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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 21

कामनानुसार पूजा में शिवलिंग-संख्या

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.21.1)

ऋषय ऊचुः । सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते । सम्यगुक्तं त्वया तात पार्थिवार्चाविधानकम् ॥ 21.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sūta sūta mahābhāga vyāsaśiṣya namo’stu te samyaguktaṁ tvayā tāta pārthivārcāvidhānakam

ऋषियों ने कहा — हे सूत जी, सूत जी, महाभाग्यशाली व्यास-शिष्य, आपको नमस्कार है! हे तात, आपने पार्थिव-पूजन की विधि का सुन्दर वर्णन किया है।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.21.2)

कामनाभेदमाश्रित्य सङ्ख्यां ब्रूहि विधानतः । शिवपार्थिवलिङ्गानां कृपया दीनवत्सल ॥ 21.2 ॥

kāmanābhedamāśritya saṅkhyāṁ brūhi vidhānataḥ śivapārthivaliṅgānāṁ kṛpayā dīnavatsala

अब कामनाओं के भेद के अनुसार, शिव-पार्थिव-लिंगों की संख्या का विधान कृपापूर्वक बताइए, हे दीनवत्सल!

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.21.3)

सूत उवाच । शृणुध्वमृषयः सर्वे पार्थिवार्चाविधानकम् । यस्यानुष्ठानमात्रेण कृतकृत्यो भवेन्नरः ॥ 21.3 ॥

sūta uvāca śaṛṇudhvamṛṣayaḥ sarve pārthivārcāvidhānakam yasyānuṣṭhānamātreṇa kṛtakṛtyo bhavennaraḥ

सूत जी ने कहा — हे समस्त ऋषियो, पार्थिव-पूजन की वह विधि सुनिए, जिसके अनुष्ठान मात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.21.4)

अकृत्वा पार्थिवं लिङ्गं योऽन्यदेवं प्रपूजयेत् । वृथा भवति सा पूजा दमदानादिकं वृथा ॥ 21.4 ॥

akṛtvā pārthivaṁ liṅgaṁ yo’nyadevaṁ prapūjayet vṛthā bhavati sā pūjā damadānādikaṁ vṛthā

पार्थिव लिंग बनाए बिना जो व्यक्ति किसी अन्य देवता की पूजा करता है, उसकी वह पूजा व्यर्थ होती है, उसका संयम-दान आदि भी व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.21.5)

सङ्ख्या पार्थिवलिङ्गानां यथाकामं निगद्यते । सङ्ख्या सद्यो मुनिश्रेष्ठ निश्चयेन फलप्रदा ॥ 21.5 ॥

saṅkhyā pārthivaliṅgānāṁ yathākāmaṁ nigadyate saṅkhyā sadyo muniśreṣṭha niścayena phalapradā

पार्थिव-लिंगों की संख्या इच्छानुसार बताई जाती है; हे मुनिश्रेष्ठ, वह संख्या निश्चय ही तत्काल फल देने वाली है।

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.21.6)

प्रथमावाहनं तत्र प्रतिष्ठा पूजनं पृथक् । लिङ्गाकारं समं तत्र सर्वं ज्ञेयं पृथक्पृथक् ॥ 21.6 ॥

prathamāvāhanaṁ tatra pratiṣṭhā pūjanaṁ pṛthak liṅgākāraṁ samaṁ tatra sarvaṁ jñeyaṁ pṛthakpṛthak

वहाँ प्रथम आवाहन, प्रतिष्ठा और पूजन — ये सब अलग-अलग हैं; लिंग का आकार भी वहाँ हर स्तर पर पृथक्-पृथक् ही जानना चाहिए।

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.21.7)

विद्यार्थी पुरुषः प्रीत्या सहस्रमितपार्थिवम् । पूजयेच्छिवलिङ्गं हि निश्चयात्तत्फलप्रदम् ॥ 21.7 ॥

vidyārthī puruṣaḥ prītyā sahasramitapārthivam pūjayecchivaliṅgaṁ hi niścayāttatphalapradam

विद्या का इच्छुक पुरुष प्रेमपूर्वक एक हजार पार्थिव शिवलिंगों की पूजा करे — यह निश्चय ही वह फल प्रदान करता है।

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.21.8)

नरः पार्थिवलिङ्गानां धनार्थी च तदर्धकम् । पुत्रार्थी सार्धसाहस्रं वस्त्रार्थी शतपञ्चकम् ॥ 21.8 ॥

naraḥ pārthivaliṅgānāṁ dhanārthī ca tadardhakam putrārthī sārdhasāhasraṁ vastrārthī śatapañcakam

धन का इच्छुक पुरुष उसकी आधी संख्या में पार्थिव लिंग बनाए; पुत्र का इच्छुक डेढ़ हजार, वस्त्र का इच्छुक पाँच सौ।

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.21.9)

मोक्षार्थी कोटिगुणितं भूकामश्च सहस्रकम् । दयार्थी च त्रिसाहस्रं तीर्थार्थी द्विसहस्रकम् ॥ 21.9 ॥

mokṣārthī koṭiguṇitaṁ bhūkāmaśca sahasrakam dayārthī ca trisāhasraṁ tīrthārthī dvisahasrakam

मोक्ष का इच्छुक करोड़ गुना बनाए; भूमि का इच्छुक एक हजार; दया का इच्छुक तीन हजार; तीर्थ-फल का इच्छुक दो हजार।

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.21.10)

सुहृत्कामी त्रिसाहस्रं वश्यार्थी शतमष्टकम् । मारणार्थी सप्तशतं मोहनार्थी शताष्टकम् ॥ 21.10 ॥

suhṛtkāmī trisāhasraṁ vaśyārthī śatamaṣṭakam māraṇārthī saptaśataṁ mohanārthī śatāṣṭakam

अच्छे मित्र का इच्छुक तीन हजार; वश में करने का इच्छुक एक सौ आठ; मारण का इच्छुक सात सौ; मोहन का इच्छुक एक सौ आठ।

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.21.11)

उच्चाटनपरश्चैव सहस्रं च यथोक्ततः । स्तम्भनार्थी सहस्रं तु द्वेषणार्थी तदर्धकम् ॥ 21.11 ॥

uccāṭanaparaścaiva sahasraṁ ca yathoktataḥ stambhanārthī sahasraṁ tu dveṣaṇārthī tadardhakam

उच्चाटन में लगा हुआ व्यक्ति भी उतना ही एक हजार बनाए, जैसा कहा गया है; स्तम्भन का इच्छुक एक हजार, द्वेष उत्पन्न करने का इच्छुक उसका आधा।

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.21.12)

निगडान्मुक्तिकामस्तु सहस्रं सार्धमुत्तमम् । महाराजभये पञ्चशतं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥ 21.12 ॥

nigaḍānmuktikāmastu sahasraṁ sārdhamuttamam mahārājabhaye pañcaśataṁ jñeyaṁ vicakṣaṇaiḥ

बन्धन से मुक्ति का इच्छुक डेढ़ हजार, जो श्रेष्ठ है; महाराज के भय में पाँच सौ जानना चाहिए, ऐसा विद्वान कहते हैं।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.21.13)

चौरादिसङ्कटे ज्ञेयं पार्थिवानां शतद्वयम् । डाकिन्यादिभये पञ्चशतमुक्तं च पार्थिवम् ॥ 21.13 ॥

caurādisaṅkaṭe jñeyaṁ pārthivānāṁ śatadvayam ḍākinyādibhaye pañcaśatamuktaṁ ca pārthivam

चोर आदि के संकट में दो सौ पार्थिव लिंग जानने चाहिए; डाकिनी आदि के भय में पाँच सौ पार्थिव लिंग बताए गए हैं।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.21.14)

दारिद्र्ये पञ्चसाहस्रमयुतं सर्वकामदम् । अथ नित्यविधिं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनिसत्तमाः ॥ 21.14 ॥

dāridrye pañcasāhasramayutaṁ sarvakāmadam atha nityavidhiṁ vakṣye śaṛṇudhvaṁ munisattamāḥ

दरिद्रता में पाँच हजार और दस हजार, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है। अब मैं नित्य-विधि बताऊँगा, सुनिए, हे मुनिश्रेष्ठो।

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.21.15)

एकं पापहरं प्रोक्तं द्विलिङ्गं चार्थसिद्धिदम् । त्रिलिङ्गं सर्वकामानां कारणं परमीरितम् ॥ 21.15 ॥

ekaṁ pāpaharaṁ proktaṁ dviliṅgaṁ cārthasiddhidam triliṅgaṁ sarvakāmānāṁ kāraṇaṁ paramīritam

एक लिंग को पाप-हारक कहा गया है, दो लिंग अर्थ-सिद्धि देने वाले हैं, तीन लिंग समस्त कामनाओं का परम कारण कहे गए हैं।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.21.16)

उत्तरोत्तरमेवं स्यात्पूर्वोक्तगणनावधि । मतान्तरमथो वक्ष्ये सङ्ख्यायां मुनिभेदतः ॥ 21.16 ॥

uttarottaramevaṁ syātpūrvoktagaṇanāvadhi matāntaramatho vakṣye saṅkhyāyāṁ munibhedataḥ

इस प्रकार यह पहले बताई गई गणना तक उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है; अब मैं इस संख्या के विषय में मुनियों के मतभेद से एक अन्य मत भी बताता हूँ।

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.21.17)

लिङ्गानामयुतं कृत्वा पार्थिवानां सुबुद्धिमान् । निर्भयो हि भवेन्नूनं महाराजभयं हरेत् ॥ 21.17 ॥

liṅgānāmayutaṁ kṛtvā pārthivānāṁ subuddhimān nirbhayo hi bhavennūnaṁ mahārājabhayaṁ haret

जो सुबुद्धिमान दस हजार पार्थिव लिंग बनवाता है, वह निश्चय ही निर्भय हो जाता है — यह महाराज के भय को भी हर लेता है।

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.21.18)

कारागृहादिमुक्त्यर्थमयुतं कारयेद् बुधः । डाकिन्यादिभये सप्तसहस्रं कारयेत्तथा ॥ 21.18 ॥

kārāgṛhādimuktyarthamayutaṁ kārayed budhaḥ ḍākinyādibhaye saptasahasraṁ kārayettathā

कारागार आदि से मुक्ति के लिए विद्वान दस हजार बनवाए; डाकिनी आदि के भय में भी सात हजार बनवाए।

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.21.19)

अपुत्रः पञ्चपञ्चाशत् सहस्राणि प्रकारयेत् । लिङ्गानामयुतेनैव कन्यकासन्ततिं लभेत् ॥ 21.19 ॥

aputraḥ pañcapañcāśat sahasrāṇi prakārayet liṅgānāmayutenaiva kanyakāsantatiṁ labhet

पुत्रहीन व्यक्ति पचपन हजार बनवाए; दस हजार लिंगों से ही कन्या-सन्तति की निरन्तरता प्राप्त होती है।

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.21.20)

लिङ्गानामयुतेनैव विष्ण्वाद्यैश्वर्यमाप्नुयात् । लिङ्गानां प्रयुतेनैव ह्यतुलां श्रियमाप्नुयात् ॥ 21.20 ॥

liṅgānāmayutenaiva viṣṇvādyaiśvaryamāpnuyāt liṅgānāṁ prayutenaiva hyatulāṁ śriyamāpnuyāt

दस हजार लिंगों से ही विष्णु आदि के समान ऐश्वर्य प्राप्त होता है; एक लाख लिंगों से ही अतुलनीय समृद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.21.21)

कोटिमेकां तु लिङ्गानां यः करोति नरो भुवि । शिव एव भवेत्सोऽपि नात्र कार्या विचारणा ॥ 21.21 ॥

koṭimekāṁ tu liṅgānāṁ yaḥ karoti naro bhuvi śiva eva bhavetso’pi nātra kāryā vicāraṇā

जो मनुष्य इस भूतल पर एक करोड़ लिंग बनवाता है, वह स्वयं शिव ही हो जाता है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.21.22)

अर्चा पार्थिवलिङ्गानां कोटियज्ञफलप्रदा । भुक्तिदा मुक्तिदा नित्यं ततः कामार्थिनां नृणाम् ॥ 21.22 ॥

arcā pārthivaliṅgānāṁ koṭiyajñaphalapradā bhuktidā muktidā nityaṁ tataḥ kāmārthināṁ nṛṇām

पार्थिव लिंगों की पूजा करोड़ यज्ञों का फल देने वाली है; यह अर्थ और कामना की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को सदा भोग और मोक्ष दोनों देती है।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.21.23)

विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः । महाहानिर्भवेत्तस्य दुर्वृत्तस्य दुरात्मनः ॥ 21.23 ॥

vinā liṅgārcanaṁ yasya kālo gacchati nityaśaḥ mahāhānirbhavettasya durvṛttasya durātmanaḥ

जिसका समय नित्य लिंग-पूजन के बिना ही बीत जाता है, उस दुराचारी, दुरात्मा व्यक्ति को महान् हानि होती है।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.21.24)

एकतः सर्वदानानि व्रतानि विविधानि च । तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गार्चा चैकतः स्मृता ॥ 21.24 ॥

ekataḥ sarvadānāni vratāni vividhāni ca tīrthāni niyamā yajñā liṅgārcā caikataḥ smṛtā

एक ओर समस्त दान, विविध व्रत, तीर्थ, नियम और यज्ञ हैं, और दूसरी ओर अकेला लिंग-पूजन — इन दोनों को समान माना गया है।

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.21.25)

कलौ लिङ्गार्चनं श्रेष्ठं यथा लोके प्रदृश्यते । तथान्यन्नास्ति शास्त्राणामेष सिद्धान्तनिश्चयः ॥ 21.25 ॥

kalau liṅgārcanaṁ śreṣṭhaṁ yathā loke pradṛśyate tathānyannāsti śāstrāṇāmeṣa siddhāntaniścayaḥ

कलियुग में लिंग-पूजन ही श्रेष्ठ है, जैसा कि लोक में देखा जाता है; शास्त्रों में इसके समान अन्य कुछ नहीं है — यही सिद्धान्त का निश्चित निष्कर्ष है।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.21.26)

भुक्तिमुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम् । पूजयित्वा नरो नित्यं शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ 21.26 ॥

bhuktimuktipradaṁ liṅgaṁ vividhāpannivāraṇam pūjayitvā naro nityaṁ śivasāyujyamāpnuyāt

भोग और मोक्ष देने वाला, विविध विपत्तियों का निवारण करने वाला वह लिंग — इसकी पूजा करके मनुष्य नित्य शिव का सायुज्य प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.21.27)

शिवनाममयं लिङ्गं नित्यं पूज्यं महर्षिभिः । यतश्च सर्वलिङ्गेषु तस्मात्पूज्यं विधानतः ॥ 21.27 ॥

śivanāmamayaṁ liṅgaṁ nityaṁ pūjyaṁ maharṣibhiḥ yataśca sarvaliṅgeṣu tasmātpūjyaṁ vidhānataḥ

शिव के नामों से युक्त लिंग महर्षियों द्वारा नित्य पूज्य है; और चूँकि यह समस्त लिंगों में अग्रणी है, इसलिए इसे विधिपूर्वक पूजना चाहिए।

श्लोक 28 (shiva.vidyeshvara.21.28)

उत्तमं मध्यमं नीचं त्रिविधं लिङ्गमीरितम् । मानतो मुनिशार्दूलास्तच्छृणुध्वं वदाम्यहम् ॥ 21.28 ॥

uttamaṁ madhyamaṁ nīcaṁ trividhaṁ liṅgamīritam mānato muniśārdūlāstacchṛṇudhvaṁ vadāmyaham

लिंग को माप के अनुसार तीन प्रकार का कहा गया है — उत्तम, मध्यम और निम्न, हे मुनिश्रेष्ठो; उसे सुनिए, मैं बताता हूँ।

श्लोक 29 (shiva.vidyeshvara.21.29)

चतुरङ्गुलमुच्छ्रायं रम्यं वेदिकया युतम् । उत्तमं लिङ्गमाख्यातं मुनिभिः शास्त्रकोविदैः ॥ 21.29 ॥

caturaṅgulamucchrāyaṁ ramyaṁ vedikayā yutam uttamaṁ liṅgamākhyātaṁ munibhiḥ śāstrakovidaiḥ

चार अंगुल ऊँचा, सुन्दर, वेदी से युक्त लिंग — शास्त्रकुशल मुनियों ने इसे 'उत्तम' लिंग कहा है।

श्लोक 30 (shiva.vidyeshvara.21.30)

तदर्द्धं मध्यमं प्रोक्तं तदर्द्धमधमं स्मृतम् । इत्थं त्रिविधमाख्यातमुत्तरोत्तरतः परम् ॥ 21.30 ॥

tadarddhaṁ madhyamaṁ proktaṁ tadarddhamadhamaṁ smṛtam itthaṁ trividhamākhyātamuttarottarataḥ param

उससे आधा 'मध्यम' कहा गया है, और उससे भी आधा 'निम्न' माना गया है; इस प्रकार यह तीन प्रकार का लिंग, एक-दूसरे से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ, बताया गया है।

श्लोक 31 (shiva.vidyeshvara.21.31)

अनेकलिङ्गं यो नित्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितः । पूजयेत्स लभेत्कामान्मनसा मानसेप्सितान् ॥ 21.31 ॥

anekaliṅgaṁ yo nityaṁ bhaktiśraddhāsamanvitaḥ pūjayetsa labhetkāmānmanasā mānasepsitān

जो भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर अनेक लिंगों की नित्य पूजा करता है, वह मन में जो भी कामनाएँ रखता है, उन्हें प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 32 (shiva.vidyeshvara.21.32)

न लिङ्गाराधनादन्यत्पुण्यं वेदचतुष्टये । विद्यते सर्वशास्त्राणामेष एव विनिश्चयः ॥ 21.32 ॥

na liṅgārādhanādanyatpuṇyaṁ vedacatuṣṭaye vidyate sarvaśāstrāṇāmeṣa eva viniścayaḥ

चारों वेदों में लिंग-आराधना से बढ़कर कोई पुण्य विद्यमान नहीं है — यही समस्त शास्त्रों का निश्चित निष्कर्ष है।

श्लोक 33 (shiva.vidyeshvara.21.33)

सर्वमेतत्परित्यज्य कर्मजालमशेषतः । भक्त्या परमया विद्वाँल्लिङ्गमेकं प्रपूजयेत् ॥ 21.33 ॥

sarvametatparityajya karmajālamaśeṣataḥ bhaktyā paramayā vidvā~lliṅgamekaṁ prapūjayet

कर्मों के इस समस्त जाल को पूर्णतः त्यागकर, विद्वान को परम भक्ति से एक ही लिंग की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 34 (shiva.vidyeshvara.21.34)

लिङ्गेऽर्चितेऽर्चितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । संसाराम्बुधिमग्नानां नान्यत्तरणसाधनम् ॥ 21.34 ॥

liṅge’rcite’rcitaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṅgamam saṁsārāmbudhimagnānāṁ nānyattaraṇasādhanam

पूजित लिंग में यह सम्पूर्ण चराचर जगत् पूजित हो जाता है; संसार-सागर में डूबते हुए प्राणियों के लिए इसके अतिरिक्त पार लगाने का कोई अन्य साधन नहीं है।

श्लोक 35 (shiva.vidyeshvara.21.35)

अज्ञानतिमिरान्धानां विषयासक्तचेतसाम् । प्लवो नान्योऽस्ति जगति लिङ्गाराधनमन्तरा ॥ 21.35 ॥

ajñānatimirāndhānāṁ viṣayāsaktacetasām plavo nānyo’sti jagati liṅgārādhanamantarā

अज्ञान के अन्धकार से अन्धे, विषयों में आसक्त चित्त वाले प्राणियों के लिए इस जगत् में लिंग-आराधना के अतिरिक्त कोई अन्य नौका नहीं है।

श्लोक 36 (shiva.vidyeshvara.21.36)

हरिब्रह्मादयो देवा मुनयो यक्षराक्षसाः । गन्धर्वाश्चारणाः सिद्धा दैतेया दानवास्तथा ॥ 21.36 ॥

haribrahmādayo devā munayo yakṣarākṣasāḥ gandharvāścāraṇāḥ siddhā daiteyā dānavāstathā

हरि, ब्रह्मा आदि देवता, मुनि, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, चारण, सिद्ध, दैत्य और दानव भी —

श्लोक 37 (shiva.vidyeshvara.21.37)

नागाः शेषप्रभृतयो गरुडाद्याः खगास्तथा । सप्रजापतयश्चान्ये मनवः किन्नरा नराः ॥ 21.37 ॥

nāgāḥ śeṣaprabhṛtayo garuḍādyāḥ khagāstathā saprajāpatayaścānye manavaḥ kinnarā narāḥ

शेष आदि नाग, गरुड़ आदि पक्षी भी, तथा प्रजापतियों सहित अन्य लोग, मनु, किन्नर और मनुष्य —

श्लोक 38 (shiva.vidyeshvara.21.38)

पूजयित्वा महाभक्त्या लिङ्गं सर्वार्थसिद्धिदम् । प्राप्ताः कामानभीष्टांश्च तांस्तान्सर्वान्हृदि स्थितान् ॥ 21.38 ॥

pūjayitvā mahābhaktyā liṅgaṁ sarvārthasiddhidam prāptāḥ kāmānabhīṣṭāṁśca tāṁstānsarvānhṛdi sthitān

सभी अभीष्टों को सिद्ध करने वाले उस लिंग की महाभक्ति से पूजा करके, उन सबने अपने-अपने हृदय में स्थित सभी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 39 (shiva.vidyeshvara.21.39)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा प्रतिलोमजः । पूजयेत्सततं लिङ्गं तत्तन्मन्त्रेण सादरम् ॥ 21.39 ॥

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā pratilomajaḥ pūjayetsatataṁ liṅgaṁ tattanmantreṇa sādaram

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा प्रतिलोम-जन्मा भी — सभी को अपने-अपने मन्त्र से सदा आदरपूर्वक लिंग की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 40 (shiva.vidyeshvara.21.40)

किं बहूक्तेन मुनयः स्त्रीणामपि तथान्यतः । अधिकारोऽस्ति सर्वेषां शिवलिङ्गार्चने द्विजाः ॥ 21.40 ॥

kiṁ bahūktena munayaḥ strīṇāmapi tathānyataḥ adhikāro’sti sarveṣāṁ śivaliṅgārcane dvijāḥ

अधिक कहने से क्या लाभ, हे मुनियो — स्त्रियों को भी, और इसी प्रकार अन्य सभी को भी, शिवलिंग-पूजन का अधिकार है, हे द्विजो।

श्लोक 41 (shiva.vidyeshvara.21.41)

द्विजानां वैदिकेनापि मार्गेणाराधनं वरम् । अन्येषामपि जन्तूनां वैदिकेन न सम्मतम् ॥ 21.41 ॥

dvijānāṁ vaidikenāpi mārgeṇārādhanaṁ varam anyeṣāmapi jantūnāṁ vaidikena na sammatam

द्विजों के लिए वैदिक मार्ग से भी आराधना श्रेष्ठ है; अन्य जीवों के लिए वैदिक मार्ग से पूजा सम्मत नहीं है।

श्लोक 42 (shiva.vidyeshvara.21.42)

वैदिकानां द्विजानां च पूजा वैदिकमार्गतः । कर्तव्या नान्यमार्गेण इत्याह भगवान् शिवः ॥ 21.42 ॥

vaidikānāṁ dvijānāṁ ca pūjā vaidikamārgataḥ kartavyā nānyamārgeṇa ityāha bhagavān śivaḥ

वैदिक द्विजों की पूजा वैदिक मार्ग से ही करनी चाहिए, अन्य मार्ग से नहीं — ऐसा भगवान शिव ने कहा है।

श्लोक 43 (shiva.vidyeshvara.21.43)

दधीचिगौतमादीनां शापेनादग्धचेतसाम् । द्विजानां जायते श्रद्धा नैव वैदिककर्मणि ॥ 21.43 ॥

dadhīcigautamādīnāṁ śāpenādagdhacetasām dvijānāṁ jāyate śraddhā naiva vaidikakarmaṇi

दधीचि, गौतम आदि के शाप से, जिनका चित्त क्रोध से जल उठा था, द्विजों में वैदिक कर्म के प्रति वैसी श्रद्धा अब नहीं रही।

श्लोक 44 (shiva.vidyeshvara.21.44)

यो वैदिकमनादृत्य कर्म स्मार्तमथापि वा । अन्यत्समाचरेन्मर्त्यो न सङ्कल्पफलं लभेत् ॥ 21.44 ॥

yo vaidikamanādṛtya karma smārtamathāpi vā anyatsamācarenmartyo na saṅkalpaphalaṁ labhet

जो मनुष्य वैदिक अथवा स्मार्त कर्म का आदर न करके कुछ अन्य आचरण करता है, वह अपने संकल्प का फल प्राप्त नहीं करता।

श्लोक 45 (shiva.vidyeshvara.21.45)

इत्थं कृत्वार्चनं शम्भोर्नैवेद्यान्तं विधानतः । पूजयेदष्टमूर्तीश्च तत्रैव त्रिजगन्मयीः ॥ 21.45 ॥

itthaṁ kṛtvārcanaṁ śambhornaivedyāntaṁ vidhānataḥ pūjayedaṣṭamūrtīśca tatraiva trijaganmayīḥ

इस प्रकार नैवेद्य तक शम्भु की पूजा विधिपूर्वक करके, वहीं तीनों लोकों से युक्त अष्टमूर्तियों की भी पूजा करे।

श्लोक 46 (shiva.vidyeshvara.21.46)

क्षितिरापोऽनलो वायुराकाशः सूर्यसोमकौ । यजमान इति त्वष्टौ मूर्तयः परिकीर्तिताः ॥ 21.46 ॥

kṣitirāpo’nalo vāyurākāśaḥ sūryasomakau yajamāna iti tvaṣṭau mūrtayaḥ parikīrtitāḥ

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान — ये आठ मूर्तियाँ कही गई हैं।

श्लोक 47 (shiva.vidyeshvara.21.47)

शर्वो भवश्च रुद्रश्च उग्रो भीम इतीश्वरः । महादेवः पशुपतिरेतान्मूर्तिभिरर्चयेत् ॥ 21.47 ॥

śarvo bhavaśca rudraśca ugro bhīma itīśvaraḥ mahādevaḥ paśupatiretānmūrtibhirarcayet

शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, ईश्वर, महादेव और पशुपति — इन नामों से उन (आठ मूर्तियों) की पूजा करे।

श्लोक 48 (shiva.vidyeshvara.21.48)

पूजयेत्परिवारं च ततः शम्भोः सुभक्तितः । ईशानादिक्रमात्तत्र चन्दनाक्षतपत्रकैः ॥ 21.48 ॥

pūjayetparivāraṁ ca tataḥ śambhoḥ subhaktitaḥ īśānādikramāttatra candanākṣatapatrakaiḥ

फिर वहाँ ईशान आदि के क्रम में, चन्दन, अक्षत और पत्तों से, अत्यन्त भक्तिपूर्वक शम्भु के परिवार की भी पूजा करे।

श्लोक 49 (shiva.vidyeshvara.21.49)

ईशानं नन्दिनं चण्डं महाकालं च भृङ्गिणम् । वृषं स्कन्दं कपर्दीशं सोमं शुक्रं च तत्क्रमात् ॥ 21.49 ॥

īśānaṁ nandinaṁ caṇḍaṁ mahākālaṁ ca bhṛṅgiṇam vṛṣaṁ skandaṁ kapardīśaṁ somaṁ śukraṁ ca tatkramāt

ईशान, नन्दी, चण्ड, महाकाल, भृंगी, वृष (बैल), स्कन्द, कपर्दीश, सोम और शुक्र — इसी क्रम में,

श्लोक 50 (shiva.vidyeshvara.21.50)

अग्रतो वीरभद्रं च पृष्ठे कीर्तिमुखं तथा । तत एकादशान् रुद्रान्पूजयेद्विधिना ततः ॥ 21.50 ॥

agrato vīrabhadraṁ ca pṛṣṭhe kīrtimukhaṁ tathā tata ekādaśān rudrānpūjayedvidhinā tataḥ

आगे वीरभद्र, और पीछे कीर्तिमुख की भी पूजा करे; फिर विधिपूर्वक ग्यारह रुद्रों की पूजा करे।

श्लोक 51 (shiva.vidyeshvara.21.51)

ततः पञ्चाक्षरं जप्त्वा शतरुद्रियमेव च । स्तुतीर्नानाविधाः कृत्वा पञ्चाङ्गपठनं तथा ॥ 21.51 ॥

tataḥ pañcākṣaraṁ japtvā śatarudriyameva ca stutīrnānāvidhāḥ kṛtvā pañcāṅgapaṭhanaṁ tathā

फिर पञ्चाक्षर और शतरुद्रिय मन्त्र का जप करके, विविध प्रकार की स्तुतियाँ करके, तथा पञ्चांग-पाठ करके,

श्लोक 52 (shiva.vidyeshvara.21.52)

ततः प्रदक्षिणां कृत्वा नत्वा लिङ्गं विसर्जयेत् । इति प्रोक्तमशेषं च शिवपूजनमादरात् ॥ 21.52 ॥

tataḥ pradakṣiṇāṁ kṛtvā natvā liṅgaṁ visarjayet iti proktamaśeṣaṁ ca śivapūjanamādarāt

फिर प्रदक्षिणा करके, प्रणाम करके, लिंग का विसर्जन करे। इस प्रकार शिव-पूजन का समस्त विधान आदरपूर्वक बताया गया।

श्लोक 53 (shiva.vidyeshvara.21.53)

रात्रावुदङ्मुखः कुर्याद् देवकार्यं सदैव हि । शिवार्चनं सदाप्येवं शुचिः कुर्यादुदङ्मुखः ॥ 21.53 ॥

rātrāvudaṅmukhaḥ kuryād devakāryaṁ sadaiva hi śivārcanaṁ sadāpyevaṁ śuciḥ kuryādudaṅmukhaḥ

रात्रि में सदा उत्तराभिमुख होकर ही देव-कार्य करना चाहिए; इसी प्रकार सदा शुद्ध होकर उत्तराभिमुख होकर ही शिव-पूजन करना चाहिए।

श्लोक 54 (shiva.vidyeshvara.21.54)

न प्राचीमग्रतः शम्भोर्नोदीचीं शक्तिसंहिताम् । न प्रतीचीं यतः पृष्ठमतो ग्राह्यं समाश्रयेत् ॥ 21.54 ॥

na prācīmagrataḥ śambhornodīcīṁ śaktisaṁhitām na pratīcīṁ yataḥ pṛṣṭhamato grāhyaṁ samāśrayet

शम्भु के सम्मुख पूर्व दिशा में नहीं, शक्ति-सहित उत्तर दिशा में भी नहीं, और पश्चिम दिशा में भी नहीं — क्योंकि वह उनकी पीठ मानी जाती है; इसलिए उचित दिशा का ही आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 55 (shiva.vidyeshvara.21.55)

विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया । बिल्वपत्रं विना नैव पूजयेच्छङ्करं बुधः ॥ 21.55 ॥

vinā bhasmatripuṇḍreṇa vinā rudrākṣamālayā bilvapatraṁ vinā naiva pūjayecchaṅkaraṁ budhaḥ

बिना भस्म-त्रिपुण्ड्र के, बिना रुद्राक्ष-माला के, बिना बिल्वपत्र के — विद्वान को कभी भी शंकर की पूजा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 56 (shiva.vidyeshvara.21.56)

भस्माप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठाः प्रवृत्ते शिवपूजने । तस्मान्मृदापि कर्तव्यं ललाटे च त्रिपुण्ड्रकम् ॥ 21.56 ॥

bhasmāprāptau muniśreṣṭhāḥ pravṛtte śivapūjane tasmānmṛdāpi kartavyaṁ lalāṭe ca tripuṇḍrakam

हे मुनिश्रेष्ठो, यदि शिव-पूजन के समय भस्म उपलब्ध न हो, तो मिट्टी से भी ललाट पर त्रिपुण्ड्र बनाना चाहिए।

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