता को उत्तम आसन पर विराजमान कर, पवित्र एवं मंगलकारी वस्तुओं से उस पूज्य देव की पूजा की।

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.9.3)

पौरुषं प्राकृतं वस्तु ज्ञेयं दीर्घाल्पकालिकम् । हारनूपुरकेयूरकिरीटमणिकुण्डलैः

pauruṣaṁ prākṛtaṁ vastu jñeyaṁ dīrghālpakālikam hāranūpurakeyūrakirīṭamaṇikuṇḍalaiḥ

मनुष्यकृत और प्राकृतिक वस्तुओं से, जो दीर्घकालीन अथवा अल्पकालीन जानी जाती हैं — हार, नूपुर, केयूर, मुकुट तथा मणिजड़ित कुण्डलों से,

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.9.4)

यज्ञसूत्रोत्तरीयस्रक्क्षौममाल्याङ्गुलीयकैः । पुष्पताम्बूलकर्पूरचन्दनागुरुलेपनैः

yajñasūtrottarīyasrakkṣaumamālyāṅgulīyakaiḥ puṣpatāmbūlakarpūracandanāgurulepanaiḥ

यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, माला, रेशमी वस्त्र तथा अँगूठियों से; पुष्प, ताम्बूल, कर्पूर, चन्दन और अगुरु के लेपों से,

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.9.5)

धूपदीपसितच्छत्रव्यजनध्वजचामरैः । अन्यैर्दिव्योपहारैश्च वाङ्मनोतीतवैभवैः

dhūpadīpasitacchatravyajanadhvajacāmaraiḥ anyairdivyopahāraiśca vāṅmanotītavaibhavaiḥ

धूप, दीप, श्वेत छत्र, पंखे, ध्वजा और चँवरों से; तथा अन्य दिव्य उपहारों से, जिनका वैभव वाणी और मन की पहुँच से परे है,

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.9.6)

पतियोग्यैः पश्वलभ्यैस्तौ समार्चयतां पतिम् । यद्यच्छ्रेष्ठतमं वस्तु पतियोग्यं हितध्वज

patiyogyaiḥ paśvalabhyaistau samārcayatāṁ patim yadyacchreṣṭhatamaṁ vastu patiyogyaṁ hitadhvaja

पति के योग्य, जो सामान्य प्राणियों को दुर्लभ हैं, ऐसी वस्तुओं से उन दोनों ने स्वामी की भलीभाँति पूजा की। हे मंगलकारी ध्वजधारी! जो-जो वस्तु सर्वश्रेष्ठ और स्वामी के योग्य थी,

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.9.7)

तद्वस्त्वखिलमीशोऽपि पारम्पर्यचिकीर्षया । सभ्यानां प्रददौ हृष्टः पृथक् तत्र यथाक्रमम्

tadvastvakhilamīśo ’pi pāramparyacikīrṣayā sabhyānāṁ pradadau hṛṣṭaḥ pṛthak tatra yathākramam

उस समस्त वस्तु को स्वयं ईश्वर ने भी परम्परा स्थापित करने की इच्छा से, प्रसन्न होकर, वहाँ सभासदों को क्रमानुसार पृथक्-पृथक् प्रदान किया।

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.9.8)

कोलाहलो महानासीत्तत्र तद्वस्तु गृह्यताम् । तत्रैव ब्रह्मविष्णुभ्यां चार्चितः शङ्करः पुरा

kolāhalo mahānāsīttatra tadvastu gṛhyatām tatraiva brahmaviṣṇubhyāṁ cārcitaḥ śaṅkaraḥ purā

वहाँ 'वह वस्तु मुझे मिले' — ऐसा कहते हुए बड़ा कोलाहल मच गया। वहीं पूर्वकाल में ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित शंकर,

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.9.9)

प्रसन्नः प्राह तौ नम्रौ सस्मितं भक्तिवर्धनः । ईश्वर उवाच । तुष्टोऽहमद्य वां वत्सौ पूजयास्मिन् महादिने

prasannaḥ prāha tau namrau sasmitaṁ bhaktivardhanaḥ īśvara uvāca tuṣṭo ’hamadya vāṁ vatsau pūjayāsmin mahādine

प्रसन्न होकर, भक्ति बढ़ाने वाले उन शिव ने मुस्कुराते हुए नतमस्तक उन दोनों से कहा। ईश्वर बोले — हे वत्सो! इस महान दिन पर तुम दोनों की पूजा से मैं आज संतुष्ट हूँ।

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.9.10)

दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरम् । शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया

dinametattataḥ puṇyaṁ bhaviṣyati mahattaram śivarātririti khyātā tithireṣā mama priyā

अतः यह दिन आगे से अत्यन्त पुण्यमय हो जाएगा। यह तिथि 'शिवरात्रि' के नाम से विख्यात होगी और मुझे अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.9.11)

एतत्काले तु यः कुर्यात् पूजां मल्लिङ्गवेरयोः । कुर्यात् स जगतः कृत्यं स्थितिसर्गादिकं पुमान्

etatkāle tu yaḥ kuryāt pūjāṁ malliṅgaverayoḥ kuryāt sa jagataḥ kṛtyaṁ sthitisargādikaṁ pumān

जो पुरुष इस काल में मेरे लिंग और प्रतिमा की पूजा करता है, वह मानो सृष्टि, स्थिति आदि जगत् के समस्त कार्यों को सम्पन्न कर लेता है।

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.9.12)

शिवरात्रावहोरात्रं निराहारो जितेन्द्रियः । अर्चयेद्वा यथान्यायं यथाबलमवञ्चकः

śivarātrāvahorātraṁ nirāhāro jitendriyaḥ arcayedvā yathānyāyaṁ yathābalamavañcakaḥ

शिवरात्रि के दिन दिन-रात उपवास करके, इन्द्रियों को वश में रखते हुए, निष्कपट भाव से यथाशक्ति और यथाविधि पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.9.13)

यत्फलं मम पूजायां वर्षमेकं निरन्तरम् । तत्फलं लभते सद्यः शिवरात्रौ मदर्चनात्

yatphalaṁ mama pūjāyāṁ varṣamekaṁ nirantaram tatphalaṁ labhate sadyaḥ śivarātrau madarcanāt

मेरी निरन्तर एक वर्ष तक पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल शिवरात्रि के दिन मेरी पूजा करने मात्र से तत्काल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.9.14)

मद्धर्मवृद्धिकालोऽयं चन्द्रकाल इवाम्बुधेः । प्रतिष्ठाद्युत्सवो यत्र मामको मङ्गलायनः

maddharmavṛddhikālo ’yaṁ candrakāla ivāmbudheḥ pratiṣṭhādyutsavo yatra māmako maṅgalāyanaḥ

यह वह समय है जब मेरा धर्म उसी प्रकार बढ़ता है जैसे चन्द्रमा की कला से समुद्र में ज्वार बढ़ता है; यह मेरी प्रतिष्ठा आदि उत्सवों का मंगलमय अवसर है।

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.9.15)

यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा । स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ

yatpunaḥ stambharūpeṇa svāvirāsamahaṁ purā sa kālo mārgaśīrṣe tu syādārdrāṛkṣamarbhakau

और हे बालको! जिस समय मैंने पूर्वकाल में स्तम्भ के रूप में स्वयं को प्रकट किया था, वह समय मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र के दिन होता है।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.9.16)

आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम् । मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः

ārdrāyāṁ mārgaśīrṣe tu yaḥ paśyenmāmumāsakham madveramapi vā liṅgaṁ sa guhādapi me priyaḥ

जो कोई मार्गशीर्ष की आर्द्रा तिथि पर उमा के सखा मुझको, अथवा मेरी प्रतिमा या लिंग को देखता है, वह मुझे गुह (कार्तिकेय) से भी अधिक प्रिय है।

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.9.17)

अलं दर्शनमात्रेण फलं तस्मिन् दिने शुभे । अभ्यर्चनं चेदधिकं फलं वाचामगोचरम्

alaṁ darśanamātreṇa phalaṁ tasmin dine śubhe abhyarcanaṁ cedadhikaṁ phalaṁ vācāmagocaram

उस शुभ दिन मात्र दर्शन से ही पर्याप्त फल मिल जाता है; और यदि पूजा भी की जाए, तो उसका फल वाणी से भी परे है।

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.9.18)

रणरङ्गतलेऽमुष्मिन् यदहं लिङ्गवर्ष्मणा । जृम्भितो लिङ्गवत्तस्माल्लिङ्गस्थानमिदं भवेत्

raṇaraṅgatale ’muṣmin yadahaṁ liṅgavarṣmaṇā jṛmbhito liṅgavattasmālliṅgasthānamidaṁ bhavet

क्योंकि उस युद्धभूमि पर मैं लिंगरूप शरीर से विस्तृत हुआ, इसलिए यह स्थान लिंगस्थान के नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.9.19)

अनाद्यन्तमिदं स्तम्भमणुमात्रं भविष्यति । दर्शनार्थं हि जगतां पूजनार्थं हि पुत्रकौ

anādyantamidaṁ stambhamaṇumātraṁ bhaviṣyati darśanārthaṁ hi jagatāṁ pūjanārthaṁ hi putrakau

हे पुत्रो! यह अनादि-अनन्त स्तम्भ जगत् के दर्शन और पूजन के लिए अणुमात्र आकार का हो जाएगा।

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.9.20)

भोगावहमिदं लिङ्गं भुक्तिमुक्त्येकसाधनम् । दर्शनस्पर्शनध्यानाज्जन्तूनां जन्ममोचनम्

bhogāvahamidaṁ liṅgaṁ bhuktimuktyekasādhanam darśanasparśanadhyānājjantūnāṁ janmamocanam

यह लिंग भोग प्रदान करने वाला और भुक्ति तथा मुक्ति दोनों का एकमात्र साधन है। इसके दर्शन, स्पर्श और ध्यान से प्राणियों को जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.9.21)

अनलाचलसङ्काशं यदिदं लिङ्गमुत्थितम् । अरुणाचलमित्येव तदिदं ख्यातिमेष्यति

analācalasaṅkāśaṁ yadidaṁ liṅgamutthitam aruṇācalamityeva tadidaṁ khyātimeṣyati

यह जो लिंग अग्नि के पर्वत के समान उठा है, वह 'अरुणाचल' के नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.9.22)

अत्र तीर्थं च बहुधा भविष्यति महत्तरम् । मुक्तिरप्यत्र जन्तूनां वासेन मरणेन च

atra tīrthaṁ ca bahudhā bhaviṣyati mahattaram muktirapyatra jantūnāṁ vāsena maraṇena ca

यहाँ अनेक प्रकार के महान तीर्थ स्थापित होंगे। यहाँ निवास करने से अथवा मृत्यु प्राप्त करने से भी प्राणियों को मुक्ति मिलती है।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.9.23)

रथोत्सवादिकल्याणं जनावासं तु सर्वतः । अत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वं कोटिगुणं भवेत्

rathotsavādikalyāṇaṁ janāvāsaṁ tu sarvataḥ atra dattaṁ hutaṁ japtaṁ sarvaṁ koṭiguṇaṁ bhavet

यहाँ रथोत्सव आदि मंगल कार्य और सब ओर से आए हुए लोगों का निवास होगा। यहाँ दिया गया दान, किया गया हवन तथा किया गया जप — सब कोटिगुना फलदायी होता है।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.9.24)

मत्क्षेत्रादपि सर्वस्मात् क्षेत्रमेतन्महत्तरम् । अत्र संस्मृतिमात्रेण मुक्तिर्भवति देहिनाम्

matkṣetrādapi sarvasmāt kṣetrametanmahattaram atra saṁsmṛtimātreṇa muktirbhavati dehinām

यह क्षेत्र मेरे अन्य समस्त क्षेत्रों से भी बढ़कर है। यहाँ केवल स्मरण मात्र से ही देहधारियों को मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.9.25)

तस्मान्महत्तरमिदं क्षेत्रमत्यन्तशोभनम् । सर्वकल्याणसम्पूर्णं सर्वमुक्तिकरं शुभम्

tasmānmahattaramidaṁ kṣetramatyantaśobhanam sarvakalyāṇasampūrṇaṁ sarvamuktikaraṁ śubham

अतः यह क्षेत्र अत्यन्त महान् और परम सुन्दर है, सम्पूर्ण मंगलों से परिपूर्ण, शुभ तथा सबको मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.9.26)

अर्चयित्वात्र मामेव लिङ्गे लिङ्गिनमीश्वरम् । सालोक्यं चैव सामीप्यं सारूप्यं सार्ष्टिरेव च

arcayitvātra māmeva liṅge liṅginamīśvaram sālokyaṁ caiva sāmīpyaṁ sārūpyaṁ sārṣṭireva ca

यहाँ लिंग में लिंगी (लिंग के अधिष्ठाता) मुझ ईश्वर की पूजा करके सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य तथा सार्ष्टि —

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.9.27)

सायुज्यमिति पञ्चैते क्रियादीनां फलं मतम् । सर्वेऽपि यूयं सकलं प्राप्स्यथाशु मनोरथम्

sāyujyamiti pañcaite kriyādīnāṁ phalaṁ matam sarve ’pi yūyaṁ sakalaṁ prāpsyathāśu manoratham

— और सायुज्य, ये पाँच फल क्रिया आदि साधनों से प्राप्त माने गए हैं। तुम सब भी शीघ्र ही अपने समस्त मनोरथों को प्राप्त करोगे।

श्लोक 28 (shiva.vidyeshvara.9.28)

नन्दिकेश्वर उवाच । इत्यनुगृह्य भगवान् विनीतौ विधिमाधवौ । यत्पूर्वं प्रहतं युद्धे तयोः सैन्यं परस्परम्

nandikeśvara uvāca ityanugṛhya bhagavān vinītau vidhimādhavau yatpūrvaṁ prahataṁ yuddhe tayoḥ sainyaṁ parasparam

नन्दिकेश्वर बोले — इस प्रकार विनीत ब्रह्मा और विष्णु को अनुगृहीत करके, भगवान ने — जो उन दोनों की सेनाएँ युद्ध में परस्पर पहले मारी गई थीं,

श्लोक 29 (shiva.vidyeshvara.9.29)

तदुत्थापयदत्यर्थं स्वशक्त्यामृतधारया । तयोर्मौढ्यं च वैरं च व्यपनेतुमुवाच तौ

tadutthāpayadatyarthaṁ svaśaktyāmṛtadhārayā tayormauḍhyaṁ ca vairaṁ ca vyapanetumuvāca tau

— उन्हें अपनी शक्ति की अमृतधारा से पूर्णतः पुनर्जीवित कर दिया। फिर उन दोनों के मोह और वैर को दूर करने के लिए उनसे कहा।

श्लोक 30 (shiva.vidyeshvara.9.30)

सकलं निष्कलं चेति स्वरूपद्वयमस्ति मे । नान्यस्य कस्यचित्तस्मादन्यः सर्वोऽप्यनीश्वरः

sakalaṁ niṣkalaṁ ceti svarūpadvayamasti me nānyasya kasyacittasmādanyaḥ sarvo ’pyanīśvaraḥ

'मेरे दो स्वरूप हैं — सकल (सगुण) और निष्कल (निर्गुण)। यह किसी अन्य के नहीं हैं; इसलिए मुझसे भिन्न सब कोई ईश्वर नहीं हैं।'

श्लोक 31 (shiva.vidyeshvara.9.31)

पुरस्तात् स्तम्भरूपेण पश्चाद् रूपेण चार्भकौ । ब्रह्मत्वं निष्कलं प्रोक्तमीशत्वं सकलं तथा

purastāt stambharūpeṇa paścād rūpeṇa cārbhakau brahmatvaṁ niṣkalaṁ proktamīśatvaṁ sakalaṁ tathā

हे बालको! पहले स्तम्भरूप में और बाद में साकार रूप में — मेरा ब्रह्मत्व निष्कल कहा गया है और मेरा ईशत्व सकल कहा गया है।

श्लोक 32 (shiva.vidyeshvara.9.32)

द्वयं ममैव संसिद्धं न मदन्यस्य कस्यचित् । तस्मादीशत्वमन्येषां युवयोरपि न क्वचित्

dvayaṁ mamaiva saṁsiddhaṁ na madanyasya kasyacit tasmādīśatvamanyeṣāṁ yuvayorapi na kvacit

यह दोनों स्वरूप केवल मुझमें ही सिद्ध हैं, किसी अन्य में नहीं; इसलिए तुम दोनों में भी कहीं ईशत्व नहीं है।

श्लोक 33 (shiva.vidyeshvara.9.33)

तदज्ञानेन वां वृत्तमीशमानं महाद्भुतम् । तन्निराकर्तुमत्रैवमुत्थितोऽहं रणक्षितौ

tadajñānena vāṁ vṛttamīśamānaṁ mahādbhutam tannirākartumatraivamutthito ’haṁ raṇakṣitau

उसी अज्ञान के कारण तुम दोनों में ईश्वरत्व का यह महान अद्भुत अभिमान उत्पन्न हुआ था; उसी को दूर करने के लिए मैं यहाँ युद्धभूमि में इस प्रकार प्रकट हुआ।

श्लोक 34 (shiva.vidyeshvara.9.34)

त्यजतं मानमात्मीयं मयीशे कुरुतं मतिम् । मत्प्रसादेन लोकेषु सर्वोऽप्यर्थः प्रकाशते

tyajataṁ mānamātmīyaṁ mayīśe kurutaṁ matim matprasādena lokeṣu sarvo ’pyarthaḥ prakāśate

तुम दोनों अपना अभिमान त्याग दो और मुझ ईश्वर में अपनी बुद्धि लगाओ। मेरी कृपा से ही लोकों में समस्त प्रयोजन सिद्ध होते हैं।

श्लोक 35 (shiva.vidyeshvara.9.35)

गुरूक्तिर्व्यञ्जकं तत्र प्रमाणं वा पुनः पुनः । ब्रह्मतत्त्वमिदं गूढं भवत्प्रीत्या भणाम्यहम्

gurūktirvyañjakaṁ tatra pramāṇaṁ vā punaḥ punaḥ brahmatattvamidaṁ gūḍhaṁ bhavatprītyā bhaṇāmyaham

इस विषय में गुरु का वचन ही प्रकाशक है, अथवा बार-बार शास्त्र ही प्रमाण है। यह गूढ़ ब्रह्मतत्त्व मैं तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण कह रहा हूँ।

श्लोक 36 (shiva.vidyeshvara.9.36)

अहमेव परं ब्रह्म मत्स्वरूपं कलाकलम् । ब्रह्मत्वादीश्वरश्चाहं कृत्यं मेऽनुग्रहादिकम्

ahameva paraṁ brahma matsvarūpaṁ kalākalam brahmatvādīśvaraścāhaṁ kṛtyaṁ me ’nugrahādikam

मैं ही परब्रह्म हूँ; मेरा स्वरूप सकल और निष्कल दोनों है। ब्रह्मत्व के कारण ही मैं ईश्वर हूँ, और अनुग्रह आदि कार्य मेरे ही हैं।

श्लोक 37 (shiva.vidyeshvara.9.37)

बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्माहं ब्रह्मकेशवौ । समत्वाद्व्यापकत्वाच्च तथैवात्माहमर्भकौ

bṛhattvād bṛṁhaṇatvācca brahmāhaṁ brahmakeśavau samatvādvyāpakatvācca tathaivātmāhamarbhakau

विशालता और वर्धन-स्वभाव के कारण मैं ही ब्रह्म हूँ, न कि केवल ब्रह्मा और केशव। समत्व और व्यापकत्व के कारण, हे बालको, मैं ही आत्मा भी हूँ।

श्लोक 38 (shiva.vidyeshvara.9.38)

अनात्मानः परे सर्वे जीवा एव न संशयः । अनुग्रहाद्यं सर्गान्तं जगत्कृत्यं च पञ्चकम्

anātmānaḥ pare sarve jīvā eva na saṁśayaḥ anugrahādyaṁ sargāntaṁ jagatkṛtyaṁ ca pañcakam

मुझसे भिन्न अन्य सभी निःसंदेह केवल जीव ही हैं, आत्मा नहीं। अनुग्रह से लेकर संहार पर्यन्त जगत् के जो पाँच कार्य हैं,

श्लोक 39 (shiva.vidyeshvara.9.39)

ईशत्वादेव मे नित्यं न मदन्यस्य कस्यचित् । आदौ ब्रह्मत्वबुद्ध्यर्थं निष्कलं लिङ्गमुत्थितम्

īśatvādeva me nityaṁ na madanyasya kasyacit ādau brahmatvabuddhyarthaṁ niṣkalaṁ liṅgamutthitam

— यह सदा मेरे ईशत्व के कारण ही मेरा है, किसी अन्य का नहीं। आरम्भ में मेरे ब्रह्मत्व के बोध हेतु ही निष्कल लिंग प्रकट हुआ था।

श्लोक 40 (shiva.vidyeshvara.9.40)

तस्मादज्ञातमीशत्वं व्यक्तं द्योतयितुं हि वाम् । सकलोऽहमतो जातः साक्षादीशस्तु तत्क्षणात्

tasmādajñātamīśatvaṁ vyaktaṁ dyotayituṁ hi vām sakalo ’hamato jātaḥ sākṣādīśastu tatkṣaṇāt

अतः तुम दोनों को मेरे अज्ञात ईशत्व को स्पष्ट रूप से दिखाने के लिए ही मैं उसी क्षण साक्षात् सकल ईश्वर रूप में प्रकट हुआ।

श्लोक 41 (shiva.vidyeshvara.9.41)

सकलत्वमतो ज्ञेयमीशत्वं मयि सत्वरम् । यदिदं निष्कलं स्तम्भं मम ब्रह्मत्वबोधकम्

sakalatvamato jñeyamīśatvaṁ mayi satvaram yadidaṁ niṣkalaṁ stambhaṁ mama brahmatvabodhakam

अतः यही जानना चाहिए कि सकलत्व और ईशत्व शीघ्र ही मुझमें हैं। यह जो निष्कल स्तम्भ है, वह मेरे ब्रह्मत्व का बोधक है।

श्लोक 42 (shiva.vidyeshvara.9.42)

लिङ्गलक्षणयुक्तत्वान्मम लिङ्गं भवेदिदम् । तदिदं नित्यमभ्यर्यं युवाभ्यामत्र पुत्रकौ

liṅgalakṣaṇayuktatvānmama liṅgaṁ bhavedidam tadidaṁ nityamabhyaryaṁ yuvābhyāmatra putrakau

लिंग के लक्षणों से युक्त होने के कारण यह मेरा लिंग होगा। इसलिए, हे पुत्रो, इसकी यहाँ तुम दोनों द्वारा सदैव पूजा की जानी चाहिए।

श्लोक 43 (shiva.vidyeshvara.9.43)

मदात्मकमिदं नित्यं मम सान्निध्यकारणम् । महत्पूज्यमिदं नित्यमभेदाल्लिङ्गलिङ्गिनोः

madātmakamidaṁ nityaṁ mama sānnidhyakāraṇam mahatpūjyamidaṁ nityamabhedālliṅgaliṅginoḥ

यह सदा मेरे स्वरूप से अभिन्न है और मेरी सन्निधि का कारण है। लिंग और लिंगी में अभेद होने के कारण यह सदा परम पूजनीय है।

श्लोक 44 (shiva.vidyeshvara.9.44)

यत्र प्रतिष्ठितं येन मदीयं लिङ्गमीदृशम् । तत्र प्रतिष्ठितः सोऽहमप्रतिष्ठोऽपि वत्सकौ

yatra pratiṣṭhitaṁ yena madīyaṁ liṅgamīdṛśam tatra pratiṣṭhitaḥ so ’hamapratiṣṭho ’pi vatsakau

हे वत्सो! जहाँ भी और जिसके द्वारा भी मेरा ऐसा लिंग स्थापित किया जाता है, वहाँ मैं स्वयं प्रतिष्ठित हो जाता हूँ, यद्यपि मैं वस्तुतः सर्वव्यापी होने से किसी स्थापन का मुहताज नहीं हूँ।

श्लोक 45 (shiva.vidyeshvara.9.45)

मत्साम्यमेकलिङ्गस्य स्थापने फलमीरितम् । द्वितीये स्थापिते लिङ्गे मदैक्यं फलमेव हि

matsāmyamekaliṅgasya sthāpane phalamīritam dvitīye sthāpite liṅge madaikyaṁ phalameva hi

एक बार लिंग की स्थापना करने से मेरे साम्य की प्राप्ति फलरूप में कही गई है; और उसी स्थान पर लिंग की पुनः स्थापना करने पर उसका फल मेरे साथ ऐक्य ही है।

श्लोक 46 (shiva.vidyeshvara.9.46)

लिङ्गं प्राधान्यतः स्थाप्यं तथा वेरं तु गौणकम् । लिङ्गाभावे न तत्क्षेत्रं सवेरमपि सर्वतः

liṅgaṁ prādhānyataḥ sthāpyaṁ tathā veraṁ tu gauṇakam liṅgābhāve na tatkṣetraṁ saveramapi sarvataḥ

लिंग को प्रधानरूप से स्थापित करना चाहिए, जबकि प्रतिमा (वेर) गौण है। लिंग के अभाव में वह स्थान, प्रतिमा सहित होने पर भी, किसी भी प्रकार तीर्थक्षेत्र नहीं बनता।

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