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रुद्र संहिता · अध्याय 124

कुमार की अद्भुत लीला

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

श्लोक 1 (shiva.rudra.124.1)

ब्रह्मोवाच अथ तत्र स गाङ्गेयो दर्शयामास सूतिकाम् । तामेव शृणु सुप्रीत्या नारद त्वं स्वभक्तिदाम्

brahmovāca atha tatra sa gāṅgeyo darśayāmāsa sūtikām tāmeva śṛṇu suprītyā nārada tvaṁ svabhaktidām

ब्रह्मा जी ने कहा — तत्पश्चात् वहाँ उस गांगेय ने अपना एक अद्भुत चमत्कार दिखाया। हे नारद! अपने भक्तों को भक्ति प्रदान करने वाले उस चमत्कार को प्रेमपूर्वक सुनो।

श्लोक 2 (shiva.rudra.124.2)

द्विज एको नारदाख्य आजगाम तदैव हि । तत्राध्वरकरः श्रीमान् शरणार्थं गुहस्य वै

dvija eko nāradākhya ājagāma tadaiva hi tatrādhvarakaraḥ śrīmān śaraṇārthaṁ guhasya vai

उसी समय एक नारद नामक ब्राह्मण, जो यज्ञ करने वाला श्रीमान् था, गुह की शरण पाने के लिए वहाँ आया।

श्लोक 3 (shiva.rudra.124.3)

स विप्रः प्राप्य निकटं कार्त्तिकस्य प्रसन्नधीः । स्वाभिप्रायं समाचख्यौ सुप्रणम्य शुभैः स्तवैः

sa vipraḥ prāpya nikaṭaṁ kārttikasya prasannadhīḥ svābhiprāyaṁ samācakhyau supraṇamya śubhaiḥ stavaiḥ

वह विप्र प्रसन्नचित्त होकर कार्तिक के निकट पहुँचा, और शुभ स्तुतियों से भलीभाँति प्रणाम कर उसने अपना अभिप्राय बताया।

श्लोक 4 (shiva.rudra.124.4)

विप्र उवाच शृणु स्वामिन्वचो मेऽद्य कष्टं मे विनिवारय । सर्वब्रह्माण्डनाथस्त्वमतस्ते शरणं गतः

vipra uvāca śṛṇu svāminvaco me'dya kaṣṭaṁ me vinivāraya sarvabrahmāṇḍanāthastvamataste śaraṇaṁ gataḥ

विप्र ने कहा — हे स्वामिन्! आज मेरी बात सुनिए, मेरे कष्ट को दूर कीजिए। आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 5 (shiva.rudra.124.5)

अजमेधाध्वरं कर्तुमारम्भं कृतवानहम् । सोऽजो गतो गृहान्मे हि त्रोटयित्वा स्वबन्धनम्

ajamedhādhvaraṁ kartumārambhaṁ kṛtavānaham so'jo gato gṛhānme hi troṭayitvā svabandhanam

मैंने अजमेध यज्ञ करने का आरम्भ किया था; वह बकरा अपना बंधन तोड़कर मेरे घर से भाग गया है।

श्लोक 6 (shiva.rudra.124.6)

न जाने स गतः कुत्राऽन्वेषणं तत्कृतं बहु । न प्राप्तोऽतस्स बलवान् भङ्गो भवति मे क्रतोः

na jāne sa gataḥ kutrā'nveṣaṇaṁ tatkṛtaṁ bahu na prāpto'tassa balavān bhaṅgo bhavati me kratoḥ

मैं नहीं जानता वह कहाँ गया; मैंने उसकी बहुत खोज की, परन्तु वह नहीं मिला। इस कारण मेरे यज्ञ में विघ्न पड़ रहा है।

श्लोक 7 (shiva.rudra.124.7)

त्वयि नाथे सति विभो यज्ञभङ्गः कथं भवेत् । विचार्य्यैवाऽखिलेशान कामं पूर्णं कुरुष्व मे

tvayi nāthe sati vibho yajñabhaṅgaḥ kathaṁ bhavet vicāryyaivā'khileśāna kāmaṁ pūrṇaṁ kuruṣva me

हे विभो! आपके नाथ रहते हुए मेरा यज्ञ भला कैसे विघ्नित हो सकता है? हे अखिलेश! विचार करके मेरी कामना पूर्ण कीजिए।

श्लोक 8 (shiva.rudra.124.8)

त्वां विहाय शरण्यं कं यायां शिवसुत प्रभो । सर्वब्रह्माण्डनाथं हि सर्वामरसुसेवितम्

tvāṁ vihāya śaraṇyaṁ kaṁ yāyāṁ śivasuta prabho sarvabrahmāṇḍanāthaṁ hi sarvāmarasusevitam

हे शिवसुत प्रभो! आपको छोड़कर मैं किसकी शरण में जाऊँ — आप ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, जिनकी समस्त देवगण भलीभाँति सेवा करते हैं।

श्लोक 9 (shiva.rudra.124.9)

दीनबन्धुर्दयासिन्धुः सुसेव्यो भक्तवत्सलः । हरिब्रह्मादिदेवैश्च सुस्तुतः परमेश्वरः

dīnabandhurdayāsindhuḥ susevyo bhaktavatsalaḥ haribrahmādidevaiśca sustutaḥ parameśvaraḥ

आप दीनबन्धु, दयासिन्धु, सुसेव्य, भक्तवत्सल तथा हरि-ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा भलीभाँति स्तुत परमेश्वर हैं।

श्लोक 10 (shiva.rudra.124.10)

पार्वतीनन्दनस्स्कन्दः परमेकः परन्तपः । परमात्माऽत्मदः स्वामी सतां च शरणार्थिनाम्

pārvatīnandanasskandaḥ paramekaḥ parantapaḥ paramātmā'tmadaḥ svāmī satāṁ ca śaraṇārthinām

पार्वती के आनन्दस्वरूप स्कन्द, परम एक, शत्रुतापन, परमात्मा, आत्मदाता, सज्जनों तथा शरणार्थियों के स्वामी हैं।

श्लोक 11 (shiva.rudra.124.11)

दीनानाथ महेश शङ्करसुत त्रैलोक्यनाथ प्रभो मायाधीश समागतोऽस्मि शरणं मां पाहि विप्रप्रिय । त्वं सर्वप्रभुरानताऽखिलविदब्रह्मादिदेवैः स्तुतः त्वं मायाकृतिरात्मभक्तसुखदो रक्षापरो मायिकः

dīnānātha maheśa śaṅkarasuta trailokyanātha prabho māyādhīśa samāgato'smi śaraṇaṁ māṁ pāhi viprapriya tvaṁ sarvaprabhurānatā'khilavidabrahmādidevaiḥ stutaḥ tvaṁ māyākṛtirātmabhaktasukhado rakṣāparo māyikaḥ

हे दीनानाथ! हे महेश! हे शंकरसुत! हे त्रैलोक्यनाथ प्रभो! हे मायाधीश! मैं शरण में आया हूँ, हे विप्रप्रिय! मेरी रक्षा कीजिए। आप सर्वप्रभु हैं, ब्रह्मा आदि सर्वज्ञ देवगण आपको नमन करते हुए आपकी स्तुति करते हैं; आप माया के रचयिता, अपने भक्तों को सुख देने वाले, रक्षा में तत्पर तथा मायावी हैं।

श्लोक 12 (shiva.rudra.124.12)

भक्तप्राणगुणाकरस्त्रिगुणतो भिन्नोऽसि शम्भुप्रियः शम्भुः शम्भुसुतः प्रसन्नसुखदः सच्चित्स्वरूपो महान् । सर्वज्ञस्त्रिपुरघ्नशङ्करसुतः सत्प्रेमवश्यःसदा षड्वक्त्रः प्रियसाधुरानतप्रियः सर्वेश्वरः शङ्करः । साधुद्रोहकरघ्न शङ्करगुरो ब्रह्माण्डनाथो प्रभुः सर्वेषाममरादिसेवितपदो मां पाहि सेवाप्रिय

bhaktaprāṇaguṇākarastriguṇato bhinno'si śambhupriyaḥ śambhuḥ śambhusutaḥ prasannasukhadaḥ saccitsvarūpo mahān sarvajñastripuraghnaśaṅkarasutaḥ satpremavaśyaḥsadā ṣaḍvaktraḥ priyasādhurānatapriyaḥ sarveśvaraḥ śaṅkaraḥ sādhudrohakaraghna śaṅkaraguro brahmāṇḍanātho prabhuḥ sarveṣāmamarādisevitapado māṁ pāhi sevāpriya

आप भक्तों के प्राण तथा गुणों की खान हैं, त्रिगुणों से भिन्न, शम्भु के प्रिय हैं; आप स्वयं शम्भु, शम्भु-पुत्र, सुख देने वाले, सच्चिदानन्द-स्वरूप महान हैं; सर्वज्ञ, त्रिपुर-नाशक शंकर के पुत्र, सदा सत्प्रेम के वशीभूत, षड्मुख, सज्जनों के प्रिय, नमन करने वालों के प्रिय, सर्वेश्वर शंकर हैं; हे साधुद्रोहियों के नाशक! हे शंकर के भी गुरु! हे ब्रह्माण्डनाथ प्रभो! हे समस्त देवताओं द्वारा सेवित चरणों वाले! हे सेवाप्रिय! मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 13 (shiva.rudra.124.13)

वैरिभयङ्कर शङ्कर जनशरणस्य वन्दे तव पदपद्मं सुखकरणस्य । विज्ञप्तिं मम कर्णे स्कन्द निधेहि निजभक्तिं जनचेतसि सदा विधेहि

vairibhayaṅkara śaṅkara janaśaraṇasya vande tava padapadmaṁ sukhakaraṇasya vijñaptiṁ mama karṇe skanda nidhehi nijabhaktiṁ janacetasi sadā vidhehi

हे शत्रुओं के लिए भयंकर! हे जनशरण्य! हे सुखकारक शंकर! मैं आपके चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। हे स्कन्द! मेरी विनती को अपने कान में धारण कीजिए, और अपनी भक्ति सदा जनमानस में स्थापित कीजिए।

श्लोक 14 (shiva.rudra.124.14)

करोति किं तस्य बली विपक्षो दक्षोऽपि पक्षोभयपार्श्वगुप्तः । किं तक्षकोऽप्यामिषभक्षको वा त्वं रक्षको यस्य सदक्षमानः

karoti kiṁ tasya balī vipakṣo dakṣo'pi pakṣobhayapārśvaguptaḥ kiṁ takṣako'pyāmiṣabhakṣako vā tvaṁ rakṣako yasya sadakṣamānaḥ

जिसका रक्षक सदा समर्थ आप हैं, उसका कोई बलवान शत्रु क्या कर सकता है, चाहे वह दोनों पार्श्वों से सुरक्षित निपुण ही क्यों न हो? तक्षक नाग अथवा मांसभक्षी पशु भी उसका क्या बिगाड़ सकते हैं?

श्लोक 15 (shiva.rudra.124.15)

विबुधगुरुरपि त्वां स्तोतुमीशो न हि स्यात् कथय कथमहं स्यां मन्दबुद्धिर्वरार्च्यः । शुचिरशुचिरनार्यो यादृशस्तादृशो वा पदकमलपरागं स्कन्द ते प्रार्थयामि

vibudhagururapi tvāṁ stotumīśo na hi syāt kathaya kathamahaṁ syāṁ mandabuddhirvarārcyaḥ śuciraśuciranāryo yādṛśastādṛśo vā padakamalaparāgaṁ skanda te prārthayāmi

जब देवगुरु बृहस्पति भी आपकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हो सकते, तो बताइए, मैं मन्दबुद्धि आपकी पूजा के योग्य कैसे हो सकता हूँ? हे स्कन्द! शुद्ध हूँ या अशुद्ध, आर्य हूँ या अनार्य, जैसा भी हूँ, मैं तो केवल आपके चरणकमलों की रज की प्रार्थना करता हूँ।

श्लोक 16 (shiva.rudra.124.16)

हे सर्वेश्वर भक्तवत्सल कृपा-सिन्धो त्वदीयोऽस्म्यहं भृत्यः स्वस्य न सेवकस्य गणप-स्यागःशतं सत्प्रभो । भक्तिं क्वापि कृतां मनागपि विभो जानासि भृत्यार्तिहा त्वत्तो नास्त्यपरोऽविता न भगवन् मत्तो नरः पामरः

he sarveśvara bhaktavatsala kṛpā-sindho tvadīyo'smyahaṁ bhṛtyaḥ svasya na sevakasya gaṇapa-syāgaḥśataṁ satprabho bhaktiṁ kvāpi kṛtāṁ manāgapi vibho jānāsi bhṛtyārtihā tvatto nāstyaparo'vitā na bhagavan matto naraḥ pāmaraḥ

हे सर्वेश्वर! हे भक्तवत्सल! हे कृपासिन्धो! मैं आपका ही हूँ — आपका सेवक हूँ, किसी सेवक का सेवक नहीं। हे सत्प्रभो! अपने गणपति के सैकड़ों दोष भी क्षम्य हैं। हे विभो! हे भृत्यों की पीड़ा हरने वाले! आप जानते हैं कि मैंने कहीं भी थोड़ी-सी भी भक्ति की है। आपके सिवा कोई अन्य रक्षक नहीं है, और हे भगवन्! मुझसे बढ़कर कोई दीन-हीन मनुष्य नहीं है।

श्लोक 17 (shiva.rudra.124.17)

कल्याणकर्त्ता कलिकल्मषघ्नः कुबेरबन्धुः करुणार्द्रचित्तः । त्रिषट्कनेत्रो रसवक्त्रशोभी यज्ञं प्रपूर्णं कुरु मे गुह त्वम्

kalyāṇakarttā kalikalmaṣaghnaḥ kuberabandhuḥ karuṇārdracittaḥ triṣaṭkanetro rasavaktraśobhī yajñaṁ prapūrṇaṁ kuru me guha tvam

हे कल्याणकर्ता! हे कलिकल्मषनाशक! हे कुबेरबन्धु! हे करुणार्द्रचित्त! हे अठारह नेत्रों वाले, रसमय शोभायमान मुख वाले गुह! मेरे यज्ञ को पूर्ण कीजिए।

श्लोक 18 (shiva.rudra.124.18)

रक्षकस्त्वं त्रिलोकस्य शरणागतवत्सलः । यज्ञकर्त्ता यज्ञभर्त्ता हरसे विघ्नकारिणाम्

rakṣakastvaṁ trilokasya śaraṇāgatavatsalaḥ yajñakarttā yajñabharttā harase vighnakāriṇām

आप तीनों लोकों के रक्षक, शरणागतवत्सल, यज्ञकर्ता तथा यज्ञभर्ता हैं; आप विघ्न करने वालों के विघ्नों को हर लेते हैं।

श्लोक 19 (shiva.rudra.124.19)

विघ्नवारण साधूनां सर्ग कारण सर्वतः । पूर्णं कुरु ममेशान सुतयज्ञ नमोस्तु ते

vighnavāraṇa sādhūnāṁ sarga kāraṇa sarvataḥ pūrṇaṁ kuru mameśāna sutayajña namostu te

हे साधुओं के विघ्नों को दूर करने वाले! हे सब प्रकार से सृष्टि के कारण! हे ईशान! मेरे यज्ञ को पूर्ण कीजिए। हे सुत! आपको नमस्कार है।

श्लोक 20 (shiva.rudra.124.20)

सर्वत्राता स्कन्द हि त्वं सर्वज्ञाता त्वमेव हि । सर्वेश्वरस्त्वमीशानो निवेशसकलाऽवनः

sarvatrātā skanda hi tvaṁ sarvajñātā tvameva hi sarveśvarastvamīśāno niveśasakalā'vanaḥ

हे स्कन्द! आप ही सबके रक्षक हैं, आप ही सबके ज्ञाता हैं। आप सर्वेश्वर, ईशान तथा सम्पूर्ण सृष्टि के रक्षक हैं।

श्लोक 21 (shiva.rudra.124.21)

सङ्गीतज्ञस्त्वमेवासि वेदविज्ञः परः प्रभुः । सर्वस्थाता विधाता त्वं देवदेवः सतां गतिः

saṅgītajñastvamevāsi vedavijñaḥ paraḥ prabhuḥ sarvasthātā vidhātā tvaṁ devadevaḥ satāṁ gatiḥ

आप ही संगीतज्ञ, वेदविज्ञ, परम प्रभु हैं; आप सबके स्थाता, विधाता, देवदेव तथा सज्जनों की गति हैं।

श्लोक 22 (shiva.rudra.124.22)

भवानीनन्दनः शम्भुतनयो वयुनः स्वराट् । ध्याता ध्येयः पितॄणां हि पिता योनिः सदात्मनाम्

bhavānīnandanaḥ śambhutanayo vayunaḥ svarāṭ dhyātā dhyeyaḥ pitṝṇāṁ hi pitā yoniḥ sadātmanām

भवानी के आनन्दस्वरूप, शम्भु के पुत्र, ज्ञानी, स्वराट्; ध्याता और ध्येय दोनों; पितरों के भी पिता, तथा सनातन आत्माओं के उद्गम-स्रोत हैं आप।

श्लोक 23 (shiva.rudra.124.23)

ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य देवसम्राट् शिवात्मजः । स्वगणं वीरबाह्वाख्यं प्रेषयामास तत्कृते

brahmovāca ityākarṇya vacastasya devasamrāṭ śivātmajaḥ svagaṇaṁ vīrabāhvākhyaṁ preṣayāmāsa tatkṛte

ब्रह्मा जी ने कहा — उसके इन वचनों को सुनकर देवसम्राट् शिवपुत्र ने इस कार्य के लिए वीरबाहु नामक अपने गण को भेजा।

श्लोक 24 (shiva.rudra.124.24)

तदाज्ञया वीरबाहुस्तदन्वेषणहेतवे । प्रणम्य स्वामिनं भक्त्या महावीरो द्रुतं ययौ

tadājñayā vīrabāhustadanveṣaṇahetave praṇamya svāminaṁ bhaktyā mahāvīro drutaṁ yayau

उस आज्ञा से महावीर वीरबाहु भक्तिपूर्वक अपने स्वामी को प्रणाम कर उस बकरे की खोज के लिए शीघ्र चल पड़ा।

श्लोक 25 (shiva.rudra.124.25)

अन्वेषणं चकारासौ सर्वब्रह्माण्डगोलके । न प्राप तमजं कुत्र शुश्राव तदुपद्रवम्

anveṣaṇaṁ cakārāsau sarvabrahmāṇḍagolake na prāpa tamajaṁ kutra śuśrāva tadupadravam

उसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-गोलक में उस बकरे की खोज की, किन्तु वह कहीं नहीं मिला; अन्ततः उसने उसके उत्पात के विषय में सुना।

श्लोक 26 (shiva.rudra.124.26)

जगामाऽथ स वैकुण्ठं तत्राऽजं प्रददर्श तम् । उपद्रवं प्रकुर्वन्तं गलयूपं महाबलम्

jagāmā'tha sa vaikuṇṭhaṁ tatrā'jaṁ pradadarśa tam upadravaṁ prakurvantaṁ galayūpaṁ mahābalam

तब वह वैकुण्ठ गया, और वहाँ उसने उस महाबली बकरे को गलयूप सहित उत्पात मचाते हुए देखा।

श्लोक 27 (shiva.rudra.124.27)

धृत्वा तं शृङ्गयोर्वीरो धर्षयित्वातिवेगतः । आनिनाय स्वामिपुरो विकुर्वन्तं रवं बहु

dhṛtvā taṁ śṛṅgayorvīro dharṣayitvātivegataḥ ānināya svāmipuro vikurvantaṁ ravaṁ bahu

उस वीर ने उसके सींगों को पकड़कर, अत्यंत वेग से उसे वश में करके, तेज-तेज रँभाते हुए उसे अपने स्वामी के सम्मुख ले आया।

श्लोक 28 (shiva.rudra.124.28)

दृष्ट्वा तं कार्त्तिकस्सोऽरमारुरोह स तं प्रभुः । धृतब्रह्माण्डगरिमा महासूतिकरो गुहः

dṛṣṭvā taṁ kārttikasso'ramāruroha sa taṁ prabhuḥ dhṛtabrahmāṇḍagarimā mahāsūtikaro guhaḥ

उसे देखकर ब्रह्माण्ड का भार धारण करने वाले, महान चमत्कार करने वाले प्रभु कार्तिक गुह उस पर आरूढ़ हो गए।

श्लोक 29 (shiva.rudra.124.29)

मुहूर्तमात्रतस्सोऽजो ब्रह्माण्डं सकलं मुने । बभ्राम श्रम एवाशु पुनस्तत्स्थानमागतः

muhūrtamātratasso'jo brahmāṇḍaṁ sakalaṁ mune babhrāma śrama evāśu punastatsthānamāgataḥ

हे मुने! क्षणमात्र में ही वह बकरा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में घूम आया, और फिर श्रमित होकर शीघ्र ही अपने स्थान पर वापस आ गया।

श्लोक 30 (shiva.rudra.124.30)

तत उत्तीर्य स स्वामी समुवास स्वमासनम् । सोऽजः स्थितस्तु तत्रैव स नारद उवाच तम्

tata uttīrya sa svāmī samuvāsa svamāsanam so'jaḥ sthitastu tatraiva sa nārada uvāca tam

तत्पश्चात् उतरकर वह स्वामी अपने आसन पर विराजमान हो गए; वह बकरा वहीं खड़ा रहा, और उस नारद ने उनसे कहा।

श्लोक 31 (shiva.rudra.124.31)

नारद उवाच नमस्ते देव देवेश देहि मेऽजं कृपानिधे । कुर्यामध्वरमानन्दात्सखायं कुरु मामहो

nārada uvāca namaste deva deveśa dehi me'jaṁ kṛpānidhe kuryāmadhvaramānandātsakhāyaṁ kuru māmaho

नारद ने कहा — हे देव! हे देवेश! आपको नमस्कार है। हे कृपानिधे! मुझे मेरा बकरा दे दीजिए, जिससे मैं आनन्दपूर्वक यज्ञ सम्पन्न कर सकूँ। हे अद्भुत प्रभो! मुझे अपना सखा बनाइए।

श्लोक 32 (shiva.rudra.124.32)

कार्त्तिक उवाच वधयोग्यो न विप्राऽजः स्वगृहं गच्छ नारद । पूर्णोऽस्तु तेऽध्वरः सर्वः प्रसादादेव मे कृतः

kārttika uvāca vadhayogyo na viprā'jaḥ svagṛhaṁ gaccha nārada pūrṇo'stu te'dhvaraḥ sarvaḥ prasādādeva me kṛtaḥ

कार्तिक ने कहा — हे विप्र! यह बकरा वध के योग्य नहीं है; हे नारद! अपने घर लौट जाओ। मेरी कृपा से ही तुम्हारा यह सम्पूर्ण यज्ञ पूर्ण हो गया समझो।

श्लोक 33 (shiva.rudra.124.33)

ब्रह्मोवाच इत्याकर्ण्य द्विजःस्वामी वचनं प्रीतमानसः । जगाम स्वालयं दत्त्वा तस्मा आशिषमुत्तमाम्

brahmovāca ityākarṇya dvijaḥsvāmī vacanaṁ prītamānasaḥ jagāma svālayaṁ dattvā tasmā āśiṣamuttamām

ब्रह्मा जी ने कहा — स्वामी के इन वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण प्रसन्नचित्त होकर, उनसे उत्तम आशीर्वाद पाकर अपने घर को चला गया।

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