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रुद्र संहिता · अध्याय 126

देव-दैत्य युद्ध का वर्णन

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

श्लोक 1 (shiva.rudra.126.1)

ब्रह्मोवाच इति ते वर्णितस्तात देवदानव सेनयोः । सङ्ग्रामस्तुमुलोऽतीव तत्प्रभ्वोः शृणु नारद

brahmovāca iti te varṇitastāta devadānava senayoḥ saṅgrāmastumulo'tīva tatprabhvoḥ śṛṇu nārada

ब्रह्मा जी ने कहा — हे तात! इस प्रकार देव-दानव सेनाओं का अत्यंत तुमुल संग्राम तुम्हें बताया; अब हे नारद! उन दोनों स्वामियों के युद्ध को सुनो।

श्लोक 2 (shiva.rudra.126.2)

एवं युद्धेऽतितुमुले देवदानवसङ्क्षये । तारकेणैव देवेन्द्रः शक्त्या परमया सह

evaṁ yuddhe'titumule devadānavasaṅkṣaye tārakeṇaiva devendraḥ śaktyā paramayā saha

इस अत्यंत तुमुल युद्ध में, देव-दानवों के संहार के बीच, देवेन्द्र स्वयं तारक द्वारा उसकी परम शक्ति से आहत होकर —

श्लोक 3 (shiva.rudra.126.3)

सद्यः पपात नागाश्च धरण्यां मूर्च्छितोऽभवत् । परं कश्मलमापेदे वज्रधारी सुरेश्वरः

sadyaḥ papāta nāgāśca dharaṇyāṁ mūrcchito'bhavat paraṁ kaśmalamāpede vajradhārī sureśvaraḥ

तत्काल अपने गज सहित पृथ्वी पर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गए; वज्रधारी सुरेश्वर परम विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 4 (shiva.rudra.126.4)

तथैव लोकपाः सर्वेऽसुरैश्च बलवत्तरैः । पराजिता रणे तात महारणविशारदैः

tathaiva lokapāḥ sarve'suraiśca balavattaraiḥ parājitā raṇe tāta mahāraṇaviśāradaiḥ

उसी प्रकार हे तात! समस्त लोकपाल भी उन महारण में निपुण अत्यंत बलवान असुरों द्वारा युद्ध में पराजित हो गए।

श्लोक 5 (shiva.rudra.126.5)

अन्येऽपि निर्जरा दैत्यैर्युद्ध्यमानाः पराजिताः । असहन्तो हि तत्तेजः पलायनपरायणाः

anye'pi nirjarā daityairyuddhyamānāḥ parājitāḥ asahanto hi tattejaḥ palāyanaparāyaṇāḥ

अन्य देवगण भी दैत्यों से युद्ध करते हुए पराजित हो गए, और उनके उस तेज को सहन न कर पाने के कारण भागने में ही तत्पर हो गए।

श्लोक 6 (shiva.rudra.126.6)

जगर्जुरसुरास्तत्र जयिनः सुकृतोद्यमाः । सिंहनादं प्रकुर्वन्तः कोलाहलपरायणाः

jagarjurasurāstatra jayinaḥ sukṛtodyamāḥ siṁhanādaṁ prakurvantaḥ kolāhalaparāyaṇāḥ

वहाँ विजयी असुर, जिनका पुरुषार्थ सफल हुआ था, सिंहनाद करते हुए तथा कोलाहल मचाते हुए गरजने लगे।

श्लोक 7 (shiva.rudra.126.7)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वीरभद्रो रुषान्वितः । आससाद गणैर्वीरैस्तारकं वीरमानिनम्

etasminnantare tatra vīrabhadro ruṣānvitaḥ āsasāda gaṇairvīraistārakaṁ vīramāninam

इसी बीच वहाँ क्रोध से भरे वीरभद्र ने अपने वीर गणों सहित, अपनी वीरता पर गर्व करने वाले तारक का सामना किया।

श्लोक 8 (shiva.rudra.126.8)

निर्जरान् पृष्ठतः कृत्वा शिवकोपोद्भवो बली । तत्सम्मुखो बभूवाथ योद्धुकामो गणाग्रणीः

nirjarān pṛṣṭhataḥ kṛtvā śivakopodbhavo balī tatsammukho babhūvātha yoddhukāmo gaṇāgraṇīḥ

देवताओं को पीछे करके, शिव के क्रोध से उत्पन्न वह बलवान गणाग्रणी उसके सम्मुख युद्ध की इच्छा से खड़ा हो गया।

श्लोक 9 (shiva.rudra.126.9)

तदा ते प्रमथाः सर्वे दैत्याश्च परमोत्सवाः । युयुधुः संयुगेऽन्योन्यं प्रसक्ताश्च महारणे

tadā te pramathāḥ sarve daityāśca paramotsavāḥ yuyudhuḥ saṁyuge'nyonyaṁ prasaktāśca mahāraṇe

तब वे समस्त प्रमथगण तथा दैत्यगण अत्यंत उत्साहित होकर उस महासंग्राम में परस्पर संलग्न होकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 10 (shiva.rudra.126.10)

त्रिशूलैरृष्टिभिः पाशैः खड्गैः परशुपट्टिशैः । निजघ्नुःसमरेऽन्योऽन्यं रणे रणविशारदाः

triśūlairṛṣṭibhiḥ pāśaiḥ khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ nijaghnuḥsamare'nyo'nyaṁ raṇe raṇaviśāradāḥ

त्रिशूलों, ऋष्टियों, पाशों, खड्गों, परशुओं तथा पट्टिशों से रणकुशल योद्धा युद्ध में एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 11 (shiva.rudra.126.11)

तारको वीरभद्रेण स त्रिशूलाहतो भृशम् । पपात सहसा भूमौ क्षणं मूर्छापरिप्लुतः

tārako vīrabhadreṇa sa triśūlāhato bhṛśam papāta sahasā bhūmau kṣaṇaṁ mūrchāpariplutaḥ

वीरभद्र के त्रिशूल से गहरा आहत हुआ तारक सहसा भूमि पर गिर पड़ा और क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 12 (shiva.rudra.126.12)

उत्थाय स द्रुतं वीरस्तारको दैत्यसत्तमः । लब्धसंज्ञो बलाच्छक्त्या वीरभद्रं जघान ह

utthāya sa drutaṁ vīrastārako daityasattamaḥ labdhasaṁjño balācchaktyā vīrabhadraṁ jaghāna ha

वीर तारक, जो दैत्यों में श्रेष्ठ था, शीघ्र उठ खड़ा हुआ; चेतना पाकर उसने अपनी शक्ति से बलपूर्वक वीरभद्र पर प्रहार किया।

श्लोक 13 (shiva.rudra.126.13)

वीरभद्रस्तथा वीरो महातेजा हि तारकम् । जघान त्रिशिखेनाशु घोरेण निशितेन तम्

vīrabhadrastathā vīro mahātejā hi tārakam jaghāna triśikhenāśu ghoreṇa niśitena tam

उसी प्रकार महातेजस्वी वीर वीरभद्र ने भी अपने भयंकर, तीक्ष्ण त्रिशूल से तत्काल तारक पर प्रहार किया।

श्लोक 14 (shiva.rudra.126.14)

सोऽपि शक्त्या वीरभद्रं जघान समरे ततः । तारको दितिजाधीशः प्रबलो वीरसम्मतः

so'pi śaktyā vīrabhadraṁ jaghāna samare tataḥ tārako ditijādhīśaḥ prabalo vīrasammataḥ

तत्पश्चात् दैत्याधीश, बलवान तथा वीरों में सम्मानित तारक ने भी अपनी शक्ति से युद्ध में वीरभद्र पर प्रहार किया।

श्लोक 15 (shiva.rudra.126.15)

एवं संयुद्ध्यमानौ तौ जघ्नतुश्चेतरेतरम् । नानास्त्रशस्त्रैः समरे रणविद्याविशारदौ

evaṁ saṁyuddhyamānau tau jaghnatuścetaretaram nānāstraśastraiḥ samare raṇavidyāviśāradau

इस प्रकार युद्धरत वे दोनों, जो युद्ध-विद्या में निपुण थे, समर में नाना अस्त्र-शस्त्रों से परस्पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 16 (shiva.rudra.126.16)

तयोर्महात्मनोस्तत्र द्वन्द्वयुद्धमभूत्तदा । सर्वेषां पश्यतामेव तुमुलं रोमहर्षणम्

tayormahātmanostatra dvandvayuddhamabhūttadā sarveṣāṁ paśyatāmeva tumulaṁ romaharṣaṇam

उन दोनों महात्माओं के बीच वहाँ एक अत्यंत तुमुल, रोमांचकारी द्वन्द्वयुद्ध हुआ, जिसे सभी देख रहे थे।

श्लोक 17 (shiva.rudra.126.17)

ततो भेरीमृदङ्गाश्च पटहानकगोमुखाः । विनेदुर्विहता वीरैः शृण्वतां सुभयानकाः

tato bherīmṛdaṅgāśca paṭahānakagomukhāḥ vinedurvihatā vīraiḥ śṛṇvatāṁ subhayānakāḥ

तब भेरी, मृदंग, पटह, आनक तथा गोमुख वाद्य वीरों द्वारा बजाए जाकर सुनने वालों के लिए अत्यंत भयंकर स्वर में बज उठे।

श्लोक 18 (shiva.rudra.126.18)

युयुधातेतिसन्नद्धौ प्रहारैर्जर्जरीकृतौ । अन्योऽन्यमतिसंरब्धौ तौ बुधाङ्गारकाविव

yuyudhātetisannaddhau prahārairjarjarīkṛtau anyo'nyamatisaṁrabdhau tau budhāṅgārakāviva

पूर्णतः कवचबद्ध वे दोनों एक-दूसरे के प्रहारों से जर्जरित होते हुए, अत्यंत क्रुद्ध होकर, मानो बुध और मंगल के समान परस्पर युद्धरत रहे।

श्लोक 19 (shiva.rudra.126.19)

एवं दृष्ट्वा तदा युद्धं वीरभद्रस्य तेन च । तत्र गत्वा वीरभद्रमवोचस्त्वं शिवप्रियः

evaṁ dṛṣṭvā tadā yuddhaṁ vīrabhadrasya tena ca tatra gatvā vīrabhadramavocastvaṁ śivapriyaḥ

वीरभद्र के उस युद्ध को देखकर, हे शिवप्रिय (नारद)! तुम वहाँ जाकर वीरभद्र से बोले।

श्लोक 20 (shiva.rudra.126.20)

नारद उवाच वीरभद्र महावीर गणानामग्रणीर्भवान् । निवर्तस्व रणादस्माद्रोचते न वधस्त्वया

nārada uvāca vīrabhadra mahāvīra gaṇānāmagraṇīrbhavān nivartasva raṇādasmādrocate na vadhastvayā

नारद ने कहा — हे वीरभद्र! हे महावीर! तुम गणों के अग्रणी हो। इस युद्ध से निवृत्त हो जाओ, तुम्हारे द्वारा किया गया यह वध मुझे रुचिकर नहीं लगता।

श्लोक 21 (shiva.rudra.126.21)

एवं निशम्य त्वद्वाक्यं वीरभद्रो गणाग्रणीः । अवदत्स रुषाविष्टस्त्वां तदा तु कृताञ्जलिः

evaṁ niśamya tvadvākyaṁ vīrabhadro gaṇāgraṇīḥ avadatsa ruṣāviṣṭastvāṁ tadā tu kṛtāñjaliḥ

तुम्हारे इन वचनों को सुनकर क्रोध से भरे गणाग्रणी वीरभद्र ने तब हाथ जोड़कर तुमसे कहा।

श्लोक 22 (shiva.rudra.126.22)

वीरभद्र उवाच मुनिवर्य महाप्राज्ञ शृणु मे परमं वचः । तारकं च वधिष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्

vīrabhadra uvāca munivarya mahāprājña śṛṇu me paramaṁ vacaḥ tārakaṁ ca vadhiṣyāmi paśya me'dya parākramam

वीरभद्र ने कहा — हे मुनिवर! हे महाप्राज्ञ! मेरा यह अंतिम वचन सुनिए। मैं तारक का वध करूँगा — आज मेरा पराक्रम देखिए।

श्लोक 23 (shiva.rudra.126.23)

आनयन्ति च ये वीराःस्वामिनं रणसंसदि । ते पापिनो महाक्लीबा विनश्यन्ति रणं गताः

ānayanti ca ye vīrāḥsvāminaṁ raṇasaṁsadi te pāpino mahāklībā vinaśyanti raṇaṁ gatāḥ

जो वीर अपने स्वामी को ही रणभूमि में आगे कर देते हैं, वे पापी तथा महाक्लीब युद्ध में जाकर नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 24 (shiva.rudra.126.24)

असद्गतिं प्राप्नुवन्ति तेषां च निरयो ध्रुवम् । वीरभद्रो हि विज्ञेयो न वाच्यस्ते कदाचन

asadgatiṁ prāpnuvanti teṣāṁ ca nirayo dhruvam vīrabhadro hi vijñeyo na vācyaste kadācana

उन्हें अशुभ गति प्राप्त होती है और निश्चय ही नरक मिलता है। वीरभद्र को ऐसा मत समझिए — मुझे कभी ऐसा कहा नहीं जाना चाहिए।

श्लोक 25 (shiva.rudra.126.25)

शस्त्रास्त्रैर्भिन्नगात्रा ये रणं कुर्वन्ति निर्भयाः । इहामुत्र प्रशंस्यास्ते लभन्ते सुखमद्भुतम्

śastrāstrairbhinnagātrā ye raṇaṁ kurvanti nirbhayāḥ ihāmutra praśaṁsyāste labhante sukhamadbhutam

जो निर्भय होकर शस्त्रास्त्रों से विदीर्ण अंग होकर भी युद्ध करते हैं, वे इस लोक और परलोक दोनों में प्रशंसनीय होते हैं और अद्भुत सुख प्राप्त करते हैं।

श्लोक 26 (shiva.rudra.126.26)

शृण्वन्तु मम वाक्यानि देवा हरिपुरोगमाः । अतारकां महीमद्य करिष्ये स्वामिवर्जितः

śṛṇvantu mama vākyāni devā haripurogamāḥ atārakāṁ mahīmadya kariṣye svāmivarjitaḥ

हरि आदि देवगण मेरी बात सुनें — मैं आज स्वामी की आज्ञा के बिना भी इस पृथ्वी को तारक से रहित कर दूँगा।

श्लोक 27 (shiva.rudra.126.27)

इत्युक्त्वा प्रमर्थैस्सार्द्धं वीरभद्रो हि शूलधृक् । विचिन्त्य मनसा शम्भुं युयुधे तारकेण हि

ityuktvā pramarthaissārddhaṁ vīrabhadro hi śūladhṛk vicintya manasā śambhuṁ yuyudhe tārakeṇa hi

यह कहकर शूलधारी वीरभद्र प्रमथगणों सहित, मन में शम्भु का स्मरण करते हुए, तारक से युद्ध करने लगे।

श्लोक 28 (shiva.rudra.126.28)

वृषारूढैरनेकैश्च त्रिशूलवरधारिभिः । महावीरैः त्रिनेत्रैश्च स रेजे रणसङ्गतः

vṛṣārūḍhairanekaiśca triśūlavaradhāribhiḥ mahāvīraiḥ trinetraiśca sa reje raṇasaṅgataḥ

बैलों पर आरूढ़, उत्तम त्रिशूलधारी, त्रिनेत्र महावीरों से घिरे हुए वे युद्ध में संलग्न होकर अत्यंत शोभायमान हुए।

श्लोक 29 (shiva.rudra.126.29)

कोलाहलं प्रकुर्वन्तो निर्भयाः शतशो गणाः । वीरभद्रं पुरस्कृत्य युयुधुर्दानवैः सह

kolāhalaṁ prakurvanto nirbhayāḥ śataśo gaṇāḥ vīrabhadraṁ puraskṛtya yuyudhurdānavaiḥ saha

कोलाहल मचाते हुए निर्भय होकर सैकड़ों गण वीरभद्र को आगे कर दानवों के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 30 (shiva.rudra.126.30)

असुरास्तेऽपि युयुधुः तारकासुरजीविनः । बलोत्कटा महावीरा मर्दयन्तो गणान् रुषा

asurāste'pi yuyudhuḥ tārakāsurajīvinaḥ balotkaṭā mahāvīrā mardayanto gaṇān ruṣā

तारकासुर के बल पर जीवित उन असुरों ने भी युद्ध किया; बलोत्कट महावीर क्रोधपूर्वक गणों को कुचलते रहे।

श्लोक 31 (shiva.rudra.126.31)

पुनः पुनश्चैव बभूव सङ्गरो महोत्कटो दैत्यवरैर्गणानाम् । प्रहर्षमाणाः परमास्त्रकोविदाः तदा गणास्ते जयिनो बभूवुः

punaḥ punaścaiva babhūva saṅgaro mahotkaṭo daityavarairgaṇānām praharṣamāṇāḥ paramāstrakovidāḥ tadā gaṇāste jayino babhūvuḥ

बार-बार गणों तथा श्रेष्ठ दैत्यों के बीच अत्यंत उग्र संग्राम होता रहा; तब परम अस्त्रों में निपुण वे गण अत्यंत हर्षित होकर विजयी हुए।

श्लोक 32 (shiva.rudra.126.32)

गणैर्जितास्ते प्रबलैरसुरा विमुखा रणे । पलायनपरा जाता व्यथिता व्यग्रमानसाः

gaṇairjitāste prabalairasurā vimukhā raṇe palāyanaparā jātā vyathitā vyagramānasāḥ

उन प्रबल गणों से पराजित असुर रणभूमि में पीठ दिखाकर व्यथित तथा व्याकुल-मन होकर भागने लगे।

श्लोक 33 (shiva.rudra.126.33)

एवं भ्रष्टं स्वसैन्यं तद् दृष्ट्वा तत्पालकोऽसुरः । तारको हि रुषाविष्टो हन्तुं देवगणान् ययौ

evaṁ bhraṣṭaṁ svasainyaṁ tad dṛṣṭvā tatpālako'suraḥ tārako hi ruṣāviṣṭo hantuṁ devagaṇān yayau

अपनी सेना को इस प्रकार भ्रष्ट हुआ देखकर उसका पालक तारक असुर क्रोध से भरकर देवगणों का वध करने के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 34 (shiva.rudra.126.34)

भुजानामयुतं कृत्वा सिंहमारुह्य वेगतः । पातयामास तान्देवान् गणांश्च रणमूर्द्धनि

bhujānāmayutaṁ kṛtvā siṁhamāruhya vegataḥ pātayāmāsa tāndevān gaṇāṁśca raṇamūrddhani

दस हजार भुजाएँ धारण कर तथा सिंह पर आरूढ़ होकर वह अत्यंत वेग से युद्ध के अग्रभाग में उन देवताओं और गणों को गिराने लगा।

श्लोक 35 (shiva.rudra.126.35)

स दृष्ट्वा तस्य तत्कर्म वीरभद्रो गणाग्रणीः । चकार सुमहत्कोपं तद्वधाय महाबली

sa dṛṣṭvā tasya tatkarma vīrabhadro gaṇāgraṇīḥ cakāra sumahatkopaṁ tadvadhāya mahābalī

उसके इस कृत्य को देखकर गणाग्रणी वीरभद्र अत्यंत क्रोधित हो उठे, और उस महाबली ने उसके वध का निश्चय किया।

श्लोक 36 (shiva.rudra.126.36)

स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं जग्राह त्रिशिखं परम् । जज्वलुस्तेजसा तस्य दिशः सर्वा नभस्तथा

smṛtvā śivapadāmbhojaṁ jagrāha triśikhaṁ param jajvalustejasā tasya diśaḥ sarvā nabhastathā

शिव के चरणकमलों का स्मरण कर उसने अपना परम त्रिशूल ग्रहण किया; उसके तेज से समस्त दिशाएँ तथा आकाश भी प्रज्वलित हो उठे।

श्लोक 37 (shiva.rudra.126.37)

एतस्मिन्नन्तरे स्वामी वारयामास तं रणात् । वीरबाहुमुखान्सद्यो महाकौतुकदर्शकः

etasminnantare svāmī vārayāmāsa taṁ raṇāt vīrabāhumukhānsadyo mahākautukadarśakaḥ

इसी बीच स्वामी (कार्तिकेय) ने, जो यह महान कौतुक देख रहे थे, वीरबाहु आदि के द्वारा उसे तत्काल युद्ध से रोक दिया।

श्लोक 38 (shiva.rudra.126.38)

तदाज्ञया वीरभद्रो निवृत्तोऽभूद्रणात्तदा । कोपं चक्रे महावीरस्तारकोऽसुरनायकः

tadājñayā vīrabhadro nivṛtto'bhūdraṇāttadā kopaṁ cakre mahāvīrastārako'suranāyakaḥ

उस आज्ञा से वीरभद्र तब युद्ध से निवृत्त हो गए; और महावीर असुरनायक तारक और भी अधिक क्रोधित हो उठा।

श्लोक 39 (shiva.rudra.126.39)

चकार बाणवृष्टिं च सुरोपरि तदाऽसुरः । तप्तोऽऽह्वासीत्सुरान्सद्यो नानास्त्ररणकोविदः

cakāra bāṇavṛṣṭiṁ ca suropari tadā'suraḥ tapto''hvāsītsurānsadyo nānāstraraṇakovidaḥ

उस क्रुद्ध असुर ने देवताओं पर बाणों की वर्षा की, और नाना अस्त्रों के युद्ध में निपुण वह तत्काल देवताओं को ललकारने लगा।

श्लोक 40 (shiva.rudra.126.40)

एवं कृत्वा महत्कर्म तारकोऽसुरपालकः । सर्वेषामपि देवानामशक्यो बलिनां वरः

evaṁ kṛtvā mahatkarma tārako'surapālakaḥ sarveṣāmapi devānāmaśakyo balināṁ varaḥ

इस प्रकार यह महान कार्य करके असुरपालक तारक, जो बलवानों में श्रेष्ठ था, समस्त देवताओं के लिए भी अजेय हो गया।

श्लोक 41 (shiva.rudra.126.41)

एवं निहन्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवान् भयाकुलान् । कोपं कृत्वा रणायाशु सन्नद्धोऽभवदच्युतः

evaṁ nihanyamānāṁstān dṛṣṭvā devān bhayākulān kopaṁ kṛtvā raṇāyāśu sannaddho'bhavadacyutaḥ

देवताओं को इस प्रकार आहत तथा भयाकुल होते देखकर अच्युत क्रोधित होकर शीघ्र ही युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गए।

श्लोक 42 (shiva.rudra.126.42)

चक्रं सुदर्शनं शार्ङ्गं धनुरादाय सायुधः । अभ्युद्ययौ महादैत्यं रणाय भगवान् हरिः

cakraṁ sudarśanaṁ śārṅgaṁ dhanurādāya sāyudhaḥ abhyudyayau mahādaityaṁ raṇāya bhagavān hariḥ

सुदर्शन चक्र तथा शार्ङ्ग धनुष धारण कर सुसज्जित भगवान् हरि उस महादैत्य से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 43 (shiva.rudra.126.43)

ततःसमभवद्युद्धं हरितारकयोर्महत् । लोमहर्षणमत्युग्रं सर्वेषां पश्यतां मुने

tataḥsamabhavadyuddhaṁ haritārakayormahat lomaharṣaṇamatyugraṁ sarveṣāṁ paśyatāṁ mune

हे मुने! तब हरि और तारक के बीच एक महान, रोमांचकारी तथा अत्यंत उग्र युद्ध हुआ, जिसे सभी देख रहे थे।

श्लोक 44 (shiva.rudra.126.44)

गदामुद्यम्य स हरिर्जघानासुरमोजसा । द्विधा चकार तां दैत्यस्त्रिशिखेन महाबली

gadāmudyamya sa harirjaghānāsuramojasā dvidhā cakāra tāṁ daityastriśikhena mahābalī

गदा उठाकर हरि ने बलपूर्वक असुर पर प्रहार किया; उस महाबली दैत्य ने अपने त्रिशूल से उसे दो टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 45 (shiva.rudra.126.45)

ततः स क्रुद्धो भगवान्देवानामभयङ्करः । शार्ङ्गच्युतैः शरव्यूहैर्जघानासुरनायकम्

tataḥ sa kruddho bhagavāndevānāmabhayaṅkaraḥ śārṅgacyutaiḥ śaravyūhairjaghānāsuranāyakam

तब क्रुद्ध होकर देवताओं को अभय देने वाले भगवान् ने शार्ङ्ग धनुष से छूटे बाण-समूहों से असुरनायक पर प्रहार किया।

श्लोक 46 (shiva.rudra.126.46)

सोऽपि दैत्यो महावीरस्तारकः परवीरहा । चिच्छेद सकलान्बाणान्स्वशरैर्निशितैर्द्रुतम्

so'pi daityo mahāvīrastārakaḥ paravīrahā ciccheda sakalānbāṇānsvaśarairniśitairdrutam

वह महावीर दैत्य तारक, जो शत्रु-वीरों का संहारक था, अपने तीक्ष्ण बाणों से उन सभी बाणों को शीघ्र ही काट डाला।

श्लोक 47 (shiva.rudra.126.47)

अथ शक्त्या जघानाशु मुरारिं तारकासुरः । भूमौ पपात स हरिस्तत्प्रहारेण मूर्च्छितः

atha śaktyā jaghānāśu murāriṁ tārakāsuraḥ bhūmau papāta sa haristatprahāreṇa mūrcchitaḥ

तब तारकासुर ने अपनी शक्ति से मुरारि पर तत्काल प्रहार किया; उस प्रहार से मूर्च्छित होकर हरि भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 48 (shiva.rudra.126.48)

जग्राह स रुषा चक्रमुत्थितः क्षणतोऽच्युतः । सिंहनादं महत्कृत्वा ज्वलज्ज्वालासमाकुलम्

jagrāha sa ruṣā cakramutthitaḥ kṣaṇato'cyutaḥ siṁhanādaṁ mahatkṛtvā jvalajjvālāsamākulam

अच्युत क्षणभर में उठकर क्रोधपूर्वक अपना धधकती ज्वाला से भरा चक्र उठा लिया, और महान सिंहनाद किया।

श्लोक 49 (shiva.rudra.126.49)

तेन तं च जघानासौ दैत्यानामधिपं हरिः । तत्प्रहारेण महता व्यथितो न्यपतद्भुवि

tena taṁ ca jaghānāsau daityānāmadhipaṁ hariḥ tatprahāreṇa mahatā vyathito nyapatadbhuvi

उससे हरि ने उस दैत्यों के स्वामी पर प्रहार किया; उस भीषण प्रहार से पीड़ित होकर वह भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 50 (shiva.rudra.126.50)

पुनश्चोत्थाय दैत्येन्द्रस्तारकोऽसुरनायकः । चिच्छेद त्वरितं चक्रं स्वशक्त्यातिबलान्वितः

punaścotthāya daityendrastārako'suranāyakaḥ ciccheda tvaritaṁ cakraṁ svaśaktyātibalānvitaḥ

पुनः उठकर दैत्येन्द्र, असुरनायक तारक ने अत्यंत बलशाली होकर अपनी शक्ति से उस चक्र को तत्काल काट डाला।

श्लोक 51 (shiva.rudra.126.51)

पुनस्तया महाशक्त्या जघानामरवल्लभम् । अच्युतोऽपि महावीरो नन्दकेन जघान तम्

punastayā mahāśaktyā jaghānāmaravallabham acyuto'pi mahāvīro nandakena jaghāna tam

पुनः उस महाशक्ति से उसने देवताओं के प्रिय पर प्रहार किया; तब महावीर अच्युत ने भी अपनी नन्दक तलवार से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 52 (shiva.rudra.126.52)

एवमन्योऽन्यमसुरो विष्णुश्च बलवानुभौ । युयुधाते रणे भूरि तत्राक्षतबलौ मुने

evamanyo'nyamasuro viṣṇuśca balavānubhau yuyudhāte raṇe bhūri tatrākṣatabalau mune

हे मुने! इस प्रकार वह असुर और विष्णु, दोनों बलवान, उस रणभूमि में दीर्घकाल तक परस्पर युद्ध करते रहे, और दोनों का बल वहाँ अक्षत ही बना रहा।

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127