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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 18

बन्ध-मोक्ष स्वरूप और शिवलिंग की महिमा

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.18.1)

ऋषय ऊचुः । बन्धमोक्षस्वरूपं हि ब्रूहि सर्वार्थवित्तम । सूत उवाच । बन्धं मोक्षं तथोपायं वक्ष्येऽहं शृणुतादरात् ॥ 18.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ bandhamokṣasvarūpaṁ hi brūhi sarvārthavittama sūta uvāca bandhaṁ mokṣaṁ tathopāyaṁ vakṣye’haṁ śaṛṇutādarāt

ऋषियों ने कहा — बन्ध और मोक्ष का स्वरूप हमें बताइए, हे सर्वार्थवेत्ता श्रेष्ठ! सूत जी ने कहा — बन्ध, मोक्ष और उनके उपाय को मैं कहूँगा, आदरपूर्वक सुनो।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.18.2)

प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन बद्धो जीवः स उच्यते । प्रकृत्याद्यष्टबन्धेन निर्मुक्तो मुक्त उच्यते ॥ 18.2 ॥

prakṛtyādyaṣṭabandhena baddho jīvaḥ sa ucyate prakṛtyādyaṣṭabandhena nirmukto mukta ucyate

प्रकृति आदि आठ बन्धनों से बँधा हुआ जीव 'बद्ध' कहलाता है; प्रकृति आदि आठ बन्धनों से मुक्त हुआ जीव 'मुक्त' कहलाता है।

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.18.3)

प्रकृत्यादिवशीकारो मोक्ष इत्युच्यते स्वतः । बद्धजीवस्तु निर्मुक्तो मुक्तजीवः स कथ्यते ॥ 18.3 ॥

prakṛtyādivaśīkāro mokṣa ityucyate svataḥ baddhajīvastu nirmukto muktajīvaḥ sa kathyate

प्रकृति आदि को वश में कर लेना ही स्वतः 'मोक्ष' कहलाता है; बद्ध जीव ही मुक्त होने पर 'मुक्त जीव' कहा जाता है।

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.18.4)

प्रकृत्यग्रे ततो बुद्धिरहङ्कारो गुणात्मकः । पञ्चतन्मात्रमित्येतत्प्रकृत्याद्यष्टकं विदुः ॥ 18.4 ॥

prakṛtyagre tato buddhirahaṅkāro guṇātmakaḥ pañcatanmātramityetatprakṛtyādyaṣṭakaṁ viduḥ

प्रकृति के पश्चात् बुद्धि, फिर गुणस्वरूप अहंकार, फिर पाँच तन्मात्राएँ — इन्हें प्रकृति आदि आठ तत्त्व जानना चाहिए।

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.18.5)

प्रकृत्याद्यष्टजो देहो देहजं कर्म उच्यते । पुनश्च कर्मजो देहो जन्म कर्म पुनः पुनः ॥ 18.5 ॥

prakṛtyādyaṣṭajo deho dehajaṁ karma ucyate punaśca karmajo deho janma karma punaḥ punaḥ

प्रकृति आदि आठों से उत्पन्न देह होती है, और उस देह से उत्पन्न कर्म कहलाता है; फिर उस कर्म से पुनः देह, और बार-बार जन्म होता रहता है।

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.18.6)

शरीरं त्रिविधं ज्ञेयं स्थूलं सूक्ष्मं च कारणम् । स्थूलं व्यापारदं प्रोक्तं सूक्ष्ममिन्द्रियभोगदम् ॥ 18.6 ॥

śarīraṁ trividhaṁ jñeyaṁ sthūlaṁ sūkṣmaṁ ca kāraṇam sthūlaṁ vyāpāradaṁ proktaṁ sūkṣmamindriyabhogadam

शरीर तीन प्रकार का जानना चाहिए — स्थूल, सूक्ष्म और कारण; स्थूल शरीर व्यापार (क्रिया) देने वाला कहा गया है, सूक्ष्म इन्द्रिय-भोग देने वाला है।

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.18.7)

कारणं त्वात्मभोगार्थं जीवकर्मानुरूपतः । सुखं दुःखं पुण्यपापैः कर्मभिः फलमश्नुते ॥ 18.7 ॥

kāraṇaṁ tvātmabhogārthaṁ jīvakarmānurūpataḥ sukhaṁ duḥkhaṁ puṇyapāpaiḥ karmabhiḥ phalamaśnute

कारण शरीर आत्मा के भोग के लिए है, जो जीव के कर्म के अनुरूप होता है; पुण्य और पाप कर्मों से सुख-दुःख रूपी फल प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.18.8)

तस्माद्धि कर्मरज्ज्वा हि बद्धो जीवः पुनः पुनः । शरीरत्रयकर्मभ्यां चक्रवद् भ्राम्यते सदा ॥ 18.8 ॥

tasmāddhi karmarajjvā hi baddho jīvaḥ punaḥ punaḥ śarīratrayakarmabhyāṁ cakravad bhrāmyate sadā

इसलिए कर्म की रस्सी से बँधा हुआ जीव बार-बार, तीनों शरीरों और कर्मों के साथ, सदा चक्र के समान घूमता रहता है।

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.18.9)

चक्रभ्रमनिवृत्यर्थं चक्रकर्तारमीडयेत् । प्रकृत्यादिमहाचक्रं प्रकृतेः परतः शिवः ॥ 18.9 ॥

cakrabhramanivṛtyarthaṁ cakrakartāramīḍayet prakṛtyādimahācakraṁ prakṛteḥ parataḥ śivaḥ

इस चक्र-भ्रमण से मुक्ति के लिए उस चक्र के चालक की स्तुति करनी चाहिए — शिव, जो प्रकृति और उसके महाचक्र से भी परे हैं।

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.18.10)

चक्रकर्ता महेशो हि प्रकृतेः परतो यतः । पिबति वाथ वमति जीवाबालो जलं यथा ॥ 18.10 ॥

cakrakartā maheśo hi prakṛteḥ parato yataḥ pibati vātha vamati jīvābālo jalaṁ yathā

प्रकृति से परे होने के कारण महेश्वर ही चक्र के चालक हैं; जैसे बालक जल को पीता और उगल देता है, उसी प्रकार जीव (उसके अधीन) है।

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.18.11)

शिवस्तथा प्रकृत्यादि वशीकृत्याधितिष्ठति । सर्वं वशीकृतं यस्मात्तस्माच्छिव इति स्मृतः । शिव एव हि सर्वज्ञः परिपूर्णश्च निःस्पृहः ॥ 18.11 ॥

śivastathā prakṛtyādi vaśīkṛtyādhitiṣṭhati sarvaṁ vaśīkṛtaṁ yasmāttasmācchiva iti smṛtaḥ śiva eva hi sarvajñaḥ paripūrṇaśca niḥspṛhaḥ

उसी प्रकार शिव प्रकृति आदि को वश में करके अधिष्ठित रहते हैं; क्योंकि सब कुछ उनके वश में है, इसीलिए उन्हें 'शिव' कहा गया है — शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण और निःस्पृह हैं।

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.18.12)

सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः ॥ 18.12 ॥

sarvajñatā tṛptiranādibodhaḥ svatantratā nityamaluptaśaktiḥ anantaśaktiśca maheśvarasya yanmānasaiśvaryamavaiti vedaḥ

सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, कभी क्षीण न होने वाली शक्ति, और अनन्त शक्ति — यही महेश्वर का मानस-ऐश्वर्य है, ऐसा वेद जानता है।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.18.13)

अतः शिवप्रसादेन प्रकृत्यादि वशं भवेत् । शिवप्रसादलाभार्थं शिवमेव प्रपूजयेत् ॥ 18.13 ॥

ataḥ śivaprasādena prakṛtyādi vaśaṁ bhavet śivaprasādalābhārthaṁ śivameva prapūjayet

इसलिए शिव की कृपा से ही प्रकृति आदि वश में होते हैं; शिव-कृपा प्राप्त करने के लिए शिव की ही पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.18.14)

निःस्पृहस्य च पूर्णस्य तस्य पूजा कथं भवेत् । शिवोद्देशकृतं कर्म प्रसादजनकं भवेत् ॥ 18.14 ॥

niḥspṛhasya ca pūrṇasya tasya pūjā kathaṁ bhavet śivoddeśakṛtaṁ karma prasādajanakaṁ bhavet

निःस्पृह और परिपूर्ण उस शिव की पूजा भला कैसे हो सकती है? शिव को उद्दिष्ट करके किया गया कर्म ही उनकी कृपा उत्पन्न करने वाला होता है।

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.18.15)

लिङ्गे वेरे भक्तजने शिवमुद्दिश्य पूजयेत् । कायेन मनसा वाचा धनेनापि प्रपूजयेत् ॥ 18.15 ॥

liṅge vere bhaktajane śivamuddiśya pūjayet kāyena manasā vācā dhanenāpi prapūjayet

लिंग में, वीर (साधक) में, और भक्तजन में शिव को उद्दिष्ट करके पूजा करे — शरीर से, मन से, वाणी से और धन से भी उनकी पूजा करे।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.18.16)

पूजया तु महेशो हि प्रकृतेः परमः शिवः । प्रसादं कुरुते सत्यं पूजकस्य विशेषतः ॥ 18.16 ॥

pūjayā tu maheśo hi prakṛteḥ paramaḥ śivaḥ prasādaṁ kurute satyaṁ pūjakasya viśeṣataḥ

पूजा से ही प्रकृति से परे वे महेश्वर शिव, विशेष रूप से पूजा करने वाले पर, सच्चे रूप से कृपा करते हैं।

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.18.17)

शिवप्रसादात्कर्माद्यं क्रमेण स्ववशं भवेत् । कर्मारभ्य प्रकृत्यन्तं यदा सर्वं वशं भवेत् ॥ 18.17 ॥

śivaprasādātkarmādyaṁ krameṇa svavaśaṁ bhavet karmārabhya prakṛtyantaṁ yadā sarvaṁ vaśaṁ bhavet

शिव-कृपा से ही कर्म आदि क्रमशः अपने वश में आ जाते हैं; जब कर्म से लेकर प्रकृति तक सब कुछ वश में हो जाता है,

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.18.18)

तदा मुक्त इति प्रोक्तः स्वात्मारामो विराजते । प्रसादात्परमेशस्य कर्मदेहो यदा वशः ॥ 18.18 ॥

tadā mukta iti proktaḥ svātmārāmo virājate prasādātparameśasya karmadeho yadā vaśaḥ

तब वह 'मुक्त' कहलाता है, और अपनी ही आत्मा में रमण करता हुआ विराजता है; परमेश्वर की कृपा से जब कर्म-देह वश में हो जाती है,

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.18.19)

तदा वै शिवलोके तु वासः सालोक्यमुच्यते । सामीप्यं याति साम्बस्य तन्मात्रे च वशं गते ॥ 18.19 ॥

tadā vai śivaloke tu vāsaḥ sālokyamucyate sāmīpyaṁ yāti sāmbasya tanmātre ca vaśaṁ gate

तब शिवलोक में निवास होता है, जिसे 'सालोक्य' कहा जाता है; और जब सूक्ष्म शरीर वश में हो जाता है, तब साम्ब (शिव-उमा) का सामीप्य प्राप्त होता है।

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.18.20)

तदा तु शिवसायुज्यमायुधाद्यैः क्रियादिभिः । महाप्रसादलाभे च बुद्धिश्चापि वशा भवेत् ॥ 18.20 ॥

tadā tu śivasāyujyamāyudhādyaiḥ kriyādibhiḥ mahāprasādalābhe ca buddhiścāpi vaśā bhavet

तब क्रिया आदि तथा आयुधादि से युक्त शिव-सायुज्य प्राप्त होता है; और महाप्रसाद पाकर बुद्धि भी वश में हो जाती है।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.18.21)

बुद्धिस्तु कार्यं प्रकृतेस्तत्सार्ष्टिरिति कथ्यते । पुनर्महाप्रसादेन प्रकृतिर्वशमेष्यति ॥ 18.21 ॥

buddhistu kāryaṁ prakṛtestatsārṣṭiriti kathyate punarmahāprasādena prakṛtirvaśameṣyati

बुद्धि प्रकृति का ही कार्य है, इसीलिए इसे 'सार्ष्टि' कहा जाता है; पुनः महाप्रसाद से प्रकृति भी वश में आ जाती है।

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.18.22)

शिवस्य मानसैश्वर्यं तदाऽयत्नं भविष्यति । सार्वज्ञाद्यं शिवैश्वर्यं लब्ध्वा स्वात्मनि राजते ॥ 18.22 ॥

śivasya mānasaiśvaryaṁ tadā’yatnaṁ bhaviṣyati sārvajñādyaṁ śivaiśvaryaṁ labdhvā svātmani rājate

तब शिव का मानस-ऐश्वर्य भी बिना किसी प्रयास के प्राप्त हो जाता है; सर्वज्ञता आदि शिव-ऐश्वर्य को पाकर वह अपनी ही आत्मा में विराजता है।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.18.23)

तत्सायुज्यमिति प्राहुर्वेदागमपरायणाः । एवं क्रमेण मुक्तिः स्याल्लिङ्गादौ पूजया स्वतः ॥ 18.23 ॥

tatsāyujyamiti prāhurvedāgamaparāyaṇāḥ evaṁ krameṇa muktiḥ syālliṅgādau pūjayā svataḥ

वेद और आगम में निष्ठ विद्वान इसी को 'सायुज्य' कहते हैं। इस प्रकार इस क्रम से लिंग आदि की पूजा से स्वतः मुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.18.24)

अतः शिवप्रसादार्थं क्रियाद्यैः पूजयेच्छिवम् । शिवक्रिया शिवतपः शिवमन्त्रजपः सदा ॥ 18.24 ॥

ataḥ śivaprasādārthaṁ kriyādyaiḥ pūjayecchivam śivakriyā śivatapaḥ śivamantrajapaḥ sadā

इसलिए शिव-कृपा के लिए क्रिया आदि से शिव की पूजा करनी चाहिए — सदा शिव-क्रिया, शिव-तप, शिव-मन्त्र-जप करते हुए,

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.18.25)

शिवज्ञानं शिवध्यानमुत्तरोत्तरमभ्यसेत् । आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वै शिवचिन्तया ॥ 18.25 ॥

śivajñānaṁ śivadhyānamuttarottaramabhyaset āsupterāmṛteḥ kālaṁ nayedvai śivacintayā

शिव-ज्ञान और शिव-ध्यान का क्रमशः अभ्यास करे; जागने से लेकर सोने तक का समय शिव-चिन्तन में ही व्यतीत करे।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.18.26)

सद्यादिभिश्च कुसुमैरर्चयेच्छिवमेष्यति ॥ ऋषय ऊचुः । लिङ्गादौ शिवपूजाया विधानं ब्रूहि सुव्रत ॥ 18.26 ॥

sadyādibhiśca kusumairarcayecchivameṣyati ṛṣaya ūcuḥ liṅgādau śivapūjāyā vidhānaṁ brūhi suvrata

सद्योजात आदि (पाँच रूपों के अनुरूप) फूलों से पूजा करते हुए शिव को प्राप्त कर लेता है। ऋषियों ने कहा — लिंग आदि में शिव-पूजा की विधि हमें बताइए, हे उत्तम व्रतधारी!

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.18.27)

सूत उवाच । लिङ्गानां च क्रमं वक्ष्ये यथावच्छृणुत द्विजाः । तदेव लिङ्गं प्रथमं प्रणवं सार्वकामिकम् ॥ 18.27 ॥

sūta uvāca liṅgānāṁ ca kramaṁ vakṣye yathāvacchṛṇuta dvijāḥ tadeva liṅgaṁ prathamaṁ praṇavaṁ sārvakāmikam

सूत जी ने कहा — अब मैं लिंगों का क्रम बताऊँगा, यथावत् सुनो, हे द्विजो। सबसे पहला लिंग तो प्रणव ही है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 28 (shiva.vidyeshvara.18.28)

सूक्ष्मप्रणवरूपं हि सूक्ष्मरूपं तु निष्कलम् । स्थूललिङ्गं हि सकलं तत्पञ्चाक्षरमुच्यते ॥ 18.28 ॥

sūkṣmapraṇavarūpaṁ hi sūkṣmarūpaṁ tu niṣkalam sthūlaliṅgaṁ hi sakalaṁ tatpañcākṣaramucyate

सूक्ष्म प्रणव-रूप निष्कल (अंशरहित) है, और स्थूल लिंग सकल (अंशसहित) है, जिसे पञ्चाक्षर कहा जाता है।

श्लोक 29 (shiva.vidyeshvara.18.29)

तयोः पूजा तपः प्रोक्तं साक्षान्मोक्षप्रदे उभे । पौरुषप्रकृतिभूतानि लिङ्गानि सुबहूनि च ॥ 18.29 ॥

tayoḥ pūjā tapaḥ proktaṁ sākṣānmokṣaprade ubhe pauruṣaprakṛtibhūtāni liṅgāni subahūni ca

इन दोनों की पूजा और तप साक्षात् मोक्ष देने वाला कहा गया है। पुरुष-निर्मित और प्रकृति-जन्य — दोनों प्रकार के लिंग बहुत अधिक हैं।

श्लोक 30 (shiva.vidyeshvara.18.30)

तानि विस्तरतो वक्तुं शिवो वेत्ति न चापरः । भूविकाराणि लिङ्गानि ज्ञातानि प्रब्रवीमि वः ॥ 18.30 ॥

tāni vistarato vaktuṁ śivo vetti na cāparaḥ bhūvikārāṇi liṅgāni jñātāni prabravīmi vaḥ

उन सबका विस्तार से वर्णन तो शिव ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; भूमि से उत्पन्न होने वाले जो लिंग ज्ञात हैं, वे मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 31 (shiva.vidyeshvara.18.31)

स्वयम्भूलिङ्गं प्रथमं बिन्दुलिङ्गं द्वितीयकम् । प्रतिष्ठितं चरं चैव गुरुलिङ्गं तु पञ्चमम् ॥ 18.31 ॥

svayambhūliṅgaṁ prathamaṁ binduliṅgaṁ dvitīyakam pratiṣṭhitaṁ caraṁ caiva guruliṅgaṁ tu pañcamam

स्वयम्भू लिंग पहला है, बिन्दु-लिंग दूसरा, प्रतिष्ठित लिंग तीसरा, चर लिंग चौथा, और गुरु-लिंग पाँचवाँ है।

श्लोक 32 (shiva.vidyeshvara.18.32)

देवर्षितपसा तुष्टः सान्निध्यार्थं तु तत्र वै । पृथिव्यन्तर्गतः शर्वो बीजं वै नादरूपतः ॥ 18.32 ॥

devarṣitapasā tuṣṭaḥ sānnidhyārthaṁ tu tatra vai pṛthivyantargataḥ śarvo bījaṁ vai nādarūpataḥ

देवताओं और ऋषियों के तप से प्रसन्न होकर, अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए, शर्व (शिव) पृथ्वी के भीतर नाद-रूप बीज के रूप में स्थित होकर,

श्लोक 33 (shiva.vidyeshvara.18.33)

स्थावराङ्कुरवद्भूमिमुद्भिद्य व्यक्त एव सः । स्वयम्भूतं जातमिति स्वयम्भूरिति तं विदुः ॥ 18.33 ॥

sthāvarāṅkuravadbhūmimudbhidya vyakta eva saḥ svayambhūtaṁ jātamiti svayambhūriti taṁ viduḥ

स्थावर अंकुर के समान भूमि को भेदकर स्वयं प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार स्वयं उत्पन्न होने के कारण उसे 'स्वयम्भू' कहा जाता है।

श्लोक 34 (shiva.vidyeshvara.18.34)

तल्लिङ्गपूजया ज्ञानं स्वयमेव प्रवर्धते । सुवर्णरजतादौ वा पृथिव्यां स्थण्डिलेऽपि वा ॥ 18.34 ॥

talliṅgapūjayā jñānaṁ svayameva pravardhate suvarṇarajatādau vā pṛthivyāṁ sthaṇḍile’pi vā

उस लिंग की पूजा से स्वयं ही ज्ञान बढ़ता जाता है, चाहे वह सोने-चाँदी आदि में हो, पृथ्वी पर हो, अथवा वेदी पर ही स्थापित हो।

श्लोक 35 (shiva.vidyeshvara.18.35)

स्वहस्ताल्लिखितं लिङ्गं शुद्धप्रणवमन्त्रकम् । यन्त्रलिङ्गं समालिख्य प्रतिष्ठावाहनं चरेत् ॥ 18.35 ॥

svahastāllikhitaṁ liṅgaṁ śuddhapraṇavamantrakam yantraliṅgaṁ samālikhya pratiṣṭhāvāhanaṁ caret

अपने ही हाथ से शुद्ध प्रणव-मन्त्र सहित लिंग को लिखकर, यन्त्र-लिंग को भलीभाँति अंकित करके, प्रतिष्ठा और आवाहन करे।

श्लोक 36 (shiva.vidyeshvara.18.36)

बिन्दुनादमयं लिङ्गं स्थावरं जङ्गमं च यत् । भावनामयमेतद्धि शिवदृष्टं न संशयः ॥ 18.36 ॥

bindunādamayaṁ liṅgaṁ sthāvaraṁ jaṅgamaṁ ca yat bhāvanāmayametaddhi śivadṛṣṭaṁ na saṁśayaḥ

बिन्दु और नाद से बना हुआ लिंग, चाहे स्थावर हो या जंगम, वह भावना-मय है और निःसन्देह शिव द्वारा दृष्ट (स्वीकृत) है।

श्लोक 37 (shiva.vidyeshvara.18.37)

यत्र विश्वस्यते शम्भुस्तत्र तस्मै फलप्रदः । स्वहस्ताल्लिखिते यन्त्रे स्थावरादावकृत्रिमे ॥ 18.37 ॥

yatra viśvasyate śambhustatra tasmai phalapradaḥ svahastāllikhite yantre sthāvarādāvakṛtrime

जहाँ शम्भु पर विश्वास किया जाता है, वहाँ वे उस भक्त को फल प्रदान करते हैं — अपने ही हाथ से बनाए गए यन्त्र में, चाहे वह स्थावर आदि अकृत्रिम वस्तु पर हो,

श्लोक 38 (shiva.vidyeshvara.18.38)

आवाह्य पूजयेच्छम्भुं षोडशैरुपचारकैः । स्वयमैश्वर्यमाप्नोति ज्ञानमभ्यासतो भवेत् ॥ 18.38 ॥

āvāhya pūjayecchambhuṁ ṣoḍaśairupacārakaiḥ svayamaiśvaryamāpnoti jñānamabhyāsato bhavet

उसका आवाहन करके सोलह उपचारों से शम्भु की पूजा करे; इससे वह स्वयं ऐश्वर्य प्राप्त करता है, तथा अभ्यास से ज्ञान भी उत्पन्न होता है।

श्लोक 39 (shiva.vidyeshvara.18.39)

देवैश्च ऋषिभिश्चापि स्वात्मसिद्ध्यर्थमेव हि । समन्त्रेणात्महस्तेन कृतं यच्छुद्धमण्डले ॥ 18.39 ॥

devaiśca ṛṣibhiścāpi svātmasiddhyarthameva hi samantreṇātmahastena kṛtaṁ yacchuddhamaṇḍale

देवताओं और ऋषियों ने भी अपनी सिद्धि के लिए ही, मन्त्र सहित अपने ही हाथ से, शुद्ध मण्डल में जो लिंग बनाया,

श्लोक 40 (shiva.vidyeshvara.18.40)

शुद्धभावनया चैव स्थापितं लिङ्गमुत्तम् । तल्लिङ्गं पौरुषं प्राहुस्तत्प्रतिष्ठितमुच्यते ॥ 18.40 ॥

śuddhabhāvanayā caiva sthāpitaṁ liṅgamuttam talliṅgaṁ pauruṣaṁ prāhustatpratiṣṭhitamucyate

और शुद्ध भावना से स्थापित किया — वह उत्तम लिंग 'पौरुष' कहलाता है, और उसे ही 'प्रतिष्ठित' भी कहा जाता है।

श्लोक 41 (shiva.vidyeshvara.18.41)

तल्लिङ्गपूजया नित्यं पौरुषैश्वर्यमाप्नुयात् । महद्भिर्ब्राह्मणैश्चापि राजभिश्च महाधनैः ॥ 18.41 ॥

talliṅgapūjayā nityaṁ pauruṣaiśvaryamāpnuyāt mahadbhirbrāhmaṇaiścāpi rājabhiśca mahādhanaiḥ

उस लिंग की नित्य पूजा से पौरुष-ऐश्वर्य प्राप्त होता है; महान ब्राह्मणों द्वारा, अथवा महाधनवान राजाओं द्वारा —

श्लोक 42 (shiva.vidyeshvara.18.42)

शिल्पिना कल्पितं लिङ्गं मन्त्रेण स्थापितं च यत् । प्रतिष्ठितं प्राकृतं हि प्राकृतैश्वर्यभोगदम् ॥ 18.42 ॥

śilpinā kalpitaṁ liṅgaṁ mantreṇa sthāpitaṁ ca yat pratiṣṭhitaṁ prākṛtaṁ hi prākṛtaiśvaryabhogadam

किसी शिल्पी द्वारा गढ़ा गया और मन्त्र से स्थापित किया गया लिंग भी 'प्रतिष्ठित' है, किन्तु वह प्राकृत है, और प्राकृत ऐश्वर्य का भोग देने वाला है।

श्लोक 43 (shiva.vidyeshvara.18.43)

यदूर्जितं च नित्यं च तद्धि पौरुषमुच्यते । यद् दुर्बलमनित्यं च तद्धि प्राकृतमुच्यते ॥ 18.43 ॥

yadūrjitaṁ ca nityaṁ ca taddhi pauruṣamucyate yad durbalamanityaṁ ca taddhi prākṛtamucyate

जो शक्तिशाली और सदा स्थायी हो, वही 'पौरुष' कहलाता है; जो दुर्बल और अस्थायी हो, वही 'प्राकृत' कहलाता है।

श्लोक 44 (shiva.vidyeshvara.18.44)

लिङ्गं नाभिस्तथा जिह्वा नासाग्रं च शिखा क्रमात् । कट्यादिषु त्रिलोकेषु लिङ्गमाध्यात्मिकं चरम् ॥ 18.44 ॥

liṅgaṁ nābhistathā jihvā nāsāgraṁ ca śikhā kramāt kaṭyādiṣu trilokeṣu liṅgamādhyātmikaṁ caram

नाभि, जिह्वा, नासाग्र और शिखा — ये क्रमशः लिंग-स्थान हैं; कटि आदि में और तीनों लोकों में स्थित लिंग 'आध्यात्मिक चर' कहलाता है।

श्लोक 45 (shiva.vidyeshvara.18.45)

पर्वतं पौरुषं प्रोक्तं भूतलं प्राकृतं विदुः । वृक्षादि पौरुषं ज्ञेयं गुल्मादि प्राकृतं विदुः ॥ 18.45 ॥

parvataṁ pauruṣaṁ proktaṁ bhūtalaṁ prākṛtaṁ viduḥ vṛkṣādi pauruṣaṁ jñeyaṁ gulmādi prākṛtaṁ viduḥ

पर्वत को 'पौरुष' कहा गया है, और भूतल को 'प्राकृत' जाना जाता है; वृक्ष आदि को 'पौरुष' और झाड़ी आदि को 'प्राकृत' जानना चाहिए।

श्लोक 46 (shiva.vidyeshvara.18.46)

षाष्टिकं प्राकृतं ज्ञेयं शालिगोधूमपौरुषम् । ऐश्वर्यं पौरुषं विद्यादणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ॥ 18.46 ॥

ṣāṣṭikaṁ prākṛtaṁ jñeyaṁ śāligodhūmapauruṣam aiśvaryaṁ pauruṣaṁ vidyādaṇimādyaṣṭasiddhidam

मोटे चावल (साठी) को 'प्राकृत' जानना चाहिए, शालि-चावल और गेहूँ को 'पौरुष'; ऐश्वर्य को 'पौरुष' जानना चाहिए, जो अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ देने वाला है।

श्लोक 47 (shiva.vidyeshvara.18.47)

सुस्त्रीधनादिविषयं प्राकृतं प्राहुरास्तिकाः । प्रथमं चरलिङ्गेषु रसलिङ्गं प्रकथ्यते ॥ 18.47 ॥

sustrīdhanādiviṣayaṁ prākṛtaṁ prāhurāstikāḥ prathamaṁ caraliṅgeṣu rasaliṅgaṁ prakathyate

अच्छी पत्नी, धन आदि विषयों को आस्तिक जन 'प्राकृत' कहते हैं। चर लिंगों में पहला वर्णित रस-लिंग (पारद-लिंग) है।

श्लोक 48 (shiva.vidyeshvara.18.48)

रसलिङ्गं ब्राह्मणानां सर्वाभीष्टप्रदं भवेत् । बाणलिङ्गं क्षत्रियाणां महाराज्यप्रदं शुभम् ॥ 18.48 ॥

rasaliṅgaṁ brāhmaṇānāṁ sarvābhīṣṭapradaṁ bhavet bāṇaliṅgaṁ kṣatriyāṇāṁ mahārājyapradaṁ śubham

रस-लिंग ब्राह्मणों के लिए समस्त अभीष्ट देने वाला है; बाण-लिंग क्षत्रियों के लिए महान राज्य देने वाला, अत्यन्त शुभ है।

श्लोक 49 (shiva.vidyeshvara.18.49)

स्वर्णलिङ्गं तु वैश्यानां महाधनपतित्वदम् । शिलालिङ्गं तु शूद्राणां महाशुद्धिकरं शुभम् ॥ 18.49 ॥

svarṇaliṅgaṁ tu vaiśyānāṁ mahādhanapatitvadam śilāliṅgaṁ tu śūdrāṇāṁ mahāśuddhikaraṁ śubham

स्वर्ण-लिंग वैश्यों को महाधनपतित्व देने वाला है; शिला-लिंग शूद्रों के लिए महाशुद्धिकर, अत्यन्त शुभ है।

श्लोक 50 (shiva.vidyeshvara.18.50)

स्फाटिकं बाणलिङ्गं च सर्वेषां सर्वकामदम् । स्वीयाभावेऽन्यदीयं तु पूजायां न निषिद्ध्यते ॥ 18.50 ॥

sphāṭikaṁ bāṇaliṅgaṁ ca sarveṣāṁ sarvakāmadam svīyābhāve’nyadīyaṁ tu pūjāyāṁ na niṣiddhyate

स्फटिक और बाण-लिंग सबकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं; अपना लिंग न होने पर पूजा में दूसरे का लिंग निषिद्ध नहीं है।

श्लोक 51 (shiva.vidyeshvara.18.51)

स्त्रीणां तु पार्थिवं लिङ्गं सभर्तृणां विशेषतः । विधवानां प्रवृत्तानां स्फाटिकं परिकीर्तितम् ॥ 18.51 ॥

strīṇāṁ tu pārthivaṁ liṅgaṁ sabhartṛṇāṁ viśeṣataḥ vidhavānāṁ pravṛttānāṁ sphāṭikaṁ parikīrtitam

स्त्रियों के लिए, विशेषतः सधवाओं के लिए, पार्थिव (मिट्टी का) लिंग है; प्रवृत्त (गृहस्थ-जीवन में रत) विधवाओं के लिए स्फटिक-लिंग बताया गया है।

श्लोक 52 (shiva.vidyeshvara.18.52)

विधवानां निवृत्तानां रसलिङ्गं विशिष्यते । बाल्ये वा यौवने वापि वार्धके वापि सुव्रताः ॥ 18.52 ॥

vidhavānāṁ nivṛttānāṁ rasaliṅgaṁ viśiṣyate bālye vā yauvane vāpi vārdhake vāpi suvratāḥ

निवृत्त (संसार से विरत) विधवाओं के लिए रस-लिंग श्रेष्ठ है, चाहे बाल्यावस्था हो, यौवन हो, अथवा वृद्धावस्था हो, हे उत्तम व्रतधारियो।

श्लोक 53 (shiva.vidyeshvara.18.53)

शुद्धस्फटिकलिङ्गं तु स्त्रीणां तत्सर्वभोगदम् । प्रवृत्तानां पीठपूजा सर्वाभीष्टप्रदा भुवि ॥ 18.53 ॥

śuddhasphaṭikaliṅgaṁ tu strīṇāṁ tatsarvabhogadam pravṛttānāṁ pīṭhapūjā sarvābhīṣṭapradā bhuvi

शुद्ध स्फटिक-लिंग स्त्रियों को सभी भोग देने वाला है; प्रवृत्त स्त्रियों के लिए पीठ-पूजा भूतल पर सभी अभीष्ट देने वाली है।

श्लोक 54 (shiva.vidyeshvara.18.54)

पात्रेणैव प्रवृत्तस्तु सर्वपूजां समाचरेत् । नैवेद्यं चाभिषेकान्ते शाल्यन्नेन समाचरेत् ॥ 18.54 ॥

pātreṇaiva pravṛttastu sarvapūjāṁ samācaret naivedyaṁ cābhiṣekānte śālyannena samācaret

पात्र (बर्तन) द्वारा ही प्रवृत्त व्यक्ति सम्पूर्ण पूजा करे; अभिषेक के अन्त में शालि-चावल के भात से नैवेद्य अर्पित करे।

श्लोक 55 (shiva.vidyeshvara.18.55)

पूजान्ते स्थापयेल्लिङ्गं सम्पुटेषु पृथग्गृहे । करपूजानिवृत्तानां स्वभोज्यं तु निवेदयेत् ॥ 18.55 ॥

pūjānte sthāpayelliṅgaṁ sampuṭeṣu pṛthaggṛhe karapūjānivṛttānāṁ svabhojyaṁ tu nivedayet

पूजा के अन्त में लिंग को डिब्बों में, अलग घर में रखे; हाथ से पूजा से निवृत्त हुए लोगों के लिए अपना ही भोजन नैवेद्य के रूप में अर्पित करे।

श्लोक 56 (shiva.vidyeshvara.18.56)

निवृत्तानां परं सूक्ष्मं लिङ्गमेव विशिष्यते । विभूत्यभ्यर्चनं कुर्याद्विभूतिं च निवेदयेत् ॥ 18.56 ॥

nivṛttānāṁ paraṁ sūkṣmaṁ liṅgameva viśiṣyate vibhūtyabhyarcanaṁ kuryādvibhūtiṁ ca nivedayet

जो लोग (सक्रिय पूजा से) निवृत्त हो चुके हैं, उनके लिए सूक्ष्म लिंग (केवल विभूति) ही श्रेष्ठ है; विभूति से पूजा करे और विभूति को ही नैवेद्य-रूप में अर्पित करे।

श्लोक 57 (shiva.vidyeshvara.18.57)

पूजां कृत्वाथ तल्लिङ्गं शिरसा धारयेत्सदा । विभूतिस्त्रिविधा प्रोक्ता लोकवेदशिवाग्निभिः ॥ 18.57 ॥

pūjāṁ kṛtvātha talliṅgaṁ śirasā dhārayetsadā vibhūtistrividhā proktā lokavedaśivāgnibhiḥ

पूजा करके उस विभूति को सदा सिर पर धारण करे। विभूति तीन प्रकार की कही गई है — लौकिक अग्नि, वैदिक अग्नि और शिवाग्नि से उत्पन्न।

श्लोक 58 (shiva.vidyeshvara.18.58)

लोकाग्निजमथो भस्म द्रव्यशुद्ध्यर्थमावहेत् । मृद्दारुलोहरूपाणां धान्यानां च तथैव च ॥ 18.58 ॥

lokāgnijamatho bhasma dravyaśuddhyarthamāvahet mṛddāruloharūpāṇāṁ dhānyānāṁ ca tathaiva ca

लौकिक अग्नि से उत्पन्न भस्म को द्रव्यों की शुद्धि के लिए लाना चाहिए — मिट्टी, लकड़ी, धातु से बनी वस्तुओं की, तथा अन्नों की भी,

श्लोक 59 (shiva.vidyeshvara.18.59)

तिलादीनां च द्रव्याणां वस्त्रादीनां तथैव च । तथा पर्युषितानां च भस्मना शुद्धिरिष्यते ॥ 18.59 ॥

tilādīnāṁ ca dravyāṇāṁ vastrādīnāṁ tathaiva ca tathā paryuṣitānāṁ ca bhasmanā śuddhiriṣyate

तिल आदि पदार्थों की और वस्त्र आदि की भी, तथा बासी हो चुकी वस्तुओं की भी भस्म से शुद्धि होती है।

श्लोक 60 (shiva.vidyeshvara.18.60)

श्वादिभिर्दूषितानां च भस्मना शुद्धिरिष्यते । सजलं निर्जलं भस्म यथायोग्यं तु योजयेत् ॥ 18.60 ॥

śvādibhirdūṣitānāṁ ca bhasmanā śuddhiriṣyate sajalaṁ nirjalaṁ bhasma yathāyogyaṁ tu yojayet

कुत्ते आदि से दूषित हुई वस्तुओं की भी भस्म से शुद्धि होती है; जल-सहित अथवा जल-रहित भस्म का प्रयोग यथायोग्य करना चाहिए।

श्लोक 61 (shiva.vidyeshvara.18.61)

वेदाग्निजं तथा भस्म तत्कर्मान्तेषु धारयेत् । मन्त्रेण क्रियया जन्यं कर्माग्नौ भस्मरूपधृक् ॥ 18.61 ॥

vedāgnijaṁ tathā bhasma tatkarmānteṣu dhārayet mantreṇa kriyayā janyaṁ karmāgnau bhasmarūpadhṛk

इसी प्रकार वैदिक अग्नि से उत्पन्न भस्म को उन्हीं कर्मों के अन्त में धारण करना चाहिए; मन्त्र और क्रिया द्वारा हवन की अग्नि में उत्पन्न भस्म-रूप को धारण करने से,

श्लोक 62 (shiva.vidyeshvara.18.62)

तद्भस्मधारणात्कर्म स्वात्मन्यारोपितं भवेत् । अघोरेणात्ममन्त्रेण बिल्वकाष्ठं प्रदाहयेत् ॥ 18.62 ॥

tadbhasmadhāraṇātkarma svātmanyāropitaṁ bhavet aghoreṇātmamantreṇa bilvakāṣṭhaṁ pradāhayet

उस भस्म को धारण करने से वह कर्म अपने ही आत्मा पर आरोपित हो जाता है। अघोर आत्ममन्त्र से बिल्व की लकड़ी को जलाए।

श्लोक 63 (shiva.vidyeshvara.18.63)

शिवाग्निरिति सम्प्रोक्तस्तेन दग्धं शिवाग्निजम् । कपिलागोमयं पूर्वं केवलं गव्यमेव वा ॥ 18.63 ॥

śivāgniriti samproktastena dagdhaṁ śivāgnijam kapilāgomayaṁ pūrvaṁ kevalaṁ gavyameva vā

इसे 'शिवाग्नि' कहा गया है, और उससे जो जलाया जाए वह 'शिवाग्निज' कहलाता है; पहले कपिला गाय का गोबर, अथवा केवल गोमय-सामग्री,

श्लोक 64 (shiva.vidyeshvara.18.64)

शम्यश्वत्थपलाशान्वा वटारग्वधबिल्वकान् । शिवाग्निना दहेच्छुद्धं तद्वै भस्म शिवाग्निजम् ॥ 18.64 ॥

śamyaśvatthapalāśānvā vaṭāragvadhabilvakān śivāgninā dahecchuddhaṁ tadvai bhasma śivāgnijam

अथवा शमी, अश्वत्थ, पलाश, वट, अरगवध और बिल्व की लकड़ी को शिवाग्नि से शुद्धतापूर्वक जलाए — वही शिवाग्निज भस्म कहलाता है।

श्लोक 65 (shiva.vidyeshvara.18.65)

दर्भाग्नौ वा दहेत्काष्ठं शिवमन्त्रं समुच्चरन् । सम्यक्संशोध्य वस्त्रेण नवकुम्भे निधापयेत् ॥ 18.65 ॥

darbhāgnau vā dahetkāṣṭhaṁ śivamantraṁ samuccaran samyaksaṁśodhya vastreṇa navakumbhe nidhāpayet

अथवा दर्भ की अग्नि में शिव-मन्त्र का उच्चारण करते हुए लकड़ी जलाए; उसे भलीभाँति वस्त्र से छानकर नए घड़े में रखे।

श्लोक 66 (shiva.vidyeshvara.18.66)

दीप्त्यर्थं तत्तु सङ्ग्राह्यं मन्यते पूज्यतेऽपि च । भस्मशब्दार्थ एवं हि शिवः पूर्वं तथाकरोत् ॥ 18.66 ॥

dīptyarthaṁ tattu saṅgrāhyaṁ manyate pūjyate’pi ca bhasmaśabdārtha evaṁ hi śivaḥ pūrvaṁ tathākarot

उसे तेजस्विता के लिए संगृहीत करना चाहिए, वह सम्मानित है और पूज्य भी है। इस प्रकार 'भस्म' शब्द का अर्थ यही है — पूर्वकाल में शिव ने स्वयं ऐसा ही किया था।

श्लोक 67 (shiva.vidyeshvara.18.67)

यथा स्वविषये राजा सारं गृह्णाति यत्करम् । यथा मनुष्याःसस्यादीन्दग्ध्वा सारं भजन्ति वै ॥ 18.67 ॥

yathā svaviṣaye rājā sāraṁ gṛhṇāti yatkaram yathā manuṣyāḥsasyādīndagdhvā sāraṁ bhajanti vai

जैसे राजा अपने राज्य में कर के रूप में सार (श्रेष्ठ भाग) ग्रहण करता है, जैसे मनुष्य फसल आदि को जलाकर उनका सार-भाग ग्रहण करते हैं,

श्लोक 68 (shiva.vidyeshvara.18.68)

यथा हि जाठराग्निश्च भक्ष्यादीन्विविधान्बहून् । दग्ध्वा सारतरं सारात्स्वदेहं परिपुष्यति ॥ 18.68 ॥

yathā hi jāṭharāgniśca bhakṣyādīnvividhānbahūn dagdhvā sārataraṁ sārātsvadehaṁ paripuṣyati

जैसे जठराग्नि विविध प्रकार के अनेक भक्ष्य पदार्थों को जलाकर उनके सार से भी अधिक सारभूत अपने शरीर का ही पोषण करती है,

श्लोक 69 (shiva.vidyeshvara.18.69)

तथा प्रपञ्चकर्तापि स शिवः परमेश्वरः । स्वाधिष्ठेयप्रपञ्चस्य दग्ध्वा सारं गृहीतवान् ॥ 18.69 ॥

tathā prapañcakartāpi sa śivaḥ parameśvaraḥ svādhiṣṭheyaprapañcasya dagdhvā sāraṁ gṛhītavān

उसी प्रकार वह परमेश्वर शिव, जो इस समस्त जगत् के रचयिता भी हैं, अपने ही अधीनस्थ जगत् के सार को जलाकर ग्रहण करते हैं।

श्लोक 70 (shiva.vidyeshvara.18.70)

दग्ध्वा प्रपञ्चं तद्भस्म स्वात्मन्यारोपयेच्छिवः । उद्धूलनस्य व्याजेन जगत्सारं गृहीतवान् ॥ 18.70 ॥

dagdhvā prapañcaṁ tadbhasma svātmanyāropayecchivaḥ uddhūlanasya vyājena jagatsāraṁ gṛhītavān

जगत् को जलाकर शिव ने उस भस्म को अपनी ही आत्मा पर आरोपित कर लिया; इस प्रकार भस्म धारण के बहाने उन्होंने जगत् के सार को ग्रहण कर लिया।

श्लोक 71 (shiva.vidyeshvara.18.71)

स्वरत्नं स्थापयामास स्वकीये हि शरीरके । केशमाकाशसारेण वायुसारेण वै मुखम् ॥ 18.71 ॥

svaratnaṁ sthāpayāmāsa svakīye hi śarīrake keśamākāśasāreṇa vāyusāreṇa vai mukham

उन्होंने अपने ही रत्न को अपने ही शरीर पर स्थापित किया — आकाश के सार से केश, वायु के सार से मुख,

श्लोक 72 (shiva.vidyeshvara.18.72)

हृदयं चाग्निसारेण त्वपां सारेण वै कटिम् । जानु चावनिसारेण तद्वत्सर्वं तदङ्गकम् ॥ 18.72 ॥

hṛdayaṁ cāgnisāreṇa tvapāṁ sāreṇa vai kaṭim jānu cāvanisāreṇa tadvatsarvaṁ tadaṅgakam

अग्नि के सार से हृदय, जल के सार से कटि, पृथ्वी के सार से जानु — इस प्रकार उनका प्रत्येक अंग (पंचमहाभूतों के सार से रचित) है।

श्लोक 73 (shiva.vidyeshvara.18.73)

ब्रह्मविष्ण्वोश्च रुद्राणां सारं चैव त्रिपुण्ड्रकम् । तथा तिलकरूपेण ललाटान्ते महेश्वरः ॥ 18.73 ॥

brahmaviṣṇvośca rudrāṇāṁ sāraṁ caiva tripuṇḍrakam tathā tilakarūpeṇa lalāṭānte maheśvaraḥ

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र — इनका सार ही त्रिपुण्ड्र है, जिसे महेश्वर तिलक के रूप में ललाट के अग्रभाग पर धारण करते हैं।

श्लोक 74 (shiva.vidyeshvara.18.74)

भूवृद्धया सर्वमेतद्धि मन्यते स्वयमित्यसौ । प्रपञ्चसारसर्वस्वमनेनैव वशीकृतम् ॥ 18.74 ॥

bhūvṛddhayā sarvametaddhi manyate svayamityasau prapañcasārasarvasvamanenaiva vaśīkṛtam

इस प्रकार भूतल के बढ़ाव से वे स्वयं इस सबको अपना ही मानते हैं; इसी उपाय से उन्होंने जगत् के सारे सार-वैभव को अपने वश में कर लिया है।

श्लोक 75 (shiva.vidyeshvara.18.75)

तस्मादस्य वशीकर्ता नान्योऽस्ति स शिवः स्मृतः । यथा सर्वमृगाणां च हिंसको मृगहिंसकः ॥ 18.75 ॥

tasmādasya vaśīkartā nānyo’sti sa śivaḥ smṛtaḥ yathā sarvamṛgāṇāṁ ca hiṁsako mṛgahiṁsakaḥ

इसलिए इसका (जगत् का) वश करने वाला उनके सिवाय अन्य कोई नहीं है — वे ही शिव कहलाते हैं। जैसे समस्त पशुओं में जो हिंसक है वह 'मृगहिंसक' कहलाता है,

श्लोक 76 (shiva.vidyeshvara.18.76)

अस्य हिंसामृगो नास्ति तस्मात्सिंह इतीरितः । शं नित्यं सुखमानन्दमिकारः पुरुषः स्मृतः ॥ 18.76 ॥

asya hiṁsāmṛgo nāsti tasmātsiṁha itīritaḥ śaṁ nityaṁ sukhamānandamikāraḥ puruṣaḥ smṛtaḥ

किन्तु शिव को हिंसा करने वाला कोई नहीं है, इसीलिए वे 'सिंह' कहलाते हैं। 'श' का अर्थ है नित्य सुख-आनन्द, 'इ'कार पुरुष (जीवात्मा) माना गया है,

श्लोक 77 (shiva.vidyeshvara.18.77)

वकारः शक्तिरमृतं मेलनं शिव उच्यते । तस्मादेवं स्वमात्मानं शिवं कृत्वार्चयेच्छिवम् ॥ 18.77 ॥

vakāraḥ śaktiramṛtaṁ melanaṁ śiva ucyate tasmādevaṁ svamātmānaṁ śivaṁ kṛtvārcayecchivam

'व'कार शक्ति है, और अमृतरूपी मिलन ही 'शिव' कहलाता है। इसीलिए स्वयं को शिव-रूप बनाकर ही शिव की पूजा करे।

श्लोक 78 (shiva.vidyeshvara.18.78)

तस्मादुद्धूलनं पूर्वं त्रिपुण्ड्रं धारयेत्परम् । पूजाकाले हि सजलं शुद्ध्यर्थं निर्जलं भवेत् ॥ 18.78 ॥

tasmāduddhūlanaṁ pūrvaṁ tripuṇḍraṁ dhārayetparam pūjākāle hi sajalaṁ śuddhyarthaṁ nirjalaṁ bhavet

इसीलिए पहले उद्धूलन (सम्पूर्ण शरीर पर भस्म-लेपन) करे, फिर उत्तम त्रिपुण्ड्र धारण करे; पूजा के समय जल-सहित, और शुद्धि के लिए जल-रहित भस्म हो।

श्लोक 79 (shiva.vidyeshvara.18.79)

दिवा वा यदि वा रात्रौ नारी वाथ नरोऽपि वा । पूजार्थं सजलं भस्म त्रिपुण्ड्रेणैव धारयेत् ॥ 18.79 ॥

divā vā yadi vā rātrau nārī vātha naro’pi vā pūjārthaṁ sajalaṁ bhasma tripuṇḍreṇaiva dhārayet

चाहे दिन हो या रात्रि, चाहे स्त्री हो या पुरुष, पूजा के लिए जल-मिश्रित भस्म को त्रिपुण्ड्र के रूप में धारण करे।

श्लोक 80 (shiva.vidyeshvara.18.80)

त्रिपुण्ड्रं सजलं भस्म धृत्वा पूजां करोति यः । शिवपूजाफलं साङ्गं तस्यैव हि सुनिश्चितम् ॥ 18.80 ॥

tripuṇḍraṁ sajalaṁ bhasma dhṛtvā pūjāṁ karoti yaḥ śivapūjāphalaṁ sāṅgaṁ tasyaiva hi suniścitam

जो व्यक्ति जल-मिश्रित भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करके पूजा करता है, उसे ही शिव-पूजा का सांगोपांग फल निश्चित रूप से प्राप्त होता है।

श्लोक 81 (shiva.vidyeshvara.18.81)

भस्म वै शिवमन्त्रेण धृत्वा ह्युच्चाश्रमी भवेत् । शिवाश्रमीति सम्प्रोक्तः शिवैकपरमो यतः ॥ 18.81 ॥

bhasma vai śivamantreṇa dhṛtvā hyuccāśramī bhavet śivāśramīti samproktaḥ śivaikaparamo yataḥ

शिव-मन्त्र से भस्म धारण करके वह उच्च आश्रम वाला हो जाता है; उसे 'शिवाश्रमी' कहा जाता है, क्योंकि वह केवल शिव में ही परायण है।

श्लोक 82 (shiva.vidyeshvara.18.82)

शिवव्रतैकनिष्ठस्य नाशौचं न च सूतकम् । ललाटेऽग्रे सितं भस्म तिलकं धारयेन्मृदा ॥ 18.82 ॥

śivavrataikaniṣṭhasya nāśaucaṁ na ca sūtakam lalāṭe’gre sitaṁ bhasma tilakaṁ dhārayenmṛdā

शिव-व्रत में एकनिष्ठ रहने वाले के लिए न अशौच है और न सूतक; ललाट के अगले भाग पर श्वेत भस्म का, और मिट्टी से भी तिलक धारण करे।

श्लोक 83 (shiva.vidyeshvara.18.83)

स्वहस्ताद् गुरुहस्ताद्वा शिवभक्तस्य लक्षणम् । गुणान्रुन्ध इति प्रोक्तो गुरुशब्दस्य विग्रहः ॥ 18.83 ॥

svahastād guruhastādvā śivabhaktasya lakṣaṇam guṇānrundha iti prokto guruśabdasya vigrahaḥ

अपने ही हाथ से अथवा गुरु के हाथ से लगाया गया यह शिवभक्त का लक्षण है। 'गुरु' शब्द का अर्थ है 'गुणों को रोकने वाला' (गुण-निरोधक)।

श्लोक 84 (shiva.vidyeshvara.18.84)

सविकारान्राजसादीन्गुणान्रुन्धे व्यपोहति । गुणातीतः परशिवो गुरुरूपं समाश्रितः ॥ 18.84 ॥

savikārānrājasādīnguṇānrundhe vyapohati guṇātītaḥ paraśivo gururūpaṁ samāśritaḥ

वह रजस् आदि विकारों-सहित गुणों को दूर कर देता है; गुणों से परे वह परम शिव ही गुरु-रूप का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 85 (shiva.vidyeshvara.18.85)

गुणत्रयं व्यपोह्याग्रे शिवं बोधयतीति सः । विश्वस्तानां तु शिष्याणां गुरुरित्यभिधीयते ॥ 18.85 ॥

guṇatrayaṁ vyapohyāgre śivaṁ bodhayatīti saḥ viśvastānāṁ tu śiṣyāṇāṁ gururityabhidhīyate

इस प्रकार तीनों गुणों को दूर करके ही वे शिष्य को शिव का बोध कराते हैं; इसीलिए विश्वस्त शिष्यों के लिए वे 'गुरु' कहलाते हैं।

श्लोक 86 (shiva.vidyeshvara.18.86)

तस्माद् गुरुशरीरं तु गुरुलिङ्गं भवेद् बुधः । गुरुलिङ्गस्य पूजा तु गुरुशुश्रूषणं भवेत् ॥ 18.86 ॥

tasmād guruśarīraṁ tu guruliṅgaṁ bhaved budhaḥ guruliṅgasya pūjā tu guruśuśrūṣaṇaṁ bhavet

इसलिए गुरु का शरीर ही गुरु-लिंग है, ऐसा विद्वान जानता है; गुरु-लिंग की पूजा ही गुरु की सेवा-सुश्रूषा है।

श्लोक 87 (shiva.vidyeshvara.18.87)

श्रुतं करोति शुश्रूषा कायेन मनसा गिरा । उक्तं यद् गुरुणा पूर्वं शक्यं वाऽशक्यमेव वा ॥ 18.87 ॥

śrutaṁ karoti śuśrūṣā kāyena manasā girā uktaṁ yad guruṇā pūrvaṁ śakyaṁ vā’śakyameva vā

'शुश्रूषा' का अर्थ है शरीर, मन और वाणी से सुनी हुई बात को पूर्ण करना; गुरु ने पहले जो कुछ भी कहा हो, चाहे वह सम्भव हो या असम्भव प्रतीत होता हो,

श्लोक 88 (shiva.vidyeshvara.18.88)

करोत्येव हि पूतात्मा प्राणैरपि धनैरपि । तस्माद्वै शासने योग्यः शिष्य इत्यभिधीयते ॥ 18.88 ॥

karotyeva hi pūtātmā prāṇairapi dhanairapi tasmādvai śāsane yogyaḥ śiṣya ityabhidhīyate

पवित्र आत्मा वाला शिष्य उसे अपने प्राणों और धन से भी पूर्ण करता है; इसीलिए जो अनुशासन के योग्य है, वही 'शिष्य' कहलाता है।

श्लोक 89 (shiva.vidyeshvara.18.89)

शरीराद्यर्थकं सर्वं गुरोर्दत्त्वा सुशिष्यकः । अग्रपाकं निवेद्याग्रे भुञ्जीयाद् गुर्वनुज्ञया ॥ 18.89 ॥

śarīrādyarthakaṁ sarvaṁ gurordattvā suśiṣyakaḥ agrapākaṁ nivedyāgre bhuñjīyād gurvanujñayā

अच्छा शिष्य अपने शरीर आदि से सम्बन्धित सब कुछ गुरु को अर्पित करके, पहले पका हुआ अन्न उन्हें अर्पित करके, गुरु की अनुमति से भोजन करे।

श्लोक 90 (shiva.vidyeshvara.18.90)

शिष्यःपुत्र इति प्रोक्तः सदा शिष्यत्वयोगतः । जिह्वालिङ्गान्मन्त्रशुक्रं कर्णयोनौ निषिच्य वै ॥ 18.90 ॥

śiṣyaḥputra iti proktaḥ sadā śiṣyatvayogataḥ jihvāliṅgānmantraśukraṁ karṇayonau niṣicya vai

शिष्य को सदा शिष्यत्व के नाते 'पुत्र' कहा गया है; जिह्वा-रूपी लिंग से मन्त्र-रूपी वीर्य को कर्ण-रूपी योनि में स्थापित कर,

श्लोक 91 (shiva.vidyeshvara.18.91)

जातः पुत्रो मन्त्रपुत्रः पितरं पूजयेद् गुरुम् । निमज्जयति पुत्रं वै संसारे जनकः पिता ॥ 18.91 ॥

jātaḥ putro mantraputraḥ pitaraṁ pūjayed gurum nimajjayati putraṁ vai saṁsāre janakaḥ pitā

इस प्रकार जन्मा पुत्र 'मन्त्र-पुत्र' कहलाता है, जो गुरु को पिता मानकर पूजा करता है। जन्म देने वाला पिता तो पुत्र को संसार में डुबाता है,

श्लोक 92 (shiva.vidyeshvara.18.92)

सन्तारयति संसाराद् गुरुर्वै बोधकः पिता । उभयोरन्तरं ज्ञात्वा पितरं गुरुमर्चयेत् ॥ 18.92 ॥

santārayati saṁsārād gururvai bodhakaḥ pitā ubhayorantaraṁ jñātvā pitaraṁ gurumarcayet

जबकि गुरु, बोध देने वाला पिता, संसार से पार उतारते हैं; दोनों के इस अन्तर को जानकर पिता और गुरु दोनों की पूजा करे —

श्लोक 93 (shiva.vidyeshvara.18.93)

अङ्गशुश्रूषया चापि धनाद्यैः स्वार्जितैर्गुरुम् । पादादिकेशपर्यन्तं लिङ्गान्यङ्गानि यद्गुरोः ॥ 18.93 ॥

aṅgaśuśrūṣayā cāpi dhanādyaiḥ svārjitairgurum pādādikeśaparyantaṁ liṅgānyaṅgāni yadguroḥ

अंग-सेवा से, तथा स्वयं अर्जित धन आदि से गुरु की पूजा करे; गुरु के पैरों से लेकर केशों तक के अंग ही (शिष्य के लिए) लिंग हैं।

श्लोक 94 (shiva.vidyeshvara.18.94)

धनरूपैः पादुकाद्यैः पादसङ्ग्रणादिभिः । स्नानाभिषेकनैवेद्यैर्भोजनैश्च प्रपूजयेत् ॥ 18.94 ॥

dhanarūpaiḥ pādukādyaiḥ pādasaṅgraṇādibhiḥ snānābhiṣekanaivedyairbhojanaiśca prapūjayet

धन-रूपी उपहारों से, पादुका आदि से, पैर दबाने आदि सेवाओं से, स्नान, अभिषेक, नैवेद्य और भोजन कराकर उनकी भलीभाँति पूजा करे।

श्लोक 95 (shiva.vidyeshvara.18.95)

गुरुपूजैव पूजा स्याच्छिवस्य परमात्मनः । गुरुसेवा तु यत्सर्वमात्मशुद्धिकरी भवेत् ॥ 18.95 ॥

gurupūjaiva pūjā syācchivasya paramātmanaḥ gurusevā tu yatsarvamātmaśuddhikarī bhavet

गुरु की पूजा ही साक्षात् परमात्मा शिव की पूजा है; गुरु की सेवा में किया गया सब कुछ आत्म-शुद्धि करने वाला होता है।

श्लोक 96 (shiva.vidyeshvara.18.96)

गुरोः शेषः शिवोच्छिष्टं जलमन्नादिनिर्मितम् । शिष्याणां शिवभक्तानां ग्राह्यं भोज्यं भवेद् द्विजाः ॥ 18.96 ॥

guroḥ śeṣaḥ śivocchiṣṭaṁ jalamannādinirmitam śiṣyāṇāṁ śivabhaktānāṁ grāhyaṁ bhojyaṁ bhaved dvijāḥ

गुरु का उच्छिष्ट (जूठा) जल, अन्न आदि ही शिव का उच्छिष्ट है; हे द्विजो, शिवभक्त शिष्यों को उसे ग्रहण करना और खाना चाहिए।

श्लोक 97 (shiva.vidyeshvara.18.97)

गुर्वनुज्ञाविरहितं चोरवत्सकलं भवेत् । गुरोरपि विशेषज्ञं यत्नाद् गृह्णीत वै गुरुम् ॥ 18.97 ॥

gurvanujñāvirahitaṁ coravatsakalaṁ bhavet gurorapi viśeṣajñaṁ yatnād gṛhṇīta vai gurum

गुरु की अनुमति के बिना किया गया सब कुछ चोरी के समान हो जाता है; इसलिए गुरु का भी सम्यक् परीक्षण करके, प्रयत्नपूर्वक गुरु को ग्रहण करे।

श्लोक 98 (shiva.vidyeshvara.18.98)

अज्ञानमोचनं साध्यं विशेषज्ञो हि मोचकः । आदौ च विघ्नशमनं कर्तव्यं कर्मपूर्तये ॥ 18.98 ॥

ajñānamocanaṁ sādhyaṁ viśeṣajño hi mocakaḥ ādau ca vighnaśamanaṁ kartavyaṁ karmapūrtaye

अज्ञान से मुक्ति ही साध्य है, और विशेष ज्ञान रखने वाला ही सच्चा मुक्तिदाता है। किसी भी कर्म की पूर्णता के लिए आरम्भ में ही विघ्न-शमन करना चाहिए।

श्लोक 99 (shiva.vidyeshvara.18.99)

निर्विघ्नेन कृतं साङ्गं कर्म वै सफलं भवेत् । तस्मात्सकलकर्मादौ विघ्नेशं पूजयेद् बुधः ॥ 18.99 ॥

nirvighnena kṛtaṁ sāṅgaṁ karma vai saphalaṁ bhavet tasmātsakalakarmādau vighneśaṁ pūjayed budhaḥ

बिना विघ्न के, सांगोपांग किया गया कर्म ही सफल होता है; इसलिए किसी भी कर्म के आरम्भ में विद्वान को विघ्नेश (गणेश) की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 100 (shiva.vidyeshvara.18.100)

सर्वबाधानिवृत्त्यर्थं सर्वान्देवान् यजेद् बुधः । ज्वरादिग्रन्थिरोगाश्च बाधा ह्याध्यात्मिकी मता ॥ 18.100 ॥

sarvabādhānivṛttyarthaṁ sarvāndevān yajed budhaḥ jvarādigranthirogāśca bādhā hyādhyātmikī matā

समस्त बाधाओं की निवृत्ति के लिए विद्वान को सभी देवताओं का यजन करना चाहिए। ज्वर, गाँठ आदि रोग 'आध्यात्मिक बाधा' माने गए हैं।

श्लोक 101 (shiva.vidyeshvara.18.101)

पिशाचजम्बुकादीनां वल्मीकाद्युद्भवे तथा । अकस्मादेव गोधादिजन्तूनां पतनेऽपि च ॥ 18.101 ॥

piśācajambukādīnāṁ valmīkādyudbhave tathā akasmādeva godhādijantūnāṁ patane’pi ca

पिशाच, गीदड़ आदि का आना, बाँबी आदि का उत्पन्न होना, गोह आदि जीवों का अचानक ही गिर पड़ना,

श्लोक 102 (shiva.vidyeshvara.18.102)

गृहे कच्छपसर्पस्त्रीदुर्जनादर्शनेऽपि च । वृक्षनारीगवादीनां प्रसूतिविषयेऽपि च ॥ 18.102 ॥

gṛhe kacchapasarpastrīdurjanādarśane’pi ca vṛkṣanārīgavādīnāṁ prasūtiviṣaye’pi ca

घर में कछुआ, सर्प, स्त्री अथवा दुर्जन का अशुभ दर्शन, तथा वृक्ष, स्त्री, गाय आदि के प्रसव-सम्बन्धी अशुभ लक्षण —

श्लोक 103 (shiva.vidyeshvara.18.103)

भाविदुःखं समायाति तस्मात्ते भौतिका मताः । अमेध्याशनिपातश्च महामारी तथैव च ॥ 18.103 ॥

bhāviduḥkhaṁ samāyāti tasmātte bhautikā matāḥ amedhyāśanipātaśca mahāmārī tathaiva ca

ये आने वाले दुःख का सूचक होते हैं, इसलिए इन्हें 'भौतिक' (बाह्य जगत् से सम्बद्ध) उत्पात माना गया है। अपवित्र वस्तुओं का आकाश से गिरना, महामारी,

श्लोक 104 (shiva.vidyeshvara.18.104)

ज्वरमारी विषूचिश्च गोमारी च मसूरिका । जन्मर्क्षग्रहसङ्क्रान्तिग्रहयोगाः स्वराशिके ॥ 18.104 ॥

jvaramārī viṣūciśca gomārī ca masūrikā janmarkṣagrahasaṅkrāntigrahayogāḥ svarāśike

ज्वर-महामारी, हैजा, गोमारी (पशुओं की महामारी) और चेचक, तथा अपने जन्म-नक्षत्र, ग्रह, संक्रान्ति एवं अपनी राशि में ग्रह-योग,

श्लोक 105 (shiva.vidyeshvara.18.105)

दुःस्वप्नदर्शनाद्याश्च मता वै ह्याधिदैविकाः । शवचाण्डालपतितस्पर्शादन्तर्गृहे गते ॥ 18.105 ॥

duḥsvapnadarśanādyāśca matā vai hyādhidaivikāḥ śavacāṇḍālapatitasparśādantargṛhe gate

अशुभ स्वप्नों का दिखना आदि — ये सब 'आधिदैविक' (दैवी) उत्पात माने गए हैं। शव, चाण्डाल अथवा पतित के स्पर्श का घर के भीतर प्रवेश करना —

श्लोक 106 (shiva.vidyeshvara.18.106)

एतादृशे समुत्पन्ने भाविदुःखस्य सूचके । शान्तियज्ञं तु मतिमान्कुर्यात्तद्दोषशान्तये ॥ 18.106 ॥

etādṛśe samutpanne bhāviduḥkhasya sūcake śāntiyajñaṁ tu matimānkuryāttaddoṣaśāntaye

जब आने वाले दुःख का सूचक ऐसा कोई लक्षण उत्पन्न हो, तो बुद्धिमान व्यक्ति उस दोष की शान्ति के लिए शान्ति-यज्ञ करे।

श्लोक 107 (shiva.vidyeshvara.18.107)

देवालयेऽथ गोष्ठे वा चैत्ये वापि गृहाङ्गणे । प्रदेशोन्नतधिष्ण्ये वै द्विहस्ते च स्वलङ्कृते ॥ 18.107 ॥

devālaye’tha goṣṭhe vā caitye vāpi gṛhāṅgaṇe pradeśonnatadhiṣṇye vai dvihaste ca svalaṅkṛte

देवालय में, गोशाला में, चैत्य में अथवा घर के आँगन में, ऊँचे और अच्छी तरह सजाए गए, दो हाथ के एक चबूतरे पर,

श्लोक 108 (shiva.vidyeshvara.18.108)

भारमात्रं व्रीहिधान्यं प्रस्थाप्य परिसृत्य च । मध्ये विलिख्य कमलं तथा दिक्षु विलिख्य वै ॥ 18.108 ॥

bhāramātraṁ vrīhidhānyaṁ prasthāpya parisṛtya ca madhye vilikhya kamalaṁ tathā dikṣu vilikhya vai

एक भार-मात्र (निश्चित तौल का) धान-अनाज बिखेरकर, बीच में कमल का चित्र बनाकर तथा दिशाओं में भी अंकित करके,

श्लोक 109 (shiva.vidyeshvara.18.109)

तन्तुना वेष्टितं कुम्भं नवगुग्गुलधूपितम् । मध्ये स्थाप्य महाकुम्भं तथा दिक्ष्वपि विन्यसेत् ॥ 18.109 ॥

tantunā veṣṭitaṁ kumbhaṁ navagugguladhūpitam madhye sthāpya mahākumbhaṁ tathā dikṣvapi vinyaset

धागे से लपेटा हुआ, नए गुग्गुल से सुगन्धित घड़ा बीच में स्थापित करे, तथा दिशाओं में भी घड़े रखे।

श्लोक 110 (shiva.vidyeshvara.18.110)

सनालाम्रककूर्चादीन्कलशांश्च तथाष्टसु । पूरयेन्मन्त्रपूतेन पञ्चद्रव्ययुतेन हि ॥ 18.110 ॥

sanālāmrakakūrcādīnkalaśāṁśca tathāṣṭasu pūrayenmantrapūtena pañcadravyayutena hi

आम के पल्लव और कुश-गुच्छों से सुसज्जित उन आठों कलशों को मन्त्र-पवित्र पाँच द्रव्यों से भरे।

श्लोक 111 (shiva.vidyeshvara.18.111)

प्रक्षिपेन्नवरत्नानि नीलादीन्क्रमशस्तथा । कर्मज्ञं च सपत्नीकमाचार्यं वरयेद् बुधः ॥ 18.111 ॥

prakṣipennavaratnāni nīlādīnkramaśastathā karmajñaṁ ca sapatnīkamācāryaṁ varayed budhaḥ

उनमें नीलम आदि नवरत्न क्रमशः डाले; तथा कर्मों में निपुण आचार्य को उनकी पत्नी सहित वरण करे।

श्लोक 112 (shiva.vidyeshvara.18.112)

सुवर्णप्रतिमां विष्णोरिन्द्रादीनां च निक्षिपेत् । सशिरस्के मध्यकुम्भे विष्णुमावाह्य पूजयेत् ॥ 18.112 ॥

suvarṇapratimāṁ viṣṇorindrādīnāṁ ca nikṣipet saśiraske madhyakumbhe viṣṇumāvāhya pūjayet

विष्णु, इन्द्र आदि की स्वर्ण-प्रतिमाएँ उनमें रखे; ढक्कन सहित मध्य कलश में विष्णु का आवाहन करके पूजा करे।

श्लोक 113 (shiva.vidyeshvara.18.113)

प्रागादिषु यथामन्त्रमिन्द्रादीन्क्रमशो यजेत् । तत्तन्नाम्ना चतुर्थ्या च नमोऽन्तेन यथाक्रमम् ॥ 18.113 ॥

prāgādiṣu yathāmantramindrādīnkramaśo yajet tattannāmnā caturthyā ca namo’ntena yathākramam

पूर्व आदि दिशाओं में यथामन्त्र इन्द्र आदि देवों का क्रमशः यजन करे — उन-उन देवताओं के नाम को चतुर्थी विभक्ति में और 'नमः' के साथ, यथाक्रम।

श्लोक 114 (shiva.vidyeshvara.18.114)

आवाहनादिकं सर्वमाचार्येणैव कारयेत् । आचार्यऋत्विजैः सार्धं तन्मत्रान्प्रजपेच्छतम् ॥ 18.114 ॥

āvāhanādikaṁ sarvamācāryeṇaiva kārayet ācāryaṛtvijaiḥ sārdhaṁ tanmatrānprajapecchatam

आवाहन आदि सारे कर्म आचार्य से ही कराए; आचार्य ऋत्विजों सहित उस मन्त्र का सौ बार जप करे।

श्लोक 115 (shiva.vidyeshvara.18.115)

कुम्भस्य पश्चिमे भागे जपान्ते होममाचरेत् । कोटिं लक्षं सहस्रं वा शतमष्टोत्तरं बुधाः ॥ 18.115 ॥

kumbhasya paścime bhāge japānte homamācaret koṭiṁ lakṣaṁ sahasraṁ vā śatamaṣṭottaraṁ budhāḥ

कलश के पश्चिम भाग में जप के अन्त में होम करे — एक करोड़, एक लाख, एक हजार अथवा एक सौ आठ बार, हे विद्वानो।

श्लोक 116 (shiva.vidyeshvara.18.116)

एकाहं वा नवाहं वा तथा मण्डलमेव वा । यथायोग्यं प्रकुर्वीत कालदेशानुसारतः ॥ 18.116 ॥

ekāhaṁ vā navāhaṁ vā tathā maṇḍalameva vā yathāyogyaṁ prakurvīta kāladeśānusārataḥ

एक दिन, नौ दिन, अथवा एक पूरे मण्डल (चालीस दिन) तक — काल और स्थान के अनुसार यथायोग्य करे।

श्लोक 117 (shiva.vidyeshvara.18.117)

शमीहोमश्च शान्त्यर्थे वृत्त्यर्थे च पलाशकम् । समिदन्नाज्यकैर्द्रव्यैर्नाम्ना मन्त्रेण वा हुनेत् ॥ 18.117 ॥

śamīhomaśca śāntyarthe vṛttyarthe ca palāśakam samidannājyakairdravyairnāmnā mantreṇa vā hunet

शमी की लकड़ी से शान्ति के लिए, और पलाश से समृद्धि के लिए होम करे; समिधा, अन्न, घृत आदि द्रव्यों से नाम या मन्त्र के द्वारा आहुति दे।

श्लोक 118 (shiva.vidyeshvara.18.118)

प्रारम्भे यत्कृतं द्रव्यं तत्क्रियान्तं समाचरेत् । पुण्याहं वाचयित्वान्ते दिने सम्प्रोक्ष्येज्जलैः ॥ 18.118 ॥

prārambhe yatkṛtaṁ dravyaṁ tatkriyāntaṁ samācaret puṇyāhaṁ vācayitvānte dine samprokṣyejjalaiḥ

आरम्भ में जो द्रव्य रखा गया हो, उसी का प्रयोग कर्म के अन्त तक करे; अन्त में पुण्याहवाचन कराकर, उस दिन जल से सिंचन करे।

श्लोक 119 (shiva.vidyeshvara.18.119)

ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्यावदाहुतिसङ्ख्यया । आचार्यश्च हविष्याशी ऋत्विजश्च भवेद् बुधाः ॥ 18.119 ॥

brāhmaṇānbhojayetpaścādyāvadāhutisaṅkhyayā ācāryaśca haviṣyāśī ṛtvijaśca bhaved budhāḥ

इसके पश्चात् जितनी आहुतियाँ दी गई हों, उतनी संख्या के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराए; आचार्य केवल हवि-अन्न ग्रहण करे, और ऋत्विज भी विद्वान होने चाहिए।

श्लोक 120 (shiva.vidyeshvara.18.120)

आदित्यादीन्ग्रहानिष्ट्वा सर्वहोमान्त एव हि । ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यान्नवरत्नं यथाक्रमम् ॥ 18.120 ॥

ādityādīngrahāniṣṭvā sarvahomānta eva hi ṛtvigbhyo dakṣiṇāṁ dadyānnavaratnaṁ yathākramam

आदित्य आदि ग्रहों का यजन करके, सभी होमों के अन्त में, ऋत्विजों को दक्षिणा में क्रमशः नवरत्न भेंट करे।

श्लोक 121 (shiva.vidyeshvara.18.121)

दशदानं ततः कुर्याद् भूरिदानं ततः परम् । बालानामुपनीतानां गृहिणां वनिनां धनम् ॥ 18.121 ॥

daśadānaṁ tataḥ kuryād bhūridānaṁ tataḥ param bālānāmupanītānāṁ gṛhiṇāṁ vanināṁ dhanam

इसके बाद दश-दान करे, और उसके पश्चात् विपुल दान करे — उपनयन-प्राप्त बालकों, गृहस्थों, वानप्रस्थों को धन का दान,

श्लोक 122 (shiva.vidyeshvara.18.122)

कन्यानां च सभर्तृणां विधवानां ततः परम् । तन्त्रोपकरणं सर्वमाचार्याय निवेदयेत् ॥ 18.122 ॥

kanyānāṁ ca sabhartṛṇāṁ vidhavānāṁ tataḥ param tantropakaraṇaṁ sarvamācāryāya nivedayet

कन्याओं, सधवा स्त्रियों और उसके बाद विधवाओं को भी दान दे; सारे यज्ञ-उपकरण आचार्य को अर्पित करे।

श्लोक 123 (shiva.vidyeshvara.18.123)

उत्पातानां च मारीणां दुःखस्वामी यमः स्मृतः । तस्माद्यमस्य प्रीत्यर्थं कालदानं प्रदापयेत् ॥ 18.123 ॥

utpātānāṁ ca mārīṇāṁ duḥkhasvāmī yamaḥ smṛtaḥ tasmādyamasya prītyarthaṁ kāladānaṁ pradāpayet

उत्पातों और महामारियों में दुःख के स्वामी यम माने गए हैं; इसलिए यम की प्रसन्नता के लिए 'काल-दान' कराए।

श्लोक 124 (shiva.vidyeshvara.18.124)

शतनिष्केण वा कुर्याद्दशनिष्केण वा पुनः । पाशाङ्कुशधरं कालं कुर्यात्पुरुषरूपिणम् ॥ 18.124 ॥

śataniṣkeṇa vā kuryāddaśaniṣkeṇa vā punaḥ pāśāṅkuśadharaṁ kālaṁ kuryātpuruṣarūpiṇam

सौ निष्क अथवा दस निष्क सोने से पाश और अंकुश धारण किए हुए काल की मानव-रूप प्रतिमा बनवाए।

श्लोक 125 (shiva.vidyeshvara.18.125)

तत्स्वर्णप्रतिमादानं कुर्याद्दक्षिणया सह । तिलदानं ततः कुर्यात्पूर्णायुष्यप्रसिद्धये ॥ 18.125 ॥

tatsvarṇapratimādānaṁ kuryāddakṣiṇayā saha tiladānaṁ tataḥ kuryātpūrṇāyuṣyaprasiddhaye

उस स्वर्ण-प्रतिमा को दक्षिणा सहित दान करे; फिर पूर्ण आयु की सिद्धि के लिए तिल-दान करे।

श्लोक 126 (shiva.vidyeshvara.18.126)

आज्यावेक्षणदानं च कुर्याद्व्याधिनिवृत्तये । सहस्रं भोजयेद्विप्रान्दरिद्रः शतमेव वा ॥ 18.126 ॥

ājyāvekṣaṇadānaṁ ca kuryādvyādhinivṛttaye sahasraṁ bhojayedviprāndaridraḥ śatameva vā

रोग-निवृत्ति के लिए घी में प्रतिबिम्ब-दर्शन (आज्यावेक्षण) का दान करे; एक हजार अथवा, दरिद्र होने पर, सौ ब्राह्मणों को भोजन कराए।

श्लोक 127 (shiva.vidyeshvara.18.127)

वित्ताभावे दरिद्रस्तु यथाशक्ति समाचरेत् । भैरवस्य महापूजां कुर्याद्भूतादिशान्तये ॥ 18.127 ॥

vittābhāve daridrastu yathāśakti samācaret bhairavasya mahāpūjāṁ kuryādbhūtādiśāntaye

धन के अभाव में दरिद्र व्यक्ति यथाशक्ति करे; भूत-प्रेत आदि की शान्ति के लिए भैरव की महापूजा करे।

श्लोक 128 (shiva.vidyeshvara.18.128)

महाभिषेकं नैवेद्यं शिवस्यान्ते तु कारयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्भूरिभोजनरूपतः ॥ 18.128 ॥

mahābhiṣekaṁ naivedyaṁ śivasyānte tu kārayet brāhmaṇānbhojayetpaścādbhūribhojanarūpataḥ

अन्त में शिव का महाभिषेक और नैवेद्य कराए; उसके बाद विपुल भोजन के रूप में ब्राह्मणों को भोजन कराए।

श्लोक 129 (shiva.vidyeshvara.18.129)

एवं कृतेन यज्ञेन दोषशान्तिमवाप्नुयात् । शान्तियज्ञमिमं कुर्याद्वर्षे वर्षे तु फाल्गुने ॥ 18.129 ॥

evaṁ kṛtena yajñena doṣaśāntimavāpnuyāt śāntiyajñamimaṁ kuryādvarṣe varṣe tu phālgune

इस प्रकार किए गए यज्ञ से दोष की शान्ति प्राप्त होती है। यह शान्ति-यज्ञ प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास में करना चाहिए।

श्लोक 130 (shiva.vidyeshvara.18.130)

दुर्दर्शनादौ सद्यो वै मासमात्रे समाचरेत् । महापापादिसम्प्राप्तौ कुर्याद्भैरवपूजनम् ॥ 18.130 ॥

durdarśanādau sadyo vai māsamātre samācaret mahāpāpādisamprāptau kuryādbhairavapūjanam

अशुभ दर्शन आदि होने पर तुरन्त ही, एक मास के भीतर इसे करना चाहिए; महापाप आदि उत्पन्न होने पर भैरव-पूजन करे।

श्लोक 131 (shiva.vidyeshvara.18.131)

महाव्याधिसमुत्पत्तौ सङ्कल्पं पुनराचरेत् । सर्वाभावे दरिद्रस्तु दीपदानमथाचरेत् ॥ 18.131 ॥

mahāvyādhisamutpattau saṅkalpaṁ punarācaret sarvābhāve daridrastu dīpadānamathācaret

महारोग उत्पन्न होने पर पुनः संकल्प करे; समस्त साधनों के अभाव में दरिद्र व्यक्ति दीप-दान करे।

श्लोक 132 (shiva.vidyeshvara.18.132)

तदप्यशक्तः स्नात्वा वै यत्किञ्चिद् दानमाचरेत् । दिवाकरं नमस्कुर्यान्मन्त्रेणाष्टोत्तरं शतम् ॥ 18.132 ॥

tadapyaśaktaḥ snātvā vai yatkiñcid dānamācaret divākaraṁ namaskuryānmantreṇāṣṭottaraṁ śatam

यदि वह भी न कर सके, तो स्नान करके जो कुछ भी सम्भव हो, वही दान करे; सूर्य को मन्त्र-सहित एक सौ आठ बार नमस्कार करे।

श्लोक 133 (shiva.vidyeshvara.18.133)

सहस्रमयुतं लक्षं कोटिं वा कारयेद् बुधः । नमस्कारात्मयज्ञेन तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ 18.133 ॥

sahasramayutaṁ lakṣaṁ koṭiṁ vā kārayed budhaḥ namaskārātmayajñena tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

विद्वान इसे हजार, दस हजार, लाख अथवा करोड़ बार भी करा सकता है; नमस्कार-रूपी इस यज्ञ से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 134 (shiva.vidyeshvara.18.134)

त्वत्स्वरूपेऽर्पिता बुद्धिर्न तेऽशून्ये च रोचते । या चास्त्यस्मदहन्तेति त्वयि दृष्टे विवर्जिता ॥ 18.134 ॥

tvatsvarūpe’rpitā buddhirna te’śūnye ca rocate yā cāstyasmadahanteti tvayi dṛṣṭe vivarjitā

'मेरी बुद्धि आपके ही स्वरूप में अर्पित है, वह शून्य में कहीं भी रमती नहीं; जो कुछ भी मेरा-अहंकार है, वह आपके दर्शन होते ही दूर हो जाता है।'

श्लोक 135 (shiva.vidyeshvara.18.135)

नम्रोऽहं हि स्वदेहेन भो महांस्त्वमसि प्रभो । न शून्यो मत्स्वरूपो वै तव दासोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ 18.135 ॥

namro’haṁ hi svadehena bho mahāṁstvamasi prabho na śūnyo matsvarūpo vai tava dāso’smi sāmpratam

'हे प्रभो, मैं अपने इस शरीर से नत हूँ, आप ही महान हैं; मेरा स्वरूप शून्य नहीं है — अब मैं आपका ही दास हूँ।'

श्लोक 136 (shiva.vidyeshvara.18.136)

यथायोग्यं स्वात्मयज्ञं नमस्कारं प्रकल्पयेत् । अथात्र शिवनैवेद्यं दत्त्वा ताम्बूलमाहरेत् ॥ 18.136 ॥

yathāyogyaṁ svātmayajñaṁ namaskāraṁ prakalpayet athātra śivanaivedyaṁ dattvā tāmbūlamāharet

इस प्रकार यथायोग्य नमस्कार के रूप में अपने आत्म-यज्ञ की कल्पना करे; फिर यहाँ शिव को नैवेद्य अर्पित करके ताम्बूल (पान) चढ़ाए।

श्लोक 137 (shiva.vidyeshvara.18.137)

शिवप्रदक्षिणं कुर्यात्स्वयमष्टोत्तरं शतम् । सहस्रमयुतं लक्षं कोटिमन्येन कारयेत् ॥ 18.137 ॥

śivapradakṣiṇaṁ kuryātsvayamaṣṭottaraṁ śatam sahasramayutaṁ lakṣaṁ koṭimanyena kārayet

स्वयं शिव की एक सौ आठ प्रदक्षिणा करे; अथवा दूसरे से हजार, दस हजार, लाख अथवा करोड़ प्रदक्षिणाएँ करवा सकता है।

श्लोक 138 (shiva.vidyeshvara.18.138)

शिवप्रदक्षिणात्सर्वं पातकं नश्यति क्षणात् । दुःखस्य मूलं व्याधिर्हि व्याधेर्मूलं हि पातकम् ॥ 18.138 ॥

śivapradakṣiṇātsarvaṁ pātakaṁ naśyati kṣaṇāt duḥkhasya mūlaṁ vyādhirhi vyādhermūlaṁ hi pātakam

शिव की प्रदक्षिणा से सारा पाप क्षणभर में नष्ट हो जाता है; दुःख का मूल रोग है, और रोग का मूल पाप ही है।

श्लोक 139 (shiva.vidyeshvara.18.139)

धर्मेणैव हि पापानामपनोदनमीरितम् । शिवोद्देशकृतो धर्मः क्षमः पापविनोदने ॥ 18.139 ॥

dharmeṇaiva hi pāpānāmapanodanamīritam śivoddeśakṛto dharmaḥ kṣamaḥ pāpavinodane

धर्म से ही पापों का निवारण कहा गया है; शिव को उद्दिष्ट करके किया गया धर्म ही पाप को दूर करने में समर्थ है।

श्लोक 140 (shiva.vidyeshvara.18.140)

अध्यक्षं शिवधर्मेषु प्रदक्षिणमितीरितम् । क्रियया जपरूपं हि प्रणवं तु प्रदक्षिणम् ॥ 18.140 ॥

adhyakṣaṁ śivadharmeṣu pradakṣiṇamitīritam kriyayā japarūpaṁ hi praṇavaṁ tu pradakṣiṇam

प्रदक्षिणा को शिव-धर्मों में अध्यक्ष (प्रधान) कहा गया है; क्रिया के रूप में जो जप-स्वरूप प्रणव है, वही प्रदक्षिणा है।

श्लोक 141 (shiva.vidyeshvara.18.141)

जननं मरणं द्वन्द्वं मायाचक्रमितीरितम् । शिवस्य मायाचक्रं हि बलिपीठं तदुच्यते ॥ 18.141 ॥

jananaṁ maraṇaṁ dvandvaṁ māyācakramitīritam śivasya māyācakraṁ hi balipīṭhaṁ taducyate

जन्म और मृत्यु का द्वन्द्व 'माया-चक्र' कहलाता है; शिव के इस माया-चक्र को ही 'बलिपीठ' कहा जाता है।

श्लोक 142 (shiva.vidyeshvara.18.142)

बलिपीठं समारभ्य प्रादक्षिण्यक्रमेण वै । पदे पदान्तरं गत्वा बलिपीठं समाविशेत् ॥ 18.142 ॥

balipīṭhaṁ samārabhya prādakṣiṇyakrameṇa vai pade padāntaraṁ gatvā balipīṭhaṁ samāviśet

बलिपीठ से आरम्भ करके, प्रदक्षिणा के क्रम से, पद-दर-पद जाकर पुनः बलिपीठ में ही प्रवेश करे।

श्लोक 143 (shiva.vidyeshvara.18.143)

नमस्कारं ततः कुर्यात्प्रदक्षिणमितीरितम् । निर्गमाज्जननं प्राप्तं नमस्त्वात्मसमर्पणम् ॥ 18.143 ॥

namaskāraṁ tataḥ kuryātpradakṣiṇamitīritam nirgamājjananaṁ prāptaṁ namastvātmasamarpaṇam

फिर नमस्कार करे — यही प्रदक्षिणा कहलाती है; बाहर निकलना जन्म को प्राप्त करने के समान है, और नमस्कार आत्मार्पण के समान है।

श्लोक 144 (shiva.vidyeshvara.18.144)

जननं मरणं द्वन्द्वं शिवमायासमर्पितम् । शिवमायार्पितद्वन्द्वो न पुनस्त्वात्मभाग्भवेत् ॥ 18.144 ॥

jananaṁ maraṇaṁ dvandvaṁ śivamāyāsamarpitam śivamāyārpitadvandvo na punastvātmabhāgbhavet

जन्म और मृत्यु का यह द्वन्द्व शिव की माया में ही अर्पित हो जाता है; जिसने अपना यह द्वन्द्व शिव की माया में अर्पित कर दिया है, वह फिर संसार-बद्ध भाग नहीं बनता।

श्लोक 145 (shiva.vidyeshvara.18.145)

यावद्देहं क्रियाधीनः स जीवो बद्ध उच्यते । देहत्रयवशीकारे मोक्ष इत्युच्यते बुधैः ॥ 18.145 ॥

yāvaddehaṁ kriyādhīnaḥ sa jīvo baddha ucyate dehatrayavaśīkāre mokṣa ityucyate budhaiḥ

जब तक जीव देह के लिए कर्म के अधीन रहता है, तब तक वह 'बद्ध' कहलाता है; तीनों शरीरों को वश में कर लेने पर ही उसे विद्वानों ने 'मोक्ष' कहा है।

श्लोक 146 (shiva.vidyeshvara.18.146)

मायाचक्रप्रणेता हि शिवः परमकारणम् । शिवमायार्पितद्वन्द्वं शिवस्तु परिमार्जति ॥ 18.146 ॥

māyācakrapraṇetā hi śivaḥ paramakāraṇam śivamāyārpitadvandvaṁ śivastu parimārjati

माया-चक्र के चालक तो साक्षात् शिव ही हैं, जो परम कारण हैं; शिव की माया में अर्पित उस द्वन्द्व को शिव ही शुद्ध करते हैं।

श्लोक 147 (shiva.vidyeshvara.18.147)

शिवेन कल्पितं द्वन्द्वं तस्मिन्नेव समर्पयेत् । शिवस्यातिप्रियं विद्यात्प्रदक्षिणनमो बुधाः ॥ 18.147 ॥

śivena kalpitaṁ dvandvaṁ tasminneva samarpayet śivasyātipriyaṁ vidyātpradakṣiṇanamo budhāḥ

शिव द्वारा ही रचित यह द्वन्द्व उन्हीं में पुनः अर्पित कर देना चाहिए; प्रदक्षिणा और नमस्कार को शिव के लिए अत्यन्त प्रिय जानना चाहिए, हे विद्वानो।

श्लोक 148 (shiva.vidyeshvara.18.148)

प्रदक्षिणनमस्काराः शिवस्य परमात्मनः । षोडशैरुपचारैश्च कृता पूजा फलप्रदा ॥ 18.148 ॥

pradakṣiṇanamaskārāḥ śivasya paramātmanaḥ ṣoḍaśairupacāraiśca kṛtā pūjā phalapradā

परमात्मा शिव को अर्पित प्रदक्षिणा-नमस्कार, तथा सोलह उपचारों से की गई पूजा — दोनों ही फल देने वाले हैं।

श्लोक 149 (shiva.vidyeshvara.18.149)

प्रदक्षिणाऽविनाश्यं हि पातकं नास्ति भूतले । तस्मात्प्रदक्षिणेनैव सर्वपापं विनाशयेत् ॥ 18.149 ॥

pradakṣiṇā’vināśyaṁ hi pātakaṁ nāsti bhūtale tasmātpradakṣiṇenaiva sarvapāpaṁ vināśayet

इस भूतल पर ऐसा कोई पाप नहीं जिसे प्रदक्षिणा नष्ट न कर सके; इसलिए प्रदक्षिणा से ही समस्त पापों का नाश करे।

श्लोक 150 (shiva.vidyeshvara.18.150)

शिवपूजापरो मौनी सत्यादिगुणसंयुतः । क्रियातपोजपज्ञानध्यानेष्वेकैकमाचरेत् ॥ 18.150 ॥

śivapūjāparo maunī satyādiguṇasaṁyutaḥ kriyātapojapajñānadhyāneṣvekaikamācaret

शिव-पूजा में तत्पर, मौन धारण करने वाला, सत्य आदि गुणों से युक्त साधक क्रिया, तप, जप, ज्ञान और ध्यान — इनमें से एक-एक का अभ्यास करे।

श्लोक 151 (shiva.vidyeshvara.18.151)

ऐश्वर्यं दिव्यदेहश्च ज्ञानमज्ञानसङ्क्षयः । शिवसान्निध्यमित्येतत्क्रियादीनां फलं भवेत् ॥ 18.151 ॥

aiśvaryaṁ divyadehaśca jñānamajñānasaṅkṣayaḥ śivasānnidhyamityetatkriyādīnāṁ phalaṁ bhavet

ऐश्वर्य, दिव्य देह, ज्ञान, अज्ञान का सर्वथा नाश, और शिव का सान्निध्य — ये ही क्रिया आदि साधनों के फल हैं।

श्लोक 152 (shiva.vidyeshvara.18.152)

करणेन फलं याति तमसः परिहापनात् । जन्मनः परिमार्जित्वाज्ज्ञबुद्ध्या जनितानिव ॥ 18.152 ॥

karaṇena phalaṁ yāti tamasaḥ parihāpanāt janmanaḥ parimārjitvājjñabuddhyā janitāniva

साधन के द्वारा ही, अन्धकार के दूर होने से फल प्राप्त होता है — मानो पूर्व जन्मों के संस्कार पूर्ण होकर, बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुए हों।

श्लोक 153 (shiva.vidyeshvara.18.153)

यथादेशं यथाकालं यथादेहं यथाधनम् । यथायोग्यं प्रकुर्वीत क्रियादीन् शिवभक्तिमान् ॥ 18.153 ॥

yathādeśaṁ yathākālaṁ yathādehaṁ yathādhanam yathāyogyaṁ prakurvīta kriyādīn śivabhaktimān

देश, काल, शरीर और धन के अनुसार, यथायोग्य रूप से, शिवभक्त को क्रिया आदि साधन करने चाहिए।

श्लोक 154 (shiva.vidyeshvara.18.154)

न्यायार्जितसुवित्तेन वसेत्प्राज्ञः शिवस्थले । जीवहिंसादिरहितमतिक्लेशविवर्जितम् ॥ 18.154 ॥

nyāyārjitasuvittena vasetprājñaḥ śivasthale jīvahiṁsādirahitamatikleśavivarjitam

न्यायपूर्वक अर्जित उत्तम धन से बुद्धिमान व्यक्ति शिव-स्थल में निवास करे — जीव-हिंसा आदि से रहित, अत्यधिक क्लेश से रहित स्थान में।

श्लोक 155 (shiva.vidyeshvara.18.155)

पञ्चाक्षरेण जप्तं च तोयमन्नं विदुः सुखम् । अथवाहुर्दरिद्रस्य भिक्षान्नं ज्ञानदं भवेत् ॥ 18.155 ॥

pañcākṣareṇa japtaṁ ca toyamannaṁ viduḥ sukham athavāhurdaridrasya bhikṣānnaṁ jñānadaṁ bhavet

पञ्चाक्षर मन्त्र से अभिमन्त्रित जल और अन्न को सुखदायी जानना चाहिए; अथवा दरिद्र के लिए भिक्षा का अन्न ज्ञान देने वाला बताया गया है।

श्लोक 156 (shiva.vidyeshvara.18.156)

शिवभक्तस्य भिक्षान्नं शिवभक्तिविवर्धनम् । शम्भुसत्रमिति प्राहुर्भिक्षान्नं शिवयोगिनः ॥ 18.156 ॥

śivabhaktasya bhikṣānnaṁ śivabhaktivivardhanam śambhusatramiti prāhurbhikṣānnaṁ śivayoginaḥ

शिवभक्त का भिक्षा-अन्न शिव-भक्ति को बढ़ाने वाला है; शिवयोगियों के भिक्षा-अन्न को 'शम्भु-सत्र' (शम्भु की अन्नशाला) कहा जाता है।

श्लोक 157 (shiva.vidyeshvara.18.157)

येन केनाप्युपायेन यत्र कुत्रापि भूतले । शुद्धान्नभुक्सदा मौनी रहस्यं न प्रकाशयेत् ॥ 18.157 ॥

yena kenāpyupāyena yatra kutrāpi bhūtale śuddhānnabhuksadā maunī rahasyaṁ na prakāśayet

किसी भी उपाय से, भूतल पर कहीं भी, मौन रहकर सदा शुद्ध अन्न ही खाए, और रहस्य को प्रकट न करे।

श्लोक 158 (shiva.vidyeshvara.18.158)

प्रकाशयेत्तु भक्तानां शिवमाहात्म्यमेव हि । रहस्यं शिवमन्त्रस्य शिवो जानाति नापरः ॥ 18.158 ॥

prakāśayettu bhaktānāṁ śivamāhātmyameva hi rahasyaṁ śivamantrasya śivo jānāti nāparaḥ

किन्तु भक्तों को शिव की महिमा अवश्य प्रकट करे; शिव-मन्त्र का रहस्य तो शिव ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं।

श्लोक 159 (shiva.vidyeshvara.18.159)

शिवभक्तो वसेन्नित्यं शिवलिङ्गं समाश्रितः । स्थाणुलिङ्गाश्रयेणैव स्थाणुर्भवति भूसुराः ॥ 18.159 ॥

śivabhakto vasennityaṁ śivaliṅgaṁ samāśritaḥ sthāṇuliṅgāśrayeṇaiva sthāṇurbhavati bhūsurāḥ

शिवभक्त को सदा शिवलिंग का आश्रय लेकर निवास करना चाहिए; स्थाणु (अचल) लिंग के आश्रय से ही वह स्वयं स्थाणु (अटल) बन जाता है, हे भूदेवो।

श्लोक 160 (shiva.vidyeshvara.18.160)

पूजया चरलिङ्गस्य क्रमान्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् । सर्वमुक्तं समासेन साध्यसाधनमुत्तमम् ॥ 18.160 ॥

pūjayā caraliṅgasya kramānmukto bhaved dhruvam sarvamuktaṁ samāsena sādhyasādhanamuttamam

चर लिंग की पूजा से क्रमशः निश्चय ही मुक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार संक्षेप में साध्य और साधन, दोनों का उत्तम वर्णन किया गया।

श्लोक 161 (shiva.vidyeshvara.18.161)

व्यासेन यत्पुरा प्रोक्तं यच्छ्रुतं हि मया पुरा । भद्रमस्तु हि वोऽस्माकं शिवभक्तिर्दृढास्तु सा ॥ 18.161 ॥

vyāsena yatpurā proktaṁ yacchrutaṁ hi mayā purā bhadramastu hi vo’smākaṁ śivabhaktirdṛḍhāstu sā

जो पहले व्यास जी ने कहा, और जो मैंने पहले सुना — वह सब हमारे और आप सबके लिए कल्याणकारी हो; हमारी शिव-भक्ति सदा दृढ़ बनी रहे।

श्लोक 162 (shiva.vidyeshvara.18.162)

य इमं पठतेऽध्यायं यः शृणोति नरः सदा । शिवज्ञानं स लभते शिवस्य कृपया बुधाः ॥ 18.162 ॥

ya imaṁ paṭhate’dhyāyaṁ yaḥ śaṛṇoti naraḥ sadā śivajñānaṁ sa labhate śivasya kṛpayā budhāḥ

जो इस अध्याय को पढ़ता है, अथवा जो मनुष्य इसे सदा सुनता है, वह शिव की कृपा से शिव-ज्ञान को प्राप्त करता है, हे विद्वानो।

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