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विद्येश्वर संहिता · अध्याय 3

साध्य और साधन का विचार

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (shiva.vidyeshvara.3.1)

व्यास उवाच । इत्याकर्ण्य वचः सौतं प्रोचुस्ते परमर्षयः । वेदान्तसारसर्वस्वं पुराणं श्रावयाद्भुतम्

vyāsa uvāca ityākarṇya vacaḥ sautaṁ procuste paramarṣayaḥ vedāṁtasārasarvasvaṁ purāṇaṁ śrāvayādbhutam

व्यास जी ने कहा — सूत जी के इन वचनों को सुनकर उन परम ऋषियों ने कहा — वेदान्त के सम्पूर्ण सार-स्वरूप उस अद्भुत पुराण को हमें सुनाइए।

श्लोक 2 (shiva.vidyeshvara.3.2)

इति श्रुत्वा मुनीनां स वचनं सुप्रहर्षितः । संस्मरञ्छङ्करं सूतः प्रोवाच मुनिसत्तमान्

iti śrutvā munīnāṁ sa vacanaṁ supraharṣitaḥ saṁsmarañchaṁkaraṁ sūtaḥ provāca munisattamān

मुनियों का यह वचन सुनकर सूत जी अत्यंत हर्षित हुए और शंकर का स्मरण करते हुए श्रेष्ठ मुनियों से बोले।

श्लोक 3 (shiva.vidyeshvara.3.3)

सूत उवाच । शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे स्मृत्वा शिवमनामयम् । पुराणप्रवणं शैवं पुराणं वेदसारजम्

sūta uvāca śṛṇvaṁtu ṛṣayaḥ sarve smṛtvā śivamanāmayam purāṇapravaṇaṁ śaivaṁ purāṇaṁ vedasārajam

सूत जी ने कहा — हे ऋषिगण! शिव का स्मरण करते हुए, रोग-रहित होकर सब लोग सुनें — यह पुराण-प्रधान शैव पुराण वेद के सार से उत्पन्न है,

श्लोक 4 (shiva.vidyeshvara.3.4)

यत्र गीतं त्रिकं प्रीत्या भक्तिज्ञानविरागकम्

yatra gītaṁ trikaṁ prītyā bhaktijñānavirāgakam

जिसमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य — यह त्रिक प्रेमपूर्वक गाया गया है,

श्लोक 5 (shiva.vidyeshvara.3.5)

वेदान्तवेद्यं सद्वस्तु विशेषेण प्रवर्णितम्

vedāṁtavedyaṁ sadvastu viśeṣeṇa pravarṇitam

और वेदान्त द्वारा जानने योग्य सत् वस्तु का विशेष रूप से वर्णन किया गया है।

श्लोक 6 (shiva.vidyeshvara.3.6)

शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे पुराणं वेदसारजम् । पुरा कालेन महता कल्पेऽतीते पुनः पुनः

śṛṇvantu ṛṣayaḥ sarve purāṇaṁ vedasārajam purā kālena mahatā kalpe 'tīte punaḥ punaḥ

हे ऋषिगण! वेद के सार से उत्पन्न इस पुराण को सुनिए — बहुत पहले, बीते हुए कल्प में, यह बार-बार कहा गया था।

श्लोक 7 (shiva.vidyeshvara.3.7)

अस्मिन्नुपस्थिते कल्पे प्रवृत्ते सृष्टिकर्मणि । मुनीनां षट्कुलीनानां ब्रुवतामितरेतरम्

asminnupasthite kalpe pravṛtte sṛṣṭikarmaṇi munīnāṁ ṣaṭkulīnānāṁ bruvatāmitaretaram

जब यह वर्तमान कल्प उपस्थित हुआ और सृष्टि-कार्य आरम्भ हुआ, तब छह कुलों में उत्पन्न मुनि आपस में वाद-विवाद करने लगे —

श्लोक 8 (shiva.vidyeshvara.3.8)

इदं परमिदं नेति विवादः सुमहानभूत् । तेऽभिजग्मुर्विधातारं ब्रह्माणं प्रष्टुमव्ययम्

idaṁ paramidaṁ neti vivādaḥ sumahānabhūt te 'bhijagmurvidhātāraṁ brahmāṇaṁ praṣṭumavyayam

'यही परम है, यह नहीं' — इस प्रकार बड़ा भारी विवाद उठ खड़ा हुआ। तब वे अविनाशी विधाता ब्रह्मा से पूछने के लिए उनके पास गए।

श्लोक 9 (shiva.vidyeshvara.3.9)

वाग्भिर्विनयगर्भाभिः सर्वे प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । त्वं हि सर्वजगद्धाता सर्वकारणकारणम्

vāgbhirvinayagarbhābhiḥ sarve prāṁjalayo 'bruvan tvaṁ hi sarvajagaddhātā sarvakāraṇakāraṇam

विनयपूर्ण वाणी से सब हाथ जोड़कर बोले — आप ही सम्पूर्ण जगत के धाता और समस्त कारणों के भी कारण हैं।

श्लोक 10 (shiva.vidyeshvara.3.10)

कः पुमान् सर्वतत्त्वेभ्यः पुराणः परतः परः । ब्रह्मोवाच । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह

kaḥ pumānsarvatattvebhyaḥ purāṇaḥ parataḥ paraḥ brahmovāca yato vāco nivartaṁte aprāpya manasā saha

समस्त तत्त्वों से भी परे और श्रेष्ठ वह पुरुष कौन है? — ब्रह्मा ने कहा — जिस तक वाणी मन के साथ भी न पहुँचकर लौट आती है,

श्लोक 11 (shiva.vidyeshvara.3.11)

यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम् । सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं सम्प्रसूयते

yasmātsarvamidaṁ brahmaviṣṇurudreṁdrapūrvakam sahabhūteṁdriyaiḥ sarvaiḥ prathamaṁ saṁprasūyate

जिससे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि, सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियों सहित, सबसे पहले उत्पन्न होते हैं,

श्लोक 12 (shiva.vidyeshvara.3.12)

एष देवो महादेवः सर्वज्ञो जगदीश्वरः । अयं तु परया भक्त्या दृश्यते नान्यथा क्वचित्

eṣa devo mahādevaḥ sarvajño jagadīśvaraḥ ayaṁ tu parayā bhaktyā dṛśyate nā 'nyathā kvacit

यही महादेव सर्वज्ञ और जगत के ईश्वर हैं; वे केवल परम भक्ति से ही देखे जाते हैं, अन्यथा कहीं नहीं।

श्लोक 13 (shiva.vidyeshvara.3.13)

रुद्रो हरिर्हरश्चैव तथान्ये च सुरेश्वराः । भक्त्या परमया तस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

rudro harirharaścaiva tathānye ca sureśvarāḥ bhaktyā paramayā tasya nityaṁ darśanakāṁkṣiṇaḥ

रुद्र, विष्णु और हर, तथा अन्य देवेश्वर भी — सब उनके दर्शन के लिए सदा परम भक्ति से आकांक्षा रखते हैं।

श्लोक 14 (shiva.vidyeshvara.3.14)

बहुनात्र किमुक्तेन शिवे भक्त्या विमुच्यते । प्रसादाद्देवताभक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः । यथेहाङ्कुरतो बीजं बीजतो वा यथाङ्कुरः

bahunātra kimuktena śive bhaktyā vimucyate prasādāddevatābhaktiḥ prasādo bhaktisaṁbhavaḥ yathehāṁkurato bījaṁ bījato vā yathāṁkuraḥ

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? भक्ति से ही मनुष्य शिव में मुक्त हो जाता है। कृपा से देवता के प्रति भक्ति होती है, और भक्ति से कृपा उत्पन्न होती है — जैसे यहाँ अंकुर से बीज और बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, वैसे ही यह चक्र चलता है।

श्लोक 15 (shiva.vidyeshvara.3.15)

तस्मादीशप्रसादार्थं यूयं गत्वा भुवं द्विजाः । दीर्घसत्रं समाकृध्वं यूयं वर्षसहस्रकम्

tasmādīśaprasādārthaṁ yūyaṁ gatvā bhuvaṁ dvijāḥ dīrghasatraṁ samākṛdhvaṁ yūyaṁ varṣasahasrakam

इसलिए, हे ब्राह्मणो! ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए तुम सब पृथ्वी पर जाकर एक सहस्र वर्षों तक दीर्घ यज्ञ-सत्र का आयोजन करो।

श्लोक 16 (shiva.vidyeshvara.3.16)

अमुष्यैवाध्वरेशस्य शिवस्यैव प्रसादतः । वेदोक्तविद्यासारं तु ज्ञायते साध्यसाधनम्

amuṣyaivādhvareśasya śivasyaiva prasādataḥ vedoktavidyāsāraṁ tu jñāyate sādhyasādhanaṁ

उस यज्ञ के स्वामी शिव की ही कृपा से वेदोक्त विद्या का सार — साध्य और साधन — जाना जा सकेगा।

श्लोक 17 (shiva.vidyeshvara.3.17)

मुनयः ऊचुः । अथ किं परमं साध्यं किं वा तत्साधनं परम् । साधकः कीदृशस्तत्र तदिदं ब्रूहि तत्त्वतः

munaya ūcuḥ atha kiṁ paramaṁ sādhyaṁ kiṁvā tatsādhanaṁ param sādhakaḥ kīdṛśastatra tadidaṁ brūhi tattvataḥ

मुनियों ने कहा — तब परम साध्य क्या है और उसका परम साधन क्या है? साधक कैसा होना चाहिए? यह हमें यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 18 (shiva.vidyeshvara.3.18)

ब्रह्मोवाच । साध्यं शिवपदप्राप्तिः साधनं तस्य सेवनम् । साधकस्तत्प्रसादाद्यो नित्यादिफलनिस्पृहः

brahmovāca sādhyaṁ śivapadaprāptiḥ sādhanaṁ tasya sevanam sādhakastatprasādādyo 'nityādiphalaniḥspṛhaḥ

ब्रह्मा ने कहा — साध्य है शिवपद की प्राप्ति, और उसका साधन है उनकी सेवा; साधक वह है जो उनकी कृपा से नित्य आदि फलों की इच्छा से रहित हो जाता है।

श्लोक 19 (shiva.vidyeshvara.3.19)

कर्म कृत्वा तु वेदोक्तं तदर्पितमहाफलम् । परमेशपदप्राप्तिः सालोक्यादिक्रमात्ततः

karma kṛtvā tu vedoktaṁ tadarpitamahāphalam parameśapadaprāptaḥ sālokyādikramāttataḥ

वेदोक्त कर्म को करके, उसे अर्पित कर, महाफल पाकर, क्रमशः सालोक्य आदि द्वारा परमेश्वर के पद को प्राप्त किया जाता है।

श्लोक 20 (shiva.vidyeshvara.3.20)

तत्तद्भक्त्यनुसारेण सर्वेषां परमं फलम् । तत्साधनं बहुविधं साक्षादीशेन बोधितम्

tattadbhaktyanusāreṇa sarveṣāṁ paramaṁ phalam tatsādhanaṁ bahuvidhaṁ sākṣādīśena bodhitam

जिस-जिस की जितनी भक्ति है, उसी के अनुसार सबको परम फल मिलता है; उसके साधन अनेक प्रकार के हैं, जो साक्षात् ईश्वर ने ही बताए हैं।

श्लोक 21 (shiva.vidyeshvara.3.21)

सङ्क्षिप्य तत्र वः सारं साधनं प्रब्रवीम्यहम् । श्रोत्रेण श्रवणं तस्य वचसा कीर्तनं तथा

saṁkṣipya tatra vaḥ sāraṁ sādhanaṁ prabravīmyaham śrotreṇa śravaṇaṁ tasya vacasā kīrtanaṁ tathā

उनमें से सार को संक्षेप में तुम्हें बताता हूँ — कान से उनका श्रवण करना, वाणी से उनका कीर्तन करना,

श्लोक 22 (shiva.vidyeshvara.3.22)

मनसा मननं तस्य महासाधनमुच्यते । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च मन्तव्यश्च महेश्वरः

manasā mananaṁ tasya mahāsādhanamucyate śrotavyaḥ kīrtitavyaśca mantavyaśca maheśvaraḥ

और मन से उनका मनन करना — यही महान साधन कहा गया है; महेश्वर श्रवण, कीर्तन और मनन के योग्य हैं।

श्लोक 23 (shiva.vidyeshvara.3.23)

इति श्रुतिः प्रमाणं नः साधनेनामुना परम् । साध्यं व्रजत सर्वार्थसाधनैकपरायणाः

iti śrutipramāṇaṁ naḥ sādhanenā 'munā param sādhyaṁ vrajata sarvārthasādhanaikaparāyaṇāḥ

यह श्रुति का ही प्रमाण है — हे सर्वार्थ-साधन में तत्पर लोगो! इसी साधन के द्वारा तुम परम साध्य को प्राप्त करो।

श्लोक 24 (shiva.vidyeshvara.3.24)

प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्ट्वा तत्र लोकः प्रवर्तते । अप्रत्यक्षं हि सर्वत्र ज्ञात्वा श्रोत्रेण चेष्टते

pratyakṣaṁ cakṣuṣā dṛṣṭvā tatra lokaḥ pravartate apratyakṣaṁ hi sarvatra jñātvā śrotreṇa ceṣṭate

आँख से प्रत्यक्ष देखकर ही संसार में लोग किसी कार्य में प्रवृत्त होते हैं; परोक्ष वस्तु के विषय में तो सर्वत्र कान से जानकर ही चेष्टा करते हैं।

श्लोक 25 (shiva.vidyeshvara.3.25)

तस्माच्छ्रवणमेवादौ श्रुत्वा गुरुमुखाद् बुधः । ततः संसाधयेदन्यत् कीर्तनं मननं सुधीः

tasmācchravaṇamevādau śrutvā gurumukhādbudhaḥ tataḥ saṁsādhayedanyatkīrtanaṁ mananaṁ sudhīḥ

इसलिए बुद्धिमान पुरुष को पहले गुरु के मुख से श्रवण करना चाहिए, फिर उसके बाद कीर्तन और मनन को सिद्ध करना चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.vidyeshvara.3.26)

क्रमान्मननपर्यन्ते साधनेऽस्मिन् सुसाधिते । शिवयोगो भवेत्तेन सालोक्यादिक्रमाच्छनैः

kramānmananaparyaṁte sādhane 'sminsusādhite śivayogo bhavettena sālokyādikramācchanaiḥ

इस प्रकार क्रमशः मनन तक यह साधन भलीभाँति सिद्ध होने पर, धीरे-धीरे सालोक्य आदि के क्रम से शिव-योग की प्राप्ति होती है।

श्लोक 27 (shiva.vidyeshvara.3.27)

सर्वाङ्गव्याधयः पश्चात् सर्वानन्दश्च लीयते । अभ्यासात् क्लेशमेतद् वै पश्चादाद्यन्तमङ्गलम्

sarvāṁgavyādhayaḥ paścātsarvānaṁdaśca līyate abhyāsātkleśametadvai paścādādyaṁtamaṁgalam

उसके बाद शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और परम आनन्द में लीन हो जाता है; निरंतर अभ्यास से यह क्लेश दूर होकर अंततः आदि और अंत के मंगल में स्थित हो जाता है।

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