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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 13

सदाचार का वर्णन

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.13.1)

ऋषय ऊचुः । सदाचारं श्रावयाशु येन लोकाञ्जयेद् बुधः । धर्माधर्ममयान्ब्रूहि स्वर्गनारकदांस्तथा

ṛṣaya ūcuḥ sadācāraṁ śrāvayāśu yena lokāñjayed budhaḥ dharmādharmamayānbrūhi svarganārakadāṁstathā

ऋषियों ने कहा — शीघ्र ही हमें सदाचार सुनाइए, जिससे बुद्धिमान पुरुष लोकों पर विजय पाता है। धर्म और अधर्म से युक्त, तथा स्वर्ग और नरक देने वाले कर्मों को भी बताइए।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.13.2)

सूत उवाच । सदाचारयुतो विद्वान् ब्राह्मणो नाम नामतः । वेदाचारयुतो विप्रो ह्येतैरेकैकवान्द्विजः

sūta uvāca sadācārayuto vidvān brāhmaṇo nāma nāmataḥ vedācārayuto vipro hyetairekaikavāndvijaḥ

सूत बोले — सदाचार और विद्या से युक्त पुरुष ही वास्तव में ब्राह्मण कहलाता है। वेदोक्त आचार से युक्त विप्र कहलाता है; इनमें से एक ही गुण रखने वाला द्विज कहलाता है।

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.13.3)

अल्पाचारोऽल्पवेदश्च क्षत्रियो राजसेवकः । किञ्चिदाचारवान्वैश्यः कृषिवाणिज्यकृत्तथा

alpācāro ’lpavedaśca kṣatriyo rājasevakaḥ kiñcidācāravānvaiśyaḥ kṛṣivāṇijyakṛttathā

अल्प आचार और अल्प वेद-ज्ञान वाला, राजा की सेवा करने वाला क्षत्रिय है; कुछ आचार से युक्त, कृषि और वाणिज्य करने वाला वैश्य है।

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.13.4)

शूद्रब्राह्मण इत्युक्तः स्वयमेव हि कर्षकः । असूयालुः परद्रोही चण्डालद्विज उच्यते

śūdrabrāhmaṇa ityuktaḥ svayameva hi karṣakaḥ asūyāluḥ paradrohī caṇḍāladvija ucyate

स्वयं खेती करने वाला ब्राह्मण 'शूद्र-ब्राह्मण' कहलाता है; दूसरों से ईर्ष्या और द्रोह करने वाला द्विज 'चण्डाल-द्विज' कहलाता है।

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.13.5)

पृथिवीपालको राजा इतरे क्षत्रिया मताः । धान्यादिक्रयवान्वैश्य इतरो वणिगुच्यते

pṛthivīpālako rājā itare kṣatriyā matāḥ dhānyādikrayavānvaiśya itaro vaṇigucyate

पृथ्वी की रक्षा करने वाला राजा कहलाता है, शेष क्षत्रिय माने जाते हैं। अन्न आदि का व्यापार करने वाला वैश्य कहलाता है, अन्य साधारण व्यापारी कहलाता है।

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.13.6)

ब्रह्मक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते । कर्षको वृषलो ज्ञेय इतरे चैव दस्यवः

brahmakṣatriyavaiśyānāṁ śuśrūṣuḥ śūdra ucyate karṣako vṛṣalo jñeya itare caiva dasyavaḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करने वाला शूद्र कहलाता है; कृषि करने वाला वृषल जाना जाता है, शेष लोग दस्यु कहलाते हैं।

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.13.7)

सर्वो ह्युषः प्राङ्मुखश्च चिन्तयेद् देवपूर्वकान् । धर्मानर्थांश्च तत्क्लेशानायं च व्ययमेव च

sarvo hyuṣaḥ prāṅmukhaśca cintayed devapūrvakān dharmānarthāṁśca tatkleśānāyaṁ ca vyayameva ca

प्रत्येक व्यक्ति को प्रातःकाल पूर्वाभिमुख होकर देवताओं से सम्बन्धित बातों का, धर्म और अर्थ का, उनसे जुड़े क्लेशों का, तथा आय और व्यय का चिन्तन करना चाहिए,

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.13.8)

आयुर्द्वेषश्च मरणं पापं भाग्यं तथैव च । व्याधिः पुष्टिस्तथा शक्तिः प्रातरुत्थानदिक्फलम्

āyurdveṣaśca maraṇaṁ pāpaṁ bhāgyaṁ tathaiva ca vyādhiḥ puṣṭistathā śaktiḥ prātarutthānadikphalam

आयु, द्वेष, मृत्यु, पाप तथा भाग्य का, व्याधि, पुष्टि और शक्ति का भी — यही प्रातः उठने और उचित दिशा में मुख करने का फल है।

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.13.9)

निशान्त्ययामोषा ज्ञेया यामार्धं सन्धिरुच्यते । तत्काले तु समुत्थाय विण्मूत्रे विसृजेद् द्विजः

niśāntyayāmoṣā jñeyā yāmārdhaṁ sandhirucyate tatkāle tu samutthāya viṇmūtre visṛjed dvijaḥ

रात्रि का अन्तिम प्रहर 'उषा' कहलाता है; आधा प्रहर 'संधि' कहलाता है। उसी समय उठकर द्विज को मल-मूत्र का विसर्जन करना चाहिए,

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.13.10)

गृहाद् दूरं ततो गत्वा बाह्यतः प्रावृतस्तथा । उदङ्मुखः समाविश्य प्रतिबन्धेऽन्यदिङ्मुखः

gṛhād dūraṁ tato gatvā bāhyataḥ prāvṛtastathā udaṅmukhaḥ samāviśya pratibandhe ’nyadiṅmukhaḥ

घर से दूर जाकर, बाहरी वस्त्र से ढका हुआ, उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठे; और यदि वह दिशा अवरुद्ध हो, तो किसी अन्य दिशा की ओर।

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.13.11)

जलाग्निब्राह्मणादीनां देवानां नाभिमुख्यतः । लिङ्गं पिधाय वामेन मुखमन्येन पाणिना

jalāgnibrāhmaṇādīnāṁ devānāṁ nābhimukhyataḥ liṅgaṁ pidhāya vāmena mukhamanyena pāṇinā

जल, अग्नि, ब्राह्मण आदि तथा देवताओं की ओर मुख न करते हुए, बायें हाथ से इन्द्रिय को और दूसरे हाथ से मुख को ढककर,

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.13.12)

मलमुत्सृज्य चोत्थाय न पश्येच्चैव तन्मलम् । उद्धृतेन जलेनैव शौचं कुर्याज्जलाद् बहिः

malamutsṛjya cotthāya na paśyeccaiva tanmalam uddhṛtena jalenaiva śaucaṁ kuryājjalād bahiḥ

मल का त्याग करके, उठकर उस मल को न देखे। जल के स्रोत से दूर हटकर, ऊपर लाए हुए जल से ही शौच करे।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.13.13)

अथवा देवपित्रर्षितीर्थावतरणं विना । सप्त वा पञ्च वा त्रीन्वा गुदं संशोधयेन्मृदा

athavā devapitrarṣitīrthāvataraṇaṁ vinā sapta vā pañca vā trīnvā gudaṁ saṁśodhayenmṛdā

अथवा देवता, पितर और ऋषियों से सम्बन्धित तीर्थ में उतरे बिना, सात, पाँच अथवा तीन मिट्टी के लेप से गुदा-शुद्धि करे।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.13.14)

लिङ्गे कर्कोटमात्रं तु गुदे प्रसृतिरिष्यते । तत उत्थाय पद्धस्तशौचं गण्डूषमष्टकम्

liṅge karkoṭamātraṁ tu gude prasṛtiriṣyate tata utthāya paddhastaśaucaṁ gaṇḍūṣamaṣṭakam

इन्द्रिय पर कर्कोट-फल के बराबर तथा गुदा पर एक मुट्ठी मिट्टी का प्रयोग होना चाहिए। फिर उठकर हाथ-पैर धोकर आठ बार कुल्ला करे,

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.13.15)

येन केन च पत्रेण काष्ठेन च जलाद् बहिः । कार्यं सन्तर्जनीं त्यज्य दन्तधावनमीरितम्

yena kena ca patreṇa kāṣṭhena ca jalād bahiḥ kāryaṁ santarjanīṁ tyajya dantadhāvanamīritam

और जल-स्रोत से दूर, किसी उपयुक्त पत्ते या दातुन से दाँत साफ करे, तर्जनी उँगली का प्रयोग किए बिना — ऐसा कहा गया है।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.13.16)

जलदेवान्नमस्कृत्य मन्त्रेण स्नानमाचरेत् । अशक्तः कण्ठदघ्नं वा कटिदघ्नमथापि वा

jaladevānnamaskṛtya mantreṇa snānamācaret aśaktaḥ kaṇṭhadaghnaṁ vā kaṭidaghnamathāpi vā

जल के देवताओं को नमस्कार करके मंत्रपूर्वक स्नान करे। यदि असमर्थ हो, तो कण्ठ अथवा कमर तक जल में,

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.13.17)

आजानुजलमाविश्य मन्त्रस्थानं समाचरेत् । देवादींस्तर्पयेद्विद्वांस्तत्र तीर्थजलेन च

ājānujalamāviśya mantrasthānaṁ samācaret devādīṁstarpayedvidvāṁstatra tīrthajalena ca

या घुटनों तक जल में प्रवेश करके मंत्र-स्थान की विधि पूर्ण करे। विद्वान वहाँ तीर्थ के जल से देवताओं आदि को तर्पण दे।

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.13.18)

धौतवस्त्रं समादाय पञ्चकच्छेन धारयेत् । उत्तरीयं च किञ्चैव धार्यं सर्वेषु कर्मसु

dhautavastraṁ samādāya pañcakacchena dhārayet uttarīyaṁ ca kiñcaiva dhāryaṁ sarveṣu karmasu

धुला हुआ वस्त्र लेकर पाँच लपेट में पहनना चाहिए; कोई उत्तरीय वस्त्र भी सभी कर्मों के समय धारण करना चाहिए।

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.13.19)

नद्यादितीर्थस्नने तु स्नानवस्त्रं न शोधयेत् । वापीकूपगृहादौ तु स्नानादूर्ध्वं नयेद्बुधः

nadyāditīrthasnane tu snānavastraṁ na śodhayet vāpīkūpagṛhādau tu snānādūrdhvaṁ nayedbudhaḥ

नदी आदि तीर्थ में स्नान करते समय स्नान-वस्त्र को वहाँ न धोए। बावड़ी, कुएँ या घर आदि में तो विद्वान स्नान के बाद ही उसे बाहर लाए,

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.13.20)

शिलादार्वादिके वापि जले वापि स्थलेऽपि वा । संशोध्य पीडयेद्वस्त्रं पितॄणां तृप्तये द्विजाः

śilādārvādike vāpi jale vāpi sthale ’pi vā saṁśodhya pīḍayedvastraṁ pitṝṇāṁ tṛptaye dvijāḥ

और पत्थर या लकड़ी के तख्ते पर, अथवा जल में या भूमि पर, उसे साफ करके निचोड़ दे — हे द्विजो! यह पितरों की तृप्ति के लिए है।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.13.21)

जाबालकोक्तमन्त्रेण भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् । अन्यथा चेज्जले पातस्ततो नरकमृच्छति

jābālakoktamantreṇa bhasmanā ca tripuṇḍrakam anyathā cejjale pātastato narakamṛcchati

जाबाल-श्रुति में कहे गए मंत्र से तथा भस्म से त्रिपुण्ड्र (तीन रेखाएँ) लगानी चाहिए; अन्यथा यदि वह भस्म जल में गिर जाए, तो नरक की प्राप्ति होती है।

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.13.22)

आपोहिष्ठेति शिरसि प्रोक्षयेत्पापशान्तये । यस्येति मन्त्रं पादे तु सन्धिप्रोक्षणमुच्यते

āpohiṣṭheti śirasi prokṣayetpāpaśāntaye yasyeti mantraṁ pāde tu sandhiprokṣaṇamucyate

'आपो हिष्ठा' मंत्र से सिर पर जल छिड़के, जिससे पाप की शांति होती है। 'यस्य' मंत्र से पैरों पर छिड़कना 'संधि-प्रोक्षण' कहलाता है।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.13.23)

हृदये मूर्ध्नि पादे च मूर्ध्नि हृत्पाद एव च । हृत्पादमूर्ध्नि सम्प्रोक्ष्य मन्त्रस्नानं विदुर्बुधाः

hṛdaye mūrdhni pāde ca mūrdhni hṛtpāda eva ca hṛtpādamūrdhni samprokṣya mantrasnānaṁ vidurbudhāḥ

हृदय, सिर और पैरों पर, फिर सिर, हृदय और पैरों पर, और अन्त में हृदय, पैर और सिर पर एक साथ छिड़ककर — विद्वान इसे मंत्र-स्नान कहते हैं।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.13.24)

ईषत्स्पर्शे च दोःस्वास्थ्ये राजराष्ट्रभयेऽपि च । अगत्या गतिकाले च मन्त्रस्नानं समाचरेत्

īṣatsparśe ca doḥsvāsthye rājarāṣṭrabhaye ’pi ca agatyā gatikāle ca mantrasnānaṁ samācaret

किसी अशुद्ध वस्तु के हल्के स्पर्श होने पर, हाथ के अस्वस्थ होने पर, राजा या राष्ट्र के भय में, अथवा यात्रा के कारण असमर्थता होने पर, यह मंत्र-स्नान करना चाहिए।

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.13.25)

प्रातः सूर्यानुवाकेन सायमग्न्यनुवाकतः । अपः पीत्वा तथा मध्ये पुनः प्रोक्षणमाचरेत्

prātaḥ sūryānuvākena sāyamagnyanuvākataḥ apaḥ pītvā tathā madhye punaḥ prokṣaṇamācaret

प्रातःकाल सूर्यानुवाक से और सायंकाल अग्न्यनुवाक से जल पीकर, मध्य में पुनः जल छिड़कना चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.13.26)

गायत्र्या जपमन्त्रान्ते त्रिरूर्ध्वं प्राग्विनिक्षिपेत् । मन्त्रेण सह चैकं वै मध्येऽर्घ्यं तु रवेर्द्विजाः

gāyatryā japamantrānte trirūrdhvaṁ prāgvinikṣipet mantreṇa saha caikaṁ vai madhye ’rghyaṁ tu raverdvijāḥ

गायत्री-जप के अन्त में तीन बार ऊपर की ओर पूर्व दिशा में जल छोड़ना चाहिए। हे द्विजो! मंत्र सहित एक बार बीच में सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए।

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.13.27)

अथ जाते च सायाह्ने भुवि पश्चिमदिङ्मुखः । उद्धृत्य दद्यात् प्रातस्तु मध्याह्नेऽङ्गुलिभिस्तथा

atha jāte ca sāyāhne bhuvi paścimadiṅmukhaḥ uddhṛtya dadyāt prātastu madhyāhne ’ṅgulibhistathā

फिर सायंकाल होने पर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भूमि पर जल गिराते हुए अर्घ्य दे; प्रातःकाल ऊपर उठाकर, और मध्याह्न में उँगलियों से,

श्लोक 28 (shiva.vidyeshvara.13.28)

अङ्गुलीनां च रन्ध्रेण लम्बं पश्येद् दिवाकरम् । आत्मप्रदक्षिणं कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत्

aṅgulīnāṁ ca randhreṇa lambaṁ paśyed divākaram ātmapradakṣiṇaṁ kṛtvā śuddhācamanamācaret

उँगलियों के बीच के छिद्र से सूर्य को ऊपर देखना चाहिए। अपनी ही प्रदक्षिणा करके शुद्ध आचमन करे।

श्लोक 29 (shiva.vidyeshvara.13.29)

सायं मुहूर्तादर्वाक्तु कृता सन्ध्या वृथा भवेत् । अकालात्काल इत्युक्तो दिनेऽतीते यथाक्रमम्

sāyaṁ muhūrtādarvāktu kṛtā sandhyā vṛthā bhavet akālātkāla ityukto dine ’tīte yathākramam

सायं-संध्या यदि उचित मुहूर्त से पहले की जाए, तो वह व्यर्थ हो जाती है। दिन बीत जाने पर, यथाक्रम 'अकाल में भी काल' का नियम लागू होता है।

श्लोक 30 (shiva.vidyeshvara.13.30)

दिवातीते च गायत्रीं शतं नित्ये क्रमाज्जपेत् । आदशाहात्परातीतं गायत्रीं लक्षमभ्यसेत्

divātīte ca gāyatrīṁ śataṁ nitye kramājjapet ādaśāhātparātītaṁ gāyatrīṁ lakṣamabhyaset

यदि दिन बीत जाए, तो नित्य क्रमशः गायत्री का सौ बार जप करे। दस दिन से अधिक बीत जाने पर, गायत्री का एक लाख जप करे।

श्लोक 31 (shiva.vidyeshvara.13.31)

मासातीते तु नित्ये हि पुनश्चोपनयं चरेत् । ईशो गौरी गुहो विष्णुर्ब्रह्मा चन्द्रश्च वै यमः

māsātīte tu nitye hi punaścopanayaṁ caret īśo gaurī guho viṣṇurbrahmā candraśca vai yamaḥ

यदि एक मास बीत जाए, तो पुनः उपनयन संस्कार करे। ईश, गौरी, गुह, विष्णु, ब्रह्मा, चन्द्र तथा यम —

श्लोक 32 (shiva.vidyeshvara.13.32)

एवंरूपांश्च वै देवांस्तर्पयेदर्थसिद्धये । ब्रह्मार्पणं ततः कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत्

evaṁrūpāṁśca vai devāṁstarpayedarthasiddhaye brahmārpaṇaṁ tataḥ kṛtvā śuddhācamanamācaret

इन देवताओं को अभीष्ट-सिद्धि के लिए तर्पण देना चाहिए। फिर ब्रह्म को अर्पण करके शुद्ध आचमन करे।

श्लोक 33 (shiva.vidyeshvara.13.33)

तीर्थदक्षिणतः शस्ते मठे मन्त्रालये बुधः । तत्र देवालये वापि गृहे वा नियतस्थले

tīrthadakṣiṇataḥ śaste maṭhe mantrālaye budhaḥ tatra devālaye vāpi gṛhe vā niyatasthale

तीर्थ के दक्षिण भाग में, अथवा किसी उत्तम मठ में, मंत्रालय में, विद्वान — या मन्दिर में, अथवा घर में ही, किसी निश्चित स्थान पर,

श्लोक 34 (shiva.vidyeshvara.13.34)

सर्वान्देवान्नमस्कृत्य स्थिरबुद्धिः स्थिरासनः । प्रणवं पूर्वमभ्यस्य गायत्रीमभ्यसेत्ततः

sarvāndevānnamaskṛtya sthirabuddhiḥ sthirāsanaḥ praṇavaṁ pūrvamabhyasya gāyatrīmabhyasettataḥ

समस्त देवताओं को नमस्कार करके, स्थिर बुद्धि और स्थिर आसन से बैठकर, पहले प्रणव का अभ्यास करे, फिर गायत्री का अभ्यास करे।

श्लोक 35 (shiva.vidyeshvara.13.35)

जीवब्रह्मैक्यविषयं बुद्ध्वा प्रणवमभ्यसेत् । त्रैलोक्यसृष्टिकर्तारं स्थितिकर्तारमच्युतम्

jīvabrahmaikyaviṣayaṁ buddhvā praṇavamabhyaset trailokyasṛṣṭikartāraṁ sthitikartāramacyutam

जीव और ब्रह्म की एकता के अर्थ को समझकर प्रणव का अभ्यास करे — 'त्रैलोक्य के सृष्टिकर्ता, स्थितिकर्ता अच्युत,

श्लोक 36 (shiva.vidyeshvara.13.36)

संहर्तारं तथा रुद्रं स्वप्रकाशमुपास्महे । ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां च मनोवृत्तीर्धियस्तथा

saṁhartāraṁ tathā rudraṁ svaprakāśamupāsmahe jñānakarmendriyāṇāṁ ca manovṛttīrdhiyastathā

तथा संहारकर्ता रुद्र, उस स्वयं-प्रकाश की हम उपासना करते हैं' — जो ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन की वृत्तियों तथा बुद्धि को भी,

श्लोक 37 (shiva.vidyeshvara.13.37)

भोगमोक्षप्रदे धर्मे ज्ञाने च प्रेरयेत्सदा । इत्थमर्थं धिया ध्यायन्ब्रह्म प्राप्नोति निश्चयम्

bhogamokṣaprade dharme jñāne ca prerayetsadā itthamarthaṁ dhiyā dhyāyanbrahma prāpnoti niścayam

भोग और मोक्ष दोनों देने वाले धर्म और ज्ञान की ओर सदा प्रेरित करते हैं। इस अर्थ का बुद्धि से ध्यान करने वाला निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त करता है।

श्लोक 38 (shiva.vidyeshvara.13.38)

केवलं वा जपेन्नित्यं ब्राह्मण्यस्य च पूर्तये । सहस्रमभ्यसेन्नित्यं प्रातर्ब्राह्मणपुङ्गवः

kevalaṁ vā japennityaṁ brāhmaṇyasya ca pūrtaye sahasramabhyasennityaṁ prātarbrāhmaṇapuṅgavaḥ

अथवा केवल ब्राह्मण्य की पूर्ति के लिए नित्य इसका जप करे। श्रेष्ठ ब्राह्मण को नित्य प्रातःकाल इसका एक हज़ार बार अभ्यास करना चाहिए,

श्लोक 39 (shiva.vidyeshvara.13.39)

अन्येषां च यथाशक्ति मध्याह्ने च शतं जपेत् । सायं द्विदशकं ज्ञेयं शिखाष्टकसमन्वितम्

anyeṣāṁ ca yathāśakti madhyāhne ca śataṁ japet sāyaṁ dvidaśakaṁ jñeyaṁ śikhāṣṭakasamanvitam

और अन्य लोगों को यथाशक्ति; मध्याह्न में सौ बार जप करे। सायंकाल बीस बार जानना चाहिए, साथ में शिखा-मंत्र का आठ बार जप।

श्लोक 40 (shiva.vidyeshvara.13.40)

मूलाधारं समारभ्य द्वादशांशस्थितांस्तथा । विद्येशब्रह्मविष्ण्वीशजीवात्मपरमेश्वरान्

mūlādhāraṁ samārabhya dvādaśāṁśasthitāṁstathā vidyeśabrahmaviṣṇvīśajīvātmaparameśvarān

मूलाधार से आरम्भ करके बारह स्थानों में स्थित विद्येश, ब्रह्मा, विष्णु, ईश, जीवात्मा तथा परमेश्वर को,

श्लोक 41 (shiva.vidyeshvara.13.41)

ब्रह्मबुद्ध्या तदैक्यं च सोऽहं भावनया जपेत् । तानेव ब्रह्मरन्ध्रादौ कायाद् बाह्ये च भावयेत्

brahmabuddhyā tadaikyaṁ ca so ’haṁ bhāvanayā japet tāneva brahmarandhrādau kāyād bāhye ca bhāvayet

'ब्रह्म ही मैं हूँ' — इस भावना से उनकी एकता को ब्रह्म-बुद्धि से जपे। उन्हीं को शिर के ऊपरी भाग से लेकर शरीर के भीतर और बाहर भी ध्यान करे,

श्लोक 42 (shiva.vidyeshvara.13.42)

महत्तत्त्वं समारभ्य शरीरं तु सहस्रकम् । एकैकस्माज्जपादेकमतिक्रम्य शनैः शनैः

mahattattvaṁ samārabhya śarīraṁ tu sahasrakam ekaikasmājjapādekamatikramya śanaiḥ śanaiḥ

महत्तत्त्व से आरम्भ करके शरीर को एक हज़ार स्थानों वाला मानते हुए। प्रत्येक जप से एक-एक स्थान को क्रमशः धीरे-धीरे पार करते हुए,

श्लोक 43 (shiva.vidyeshvara.13.43)

परस्मिन्योजयेज्जीवं जपतत्त्वमुदाहृतम् । शतद्विदशकं देहं शिखाष्टकसमन्वितम्

parasminyojayejjīvaṁ japatattvamudāhṛtam śatadvidaśakaṁ dehaṁ śikhāṣṭakasamanvitam

जीव को परम तत्त्व में मिलाना चाहिए — इसी को जप-तत्त्व कहा गया है। शरीर के लिए एक सौ बीस जप, शिखा-मंत्र के आठ जप सहित —

श्लोक 44 (shiva.vidyeshvara.13.44)

मन्त्राणां जप एवं हि जपमादिक्रमाद्विदुः । सहस्रं ब्राह्मदं विद्याच्छतमैन्द्रप्रदं विदुः

mantrāṇāṁ japa evaṁ hi japamādikramādviduḥ sahasraṁ brāhmadaṁ vidyācchatamaindrapradaṁ viduḥ

इसी क्रम से मंत्रों का जप जाना जाता है, आरम्भ से इसी क्रम में। एक हज़ार जप को ब्रह्मलोक देने वाला और सौ जप को इन्द्रलोक देने वाला जानना चाहिए;

श्लोक 45 (shiva.vidyeshvara.13.45)

इतरत्त्वात्मरक्षार्थं ब्रह्मयोनिषु जायते । दिवाकरमुपस्थाय नित्यमित्थं समाचरेत्

itarattvātmarakṣārthaṁ brahmayoniṣu jāyate divākaramupasthāya nityamitthaṁ samācaret

इससे कम तो केवल आत्म-रक्षा के लिए है, और ब्राह्मण-कुलों में जन्म दिलाता है। इस प्रकार नित्य सूर्य की उपासना करते हुए यह आचरण करना चाहिए।

श्लोक 46 (shiva.vidyeshvara.13.46)

लक्षद्वादशयुक्तस्तु पूर्णब्राह्मण ईरितः । गायत्र्या लक्षहीनं तु वेदकार्ये न योजयेत्

lakṣadvādaśayuktastu pūrṇabrāhmaṇa īritaḥ gāyatryā lakṣahīnaṁ tu vedakārye na yojayet

जिसने बारह लाख जप पूर्ण कर लिए हों, वह 'पूर्ण ब्राह्मण' कहलाता है। जिसने गायत्री का एक लाख जप पूर्ण न किया हो, उसे वैदिक कार्यों में नहीं लगाना चाहिए।

श्लोक 47 (shiva.vidyeshvara.13.47)

आसप्ततेस्तु नियमं पश्चात्प्रव्राजनं चरेत् । प्रातर्द्वादशसाहस्रं प्रव्राजी प्रणवं जपेत्

āsaptatestu niyamaṁ paścātpravrājanaṁ caret prātardvādaśasāhasraṁ pravrājī praṇavaṁ japet

सत्तर वर्ष की आयु तक यह नियम पालन करे, उसके पश्चात् संन्यास ग्रहण करे। संन्यासी को प्रातःकाल बारह हज़ार बार प्रणव का जप करना चाहिए,

श्लोक 48 (shiva.vidyeshvara.13.48)

दिने दिने त्वतिक्रान्ते नित्यमेवं क्रमाज्जपेत् । मासादौ क्रमशोऽतीते सार्धलक्षजपेन हि

dine dine tvatikrānte nityamevaṁ kramājjapet māsādau kramaśo ’tīte sārdhalakṣajapena hi

और प्रतिदिन इसी क्रम से नित्य जप करना चाहिए। यदि एक मास आदि क्रमशः बीत जाए, तो डेढ़ लाख जप द्वारा प्रायश्चित करे।

श्लोक 49 (shiva.vidyeshvara.13.49)

अत ऊर्ध्वमतिक्रान्ते पुनः प्रैषं समाचरेत् । एवं कृत्वा दोषशान्तिरन्यथा रौरवं व्रजेत्

ata ūrdhvamatikrānte punaḥ praiṣaṁ samācaret evaṁ kṛtvā doṣaśāntiranyathā rauravaṁ vrajet

इससे भी अधिक बीत जाने पर पुनः संन्यास-दीक्षा ग्रहण करे। ऐसा करने से दोष की शान्ति होती है; अन्यथा रौरव नरक में जाना पड़ता है।

श्लोक 50 (shiva.vidyeshvara.13.50)

धर्मार्थयोस्ततो यत्नं कुर्यात्कामी न चेतरः । ब्राह्मणो मुक्तिकामः स्याद् बह्मज्ञानं सदाभ्यसेत्

dharmārthayostato yatnaṁ kuryātkāmī na cetaraḥ brāhmaṇo muktikāmaḥ syād bahmajñānaṁ sadābhyaset

इसलिए कामनावान पुरुष को ही धर्म और अर्थ के लिए प्रयत्न करना चाहिए, निष्काम पुरुष को नहीं। मुमुक्षु ब्राह्मण को सदा ब्रह्मज्ञान का ही अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 51 (shiva.vidyeshvara.13.51)

धर्मादर्थोऽर्थतो भोगो भोगाद्वैराग्यसम्भवः । धर्मार्जितार्थभोगेन वैराग्यमुपजायते

dharmādartho ’rthato bhogo bhogādvairāgyasambhavaḥ dharmārjitārthabhogena vairāgyamupajāyate

धर्म से अर्थ, अर्थ से भोग, और भोग से वैराग्य उत्पन्न होता है। धर्मपूर्वक अर्जित धन के भोग से ही सच्चा वैराग्य उत्पन्न होता है।

श्लोक 52 (shiva.vidyeshvara.13.52)

विपरीतार्थभोगेन राग एव प्रजायते । धर्मश्च द्विविधः प्रोक्तो द्रव्यदेहद्वयेन च

viparītārthabhogena rāga eva prajāyate dharmaśca dvividhaḥ prokto dravyadehadvayena ca

परन्तु अनुचित ढंग से अर्जित धन के भोग से केवल आसक्ति ही उत्पन्न होती है। धर्म दो प्रकार का कहा गया है — धन-सम्बन्धी और शरीर-सम्बन्धी।

श्लोक 53 (shiva.vidyeshvara.13.53)

द्रव्यमिज्यादिरूपं स्यात्तीर्थस्नानादि दैहिकम् । धर्मेण धनमाप्नोति तपसा दिव्यरूपताम्

dravyamijyādirūpaṁ syāttīrthasnānādi daihikam dharmeṇa dhanamāpnoti tapasā divyarūpatām

धन-सम्बन्धी धर्म यज्ञ आदि के रूप में है, और शारीरिक धर्म तीर्थ-स्नान आदि के रूप में है। धर्म से धन प्राप्त होता है, तप से दिव्य रूप प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (shiva.vidyeshvara.13.54)

निष्कामः शुद्धिमाप्नोति शुद्ध्या ज्ञानं न संशयः । कृतादौ हि तपः श्लाघ्यं द्रव्यधर्मः कलौ युगे

niṣkāmaḥ śuddhimāpnoti śuddhyā jñānaṁ na saṁśayaḥ kṛtādau hi tapaḥ ślāghyaṁ dravyadharmaḥ kalau yuge

निष्काम पुरुष शुद्धि प्राप्त करता है, और शुद्धि से निःसंदेह ज्ञान प्राप्त होता है। सत्ययुग आदि में तप श्लाघ्य था; कलियुग में धन-सम्बन्धी धर्म श्रेष्ठ है।

श्लोक 55 (shiva.vidyeshvara.13.55)

कृते ध्यानाज्ज्ञानसिद्धिस्त्रेतायां तपसा तथा । द्वापरे यजनाज्ज्ञानं प्रतिमापूजया कलौ

kṛte dhyānājjñānasiddhistretāyāṁ tapasā tathā dvāpare yajanājjñānaṁ pratimāpūjayā kalau

सत्ययुग में ध्यान से ज्ञान-सिद्धि होती है, त्रेता में तप से; द्वापर में यज्ञ से ज्ञान प्राप्त होता है, और कलियुग में प्रतिमा-पूजा से।

श्लोक 56 (shiva.vidyeshvara.13.56)

यादृशं पुण्यपापं वा तादृशं फलमेव हि । द्रव्यदेहाङ्गभेदेन न्यूनवृद्धिक्षयादिकम्

yādṛśaṁ puṇyapāpaṁ vā tādṛśaṁ phalameva hi dravyadehāṅgabhedena nyūnavṛddhikṣayādikam

जैसा भी पुण्य या पाप किया जाता है, वैसा ही फल मिलता है। धन और शरीर के भेद से उसमें कमी, वृद्धि, क्षय आदि होते रहते हैं।

श्लोक 57 (shiva.vidyeshvara.13.57)

अधर्मो हिंसिकारूपो धर्मस्तु सुखरूपकः । अधर्माद् दुःखमाप्नोति धर्माद्वै सुखमेधते

adharmo hiṁsikārūpo dharmastu sukharūpakaḥ adharmād duḥkhamāpnoti dharmādvai sukhamedhate

अधर्म हिंसा का रूप है, धर्म सुख का रूप है। अधर्म से दुःख प्राप्त होता है, और धर्म से निश्चय ही सुख बढ़ता है।

श्लोक 58 (shiva.vidyeshvara.13.58)

विद्याद् दुर्वृत्तितो दुःखं सुखं विद्यात्सुवृत्तितः । धर्मार्जनमतः कुर्याद्भोगमोक्षप्रसिद्धये

vidyād durvṛttito duḥkhaṁ sukhaṁ vidyātsuvṛttitaḥ dharmārjanamataḥ kuryādbhogamokṣaprasiddhaye

दुराचरण से दुःख और सदाचरण से सुख जानना चाहिए। अतः भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि के लिए धर्म का अर्जन करना चाहिए।

श्लोक 59 (shiva.vidyeshvara.13.59)

सकुटुम्बस्य विप्रस्य चतुर्जनयुतस्य च । शतवर्षस्य वृत्तिं तु दद्यात्तद्ब्रह्मलोकदम्

sakuṭumbasya viprasya caturjanayutasya ca śatavarṣasya vṛttiṁ tu dadyāttadbrahmalokadam

चार सदस्यों वाले परिवार सहित किसी ब्राह्मण की सौ वर्ष तक जीविका देना — यह ब्रह्मलोक प्रदान करने वाला कार्य है।

श्लोक 60 (shiva.vidyeshvara.13.60)

चान्द्रायणसहस्रं तु ब्रह्मलोकप्रदं विदुः । सहस्रस्य कुटुम्बस्य प्रतिष्ठां क्षत्रियश्चरेत्

cāndrāyaṇasahasraṁ tu brahmalokapradaṁ viduḥ sahasrasya kuṭumbasya pratiṣṭhāṁ kṣatriyaścaret

एक हज़ार चान्द्रायण व्रत करना भी ब्रह्मलोक प्रदान करने वाला जाना जाता है। क्षत्रिय को एक हज़ार परिवारों की जीविका स्थापित करनी चाहिए।

श्लोक 61 (shiva.vidyeshvara.13.61)

इन्द्रलोकप्रदं विद्यादयुतं ब्रह्मलोकदम् । यां देवतां पुरस्कृत्य दानमाचरते नरः

indralokapradaṁ vidyādayutaṁ brahmalokadam yāṁ devatāṁ puraskṛtya dānamācarate naraḥ

इसे इन्द्रलोक और दस हज़ार परिवारों की जीविका को ब्रह्मलोक प्रदान करने वाला जानना चाहिए। जिस देवता को आगे रखकर मनुष्य दान करता है,

श्लोक 62 (shiva.vidyeshvara.13.62)

तत्तल्लोकमवाप्नोति इति वेदविदो विदुः । अर्थहीनः सदा कुर्यात्तपसामर्जनं तथा

tattallokamavāpnoti iti vedavido viduḥ arthahīnaḥ sadā kuryāttapasāmarjanaṁ tathā

वह उसी देवता के लोक को प्राप्त होता है — ऐसा वेद के ज्ञाता कहते हैं। जो धनहीन हो, उसे सदा तपस्या द्वारा ही पुण्य-अर्जन करना चाहिए,

श्लोक 63 (shiva.vidyeshvara.13.63)

तीर्थाच्च तपसा प्राप्यं सुखमक्षय्यमश्नुते । अर्थार्जनमथो वक्ष्ये न्यायतः सुसमाहितः

tīrthācca tapasā prāpyaṁ sukhamakṣayyamaśnute arthārjanamatho vakṣye nyāyataḥ susamāhitaḥ

और तीर्थ-यात्रा तथा तप से प्राप्त होने वाला अक्षय सुख प्राप्त करता है। अब मैं न्यायपूर्वक धन-अर्जन की विधि बताऊँगा, ध्यानपूर्वक सुनो।

श्लोक 64 (shiva.vidyeshvara.13.64)

कृतात्प्रतिग्रहाच्चैव याजनाच्च विशुद्धतः । अदैन्यादनतिक्लेशाद् ब्राह्मणो धनमर्जयेत्

kṛtātpratigrahāccaiva yājanācca viśuddhataḥ adainyādanatikleśād brāhmaṇo dhanamarjayet

यज्ञ-कर्म से, दान ग्रहण से, तथा शुद्धतापूर्वक याजन (पुरोहिती) से — बिना दीनता के और बिना अत्यधिक कष्ट के — ब्राह्मण को धन अर्जित करना चाहिए;

श्लोक 65 (shiva.vidyeshvara.13.65)

क्षत्रियो बाहुवीर्येण कृषिगोरक्षणाद् विशः । न्यायार्जितस्य वित्तस्य दानात्सिद्धिं समश्नुते

kṣatriyo bāhuvīryeṇa kṛṣigorakṣaṇād viśaḥ nyāyārjitasya vittasya dānātsiddhiṁ samaśnute

क्षत्रिय को भुजबल से, वैश्य को कृषि और गोरक्षा से धन अर्जित करना चाहिए। न्यायपूर्वक अर्जित धन के दान से ही सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 66 (shiva.vidyeshvara.13.66)

ज्ञानसिद्ध्या मोक्षसिद्धिः सर्वेषां गुर्वनुग्रहात् । मोक्षात्स्वरूपसिद्धिः स्यात्परानन्दं समश्नुते

jñānasiddhyā mokṣasiddhiḥ sarveṣāṁ gurvanugrahāt mokṣātsvarūpasiddhiḥ syātparānandaṁ samaśnute

ज्ञान की सिद्धि से मोक्ष की सिद्धि होती है, और सबके लिए यह गुरु की कृपा से ही सम्भव है। मोक्ष से स्वरूप की सिद्धि होती है, और परम आनन्द की प्राप्ति होती है।

श्लोक 67 (shiva.vidyeshvara.13.67)

सत्सङ्गात्सर्वमेतद्वै नराणां जायते द्विजाः । धनधान्यादिकं सर्वं देयं वै गृहमेधिना

satsaṅgātsarvametadvai narāṇāṁ jāyate dvijāḥ dhanadhānyādikaṁ sarvaṁ deyaṁ vai gṛhamedhinā

हे द्विजो! यह सब मनुष्यों को सत्संग से ही प्राप्त होता है। गृहस्थ को धन, धान्य आदि सभी वस्तुएँ दान में देनी चाहिए,

श्लोक 68 (shiva.vidyeshvara.13.68)

यद्यत्काले वस्तुजातं फलं वा धान्यमेव च । तत्तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यो देयं वै हितमिच्छता

yadyatkāle vastujātaṁ phalaṁ vā dhānyameva ca tattatsarvaṁ brāhmaṇebhyo deyaṁ vai hitamicchatā

जो भी वस्तु, फल अथवा धान्य समय पर उत्पन्न हो, वह सब अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले को ब्राह्मणों को अवश्य देना चाहिए।

श्लोक 69 (shiva.vidyeshvara.13.69)

जलं चैव सदा देयमन्नं क्षुद्व्याधिशान्तये । क्षेत्रं धान्यं तथामान्नमन्नमेव चतुर्विधम्

jalaṁ caiva sadā deyamannaṁ kṣudvyādhiśāntaye kṣetraṁ dhānyaṁ tathāmānnamannameva caturvidham

जल सदा देना चाहिए, तथा भूख और रोग की शान्ति के लिए अन्न भी। भूमि, धान्य, कच्चा अन्न और पका अन्न — ये चार प्रकार के दान हैं।

श्लोक 70 (shiva.vidyeshvara.13.70)

यावत्कालं यदन्नं वै भुक्त्वा श्रवणमेधते । तावत्कृतस्य पुण्यस्य त्वर्धं दातुर्न संशयः

yāvatkālaṁ yadannaṁ vai bhuktvā śravaṇamedhate tāvatkṛtasya puṇyasya tvardhaṁ dāturna saṁśayaḥ

जितने समय तक दिए गए अन्न को खाकर व्यक्ति शास्त्र-श्रवण में स्थिर रहता है, उतने समय तक अर्जित पुण्य का आधा भाग निश्चय ही दाता को प्राप्त होता है।

श्लोक 71 (shiva.vidyeshvara.13.71)

ग्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा । पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं व्रजेत्

grahītā hi gṛhītasya dānādvai tapasā tathā pāpasaṁśodhanaṁ kuryādanyathā rauravaṁ vrajet

ग्रहण की हुई वस्तु का प्राप्तकर्ता उसी वस्तु के दान से तथा तप से पाप का संशोधन करे; अन्यथा उसे रौरव नरक में जाना पड़ता है।

श्लोक 72 (shiva.vidyeshvara.13.72)

आत्मवित्तं त्रिधा कुर्याद्धर्मवृद्ध्यात्मभोगतः । नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात्तु धर्मतः

ātmavittaṁ tridhā kuryāddharmavṛddhyātmabhogataḥ nityaṁ naimittikaṁ kāmyaṁ karma kuryāttu dharmataḥ

अपने धन को धर्म, वृद्धि और भोग — इन तीन भागों में बाँटना चाहिए। धर्म के भाग से नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म करने चाहिए;

श्लोक 73 (shiva.vidyeshvara.13.73)

वित्तस्य वर्धनं कुर्याद् वृद्ध्यंशेन हि साधकः । हितेन मितमेध्येन भोगं भोगांशतश्चरेत्

vittasya vardhanaṁ kuryād vṛddhyaṁśena hi sādhakaḥ hitena mitamedhyena bhogaṁ bhogāṁśataścaret

वृद्धि के भाग से साधक को धन की वृद्धि करनी चाहिए, और भोग के भाग से हितकर, मित तथा पवित्र भोग करना चाहिए।

श्लोक 74 (shiva.vidyeshvara.13.74)

कृष्यर्जिते दशांशं हि देयं पापस्य शुद्धये । शेषेण कुर्याद्धर्मादि अन्यथा रौरवं व्रजेत्

kṛṣyarjite daśāṁśaṁ hi deyaṁ pāpasya śuddhaye śeṣeṇa kuryāddharmādi anyathā rauravaṁ vrajet

कृषि से अर्जित धन का दसवाँ भाग पाप-शुद्धि के लिए दान करना चाहिए; शेष से धर्म आदि करने चाहिए, अन्यथा रौरव नरक की प्राप्ति होती है।

श्लोक 75 (shiva.vidyeshvara.13.75)

अथवा पापबुद्धिः स्यात्क्षयं वा सस्यमेष्यति । वृद्धिवाणिज्यके देयं षडंशं हि विचक्षणैः

athavā pāpabuddhiḥ syātkṣayaṁ vā sasyameṣyati vṛddhivāṇijyake deyaṁ ṣaḍaṁśaṁ hi vicakṣaṇaiḥ

अन्यथा पाप-बुद्धि उत्पन्न होगी अथवा फसल नष्ट हो जाएगी। व्यापार से अर्जित लाभ का छठा भाग विवेकी पुरुषों द्वारा दान करना चाहिए।

श्लोक 76 (shiva.vidyeshvara.13.76)

शुद्धप्रतिग्रहे देयं चतुर्थांशं द्विजोत्तमैः । अकस्मादुत्थितेऽर्थे हि देयमर्धं द्विजोत्तमैः

śuddhapratigrahe deyaṁ caturthāṁśaṁ dvijottamaiḥ akasmādutthite ’rthe hi deyamardhaṁ dvijottamaiḥ

शुद्ध दान से प्राप्त धन का चौथा भाग श्रेष्ठ द्विजों को देना चाहिए। अकस्मात् प्राप्त हुए धन का आधा भाग श्रेष्ठ द्विजों को देना चाहिए।

श्लोक 77 (shiva.vidyeshvara.13.77)

असत्प्रतिग्रहे सर्वं दुर्दानं सागरे क्षिपेत् । आहूय दानं कर्तव्यमात्मभोगसमृद्धये

asatpratigrahe sarvaṁ durdānaṁ sāgare kṣipet āhūya dānaṁ kartavyamātmabhogasamṛddhaye

अनुचित ढंग से प्राप्त सम्पूर्ण धन को समुद्र में फेंक देना चाहिए (अर्थात् त्याग देना चाहिए)। अपने भोग की समृद्धि के लिए दान बुलाकर, आदरपूर्वक देना चाहिए।

श्लोक 78 (shiva.vidyeshvara.13.78)

पृष्टं सर्वं सदा देयमात्मशक्त्यनुसारतः । जन्मान्तरे ऋणी हि स्याददत्ते पृष्टवस्तुनि

pṛṣṭaṁ sarvaṁ sadā deyamātmaśaktyanusārataḥ janmāntare ṛṇī hi syādadatte pṛṣṭavastuni

माँगी गई वस्तु सदा अपनी शक्ति के अनुसार देनी चाहिए, क्योंकि माँगी गई वस्तु न देने पर मनुष्य अगले जन्म में ऋणी होता है।

श्लोक 79 (shiva.vidyeshvara.13.79)

परेषां च तथा दोषं न प्रशंसेद्विचक्षणः । विद्वेषेण तथा ब्रह्मन् श्रुतं दृष्टं च नो वदेत्

pareṣāṁ ca tathā doṣaṁ na praśaṁsedvicakṣaṇaḥ vidveṣeṇa tathā brahman śrutaṁ dṛṣṭaṁ ca no vadet

विवेकी पुरुष को दूसरों के दोष की प्रशंसा (चर्चा) नहीं करनी चाहिए। हे ब्राह्मण! द्वेषवश सुनी या देखी हुई बात भी नहीं कहनी चाहिए।

श्लोक 80 (shiva.vidyeshvara.13.80)

न वदेत्सर्वजन्तूनां हृदि रोषकरं बुधः । सन्ध्ययोरग्निकार्यं च कुर्यादैश्वर्यसिद्धये

na vadetsarvajantūnāṁ hṛdi roṣakaraṁ budhaḥ sandhyayoragnikāryaṁ ca kuryādaiśvaryasiddhaye

बुद्धिमान पुरुष को कोई ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जो किसी भी प्राणी के हृदय में क्रोध उत्पन्न करे। ऐश्वर्य-सिद्धि के लिए दोनों संध्याओं में अग्निहोत्र करना चाहिए।

श्लोक 81 (shiva.vidyeshvara.13.81)

अशक्तस्त्वेककाले वा सूर्याग्नी च यथाविधि । तण्डुलं धान्यमाज्यं वा फलं कन्दं हविस्तथा

aśaktastvekakāle vā sūryāgnī ca yathāvidhi taṇḍulaṁ dhānyamājyaṁ vā phalaṁ kandaṁ havistathā

यदि असमर्थ हो, तो एक ही समय विधिपूर्वक सूर्य और अग्नि की पूजा करे; चावल, धान्य, घृत, फल, कन्द अथवा हवि से,

श्लोक 82 (shiva.vidyeshvara.13.82)

स्थालीपाकं तथा कुर्याद्यथान्यायं यथाविधि । प्रधानहोममात्रं वा हव्याभावे समाचरेत्

sthālīpākaṁ tathā kuryādyathānyāyaṁ yathāvidhi pradhānahomamātraṁ vā havyābhāve samācaret

विधिपूर्वक स्थालीपाक (हवि-पाक) तैयार करना चाहिए। हवि के अभाव में केवल प्रधान होम ही कर लेना चाहिए।

श्लोक 83 (shiva.vidyeshvara.13.83)

नित्यसन्धानमित्युक्तं तमजस्रं विदुर्बुधाः । अथवा जपमात्रं वा सूर्यवन्दनमेव च

nityasandhānamityuktaṁ tamajasraṁ vidurbudhāḥ athavā japamātraṁ vā sūryavandanameva ca

इसे 'नित्य-संधान' कहा गया है, जिसे विद्वान अखण्ड मानते हैं। अथवा केवल जप ही करे, अथवा सूर्य को वन्दन ही करे —

श्लोक 84 (shiva.vidyeshvara.13.84)

एवमात्मार्थिनः कुर्युरर्थार्थी च यथाविधि । ब्रह्मयज्ञरता नित्यं देवपूजारतास्तथा

evamātmārthinaḥ kuryurarthārthī ca yathāvidhi brahmayajñaratā nityaṁ devapūjāratāstathā

आत्म-कल्याण चाहने वालों को तथा अर्थ चाहने वालों को भी इसी विधि से यह करना चाहिए। जो नित्य ब्रह्म-यज्ञ (वेदाध्ययन) में रत रहते हैं, तथा देव-पूजा में रत रहते हैं,

श्लोक 85 (shiva.vidyeshvara.13.85)

अग्निपूजापरा नित्यं गुरुपूजारतास्तथा । ब्राह्मणानां तृप्तिकराः सर्वे स्वर्गस्य भागिनः

agnipūjāparā nityaṁ gurupūjāratāstathā brāhmaṇānāṁ tṛptikarāḥ sarve svargasya bhāginaḥ

जो नित्य अग्नि-पूजा में तत्पर रहते हैं तथा गुरु-पूजा में रत रहते हैं — जो सब ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करते हैं, वे सभी स्वर्ग के भागी होते हैं।

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