रुद्र संहिता · अध्याय 3
नारद का मोहग्रस्त होना
श्लोक 1 (shiva.rudra.3.1)
ऋषय ऊचुः । सूत सूत महाभाग व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते । अद्भुतेयं कथा तात वर्णिता कृपया हि नः
ṛṣaya ūcuḥ sūta sūta mahābhāga vyāsaśiṣya namo'stu te adbhuteyaṁ kathā tāta varṇitā kṛpayā hi naḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूत, सूत! हे महाभाग्यशाली, व्यास के शिष्य! आपको नमस्कार है। हे तात! आपने कृपापूर्वक हमें यह अद्भुत कथा सुनाई है।
श्लोक 2 (shiva.rudra.3.2)
मुनौ गते हरिस्तात किञ्चकार ततः परम् । नारदोऽपि गतः कुत्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि
munau gate haristāta kiñcakāra tataḥ param nārado'pi gataḥ kutra tanme vyākhyātumarhasi
हे तात! मुनि के चले जाने पर हरि ने फिर क्या किया? नारद भी कहाँ गये? यह हमें बताने की कृपा कीजिए।
श्लोक 3 (shiva.rudra.3.3)
व्यास उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तेषां सूतः पौराणिकोत्तमः । प्रत्युवाच शिवं स्मृत्वा नानासूतिकरं बुधः
vyāsa uvāca ityākarṇya vacasteṣāṁ sūtaḥ paurāṇikottamaḥ pratyuvāca śivaṁ smṛtvā nānāsūtikaraṁ budhaḥ
व्यास जी ने कहा — उनके यह वचन सुनकर पुराणकथाकारों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान सूत जी ने नाना प्रकार के कल्याण करने वाले शिव का स्मरण करके उत्तर दिया।
श्लोक 4 (shiva.rudra.3.4)
सूत उवाच । मुनौ यदृच्छया विष्णुर्गते तस्मिन्हि नारदे । शिवेच्छया चकाराशु मायां मायाविशारदः
sūta uvāca munau yadṛcchayā viṣṇurgate tasminhi nārade śivecchayā cakārāśu māyāṁ māyāviśāradaḥ
सूत जी ने कहा — मुनि के अपनी इच्छा से चले जाने पर, शिव की इच्छा से मायाकुशल विष्णु ने शीघ्र एक माया रची।
श्लोक 5 (shiva.rudra.3.5)
मुनिमार्गस्य मध्ये तु विरेचे नगरं महत् । शतयोजनविस्तारमद्भुतं सुमनोहरम्
munimārgasya madhye tu virece nagaraṁ mahat śatayojanavistāramadbhutaṁ sumanoharam
मुनि के मार्ग के बीच में सौ योजन विस्तार वाला, अद्भुत और अत्यन्त मनोहर एक विशाल नगर प्रकट हो गया।
श्लोक 6 (shiva.rudra.3.6)
स्वलोकादधिकं रम्यं नानावस्तुविराजितम् । नरनारीविहाराढ्यं चतुर्वर्णाकुलं परम्
svalokādadhikaṁ ramyaṁ nānāvastuvirājitam naranārīvihārāḍhyaṁ caturvarṇākulaṁ param
वह अपने लोक से भी अधिक रमणीय था, नाना वस्तुओं से सुशोभित, नर-नारियों के विहार से समृद्ध, चारों वर्णों के लोगों से परिपूर्ण।
श्लोक 7 (shiva.rudra.3.7)
तत्र राजा शीलनिधिर्नामैश्वर्यसमन्वितः । सुतास्वयम्वरोद्युक्तो महोत्सवसमन्वितः
tatra rājā śīlanidhirnāmaiśvaryasamanvitaḥ sutāsvayamvarodyukto mahotsavasamanvitaḥ
वहाँ शीलनिधि नामक राजा ऐश्वर्य से सम्पन्न राज्य करते थे, जो अपनी पुत्री के स्वयंवर की तैयारी में लगे थे, और महोत्सव मनाया जा रहा था।
श्लोक 8 (shiva.rudra.3.8)
चतुर्दिग्भ्यः समायातैः संयुतं नृपनन्दनैः । नानावेषैः सुशोभैश्च तत्कन्यावरणोत्सुकैः
caturdigbhyaḥ samāyātaiḥ saṁyutaṁ nṛpanandanaiḥ nānāveṣaiḥ suśobhaiśca tatkanyāvaraṇotsukaiḥ
वह चारों दिशाओं से आये हुए, नाना सुन्दर वेषों में सजे, उस कन्या को वरण करने के लिए उत्सुक राजकुमारों से भरा हुआ था।
श्लोक 9 (shiva.rudra.3.9)
एतादृशं पुरं दृष्ट्वा मोहं प्राप्तोऽथ नारदः । कौतुकी तन्नृपद्वारं जगाम मदनैधितः
etādṛśaṁ puraṁ dṛṣṭvā mohaṁ prāpto'tha nāradaḥ kautukī tannṛpadvāraṁ jagāma madanaidhitaḥ
ऐसे नगर को देखकर नारद मोहग्रस्त हो गये; कौतुकवश और काम से उद्दीप्त होकर वे उस राजा के द्वार पर गये।
श्लोक 10 (shiva.rudra.3.10)
आगतं मुनिवर्यं तं दृष्ट्वा शीलनिधिर्नृपः । उपवेश्यार्चयाञ्चक्रे रत्नसिंहासने वरे
āgataṁ munivaryaṁ taṁ dṛṣṭvā śīlanidhirnṛpaḥ upaveśyārcayāñcakre ratnasiṁhāsane vare
आये हुए उस श्रेष्ठ मुनि को देखकर राजा शीलनिधि ने उन्हें उत्तम रत्नजड़ित सिंहासन पर बिठाकर उनकी पूजा की।
श्लोक 11 (shiva.rudra.3.11)
अथ राजा स्वतनयां नामतः श्रीमतीं वराम् । नारदस्य समानीय पादयोः समपातयत्
atha rājā svatanayāṁ nāmataḥ śrīmatīṁ varām nāradasya samānīya pādayoḥ samapātayat
तब राजा ने अपनी सुन्दर पुत्री श्रीमती नामक कन्या को लाकर नारद के चरणों में प्रणाम कराया।
श्लोक 12 (shiva.rudra.3.12)
तत्कन्यां प्रेक्ष्य स मुनिर्नारदः प्राह विस्मितः । केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा
tatkanyāṁ prekṣya sa munirnāradaḥ prāha vismitaḥ keyaṁ rājanmahābhāgā kanyā surasutopamā
उस कन्या को देखकर आश्चर्यचकित मुनि नारद ने कहा — हे राजन्! देवकन्या के समान यह महाभाग्यशाली कन्या कौन है?
श्लोक 13 (shiva.rudra.3.13)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा प्राह कृताञ्जलिः । दुहितेयं मम मुने श्रीमती नाम नामतः
tasya tadvacanaṁ śrutvā rājā prāha kṛtāñjaliḥ duhiteyaṁ mama mune śrīmatī nāma nāmataḥ
उनका वह वचन सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर कहा — हे मुने! यह मेरी पुत्री है, इसका नाम श्रीमती है।
श्लोक 14 (shiva.rudra.3.14)
प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषती शुभम् । सा स्वयम्वरसम्प्राप्ता सर्वलक्षणलक्षिता
pradānasamayaṁ prāptā varamanveṣatī śubham sā svayamvarasamprāptā sarvalakṣaṇalakṣitā
यह विवाह योग्य आयु को प्राप्त होकर शुभ वर की खोज में है; सर्वलक्षणसम्पन्न यह कन्या स्वयंवर के लिए प्रस्तुत हुई है।
श्लोक 15 (shiva.rudra.3.15)
अस्या भाग्यं वद मुने सर्वं जातकमादरात् । कीदृशं तनयेयं मे वरमाप्स्यति तद्वद
asyā bhāgyaṁ vada mune sarvaṁ jātakamādarāt kīdṛśaṁ tanayeyaṁ me varamāpsyati tadvada
हे मुने! आप आदरपूर्वक इसका सम्पूर्ण भाग्य और जन्मपत्री बताइये — यह मेरी पुत्री कैसा वर पायेगी, यह भी कहिये।
श्लोक 16 (shiva.rudra.3.16)
इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामिच्छुः कामविह्वलः । समाभाष्य स राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्
ityukto muniśārdūlastāmicchuḥ kāmavihvalaḥ samābhāṣya sa rājānaṁ nārado vākyamabravīt
इस प्रकार कहे जाने पर, उस कन्या की इच्छा करते हुए, काम से विह्वल हो चुके मुनिश्रेष्ठ नारद ने राजा को सम्बोधित कर यह वचन कहा —
श्लोक 17 (shiva.rudra.3.17)
सुतेयं तव भूपाल सर्वलक्षणलक्षिता । महाभाग्यवती धन्या लक्ष्मीरिव गुणालया
suteyaṁ tava bhūpāla sarvalakṣaṇalakṣitā mahābhāgyavatī dhanyā lakṣmīriva guṇālayā
हे भूपाल! आपकी यह पुत्री सर्वलक्षणसम्पन्न है; यह महाभाग्यशाली, धन्य और लक्ष्मी के समान गुणों की आगार है।
श्लोक 18 (shiva.rudra.3.18)
सर्वेश्वरोऽजितो वीरो गिरीशसदृशो विभुः । अस्याः पतिर्ध्रुवं भावी कामजित्सुरसत्तमः
sarveśvaro'jito vīro girīśasadṛśo vibhuḥ asyāḥ patirdhruvaṁ bhāvī kāmajitsurasattamaḥ
इसका पति निश्चय ही सबका स्वामी, अजेय, वीर, गिरीश के समान प्रभावशाली, कामदेव का विजेता और देवताओं में श्रेष्ठ होगा।
श्लोक 19 (shiva.rudra.3.19)
इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य ययौ यादृच्छिको मुनिः । बभूव कामविवशः शिवमायाविमोहितः
ityuktvā nṛpamāmantrya yayau yādṛcchiko muniḥ babhūva kāmavivaśaḥ śivamāyāvimohitaḥ
यह कहकर राजा से विदा लेकर वह मुनि अपनी इच्छानुसार चले गये, और शिव की माया से मोहित होकर पूर्णतः काम के वश में हो गये।
श्लोक 20 (shiva.rudra.3.20)
चित्ते विचिन्त्य स मुनिराप्नुयां कन्यकां कथम् । स्वयंवरे नृपालानामेकं मां वृणुयात्कथम्
citte vicintya sa munirāpnuyāṁ kanyakāṁ katham svayaṁvare nṛpālānāmekaṁ māṁ vṛṇuyātkatham
मुनि ने मन में विचार किया — मैं इस कन्या को कैसे प्राप्त करूँ? स्वयंवर में उपस्थित इतने राजाओं में से यह मुझ अकेले को कैसे चुनेगी?
श्लोक 21 (shiva.rudra.3.21)
सौन्दर्यं सर्वनारीणां प्रियं भवति सर्वथा । तद् दृष्ट्वैव प्रसन्ना सा स्ववशा नात्र संशयः
saundaryaṁ sarvanārīṇāṁ priyaṁ bhavati sarvathā tad dṛṣṭvaiva prasannā sā svavaśā nātra saṁśayaḥ
सुन्दरता सभी स्त्रियों को सदा प्रिय होती है; उसे देखते ही वह प्रसन्न होकर मेरे वश में हो जायेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 22 (shiva.rudra.3.22)
विधायेत्थं विष्णुरूपं ग्रहीतुं मुनिसत्तमः । विष्णुलोकं जगामाशु नारदः स्मरविह्वलः
vidhāyetthaṁ viṣṇurūpaṁ grahītuṁ munisattamaḥ viṣṇulokaṁ jagāmāśu nāradaḥ smaravihvalaḥ
इस प्रकार विष्णु का रूप ग्रहण करने का विचार कर, मुनिश्रेष्ठ नारद काम से विह्वल होकर शीघ्र विष्णुलोक गये।
श्लोक 23 (shiva.rudra.3.23)
प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह । रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि स्ववृत्तान्तमशेषतः
praṇipatya hṛṣīkeśaṁ vākyametaduvāca ha rahasi tvāṁ pravakṣyāmi svavṛttāntamaśeṣataḥ
हृषीकेश को प्रणाम करके उन्होंने यह वचन कहा — मैं एकान्त में आपसे अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहूँगा।
श्लोक 24 (shiva.rudra.3.24)
तथेत्युक्ते तथाभूते शिवेच्छाकार्यकर्तरि । ब्रूहीत्युक्तवति श्रीशे मुनिराह च केशवम्
tathetyukte tathābhūte śivecchākāryakartari brūhītyuktavati śrīśe munirāha ca keśavam
शिव की इच्छा से कार्य करने वाले श्रीश (विष्णु) के 'ऐसा ही हो, कहो' कहने पर मुनि ने केशव से कहा —
श्लोक 25 (shiva.rudra.3.25)
नारद उवाच । त्वदीयो भूपतिः शीलनिधिः स वृषतत्परः । तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती वरवर्णिनी
nārada uvāca tvadīyo bhūpatiḥ śīlanidhiḥ sa vṛṣatatparaḥ tasya kanyā viśālākṣī śrīmatī varavarṇinī
नारद ने कहा — आपका भक्त राजा शीलनिधि धर्मपरायण है; उसकी विशाललोचना, सुन्दर वर्ण वाली पुत्री का नाम श्रीमती है।
श्लोक 26 (shiva.rudra.3.26)
जगन्मोहिन्यभिख्याता त्रैलोक्येऽप्यतिसुन्दरी । परिणेतुमहं विष्णो तामिच्छाम्यद्य मा चिरम्
jaganmohinyabhikhyātā trailokye'pyatisundarī pariṇetumahaṁ viṣṇo tāmicchāmyadya mā ciram
वह जगन्मोहिनी के नाम से प्रसिद्ध है, तीनों लोकों में भी अत्यन्त सुन्दर है; हे विष्णु! मैं आज ही, बिना विलम्ब, उसे विवाहना चाहता हूँ।
श्लोक 27 (shiva.rudra.3.27)
स्वयम्वरं चकारासौ भूपतिस्तनयेच्छया । चतुर्दिग्भ्यः समायाता राजपुत्राः सहस्रशः
svayamvaraṁ cakārāsau bhūpatistanayecchayā caturdigbhyaḥ samāyātā rājaputrāḥ sahasraśaḥ
उस राजा ने अपनी पुत्री की इच्छा से स्वयंवर रचाया है; चारों दिशाओं से हजारों राजकुमार वहाँ एकत्रित हुए हैं।
श्लोक 28 (shiva.rudra.3.28)
यदि दास्यसि रूपं मे तदा तां प्राप्नुयां ध्रुवम् । त्वद्रूपं सा विना कण्ठे जयमालां न धास्यति
yadi dāsyasi rūpaṁ me tadā tāṁ prāpnuyāṁ dhruvam tvadrūpaṁ sā vinā kaṇṭhe jayamālāṁ na dhāsyati
यदि आप मुझे अपना रूप दे दें, तो मैं निश्चय ही उसे प्राप्त कर लूँगा; आपके रूप के बिना वह किसी अन्य के गले में जयमाला नहीं डालेगी।
श्लोक 29 (shiva.rudra.3.29)
स्वरूपं देहि मे नाथ सेवकोऽहं प्रियस्तव । वृणुयान्मां यथा सा वै श्रीमती क्षितिपात्मजा
svarūpaṁ dehi me nātha sevako'haṁ priyastava vṛṇuyānmāṁ yathā sā vai śrīmatī kṣitipātmajā
हे नाथ! मुझे अपना स्वरूप दीजिए; मैं आपका सेवक और प्रिय हूँ — जिससे वह राजकुमारी श्रीमती मुझे ही वरण करे।
श्लोक 30 (shiva.rudra.3.30)
सूत उवाच । वचः श्रुत्वा मुनेरित्थं विहस्य मधुसूदनः । शाङ्करीं प्रभुतां बुध्वा प्रत्युवाच दयापरः
sūta uvāca vacaḥ śrutvā muneritthaṁ vihasya madhusūdanaḥ śāṅkarīṁ prabhutāṁ budhvā pratyuvāca dayāparaḥ
सूत जी ने कहा — मुनि का यह वचन सुनकर मधुसूदन मुस्कुराए, और शंकर की इस लीला को समझकर, दयालु विष्णु ने उत्तर दिया।
श्लोक 31 (shiva.rudra.3.31)
विष्णुरुवाच । स्वेष्टदेशं मुने गच्छ करिष्यामि हितं तव । भिषग्वरो यथार्तस्य यतः प्रियतरोऽसि मे
viṣṇuruvāca sveṣṭadeśaṁ mune gaccha kariṣyāmi hitaṁ tava bhiṣagvaro yathārtasya yataḥ priyataro'si me
विष्णु ने कहा — हे मुने! अपने अभीष्ट स्थान को जाओ, मैं तुम्हारा हित करूँगा — जैसे वैद्य रोगी का हित करता है, क्योंकि तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो।
श्लोक 32 (shiva.rudra.3.32)
इत्युक्त्वा मुनये तस्मै ददौ विष्णुर्मुखं हरेः । स्वरूपमनुगृह्यास्य तिरोधानं जगाम सः
ityuktvā munaye tasmai dadau viṣṇurmukhaṁ hareḥ svarūpamanugṛhyāsya tirodhānaṁ jagāma saḥ
यह कहकर विष्णु ने उस मुनि को हरि (वानर) का मुख दे दिया; अपना ही स्वरूप देने का अनुग्रह मानकर वे स्वयं अन्तर्धान हो गये।
श्लोक 33 (shiva.rudra.3.33)
एवमुक्तो मुनिर्हृष्टः स्वरूपं प्राप्य वै हरेः । मेने कृतार्थमात्मानं तद्यत्नं न बुबोध सः
evamukto munirhṛṣṭaḥ svarūpaṁ prāpya vai hareḥ mene kṛtārthamātmānaṁ tadyatnaṁ na bubodha saḥ
इस प्रकार कहे जाने पर मुनि प्रसन्न हुए, और हरि का रूप पाकर स्वयं को कृतार्थ मान बैठे; उन्होंने उस छिपे प्रयोजन को नहीं समझा।
श्लोक 34 (shiva.rudra.3.34)
अथ तत्र गतः शीघ्रं नारदो मुनिसत्तमः । चक्रे स्वयम्वरं यत्र राजपुत्रैः समाकुलम्
atha tatra gataḥ śīghraṁ nārado munisattamaḥ cakre svayamvaraṁ yatra rājaputraiḥ samākulam
तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र ही वहाँ पहुँचे, जहाँ राजकुमारों से भरा हुआ वह स्वयंवर आयोजित हो रहा था।
श्लोक 35 (shiva.rudra.3.35)
स्वयम्वरसभा दिव्या राजपुत्रसमावृता । शुशुभेऽतीव विप्रेन्द्रा यथा शक्रसभापरा
svayamvarasabhā divyā rājaputrasamāvṛtā śuśubhe'tīva viprendrā yathā śakrasabhāparā
हे श्रेष्ठ विप्रो! राजकुमारों से घिरी वह दिव्य स्वयंवर सभा इन्द्र की सभा के समान अत्यन्त शोभायमान हो रही थी।
श्लोक 36 (shiva.rudra.3.36)
तस्यां नृपसभायां वै नारदः समुपाविशत् । स्थित्वा तत्र विचिन्त्येति प्रीतियुक्तेन चेतसा
tasyāṁ nṛpasabhāyāṁ vai nāradaḥ samupāviśat sthitvā tatra vicintyeti prītiyuktena cetasā
उस राजसभा में नारद जा बैठे, और वहाँ स्थित होकर प्रसन्नचित्त होकर मन में इस प्रकार विचार करने लगे —
श्लोक 37 (shiva.rudra.3.37)
मां वरिष्यति नान्यं सा विष्णुरूपधरं ध्रुवम् । आननस्य कुरूपत्वं न वेद मुनिसत्तमः
māṁ variṣyati nānyaṁ sā viṣṇurūpadharaṁ dhruvam ānanasya kurūpatvaṁ na veda munisattamaḥ
'वह मुझे ही वरेगी, अन्य किसी को नहीं, क्योंकि मैं विष्णु का रूप धारण किये हूँ' — उस मुनिश्रेष्ठ को अपने मुख की कुरूपता का ज्ञान नहीं था।
श्लोक 38 (shiva.rudra.3.38)
पूर्वरूपं मुनिं सर्वे ददृशुस्तत्र मानवाः । तद्भेदं बुबुधुस्ते न राजपुत्रादयो द्विजाः
pūrvarūpaṁ muniṁ sarve dadṛśustatra mānavāḥ tadbhedaṁ bubudhuste na rājaputrādayo dvijāḥ
वहाँ उपस्थित सभी मनुष्यों ने मुनि को उनके पूर्व (स्वाभाविक) रूप में ही देखा; राजकुमार आदि द्विजों ने उस भेद को नहीं जाना।
श्लोक 39 (shiva.rudra.3.39)
तत्र रुद्रगणौ द्वौ तद्रक्षणार्थं समागतौ । विप्ररूपधरौ गूढौ तद्भेदं जज्ञतुः परम्
tatra rudragaṇau dvau tadrakṣaṇārthaṁ samāgatau viprarūpadharau gūḍhau tadbhedaṁ jajñatuḥ param
वहाँ रुद्र के दो गण उसकी रक्षा के लिए गुप्त रूप से ब्राह्मण-वेष धारण कर आये हुए थे; केवल उन्होंने ही वह भेद पूर्णतः जान लिया।
श्लोक 40 (shiva.rudra.3.40)
मूढं मत्वा मुनिं तौ तन्निकटं जग्मतुर्गणौ । कुरुतस्तत्प्रहासं वै भाषमाणौ परस्परम्
mūḍhaṁ matvā muniṁ tau tannikaṭaṁ jagmaturgaṇau kurutastatprahāsaṁ vai bhāṣamāṇau parasparam
मुनि को मूढ़ मानकर वे दोनों गण उनके निकट गये, और आपस में बोलते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे —
श्लोक 41 (shiva.rudra.3.41)
पश्य नारदरूपं हि विष्णोरिव महोत्तमम् । मुखं तु वानरस्येव विकटं च भयङ्करम्
paśya nāradarūpaṁ hi viṣṇoriva mahottamam mukhaṁ tu vānarasyeva vikaṭaṁ ca bhayaṅkaram
देखो, नारद का यह रूप मानो विष्णु के समान श्रेष्ठ है! परन्तु मुख तो वानर के समान विकट और भयंकर है।
श्लोक 42 (shiva.rudra.3.42)
इच्छत्ययं नृपसुतां वृथैव स्मरमोहितः । इत्युक्त्वा सच्छलं वाक्यमुपहासं प्रचक्रतुः
icchatyayaṁ nṛpasutāṁ vṛthaiva smaramohitaḥ ityuktvā sacchalaṁ vākyamupahāsaṁ pracakratuḥ
काम से मोहित यह व्यर्थ ही राजकुमारी की इच्छा कर रहा है — यह छलपूर्ण वचन कहकर उन दोनों ने उसका उपहास किया।
श्लोक 43 (shiva.rudra.3.43)
न शुश्राव यथार्थं तु तद्वाक्यं स्मरविह्वलः । पर्यैक्षच्छ्रीमतीं तां वै तल्लिप्सुर्मोहितो मुनिः
na śuśrāva yathārthaṁ tu tadvākyaṁ smaravihvalaḥ paryaikṣacchrīmatīṁ tāṁ vai tallipsurmohito muniḥ
काम से विह्वल मुनि ने उनके उस वचन को यथार्थ रूप में नहीं सुना; मोहग्रस्त होकर वे उसे पाने की चाह में श्रीमती को ही निहारते रहे।
श्लोक 44 (shiva.rudra.3.44)
एतस्मिन्नन्तरे भूपकन्या चान्तःपुरात्तु सा । स्त्रीभिः समावृता तत्राजगाम वरवर्णिनी
etasminnantare bhūpakanyā cāntaḥpurāttu sā strībhiḥ samāvṛtā tatrājagāma varavarṇinī
इसी बीच वह सुन्दरवर्णा राजकन्या अपनी सखियों से घिरी हुई अन्तःपुर से वहाँ आ पहुँची।
श्लोक 45 (shiva.rudra.3.45)
मालां हिरण्मयीं रम्यामादाय शुभलक्षणा । तत्र स्वयम्वरे रेजे स्थिता मध्ये रमेव सा
mālāṁ hiraṇmayīṁ ramyāmādāya śubhalakṣaṇā tatra svayamvare reje sthitā madhye rameva sā
शुभलक्षणा वह सुवर्णमयी सुन्दर माला लिए हुए उस स्वयंवर में मध्य में स्थित रमा के समान शोभा दे रही थी।
श्लोक 46 (shiva.rudra.3.46)
बभ्राम सा सभां सर्वां मालामादाय सुव्रता । वरमन्वेषती तत्र स्वात्माभीष्टं नृपात्मजा
babhrāma sā sabhāṁ sarvāṁ mālāmādāya suvratā varamanveṣatī tatra svātmābhīṣṭaṁ nṛpātmajā
वह सुव्रता राजकुमारी माला हाथ में लिए हुए अपने मनचाहे वर की खोज करती हुई पूरी सभा में घूमने लगी।
श्लोक 47 (shiva.rudra.3.47)
वानरास्यं विष्णुतनुं मुनिं दृष्ट्वा चुकोप सा । दृष्टिं निवार्य च ततः प्रस्थिता प्रीतमानसा
vānarāsyaṁ viṣṇutanuṁ muniṁ dṛṣṭvā cukopa sā dṛṣṭiṁ nivārya ca tataḥ prasthitā prītamānasā
वानर-मुख वाले और विष्णु के शरीर वाले उस मुनि को देखकर वह क्रुद्ध हो गई; दृष्टि हटाकर प्रसन्नचित्त होकर वहाँ से आगे बढ़ गई।
श्लोक 48 (shiva.rudra.3.48)
न दृष्ट्वा स्ववरं तत्र त्रस्तासीन्मनेप्सितम् । अन्तःसभास्थिता कस्मिन्नर्पयामास न स्रजम्
na dṛṣṭvā svavaraṁ tatra trastāsīnmanepsitam antaḥsabhāsthitā kasminnarpayāmāsa na srajam
वहाँ अपने अभीष्ट वर को न देखकर वह भयभीत हो गई; सभा के भीतर स्थित रहकर भी उसने किसी को माला नहीं पहनाई।
श्लोक 49 (shiva.rudra.3.49)
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुराजगाम नृपाकृतिः । न दृष्टः कैश्चिदपरैः केवलं सा ददर्श हि
etasminnantare viṣṇurājagāma nṛpākṛtiḥ na dṛṣṭaḥ kaiścidaparaiḥ kevalaṁ sā dadarśa hi
इसी बीच विष्णु स्वयं राजा के रूप में वहाँ आये; उन्हें अन्य किसी ने नहीं देखा, केवल उसी राजकुमारी ने उन्हें देखा।
श्लोक 50 (shiva.rudra.3.50)
अथ सा तं समालोक्य प्रसन्नवदनाम्बुजा । अर्पयामास तत्कण्ठे तां मालां वरवर्णिनी
atha sā taṁ samālokya prasannavadanāmbujā arpayāmāsa tatkaṇṭhe tāṁ mālāṁ varavarṇinī
उन्हें देखते ही उस सुन्दरवर्णा राजकुमारी का मुखकमल प्रसन्नता से खिल उठा, और उसने उनके गले में वह माला डाल दी।
श्लोक 51 (shiva.rudra.3.51)
तामादाय ततो विष्णू राजरूपधरः प्रभुः । अन्तर्धानमगात्सद्यः स्वस्थानं प्रययौ किल
tāmādāya tato viṣṇū rājarūpadharaḥ prabhuḥ antardhānamagātsadyaḥ svasthānaṁ prayayau kila
उसे लेकर तत्पश्चात् राजरूपधारी प्रभु विष्णु तत्काल अन्तर्धान हो गये, और वस्तुतः अपने ही स्थान को चले गये।
श्लोक 52 (shiva.rudra.3.52)
सर्वे राजकुमाराश्च निराशाः श्रीमतीं प्रति । मुनिस्तु विह्वलोऽतीव बभूव मदनातुरः
sarve rājakumārāśca nirāśāḥ śrīmatīṁ prati munistu vihvalo'tīva babhūva madanāturaḥ
श्रीमती को न पाकर सभी राजकुमार निराश हो गये; और वह मुनि काम-पीड़ा से अत्यन्त विह्वल हो उठे।
श्लोक 53 (shiva.rudra.3.53)
तदा तावूचतुः सद्यो नारदं स्मरविह्वलम् । विप्ररूपधरौ रुद्रगणौ ज्ञानविशारदौ
tadā tāvūcatuḥ sadyo nāradaṁ smaravihvalam viprarūpadharau rudragaṇau jñānaviśāradau
तब ब्राह्मण-वेषधारी, ज्ञानकुशल उन दोनों रुद्रगणों ने काम-विह्वल नारद से तत्काल यह कहा —
श्लोक 54 (shiva.rudra.3.54)
गणावूचतुः हे नारद मुने त्वं हि वृथा मदनमोहितः । तल्लिप्सुः स्वमुखं पश्य वानरस्येव गर्हितम्
gaṇāvūcatuḥ he nārada mune tvaṁ hi vṛthā madanamohitaḥ tallipsuḥ svamukhaṁ paśya vānarasyeva garhitam
गणों ने कहा — हे नारद मुने! तुम व्यर्थ ही काम से मोहित हो; उसे पाने की चाह में अपना मुख तो देखो, जो वानर के समान निन्दनीय है।
श्लोक 55 (shiva.rudra.3.55)
सूत उवाच । इत्याकर्ण्य तयोर्वाक्यं नारदो विस्मितोऽभवत् । मुखं ददर्श मुकुरे शिवमायाविमोहितः
sūta uvāca ityākarṇya tayorvākyaṁ nārado vismito'bhavat mukhaṁ dadarśa mukure śivamāyāvimohitaḥ
सूत जी ने कहा — उन दोनों का यह वचन सुनकर नारद चकित रह गये; शिव की माया से मोहित होकर उन्होंने दर्पण में अपना मुख देखा।
श्लोक 56 (shiva.rudra.3.56)
स्वमुखं वानरस्येव दृष्ट्वा चुक्रोध सत्वरम् । शापं ददौ तयोस्तत्र गणयोर्मोहितो मुनिः
svamukhaṁ vānarasyeva dṛṣṭvā cukrodha satvaram śāpaṁ dadau tayostatra gaṇayormohito muniḥ
अपने मुख को वानर के समान देखकर वे तुरन्त क्रुद्ध हो गये; मोहग्रस्त मुनि ने वहाँ उन दोनों गणों को शाप दे दिया।
श्लोक 57 (shiva.rudra.3.57)
युवां ममोपहासं वै चक्रतुर्ब्राह्मणस्य हि । भवेतां राक्षसौ विप्रवीर्यजौ वै तदाकृती
yuvāṁ mamopahāsaṁ vai cakraturbrāhmaṇasya hi bhavetāṁ rākṣasau vipravīryajau vai tadākṛtī
तुम दोनों ने एक ब्राह्मण का उपहास किया है, अतः तुम दोनों उसी वानर-आकृति के साथ, ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न राक्षस बन जाओ।
श्लोक 58 (shiva.rudra.3.58)
श्रुत्वा हरगणावित्थं स्वशापं ज्ञानिसत्तमौ । न किञ्चिदूचतुस्तौ हि मुनिमाज्ञाय मोहितम्
śrutvā haragaṇāvitthaṁ svaśāpaṁ jñānisattamau na kiñcidūcatustau hi munimājñāya mohitam
ज्ञानियों में श्रेष्ठ उन दोनों शिवगणों ने अपने ऊपर पड़े इस शाप को सुनकर, मुनि को मोहग्रस्त जानकर, कुछ भी नहीं कहा।
श्लोक 59 (shiva.rudra.3.59)
स्वस्थानं जग्मतुर्विप्रा उदासीनौ शिवस्तुतिम् । चक्रतुर्मन्यमानौ वै शिवेच्छां सकलां सदा
svasthānaṁ jagmaturviprā udāsīnau śivastutim cakraturmanyamānau vai śivecchāṁ sakalāṁ sadā
वे उदासीन द्विज अपने स्थान को चले गये, शिव की स्तुति करते हुए, और सदा यह मानते हुए कि यह सब शिव की ही इच्छा है।